मंगलवार, 13 जून 2017

👉 नारी जागरण की दूरगामी सम्भावनाएँ (भाग 2)

🔵 पिछड़े वर्ग को ऊँचा उठाने की इन दिनों प्रबल माँग है। इस के लिए अनुसूचित जातियों, जनजातियों को समर्थ बनाने के प्रयत्न चल रहे है। इस औचित्य में एक कड़ी और जुड़नी चाहिए कि हर दृष्टि में हेय स्थिति में पड़ी हुई, दूसरे दर्जे के नागरिक जैसा जीवन जीने वाली अनेकानेक सामाजिक प्रतिबन्धों में जकड़ी हुई नारी को भी एकता और समा का लाभ मिले। इस ओर से आँखें बन्द किए रहना सम्भवतः प्रगति में चट्टान बनकर अड़ा ही रहेगा।

🔴 अपंग स्तर का व्यक्ति स्वयं कुछ नहीं कर पाता, दूसरों की अनुकम्पा पर जीता है। पर यदि उसकी स्थिति अन्य समर्थों जैसी हो जाय तो किसी के अनुग्रह पर रहने की अपेक्षा वह अपने परिकर को अपनी उपलब्धियों से लाद सकता है। जब लेने वाला देने वाले में बदल जाय तो समझना चाहिए कि खाई पटी और उस स्थान पर ऊँची मीनार खड़ी हो गई। आधी जनसंख्या तक स्वतंत्रता का आलोक पहुँचाना और उसे अपने पैरों खड़ा हो सकने योग्य बनाना उस पुरुष वर्ग का विशेष रूप से कर्तव्य बनता है, जिसने पिछले दिनों अपनी अहमन्यता उत्पन्न की। पाप का प्रायश्चित तो करना ही चाहिए। खोदी गई खाई को पाटकर समतल भूमि बननी ही चाहिए ताकि उसका उपयुक्त उपयोग हो सके।

🔵 नारी जागरण आन्दोलन इसी पुण्य प्रयास के लिए उभारा गया है। इसके लिए लैटरपैड, साइनबोर्ड, मजलिस, भाषण, लेखन, उद्घाटन समारोह तो आए दिन होते रहते है पर उस प्रचार प्रक्रिया भर से उतनी गहराई तक नहीं पहुँचा जा सकता जितनी कि इस बड़ी समस्या के समाधान हेतु आवश्यक है। इसके लिए व्यापक जनसंपर्क साधने और प्रचलित मान्यताओं को बदलने की सर्वप्रथम आवश्यकता है। कारण कि बच्चे से लेकर बूढ़े तक के मन में यह मान्यता गहराई तक जड़ जमा चुकी है कि नारी का स्तर दासी स्तर का ही रहना चाहिए। यही परम्परा है, वही शास्त्र वचन। स्वयं नारी तक ने अपना मानस इसी ढाँचे में ढाल लिया है। चिरकाल तक अन्धेरे में बंद रहने वाले कैदियों की तरह उसके मन में भी प्रकाश के संपर्क में आने का साहस टूट गया है। आवश्यकता प्रस्तुत समूचे वातावरण को बदलने की है। ताकि सुधार प्रक्रिया की लीपा-पोती न करके उसकी जड़ तक पहुँचने और वहाँ अभीष्ट परिवर्तन कर सकना सम्भव हो सके।

🔴 देखा गया है कि नारी उत्थान के नाम पर प्रौढ़ शिक्षा, कुटीर उद्योग, शिशु पालन, पाकविद्या, गृह व्यवस्था जैसी जानकारियाँ कराने में कर्तव्य की इतिश्री मान ली जाती है। यों यह सभी बातें भी आवश्यक हैं और किया इन्हें भी जाना चाहिए। पर मूल प्रश्न उस मान्यता को बदलने का है। जिसके आधार पर नारी को पिछड़ेपन में बाँधें रहने वाली व्यापक मान्यता में कारगर परिवर्तन सम्भव हो सके।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1988 पृष्ठ 58

👉 इक्कीसवीं सदी का संविधान - हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 11)

🌹  शरीर को भगवान् का मंदिर समझकर आत्मसंयम और नियमितता द्वारा आरोग्य की रक्षा करेंगे।

🔵 शारीरिक आरोग्य के मुख्य आधार आत्म संयम एवं नियमितता ही हैं। इनकी उपेक्षा करके मात्र औषधियों के सहारे आरोग्य लाभ का प्रयास मृग मरीचिका के अतिरिक्त कुछ नहीं है। आवश्यकता पड़ने पर औषधियों का सहारा लाठी की तरह लिया तो जा सकता है, किंतु चलना तो पैरों से ही पड़ता है। शारीरिक आरोग्य एवं सशक्तता जिस जीवनी शक्ति के ऊपर आधारित है, उसे बनाए रखना इन्हीं माध्यमों से संभव है। शरीर को प्रभु मंदिर की तरह ही महत्त्व दें। बचकाने, छिछोरे बनाव शृंगार से उसे दूर रखें। उसे स्वच्छ, स्वस्थ एवं सक्षम बनाना अपना पुण्य कर्तव्य मानें।

🔴 उपवास द्वारा स्वाद एवं अति आहार की दुष्प्रवृत्तियों पर नियंत्रण पाने का प्रयास करें। मौन एवं ब्रह्मचर्य साधना द्वारा जीवनी शक्ति क्षीण न होने दें। उसे अंतर्मुखी होने का अभ्यास करें। श्रमशीलता को दिनचर्या में स्थान मिले। जीवन के महत्त्वपूर्ण क्रमों को नियमितता के शिकंजे में ऐसा कद दिया जाए कि कहीं विशृंखलता न आने पाए। थोड़ी-सी तत्परता बरत कर यह साधा जाना संभव है। ऐसा करके इस शरीर से वे लाभ पाए जा सकते हैं, जिनकी संभावना शास्त्रकारों से लेकर वैज्ञानिकों तक ने स्वीकार की है।   

🔵 तक बीमारियाँ एक पहाड़ पर रहा करती थीं। उन दिनों की बात है, एक किसान को जमीन की कमी महसूस हुई, अतएव उसने पहाड़ काटना शुरू कर दिया। पहाड़ बड़ा घबराया। उसने बीमारियों को आज्ञा दी-बेटियों टूट पड़ो इस किसान पर और इसे नष्ट-भ्रष्ट कर डालो। बीमारियाँ दंड-बैठक लगाकर आगे बढ़ी और किसान पर चढ़ बैठीं। किसान ने किसी की परवाह नहीं की, डटा रहा अपने काम में। शरीर से पसीने की धार निकली और उसी में लिपटी हुई बीमारियाँ भी बह गईं। पहाड़ ने क्रुद्ध होकर शाप दे दिया-मेरी बेटी होकर तुमने हमारा इतना काम नहीं किया, अब जहाँ हो वहीं पड़ी रहो। तब से बीमारियाँ परिश्रमी लोगों पर असर नहीं कर पातीं, आलसी लोग ही उनके शिकार होते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Sankalpaa/body

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.17

सोमवार, 12 जून 2017

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 109)

🌹 ब्राह्मण मन और ऋषि कर्म

🔵 देवात्मा हिमालय का प्रतीक प्रतिनिधि शान्तिकुञ्ज को बना देने का जो निर्देश मिला वह कार्य साधारण नहीं श्रम एवं धन साध्य था, सहयोगियों की सहायता पर निर्भर भी। इसके अतिरिक्त अध्यात्म के उस ध्रुव केंद्र में सूक्ष्म शरीर से निवास करने वाले ऋषियों की आत्मा का आह्वान करके प्राण प्रतिष्ठा का संयोग भी बिठाना था। यह सभी कार्य ऐसे हैं, जिन्हें देवालय परम्परा में अद्भुत एवं अनुपम कहा जा सकता है। देवताओं के मंदिर अनेक जगह बने हैं। वे भिन्न-भिन्न भी हैं। 

🔴 एक ही जगह सारे देवताओं की स्थापना का तो कहीं सुयोग हो भी सकता है, पर समस्त देवात्माओं ऋषियों की एक जगह प्राण प्रतिष्ठा हुई हो ऐसा तो संसार भर में अन्यत्र कहीं भी नहीं है। फिर इससे भी बड़ी बात यह है कि ऋषियों के क्रियाकलापों का न केवल चिह्न पूजा के रूप में वरन् यथार्थता के रूप में भी यहाँ न केवल दर्शन वरन् परिचय भी प्राप्त किया जा सकता है। इस प्रकार शान्तिकुञ्ज, ब्रह्मवर्चस् गायत्री तीर्थ एक प्रकार से प्रायः सभी ऋषियों के क्रियाकलापों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

🔵 भगवान् राम ने लंका विजय और रामराज्य की स्थापना के निमित्त मंगलाचरण रूप में रामेश्वरम् पर शिव प्रतीक की स्थापना की थी। हमारा सौभाग्य है कि हमें युग परिवर्तन हेतु संघर्ष एवं सृजन प्रयोजन के लिए देवात्मा हिमालय की प्रतिमा प्राण प्रतिष्ठा समेत करने का आदेश मिला। शान्तिकुञ्ज में देवात्मा हिमालय का भव्य मंदिर पाँचों प्रयागों, पाँचों काशियों, पाँचों सरिताओं और पाँचों सरोवरों सहित देखा जा सकता है। इसमें सभी ऋषियों के स्थानों के दिव्य दर्शन हैं। इसे अपने ढंग का अद्भुत एवं अनुपम देवालय कहा जा सकता है। जिसने हिमालय के उन दुर्गम क्षेत्रों के दर्शन न किए हों, वे इस लघु संस्करण के दर्शन से ही वही लाभ प्राप्त कर सकते हैं।  

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/brahman.2

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 13 Jun 2017


👉 आज का सद्चिंतन 13 Jun 2017


👉 मेरी ताकत

🔴 जापान के एक छोटे से कसबे में रहने वाले दस वर्षीय ओकायो को जूडो सीखने का बहुत शौक था पर बचपन में हुई एक दुर्घटना में बायाँ हाथ कट जाने के कारण उसके माता -पिता उसे जूडो सीखने की आज्ञा नहीं देते थे पर अब वो बड़ा हो रहा था और उसकी जिद्द भी बढती जा रही थी।

🔵 अंततः माता-पिता को झुकना ही पड़ा और वो ओकायो को नजदीकी शहर के एक मशहूर मार्शल आर्ट्स गुरु के यहाँ दाखिला दिलाने ले गए।

🔴 गुरु ने जब ओकायो को देखा तो उन्हें अचरज हुआ कि, बिना बाएँ हाथ का यह लड़का भला जूडो क्यों सीखना चाहता है?

🔵 उन्होंने पूछा,  तुम्हारा तो बायाँ हाथ ही नहीं है तो भला तुम और लड़कों का मुकाबला कैसे करोगे।

🔴 ये बताना तो आपका काम है, ओकायो ने कहा मैं तो बस इतना जानता हूँ कि मुझे सभी को हराना है और एक दिन खुद “सेंसेई” (मास्टर) बनना है।

🔵 गुरु उसकी सीखने की दृढ इच्छा शक्ति से काफी प्रभावित हुए और बोले, ठीक है मैं तुम्हे सीखाऊंगा लेकिन एक शर्त है, तुम मेरे हर एक निर्देश का पालन करोगे और उसमे दृढ विश्वास रखोगे।

🔴 ओकायो ने सहमती में गुरु के समक्ष अपना सर झुका दिया।

🔵 गुरु ने एक साथ लगभग पचास छात्रों को जूडो सीखना शुरू किया ओकायो भी अन्य लड़कों की तरह सीख रहा था पर कुछ दिनों बाद उसने ध्यान दिया कि गुरु जी अन्य लड़कों को अलग -अलग दांव -पेंच सीखा रहे हैं लेकिन वह अभी भी उसी एक किक का अभ्यास कर रहा है जो उसने शुरू में सीखी थी उससे रहा नहीं गया और उसने गुरु से पूछा, गुरु जी आप अन्य लड़कों को नयी -नयी चीजें सीखा रहे हैं, पर मैं अभी भी बस वही एक किक मारने का अभ्यास कर रहा हूँ क्या मुझे और चीजें नहीं सीखनी चाहियें?

🔴 गुरु जी बोले, तुम्हे बस इसी एक किक पर महारथ हांसिल करने की आवश्यकता है और वो आगे बढ़ गए।

🔵 ओकायो को विस्मय हुआ पर उसे अपने गुरु में पूर्ण विश्वास था और वह फिर अभ्यास में जुट गया।

🔴 समय बीतता गया और देखते -देखते दो साल गुजर गए, पर ओकायो उसी एक किक का अभ्यास कर रहा था एक बार फिर ओकायो को चिंता होने लगी और उसने गुरु से कहा, क्या अभी भी मैं बस यही करता रहूँगा और बाकी सभी नयी तकनीकों में पारंगत होते रहेंगे।

🔵 गुरु जी बोले, तुम्हे मुझमे यकीन है तो अभ्यास जारी रखो।

🔴 ओकायो ने गुरु कि आज्ञा का पालन करते हुए बिना कोई प्रश्न पूछे अगले 6 साल तक उसी एक किक का अभ्यास जारी रखा।

🔵 सभी को जूडो सीखते आठ साल हो चुके थे कि तभी एक दिन गुरु जी ने सभी शिष्यों को बुलाया और बोले मुझे आपको जो ज्ञान देना था वो मैं दे चुका हूँ और अब गुरुकुल की परंपरा के अनुसार सबसे अच्छे शिष्य का चुनाव एक प्रतिस्पर्धा के माध्यम से किया जायेगा और जो इसमें विजयी होने वाले शिष्य को “सेंसेई” की उपाधि से सम्मानित किया जाएगा।

🔴 प्रतिस्पर्धा आरम्भ हुई।

🔵 गुरु जी ओकायो को उसके पहले मैच में हिस्सा लेने के लिए आवाज़ दी।

🔴 ओकायो ने लड़ना शुर किया और खुद को आश्चर्यचकित करते हुए उसने अपने पहले दो मैच बड़ी आसानी से जीत लिए तीसरा मैच थोडा कठिन था, लेकिन कुछ संघर्ष के बाद विरोधी ने कुछ क्षणों के लिए अपना ध्यान उस पर से हटा दिया, ओकायो को तो मानो इसी मौके का इंतज़ार था, उसने अपनी अचूक किक विरोधी के ऊपर जमा दी और मैच अपने नाम कर लिया अभी भी अपनी सफलता से आश्चर्य में पड़े ओकयो ने फाइनल में अपनी जगह बना ली।

🔵 इस बार विरोधी कहीं अधिक ताकतवर, अनुभवी और विशाल था देखकर ऐसा लगता था कि ओकायो उसके सामने एक मिनट भी टिक नहीं पायेगा।

🔴 मैच शुरू हुआ, विरोधी ओकायो पर भारी पड़ रहा था, रेफरी ने मैच रोक कर विरोधी को विजेता घोषित करने का प्रस्ताव रखा, लेकिन तभी गुरु जी ने उसे रोकते हुए कहा, नहीं, मैच पूरा चलेगा।

🔴 मैच फिर से शुरू हुआ।

🔵 विरोधी अतिआत्मविश्वास से भरा हुआ था और अब ओकायो को कम आंक रहा था. और इसी दंभ में उसने एक भारी गलती कर दी, उसने अपना गार्ड छोड़ दिया!! ओकयो ने इसका फायदा उठाते हुए आठ साल तक जिस किक की प्रैक्टिस की थी उसे पूरी ताकत और सटीकता के साथ विरोधी के ऊपर जड़ दी और उसे ज़मीन पर धराशाई कर दिया उस किक में इतनी शक्ति थी की विरोधी वहीँ मुर्छित हो गया और ओकायो को विजेता घोषित कर दिया गया।

🔴 मैच जीतने के बाद ओकायो ने गुरु से पूछा, सेंसेई, भला मैंने यह प्रतियोगिता सिर्फ एक मूव सीख कर कैसे जीत ली?

🔵 तुम दो वजहों से जीते, गुरु जी ने उत्तर दिया पहला, तुम ने जूडो की एक सबसे कठिन किक पर अपनी इतनी मास्टरी कर ली कि शायद ही इस दुनिया में कोई और यह किक इतनी दक्षता से मार पाए, और दूसरा कि इस किक से बचने का एक ही उपाय है, और वह है विरोधी के बाएँ हाथ को पकड़कर उसे ज़मीन पर गिराना।

🔴 ओकायो समझ चुका था कि आज उसकी सबसे बड़ी कमजोरी ही उसकी सबसे बड़ी ताकत बन चुकी थी।

🔵 मित्रों अगर ओकायो चाहता तो अपने बाएँ हाथ के ना होने का रोना रोकर एक अपाहिज की तरह जीवन बिता सकता था, लेकिन उसने इस वजह से कभी खुद को हीन नहीं महसूस होने दिया. उसमे अपने सपने को साकार करने की दृढ इच्छा थी और यकीन जानिये जिसके अन्दर यह इच्छा होती है भगवान उसकी मदद के लिए कोई ना कोई गुरु भेज देता है, ऐसा गुरु जो उसकी सबसे बड़ी कमजोरी को ही उसकी सबसे बड़ी ताकत बना उसके सपने साकार कर सकता है।





👉 युग-निर्माण आन्दोलन की प्रगति (भाग 3)

🌹 अध्यात्म की प्रधान कसौटी

🔴 किन्तु किसी व्यक्ति की महानता के लिए इतना ही पर्याप्त नहीं है। महामानवों में एक अतिरिक्त गुण होता है और वह है परमार्थ। दूसरों को दुखी या अधःपतित देखकर जिसकी करुणा विचलित हो उठती है, जिसे औरों की पीड़ा अपनी पीड़ा की तरह कष्टकर लगती है, जिसे दूसरों के सुख में अपने सुख की आनन्दमयी अनुभूति होती है, वस्तुतः वही महामानव, देवता, ऋषि, सन्त, ब्राह्मण, अथवा ईश्वर-भक्त है। निष्ठुर व्यक्ति, जिसे अपनी खुदगर्जी के अतिरिक्त दूसरी बात सूझती ही नहीं, जो अपनी सुख सुविधा से आगे की बात सोच ही नहीं सकता ऐसा अभागा व्यक्ति निष्कृष्ट कोटि के जीव जन्तुओं की मनोभूमि का होने के कारण तात्विक दृष्टि से ‘नर-पशु’ ही गिना जायगा।

🔵 ऐसे नर-पशु कितना भजन करते हैं, कितना ब्रह्मचर्य रहते है, इसका कोई विशेष महत्व नहीं रह जाता। भावनाओं का दरिद्र व्यक्ति ईश्वर के दरबार में एक कोढ़ी कंगले का रूप बनाकर ही पहुँचेगा। उसे वहाँ क्या कोई मान मिलेगा ? भक्ति का भूखा, भावना का लोभी भगवान् केवल भक्त की उदात्त भावनाओं को परखता है और उन्हीं से रीझता है। माला और चन्दन, दर्शन और स्नान उसकी भक्ति के चिह्न नहीं, हृदय की विशालता और अन्तःकरण की करुणा ही किसी व्यक्ति के भावनाशील होने का प्रमाण है और ऐसे ही व्यक्ति को, केवल ऐसे ही व्यक्ति को ईश्वर के राज्य में प्रवेश पाने का अधिकार मिलता है।

🔴 हमें अपने परिवार में से अब ऐसे ही व्यक्ति ढूंढ़ने हैं जिन्होंने अध्यात्म का वास्तविक स्वरूप समझ लिया हो और जीवन की सार्थकता के लिए चुकाए जाने वाले मूल्य के बारे में जिन्होंने अपने भीतर आवश्यक साहस एकत्रित करना आरम्भ कर दिया हो। हम अपना उत्तराधिकार उन्हें ही सौंपेंगे। बेशक, धन-दौलत की दृष्टि को कुछ भी मिलने वाला नहीं है, हमारे अन्तःकरण में जलने वाली आग की एक चिंगारी ही उनके हिस्से में आवेगी पर वह इतनी अधिक मूल्यवान है कि उसे पाकर कोई भी व्यक्ति धन्य हो सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति 1965 जनवरी पृष्ठ 51
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/January/v1.51

👉 नारी जागरण की दूरगामी सम्भावनाएँ (भाग 1)

🔵 भावनाशील प्रतिभाओं को खोजना, एक सूत्र में बाँधना और उन्हें मिल जुलकर सृजन के लिए कुछ करने में जुटाना- सतयुग की वापसी का शिलान्यास है। इसी के उपरान्त नवयुग का, उज्ज्वल भविष्य का भव्य भवन खड़ा हो सकने का विश्वास किया जा सकता है। इसलिए इसे सम्पन्न करने के लिए इस आड़े समय में किसी भी प्राणवान को निजी कार्यों की व्यस्तता की आड लेकर बगलें नहीं झाँकनी चाहिए। युग धर्म की इस प्रारम्भिक माँग को हर हालत में, हर कीमत पर पूरा करना ही चाहिए।

🔴 इन्हीं दिनों उठने वाला दूसरा चरण है “आद्यशक्ति का अभिनव अवतरण” नारी-जागरण। आज की स्थिति में नारी-नर की तुलना में कितनी पिछड़ी हुई है। इसे हर कोई हर कहीं नजर पसार कर अपने इर्द गिर्द ही देख सकता है। उसे रसाईदारिन-चौकीदारिन, धोबिन और बच्चे जनने की मशीन बन कर अपनी जिन्दगी गुजारनी पड़ती है। दासी की तरह जुटे रहने और अन्न वस्त्र पाने के अतिरिक्त और भी महत्वाकाँक्षा सँजोने के लिए उस पर कड़ा प्रतिबन्ध है। परम्परा निर्वाह के नाम पर उसे बाधित और प्रतिबंधित रहने के लिए कोई ऐसी भूमिका निभाने की गुँजाइश नहीं है जिससे उसे एक समग्र मनुष्य कहलाने की स्थिति तक पहुँचने का अवसर मिले।

🔵 संसार में आधी जनसंख्या नारी की है। इस वर्ग का पिछड़ी स्थिति में पड़े रहना समूची मनुष्य जाति के लिए एक अभिशाप है। इसे अर्धांग-पक्षाघात पीड़ित जैसी स्थिति भी कहा जा सकता है ऐ पहिया टूटा और दूसरा साबुत हो तो गाड़ी ठीक प्रकार चलने और लक्ष्य तक पहुँचने में कैसे समर्थ हो सकती है? एक हाथ वाले, एक पैर वाले निर्वाह भर कर पाते है। समर्थों की तरह बड़े काम सफलता पूर्वक कर सकना उनसे कहाँ बन पड़ता है? आधी जनसंख्या अनपढ़ स्थिति में रहे और दूसरा आधा भाग उसे गले के पत्थर की तरह लटकाए फिरे तो समझना चाहिए कि इस स्थिति में किस प्रकार समय को पूरा किया जा सकेगा किसी महत्वपूर्ण प्रगति की सम्भावना बन पड़ना तो दुष्कर ही रहेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1988 पृष्ठ 58
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1988/October/v1.58

👉 इक्कीसवीं सदी का संविधान - हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 10)

🌹  शरीर को भगवान् का मंदिर समझकर आत्मसंयम और नियमितता द्वारा आरोग्य की रक्षा करेंगे।  

🔵 कुछ अपवादों को छोड़कर अस्वस्थता अपना निज का उपार्जन है। भले ही वह अनजाने में, भ्रमवश या दूसरों की देखा-देखी उसे न्यौत बुलाया गया हो। सृष्टि के सभी प्राणी जीवन भर निरोग रहते हैं। मरणकाल आने पर जाना तो सभी को पड़ता है। मनुष्य की उच्छृंखल आदत ही उसे बीमार बनाती है। जीभ का चटोरापन अतिशय मात्रा में अखाद्य खाने के लिए बाधित करता रहता है। जितना भार उठ नहीं सकता उतना लादने पर किसी का भी कचूमर निकल सकता है। पेट पर अपच भी इसी कारण चढ़ दौड़ती है। बिना पचा सड़ता है और सड़न रक्त प्रवाह में मिल जाने से जहाँ भी अवसर मिलता है, रोग का लक्षण उभर पड़ता है।

🔴 कामुकता की कुटेब जीवनी शक्ति का बुरी तरह क्षरण करती है और मस्तिष्क की तीक्ष्णता का हरण कर लेती है। अस्वच्छता, पूरी नींद न लेना, कड़े परिश्रम से जी चुराना, नशेबाजी जैसे कुटेब भी स्वास्थ्य को जर्जर बनाने का कारण बनते हैं। खुली हवा और रोशनी से बचना, घुटन भरे वातावरण में रहना भी रुग्णता का एक बड़ा कारण है। भय का आक्रोश जैसे उतार-चढ़ाव भरे ज्वार-भाटे भी मनोविकार बनते और व्यक्ति को सनकी, कमजोर एवं बीमार बनाकर रहते हैं।   

🔵 शरीर को निरोग बनाकर रखना कठिन नहीं है। आहार, श्रम एवं विश्राम का संतुलन बिठा कर हर व्यक्ति आरोग्य एवं दीर्घजीवी पा सकता है। आलस्य रहित, श्रमयुक्त, व्यवस्थित दिनचर्या का निर्धारण कठिन नहीं है। स्वाद को नहीं स्वास्थ्य को लक्ष्य करके उपयुक्त भोजन की व्यवस्था हर स्थिति में बनाई जानी संभव है। सुपाच्य आहार समुचित मात्रा में लेना जरा भी कठिन नहीं है। शरीर को उचित विश्राम देकर हर बार तरोताजा बना लेने के लिए कहीं से कुछ लेने नहीं जाना पड़ता। यह सब हमारी असंयम एवं असंतुलन की वृत्ति के कारण ही नहीं सध पाता और हम इस सुर दुर्लभ देह को पाकर भी नर्क जैसी हीन और यातना ग्रस्त स्थिति में पड़े रहते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Sankalpaa/body

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.16

रविवार, 11 जून 2017

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 108)

🌹 ब्राह्मण मन और ऋषि कर्म

🔵 अब पुरातन काल के ऋषियों में से किसी का भी स्थूल शरीर नहीं है, उनकी चेतना निर्धारित स्थानों में मौजूद है। सभी से हमारा परिचय कराया गया और कहा गया कि इन्हीं पद चिन्हों पर चलना है। इन्हीं की कार्य पद्धति अपनानी, देवात्मा हिमालय के प्रतीक स्वरूप शान्तिकुञ्ज हरिद्वार में एक आश्रम बनाना और ऋषि परम्परा को इस प्रकार कार्यान्वित करना है, जिससे युग परिवर्तन की प्रक्रिया का गति चक्र सुव्यवस्थित रूप से चल पड़े

🔴 जिन ऋषियों, तप पूत मानवों ने कभी हिमालय में रहकर विभिन्न कार्य किए थे, उनका स्मरण हमें मार्गदर्शक सत्ता ने तीसरी यात्रा में बार-बार दिलाया था। इनमें थे, भगीरथ (गंगोत्री), परशुराम (यमुनोत्री), चरक  (केदारनाथ), व्यास (बद्रीनाथ), याज्ञवल्क्य (त्रियुगी नारायण), नारद (गुप्तकाशी), आद्य शंकराचार्य (ज्योतिर्मठ), जमदग्नि (उत्तरकाशी), पातंजलि (रुद्र प्रयाग), पिप्पलाद, सूत-शौनिक, लक्ष्मण, भरत एवं शत्रुघ्न (ऋषिकेश), दक्ष प्रजापति, कणादि एवं विश्वामित्र सहित सप्त ऋषिगण (हरिद्वार), इसके अतिरिक्त चैतन्य महाप्रभु, संत ज्ञानेश्वर एवं तुलसीदास जी के कर्तव्यों की झाँकी दिखाकर भगवान् बुद्ध के परिव्राजक धर्म चक्र प्रवर्तन अभियान को युगानुकूल परिस्थितियों में संगीत, संकीर्तन, प्रज्ञा पुराण कथा के माध्यम से देश-विदेश में फैलाने एवं प्रज्ञावतार द्वारा बुद्धावतार का उत्तरार्द्ध पूरा किए जाने का भी निर्देश था। समर्थ रामदास के रूप में जन्म लेकर जिस प्रकार व्यायामशालाओं, महावीर मंदिरों की स्थापना सोलहवीं सदी में हमसे कराई गई थी, उसी को नूतन अभिनव रूप में प्रज्ञा संस्थानों, प्रज्ञापीठों, चरणपीठों, ज्ञानमंदिरों, स्वाध्याय मण्डलों द्वारा सम्पन्न किए जाने के संकेत मार्गदर्शक द्वारा हिमालय प्रवास में ही दे दिए गए थे।

🔵 देवात्मा हिमालय का प्रतीक प्रतिनिधि शान्तिकुञ्ज को बना देने का जो निर्देश मिला वह कार्य साधारण नहीं श्रम एवं धन साध्य था, सहयोगियों की सहायता पर निर्भर भी। इसके अतिरिक्त अध्यात्म के उस ध्रुव केंद्र में सूक्ष्म शरीर से निवास करने वाले ऋषियों की आत्मा का आह्वान करके प्राण प्रतिष्ठा का संयोग भी बिठाना था। यह सभी कार्य ऐसे हैं, जिन्हें देवालय परम्परा में अद्भुत एवं अनुपम कहा जा सकता है। देवताओं के मंदिर अनेक जगह बने हैं। वे भिन्न-भिन्न भी हैं। एक ही जगह सारे देवताओं की स्थापना का तो कहीं सुयोग हो भी सकता है, पर समस्त देवात्माओं ऋषियों की एक जगह प्राण प्रतिष्ठा हुई हो ऐसा तो संसार भर में अन्यत्र कहीं भी नहीं है। फिर इससे भी बड़ी बात यह है कि ऋषियों के क्रियाकलापों का न केवल चिह्न पूजा के रूप में वरन् यथार्थता के रूप में भी यहाँ न केवल दर्शन वरन् परिचय भी प्राप्त किया जा सकता है। इस प्रकार शान्तिकुञ्ज, ब्रह्मवर्चस् गायत्री तीर्थ एक प्रकार से प्रायः सभी ऋषियों के क्रियाकलापों का प्रतिनिधित्व करते हैं।  

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/brahman.2

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 12 Jun 2017


👉 आज का सद्चिंतन 12 Jun 2017


👉 शिक्षा का निचोड

🔴 काशी में गंगा के तट पर एक संत का आश्रम था। एक दिन उनके एक शिष्य ने पूछा... "गुरुवर! शिक्षा का निचोड़ क्या है?"

🔵 संत ने मुस्करा कर कहा... "एक दिन तुम खुद-ब-खुद जान जाओगे।"

🔴 बात आई गई हो गई।

🔵 कुछ समय बाद एक रात संत ने उस शिष्य से कहा... "वत्स! इस पुस्तक को मेरे कमरे में तख्त पर रख दो।"

🔴 शिष्य पुस्तक लेकर कमरे में गया लेकिन तत्काल लौट आया। वह डर से कांप रहा था।

🔵 संत ने पूछा... "क्या हुआ? इतना डरे हुए क्यों हो?"

🔴 शिष्य ने कहा... "गुरुवर! कमरे में सांप है।"

🔵 संत ने कहा... "यह तुम्हारा भ्रम होगा। कमरे में सांप कहां से आएगा। तुम फिर जाओ और किसी मंत्र का जाप करना। सांप होगा तो भाग जाएगा।"

🔴 शिष्य दोबारा कमरे में गया। उसने मंत्र का जाप भी किया लेकिन सांप उसी स्थान पर था। वह डर कर फिर बाहर आ गया और संत से बोला... "सांप वहां से जा नहीं रहा है।"

🔵 संत ने कहा... "इस बार दीपक लेकर जाओ। सांप होगा तो दीपक के प्रकाश से भाग जाएगा।"

🔴 शिष्य इस बार दीपक लेकर गया तो देखा कि वहां सांप नहीं है। सांप की जगह एक रस्सी लटकी हुई थी। अंधकार के कारण उसे रस्सी का वह टुकड़ा सांप नजर आ रहा था।

🔵 बाहर आकर शिष्य ने कहा... "गुरुवर! वहां सांप नहीं रस्सी का टुकड़ा है। अंधेरे में मैंने उसे सांप समझ लिया था।"

🔴 संत ने कहा... "वत्स, इसी को भ्रम कहते हैं। संसार गहन भ्रम जाल में जकड़ा हुआ है। ज्ञान के प्रकाश से ही इस भ्रम जाल को मिटाया जा सकता है। यही शिक्षा का निचोड है।"

🔵 वास्तव में अज्ञानता के कारण हम बहुत सारे भ्रमजाल पाल लेते हैं और आंतरिक दीपक के अभाव में उसे दूर नहीं कर पाते। यह आंतरिक दीपक का प्रकाश निरंतर स्वाध्याय और ज्ञानार्जन से मिलता है। जब तक आंतरिक दीपक का प्रकाश प्रज्वलित नहीं होगा, लोग भ्रमजाल से मुक्ति नहीं पा सकते।

👉 युग-निर्माण आन्दोलन की प्रगति (भाग 2)

🌹 उत्तराधिकार का पात्रत्व

🔴 अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों में से जिन विशिष्ट परिजनों का हम अपने उत्तराधिकारी के रूप में चुनाव कर रहे हैं, उनमें प्रमुख गुण यही होना चाहिए कि अपनी ही उलझनों तक सुलझे रहने में सीमित न रखकर “वसुधैव कुटुम्बकम्” की प्रवृत्ति को समुचित मात्रा में धारण किए हुए हों। घर का बड़ा वही कहलाता है जो अपने छोटे भाई बहिनों, अशक्त असमर्थों का भी पूरा ध्यान रखे। ऐसे ही गृहपति प्रशंसनीय कहे जाते हैं और वे ही उसे कुटुम्ब का ठीक तरह पालन पोषण कर सकने में समर्थ हो सकते हैं। जो व्यक्ति अपनी निजी इच्छाओं, कामनाओं को ही सर्वोपरि स्थान देता हो और उतनी ही परिधि में सोचता विचारता हो, ऐसे स्वार्थी के हाथ में यदि बूढ़े पिता का उत्तरदायित्व आ जाय तो घर के छोटे लोगों को क्या प्रसन्नता होगी ? वे सब घाटे में ही रहेंगे और संकट में ही पड़ेंगे। बूढ़ा बाप भी इतना समझदार तो होता ही है कि जिसे अपना उत्तरदायित्व सौंपे, उसमें स्वार्थपरता की मात्रा कम ही होनी चाहिए।

🔵 उपासना की दृष्टि से कई लोग काफी बढ़े-चढ़े होते हैं। यह प्रसन्नता की बात है कि जहाँ दूसरे लोग भगवान् को बिल्कुल ही भूल बैठे हैं वहाँ वह व्यक्ति ईश्वर का स्मरण तो करता है, औरों से तो अच्छा है। इसी प्रकार जो बदमाशियों से बचा है, अनीति और अव्यवस्था नहीं फैलाता, संयम और मर्यादा में रहता है, वह भी भला है। उसे बुद्धिमान कहा जायगा क्योंकि दुर्बुद्धि को अपनाने से जो अगणित विपत्तियाँ उस पर टूटने वाली थीं, उनसे बच गया। स्वयं भी उद्विग्न नहीं हुआ और दूसरों को भी विक्षुब्ध न करने की भलमनसाहत बरतता रहा। यह दोनों ही बातें अच्छी हैं- ईश्वर का नाम लेना और भलमनसाहत से रहना एक अच्छे मनुष्य के लिये योग्य कार्य हैं। उतना तो हर समझदार आदमी को करना ही चाहिए था। जो उतना ही करता है उसकी उतनी तो प्रशंसा ही की जायगी कि उसने अनिवार्य कर्तव्यों की उपेक्षा नहीं की और दुष्ट दुरात्माओं की होने वाली दुर्गति से अपने को बचा लिया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति 1965 जनवरी पृष्ठ 50
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/January/v1.50

👉 इक्कीसवीं सदी का संविधान - हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 9)

🌹  शरीर को भगवान् का मंदिर समझकर आत्मसंयम और नियमितता द्वारा आरोग्य की रक्षा करेंगे।

🔵 रुग्णता या बीमारी कहीं बाहर से नहीं आती। विकार तो बाहर से भी प्रविष्ट हो सकते हैं तथा शरीर के अंदर भी पैदा होते हैं, किंतु शरीर संस्थान में उन्हें बाहर निकाल फेंकने की अद्भुत क्षमता विद्यमान है। मनुष्य अपने इंद्रिय असंयम द्वारा जीवनी शक्ति को बुरी तरह नष्ट कर देता है। आहार-विहार के असंयम से शरीर के पाचन तंत्र, रक्त संचार, मस्तिष्क, स्नायु संस्थान आदि पर भारी आघात पड़ता है। बार-बार के आघात से वे दुर्बल एवं रोगग्रस्त होने लग जाते हैं। निर्बल संस्थान अंदर के विकारों को स्वाभाविक ढंग से बाहर नहीं निकाल पाते। फलस्वरूप वे शरीर में एकत्रित होने लगते हैं तथा अस्वाभाविक ढंग से बाहर निकलने लगते हैं। यही स्थिति बीमारी कहलाती है।

🔴 स्वस्थ रहने पर ही कोई अपना और दूसरों का भला कर सकता है। जिसे दुर्बलता और रुग्णता घेरे हुए होगी, वह निर्वाह के योग्य भी उत्पादन न कर सकेगा। दूसरों पर आश्रित रहेगा। परावलम्बन एक प्रकार से अपमानजनक स्थिति है। भारभूत होकर जीने वाले न कहीं सम्मान पाते हैं और न किसी की सहायता कर सकने में समर्थ होते हैं। जिससे अपना बोझ ही सही प्रकार उठ नहीं पाता, वह दूसरों के लिए किस प्रकार कितना उपयोगी हो सकता है?  

🔵 मनुष्य जन्म अगणित विशेषताओं और विभूतियों से भरा पूरा है। किसी को भी यह छूट है कि उतना ऊँचा उठे जितना अब तक कोई महामानव उत्कर्ष कर सका है, पर यह संभव तभी है, जब कि शरीर और मन पूर्णतया स्वस्थ हो। जो जितनों के लिए, जितना उपयोगी और सहायक सिद्ध होता हैं, उसे उसी अनुपात में सम्मान और सहयोग मिलता है। अपने और दूसरों के अभ्युदय में योगदान करते उसी में बन पड़ता है, जो स्वस्थ, समर्थ रहने की स्थिति बनाए रहता है। इसलिए अनेक दुःखद दुर्भाग्यों और अभिशापों में प्रथम अस्वस्थता को ही माना गया है। प्रयत्न यह होना चाहिए कि वैसी स्थिति उत्पन्न न होने पाए। सच्चे अर्थों में जीवन उतने ही समय का माना जाता है, जितना कि स्वस्थतापूूर्वक जिया जा सके। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Sankalpaa/body

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.15

👉 इक्कीसवीं सदी का संविधान - हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 8)

🌹  शरीर को भगवान् का मंदिर समझकर आत्मसंयम और नियमितता द्वारा आरोग्य की रक्षा करेंगे।

🔵 यह सब अज्ञान के कारण होता है, जो होश सँभालने से पूर्व ही अभिभावकों के अनाड़ीपन के कारण वह अपने ऊपर लाद लेता है। स्वस्थ-समर्थ रहना कुछ भी कठिन नहीं है। प्रकृति के संकेतों का अनुसरण करने भर से यह प्रयोजन सिद्ध हो सकता है। प्रकृति के सभी जीवधारी यही करते और दुर्घटना जैसी आकस्मिक परिस्थितियों को छोड़कर साधारणतया निरोग रहते और समयानुसार अपनी मौत मरते हैं। प्रकृति के संदेश-संकेतों को जब सृष्टि के सभी जीवधारी मोटी बुद्धि होने पर भी समझ लेते हैं तो कोई कारण नहीं कि मनुष्य जैसा बुद्धिजीवी उन्हें न अपना सके। प्रकृति के स्वास्थ्य रक्षा के नियम व्यवहार में अति सरल हैं। उचित और अनुचित का निर्णय करने वाले यंत्र इसी शरीर में लगे हैं, जो तत्काल यह बता देते हैं कि क्या करना चाहिए, क्या नहीं? मर्यादाओं का पालन और वर्जनाओं का अनुशासन मानने भर से उद्देश्य की पूर्ति हो जाती है।

🔴 आहार-विहार का ध्यान रखने के स्वास्थ्य रक्षा की समस्या हल हो जाती है। आहार प्रमुख पक्ष है, जिसे स्वास्थ्य, अनुशासन का पूर्वार्द्ध कहा जा सकता है। उत्तरार्द्ध में विहार आता है, जिसका तात्पर्य होता है नित्य कर्म, शौच, स्नान, शयन, परिश्रम, संतोष आदि। इन्हीं के संबंध में समुचित जानकारी प्राप्त कर लेने और उनका परिपालन करते रहने से एक प्रकार से आरोग्य का बीमा जैसा हो जाता है।  

🔵 शरीर को ईश्वर के पवित्र निवास के रूप में मान्यता देना उचित है। यह तथ्य ध्यान में बना रहे तो शरीर के प्रति निरर्थक मोहग्रस्तता से बचकर, उसके प्रति कर्तव्यों का संतुलित निर्वाह संभव है। मंदिर को सजाने, सँवारने में भगवान् को भुला देना निरी मूर्खता है, किंतु देवालयों को गंदा, तिरस्कृत, भ्रष्ट, जीर्ण-शीर्ण रखना भी पाप माना जाता है। शरीर रूपी मंदिर को मनमानी बुरी आदतों के कारण रुग्ण बनाना प्रकृति की दृष्टि में बड़ा अपराध है। उसके फलस्वरूप पीड़ा, बेचैनी, अल्पायु, आर्थिक हानि, तिरस्कार जैसे दंड भोगने पड़ते हैं।  

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Sankalpaa/body

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.14

👉 युग-निर्माण आन्दोलन की प्रगति

🌹 उत्तराधिकार और प्रतिनिधित्व का प्रयोजन
 
🔵 नवम्बर और दिसम्बर की अखण्ड-ज्योति में इसी स्तम्भ के अंतर्गत ‘प्रतिनिधियों की नियुक्ति’ वाली योजना छपी है। प्रसन्नता की बात है कि परिजनों ने उसे गम्भीरता-पूर्वक समझा और ग्रहण किया है। बात सचमुच ऐसी है भी कि उस पर विचार करना हर सदस्य के लिए आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी है।

🔴 ‘अखण्ड-ज्योति’ छपे कागजों का व्यापार नहीं है। न उसके पाठक इस तरह के मनचले लोग ही है कि मनोरंजन के लिए, खाली समय काटने के लिये कुछ भी पढ़ते रहने की तरह इस पत्रिका को मँगाते हों। हमने विशेष प्रयत्न और मनोयोगपूर्वक पिछले पच्चीस वर्ष के परिश्रम से इस विशाल जनसमुद्र में से थोड़े से मोती चने हैं। वे ही अखण्ड-ज्योति के सदस्य हैं। जिनकी अन्तरात्मा में पूर्व जन्मों की संग्रहीत उत्कृष्टता मौजूद है, जिन्होंने इस जन्म में भी अपनी अन्तरात्मा को परिष्कृत किया है - जिनके सामने मानव-जीवन की महत्ता और उसकी सार्थकता का प्रश्न उपस्थित रहता है-ऐसे ही लोग इस परिवार के सदस्य बन सके हैं और इन प्रबुद्ध आत्माओं की अन्तःप्रेरणा को जागृत एवं समुन्नत बनाने के लिए एक उपयुक्त साधन के रूप में “अखण्ड-ज्योति” अपना अस्तित्व बनाये हुए है और इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये वह जीवित है

🌹 जागृत आत्माओं का चुनाव

🔵 जागृत आत्माओं को ढूंढ़ने और संग्रह करने में हमको ‘अखण्ड-ज्योति’ के 25 वर्ष पूरे हो गये। अब उसे दूसरे कदम उठाने हैं। जिन विचारों का पिछले वर्षों में प्रचार किया जाता रहा है अब उन्हें मूर्त रूप देने के लिये ठोस गतिविधियाँ अपनानी हैं, और रचनात्मक कार्य खड़े करने हैं। यह सब हम अकेले ही न कर लेंगे, प्रस्तुत योजना की पूर्ति के लिए अनेक सहचरों का श्रम एवं मनोयोग आवश्यक होगा। ऐसे लोग कौन हो सकते हैं, यही चुनावक्रम इन दिनों चल रहा है। तीस हजार अखण्ड-ज्योति सदस्यों में से सभी इतने उत्साही और निष्ठावान नहीं हैं जिन पर इतना भार डाला जा सके कि वे इस मिशन को गतिशील बनाये रहने के लिये हमारी ही तरह कुछ करने के लिये कटिबद्ध हो जाएँ। यों परिवार के सभी परिजन, अखण्ड ज्योति के प्रायः सभी सदस्य अपनी आध्यात्मिक विशेषताओं से सम्पन्न हैं। पर बड़े उत्तरदायित्व संभालने की क्षमता हर किसी में नहीं हैं। बूढ़ा बाप, परिवार के बड़े लड़कों को गृह व्यवस्था चलाने का उत्तरदायित्व सौंपता है, इसको अर्थ यह नहीं कि घर के शेष सब लोगों का महत्व कम है। आगे चलकर छोटे बच्चे भी होनहार हो सकते हैं-वे बूढ़े बाप से भी अधिक योग्य सिद्ध हो सकते हैं, पर आज तो जो भी कंधे पर बोझ ढोने की क्षमता रखते होंगे, उन्हें ही कार्यभार सौंपा जाएगा

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति 1965 जनवरी

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/January/v1.50

शनिवार, 10 जून 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 Jun 2017


👉 आज का सद्चिंतन 11 Jun 2017


👉 सुकरात और आईना

🔴 दार्शनिक सुकरात दिखने में कुरुप थे। वह एक दिन अकेले बैठे हुए आईना हाथ मे लिए अपना चेहरा देख रहे थे।

🔵 तभी उनका एक शिष्य कमरे मे आया ; सुकरात को आईना देखते हुए देख उसे कुछ अजीब लगा । वह कुछ बोला नही सिर्फ मुस्कराने लगा। विद्वान सुकरात शिष्य की मुस्कराहट देख कर सब समझ गए और कुछ देर बाद बोले ,”मैं तुम्हारे मुस्कराने का मतलब समझ रहा हूँ…….शायद तुम सोच रहे हो कि मुझ जैसा कुरुप आदमी आईना क्यों देख रहा है ?”

🔴 शिष्य कुछ नहीं बोला , उसका सिर शर्म से झुक गया।

🔵 सुकरात ने फिर बोलना शुरु किया , “शायद तुम नहीं जानते कि मैं आईना क्यों देखता हूँ”

🔴 “नहीं ” , शिष्य बोला।

🔵 गुरु जी ने कहा “मैं कुरूप हूं इसलिए रोजाना आईना देखता हूं”। आईना देख कर मुझे अपनी कुरुपता का भान हो जाता है। मैं अपने रूप को जानता हूं। इसलिए मैं हर रोज कोशिश करता हूं कि अच्छे काम करुं ताकि मेरी यह कुरुपता ढक जाए।

🔴 शिष्य को ये बहुत शिक्षाप्रद लगी। परंतु उसने एक शंका प्रकट की- ” तब गुरू जी, इस तर्क के अनुसार सुंदर लोगों को तो आईना नही देखना चाहिए?”

🔵 “ऐसी बात नही!” सुकरात समझाते हुए बोले,” उन्हे भी आईना अवश्य देखना चाहिए”! इसलिए ताकि उन्हे ध्यॉन रहे कि वे जितने सुंदर दीखते हैं उतने ही सुंदर काम करें, कहीं बुरे काम उनकी सुंदरता को ढक ना ले और परिणामवश उन्हें कुरूप ना बना दे।

🔴 शिष्य को गुरु जी की बात का रहस्य मालूम हो गया। वह गुरु के आगे नतमस्तक हो गया।

🔵 मित्रो, कहने का भाव यह है कि सुन्दरता मन व् भावों से दिखती है। शरीर की सुन्दरता तात्कालिक है जब कि मन और विचारों की सुन्दरता की सुगंध दूर-दूर तक फैलती है।















👉 शाश्वत और सर्वस्व की प्राप्ति है धर्म

🔴  किसी ने कहा, ‘‘धर्म त्याग है।’’ यह सुनकर सुनने वाले घबराए। उनकी घबराहट स्वाभाविक थी। आखिर उनमें से हर एक ने अपने जीवन में पल-पल तिनका-तिनका जोड़ा था। छोटी-छोटी चीजों को पाने के लिए न जाने कितने झगड़े-झंझट खड़े किए थे, कितनी पुरजोर मेहनत की थी। उन सबका त्याग!
 
🔵 उनकी इस सकपकाहट को एक फकीर बैठा देख रहा था। वह हँस पड़ा। लोगों ने उसकी हँसी का कारण पूछा। तो उसने कहा, कुछ नहीं, बस यूँ ही बचपन की एक घटना याद आ गई। बचपन में मैं कुछ लोगों के साथ नदी तट पर वनभोज को गया था। नदी तो छोटी थी, पर रेत बहुत थी और रेत में चमकीले रंगों भरे पत्थर बहुत थे। मैंने तो जैसे खजाना पा लिया था। साँझ तक इतने पत्थर बीन लिए कि उन्हें साथ ले जाना असंभव था। चलते क्षण जब उन्हें छोड़ना पड़ा, तो आँखें भीग गईं। साथ के लोगों की उन पत्थरों की ओर विरक्ति देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ। उस दिन वे मुझे बड़े त्यागी लगे थे, पर आज जब सोचता हूँ, तो समझ आता है कि पत्थरों को पत्थर जान लेने पर त्याग का कोई प्रश्न ही नहीं है। अज्ञान भोग है। ज्ञान त्याग है। त्याग क्रिया नहीं है। वह करना नहीं होता है। वह हो जाता है। वह ज्ञान का सहज परिणाम है। भोग भी यांत्रिक है। वह भी कोई करता नहीं। वह अज्ञान की सहज परिणति है।

 🔴  फिर त्याग के कठिन और कठोर होने की बात व्यर्थ है। उसके लिए घबराने-परेशान होने का भी कोई औचित्य नहीं है, क्योंकि वह कोई क्रिया नहीं है। क्रियाएँ ही कठिन और कठोर मालूम पड़ती हैं। वह तो परिणाम है, फिर उसमें जो छूटता मालूम होता है, वह निर्मूल्य होता है और जो पाया जाता है, वह अमूल्य होता है।

 🔵 सच तो यह है कि हम केवल बंधनों को छोड़ते हैं और पाते हैं मुक्ति। छोड़ते हैं कौड़ियाँ और पाते हैं हीरे। छोड़ते हैं मृत्यु और पाते हैं अमृत। छोड़ते हैं अँधेरा और पा लेते हैं प्रकाश। छोड़ते हैं अपनी क्षुद्रता और पा लेते हैं शाश्वत और अनंत। छोड़ते हैं दुःखों को, पीड़ाओं को और पा लेते हैं असीम आनंद। इसलिए त्याग कहाँ है? न कुछ को छोड़कर सब कुछ को पा लेना त्याग नहीं है। शाश्वत और सर्वस्व की प्राप्ति है धर्म।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 88

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 Jun 2017


👉 आज का सद्चिंतन 10 Jun 2017


शुक्रवार, 9 जून 2017

👉 आज का सद्चिंतन 9 Jun 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 9 Jun 2017


👉संस्कृति पुरुष - परमपूज्य गुरुदेव

🔵 सजल भावनाओं एवं प्रखर विचारों के राशि सितारों से भारतवर्ष की देवसंस्कृति का आकाश भरा पड़ा है। अनंत-अनगिनत सितारे हैं। इन सबकी उज्ज्वल ज्योति जब घनीभूत हो संस्कृति पुरुष की भव्य मूर्ति गढ़ती है, तो परमपूज्य गुरुदेव का दिव्य स्वरूप साकार होता है।
 

🔴 संस्कृति पुरुष परमपूज्य गुरुदेव में देवसंस्कृति के सभी तत्त्व अपने मौलिक, किन्तु सार रूप में समाहित हैं। उनके व्यक्तित्व में भावनाओं की सजलता है, तो कृतित्व में विचारों की प्रखरता। वे सजल श्रद्धा और प्रखर प्रज्ञा दोनों एक साथ हैं। वंदनीया माताजी उन्हीं की छाया हैं, उन्हीं में समाहित हैं। उनमें संस्कृति की मधुरिमा एवं सम्मोहन दोनों ही हैं।

🔵 पूज्य गुरुदेव के विचारों में तप की इतनी प्रबल शक्ति है कि उनका साहित्य पढ़ते समय भी उनका तप-प्राण निरंतर आस-पास मँडराता रहता है। उनके शब्द कभी बड़े प्यार सें हमें अपनी बाँहों में भर लेते हैं, सहलाते हैं, प्रेम भरा आश्वासन देते हैं। कभी हमारा आवाहन करते हैं और हमारे अहसास को प्रखर करते रहते हैं। उनके शब्दों में जीवंतता है, अधिकार है, आत्मविश्वास है, और है निर्भयता। यह सारी सामर्थ्य उनकी आध्यात्मिक साधना से उद्धृत है। उन्हें पढ़ने वाला या सुनने वाला इस अनोखेपन का अहसास पाए बिना नहीं रहता।

🔴 उनकी भाषा अत्यंत सरल, रसमयी, अर्थ को सटीक अभिव्यक्ति देने वाली और हृदयस्पर्शी है। जीवन एक संस्कृति, अतीत एवं वर्तमान, धर्म एवं विज्ञान, प्राच्य एवं पाश्चात्य के किसी भी पहलू के भीतर बैठते समय जब वह उसके एक-एक रहस्य को उजागर करते हैं, विश्लेषण एवं समन्वय करते हैं, तो ऐसा लगता है, मानो किसी गीत की कड़ी को बार-बार नए-नए स्वरालंकारों से सजा रहे हों। वे देवसंस्कृति के हर रहस्य को हमारे दैनंदिन जीवन में घटने वाले, हम सबके जाने-पहचाने उदाहरण देकर तर्कसंगत रूप से प्रस्तुत करते हैं। परमपूज्य गुरुदेव निश्चित ही इस युग के संस्कृति पुरुष हैं। उनमें भारतीय संस्कृति के अस्तित्व एवं अस्मिता का गौरव संपूर्ण रूप से प्रकाशित है। मनुष्य में देवत्व एवं धरा पर स्वर्ग के अवतरण का संकल्प उन्होंने लिया है। इस संकल्प को साकार करना प्रत्येक मनुष्य का दायित्व है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 87

गुरुवार, 8 जून 2017

👉अँधेरे की चिंता छोड़ें, प्रकाश को प्रदीप्त करें

🔵 अँधेरे के लिए न तो चिंतित हों और न ही उसका चिंतन करें। अनिवार्य है, प्रकाश को प्रदीप्त करने का उपाय करना। जो लोग अंधकार का ही विचार करते रहते हैं, वे अँधेरे में ही खोए रहते हैं। उनका प्रकाश तक पहुँचना संभव नहीं।

🔴 जीवन में अँधेरा बहुत है और अँधेरे की ही भाँति अशुभ और अनीति भी छाई है। कुछ लोग इस तमस् को स्वीकार कर लेते हैं। ऐसी दशा में उनकी प्रकाश को पाने एवं उस तक पहुँचने की आकांक्षा क्षीण हो जाती है। अंधकार की यह स्वीकृति ही मनुष्य का सबसे बड़ा पाप है। यही उसका स्वयं के प्रति किया गया अपराध है। इसी से उसके दूसरे अन्य अपराधों का जन्म होता है। सभी तरह के पाप इसी मूल पाप से जन्मते एवं पनपते हैं। याद रहे कि जो व्यक्ति अपने ही प्रति इस पाप को नहीं करता है, वह कोई अन्य अपराध या पाप नहीं कर सकता है।

🔵 कतिपय लोग अंधकार की इस स्वीकृति से बचने के लिए उसके अस्वीकार में लग जाते हैं। उनका जीवन अंधकार के निषेध का ही सतत उपक्रम बन जाता है, पर यह भी एक भूल है। अंधकार को मान लेने वाला भी भूल में है, उससे लड़ने वाला भी भूल में है। न अंधकार को मानना है, न उससे लड़ना है। ये दोनों ही अज्ञान हैं। जो ज्ञानी है, वह प्रकाश को प्रदीप्त करने का आयोजन करता है। सच तो यह है कि अँधेरे की अपनी सत्ता ही नहीं है। वह तो मात्र प्रकाश का अभाव है। प्रकाश का आगमन होते ही वह अपने ही आप हट-मिट जाता है। ऐसी ही बात अशुभ, अनीति एवं अधर्म के संबंध में भी है। अशुभ को, अनीति को, अधर्म को मिटाने के लिए परेशान होने की जरूरत नहीं है, इसके लिए तो बस धर्म का दीया जलाना ही पर्याप्त है। धर्म की ज्योति ही अधर्म की मृत्यु है।

🔴 अँधेरे से लड़ना तो अभाव से लड़ना है। इस तरह तो बस विक्षिप्तता ही हाथ लगती है। लड़ना है, तो प्रकाश को पाने के लिए लड़ो। प्रकाश को प्रदीप्त करने के लिए श्रम एवं मनोयोग का नियोजन करो, क्योंकि जो प्रकाश को पा लेता है, वह अंधकार को मिटा ही देता है। इसलिए अँधेरे की चिंता छोड़ें, प्रकाश को प्रदीप्त करें।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 86

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 8 Jun 2017


👉 आज का सद्चिंतन 8 Jun 2017


बुधवार, 7 जून 2017

👉संयम का संगीत

🔴 जीवन का सत्य संयम के संगीत से प्रकट होता है। जो किसी भी दिशा में अति करते हैं, वे मार्ग से भटक जाते हैं। भटका हुआ मानव-मन अतियों में डोलता और चलता है। एक अति से दूसरी अति पर उसे ले जाना बहुत आसान है। उसका स्वभाव ही कुछ ऐसा है। शरीर के प्रति जो बहुत आसक्त है, वही व्यक्ति प्रतिक्रिया में शरीर के प्रति बहुत क्रूर और कठोर भी हो सकता है। इस कठोरता और क्रूरता में भी वही आसक्ति छिपी होती है। जैसा वह पहले शरीर से बँधा होता है। उसका मन पहले भी शरीर के ही चिंतन में लगा और अब बदली हुई विपरीत दशा में उसका चिंतन शरीर पर ही क्रेंदित होता है। इस भाँति विपरीत अति पर जाकर मन धोखा दे देता है। इस धोखाधड़ी में वह अपनी मूलवृत्ति को बचा लेता है। सदा ही अतियों में चलते रहने की इस मानसिक वृत्ति का कारण यही है। विपरीत अतियों में चलने की यह मन की प्रवृत्ति ही असंयम है।

🔵 जबकि संयम दो विपरीत अतियों के बीच मध्य बिंदु की खोज है। इस मध्य बिंदु पर थिर होने की कला का नाम ही ‘संयम’ है। शरीर के प्रति राग और विराग का मध्य खोजने और उसमें स्थिर होने से वीतरागता का संयम उपलब्ध होता है। संसार के प्रति आसक्ति और विरक्ति का मध्य खोजने और उसमें स्थिर होने से संन्यास का संयम उपलब्ध होता है और इस भाँति जो समस्त अतियों में संयम को साधता है, वह अतियों से अतीत हो जाता है और उसके जीवन में संयम का सुरीला संगीत गूँजने लगता है।

 🔴 संयम के इस सुरीले संगीत में जीवन का समस्त कोलाहल विलीन हो जाता है। इस कोलाहल को जन्म देने वाली ईर्ष्या, द्वेष एवं प्रपंच की सारी वृत्तियाँ और इन सबका जन्मदाता मन भी संयम के इस सुहाने संगीत में अपना अस्तित्व खो बैठता है। फिर तो केवल वही निनादित होता है, जो सदा-सदैव से ही स्वयं के भीतर निनादित हो रहा है। संयम के संगीत का यह सुरीलापन ही तो निर्वाण है, मोक्ष है, परब्रह्म है। यही जीवन का सत्य है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 85

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 7 Jun 2017


👉 आज का सद्चिंतन 7 Jun 2017


मंगलवार, 6 जून 2017

👉 जीवन क्या है?

🔵 जीवन क्या है? यह एक ऐसा प्रश्न है, जो युगों-युगों से पूछा जा रहा है एवं अनुत्तरित है। श्रुति की शरण में जाएँ, तो वह कहती है कि हर व्यक्ति द्वारा जीवन के स्वरूप को समझा जाना चाहिए और उससे जुड़े तथ्यों को स्वीकार करना चाहिए, चाहे वे कितने भी कड़ुए एवं अप्रिय क्यों न प्रतीत हों? जीवन एक चुनौती है, एक समर है, एक जोखिम है एवं उसे इस रूप में स्वीकार करने के अलावा हमारे पास और कोई चारा भी नहीं।

🔴 जीवन एक रहस्य है, तिलिस्म है, भूल-भुलैया है, एक प्रकार से एक गोरखधंधा है। जिस किसी के पास भी गंभीर पर्यवेक्षण करने की दृष्टि हो, वह उसकी तह तक पहुँच सकता है। इसी आधार पर जीवन से जुड़ी भ्रांतियों के कुहासे को भी मिटाया जा सकता है। कई प्रकार के खतरों से भी बचा जा सकता है। कर्त्तव्य के रूप में जीवन अत्यंत भारी किंतु अभिनेता की तरह हँसने-हँसाने वाला हलका-फुलका रंगमंच भी है, जिसका विनोदपूर्वक मंचन कर आनंद लिया जा सकता है।

🔵 जीवन एक गीत है, जिसे पंचम स्वर में गाया जा सकता है। जीवन एक अवसर है, जिसे गवाँ देने पर सब कुछ हाथ से निकल जाता है। जीवन एक स्वप्न है, जिसमें स्वयं को खोया जा सके, तो भरपूर आनंद का रसास्वादन किया जा सकता है। जीवन एक प्रतिज्ञा है, यात्रा है, जीने की एक कला है, उसे सफल कैसे बनाया जाए, यह यदि जान लिया जाए, इस पर मनन कर लिया जाए, तो फिर उससे बड़ा भाग्यशाली कोई नहीं। जीवन सौंदर्य है, प्रेम है, सत्-चित्-आनंद है। वह सब कुछ है, जो नियंता की इस सृष्टि में सर्वोत्तम कहा जाने योग्य है। हम इसे जीकर तो दिखाएँ।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 84

👉 आज का सद्चिंतन 6 Jun 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 6 Jun 2017


सोमवार, 5 जून 2017

👉 सच्ची साधना

🔵 आज साधु तो बहुत हैं, पर साधना नहीं है। साधना के बिना साधुता कागज के फूलों की तरह है। जिनमें बहुरंगी आकर्षण तो भरपूर है, लेकिन सुगंध का एकदम अभाव है। सब तरफ आज ऐसे ही कागज के फूल दिखाई देते हैं। इसी वज़ह से धर्म की प्रखरता-तेजस्विता मंद पड़ गई है। साधना के अभाव में धर्म असंभव है।

🔴 धर्म की जड़ें साधना में हैं। साधना के अभाव में साधु का जीवन या तो मात्र अभिनय हो सकता है या फिर दमन हो सकता है। ये दोनों ही बातें शुभ नहीं हैं। तप-साधना का मिथ्या अभिनय पाखंड है, जबकि कोरा दमन और भी महाघातक है। उसमें संघर्ष की यातना तो है, पर उपलब्धि कुछ भी नहीं। जिसे दबाया जाता है, वह मरता नहीं, बल्कि और गहरी परतों में सरक जाता है। साधनाविहीन साधु को एक ओर वासना की पीड़ाएँ सताती हैं; दूसरी ओर उसे दमन और आत्म-उत्पीड़न की अग्निशिखाएँ जलाती हैं। एक ओर कूँआ है तो दूसरी ओर खाई। सच्ची साधना के बिना इन दोनों में से किसी एक में गिरना ही पड़ता है।

🔵 सच्ची साधना न तो भोग में है और न दमन में। यह तो आत्मजागरण में है। इन दोनों के द्वंद्व में से उबरने और परमेश्वर में स्वयं को विसर्जित करने में है। साधना वेश-विन्यास की विविधता या कौतुक भरे प्रदर्शन का नाम नहीं है। यह नर से नारायण बनने की अंतर्यात्रा है, जो पशु-भाव का दमन करके नहीं, उसे सर्वथा छोड़कर परमात्म-भाव में प्रतिष्ठित होने में ही संपन्न होती है।

🔴 सच्ची साधना का अर्थ किसी को पकड़ना नहीं है, वरन् सारी पकड़ को एक साथ छोड़ना है। सारी अतियों से, सभी द्वंद्वों से ऊपर उठना-उबरना है। इस सच्ची साधना से जो अपनी चेतना की लौ को द्वंद्वों की आँधियों से मुक्त कर लेते हैं, वे उस कुंजी को पा लेते हैं, जिससे सत्य का द्वार खुलता है और तभी वह साधुता प्रकट होती है, जिसकी अलौकिक सुगंध से अनेकों दूसरी सुप्त और मुरझाई आत्माएँ भी जाग्रत् होकर मुस्कराने लगती हैं।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 83

👉 आज का सद्चिंतन 5 Jun 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 5 Jun 2017


रविवार, 4 जून 2017

👉 क्रान्ति-बीज

🔵 युगसंधि की वेला। सभी शिष्य-साधक ब्रह्ममुहूर्त में ध्यानस्थ। ध्यान की गहराइयों में दिव्य नाद ध्वनित हो उठा। गुरुदेव की वाणी शब्दरूप लेने लगी, ‘‘मेरे पुत्रो! मैं भी एक किसान हूँ। मैंने भी कुछ बीज बोए थे। उनमें अंकुर आए और फूल भी लगे। उन फूलों की सुगंध से मेरा सारा जीवन भर गया। उस सुगंध ने मुझे रूपांतरित कर दिया। मुझे नया जीवन दिया।’’

 🔴 ‘‘अदृश्य और अज्ञात ने अपने बंद द्वार मेरे लिए खोल दिए और मैंने उस परम सत्य को देखा, जो आँखों से देखा नहीं जा सकता। शाश्वत् के उस संगीत को सुना, जिसे सुनने में कान समर्थ नहीं होते हैं। मेरी यह दिव्य अनुभूतियाँ अब वैसे ही मुझसे बहने और प्रवाहित होने को उत्सुक हैं, जैसे पहाड़ों के झरने सागर की ओर प्रवाहित होते और भागते हैं।’’

🔵 ‘‘याद रहे बदलियाँ जब पानी से भर जाती हैं, तो उन्हें बरसना पड़ता है। फूल जब सुवास से भर जाते हैं, तो उन्हें हवाओं को अपनी सुगंध लुटा देनी होती है और जब कोई दीया जलता है, तो आलोक उससे बहता ही है।’’

 🔴 ‘‘ऐसा ही कुछ मेरे साथ हुआ है। मैंने अपने जीवन के अनमोल रहस्य अपने साहित्य में सँजोए हैं। मेरे ये विचार क्रांति-बीज हैं। वे जिसके पास पहुँचेंगे, जो भी इन्हें सँभालेगा-फैलाएगा, उसके जीवन में देवत्व के, अमृत के और प्रभु प्रेम के फूल अवश्य ही मुस्कराएँगे। उसका जीवन भी उसी सुगंध से भर उठेगा, जिससे मेरा जीवन भरा था। ये मेरे क्रांति-बीज जिस भी खेत में पड़ेंगे, वहाँ की मिट्टी अमृत के फूलों में परिणत हो जाएगी।’’

🔵 ‘‘जो भी मेरे पास था, उसे क्रांति-बीजों के रूप में तुम सबको सौंप चुका। मेरा प्रत्येक विचार क्रांति बीज है और मेरा समूचा साहित्य इन क्रांति-बीजों का अक्षय भंडार है। सार संक्षेप मैंने दैवीचेतना के संदेशवाहक के रूप में क्रांतिधर्मी साहित्य के रूप में विनिर्मित किया है। मैंने इन्हें तुम्हारे जीवन में बोया, अब तुम सबको इन्हें समूचे विश्व के प्रत्येक मानव के जीवन में बोना है, ताकि हर कहीं देवत्व के फूल खिल सकें। मेरे इन क्रांति-बीजों को हर कहीं बोने के साथ ही तुम सब अपने जीवन में भी इनकी देखभाल करना, क्योंकि मैं तो बो चला, देखना तुम कि बीज, बीज न रह जाए।’’

🔴 ध्यान टूटने के बाद भी साधकों को लगा कि गुरुसत्ता का यह संदेश सतत ध्वनित हो रहा है कि उनके क्रांति-बीजों की सफलता देवत्व के फूल बनकर मुस्कराने में ही है। जीवन की मिट्टी को सुगंध से भरने में ही है।


🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 82

👉 आज का सद्चिंतन,


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 4 Jun 2017


शनिवार, 3 जून 2017

👉 जीवन का महामंत्र

🔵 जीवन का सच्चा सदुपयोग ही जीवन का महामंत्र है। जब भी मन में कोई उदात्त प्रेरणा जागे, तो उसे बलपूर्वक थाम लो। कहीं ऐसा न हो कि भूल जाने के दोष के कारण वह सदैव के लिए लुप्त हो जाए। किसी भी सिद्धांत की सार्थकता, उसकी व्यावहारिकता अनुभूति में है। आदर्श चिंतन श्रेष्ठ है, तो आदर्श कर्म श्रेष्ठतम। आध्यात्मिक सत्य की अनुभूति-तत्त्वचिंतन और धारणा की अपेक्षा कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है। साधनात्मक पुरुषार्थ थोड़ा-सा ही क्यों न हो, हजार बड़ी-बड़ी बातों से ज्यादा उत्तम है। बातों से भावनाएँ जाग सकती हैं, किन्तु उस सिद्धांत की अनुभूति के लिए यदि आवश्यक पुरुषार्थ न किया गया, तो समझो समय तथा भावना बेकार नष्ट हुई। आदर्शोन्मुखी आध्यात्मिक कर्म में ही तो जीवन का सच्चा सदुपयोग है।

🔴 यह तभी संभव है, जब हृदय में कपट न हो। अपनी लालसाओं-वासनाओं पर बड़े-बड़े सिद्धांतों का आवरण डालकर उन्हें ढका न जाए। अपनी अकर्मण्यता पर सोने की चादर डालकर उसे शरणागति का नाम देना उचित नहीं। शरणागति तो निष्काम कर्म के तीव्र वेग से उपजी सात्विक भावना है, अकर्मण्यता नहीं। निश्चित जान लो कि आध्यात्मिक साधना न हो पाने का कारण शारीरिक सुख-सुविधाओं की चिंता और इंद्रियभोगों की लालसा ही है, क्योंकि जैसे ही मन में आध्यात्मिक साधना में संलग्न होने की, कठोर तप में प्रवृत्त होने की बात पैठती है, इंद्रियाँ विरोध करने लगती हैं। शरीर पूछने लगता है, ‘‘रे मन! भला क्या यह आरामदायक होगा?’’
 
 🔵 सच तो यह है कि सांसारिक उपलब्धियों के लिए जितने साहस और संघर्ष की आवश्यकता है, आध्यात्मिक जीवन के लिए उससे भी कहीं अधिक संघर्ष और साहस आवश्यक है। कृपण व्यक्ति धनसंग्रह के लिए जितना अध्यवसाय करता है, वीर सैनिक शत्रु पर आक्रमण करने के लिए जितना साहस रखता है, आध्यात्मिक ऊर्जा को पाने के लिए, सदैव के लिए जीवन की समस्त दुर्बलताओं को जीत लेने के लिए उतने ही अध्यवसाय की, उतने ही महान् साहस की आवश्यकता है। किसी भी प्रकार की आध्यात्मिक अनुभूति के पीछे रहस्य है- अदम्य साहस, सर्वथा भयहीन साहस। इस सत्य को पहचानने पर ही जीवन का सच्चा-सार्थक सदुपयोग संभव है। जीवन के सच्चे सदुपयोग अर्थात् जीवन के महामंत्र की साधना करके ही जीवन के रहस्य को जाना जा सकता है। समस्त दुर्बलताओं पर विजय पाई जा सकती है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 81

👉 आज का सद्चिंतन 3 Jun 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 3 Jun 2017


शुक्रवार, 2 जून 2017

👉 समग्रता का ईश्वरीय बोध


🔵 मन सिकुड़ा है, मस्तिष्क फैला है। कर्मक्षेत्र समूचे विश्व तक फैलकर सीमातीत हुआ है, स्नेहसूत्र परिवार की छोटी-से-छोटी इकाई में भी टूटकर टुकड़े-टुकड़े हुआ है। स्थूल फैलकर स्थूलतम हो रहा है, सूक्ष्म और अधिक सिमटकर सूक्ष्मतम बन रहा है। कर्म-तर्क-बौद्धिकता के धरातल पर मनुष्य महानता का मुखौटा पहनकर आगे बढ़ा दिख रहा है, कर्म-श्रद्धा-आचार के मूल्यों पर वह बौना और कमजोर पड़ रहा है, आखिर क्यों?

 🔴  बुद्ध का कहा आज लाखों पृष्ठों में विवेचित हो रहा है, श्रीकृष्ण की गीता के अक्षर-अक्षर पर प्रवचन और भाष्य हो रहे हैं। कुरान और बाइबिल को घर-घर तक प्रत्येक व्यक्ति तक पहुँचाने के लिए अथक प्रयास किए जा रहे हैं, पर बुद्ध की करुणा, श्रीकृष्ण का निष्काम कर्म, ईसा व मुहम्मद का प्रेम व भाईचारे की छवि क्यों नहीं चमक-दमक रही हैं, यह एक गूढ़ पहेली है।

🔵  विचार में विश्वास नहीं, धर्म में श्रद्धा नहीं, परस्परता-सामाजिकता में सुख-दुःख की अनुभूति नहीं, तब वह व्यक्ति न तो धार्मिक हो सकता है और न ही सामाजिक। धर्म और समाज के विभिन्न सवाल उस व्यक्ति की स्वार्थ-लालसा और लिप्सा को तीखा और कड़ुवा बना देते हैं। ये कटुस्वार्थ जब सामाजिक कटुता का रूप लेते हैं, तो सांप्रदायिक, जातीय, क्षेत्रीय आदि-आदि विषवल्लरियाँ उगती और पनपती हैं।

 🔴  संप्रदाय, जाति, क्षेत्र-जीवन की ये इकाइयाँ हैं, समग्रता नहीं। जैसे आँख, कान, नाक, पाँव ये शरीर की इकाइयाँ हैं, समग्रता नहीं। इकाइयाँ समग्रता की पूरक हैं, विरोधी-विद्रोही नहीं। विषग्रस्त मनुष्य ही धार्मिकता के मूल्य पर हिंदू-मुसलमान, सिख, ईसाई को लड़ाता है। हम धार्मिक हैं, हम मनुष्य हैं-समग्रता के इस ईश्वरीय बोध में सांप्रदायिकता, जातीयता का विष उत्पन्न हो ही नहीं सकता। हम हिंदू-मुसलमान हैं, पर अविरोधी पूरक इकाई के रूप में ही। समग्रता में तो हम मनुष्य हैं, परमेश्वर की संतान, मनुष्य हैं-मननशील मनुष्य।


🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 80

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 Jun 2017


👉 आज का सद्चिंतन 2 Jun 2017


गुरुवार, 1 जून 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 1 Jun 2017



 

👉 आज का सद्चिंतन 1 Jun 2017


होली की हिलोरें

👉होली की हिलोरें

    🔵होली आई है, तो इसकी हिलोरें भी उठेंगी ही। इनकी छुअन हर एक के मन को अपने रस में भिगो देती है, डुबो देती है। अंतराल में स्नेहानुभूति के अक्षय स्रोत से खुलने लगते हैं। ये हिलोरे जिन्हें भी छूती हैं उन्हीं को लगता है कि वे किसी हिंडोले में झूल रहे हैं। होली के उल्लास के महासिंधु में खुद भी हिलोरें ले रहे हैं। कुछ ऐसा लगता है जैसे जीवन के हर अँखुवे से नई शाख फूट पड़ी हो। उमंग में उमगते हुए मन आतुर-आकुल होने लगता है, इस उल्लास को बाँटने के लिए। बस क्या दे डालूँ? यही व्याकुलता-व्याकुल करने लगती है सभी को।

    🔴प्रेमानुभूति में सनी-मस्ती में डूबी यह व्याकुलता अति दुर्लभ है। जीवन में अनेकों भाव पनपते हैं और तिरोहित हो जाते हैं। इनके प्रभाव व सीमाएँ भी सीमित होती हैं। खुशियाँ अन्य दिनों में भी आती हैं, प्रेमरस से अन्य दिनों में भी मन भीगता है, पर इसकी परिधि प्रायः व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन तक सिमटी-सिकुड़ी रहती है। पर होली में तो जैसे प्रेमभरी मस्ती का महासिंधु हिलोरें लेता है। जिसकी प्रत्येक लहर के छूने भर से जाति, धर्म, वंश, ऊँच-नीच, अमीर-गरीब आदि सभी भेद-भाव की दीवारें टूटती-ढहती-विनष्ट होती चली जाती हैं। होली की उमंगें बढ़ें और विकसित हों, यह आवश्यक है, पर जितनी प्रबल वह हो, उतनी ही सबल जीवनसाधना भी होनी चाहिए। प्रबल धारा को सबल किनारे ही दिशा दे सकते हैं। धारा धीमी हो अथवा कूल कमजोर, दोनों ही अभीष्ट उद्देश्य की प्राप्ति में बाधक हैं। दोनों सबल और सशक्त हों, तो प्रेम की महाशक्ति का महाप्रयोग हो सकने की व्यवस्था बनती है।

    🔵प्रेम की महाशक्ति का अमर्यादित उपयोग अथवा सीमाबद्ध रह जाना अकल्याणकारी प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करता है। होली की हिलोरें जीवनसाधना के स्पर्श से सुनियोजित और सुव्यवस्थित हो जाती हैं। फिर उन्हें जहाँ जितनी मात्रा में प्रवाहित करना हो, किया जा सकता है। ऐसा यदि बन सके, तो संसार की विविधता-विषमता के रूप में नहीं, होली की रंग-रँगीली मस्ती के रूप में सामने आएगी। मन के मलाल धुल जाएँगे, स्नेह का गुलाल सब पर छा जाएगा, बस आनंद आ जाएगा। जो सामने आए, मन का मैल मिटाकर उसी पर अपना प्रेम उँड़ेल दें। दोनों सराबोर हो जाएँ, होली की हिलोरें यदि इस तरह हमें भिगो दें, तो जीवन पहेली नहीं एक रँगोली बन जाए।


🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 79
 


👉 उत्तरदायित्वों को निभायें, महान बनें

उत्तरदायित्वों को जो बोझ मानकर उपेक्षा करता है। उस अच्छे परिणामों से वंचित रह जाना पड़ता है। प्रत्येक मानव की आजीविका कमाने में शर्म, संकोच ...