शुक्रवार, 5 मई 2017
👉 अंधविश्वास का पर्दाफाश
🔵 सिक्ख संप्रदाय के दसवें गुरु गोविंदसिंह एक महान् योद्धा होने के साथ बडे बुद्धिमान् व्यक्ति थे। धर्म के प्रति उनकी निष्ठा बडी गहरी थी। वह धर्म के लिए ही जिए और धर्म के लिए ही मरे। धर्म के प्रति अडिग आस्थावान् होते हुए भी वे अंधविश्वासी जरा भी न थे और न अंधविश्वासियों को पसंद करते थे।
🔴 गुरु गोविंदसिंह का संगठन और शक्ति बढा़ने की चिता में रहते थे। उनकी इस चिंता से एक पंडित ने लाभ उठाने की सोची। वह गुरु गोविंदसिंह के पास आया और बोला-यदि आप सिक्खो की शक्ति बढाना चाहते हैं, तो दुर्गा देवी का यज्ञ कराइए। यज्ञ की अग्नि से देवी प्रकट होगी और वह सिक्खों को शक्ति का वरदान दे देगी। गुरु गोविंदसिंह यज्ञ करने को तैयार हो गये। उस पंडित ने यज्ञ कराना शुरू किया।
🔵 कई दिन तक यज्ञ होते रहने पर भी जब देवी प्रकट नही हुइ तो उन्होंने पंडित से कहा-" महाराज! देवी अभी तक प्रकट नहीं हुई।'' धूर्त पंडित ने कहा-देवी अभी प्रसन्न नहीं हुई है। वह प्रसन्नता के लिये बलिदान चाहती है। यदि आप किसी पुरुष का वलिदान दे सकें तो वह प्रसन्न होकर दर्शन दे देगी और बलिदानी व्यक्ति को स्वर्ग की प्राप्ति होगी।
🔴 देवी की प्रसन्नता के लिए नर बलि की बात सुनकर गुरु गोविंदसिंह उस पंडित की धूर्तता समझ गए। उन्होंने उस पडित को पकडकर कहा- 'बलि के लिए आपसे अच्छा आदमी कहाँ मिलेगा। आपका बलिदान पाकर देवी तो प्रसन्न हो ही जायेगी, आपको भी स्वर्ग मिल जायेगा। इस प्रकार हम दोनों का काम बन जाएगा। गुरु गोविंदसिंह का व्यवहार देखकर पंडित घबरा गया, गुरु गोविंदसिंह ने बलिदान दूसरे दिन के लिए स्थगित करके पंडित को एक रावटी में रख दिया।
🔵 पंडित घबराकर गुरु गोबिंदसिंह के पैरों पर गिर पड़ा और गिडगिडाने लगा-'मुझे नहीं मालूम था कि बलिदान की बात मेरे सिर पर ही आ पडेगी, गुरु जी, मुझे छोड़ दीजिए। मैं आपसे क्षमा माँगता हूँ। गुरु गोविंदसिंह ने कहा क्यों घबराते हो ? बलिदान से तो स्वर्ग मिलेगा, क्यों पंडित जी, बलिदान की बातें तभी तक अच्छी लगती हैं न जब तक वह दूसरों के लिए होती हैं? अपने सिर आते ही असलियत खुल गई न।''
🔴 पंडित बोला- इस बार क्षमा कर दीजिए महाराज। अब कभी ऐसी बातें नहीं करूँगा।'' गुरु गोविंदसिंह ने उसे छोड़ दिया और समझाया-इस प्रकार का अंध-विश्वास समाज में फैलाना ठीक नही। देवी अपने नाम पर किसी के प्राण लेकर प्रसन्न नहीं होती। वह प्रसन्न होती है अपने नाम पर किए गए अच्छे कामो से। '' बाद में गुरु गोविंदसिंह ने उसे रास्ते का खर्च देकर भगा दिया। गोविदसिंह ने सिक्खों को समझाया। किसी देवी-देवता के नाम पर जीव हत्या करने से न तो पुण्य है और न शक्ति। धर्म के नाम पर किसी जीव का प्राण लेना घोर पाप है। शक्ति बढती आपस में प्रेम रखने से, धर्म का पालन करने से। शक्ति बढ़ती है-ईश्वर की उपासना करने से और उसके लिए त्याग-करने से। शक्ति बढ़ती है-अन्याय और अत्याचार का विरोध और निर्बल तथा असहायों की सहायता करने से। सभी लोग एक मति और एक गति होकर संगठित हो जाएँ और धर्म रक्षा में रणभूमि में अपने प्राणो की बलि दें। देवी इसी सार्थक बलिदान से प्रसन्न होगी और आज के इसी मार्ग से मुक्ति मिलेगी। अंध-विश्वास के आधार पर अपनी जान देने अथवा किसी दूसरे जीव की जान लेने से न तो देवी-देवता प्रसन्न होते हैं और न सद्गति मिलती है।
🔵 गुरु गोविंदसिंह के इन सार वचनों को सभी सिक्खों ने हृदयगम किया। उस पर आचरण किया और अपने जीवन का कण-कण देश धर्म की रक्षा में लगाकर ऐतिहासिक यश प्राप्त किया।
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 151, 152
🔴 गुरु गोविंदसिंह का संगठन और शक्ति बढा़ने की चिता में रहते थे। उनकी इस चिंता से एक पंडित ने लाभ उठाने की सोची। वह गुरु गोविंदसिंह के पास आया और बोला-यदि आप सिक्खो की शक्ति बढाना चाहते हैं, तो दुर्गा देवी का यज्ञ कराइए। यज्ञ की अग्नि से देवी प्रकट होगी और वह सिक्खों को शक्ति का वरदान दे देगी। गुरु गोविंदसिंह यज्ञ करने को तैयार हो गये। उस पंडित ने यज्ञ कराना शुरू किया।
🔵 कई दिन तक यज्ञ होते रहने पर भी जब देवी प्रकट नही हुइ तो उन्होंने पंडित से कहा-" महाराज! देवी अभी तक प्रकट नहीं हुई।'' धूर्त पंडित ने कहा-देवी अभी प्रसन्न नहीं हुई है। वह प्रसन्नता के लिये बलिदान चाहती है। यदि आप किसी पुरुष का वलिदान दे सकें तो वह प्रसन्न होकर दर्शन दे देगी और बलिदानी व्यक्ति को स्वर्ग की प्राप्ति होगी।
🔴 देवी की प्रसन्नता के लिए नर बलि की बात सुनकर गुरु गोविंदसिंह उस पंडित की धूर्तता समझ गए। उन्होंने उस पडित को पकडकर कहा- 'बलि के लिए आपसे अच्छा आदमी कहाँ मिलेगा। आपका बलिदान पाकर देवी तो प्रसन्न हो ही जायेगी, आपको भी स्वर्ग मिल जायेगा। इस प्रकार हम दोनों का काम बन जाएगा। गुरु गोविंदसिंह का व्यवहार देखकर पंडित घबरा गया, गुरु गोविंदसिंह ने बलिदान दूसरे दिन के लिए स्थगित करके पंडित को एक रावटी में रख दिया।
🔵 पंडित घबराकर गुरु गोबिंदसिंह के पैरों पर गिर पड़ा और गिडगिडाने लगा-'मुझे नहीं मालूम था कि बलिदान की बात मेरे सिर पर ही आ पडेगी, गुरु जी, मुझे छोड़ दीजिए। मैं आपसे क्षमा माँगता हूँ। गुरु गोविंदसिंह ने कहा क्यों घबराते हो ? बलिदान से तो स्वर्ग मिलेगा, क्यों पंडित जी, बलिदान की बातें तभी तक अच्छी लगती हैं न जब तक वह दूसरों के लिए होती हैं? अपने सिर आते ही असलियत खुल गई न।''
🔴 पंडित बोला- इस बार क्षमा कर दीजिए महाराज। अब कभी ऐसी बातें नहीं करूँगा।'' गुरु गोविंदसिंह ने उसे छोड़ दिया और समझाया-इस प्रकार का अंध-विश्वास समाज में फैलाना ठीक नही। देवी अपने नाम पर किसी के प्राण लेकर प्रसन्न नहीं होती। वह प्रसन्न होती है अपने नाम पर किए गए अच्छे कामो से। '' बाद में गुरु गोविंदसिंह ने उसे रास्ते का खर्च देकर भगा दिया। गोविदसिंह ने सिक्खों को समझाया। किसी देवी-देवता के नाम पर जीव हत्या करने से न तो पुण्य है और न शक्ति। धर्म के नाम पर किसी जीव का प्राण लेना घोर पाप है। शक्ति बढती आपस में प्रेम रखने से, धर्म का पालन करने से। शक्ति बढ़ती है-ईश्वर की उपासना करने से और उसके लिए त्याग-करने से। शक्ति बढ़ती है-अन्याय और अत्याचार का विरोध और निर्बल तथा असहायों की सहायता करने से। सभी लोग एक मति और एक गति होकर संगठित हो जाएँ और धर्म रक्षा में रणभूमि में अपने प्राणो की बलि दें। देवी इसी सार्थक बलिदान से प्रसन्न होगी और आज के इसी मार्ग से मुक्ति मिलेगी। अंध-विश्वास के आधार पर अपनी जान देने अथवा किसी दूसरे जीव की जान लेने से न तो देवी-देवता प्रसन्न होते हैं और न सद्गति मिलती है।
🔵 गुरु गोविंदसिंह के इन सार वचनों को सभी सिक्खों ने हृदयगम किया। उस पर आचरण किया और अपने जीवन का कण-कण देश धर्म की रक्षा में लगाकर ऐतिहासिक यश प्राप्त किया।
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 151, 152
👉 सत्कार्य के प्रति समर्पण
🔵 सत्कार्य के प्रति समर्पण ही तुम्हें धरती और धरती की आत्मा की रफ्तार के साथ चल सकने की सामर्थ्य देता है। निठल्ला होना तो मौसम की बहारों के लिए अजनबी बन जाना है और जीवन की उस शोभायात्रा से अलग-थलग हो जाना है, जो अनन्त को शानदार समर्पण करती हुई अपने समूचे ऐश्वर्य एवं आन-बान के साथ निकल रही है।
🔴 कार्य करते हुए तुम वह बाँसुरी बन जाते हो, जिसके हृदय से समय की साँस गुजरती है और संगीत में बदल जाती है। आखिर तुम में से कौन है, जो गूँगा और खामोश नरकुल बने रहना चाहेगा, उस वक्त, जब सारा संसार एक ही बाँसुरी के स्वरों में शामिल हो रहा है? तुमसे हमेशा कहा गया है कि कर्म एक अभिशाप है और श्रम है दुर्भाग्य। किन्तु मैं तुमसे कहता हूँ कि जब तुम कर्म करते हो, तब तुम धरती के प्राचीनतम स्वप्न के एक अंश को पूरा करते हो, जिसका दायित्व तुम्हें तभी सौंपा गया था, जब वह स्वप्न जन्मा था।
🔵 सत्कर्म में डूबे रहना ही सही अर्थों में जिन्दगी से प्यार करते रहना है। जिन्दगी को कर्म के माध्यम से प्यार करना ही उसके अन्तरंग रहस्यों को बारीकी से जान लेना है, किन्तु यदि तुम अपने कष्टों से घबराकर यह कहने लगे कि तुम्हारा जन्म एक विपत्ति है और हाड़-मांस की बनी काया का पोषण करना तुम्हारे माथे पर लिखा हुआ अभिशाप है, तो मेरा उत्तर यही है कि तुम्हारे माथे के पसीने के अलावा और कुछ नहीं है, जो उस लिखे हुए अभिशाप को धो सके।
🔴 तुमसे यह भी कहा गया होगा कि जीवन अंधकारमय है। मैं भी कहता हूँ कि जीवन सचमुच अंधकारमय है, यदि आकांक्षा न हो। सारी आकांक्षाएँ अन्धी हैं, यदि ज्ञान न हो। सारा ज्ञान व्यर्थ है, यदि कर्म न हो। सारा कर्म खोखला है, यदि प्रभु-प्रेम न हो। जब तुम प्रभु-प्रेम से प्रेरित होकर कर्म करते हो, तब तुम विश्व-मानवता के लिए स्वयं को अर्पित करते हो, क्योंकि विश्वात्मा का साकार रूप ही तो यह विश्व है। प्रभु प्रेम से प्रेरित कर्म क्या होता है? यह अपने हृदय से खींचकर काते गए सूत से कपड़ा बुनना है, मानो स्वयं प्रभु ही पहनने वाले हों उसे। यह इतने प्यार से भवन निर्माण करना है, मानों सर्वेश्वर स्वयं ही रहने वाले हों वहाँ। यह इतनी कोमलता से बीज बोना और इतने आनन्दित होकर फलों का संचय करना है, मानो स्वयं प्रभु ही खाने वाले हों वे फल। यह अपने हाथों किए गए प्रत्येक कर्म को अपनी दिव्यता की ऊर्जा से भर देना है और ऐसा महसूस करना है, मनो समस्त निर्जीव सत्ताएँ तुम्हारे आस-पास खड़ी तुम्हारे कर्मों को निहार रही हों।
🔵 पवन जो संवाद शाह बलूत से करता है, वह उसकी अपेक्षा अधिक मीठा नहीं हो सकता, जो वह घास के तिनकों से करता है। केवल वही व्यक्ति महान् है जो अपने कर्म से पवन के स्वरों को एक गीत में बदल देता है और अपने भगवत्प्रेम से उस गीत की मिठास को प्रगाढ़ कर देता है। प्रभु प्रेम को दृष्टिगोचर बना देना ही सत्कर्म है।
🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 56
🔴 कार्य करते हुए तुम वह बाँसुरी बन जाते हो, जिसके हृदय से समय की साँस गुजरती है और संगीत में बदल जाती है। आखिर तुम में से कौन है, जो गूँगा और खामोश नरकुल बने रहना चाहेगा, उस वक्त, जब सारा संसार एक ही बाँसुरी के स्वरों में शामिल हो रहा है? तुमसे हमेशा कहा गया है कि कर्म एक अभिशाप है और श्रम है दुर्भाग्य। किन्तु मैं तुमसे कहता हूँ कि जब तुम कर्म करते हो, तब तुम धरती के प्राचीनतम स्वप्न के एक अंश को पूरा करते हो, जिसका दायित्व तुम्हें तभी सौंपा गया था, जब वह स्वप्न जन्मा था।
🔵 सत्कर्म में डूबे रहना ही सही अर्थों में जिन्दगी से प्यार करते रहना है। जिन्दगी को कर्म के माध्यम से प्यार करना ही उसके अन्तरंग रहस्यों को बारीकी से जान लेना है, किन्तु यदि तुम अपने कष्टों से घबराकर यह कहने लगे कि तुम्हारा जन्म एक विपत्ति है और हाड़-मांस की बनी काया का पोषण करना तुम्हारे माथे पर लिखा हुआ अभिशाप है, तो मेरा उत्तर यही है कि तुम्हारे माथे के पसीने के अलावा और कुछ नहीं है, जो उस लिखे हुए अभिशाप को धो सके।
🔴 तुमसे यह भी कहा गया होगा कि जीवन अंधकारमय है। मैं भी कहता हूँ कि जीवन सचमुच अंधकारमय है, यदि आकांक्षा न हो। सारी आकांक्षाएँ अन्धी हैं, यदि ज्ञान न हो। सारा ज्ञान व्यर्थ है, यदि कर्म न हो। सारा कर्म खोखला है, यदि प्रभु-प्रेम न हो। जब तुम प्रभु-प्रेम से प्रेरित होकर कर्म करते हो, तब तुम विश्व-मानवता के लिए स्वयं को अर्पित करते हो, क्योंकि विश्वात्मा का साकार रूप ही तो यह विश्व है। प्रभु प्रेम से प्रेरित कर्म क्या होता है? यह अपने हृदय से खींचकर काते गए सूत से कपड़ा बुनना है, मानो स्वयं प्रभु ही पहनने वाले हों उसे। यह इतने प्यार से भवन निर्माण करना है, मानों सर्वेश्वर स्वयं ही रहने वाले हों वहाँ। यह इतनी कोमलता से बीज बोना और इतने आनन्दित होकर फलों का संचय करना है, मानो स्वयं प्रभु ही खाने वाले हों वे फल। यह अपने हाथों किए गए प्रत्येक कर्म को अपनी दिव्यता की ऊर्जा से भर देना है और ऐसा महसूस करना है, मनो समस्त निर्जीव सत्ताएँ तुम्हारे आस-पास खड़ी तुम्हारे कर्मों को निहार रही हों।
🔵 पवन जो संवाद शाह बलूत से करता है, वह उसकी अपेक्षा अधिक मीठा नहीं हो सकता, जो वह घास के तिनकों से करता है। केवल वही व्यक्ति महान् है जो अपने कर्म से पवन के स्वरों को एक गीत में बदल देता है और अपने भगवत्प्रेम से उस गीत की मिठास को प्रगाढ़ कर देता है। प्रभु प्रेम को दृष्टिगोचर बना देना ही सत्कर्म है।
🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 56
👉 समय का सदुपयोग करें (भाग 22)
🌹 समय के सदुपयोग का महत्व समझिए
🔴 समय की चूक पश्चाताप की हूक बन जाती है। जीवन में कुछ करने की इच्छा रखने वालों को चाहिये कि वे अपने किसी भी कर्त्तव्य को भूलकर भी कल पर न डालें जो आज किया जाना चाहिए। आज के काम के लिए आज का ही दिन निश्चित है और कल के काम के लिये कल का दिन निर्धारित है। आज का काम कल पर डाल देने से कल का भार दो गुना हो जायेगा जो निश्चय ही कल के समय में पूरा नहीं हो सकता। इस प्रकार आज का कल पर और कल का परसों पर ठेला हुआ काम इतना बढ़ जायेगा कि वह फिर किसी भी प्रकार पूरा नहीं किया जा सकता। जिस स्थगनशील स्वभाव तथा दीर्घसूत्री मनोवृत्ति ने आज का काम आज नहीं करने दिया वह कल कब करने देयी ऐसा नहीं माना जा सकता। स्थगन-स्थगन को और क्रिया-क्रिया को प्रोत्साहित करती है यह प्रकृति का एक निश्चित नियम है।
🔵 बासी काम, बासी भोजन की तरह ही अरुचिकर हो जाया करता है। फिर न तो उसे करने की इच्छा होती है और करने पर सुचारू रूप से नहीं हो पाता। कल के काम का दबाव बासी काम को एक बेगार बना देगा जो रो-झींककर ही किया जा सकेगा। ऐसा होने से अभ्यास बिगड़ता है। और उनका विकृत प्रभाव कल के नये काम पर भी पड़ता है। इस प्रकार स्थगनशीलता कर्त्तव्यों में मनुष्य की रुचि तथा दक्षता को नष्ट कर देती है। इन दोनों विशेषताओं से रहित कर्त्तव्य परिश्रम का भरपूर मूल्य पाकर भी अपेक्षित पुरस्कार एवं परितोषक नहीं ला पाते।
🔴 जीवन में सफलता के लिए जहां परिश्रम एवं पुरुषार्थ की अनिवार्य आवश्यकता है वहां सामयिकता का सामंजस्य उससे भी अधिक आवश्यक है। जिस वक्त को बरबाद कर दिया जाता है उस वक्त में किया जाने के लिए निर्धारित श्रम भी निष्क्रिय रहकर नष्ट हो जाता है। श्रम तभी सम्पत्ति बनता है जब वह वक्त से संयोजित कर दिया जाता है और वक्त तब ही सम्पदा के रूप में सम्पन्नता एवं सफलता ला सकता है जब उसका श्रम के साथ सदुपयोग किया जाता है। समय का सदुपयोग करने वाले स्वभावतः परिश्रमी बन जाते हैं जब कि असामयिक परिश्रमी, आलसी की कोटि का ही व्यक्ति होता है वक्त का सदुपयोग ही वास्तविक श्रम है और वास्तविक श्रम अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष का सम्वाहन पुरुषार्थ एवं परमार्थ है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔴 समय की चूक पश्चाताप की हूक बन जाती है। जीवन में कुछ करने की इच्छा रखने वालों को चाहिये कि वे अपने किसी भी कर्त्तव्य को भूलकर भी कल पर न डालें जो आज किया जाना चाहिए। आज के काम के लिए आज का ही दिन निश्चित है और कल के काम के लिये कल का दिन निर्धारित है। आज का काम कल पर डाल देने से कल का भार दो गुना हो जायेगा जो निश्चय ही कल के समय में पूरा नहीं हो सकता। इस प्रकार आज का कल पर और कल का परसों पर ठेला हुआ काम इतना बढ़ जायेगा कि वह फिर किसी भी प्रकार पूरा नहीं किया जा सकता। जिस स्थगनशील स्वभाव तथा दीर्घसूत्री मनोवृत्ति ने आज का काम आज नहीं करने दिया वह कल कब करने देयी ऐसा नहीं माना जा सकता। स्थगन-स्थगन को और क्रिया-क्रिया को प्रोत्साहित करती है यह प्रकृति का एक निश्चित नियम है।
🔵 बासी काम, बासी भोजन की तरह ही अरुचिकर हो जाया करता है। फिर न तो उसे करने की इच्छा होती है और करने पर सुचारू रूप से नहीं हो पाता। कल के काम का दबाव बासी काम को एक बेगार बना देगा जो रो-झींककर ही किया जा सकेगा। ऐसा होने से अभ्यास बिगड़ता है। और उनका विकृत प्रभाव कल के नये काम पर भी पड़ता है। इस प्रकार स्थगनशीलता कर्त्तव्यों में मनुष्य की रुचि तथा दक्षता को नष्ट कर देती है। इन दोनों विशेषताओं से रहित कर्त्तव्य परिश्रम का भरपूर मूल्य पाकर भी अपेक्षित पुरस्कार एवं परितोषक नहीं ला पाते।
🔴 जीवन में सफलता के लिए जहां परिश्रम एवं पुरुषार्थ की अनिवार्य आवश्यकता है वहां सामयिकता का सामंजस्य उससे भी अधिक आवश्यक है। जिस वक्त को बरबाद कर दिया जाता है उस वक्त में किया जाने के लिए निर्धारित श्रम भी निष्क्रिय रहकर नष्ट हो जाता है। श्रम तभी सम्पत्ति बनता है जब वह वक्त से संयोजित कर दिया जाता है और वक्त तब ही सम्पदा के रूप में सम्पन्नता एवं सफलता ला सकता है जब उसका श्रम के साथ सदुपयोग किया जाता है। समय का सदुपयोग करने वाले स्वभावतः परिश्रमी बन जाते हैं जब कि असामयिक परिश्रमी, आलसी की कोटि का ही व्यक्ति होता है वक्त का सदुपयोग ही वास्तविक श्रम है और वास्तविक श्रम अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष का सम्वाहन पुरुषार्थ एवं परमार्थ है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
गुरुवार, 4 मई 2017
👉 एक भयानक घटना टली
🔵 दिसम्बर २००८ की बात है। उन दिनों मैं नए वर्ष के लिए ‘अखण्ड ज्योति’ एवं ‘युग निर्माण योजना’ के सदस्य बनाने में व्यस्त थी। उसी समय मेरे साथ एक भयानक किन्तु आश्चर्यजनक घटना घटी। मैं नया सिलेण्डर भरवाकर बाजार से लाई थी, शायद वह कहीं से लीकेज था। पास में रखे लैम्प से उसमें आग लग गई। मैंने बुझाने का बहुत प्रयास किया परन्तु लपटें बढ़ती ही गईं। किसी तरह रसोई से घसीट कर सिलेण्डर को मैं बरामदे तक ले आयी। आगे खुले स्थान पर ले जाना संभव न था, क्योंकि लपटें अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुकी थीं। मैंने अपनी माँ को घर से बाहर ले जाकर बैठा दिया।
🔴 बाहर निकलकर पड़ोसियों से सहायता के लिए चिल्लाई। सारे पड़ोसी एकत्र होकर अपनी- अपनी राय देने लगे और अपनी तरह से आग बुझाने का प्रयास करने लगे, पर किसी को कोई भी कामयाबी नहीं मिली। किसी ने फायर ब्रिगेड को सूचना भी दे दी, लेकिन स्टेशन पास न होने के कारण शीघ्र सहायता न मिल सकी। मेरे सामने विषम परिस्थिति थी। सामने साक्षात् तबाही का दृश्य था। देखने वालों की भीड़ लगी थी। सभी त्राहि- त्राहि कर रहे थे। परन्तु सहानुभूति के अलावा किसी के पास कोई उपाय न था। मैं बहुत घबराई हुई थी। जाड़े की शाम जल्दी ही गहरा जाती है। सायं पाँच बजे का समय था, अँधेरा छाने लगा था। लपटें अपना उग्र रूप धारण करती जा रही थीं। सिलेण्डर पूरा भरा होने के कारण देर तक जलता रहा। मैंने भीड़ की ओर एक बार फिर देखा कि शायद कोई कुछ उपाय कर सके, परन्तु इस भौतिक संसार में इतनी सामर्थ्य कहाँ जो किसी का कष्ट हर ले।
🔵 कुछ ही पलों में एक भयानक दुर्घटना होने वाली थी, सभी विवश थे, उस भयानक स्थिति में सहसा मुझे गुरुदेव याद आये। मैं आर्त स्वर में रो पड़ी, गुरुदेव मेरी रक्षा करो, आप ही इस तबाही से मेरी रक्षा कर सकते हैं। गुरुदेव! यदि कुछ अनिष्ट हुआ तो मन टूट जाएगा, मैं इस समय आपका कार्य कर रही हूँ। उसमें व्यवधान आ जाएगा। इतना परिपक्व नहीं हूँ जो इतनी बड़ी घटना को सह सकूँ। गुरुदेव! क्षति मेरी नहीं आपकी होगी। लोग कहेंगे कि लोगों को गायत्री उपासना की सलाह देती हैं और कहती हैं गायत्री मंत्र सबका कल्याण करने वाला अनिष्ट निवारक मंत्र है। अपना ही अनिष्ट नहीं रोक पाई। इस घटना से बहुत लोगों की आस्था टूट जाएगी। लोग कहेंगे कि गायत्री उपासना में कोई शक्ति नहीं है। ज्यों- ज्यों लपटें बढ़ रही थीं मेरी प्रार्थना और आर्त होती जा रही थी। परन्तु गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा और विश्वास था कि अब कुछ नहीं होगा। जब गुरुदेव याद आ गए तो निश्चित है कि परोक्ष में वे साथ दे रहे हैं। मन में विश्वास जागा कि गुरुदेव आ गए, अब कोई अनिष्ट नहीं होगा।
🔴 बहनों ने कहा- सिलेण्डर से तेज आवाज होने लगी है, घर से बाहर निकल आओ, बस फटने ही वाला है। घर की छत उड़ जाएगी, दरवाजे दीवारें गिर जाएँगी। बड़ा भयानक विस्फोट होगा। सामान का नुकसान हो जाएगा कोई बात नहीं, जान तो बच जाएगी। लेकिन पता नहीं क्यों मुझे यह आभास हो रहा था कि मेरी करुण पुकार सुनकर मेरे गुरुदेव आ गए हैं अब कुछ नहीं होगा। मैंने उनसे यही बात कही भी। भीड़ से कुछ लोग व्यंग्यात्मक हँसी हँसकर बोले- यह विज्ञान का सत्य है कि सिलेण्डर फटेगा तो दीवार दरवाजे टूट जाएँगे, भयानक हादसा होगा। विज्ञान के नियमों में कच्ची श्रद्धा न रखो, इसमें तुम्हारे गुरु क्या कर पायेंगे। मेरा मन शांत था जैसे सब कुछ सामान्य हो। सहसा मेरे मन में विचार आया- जैसे किसी ने आदेश दिया हो कि तुम गायत्री मंत्र का जप शुरू करो। मैंने तुरंत आँखें बंद करके जप शुरू कर दिया। मेरे इस क्रिया- कलाप को सभी देख रहे थे और यह कह रहे थे कि मानती नहीं है। अंधी श्रद्धा भक्ति इसको ले डूबेगी।
🔵 एक बुजुर्ग हितैषी बाहर ले जाने के लिए मेरा हाथ पकड़कर घसीटने लगे। मैंने कहा- मामा जी चिन्ता न करें मेरा मन शांत है। यहाँ पर अदृश्य में गुरुदेव उपस्थित हैं। अब मुझे चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है। मैंने पुनः आँखें बंद कर गायत्री मंत्र का जप शुरू कर दिया। अभी ११ मंत्र ही हुए होंगे कि सिलेण्डर से साँय- साँय की तेज आवाज आने लगी। लोग चिल्लाने लगे कि अब सिलेण्डर फटने वाला है, ये बाहर निकल नहीं रही है। इसके बाद मैं भीड़ के कोलाहल से बेखबर, आँखें बंद किए, ध्यानावस्थित होकर मंत्र जप करती रही। एक भयानक धमाके के साथ सिलेण्डर फट गया। घर की दीवारें, छत व पृथ्वी हिल गई। साथ ही मैं भी डगमगा गई। मन मस्तिष्क को धमाके ने हिला दिया। सिलेण्डर फटने का दृश्य मैंने नहीं देखा, क्योंकि मैं आँखें बंद किए हुए थी। धमाके की आवाज सुनकर सभी रोने लगे। मेरी माँ का रोते- रोते बुरा हाल था, लोग समझ रहे थे कि मेरा अंत हो चुका है। धमाके से मेरी आँखें खुलीं तो देखा पूरा घर धूल से भर गया है। चारों तरफ धूल ही धूल थी। कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। मैंने अपने शरीर को स्पर्श किया कि कहीं मुझे चोट वगैरह तो नहीं आई! अपने को सुरक्षित पा मैं जोर से चिल्लाई- परेशान मत होओ मुझे कुछ नहीं हुआ। जब मैं घर से बाहर निकली तो मुझे सुरक्षित देख मेरी माँ मुझसे लिपट गई। सबकी आँखों में आँसू आ गए।
🔴 मेरा मन गुरु के प्रति कृतज्ञ हो उठा। लगभग १ घंटे तक चर्चा चलती रही। धमाके की आवाज सुनकर दूर- दूर के लोग भी एकत्रित हो गए। एक घंटे बाद जब घर की धूल बैठ गई तो कुछ लोगों के साथ घर के अन्दर गई। देखा टमाटर, संतरे, अंगूर, कपड़े सभी धमाके से छत पर चिपक गए थे। अलमारी से बरतन नीचे गिर गए थे। इधर- उधर बिखर गए थे। सारे घर में धूल ही धूल थी, सभी कुछ आश्चर्यचकित कर देने वाला था। सबसे अधिक आश्चर्य तो लोगों को तब हुआ जब उन्होंने देखा कि बरामदे में रखा सिलेण्डर धरती में १ फुट नीचे धँस गया, और उसके ऊपर का हिस्सा टूटकर मात्र १ से २ फुट की दूरी पर बिखरे हुए थे, जैसे किसी ने उन्हें जान बूझकर समेट दिया हो। सिलेण्डर के पास रखी चारपाई, दरवाजे बॉक्स, सब सुरक्षित थे और कहीं भी कुछ नुकसान नहीं हुआ। छत दीवार सब सही सलामत थे, जिसे देखने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। रात्रि हो गई थी, घर को वैसी स्थिति में छोड़कर हम सब सो गए। दूसरे दिन जब सवेरा हुआ तो लोगों का जमावड़ा होने लगा। इस अद्भुत घटना को देखने के लिए जन समूह उमड़ पड़ा। लोगों ने कई सिलेण्डर फटते देखे, जिसमें छत दीवारें, दरवाजों के काफी नुकसान हुए, सिलेण्डर को जमीन में धँसते किसी ने नहीं देखा था। सभी लोग कह रहे थे कि यह अद्भुत लीला तो सर्वोच्च सत्ता की ही हो सकती है, जो असंभव को संभव कर दे। यह तो विज्ञान को अध्यात्म की जबरदस्त चुनौती है। गुरु पर श्रद्धा विश्वास का फल देखकर सभी परम पूज्य गुरुदेव और माँ गायत्री के चरणों में नतमस्तक हो गए।
🌹 ममता सिंह रायबरेली (उ.प्र.)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/won/bha.1
🔴 बाहर निकलकर पड़ोसियों से सहायता के लिए चिल्लाई। सारे पड़ोसी एकत्र होकर अपनी- अपनी राय देने लगे और अपनी तरह से आग बुझाने का प्रयास करने लगे, पर किसी को कोई भी कामयाबी नहीं मिली। किसी ने फायर ब्रिगेड को सूचना भी दे दी, लेकिन स्टेशन पास न होने के कारण शीघ्र सहायता न मिल सकी। मेरे सामने विषम परिस्थिति थी। सामने साक्षात् तबाही का दृश्य था। देखने वालों की भीड़ लगी थी। सभी त्राहि- त्राहि कर रहे थे। परन्तु सहानुभूति के अलावा किसी के पास कोई उपाय न था। मैं बहुत घबराई हुई थी। जाड़े की शाम जल्दी ही गहरा जाती है। सायं पाँच बजे का समय था, अँधेरा छाने लगा था। लपटें अपना उग्र रूप धारण करती जा रही थीं। सिलेण्डर पूरा भरा होने के कारण देर तक जलता रहा। मैंने भीड़ की ओर एक बार फिर देखा कि शायद कोई कुछ उपाय कर सके, परन्तु इस भौतिक संसार में इतनी सामर्थ्य कहाँ जो किसी का कष्ट हर ले।
🔵 कुछ ही पलों में एक भयानक दुर्घटना होने वाली थी, सभी विवश थे, उस भयानक स्थिति में सहसा मुझे गुरुदेव याद आये। मैं आर्त स्वर में रो पड़ी, गुरुदेव मेरी रक्षा करो, आप ही इस तबाही से मेरी रक्षा कर सकते हैं। गुरुदेव! यदि कुछ अनिष्ट हुआ तो मन टूट जाएगा, मैं इस समय आपका कार्य कर रही हूँ। उसमें व्यवधान आ जाएगा। इतना परिपक्व नहीं हूँ जो इतनी बड़ी घटना को सह सकूँ। गुरुदेव! क्षति मेरी नहीं आपकी होगी। लोग कहेंगे कि लोगों को गायत्री उपासना की सलाह देती हैं और कहती हैं गायत्री मंत्र सबका कल्याण करने वाला अनिष्ट निवारक मंत्र है। अपना ही अनिष्ट नहीं रोक पाई। इस घटना से बहुत लोगों की आस्था टूट जाएगी। लोग कहेंगे कि गायत्री उपासना में कोई शक्ति नहीं है। ज्यों- ज्यों लपटें बढ़ रही थीं मेरी प्रार्थना और आर्त होती जा रही थी। परन्तु गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा और विश्वास था कि अब कुछ नहीं होगा। जब गुरुदेव याद आ गए तो निश्चित है कि परोक्ष में वे साथ दे रहे हैं। मन में विश्वास जागा कि गुरुदेव आ गए, अब कोई अनिष्ट नहीं होगा।
🔴 बहनों ने कहा- सिलेण्डर से तेज आवाज होने लगी है, घर से बाहर निकल आओ, बस फटने ही वाला है। घर की छत उड़ जाएगी, दरवाजे दीवारें गिर जाएँगी। बड़ा भयानक विस्फोट होगा। सामान का नुकसान हो जाएगा कोई बात नहीं, जान तो बच जाएगी। लेकिन पता नहीं क्यों मुझे यह आभास हो रहा था कि मेरी करुण पुकार सुनकर मेरे गुरुदेव आ गए हैं अब कुछ नहीं होगा। मैंने उनसे यही बात कही भी। भीड़ से कुछ लोग व्यंग्यात्मक हँसी हँसकर बोले- यह विज्ञान का सत्य है कि सिलेण्डर फटेगा तो दीवार दरवाजे टूट जाएँगे, भयानक हादसा होगा। विज्ञान के नियमों में कच्ची श्रद्धा न रखो, इसमें तुम्हारे गुरु क्या कर पायेंगे। मेरा मन शांत था जैसे सब कुछ सामान्य हो। सहसा मेरे मन में विचार आया- जैसे किसी ने आदेश दिया हो कि तुम गायत्री मंत्र का जप शुरू करो। मैंने तुरंत आँखें बंद करके जप शुरू कर दिया। मेरे इस क्रिया- कलाप को सभी देख रहे थे और यह कह रहे थे कि मानती नहीं है। अंधी श्रद्धा भक्ति इसको ले डूबेगी।
🔵 एक बुजुर्ग हितैषी बाहर ले जाने के लिए मेरा हाथ पकड़कर घसीटने लगे। मैंने कहा- मामा जी चिन्ता न करें मेरा मन शांत है। यहाँ पर अदृश्य में गुरुदेव उपस्थित हैं। अब मुझे चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है। मैंने पुनः आँखें बंद कर गायत्री मंत्र का जप शुरू कर दिया। अभी ११ मंत्र ही हुए होंगे कि सिलेण्डर से साँय- साँय की तेज आवाज आने लगी। लोग चिल्लाने लगे कि अब सिलेण्डर फटने वाला है, ये बाहर निकल नहीं रही है। इसके बाद मैं भीड़ के कोलाहल से बेखबर, आँखें बंद किए, ध्यानावस्थित होकर मंत्र जप करती रही। एक भयानक धमाके के साथ सिलेण्डर फट गया। घर की दीवारें, छत व पृथ्वी हिल गई। साथ ही मैं भी डगमगा गई। मन मस्तिष्क को धमाके ने हिला दिया। सिलेण्डर फटने का दृश्य मैंने नहीं देखा, क्योंकि मैं आँखें बंद किए हुए थी। धमाके की आवाज सुनकर सभी रोने लगे। मेरी माँ का रोते- रोते बुरा हाल था, लोग समझ रहे थे कि मेरा अंत हो चुका है। धमाके से मेरी आँखें खुलीं तो देखा पूरा घर धूल से भर गया है। चारों तरफ धूल ही धूल थी। कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। मैंने अपने शरीर को स्पर्श किया कि कहीं मुझे चोट वगैरह तो नहीं आई! अपने को सुरक्षित पा मैं जोर से चिल्लाई- परेशान मत होओ मुझे कुछ नहीं हुआ। जब मैं घर से बाहर निकली तो मुझे सुरक्षित देख मेरी माँ मुझसे लिपट गई। सबकी आँखों में आँसू आ गए।
🔴 मेरा मन गुरु के प्रति कृतज्ञ हो उठा। लगभग १ घंटे तक चर्चा चलती रही। धमाके की आवाज सुनकर दूर- दूर के लोग भी एकत्रित हो गए। एक घंटे बाद जब घर की धूल बैठ गई तो कुछ लोगों के साथ घर के अन्दर गई। देखा टमाटर, संतरे, अंगूर, कपड़े सभी धमाके से छत पर चिपक गए थे। अलमारी से बरतन नीचे गिर गए थे। इधर- उधर बिखर गए थे। सारे घर में धूल ही धूल थी, सभी कुछ आश्चर्यचकित कर देने वाला था। सबसे अधिक आश्चर्य तो लोगों को तब हुआ जब उन्होंने देखा कि बरामदे में रखा सिलेण्डर धरती में १ फुट नीचे धँस गया, और उसके ऊपर का हिस्सा टूटकर मात्र १ से २ फुट की दूरी पर बिखरे हुए थे, जैसे किसी ने उन्हें जान बूझकर समेट दिया हो। सिलेण्डर के पास रखी चारपाई, दरवाजे बॉक्स, सब सुरक्षित थे और कहीं भी कुछ नुकसान नहीं हुआ। छत दीवार सब सही सलामत थे, जिसे देखने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। रात्रि हो गई थी, घर को वैसी स्थिति में छोड़कर हम सब सो गए। दूसरे दिन जब सवेरा हुआ तो लोगों का जमावड़ा होने लगा। इस अद्भुत घटना को देखने के लिए जन समूह उमड़ पड़ा। लोगों ने कई सिलेण्डर फटते देखे, जिसमें छत दीवारें, दरवाजों के काफी नुकसान हुए, सिलेण्डर को जमीन में धँसते किसी ने नहीं देखा था। सभी लोग कह रहे थे कि यह अद्भुत लीला तो सर्वोच्च सत्ता की ही हो सकती है, जो असंभव को संभव कर दे। यह तो विज्ञान को अध्यात्म की जबरदस्त चुनौती है। गुरु पर श्रद्धा विश्वास का फल देखकर सभी परम पूज्य गुरुदेव और माँ गायत्री के चरणों में नतमस्तक हो गए।
🌹 ममता सिंह रायबरेली (उ.प्र.)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
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👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 93)
🌹 तीसरी हिमालय यात्रा-ऋषि परम्परा का बीजारोपण
🔴 मथुरा का कार्य सुचारु रूप से चल पड़ने के उपरांत हिमालय से तीसरा बुलावा आया, जिसमें अगले चौथे कदम को उठाए जाने का संकेत था। समय भी काफी हो गया था। इस बार कार्य का दबाव अत्यधिक रहा और सफलता के साथ-साथ थकान बढ़ती गई थी। ऐसी परिस्थितियों में बैटरी चार्ज करने का यह निमंत्रण हमारे लिए बहुत ही उत्साहवर्धक था।
🔵 निर्धारित दिन प्रयाण आरम्भ हो गया। देखे हुए रास्ते को पार करने में कोई कठिनाई नहीं हुए। फिर मौसम भी ऐसा रखा गया था जिसमें शीत के कड़े प्रकोप का सामना न करना पड़ता और एकाकीपन की प्रथम बार जैसी कठिनाई न पड़ती। गोमुख पहुँचने पर गुरुदेव के छाया पुरुष का मिलना और अत्यंत सरलतापूर्वक नंदन वन पहुँचा देने का क्रम पिछली बार जैसा ही रहा। सच्चे आत्मीयजनों का पारस्परिक मिलन कितना आनंद-उल्लास भरा होता है, इसे भुक्त-भोगी ही जानते हैं। रास्ते भर जिस शुभ घड़ी की प्रतीक्षा करनी पड़ी वह आखिर आ ही गई। अभिवादन आशीर्वाद का क्रम चला और पीछे बहुमूल्य मार्गदर्शन का सिलसिला चल पड़ा।
🔴 अब की बार मथुरा छोड़कर हरिद्वार डेरा डालने का निर्देश मिला और कहा गया कि ‘‘वहाँ रहकर ऋषि परम्परा को पुनर्जीवित करने का कार्य आरम्भ करना है। तुम्हें याद है न, जब यहाँ प्रथम बार आए थे और हमने सूक्ष्म शरीरधारी इस क्षेत्र के ऋषियों का दर्शन कराया था। हर एक ने उनकी परम्परा लुप्त हो जाने पर दुःख प्रकट किया था और तुमने यह वचन दिया था कि इस कार्य को भी सम्पन्न करोगे। इस बार उसी निमित्त बुलाया गया है।’’
🔵 भगवान अशरीरी है। जब कभी उन्हें महत्त्वपूर्ण कार्य कराने होते हैं, तो ऋषियों के द्वारा कराते हैं। महापुरुषों को वे बनाकर खड़े कर देते हैं। स्वयं तप करते हैं और अपनी शक्ति देवात्माओं को देकर बड़े काम करा लेते हैं। भगवान राम को विश्वामित्र अपने यहाँ रक्षा के बहाने ले गए और वहाँ बला-अतिबला विद्या (गायत्री और सावित्री) की शिक्षा देकर उनके द्वारा असुरता का दुर्ग ढहाने तथा रामराज्य, धर्मराज्य की स्थापना का कार्य कराया था। कृष्ण भी संदीपन ऋषि के आश्रम में पढ़ने गए थे और वहाँ से गीता गायन, महाभारत निर्णय तथा सुदामा ऋषि की कार्य पद्धति को आगे बढ़ाने का निर्देशन लेकर वापस लौटे थे। समस्त पुराण इसी उल्लेख से भरे पड़े हैं कि ऋषियों के द्वारा महापुरुष उत्पन्न किए गए और उनकी सहायता से महान कार्य सम्पादित कराए। स्वयं तो वे शोध प्रयोजनों में और तप साधनाओं में संलग्न रहते ही थे। इसी कार्य को तुम्हें अब पूरा करना है।’’
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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🔴 मथुरा का कार्य सुचारु रूप से चल पड़ने के उपरांत हिमालय से तीसरा बुलावा आया, जिसमें अगले चौथे कदम को उठाए जाने का संकेत था। समय भी काफी हो गया था। इस बार कार्य का दबाव अत्यधिक रहा और सफलता के साथ-साथ थकान बढ़ती गई थी। ऐसी परिस्थितियों में बैटरी चार्ज करने का यह निमंत्रण हमारे लिए बहुत ही उत्साहवर्धक था।
🔵 निर्धारित दिन प्रयाण आरम्भ हो गया। देखे हुए रास्ते को पार करने में कोई कठिनाई नहीं हुए। फिर मौसम भी ऐसा रखा गया था जिसमें शीत के कड़े प्रकोप का सामना न करना पड़ता और एकाकीपन की प्रथम बार जैसी कठिनाई न पड़ती। गोमुख पहुँचने पर गुरुदेव के छाया पुरुष का मिलना और अत्यंत सरलतापूर्वक नंदन वन पहुँचा देने का क्रम पिछली बार जैसा ही रहा। सच्चे आत्मीयजनों का पारस्परिक मिलन कितना आनंद-उल्लास भरा होता है, इसे भुक्त-भोगी ही जानते हैं। रास्ते भर जिस शुभ घड़ी की प्रतीक्षा करनी पड़ी वह आखिर आ ही गई। अभिवादन आशीर्वाद का क्रम चला और पीछे बहुमूल्य मार्गदर्शन का सिलसिला चल पड़ा।
🔴 अब की बार मथुरा छोड़कर हरिद्वार डेरा डालने का निर्देश मिला और कहा गया कि ‘‘वहाँ रहकर ऋषि परम्परा को पुनर्जीवित करने का कार्य आरम्भ करना है। तुम्हें याद है न, जब यहाँ प्रथम बार आए थे और हमने सूक्ष्म शरीरधारी इस क्षेत्र के ऋषियों का दर्शन कराया था। हर एक ने उनकी परम्परा लुप्त हो जाने पर दुःख प्रकट किया था और तुमने यह वचन दिया था कि इस कार्य को भी सम्पन्न करोगे। इस बार उसी निमित्त बुलाया गया है।’’
🔵 भगवान अशरीरी है। जब कभी उन्हें महत्त्वपूर्ण कार्य कराने होते हैं, तो ऋषियों के द्वारा कराते हैं। महापुरुषों को वे बनाकर खड़े कर देते हैं। स्वयं तप करते हैं और अपनी शक्ति देवात्माओं को देकर बड़े काम करा लेते हैं। भगवान राम को विश्वामित्र अपने यहाँ रक्षा के बहाने ले गए और वहाँ बला-अतिबला विद्या (गायत्री और सावित्री) की शिक्षा देकर उनके द्वारा असुरता का दुर्ग ढहाने तथा रामराज्य, धर्मराज्य की स्थापना का कार्य कराया था। कृष्ण भी संदीपन ऋषि के आश्रम में पढ़ने गए थे और वहाँ से गीता गायन, महाभारत निर्णय तथा सुदामा ऋषि की कार्य पद्धति को आगे बढ़ाने का निर्देशन लेकर वापस लौटे थे। समस्त पुराण इसी उल्लेख से भरे पड़े हैं कि ऋषियों के द्वारा महापुरुष उत्पन्न किए गए और उनकी सहायता से महान कार्य सम्पादित कराए। स्वयं तो वे शोध प्रयोजनों में और तप साधनाओं में संलग्न रहते ही थे। इसी कार्य को तुम्हें अब पूरा करना है।’’
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 MANAN (Part 4)
(motivating the self-being for present & future period) & its Significance.
🔴 As ‘CHINTAN’ is comprised of two stages of ‘SELF-INSEPCTION/REVIEW’ & ‘SELF-RECTIFICATION’ so is the ‘MANAN’. The first stage of it is ‘SELF-INCULCATION’ whereas the second one is ‘SELF-DEVELOPMENT’. What is meant by SELF-DEVELOPMENT? The very meaning of SELF-DEVELOPMENT is enlarging/developing the Ego-Circle. People’ circle happens to be very small like that of a frog of the well. They assume that only their bodies are their own. They do not treat themselves as a component of the society. You tell what can be the value of an isolated particle of blood.
🔵 The blood works only when all the particles of it bind together otherwise where is counted is one particle taken out of blood. That is why do not limit your circle. Just keep trying to move above the timidity of selfishness. Try to address yourself as ‘We’ in place of ‘I’ like we all. If you continue with ‘MAI’,’MAI’,’MAI’ ( I,I,I) then you will be confined to a area like a he-goat and encircled like a well-frog in which only and your family will be present. You will have no contact with society and BHAGWAN; therefore kindly broaden your base.
🔴 ‘We are for all’; ‘all are for us’ think like this. You think like-‘ATMAVAT SARVBHUTESHU’. This whole world is like us. We are alive due to helps pouring in from different quarters and so our help must be given to all. This thinking-style will lead you to become society-oriented and a responsible citizen. You will start expressing your affection for country, religion, society and culture and not only this you will also start treating social problems as your own problems. What is this all about? It is about widening the base of soul or expansion of ego-circle. You feel happy with things you treat as yours’.
🔵 But if you start treating all as yours’ then, you will find your level of pride and pleasure grown. Yours’ will be the sun, the moon, the stars, the rivers, the mountains too, the earth too, all the men and even the whole of world will be yours’. The day you begin treating yourself as of all and all as yours’, you will see how happy and glorious your life becomes, how is transformed your activities and life and how your happiness scales new peaks? Just be competent like that. Well, only it was to be told to you.
🌹 Finish
🌹 ~Pt Shriram Sharma Aachrya
🔴 As ‘CHINTAN’ is comprised of two stages of ‘SELF-INSEPCTION/REVIEW’ & ‘SELF-RECTIFICATION’ so is the ‘MANAN’. The first stage of it is ‘SELF-INCULCATION’ whereas the second one is ‘SELF-DEVELOPMENT’. What is meant by SELF-DEVELOPMENT? The very meaning of SELF-DEVELOPMENT is enlarging/developing the Ego-Circle. People’ circle happens to be very small like that of a frog of the well. They assume that only their bodies are their own. They do not treat themselves as a component of the society. You tell what can be the value of an isolated particle of blood.
🔵 The blood works only when all the particles of it bind together otherwise where is counted is one particle taken out of blood. That is why do not limit your circle. Just keep trying to move above the timidity of selfishness. Try to address yourself as ‘We’ in place of ‘I’ like we all. If you continue with ‘MAI’,’MAI’,’MAI’ ( I,I,I) then you will be confined to a area like a he-goat and encircled like a well-frog in which only and your family will be present. You will have no contact with society and BHAGWAN; therefore kindly broaden your base.
🔴 ‘We are for all’; ‘all are for us’ think like this. You think like-‘ATMAVAT SARVBHUTESHU’. This whole world is like us. We are alive due to helps pouring in from different quarters and so our help must be given to all. This thinking-style will lead you to become society-oriented and a responsible citizen. You will start expressing your affection for country, religion, society and culture and not only this you will also start treating social problems as your own problems. What is this all about? It is about widening the base of soul or expansion of ego-circle. You feel happy with things you treat as yours’.
🔵 But if you start treating all as yours’ then, you will find your level of pride and pleasure grown. Yours’ will be the sun, the moon, the stars, the rivers, the mountains too, the earth too, all the men and even the whole of world will be yours’. The day you begin treating yourself as of all and all as yours’, you will see how happy and glorious your life becomes, how is transformed your activities and life and how your happiness scales new peaks? Just be competent like that. Well, only it was to be told to you.
🌹 Finish
🌹 ~Pt Shriram Sharma Aachrya
👉 हिम्मत इंसान की मदद भगवान् की
🔵 सन् १९३९ तब रूस के मुखिया स्टालिन थे। फिनलैंड के कई बंदरगाह रूस के लिए सामरिक महत्त्व के थे, इसलिये उन्होंने अपनी शक्ति के बल पर फिनलैंड को धमकी दी-यह बंदरगाह रूस को दे दिये जाएँ? यदि फिनलैंड ने बात न मानी तो रूस शक्ति प्रयोग करना भी जानता है।''
🔴 वह वैसा ही अपराध था जैसे चोरी, डकैती, अपहरण या लूटपाट। यदि संसार में शक्ति और सैन्यबल ही सब कुछ हो तो फिर न्याय-नीति आदि सद्भावनाओ को प्रश्रय कहॉ मिले? पर किया क्या जाए? ऐसे लोग भी इस दुनिया में हैं, जो केवल शक्ति और उद्दंडता की भाषा समझते हैं। इनसे रक्षा भी हिम्मत से ही करनी पडती है। स्वल्प क्षमता के लोग साहसपूर्वक संघर्ष कर बैठते हैं तो उनकी मदद भगवान् करता है। बाहर से दिखाई देने वाला राक्षसी बल तब जीतता है, जब अच्छाई की शक्तियॉ भले ही सीमित सही-संघर्ष करने से भय खा जाती है।
🔵 फिनलैण्ड़ की कुल २ लाख सेना रूस की ४० लाख की विशाल सेना और आधुनिक शस्त्र सज्जा के सामने जा डटी। रूसियों को अनुमान था- प्रात: होते देर है, फिनलैंड को जीतना देर नहीं, उनको यह आशा महंगी पडी।
🔴 एक स्थान पर फिनलैंड के एक सेनाधिकारी लेफ्टिनेंट हीन सारेला को नियुक्त किया गया। साथ में कुल ४९ सिपाही थे। हथियार भी उस समय के जब बंदूके बनना प्रारभ हुईं थीं। रात से ही रूसी टैंको की गडगडा़हट सुनाई देने लगी। रूसी सेना मार्च करती हुई बढी चली आ रही थी।
🔵 ४९ सैनिकों के आगे हजारों की सेना। सैनिकों ने हाथ ढीले कर दिए और कहा- भेड़िये-भेड का युद्ध नहीं होता। लडाना है तो हमें आप ही मार डालिये। युद्ध के मोर्चे पर आगे बढ़ना तो एक प्रकार से जानबूझकर हमारी हत्या कराना है। लेफ्टिनेंट सारेला का माथा ठनक गया। यह बात उसके अपने मन में आई होती तो वह गोली मार लेता-उसने कडककर कहा-सैनिको! यह मत भूलो संसार में वही जातियाँ जीवित रहती है, जो संघर्ष से नहीं घबडातीं। जो बाह्य आक्रमण का मुकाबला नहीं कर सकते वह अपने सामाजिक जीवन में दृढ़ नही हो सकते। प्रतिरोध से घबडाने वाले लोगों में अपने से ही उद्दंड और अभद्र लोग पैदा हो जाते हैं और सामाजिक शांति एवं व्यवस्था को चौपट कर डालते हैं। पाप, दुर्भाव, उद्दंडता और उच्छृंखलता मुर्दा जातियों के जीवन में पाई जाती है। साहसी शूर-वीरो के राज्य में चोर, उठाईगीर क्या-डकैत, आतताई लोग भी मजदूरी करते है। उनमें अंधविश्वास और रूढिवादिता नहीं, पौरुष और पराक्रम का विकास होता है, इसलिये वे थोड़े-से भी हों तो भी संसार में छाए रहते हैं। निश्चय करो, तुम्हें पराधीनता का जीवन जीना है या फिर शानदार जीवन की प्राप्ति के लिए संधर्ष की तैयारी करनी है।
🔴 सैनिको के हृदयों में सारेला का तेजस्वी भाषण सुनकर विद्युत् कौंध गई। हथियार उठा-उठाकर उन्होंने प्रतिज्ञा की लडे़ंगे और रक्त की आखिरी बूंद तक संघर्ष करेंगे।
🔵 मुट्ठी-मर जवान विकराल दानवी सेना से जूझ पडे। ४९ जवान दिन भर कुछ खाए-पिए बिना जमीन में रैंगते शत्रुओ को मारते हुए आगे बढते गए और जब उस दिन का युद्ध समाप्त हुआ तो संसार के अखबारो ने बडे़ बडे़ अक्षरों में छापा-मुट्ठी भर फिनलैण्ड़ के सिपाहियो ने रूसी सेना की अग्रिम पंक्ति के बीस हजार सैनिकों को कुचलकर रख दिया। ५० गाडियों और १२० टेंकों को भी उन्होंने ध्वस्त करके रख दिया था।
🔴 सच है जिंदा दिल कौमें बुराइयों और अपराधों के आगे घुटने नही टेकती, उनसे लड पडती है और विजय पाती हैं। हिम्मत करने वाले इंसान की मदद भगवान् करता है। स्टालिन जैसे सशक्त व्यक्ति ने भी इस पराजय को चमत्कार ही माना था।
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 149, 150
🔴 वह वैसा ही अपराध था जैसे चोरी, डकैती, अपहरण या लूटपाट। यदि संसार में शक्ति और सैन्यबल ही सब कुछ हो तो फिर न्याय-नीति आदि सद्भावनाओ को प्रश्रय कहॉ मिले? पर किया क्या जाए? ऐसे लोग भी इस दुनिया में हैं, जो केवल शक्ति और उद्दंडता की भाषा समझते हैं। इनसे रक्षा भी हिम्मत से ही करनी पडती है। स्वल्प क्षमता के लोग साहसपूर्वक संघर्ष कर बैठते हैं तो उनकी मदद भगवान् करता है। बाहर से दिखाई देने वाला राक्षसी बल तब जीतता है, जब अच्छाई की शक्तियॉ भले ही सीमित सही-संघर्ष करने से भय खा जाती है।
🔵 फिनलैण्ड़ की कुल २ लाख सेना रूस की ४० लाख की विशाल सेना और आधुनिक शस्त्र सज्जा के सामने जा डटी। रूसियों को अनुमान था- प्रात: होते देर है, फिनलैंड को जीतना देर नहीं, उनको यह आशा महंगी पडी।
🔴 एक स्थान पर फिनलैंड के एक सेनाधिकारी लेफ्टिनेंट हीन सारेला को नियुक्त किया गया। साथ में कुल ४९ सिपाही थे। हथियार भी उस समय के जब बंदूके बनना प्रारभ हुईं थीं। रात से ही रूसी टैंको की गडगडा़हट सुनाई देने लगी। रूसी सेना मार्च करती हुई बढी चली आ रही थी।
🔵 ४९ सैनिकों के आगे हजारों की सेना। सैनिकों ने हाथ ढीले कर दिए और कहा- भेड़िये-भेड का युद्ध नहीं होता। लडाना है तो हमें आप ही मार डालिये। युद्ध के मोर्चे पर आगे बढ़ना तो एक प्रकार से जानबूझकर हमारी हत्या कराना है। लेफ्टिनेंट सारेला का माथा ठनक गया। यह बात उसके अपने मन में आई होती तो वह गोली मार लेता-उसने कडककर कहा-सैनिको! यह मत भूलो संसार में वही जातियाँ जीवित रहती है, जो संघर्ष से नहीं घबडातीं। जो बाह्य आक्रमण का मुकाबला नहीं कर सकते वह अपने सामाजिक जीवन में दृढ़ नही हो सकते। प्रतिरोध से घबडाने वाले लोगों में अपने से ही उद्दंड और अभद्र लोग पैदा हो जाते हैं और सामाजिक शांति एवं व्यवस्था को चौपट कर डालते हैं। पाप, दुर्भाव, उद्दंडता और उच्छृंखलता मुर्दा जातियों के जीवन में पाई जाती है। साहसी शूर-वीरो के राज्य में चोर, उठाईगीर क्या-डकैत, आतताई लोग भी मजदूरी करते है। उनमें अंधविश्वास और रूढिवादिता नहीं, पौरुष और पराक्रम का विकास होता है, इसलिये वे थोड़े-से भी हों तो भी संसार में छाए रहते हैं। निश्चय करो, तुम्हें पराधीनता का जीवन जीना है या फिर शानदार जीवन की प्राप्ति के लिए संधर्ष की तैयारी करनी है।
🔴 सैनिको के हृदयों में सारेला का तेजस्वी भाषण सुनकर विद्युत् कौंध गई। हथियार उठा-उठाकर उन्होंने प्रतिज्ञा की लडे़ंगे और रक्त की आखिरी बूंद तक संघर्ष करेंगे।
🔵 मुट्ठी-मर जवान विकराल दानवी सेना से जूझ पडे। ४९ जवान दिन भर कुछ खाए-पिए बिना जमीन में रैंगते शत्रुओ को मारते हुए आगे बढते गए और जब उस दिन का युद्ध समाप्त हुआ तो संसार के अखबारो ने बडे़ बडे़ अक्षरों में छापा-मुट्ठी भर फिनलैण्ड़ के सिपाहियो ने रूसी सेना की अग्रिम पंक्ति के बीस हजार सैनिकों को कुचलकर रख दिया। ५० गाडियों और १२० टेंकों को भी उन्होंने ध्वस्त करके रख दिया था।
🔴 सच है जिंदा दिल कौमें बुराइयों और अपराधों के आगे घुटने नही टेकती, उनसे लड पडती है और विजय पाती हैं। हिम्मत करने वाले इंसान की मदद भगवान् करता है। स्टालिन जैसे सशक्त व्यक्ति ने भी इस पराजय को चमत्कार ही माना था।
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 149, 150
👉 सद्गुरु को बना ले अपना नाविक
🔵 एक था यात्री, दूर देश की यात्रा पर निकला था वह। अभी कुछ दूर ही चला था कि एक नदी आ गयी, किनारे पर नाव लगी थी। उसने सोचा-यह नदी भला मेरा क्या बिगाड़ लेगी? पाल उसने बाँधा नहीं, डाँड उसने खोले नहीं, न जाने कैसी जल्दी थी उसे? मल्लाह को उसने पुकारा नहीं। बादल गरज रहे थे। घना अँधेरा आस-पास के वातावरण को भयावह बना रहा था। तेज कड़क के साथ जब बिजली चमकती है, तो नदी का पानी भी दहशत से थर्रा जाता। फिर भी वह माना नहीं, नाव को लंगर से खोल दिया और स्वयं भी उसमें सवार हो गया। किनारा जैसे-तैसे निकल गया, पर नाव जैसे ही मझधार में आयी, वैसे ही उसे भँवरों और उत्ताल तरंगों ने आ घेरा। लहरों के थपेड़े मजबूत नाव को चकनाचूर करने लगे। उत्ताल तरंगें बार-बार नाव को ऊपर तक उछाल देतीं और जब नाव लहरों के साथ नीचे गिरती, तो भँवरों का चक्रव्यूह उसे मझधार में डुबो देने में जुट जाता। यात्री विकल और बेबस था। मल्लाह के अभाव में वह असहाय था। आखिरकार नाव ऊपर तक उछली और यात्री समेत जल में समा गयी।
🔴 एक दूसरा यात्री आया। कुछ दूर चलने के बाद उसे भी नदी मिली। नदी किनारे लगी नाव टूटी-फूटी थी,डाँड कमजोर थे, पाल फटा हुआ था, तो भी उसने युक्ति से काम लिया। नाविक को बुलाया और बड़ी विनम्रतापूर्वक उससे कहा-मुझे उस पार तक पहुँचा दो। नाविक यात्री को लेकर चल पड़ा। किनारा छोड़ते ही वातावरण भयानक हो उठा। आसमान के सूरज को बादलों ने ढँक लिया। भयानक गरज के साथ मूसलाधार बारिश होने लगी। रह-रहकर जब बिजली कड़कती, तो यात्री का हृदय सूखे पत्ते की तरह काँप उठता। नाविक हर बार व्याकुल और भयभीत यात्री के मन को सान्त्वना देता। वह हर बार नाव को बचा लेता और यात्री के मनोबल को टूटने न देता। लहरों ने संघर्ष किया, तूफान टकराए, हवा ने पूरी ताकत लगाकर नाव को भटकाने का प्रयत्न किया, पर नाविक एक-एक को सँभालता हुआ यात्री को सकुशल दूसरे पार तक ले आया।
🔵 मनुष्य जीवन भी एक यात्रा है जिसमें पग-पग पर कठिनाइयों के महासागर पार करने पड़ते हैं। इन्द्रियों की लालसाएँ-मन में पनपते भ्रमों की बहुतायत जीवन को पल-पल पर भटकाने की कोशिश करते हैं, फिर संसार में भयावह संकटों, विघ्नों, परेशानियों की कमी कहाँ है? संसार का हर थपेड़ा जीवन-नौका को नेस्तनाबूद कर देने के लिए प्रयत्नशील रहता है। यहाँ के चित्र-विचित्र आकर्षणों का हर भँवर समूचे जीवन को डुबो देने के लिए आतुर-व्याकुल रहता है। जो जीवन-यात्रा की शुरुआत से ही सद्गुरु को अपना नाविक बना लेते हैं, उनके हाथों में अपने को सौंप देते हैं, गुरु स्वयं उनकी यात्रा को सरल बना देते हैं, क्योंकि जीवनपथ की सभी कठिनाइयों के वही ज्ञाता और हम सबके वही सच्चे सहचर हैं। अपने अहंकार और अज्ञान में डूबे मनुष्यों की स्थिति तो उस पहले यात्री जैसी है, जो नाव चलाना न जानने पर भी उसे तूफानों में छोड़ देता है और बीच में ही नष्ट हो जाता है।
🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 55
🔴 एक दूसरा यात्री आया। कुछ दूर चलने के बाद उसे भी नदी मिली। नदी किनारे लगी नाव टूटी-फूटी थी,डाँड कमजोर थे, पाल फटा हुआ था, तो भी उसने युक्ति से काम लिया। नाविक को बुलाया और बड़ी विनम्रतापूर्वक उससे कहा-मुझे उस पार तक पहुँचा दो। नाविक यात्री को लेकर चल पड़ा। किनारा छोड़ते ही वातावरण भयानक हो उठा। आसमान के सूरज को बादलों ने ढँक लिया। भयानक गरज के साथ मूसलाधार बारिश होने लगी। रह-रहकर जब बिजली कड़कती, तो यात्री का हृदय सूखे पत्ते की तरह काँप उठता। नाविक हर बार व्याकुल और भयभीत यात्री के मन को सान्त्वना देता। वह हर बार नाव को बचा लेता और यात्री के मनोबल को टूटने न देता। लहरों ने संघर्ष किया, तूफान टकराए, हवा ने पूरी ताकत लगाकर नाव को भटकाने का प्रयत्न किया, पर नाविक एक-एक को सँभालता हुआ यात्री को सकुशल दूसरे पार तक ले आया।
🔵 मनुष्य जीवन भी एक यात्रा है जिसमें पग-पग पर कठिनाइयों के महासागर पार करने पड़ते हैं। इन्द्रियों की लालसाएँ-मन में पनपते भ्रमों की बहुतायत जीवन को पल-पल पर भटकाने की कोशिश करते हैं, फिर संसार में भयावह संकटों, विघ्नों, परेशानियों की कमी कहाँ है? संसार का हर थपेड़ा जीवन-नौका को नेस्तनाबूद कर देने के लिए प्रयत्नशील रहता है। यहाँ के चित्र-विचित्र आकर्षणों का हर भँवर समूचे जीवन को डुबो देने के लिए आतुर-व्याकुल रहता है। जो जीवन-यात्रा की शुरुआत से ही सद्गुरु को अपना नाविक बना लेते हैं, उनके हाथों में अपने को सौंप देते हैं, गुरु स्वयं उनकी यात्रा को सरल बना देते हैं, क्योंकि जीवनपथ की सभी कठिनाइयों के वही ज्ञाता और हम सबके वही सच्चे सहचर हैं। अपने अहंकार और अज्ञान में डूबे मनुष्यों की स्थिति तो उस पहले यात्री जैसी है, जो नाव चलाना न जानने पर भी उसे तूफानों में छोड़ देता है और बीच में ही नष्ट हो जाता है।
🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 55
👉 समय का सदुपयोग करें (भाग 21)
🌹 समय के सदुपयोग का महत्व समझिए
🔴 हर मनुष्य को वक्त का, छोटे से छोटे क्षण का मूल्य एवं महत्व समझना चाहिये। जीवन का वक्त सीमित है और काम बहुत है। आने से लेकर परिवार, समाज एवं राष्ट्र के दायित्वपूर्ण कर्त्तव्यों के साथ मुक्ति की साधना तक कामों की एक लम्बी शृंखला चली गई है। कर्त्तव्यों की इस अनिवार्य परम्परा को पूरा किये बिना मनुष्य का कल्याण नहीं। इसी कर्म-क्रम को इसी एक जीवन के सीमित वक्त से ही पूरा कर डालना है क्योंकि आत्मा की मुक्ति मानव-जीवन के अतिरिक्त अन्य किसी जीवन में नहीं हो सकती और मुक्ति का प्रयास तभी सफल हो सकते है जब वह उसके सहायक पूर्व प्रयासों को पूरा करता है। अस्तु जीवन के चरम लक्ष्य मुक्ति पाने के लिए उसकी साधना के अतिरिक्त सारे कर्त्तव्य-क्रम को इसी जीवन के सीमित वक्त में ही पूरा करना होगा।
🔵 इतने विशाल कर्त्तव्य-क्रम को मनुष्य पूरा तब ही कर सकता है जब वह जीवन के एक-एक क्षण, एक-एक पल और एक-एक विशेष को सावधानी के साथ उपयोगी एवं उपयुक्त दिशा में प्रयुक्त करे। नहीं तो किसने देखा है कि उसके जीवन का अन्तिम छोर कितनी दूरी पर ठहरा हुआ है। जीवन की अवधि सीमित होने के साथ अनिश्चित एवं अज्ञात भी है। जो क्षण हमारे पास है, हृदय के जिस स्पन्दन में गति है, वही हमारा है। श्वास का एक आगमन ही हमारा है बाकी सब पराये हैं, न जाने दूसरे क्षण हमारे बन पायेंगे या नहीं। अतएव हर बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिये कि जो क्षण, जो श्वास उसके अधिकार में है उसे भगवान की महती कृपा और जीवन का उच्चतम अन्तिम अवसर समझकर इस सावधानी एवं संलग्नता से उपयोग करे कि मानों इसी एक क्षण में सब कुछ दक्षता है। अपने वर्तमान क्षण को छोड़कर भविष्य की युगीन अवधि पर विश्वास करना विवेक का बहुत बड़ा अपमान है। जिस भविष्य पर आप अपने जीवन विकास के कार्यों, अपने विकास कर्त्तव्यों को स्थगित करने की सोच रहे हैं वह आ ही जायेगा, यह जीवन निश्चित अनिश्चितता के बीच निश्चय पूर्वक नहीं कहा जा सकता।
🔴 कर्त्तव्यों के विषय में आने वाले कल की कल्पना एक अन्ध-विश्वास है। उसकी प्रतीक्षा करने वाले नासमझ इस दुनिया में पश्चाताप करते हुए ही विदा होते हैं। आने वाला कल ऐसा आकाश कुसुम है जो सुना तो गया पर पाया कभी नहीं गया। किन्तु दुर्भाग्य है कि हर स्थगनशील व्यक्ति सदा ही उसी कल पर विश्वास किये हुए उपस्थित वर्तमान में सोता रहता है और जब उसका प्रतीक्षित कल कभी नहीं आता तब उसके पास उस बीते हुये कल के लिये रोने-पछताने के सिवाय कुछ नहीं रह जाता जिसको कि उसने वर्तमान में अवहेलना की थी, और जो कि किसी भी मूल्य पर वापस नहीं लाया जा सकता।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔴 हर मनुष्य को वक्त का, छोटे से छोटे क्षण का मूल्य एवं महत्व समझना चाहिये। जीवन का वक्त सीमित है और काम बहुत है। आने से लेकर परिवार, समाज एवं राष्ट्र के दायित्वपूर्ण कर्त्तव्यों के साथ मुक्ति की साधना तक कामों की एक लम्बी शृंखला चली गई है। कर्त्तव्यों की इस अनिवार्य परम्परा को पूरा किये बिना मनुष्य का कल्याण नहीं। इसी कर्म-क्रम को इसी एक जीवन के सीमित वक्त से ही पूरा कर डालना है क्योंकि आत्मा की मुक्ति मानव-जीवन के अतिरिक्त अन्य किसी जीवन में नहीं हो सकती और मुक्ति का प्रयास तभी सफल हो सकते है जब वह उसके सहायक पूर्व प्रयासों को पूरा करता है। अस्तु जीवन के चरम लक्ष्य मुक्ति पाने के लिए उसकी साधना के अतिरिक्त सारे कर्त्तव्य-क्रम को इसी जीवन के सीमित वक्त में ही पूरा करना होगा।
🔵 इतने विशाल कर्त्तव्य-क्रम को मनुष्य पूरा तब ही कर सकता है जब वह जीवन के एक-एक क्षण, एक-एक पल और एक-एक विशेष को सावधानी के साथ उपयोगी एवं उपयुक्त दिशा में प्रयुक्त करे। नहीं तो किसने देखा है कि उसके जीवन का अन्तिम छोर कितनी दूरी पर ठहरा हुआ है। जीवन की अवधि सीमित होने के साथ अनिश्चित एवं अज्ञात भी है। जो क्षण हमारे पास है, हृदय के जिस स्पन्दन में गति है, वही हमारा है। श्वास का एक आगमन ही हमारा है बाकी सब पराये हैं, न जाने दूसरे क्षण हमारे बन पायेंगे या नहीं। अतएव हर बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिये कि जो क्षण, जो श्वास उसके अधिकार में है उसे भगवान की महती कृपा और जीवन का उच्चतम अन्तिम अवसर समझकर इस सावधानी एवं संलग्नता से उपयोग करे कि मानों इसी एक क्षण में सब कुछ दक्षता है। अपने वर्तमान क्षण को छोड़कर भविष्य की युगीन अवधि पर विश्वास करना विवेक का बहुत बड़ा अपमान है। जिस भविष्य पर आप अपने जीवन विकास के कार्यों, अपने विकास कर्त्तव्यों को स्थगित करने की सोच रहे हैं वह आ ही जायेगा, यह जीवन निश्चित अनिश्चितता के बीच निश्चय पूर्वक नहीं कहा जा सकता।
🔴 कर्त्तव्यों के विषय में आने वाले कल की कल्पना एक अन्ध-विश्वास है। उसकी प्रतीक्षा करने वाले नासमझ इस दुनिया में पश्चाताप करते हुए ही विदा होते हैं। आने वाला कल ऐसा आकाश कुसुम है जो सुना तो गया पर पाया कभी नहीं गया। किन्तु दुर्भाग्य है कि हर स्थगनशील व्यक्ति सदा ही उसी कल पर विश्वास किये हुए उपस्थित वर्तमान में सोता रहता है और जब उसका प्रतीक्षित कल कभी नहीं आता तब उसके पास उस बीते हुये कल के लिये रोने-पछताने के सिवाय कुछ नहीं रह जाता जिसको कि उसने वर्तमान में अवहेलना की थी, और जो कि किसी भी मूल्य पर वापस नहीं लाया जा सकता।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
बुधवार, 3 मई 2017
👉 प्रभु इच्छा सर्वोपरि
🔵 घटना १४ जुलाई १९८९ की है। विनोदानंदजी की शादी शांतिकुंज के यज्ञशाला प्रांगण में होना निश्चित हुई। श्रद्धेय आचार्यगण द्वारा विवाह संस्कार के वेदमंत्रों के छन्दबद्ध उच्चारण और उनकी सारगर्भित व्याख्याएँ श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर रही थीं। शांतिपाठ- विसर्जन के उपरांत वर- वधू को वंदनीया माताजी एवं परम पूज्य गुरुदेव के आशीर्वचनों के लिये उनके कक्ष में जाना था। तब पूज्य गुरुदेव के कक्ष में उनसे मिलने हेतु आवश्यक अनुमति लेनी पड़ती थी। परिजन दूर झरोखे से ही गुरुवर के दर्शन कर लिया करते थे। वर- वधू के आर्शीवचन हेतु गुरुवर के कक्ष में जाने की अनुमति तो मिली, लेकिन फोटो लेने की नहीं अनुमति मिली। अब हमारे मन में मचलती सी भावना थी कि शादी के इतने फोटो खींचे गए पर हमारे परम आराध्य के सान्निध्य के बिना तो वर- वधू के सारे फोटो अधूरे ही माने जाएँगे।
🔴 अब गुरुदेव के आशीर्वाद वाले पल के फोटो कैसे लिये जाएँ? यह प्रश्र हम सब के मन में बार- बार कौंधने लगा- बुद्धि उपाय ढूँढ़ने लगी। हृदय कचोटने लगा कि गुरुदेव के फोटो नहीं लेंगे तो सब चौपट। तुरंत मेरे पति (विजय कुमार शर्मा) के मन में एक उपाय सूझा कि अगर श्रद्धेय शिव प्रसाद मिश्रा जी के द्वारा फोटो लेने की अनुमति स्वीकार करवा ली जाय तो यह संभव हो सकता है। मैं और मेरे पतिदेव गुरुवर के फोटो लेने की अभिलाषा को पूर्ण करना चाहते थे। लेकिन मिश्रा जी ने स्पष्ट कहा कि गुरुदेव की अनुमति के बिना फोटो लेना संभव नहीं है। उन्होंने भी फोटो लेने से मना कर दिया।
🔵 निराश होकर हम सब वंदनीया माताजी के कमरे की ओर वर- वधू के साथ बढ़े। नीचे के कमरे में वंदनीया माताजी से आशीर्वाद लेकर ऊपर के कमरे में गुरुदेव के आशीष हेतु जाना था। मेरे पति भी कैमरा लेकर वर- वधू के साथ गुरुवर के पास पहुँच गए। गुरुदेव ने बड़े प्यार से भावभरे आशीष वचन कहे। तभी मेरे पति ने कैमरे से दो फोटो फटाफट खींच लिए। गुरुदेव एक भेदक दृष्टि डालकर मुस्कुराए भी। हम सब बड़े प्रसन्न थे कि गुरुदेव की यादगार हमारे साथ होगी। हम सब खुशी- खुशी घर लौटे।
🔴 अपने घर जमालपुर (मुंगेर) पहुँचकर जब मेरे पति ने कैमरे की रील साफ कराई तो वे स्तब्ध रह गए। मैं भी देखकर हैरान थी कि वंदनीया माताजी के फोटो तो कैमरे में स्पष्ट आए थे, पर गुरुदेव के लिये गए दोनों चित्र बिल्कुल सादे आए थे। तब मैं गुरुदेव की उस भेदक दृष्टि और मुस्कुराहट का अर्थ समझी। वस्तुतः जाग्रत चेतना के प्रज्ञा- पुरुष की इच्छा से भौतिक (कैमरा) भी नियंत्रित हुआ। उनकी आज्ञा की अवहेलना कर कैमरा भी फोटो नहीं ले पाया। सच ही कहा गया है- संसार में प्रभु की इच्छा ही सर्वोपरि है। परमात्मा की इच्छा ही विजयी होती है। तब ये भौतिक यंत्र और संसार उनकी इच्छा को कैसे टाल सकते हैं।
🌹 आशा देवी शर्मा जमालपुर, मुंगेर (बिहार)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/won/prabhu
🔴 अब गुरुदेव के आशीर्वाद वाले पल के फोटो कैसे लिये जाएँ? यह प्रश्र हम सब के मन में बार- बार कौंधने लगा- बुद्धि उपाय ढूँढ़ने लगी। हृदय कचोटने लगा कि गुरुदेव के फोटो नहीं लेंगे तो सब चौपट। तुरंत मेरे पति (विजय कुमार शर्मा) के मन में एक उपाय सूझा कि अगर श्रद्धेय शिव प्रसाद मिश्रा जी के द्वारा फोटो लेने की अनुमति स्वीकार करवा ली जाय तो यह संभव हो सकता है। मैं और मेरे पतिदेव गुरुवर के फोटो लेने की अभिलाषा को पूर्ण करना चाहते थे। लेकिन मिश्रा जी ने स्पष्ट कहा कि गुरुदेव की अनुमति के बिना फोटो लेना संभव नहीं है। उन्होंने भी फोटो लेने से मना कर दिया।
🔵 निराश होकर हम सब वंदनीया माताजी के कमरे की ओर वर- वधू के साथ बढ़े। नीचे के कमरे में वंदनीया माताजी से आशीर्वाद लेकर ऊपर के कमरे में गुरुदेव के आशीष हेतु जाना था। मेरे पति भी कैमरा लेकर वर- वधू के साथ गुरुवर के पास पहुँच गए। गुरुदेव ने बड़े प्यार से भावभरे आशीष वचन कहे। तभी मेरे पति ने कैमरे से दो फोटो फटाफट खींच लिए। गुरुदेव एक भेदक दृष्टि डालकर मुस्कुराए भी। हम सब बड़े प्रसन्न थे कि गुरुदेव की यादगार हमारे साथ होगी। हम सब खुशी- खुशी घर लौटे।
🔴 अपने घर जमालपुर (मुंगेर) पहुँचकर जब मेरे पति ने कैमरे की रील साफ कराई तो वे स्तब्ध रह गए। मैं भी देखकर हैरान थी कि वंदनीया माताजी के फोटो तो कैमरे में स्पष्ट आए थे, पर गुरुदेव के लिये गए दोनों चित्र बिल्कुल सादे आए थे। तब मैं गुरुदेव की उस भेदक दृष्टि और मुस्कुराहट का अर्थ समझी। वस्तुतः जाग्रत चेतना के प्रज्ञा- पुरुष की इच्छा से भौतिक (कैमरा) भी नियंत्रित हुआ। उनकी आज्ञा की अवहेलना कर कैमरा भी फोटो नहीं ले पाया। सच ही कहा गया है- संसार में प्रभु की इच्छा ही सर्वोपरि है। परमात्मा की इच्छा ही विजयी होती है। तब ये भौतिक यंत्र और संसार उनकी इच्छा को कैसे टाल सकते हैं।
🌹 आशा देवी शर्मा जमालपुर, मुंगेर (बिहार)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/won/prabhu
👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 92)
🌹 जीवन साधना जो कभी असफल नहीं जाती
🔴 लोक साधना का महत्त्व तब घटता है, जब उसके बदले नामवरी लूटने की ललक होती है। यह तो अखबारों में इश्तहार छपा कर विज्ञापन बाजी करने जैसा व्यवसाय है। एहसान जताने और बदला चाहने से भी पुण्यफल नष्ट होता है। दोस्तों के दबाव से किसी भी काम के लिए चंदा दे बैठने से भी दान की भावना पूर्ण नहीं होती। देखा यह जाना चाहिए कि इस प्रयास के फलस्वरूप सद्भावनाओं का सम्वर्धन होता है या नहीं, सत्प्रवृत्तियों को आगे बढ़ाने में जो कार्य सहायक हों उन्हीं की सार्थकता है। अन्यथा मुफ्तखोरी बढ़ाने और छल प्रपंच से भोले-भाले लोगों को लूटते खाते रहने के लिए इन दिनों अगणित आडम्बर चल पड़े हैं।
🔵 उनमें धन या सम्मान देने से पूर्व हजार बार यह विचार करना चाहिए कि अपने प्रयत्नों की अंतिम परिणति क्या होगी? इस दूरदर्शी विवेकशीलता का अपनाया जाना इन दिनों विशेष रूप से आवश्यक है। हमने ऐसे प्रसंगों में स्पष्ट इनकारी भी व्यक्त की है। औचित्य-सनी उदारता के साथ-साथ अनौचित्य की गंध पाने पर अनुदारता अपनाने और नाराजी का खतरा लेने का साहस किया है। आराधना में इन तथ्यों का समावेश भी नितांत आवश्यक है।
🔴 उपरोक्त तीनों प्रसंगों में हमारे जीवन दर्शन की एक झलक मिलती है। यह वह मार्ग है, जिस पर सभी महामानव चले एवं लक्ष्य प्राप्ति में सफल हो यश के भागी बने हैं। किसी प्रकार के ‘‘शार्ट कट’’ का इसमें कोई स्थान नहीं है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/jivan.5
🔴 लोक साधना का महत्त्व तब घटता है, जब उसके बदले नामवरी लूटने की ललक होती है। यह तो अखबारों में इश्तहार छपा कर विज्ञापन बाजी करने जैसा व्यवसाय है। एहसान जताने और बदला चाहने से भी पुण्यफल नष्ट होता है। दोस्तों के दबाव से किसी भी काम के लिए चंदा दे बैठने से भी दान की भावना पूर्ण नहीं होती। देखा यह जाना चाहिए कि इस प्रयास के फलस्वरूप सद्भावनाओं का सम्वर्धन होता है या नहीं, सत्प्रवृत्तियों को आगे बढ़ाने में जो कार्य सहायक हों उन्हीं की सार्थकता है। अन्यथा मुफ्तखोरी बढ़ाने और छल प्रपंच से भोले-भाले लोगों को लूटते खाते रहने के लिए इन दिनों अगणित आडम्बर चल पड़े हैं।
🔵 उनमें धन या सम्मान देने से पूर्व हजार बार यह विचार करना चाहिए कि अपने प्रयत्नों की अंतिम परिणति क्या होगी? इस दूरदर्शी विवेकशीलता का अपनाया जाना इन दिनों विशेष रूप से आवश्यक है। हमने ऐसे प्रसंगों में स्पष्ट इनकारी भी व्यक्त की है। औचित्य-सनी उदारता के साथ-साथ अनौचित्य की गंध पाने पर अनुदारता अपनाने और नाराजी का खतरा लेने का साहस किया है। आराधना में इन तथ्यों का समावेश भी नितांत आवश्यक है।
🔴 उपरोक्त तीनों प्रसंगों में हमारे जीवन दर्शन की एक झलक मिलती है। यह वह मार्ग है, जिस पर सभी महामानव चले एवं लक्ष्य प्राप्ति में सफल हो यश के भागी बने हैं। किसी प्रकार के ‘‘शार्ट कट’’ का इसमें कोई स्थान नहीं है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/jivan.5
👉 पूर्ण शांति की प्राप्ति
🔴 जिस क्षण हम भगवान के साथ अपनी एकता का अनुभव करना प्रारंभ कर देते हैं, उसी क्षण हमारे हृदय में शांति का स्रोत बहने लगता है। अपने को सदा सुंदर, स्वस्थ, पवित्र एवं आध्यात्मिक विचारों से ओतप्रोत रखना, वस्तुत: जीवन और शांति की प्राप्ति का मार्ग है। इस सत्य को सदा अपने हृदयपट पर अंकित करना कि ``मैं आत्मा हूँ, भगवान का अंश हूँ’’ और हमेशा ही इसी विचारधारा में रहना, शांति का मूल तत्त्व है। कितना करुणाजनक और आश्चर्यप्रद दृश्य है कि संसार में हमें हजारों व्यक्ति चिंतित, दु:खी, शांति की प्राप्ति के लिए इधर-उधर भटकते हुए तथा विदेशों की खाक छानते हुए नजर आते हैं, परंतु उन्हें शांति के दर्शन नहीं होते।
🔵 इसमें तिल मात्र भी संदेह नहीं कि इस प्रकार वे कदापि शांति नहीं प्राप्त कर सकते, चाहे वर्षों तक वे प्रयत्न करते रहें, क्योंकि वे शांति को वहाँ खोज रहे हैं जहाँ कि उसका सर्वथा अभाव है। वे भोले मनुष्य बाह्य पदार्थों की ओर तृष्णा भरी निगाहों से देख रहे हैं, जबकि शांति का स्रोत उनके अपने अंदर बह रहा है। कस्तूरी मृग की नाभि में विद्यमान है, परंतु मृग अज्ञानतावश उसे खोजता फिरता है। जीवन में सच्ची शांति अपने अंदर झाँकने से ही मिल सकती है।
🔴 पूर्ण शांति की प्राप्ति के लिए आवश्यकता है, अपने मन पर नियंत्रण की। हमें मन और इंद्रियों का दास नहीं अपितु उनका स्वामी बनना चाहिए।
🌹 ~अखण्ड ज्योति-मार्च 1947 पृष्ठ 2
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1947/March/v1.2
🔵 इसमें तिल मात्र भी संदेह नहीं कि इस प्रकार वे कदापि शांति नहीं प्राप्त कर सकते, चाहे वर्षों तक वे प्रयत्न करते रहें, क्योंकि वे शांति को वहाँ खोज रहे हैं जहाँ कि उसका सर्वथा अभाव है। वे भोले मनुष्य बाह्य पदार्थों की ओर तृष्णा भरी निगाहों से देख रहे हैं, जबकि शांति का स्रोत उनके अपने अंदर बह रहा है। कस्तूरी मृग की नाभि में विद्यमान है, परंतु मृग अज्ञानतावश उसे खोजता फिरता है। जीवन में सच्ची शांति अपने अंदर झाँकने से ही मिल सकती है।
🔴 पूर्ण शांति की प्राप्ति के लिए आवश्यकता है, अपने मन पर नियंत्रण की। हमें मन और इंद्रियों का दास नहीं अपितु उनका स्वामी बनना चाहिए।
🌹 ~अखण्ड ज्योति-मार्च 1947 पृष्ठ 2
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1947/March/v1.2
👉 MANAN (Part 3)
(motivating the self-being for present & future period) & its Significance.
🔴 They are also your part, aren’t they? Make up them also. What to make up in them? Only one thing is to be made up in them. Make up in them generousness, good habits, ideals and a tendency to maintain their characters? It hardly matters whether they become rich or not. There are people who have live a magnificent life despite the fact that they were poor ones whereas there are also such rich people who have created only disputes leading to their and others’ deaths. That is why I do not talk about & emphasis on ensuring prosperity. By ‘INCULCATION’ I mean is merit, action and temperament. You please do all that you can do to change these specifications, habits, traits in order to maintain the dignity of a man.
🔵 The five basic principles of family-conduct include laboriousness, orderliness, thriftiness and co-operation. You must inculcate these specifications in your life and motivate your family members to do the same. This is a very tremendous way of building a personality, character and thinking-style. You must configure how you can implement that when you are exercising stages of CHINTAN & MANAN.
🌹 to be continue...
🌹 ~Pt Shriram Sharma Aachrya
🔴 They are also your part, aren’t they? Make up them also. What to make up in them? Only one thing is to be made up in them. Make up in them generousness, good habits, ideals and a tendency to maintain their characters? It hardly matters whether they become rich or not. There are people who have live a magnificent life despite the fact that they were poor ones whereas there are also such rich people who have created only disputes leading to their and others’ deaths. That is why I do not talk about & emphasis on ensuring prosperity. By ‘INCULCATION’ I mean is merit, action and temperament. You please do all that you can do to change these specifications, habits, traits in order to maintain the dignity of a man.
🔵 The five basic principles of family-conduct include laboriousness, orderliness, thriftiness and co-operation. You must inculcate these specifications in your life and motivate your family members to do the same. This is a very tremendous way of building a personality, character and thinking-style. You must configure how you can implement that when you are exercising stages of CHINTAN & MANAN.
🌹 to be continue...
🌹 ~Pt Shriram Sharma Aachrya
👉 शंकर मिश्र की माँ की प्रतिज्ञा
🔵 दरभंगा में एक तालाब है। उसे 'दाई का तालाब' कहते है। तालाब के निर्माण का इतिहास सज्जनता और ईमानदारी, कर्तव्यपरायणता और नैतिकता का जीता-जागता आदर्श है। उसे पढ़कर जीवन के निष्काम प्रेम की अनुभूति का आनंद मिलता है।
🔴 शंकर मिश्र जन्मे तब इनकी माता जी के स्तनों में दूध नहीं आता था। बच्चे को प्रारंभ से ही ऊपर का दूध दिया नही जा सकता था, इसलिए उसे किसका दूध दिया जाए? यह एक संकट आ गया।
🔵 एक धाय रखनी पड़ी। इस धाय ने शंकर को अपना बच्चा समझकर दूध पिलाया। मातृत्च का जो भी लाड़ और स्नेह एक माँ अपने बच्चे को दे सकती है, धाय ने वही स्नेह और ममता बच्चे को पिलाई। आज के युग में जब भाई-भाई एक-दूसरे को स्वार्थ और कपट की दृष्टि सें देखते हैं, तब एक साधारण स्त्री का यह भावनात्मक अनुदान स्वर्गीय ही कहा जा सकता है। संसार के सब मनुष्य जीवन के कठोर कर्तव्यों का पालन करते हुए भी यदि इस सुरह प्रेम कर्तव्यशीलता का व्यवहार कर सकें तो संसार स्वर्ग बन जाए।
🔴 शंकर मिश्र बढ़ने लगे। धाय उनकी सब प्रकार सेवा सुश्रूषा करती, नीति और सदाचार की बातें भी सिखाती। सामान्य कर्तव्य पालन में कभी ऐसा समझ में नहीं आया, जब बाहर से देखने वालों को यह पता चला हो कि यह असली माँ नही है। धाय के इस आत्म-भाव से शंकर की माँ बहुत प्रभावित हुई। एक दिन उन्होंने धाय की सराहना करते हुए वचन दिया तुमने मेरे बच्चे के अपने बच्चे जैसा पाला है, जब वह बडा हो जायेगा तो इसकी पहली कमाई पर तुम्हारा अधिकार होगा।'' कुछ दिन यह बात आई गई हो गई।
🔵 शंकर मिश्र बाल्यावस्था से ही संस्कृत के प्रकाड विद्वान् दिखाई देने लगे। बाद में तो उनकी प्रतिभा ऐसी चमकी कि उनका यश चारों ओर फैलता गया। उनकी एक काव्य-रचना पर तल्ललीन दरभंगा नरेश बहुत ही प्रभावित हुए। उन्होंने दरबार में बुलाकर उनका बडा सम्मान किया और उपहार स्वरूप एक हार भेंट किया। इसे लेकर शंकर घर आए और हार अपनी माँ को सौंप दिया।
🔴 हार बहुत कीमती था उसे देखकर किसी के भी मन में लोभ और लालच आ सकता था, पर यह सब सामान्य मनुष्यों के आकर्षण की बातें है। उदार हृदय व्यक्ति, कर्तव्यपरायण और आदर्शों को ही जीवन मानने वाले सज्जनों के लिए रुपये पैसे का क्या महत्व, मानवता जैसी वस्तु खोकर धन, संपत्ति, पद, यश प्रतिष्ठा कुछ भी मिले निरर्थक है, उससे आत्मा का कभी भला नही होता।
🔵 शंकर मिश्र की माता ने धाय को बुलाया और अपनी प्रतिज्ञा की याद दिलाते हुए हार उसे दे दिया। धाय हार लेकर घर आई। उसे शक हुआ हार बहुत कीमती है, तो उसकी कीमत जंचवाई। जौहरियों से पता चला कि उसकी कीमत लाखों रुपयों की है। लौटकर धाय ने कहा- माँ जी मुझे तो सौ-दो सौ की भेंट ही उपयुक्त थी। इस कीमती हार को लेकर मैं क्या करूँगी ? कहकर हार लौटाने लगी।
🔴 पर शंकर की माँ ने भी दृढता से कहा- जो भी हो एक बार दे देने के बाद चाहे वह करोड़ की संपत्ति हो मेरे लिए उसका क्या महत्व ? हार तुम्हारा हो गया-जाओ। उन्होंने किसी भी मूल्य पर हार स्वीकार न किया।
🔵 विवश धाय उसे ले तो गई पर उसने कहा- जो मेरे परिश्रम की कमाई नहीं उसका उपयोग करूँ तो वह पाप होगा। अतएव उसने उसे बेचकर एक पक्का तालाब बनवा दिया।
🔴 यही तालाब 'धाय का तालाब' के नाम से शंकर की माँ के वचन और धाय की उत्कृष्ट नैतिकता के रूप में आज भी लोगों को प्रेरणा देता है।
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 146, 147
🔴 शंकर मिश्र जन्मे तब इनकी माता जी के स्तनों में दूध नहीं आता था। बच्चे को प्रारंभ से ही ऊपर का दूध दिया नही जा सकता था, इसलिए उसे किसका दूध दिया जाए? यह एक संकट आ गया।
🔵 एक धाय रखनी पड़ी। इस धाय ने शंकर को अपना बच्चा समझकर दूध पिलाया। मातृत्च का जो भी लाड़ और स्नेह एक माँ अपने बच्चे को दे सकती है, धाय ने वही स्नेह और ममता बच्चे को पिलाई। आज के युग में जब भाई-भाई एक-दूसरे को स्वार्थ और कपट की दृष्टि सें देखते हैं, तब एक साधारण स्त्री का यह भावनात्मक अनुदान स्वर्गीय ही कहा जा सकता है। संसार के सब मनुष्य जीवन के कठोर कर्तव्यों का पालन करते हुए भी यदि इस सुरह प्रेम कर्तव्यशीलता का व्यवहार कर सकें तो संसार स्वर्ग बन जाए।
🔴 शंकर मिश्र बढ़ने लगे। धाय उनकी सब प्रकार सेवा सुश्रूषा करती, नीति और सदाचार की बातें भी सिखाती। सामान्य कर्तव्य पालन में कभी ऐसा समझ में नहीं आया, जब बाहर से देखने वालों को यह पता चला हो कि यह असली माँ नही है। धाय के इस आत्म-भाव से शंकर की माँ बहुत प्रभावित हुई। एक दिन उन्होंने धाय की सराहना करते हुए वचन दिया तुमने मेरे बच्चे के अपने बच्चे जैसा पाला है, जब वह बडा हो जायेगा तो इसकी पहली कमाई पर तुम्हारा अधिकार होगा।'' कुछ दिन यह बात आई गई हो गई।
🔵 शंकर मिश्र बाल्यावस्था से ही संस्कृत के प्रकाड विद्वान् दिखाई देने लगे। बाद में तो उनकी प्रतिभा ऐसी चमकी कि उनका यश चारों ओर फैलता गया। उनकी एक काव्य-रचना पर तल्ललीन दरभंगा नरेश बहुत ही प्रभावित हुए। उन्होंने दरबार में बुलाकर उनका बडा सम्मान किया और उपहार स्वरूप एक हार भेंट किया। इसे लेकर शंकर घर आए और हार अपनी माँ को सौंप दिया।
🔴 हार बहुत कीमती था उसे देखकर किसी के भी मन में लोभ और लालच आ सकता था, पर यह सब सामान्य मनुष्यों के आकर्षण की बातें है। उदार हृदय व्यक्ति, कर्तव्यपरायण और आदर्शों को ही जीवन मानने वाले सज्जनों के लिए रुपये पैसे का क्या महत्व, मानवता जैसी वस्तु खोकर धन, संपत्ति, पद, यश प्रतिष्ठा कुछ भी मिले निरर्थक है, उससे आत्मा का कभी भला नही होता।
🔵 शंकर मिश्र की माता ने धाय को बुलाया और अपनी प्रतिज्ञा की याद दिलाते हुए हार उसे दे दिया। धाय हार लेकर घर आई। उसे शक हुआ हार बहुत कीमती है, तो उसकी कीमत जंचवाई। जौहरियों से पता चला कि उसकी कीमत लाखों रुपयों की है। लौटकर धाय ने कहा- माँ जी मुझे तो सौ-दो सौ की भेंट ही उपयुक्त थी। इस कीमती हार को लेकर मैं क्या करूँगी ? कहकर हार लौटाने लगी।
🔴 पर शंकर की माँ ने भी दृढता से कहा- जो भी हो एक बार दे देने के बाद चाहे वह करोड़ की संपत्ति हो मेरे लिए उसका क्या महत्व ? हार तुम्हारा हो गया-जाओ। उन्होंने किसी भी मूल्य पर हार स्वीकार न किया।
🔵 विवश धाय उसे ले तो गई पर उसने कहा- जो मेरे परिश्रम की कमाई नहीं उसका उपयोग करूँ तो वह पाप होगा। अतएव उसने उसे बेचकर एक पक्का तालाब बनवा दिया।
🔴 यही तालाब 'धाय का तालाब' के नाम से शंकर की माँ के वचन और धाय की उत्कृष्ट नैतिकता के रूप में आज भी लोगों को प्रेरणा देता है।
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 146, 147
👉 सद्गुरु के स्वर
🔵 अन्तःकरण के मौन में गुरुदेव की परावाणी गूँजती है- अहो! मैं सदैव तुम्हारे साथ हूँ। तुम चाहे जहाँ जाओ, वहाँ मैं उपस्थित हूँ ही। मैं तुम्हारे लिए ही जीता हूँ। अपनी अनुभूति के फल मैं तुम्हें देता हूँ। तुम मेरे हृदय-धन हो। मेरी आँखों के तारे हो। प्रभु में हम एक हैं। मैं सदा-सर्वदा तुमसे एकता की अनुभूति करता हूँ। तुम्हें कठिन संघर्षों की धधकती-च्वालाओं में झोंक देने में मुझे भय नहीं होता, यह इसलिए क्योंकि मैं तुम्हारी शक्ति की मात्रा को जानता हूँ। मैं तुम्हें अनुभवों के बाद अनुभवों में भेजता हूँ, किन्तु तुम्हारे इस भ्रमण में मेरी दृष्टि सदैव तुम्हारा पीछा करती रहती है। तुम जो भी करते हो, वह सब मेरी उपस्थिति में करते हो।
🔴 मेरे विचारों में, मेरे साहित्य में मेरी इच्छाओं को ढूँढ़ो। उन शिक्षाओं का अनुसरण करो, जो मेरे गुरु ने मुझे दी थीं और जिसे मैंने तुम्हें दिया है। जो एक है, उसी का दर्शन करो, तब तुम मेरे सहस्रों शरीरों के साथ रहकर जितनी एकता का अनुभव करते, उससे कहीं अधिक एकता का अनुभव करोगे। मेरी इच्छा और विचारों के प्रति जागरूकता, स्थिरता और भक्ति में ही शिष्यत्व है, हम दोनों के बीच असीम प्रेम है। गुरु और शिष्य का सम्बन्ध वज्र से भी अधिक दृढ़ होता है। वह मृत्यु से भी अधिक सशक्त होता है।
🔵 इस सत्य को अनुभव करते हुए यह ध्यान रखो वत्स! इन्द्रियाँ सदैव आत्मा के विरुद्ध संघर्ष करती हैं। अतः सतत सावधान रहो, इन्द्रियों पर विश्वास न करो। ये सुख तथा दुःख के द्वारा विचलित होती रहती हैं। उनके ऊपर उठ जाओ। तुम आत्मा हो, मेरे अविनाशी अंश हो। शरीर का किसी भी क्षण नाश हो सकता है। सचमुच कौन उस क्षण को जानता है। इसलिए सदैव अपनी दृष्टि लक्ष्य पर स्थिर रखो, अपने मन को मेरे विचारों से परिपूर्ण कर लो। मृत्यु के क्षणों में नहीं, किन्तु जीवन के इन्हीं क्षणों में अपने मन को मुक्त और पवित्र रखो। तब यदि मृत्यु अकस्मात् तुम्हें ग्रास बना ले, तो भी तुम प्रस्तुत हो। इस प्रकार जीवन जिओ, मानो इसी क्षण तुम्हारी मृत्यु होने वाली है, तभी तुम सच्चा जीवन जी सकोगे। समय भाग रहा है। यदि तुम शाश्वत तथा अमर विचारों में डूबे रहो, तभी भागते समय को शाश्वत बना सकोगे।
🔴 हर किसी को अपने आदर्श के लिए अनेकों तरह के कष्ट सहने पड़ते हैं तुम भी सभी प्रकार की कसौटियों को सहो, विपत्तियों का सामना करो। आदर्श का जीवन जिओ तथा ईश्वर के नाम पर निर्भीक बनो। भगवान् पर सच्ची निर्भरता सभी भयों को भगा देती है। तुम मेरी सन्तान हो। जीवन में या मृत्यु में, सुख या दुःख में, भले या बुरे में जहाँ भी तुम जाओ, जहाँ भी तुम रहो, मैं तुम्हारे साथ हूँ। मैं तुम्हारी रक्षा करता हूँ। मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ, क्योंकि मैं तुमसे बँधा हूँ। ईश्वर के प्रति मेरा प्रेम तुम्हारे साथ एक कर देता है। मैं तुम्हारी आत्मा हूँ। वत्स! तुम्हारा हृदय मेरा निवास स्थान है। फिर चिन्ता किस बात की निश्चिन्त रहो, निर्भीक बनो।
🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 53
🔴 मेरे विचारों में, मेरे साहित्य में मेरी इच्छाओं को ढूँढ़ो। उन शिक्षाओं का अनुसरण करो, जो मेरे गुरु ने मुझे दी थीं और जिसे मैंने तुम्हें दिया है। जो एक है, उसी का दर्शन करो, तब तुम मेरे सहस्रों शरीरों के साथ रहकर जितनी एकता का अनुभव करते, उससे कहीं अधिक एकता का अनुभव करोगे। मेरी इच्छा और विचारों के प्रति जागरूकता, स्थिरता और भक्ति में ही शिष्यत्व है, हम दोनों के बीच असीम प्रेम है। गुरु और शिष्य का सम्बन्ध वज्र से भी अधिक दृढ़ होता है। वह मृत्यु से भी अधिक सशक्त होता है।
🔵 इस सत्य को अनुभव करते हुए यह ध्यान रखो वत्स! इन्द्रियाँ सदैव आत्मा के विरुद्ध संघर्ष करती हैं। अतः सतत सावधान रहो, इन्द्रियों पर विश्वास न करो। ये सुख तथा दुःख के द्वारा विचलित होती रहती हैं। उनके ऊपर उठ जाओ। तुम आत्मा हो, मेरे अविनाशी अंश हो। शरीर का किसी भी क्षण नाश हो सकता है। सचमुच कौन उस क्षण को जानता है। इसलिए सदैव अपनी दृष्टि लक्ष्य पर स्थिर रखो, अपने मन को मेरे विचारों से परिपूर्ण कर लो। मृत्यु के क्षणों में नहीं, किन्तु जीवन के इन्हीं क्षणों में अपने मन को मुक्त और पवित्र रखो। तब यदि मृत्यु अकस्मात् तुम्हें ग्रास बना ले, तो भी तुम प्रस्तुत हो। इस प्रकार जीवन जिओ, मानो इसी क्षण तुम्हारी मृत्यु होने वाली है, तभी तुम सच्चा जीवन जी सकोगे। समय भाग रहा है। यदि तुम शाश्वत तथा अमर विचारों में डूबे रहो, तभी भागते समय को शाश्वत बना सकोगे।
🔴 हर किसी को अपने आदर्श के लिए अनेकों तरह के कष्ट सहने पड़ते हैं तुम भी सभी प्रकार की कसौटियों को सहो, विपत्तियों का सामना करो। आदर्श का जीवन जिओ तथा ईश्वर के नाम पर निर्भीक बनो। भगवान् पर सच्ची निर्भरता सभी भयों को भगा देती है। तुम मेरी सन्तान हो। जीवन में या मृत्यु में, सुख या दुःख में, भले या बुरे में जहाँ भी तुम जाओ, जहाँ भी तुम रहो, मैं तुम्हारे साथ हूँ। मैं तुम्हारी रक्षा करता हूँ। मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ, क्योंकि मैं तुमसे बँधा हूँ। ईश्वर के प्रति मेरा प्रेम तुम्हारे साथ एक कर देता है। मैं तुम्हारी आत्मा हूँ। वत्स! तुम्हारा हृदय मेरा निवास स्थान है। फिर चिन्ता किस बात की निश्चिन्त रहो, निर्भीक बनो।
🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 53
👉 समय का सदुपयोग करें (भाग 20)
🌹 समय के सदुपयोग का महत्व समझिए
🔴 जीवन का हर क्षण एक उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना लेकर आता है। हर घड़ी एक महान् मोड़ का समय हो सकती है। मनुष्य यह निश्चयपूर्वक नहीं कह सकता कि जिस वक्त, जिस क्षण और जिस पल को यों ही व्यर्थ में खो रहा है वह ही क्षण—वह ही वक्त-क्या उसके भाग्योदय का वक्त नहीं है? क्या पता जिस क्षण को हम व्यर्थ समझकर बरबाद कर रहे हैं वह ही हमारे लिये अपनी झोली में सुन्दर सौभाग्य की सफलता लाया हो।
🔵 सबके जीवन में एक परिवर्तनकारी वक्त आया करता है। किन्तु मनुष्य उसके आगमन से अनभिज्ञ रहा करता है। इसलिये हर बुद्धिमान मनुष्य हर क्षण को, बहूमूल्य समझकर व्यर्थ नहीं जाने देता। कोई भी क्षण व्यर्थ न जाने देने से निश्चय ही वह क्षण हाथ से छूटकर नहीं जा सकता जो जीवन में वांछित परिवर्तन का संदेशवाहक होगा। सिद्धि की अनिश्चित घड़ी से अनभिज्ञ साधक जिस प्रकार हर समय लौ लगाये रहने से उसको पकड़ लेता है ठीक उसी प्रकार हर क्षण को सौभाग्य के द्वार खोल देने वाला समझकर महत्त्वाकांक्षी कर्मवीर जीवन के एक छोटे से भी क्षण की उपेक्षा नहीं करता और निश्चय ही सौभाग्य का अधिकारी बनता है।
🔴 कोई भी दीर्घसूत्री व्यक्ति संसार में आज तक सफल होते देखा, सुना नहीं गया है। जीवन में उन्नति करने और सफलता पाने वाले व्यक्तियों की जीवनगाथा का निरीक्षण करने पर निश्चय ही उनके उन गुणों में समय के पालन एवं सदुपयोग को प्रमुख स्थान मिलेगा जो जीवन की उन्नति के लिए अपेक्षित होते हैं।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔴 जीवन का हर क्षण एक उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना लेकर आता है। हर घड़ी एक महान् मोड़ का समय हो सकती है। मनुष्य यह निश्चयपूर्वक नहीं कह सकता कि जिस वक्त, जिस क्षण और जिस पल को यों ही व्यर्थ में खो रहा है वह ही क्षण—वह ही वक्त-क्या उसके भाग्योदय का वक्त नहीं है? क्या पता जिस क्षण को हम व्यर्थ समझकर बरबाद कर रहे हैं वह ही हमारे लिये अपनी झोली में सुन्दर सौभाग्य की सफलता लाया हो।
🔵 सबके जीवन में एक परिवर्तनकारी वक्त आया करता है। किन्तु मनुष्य उसके आगमन से अनभिज्ञ रहा करता है। इसलिये हर बुद्धिमान मनुष्य हर क्षण को, बहूमूल्य समझकर व्यर्थ नहीं जाने देता। कोई भी क्षण व्यर्थ न जाने देने से निश्चय ही वह क्षण हाथ से छूटकर नहीं जा सकता जो जीवन में वांछित परिवर्तन का संदेशवाहक होगा। सिद्धि की अनिश्चित घड़ी से अनभिज्ञ साधक जिस प्रकार हर समय लौ लगाये रहने से उसको पकड़ लेता है ठीक उसी प्रकार हर क्षण को सौभाग्य के द्वार खोल देने वाला समझकर महत्त्वाकांक्षी कर्मवीर जीवन के एक छोटे से भी क्षण की उपेक्षा नहीं करता और निश्चय ही सौभाग्य का अधिकारी बनता है।
🔴 कोई भी दीर्घसूत्री व्यक्ति संसार में आज तक सफल होते देखा, सुना नहीं गया है। जीवन में उन्नति करने और सफलता पाने वाले व्यक्तियों की जीवनगाथा का निरीक्षण करने पर निश्चय ही उनके उन गुणों में समय के पालन एवं सदुपयोग को प्रमुख स्थान मिलेगा जो जीवन की उन्नति के लिए अपेक्षित होते हैं।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
मंगलवार, 2 मई 2017
👉 ऋषियुग्म से मिला अभयदान
🔵 मेरा जन्म स्थान झारखण्ड प्रांत के पूर्वी सिंहभूम जिले के ग्राम चाकुलिया में है। रोजी- रोटी के सिलसिले में मैं अपने बच्चों के साथ कटक (उड़ीसा) में बस गया। मुझे अपने चाचा श्री कैलाश चन्द्र जी, जो युग निर्माण मिशन के समर्पित कार्यकर्ता हैं, की प्रेरणा से पू.गुरुदेव से जुड़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
🔴 वर्ष २०११ के जनवरी- फरवरी के महीने में मेरे दाहिने पैर में अचानक असह्य वेदना शुरू हो गयी। इधर- उधर बहुत सारे चिकित्सकों से इलाज कराने के क्रम में चिकित्सकों द्वारा शल्य चिकित्सा की सलाह दी गयी, जिसका खर्च लगभग तीन लाख था। यह मेरे लिए दुष्कर ही नहीं, असंभव था। आशा की एकमात्र किरण पू.गुरुदेव ही थे।
🔵 मैं जहाँ काम करता था वहाँ के लोगों से बात की। उन्होंने सुझाव दिया कि ई.एस.आई. को लिखने पर आपकी समस्या का समाधान हो सकता है। ई.एस.आई. को पत्र लिखा गया और गुरुदेव की कृपा से मेरे ऑपरेशन के लिए आदित्य केयर हॉस्पिटल में व्यवस्था हो गयी। दिनांक १३ जुलाई को ऑपरेशन की तारीख रखी गयी। मुझे ऑपरेशन के नाम से ही डर लगता था। हमारे घर के सभी लोग बहुत घबड़ाये हुए थे। मैं भी ऑपरेशन के नाम से बहुत भयभीत था।
🔴 ऑपरेशन के एक दिन पहले घर के सभी परिजन बहुत परेशान थे। क्या होगा? कैसे होगा? मेरे चाचाजी ने रात्रि ८ बजे शांतिकुंज में आदरणीय विनय बाजपेयी जी भाई साहब से फोन पर मेरे ऑपरेशन की बात बताई और आध्यात्मिक उपचार हेतु प्रार्थना की। भाई साहब ने तुरन्त आश्वासन दिया कि जैसा आप चाहते है मैं व्यवस्था कर रहा हूँ। आप परेशान न हों, हम गुरुसत्ता से प्रार्थना करेंगे। उनके आश्वासन पर हम सभी को बहुत राहत मिली। लग रहा था, सचमुच गुरुदेव का ही संरक्षण मिल रहा है, अब कुछ अनिष्ट नहीं होगा। १३ जुलाई को मुझे एडमिट कर लिया गया। एडमिट होते ही डॉक्टर ने कहा कि पेशेन्ट के ग्रुप का २ बोतल खून चाहिए। मेरे जामाता एवं मेरे एक मित्र के खून का ग्रुप मुझसे मिलता था। दोनों लोगों को खून देने के लिए समय पर हॉस्पिटल पहुँचना था। लेकिन दुर्भाग्यवश मित्र महोदय समय पर नहीं पहुँचने के कारण उनके आने की राह देख रहे थे।
🔵 सभी चिन्तित थे और सभी मन ही मन गुरुदेव से प्रार्थना कर रहे थे। अचानक एक अपरिचित सज्जन हम सबके बीच आये और कहने लगे कि आप लोग परेशान न हों मैं खून दूँगा। मेरे खून का ग्रुप इनके खून से मैच करता है। इनके इतना कहते ही जिन मित्र महोदय का खून लेना था वे भी वहाँ पहुँच गये। सभी लोग उनके देर होने आदि के सम्बन्ध में बातचीत करने लगे। जब हम उस अपरिचित सज्जन को धन्यवाद देने के लिए पीछे मुड़े तो देखा, उनका कहीं कोई पता नहीं था। सभी ने पता करने की कोशिश की, मगर वे नहीं मिले। बाद में अनुभव हुआ कि हम जिस समर्थ सत्ता से जुड़े हैं वे हमारी कष्ट कठिनाइयाँ देख नहीं सकते, वे किसी न किसी रूप में सहायता कर ही देते हैं।
🔴 इस घटना से हम सभी के मन में गुरुदेव के प्रति श्रद्धा और विश्वास बढ़ गया कि अब हमें परेशान होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि जिसके ऊपर महाकाल की छत्रछाया हो उसका काल क्या बिगाड़ेगा?
🔵 ऑपरेशन की सारी व्यवस्थाएँ हो चुकी थीं। मैं और मेरे परिवार के सभी लोग केवल गुरुदेव को मन ही मन स्मरण कर रहे थे। मेरा विश्वास इतना सघन हो गया था कि ऑपरेशन थियेटर में जाते समय मेरा भय समाप्त सा हो गया था। मेरा ऑपरेशन सफलतापूर्वक सम्पन्न हो गया। मुझे दो दिन तक गहन चिकित्सा कक्ष में रखा गया। उसके पश्चात् मुझे जनरल वार्ड वी.के.सी. बेड पर स्थान दिया गया। मुझे यहाँ कुछ असुविधा हो रही थी। मैं तीन- चार दिन जनरल वार्ड में रहा। इसके पश्चात् मैंने अपनी सुविधा हेतु अपना स्थानान्तरण बेड सं. ए में करवा लिया। लेकिन यहाँ पर मेरा सोचना गलत था। यहाँ स्थान सुविधा की दृष्टि से तो अच्छा था, किन्तु यहाँ पर आने के पश्चात् मेरे साथ अजीबोगरीब घटनाएँ होने लगीं, जो असामान्य थी।
🔴 मुझे चौबीसों घण्टे बेचैनी छाई रहती। नींद बिल्कुल नहीं आती थी। मैं एक मिनट के लिए भी सो नहीं पाता था। रात्रि तो मेरे लिए काल बन कर आती थी। मैं सुबह होने का इन्तजार करता। रात्रि के आते ही मेरी परेशानी बढ़ने लगती। लगता था, कमरे के सारे परदे अपने आप हिल रहे हों। लगता कोई मेरा गला दबा रहा हो। मैं बोलने का प्रयास करता तो मेरा कण्ठ अवरुद्ध हो जाता। मैंने अपनी धर्मपत्नी से यह बात कही तो उसने कहा ऐसा कुछ नहीं है। मेरी धर्मपत्नी ऑपरेशन के समय से ही मेरे साथ थीं और मेरी देखभाल करती थीं। मैं असहाय था और मेरी परेशानी का हल किसी के पास नहीं था। पत्नी ने दिलासा दिया ताकि मैं घबरा न जाऊँ।
🔵 घबराहट की ऐसी मनोदशा में मुझे भय और निराशा के विचारों ने बुरी तरह घेर लिया। अवसादजन्य भावना से वशीभूत होकर मेरे अंदर बुरी आत्मा के चंगुल में आ जाने और अपना अंत होने का आभास होने लगा। लेकिन इस क्षण मुझे गायत्री मंत्र का आश्रय और गुरुदेव की कृपा अनन्य रूप से एक मात्र सहायक और संबल प्रतीत हुआ। पूरी व्याकुलता के साथ मैं पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीया माताजी का ध्यान करते हुए गायत्री मंत्र जपने लगा। जप करते- करते लगभग चार बजे ब्राह्ममुहूर्त में क्षणिक निद्रा में मुझे गुरुदेव- माताजी के दिव्य दर्शन हुए। मैंने देखा उनके चरण कमलों में नतमस्तक हो चरण स्पर्श कर रहा हूँ एवं वे मुझे आशीर्वाद के साथ अभयदान दे रहे हैं। मुझे अनुभव हो रहा था कि अब मेरे सारे कष्ट दूर हो गए हैं।
🔴 चेतना आने पर मैंने अपनी धर्मपत्नी से इस बात को बताया कि मुझे ऐसा स्वप्न हुआ है। आज मुझे यहाँ से छुट्टी मिल जाएगी। जबकि सच तो यह था कि उस दिन छुट्टी मिलने का प्रश्र ही नहीं था। डॉक्टर ने पहले ही कह दिया था कि २९ जुलाई से पूर्व आपको रिलीज नहीं किया जा सकता।
🔵 लेकिन मुझे गुरु के ऊपर विश्वास था कि आज मुझे अस्पताल से छुट्टी मिल जाएगी। २७ तारीख को जब डॉक्टर विजिट में आए तो मैंने उनसे रिलीज कर देने के लिए आग्रह किया। वे कुछ देर तक मौन रहे और बाद में अनुमति दे दी। मैं उसी दिन रात्रि ७ बजे रिलीज होकर अपने घर आ गया। मेरे गुरुदेव ने मुझे उस अतृप्त आत्मा से बचाकर नया जीवन दिया। अगर मैं वैसी विषम स्थिति में दो दिन और रह जाता तो मेरी मौत निश्चित थी।
🌹 पवन कुमार शर्मा कटक (उड़ीसा)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/won/mila.1
🔴 वर्ष २०११ के जनवरी- फरवरी के महीने में मेरे दाहिने पैर में अचानक असह्य वेदना शुरू हो गयी। इधर- उधर बहुत सारे चिकित्सकों से इलाज कराने के क्रम में चिकित्सकों द्वारा शल्य चिकित्सा की सलाह दी गयी, जिसका खर्च लगभग तीन लाख था। यह मेरे लिए दुष्कर ही नहीं, असंभव था। आशा की एकमात्र किरण पू.गुरुदेव ही थे।
🔵 मैं जहाँ काम करता था वहाँ के लोगों से बात की। उन्होंने सुझाव दिया कि ई.एस.आई. को लिखने पर आपकी समस्या का समाधान हो सकता है। ई.एस.आई. को पत्र लिखा गया और गुरुदेव की कृपा से मेरे ऑपरेशन के लिए आदित्य केयर हॉस्पिटल में व्यवस्था हो गयी। दिनांक १३ जुलाई को ऑपरेशन की तारीख रखी गयी। मुझे ऑपरेशन के नाम से ही डर लगता था। हमारे घर के सभी लोग बहुत घबड़ाये हुए थे। मैं भी ऑपरेशन के नाम से बहुत भयभीत था।
🔴 ऑपरेशन के एक दिन पहले घर के सभी परिजन बहुत परेशान थे। क्या होगा? कैसे होगा? मेरे चाचाजी ने रात्रि ८ बजे शांतिकुंज में आदरणीय विनय बाजपेयी जी भाई साहब से फोन पर मेरे ऑपरेशन की बात बताई और आध्यात्मिक उपचार हेतु प्रार्थना की। भाई साहब ने तुरन्त आश्वासन दिया कि जैसा आप चाहते है मैं व्यवस्था कर रहा हूँ। आप परेशान न हों, हम गुरुसत्ता से प्रार्थना करेंगे। उनके आश्वासन पर हम सभी को बहुत राहत मिली। लग रहा था, सचमुच गुरुदेव का ही संरक्षण मिल रहा है, अब कुछ अनिष्ट नहीं होगा। १३ जुलाई को मुझे एडमिट कर लिया गया। एडमिट होते ही डॉक्टर ने कहा कि पेशेन्ट के ग्रुप का २ बोतल खून चाहिए। मेरे जामाता एवं मेरे एक मित्र के खून का ग्रुप मुझसे मिलता था। दोनों लोगों को खून देने के लिए समय पर हॉस्पिटल पहुँचना था। लेकिन दुर्भाग्यवश मित्र महोदय समय पर नहीं पहुँचने के कारण उनके आने की राह देख रहे थे।
🔵 सभी चिन्तित थे और सभी मन ही मन गुरुदेव से प्रार्थना कर रहे थे। अचानक एक अपरिचित सज्जन हम सबके बीच आये और कहने लगे कि आप लोग परेशान न हों मैं खून दूँगा। मेरे खून का ग्रुप इनके खून से मैच करता है। इनके इतना कहते ही जिन मित्र महोदय का खून लेना था वे भी वहाँ पहुँच गये। सभी लोग उनके देर होने आदि के सम्बन्ध में बातचीत करने लगे। जब हम उस अपरिचित सज्जन को धन्यवाद देने के लिए पीछे मुड़े तो देखा, उनका कहीं कोई पता नहीं था। सभी ने पता करने की कोशिश की, मगर वे नहीं मिले। बाद में अनुभव हुआ कि हम जिस समर्थ सत्ता से जुड़े हैं वे हमारी कष्ट कठिनाइयाँ देख नहीं सकते, वे किसी न किसी रूप में सहायता कर ही देते हैं।
🔴 इस घटना से हम सभी के मन में गुरुदेव के प्रति श्रद्धा और विश्वास बढ़ गया कि अब हमें परेशान होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि जिसके ऊपर महाकाल की छत्रछाया हो उसका काल क्या बिगाड़ेगा?
🔵 ऑपरेशन की सारी व्यवस्थाएँ हो चुकी थीं। मैं और मेरे परिवार के सभी लोग केवल गुरुदेव को मन ही मन स्मरण कर रहे थे। मेरा विश्वास इतना सघन हो गया था कि ऑपरेशन थियेटर में जाते समय मेरा भय समाप्त सा हो गया था। मेरा ऑपरेशन सफलतापूर्वक सम्पन्न हो गया। मुझे दो दिन तक गहन चिकित्सा कक्ष में रखा गया। उसके पश्चात् मुझे जनरल वार्ड वी.के.सी. बेड पर स्थान दिया गया। मुझे यहाँ कुछ असुविधा हो रही थी। मैं तीन- चार दिन जनरल वार्ड में रहा। इसके पश्चात् मैंने अपनी सुविधा हेतु अपना स्थानान्तरण बेड सं. ए में करवा लिया। लेकिन यहाँ पर मेरा सोचना गलत था। यहाँ स्थान सुविधा की दृष्टि से तो अच्छा था, किन्तु यहाँ पर आने के पश्चात् मेरे साथ अजीबोगरीब घटनाएँ होने लगीं, जो असामान्य थी।
🔴 मुझे चौबीसों घण्टे बेचैनी छाई रहती। नींद बिल्कुल नहीं आती थी। मैं एक मिनट के लिए भी सो नहीं पाता था। रात्रि तो मेरे लिए काल बन कर आती थी। मैं सुबह होने का इन्तजार करता। रात्रि के आते ही मेरी परेशानी बढ़ने लगती। लगता था, कमरे के सारे परदे अपने आप हिल रहे हों। लगता कोई मेरा गला दबा रहा हो। मैं बोलने का प्रयास करता तो मेरा कण्ठ अवरुद्ध हो जाता। मैंने अपनी धर्मपत्नी से यह बात कही तो उसने कहा ऐसा कुछ नहीं है। मेरी धर्मपत्नी ऑपरेशन के समय से ही मेरे साथ थीं और मेरी देखभाल करती थीं। मैं असहाय था और मेरी परेशानी का हल किसी के पास नहीं था। पत्नी ने दिलासा दिया ताकि मैं घबरा न जाऊँ।
🔵 घबराहट की ऐसी मनोदशा में मुझे भय और निराशा के विचारों ने बुरी तरह घेर लिया। अवसादजन्य भावना से वशीभूत होकर मेरे अंदर बुरी आत्मा के चंगुल में आ जाने और अपना अंत होने का आभास होने लगा। लेकिन इस क्षण मुझे गायत्री मंत्र का आश्रय और गुरुदेव की कृपा अनन्य रूप से एक मात्र सहायक और संबल प्रतीत हुआ। पूरी व्याकुलता के साथ मैं पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीया माताजी का ध्यान करते हुए गायत्री मंत्र जपने लगा। जप करते- करते लगभग चार बजे ब्राह्ममुहूर्त में क्षणिक निद्रा में मुझे गुरुदेव- माताजी के दिव्य दर्शन हुए। मैंने देखा उनके चरण कमलों में नतमस्तक हो चरण स्पर्श कर रहा हूँ एवं वे मुझे आशीर्वाद के साथ अभयदान दे रहे हैं। मुझे अनुभव हो रहा था कि अब मेरे सारे कष्ट दूर हो गए हैं।
🔴 चेतना आने पर मैंने अपनी धर्मपत्नी से इस बात को बताया कि मुझे ऐसा स्वप्न हुआ है। आज मुझे यहाँ से छुट्टी मिल जाएगी। जबकि सच तो यह था कि उस दिन छुट्टी मिलने का प्रश्र ही नहीं था। डॉक्टर ने पहले ही कह दिया था कि २९ जुलाई से पूर्व आपको रिलीज नहीं किया जा सकता।
🔵 लेकिन मुझे गुरु के ऊपर विश्वास था कि आज मुझे अस्पताल से छुट्टी मिल जाएगी। २७ तारीख को जब डॉक्टर विजिट में आए तो मैंने उनसे रिलीज कर देने के लिए आग्रह किया। वे कुछ देर तक मौन रहे और बाद में अनुमति दे दी। मैं उसी दिन रात्रि ७ बजे रिलीज होकर अपने घर आ गया। मेरे गुरुदेव ने मुझे उस अतृप्त आत्मा से बचाकर नया जीवन दिया। अगर मैं वैसी विषम स्थिति में दो दिन और रह जाता तो मेरी मौत निश्चित थी।
🌹 पवन कुमार शर्मा कटक (उड़ीसा)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/won/mila.1
👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 91)
🌹 जीवन साधना जो कभी असफल नहीं जाती
🔴 बाजरे का-मक्का का एक दाना सौ दाने होकर पकता है। यह उदाहरण हमने अपनी संचित सम्पदा के उत्सर्ग करने जैसा दुस्साहस करने में देखा। जो था, वह परिवार के लिए उतनी ही मात्रा में, उतनी ही अवधि तक दिया, जब तक कि वे लोग हाथ पैरों से कमाने-खाने लायक नहीं बन गए। उत्तराधिकार में समर्थ संतान हेतु सम्पदा छोड़ मरना, अपना श्रम मनोयोग उन्हीं के लिए खपाते रहना हमने सदा अनैतिक माना और विरोध किया है। फिर स्वयं वैसा करते भी कैसे? मुफ्त की कमाई हराम की होती है, भले ही वह पूर्वजों की खड़ी की हुई हो। हराम की कमाई न पचती है, न फलती है। इस आदर्श पर परिपूर्ण विश्वास रखते हुए हमने शारीरिक श्रम, मनोयोग, भाव संवेदना और संग्रहीत धन की चारों सम्पदाओं में से किसी को भी कुपात्रों के हाथ नहीं जाने दिया है।
🔵 उसका एक-एक कण सज्जनता के सम्वर्धन में, भगवान की आराधना में लगाया है। परिणाम सामने है। जो पास में था, उससे अगणित लाभ उठा चुके। यदि कृपणों की तरह उन उपलब्धियों को विलास में, लालच में, संग्रह में, परिवार वालों को धन-कुबेर बनाने में खर्च किया होता, तो वह सब कुछ बेकार चला जाता। कोई महत्त्वपूर्ण काम न बनता, वरन् जो भी उस मुफ्त के श्रम साधन का उपयोग करते वे दुर्गुण, दुर्व्यसनी बनकर नफे में नहीं, घाटे में ही रहते। कितने पुण्य फल ऐसे हैं, जिनके सत्परिणाम प्राप्त करने के लिए अगले जन्म की प्रतीक्षा करनी पड़ती है, पर लोक साधना का परमार्थ ऐसा है, जिसका प्रतिफल हाथों-हाथ मिलता है। किसी दुःखी के आँसू पोंछते समय असाधारण आत्म-संतोष होता है। कोई बदला न चुका सके, तो भी उपकारी का मन ही मन सम्मान करता है, आशीर्वाद देता है, इसके अतिरिक्त और एक ऐसा दैवी विधान जिसके अनुसार उपकारी का भण्डार खाली नहीं होता, उस पर ईश्वरीय अनुग्रह बरसता रहता है और जो खर्चा गया है, उसकी भरपाई करता रहता है।
🔴 भेड़ ऊन कटाती रहती है, हर वर्ष उसे नई ऊन मिलती है। पेड़ फल देते हैं, अगली बार टहनियाँ फिर उसी तरह लद जाती हैं, बादल बरसते हैं, पर खाली नहीं होते। अगले दिनों वे फिर उतनी ही जल सम्पदा बरसाने के लिए समुद्र से प्राप्त कर लेते हैं, उदारचेताओं के भण्डार कभी खाली नहीं हुए। किसी ने कुपात्रों को अपना श्रम-समय देकर भ्रमवश दुष्प्रवृत्तियों का पोषण किया हो और उसे भी पुण्य समझा हो तो फिर बात दूसरी है। अन्यथा लोक साधना के परमार्थ का प्रतिफल ऐसा है, जो हाथों-हाथ मिलता है। आत्मसंतोष, लोक सम्मान, दैवी अनुग्रह के रूप में तीन गुना सत्परिणाम प्रदान करने वाला व्यवसाय ऐसा है, जिसने भी हाथ डाला कृत-कृत्य होकर रहा है। कृपण ही हैं, जो चतुरता का दम भरते किंतु हर दृष्टि से घाटा उठाते हैं।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/jivan.4
🔴 बाजरे का-मक्का का एक दाना सौ दाने होकर पकता है। यह उदाहरण हमने अपनी संचित सम्पदा के उत्सर्ग करने जैसा दुस्साहस करने में देखा। जो था, वह परिवार के लिए उतनी ही मात्रा में, उतनी ही अवधि तक दिया, जब तक कि वे लोग हाथ पैरों से कमाने-खाने लायक नहीं बन गए। उत्तराधिकार में समर्थ संतान हेतु सम्पदा छोड़ मरना, अपना श्रम मनोयोग उन्हीं के लिए खपाते रहना हमने सदा अनैतिक माना और विरोध किया है। फिर स्वयं वैसा करते भी कैसे? मुफ्त की कमाई हराम की होती है, भले ही वह पूर्वजों की खड़ी की हुई हो। हराम की कमाई न पचती है, न फलती है। इस आदर्श पर परिपूर्ण विश्वास रखते हुए हमने शारीरिक श्रम, मनोयोग, भाव संवेदना और संग्रहीत धन की चारों सम्पदाओं में से किसी को भी कुपात्रों के हाथ नहीं जाने दिया है।
🔵 उसका एक-एक कण सज्जनता के सम्वर्धन में, भगवान की आराधना में लगाया है। परिणाम सामने है। जो पास में था, उससे अगणित लाभ उठा चुके। यदि कृपणों की तरह उन उपलब्धियों को विलास में, लालच में, संग्रह में, परिवार वालों को धन-कुबेर बनाने में खर्च किया होता, तो वह सब कुछ बेकार चला जाता। कोई महत्त्वपूर्ण काम न बनता, वरन् जो भी उस मुफ्त के श्रम साधन का उपयोग करते वे दुर्गुण, दुर्व्यसनी बनकर नफे में नहीं, घाटे में ही रहते। कितने पुण्य फल ऐसे हैं, जिनके सत्परिणाम प्राप्त करने के लिए अगले जन्म की प्रतीक्षा करनी पड़ती है, पर लोक साधना का परमार्थ ऐसा है, जिसका प्रतिफल हाथों-हाथ मिलता है। किसी दुःखी के आँसू पोंछते समय असाधारण आत्म-संतोष होता है। कोई बदला न चुका सके, तो भी उपकारी का मन ही मन सम्मान करता है, आशीर्वाद देता है, इसके अतिरिक्त और एक ऐसा दैवी विधान जिसके अनुसार उपकारी का भण्डार खाली नहीं होता, उस पर ईश्वरीय अनुग्रह बरसता रहता है और जो खर्चा गया है, उसकी भरपाई करता रहता है।
🔴 भेड़ ऊन कटाती रहती है, हर वर्ष उसे नई ऊन मिलती है। पेड़ फल देते हैं, अगली बार टहनियाँ फिर उसी तरह लद जाती हैं, बादल बरसते हैं, पर खाली नहीं होते। अगले दिनों वे फिर उतनी ही जल सम्पदा बरसाने के लिए समुद्र से प्राप्त कर लेते हैं, उदारचेताओं के भण्डार कभी खाली नहीं हुए। किसी ने कुपात्रों को अपना श्रम-समय देकर भ्रमवश दुष्प्रवृत्तियों का पोषण किया हो और उसे भी पुण्य समझा हो तो फिर बात दूसरी है। अन्यथा लोक साधना के परमार्थ का प्रतिफल ऐसा है, जो हाथों-हाथ मिलता है। आत्मसंतोष, लोक सम्मान, दैवी अनुग्रह के रूप में तीन गुना सत्परिणाम प्रदान करने वाला व्यवसाय ऐसा है, जिसने भी हाथ डाला कृत-कृत्य होकर रहा है। कृपण ही हैं, जो चतुरता का दम भरते किंतु हर दृष्टि से घाटा उठाते हैं।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/jivan.4
👉 MANAN (Part 2)
(motivating the self-being for present & future period) & its Significance.
🔴 So, the gap also is to be filled. Rectification (identification coupled with commitment to remove) alone is not all that is to be done. Let it be compensated also. Rectified, well but it alone will not serve the purpose. Will you not compensate or fill the gap created out of removal of some undesirable specification? Will you not improve your health that has been stabilized after identification & then removal by you, of some undesirable specification of your personality? Will you not add to your public contacts, not proceed for public-service? Will you not do the jobs you have to do now? No sir! We have rectified our mistakes & that’s enough.
🔵 What do you mean by ‘Mistakes Rectified’? ‘Mistakes Rectified’ must be compulsorily followed by ‘Qualities-Developed’, ‘Competency-Developed’ and ‘Sensitivity-Developed’. Process of ‘SELF-BUILDING’ will require you to repeatedly inspect your gaps just to fill that or compensate that. We should make our temperament and habits morally justified. Make up yourself, your health, your personality, your character, your temperament and of course your working-style. Make up everything. Besides making up these specifications, just take care of one more thing and that is your family, make up its scenario too.
🔴 Building, only of ourselves! We will become a saint in ourselves, will study RAMAYANA and not consume sweets. You are right, but again the family is there which a part of you is also. You are not alone. Your family is also associated with you, therefore your job also warrants its building as well. If you cannot do that then all your family members are likely to remain fool, wicked and uncivil and in that condition how will you ensure your peace of mind, do BHAJAN? Then how will you live a happy life, practice good habits and words? Why will you not be angry to see everybody puzzled in your family? That is why what is to be additionally done is to take necessary measures to ensure peace, happiness and harmony within your family and of course in your personal life also.
🌹 to be continue...
🌹 ~Pt Shriram Sharma Aachrya
🔴 So, the gap also is to be filled. Rectification (identification coupled with commitment to remove) alone is not all that is to be done. Let it be compensated also. Rectified, well but it alone will not serve the purpose. Will you not compensate or fill the gap created out of removal of some undesirable specification? Will you not improve your health that has been stabilized after identification & then removal by you, of some undesirable specification of your personality? Will you not add to your public contacts, not proceed for public-service? Will you not do the jobs you have to do now? No sir! We have rectified our mistakes & that’s enough.
🔵 What do you mean by ‘Mistakes Rectified’? ‘Mistakes Rectified’ must be compulsorily followed by ‘Qualities-Developed’, ‘Competency-Developed’ and ‘Sensitivity-Developed’. Process of ‘SELF-BUILDING’ will require you to repeatedly inspect your gaps just to fill that or compensate that. We should make our temperament and habits morally justified. Make up yourself, your health, your personality, your character, your temperament and of course your working-style. Make up everything. Besides making up these specifications, just take care of one more thing and that is your family, make up its scenario too.
🔴 Building, only of ourselves! We will become a saint in ourselves, will study RAMAYANA and not consume sweets. You are right, but again the family is there which a part of you is also. You are not alone. Your family is also associated with you, therefore your job also warrants its building as well. If you cannot do that then all your family members are likely to remain fool, wicked and uncivil and in that condition how will you ensure your peace of mind, do BHAJAN? Then how will you live a happy life, practice good habits and words? Why will you not be angry to see everybody puzzled in your family? That is why what is to be additionally done is to take necessary measures to ensure peace, happiness and harmony within your family and of course in your personal life also.
🌹 to be continue...
🌹 ~Pt Shriram Sharma Aachrya
👉 मानवता के हित में महत्त्वाकांक्षा त्यागी
🔵 घटना उस समय की है, जब यमन के राष्ट्रपति अब्दुल्ला सलाल को अपदस्थ कर रिपब्लिकन नेता श्री रहमान हरयानी को सत्तारूढ किया गया। यह क्रांति रक्तहीन था। बाद में प्रकाशित समचारों से पता चला है कि जन-जीवन को रक्तपात और लूटमार से बचाने का संपूर्ण श्रेय अपदस्थ राष्ट्रपति सलाल को ही था।
🔴 इस युग में जब कि हर देश के नेता अपनी स्वार्थलिप्सा और महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए घृणित से घृणित कार्य करने से भी नहीं चूकते, श्री सलाल ने एक आदर्श सिद्धांत स्थापित किया है कि कोई बात मानवता के हित में है तो उसके लिए अपनी महत्वाकांक्षाओं को ठुकराया भी जा सकता है। श्री सलाल के इस आदर्श ने उनकी खोई प्रतिष्ठा से भी अधिक उन्हें श्रेय और सम्मान दिलाया।
🔵 राष्ट्रपति सलाल जब सत्तारूढ थे, तभी उनकी कई नीतियों का यमन मे तीव्र विरोध चल रहा था। जन-चेतना को सामूहिक शक्ति आज के युग की प्रबलतम शक्ति गिनी गई है। संगठित व्यक्तियों के आगे वैसे भी किसी की चल नहीं सकती। यदि जनतंत्र में बौद्धिक जागृति हो तब तो उसका मुकाबला सेना और तलवारें भी नहीं कर सकती। यदि कुछ हो सकता है तो संघर्ष और रक्तपात अवश्य हो सकता है। यमन में उसी की तैयारी चल पडी थी और अब्दुल्ला सलाल को उस सबकी पूरी और पक्की जानकारी भी थी।
🔴 राष्ट्रपति सलाल सत्तारूढ थे, चाहते तो गृह युद्ध करा देते। अपने अनेक विरोधियों को मारकर वे उस अस्थिरता को समाप्त भी कर सकते थे पर सिद्धॉंतवादी व्यक्ति अपने शत्रु के साथ भी अमानवीय का व्यवहार नहीं करते, यह जो कुछ हो रहा था, वह तो उनके ही देशवासी कर रहे थे, उसके प्रति सलाल जैसा सहृदय व्यक्ति क्रूर एवं कठोर क्यों होता ?
🔵 उन्होंने बगदाद और मास्को यात्रा का कार्यक्रम इसी उद्देश्य से बनाया। एक पक्ष जब निबल पड जायेगा तो गृह-युद्ध की स्थिति ही न आने पायेगी। विरोधी व्यक्तियों ने समझा, यह सब विद्रोह के लिए अच्छा रहेगा। बाद मे सही स्थिति का पता चला तो वह लोग, जिन्होंने श्री सलाल के विरुद्ध बगावत की थी, वह भी उनकी प्रशंसा किये बिना न रहे।
🔴 सबसे पहले अल अनवर समाचार पत्र ने यह खबर देते हुए बताया कि श्री सलाल जब बगदाद यात्रा के लिए चलने लगे तो उन्होंने विद्रोही नेता श्री अनवर हरयानी को पत्र लिखा कि अपने देश को रक्तपात और दूसरे देशों के सामने शर्मिदगी से बचाने के लिए मैं देश छोड रहा हूँ। मैं अपने विरुद्ध की गई हर तैयारी से अवगत हूँ किंतु अपनी प्रजा के अहित के साथ मेरा नाम जुडे मैं यह कभी नहीं चाहता। आप मेरा स्थान ग्रहण करने के लिए चुने गये हैं, तब तक आप गणराज्य बनाए रख सकते है। मैं पहला व्यक्ति हूँ जो इस बात का स्वागत करता हूँ।
🔵 राष्ट्रपति सलाल ने इसके बाद शेष जीवन बगदाद में ही रहकर ईश्वर की उपासना और आत्म-कल्याण में बिताने का निश्चय किया। सारे संसार के नेता ऐसे उदार और मानवता के हितैषी हो जाये तो रक्तपात की परिस्थितियाँ संसार में आए ही क्यों?
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 143, 144
🔴 इस युग में जब कि हर देश के नेता अपनी स्वार्थलिप्सा और महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए घृणित से घृणित कार्य करने से भी नहीं चूकते, श्री सलाल ने एक आदर्श सिद्धांत स्थापित किया है कि कोई बात मानवता के हित में है तो उसके लिए अपनी महत्वाकांक्षाओं को ठुकराया भी जा सकता है। श्री सलाल के इस आदर्श ने उनकी खोई प्रतिष्ठा से भी अधिक उन्हें श्रेय और सम्मान दिलाया।
🔵 राष्ट्रपति सलाल जब सत्तारूढ थे, तभी उनकी कई नीतियों का यमन मे तीव्र विरोध चल रहा था। जन-चेतना को सामूहिक शक्ति आज के युग की प्रबलतम शक्ति गिनी गई है। संगठित व्यक्तियों के आगे वैसे भी किसी की चल नहीं सकती। यदि जनतंत्र में बौद्धिक जागृति हो तब तो उसका मुकाबला सेना और तलवारें भी नहीं कर सकती। यदि कुछ हो सकता है तो संघर्ष और रक्तपात अवश्य हो सकता है। यमन में उसी की तैयारी चल पडी थी और अब्दुल्ला सलाल को उस सबकी पूरी और पक्की जानकारी भी थी।
🔴 राष्ट्रपति सलाल सत्तारूढ थे, चाहते तो गृह युद्ध करा देते। अपने अनेक विरोधियों को मारकर वे उस अस्थिरता को समाप्त भी कर सकते थे पर सिद्धॉंतवादी व्यक्ति अपने शत्रु के साथ भी अमानवीय का व्यवहार नहीं करते, यह जो कुछ हो रहा था, वह तो उनके ही देशवासी कर रहे थे, उसके प्रति सलाल जैसा सहृदय व्यक्ति क्रूर एवं कठोर क्यों होता ?
🔵 उन्होंने बगदाद और मास्को यात्रा का कार्यक्रम इसी उद्देश्य से बनाया। एक पक्ष जब निबल पड जायेगा तो गृह-युद्ध की स्थिति ही न आने पायेगी। विरोधी व्यक्तियों ने समझा, यह सब विद्रोह के लिए अच्छा रहेगा। बाद मे सही स्थिति का पता चला तो वह लोग, जिन्होंने श्री सलाल के विरुद्ध बगावत की थी, वह भी उनकी प्रशंसा किये बिना न रहे।
🔴 सबसे पहले अल अनवर समाचार पत्र ने यह खबर देते हुए बताया कि श्री सलाल जब बगदाद यात्रा के लिए चलने लगे तो उन्होंने विद्रोही नेता श्री अनवर हरयानी को पत्र लिखा कि अपने देश को रक्तपात और दूसरे देशों के सामने शर्मिदगी से बचाने के लिए मैं देश छोड रहा हूँ। मैं अपने विरुद्ध की गई हर तैयारी से अवगत हूँ किंतु अपनी प्रजा के अहित के साथ मेरा नाम जुडे मैं यह कभी नहीं चाहता। आप मेरा स्थान ग्रहण करने के लिए चुने गये हैं, तब तक आप गणराज्य बनाए रख सकते है। मैं पहला व्यक्ति हूँ जो इस बात का स्वागत करता हूँ।
🔵 राष्ट्रपति सलाल ने इसके बाद शेष जीवन बगदाद में ही रहकर ईश्वर की उपासना और आत्म-कल्याण में बिताने का निश्चय किया। सारे संसार के नेता ऐसे उदार और मानवता के हितैषी हो जाये तो रक्तपात की परिस्थितियाँ संसार में आए ही क्यों?
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 143, 144
👉 ईश्वरीय अपनत्व की कसौटी
🔵 प्रभु जब किसी को अपना मानते हैं, उसे गहराइयों से प्यार करते हैं, तो उसे अपना सबसे भरोसेमन्द सेवक प्रदान करते हैं और उससे कहते हैं कि तुम-हर हमेशा मेरे प्रिय के साथ रहो, उसका दामन कभी न छोड़ो। कहीं ऐसा न हो कि हमारा प्रिय भक्त अकेला रहकर संसार की चमक-दमक से भ्रमित हो जाए, ओछे आकर्षणों की भूल-भुलैयों में भटक जाए अथवा फिर सुख-भोगों की झाड़ियों में अटक जाए। प्रभु के इस विश्वस्त सेवक का नाम है-दुःख। सचमुच वह ईश्वरभक्त के साथ-साथ छाया की तरह चिपका रहता है।
🔴 निःसन्देह यह दुःख ही ईश्वरीय अपनत्व की कसौटी है। च्यों ही इसका आगमन होता है, हमारी चेतना ईश्वरोन्मुख होने लगती है। दुःख का हर पल, दिल की गहराइयों में संसार की यथार्थता-उसकी असारता एवं निस्सारता की अनुभूति कराता है। इन्हीं क्षणों में हमें सत्य की सघन अनुभूति होती है कि मेरे अपने कितने अधिक पराए हैं? जिन सगे-सम्बन्धियों, मित्रों-परिजनों, कुटुम्बियों-रिश्तेदारों को अपना कहने और मानने में गर्व की अनुभूति होती थी, दुःख के सघन होते ही उनके पराएपन का रहस्य एक के बाद एक उजागर होने लगता हैं। इन्हीं पलों में ईश्वर की याद विकल करती है, ईश्वरीय प्रेम अंकुरित होता है। प्रभु के प्रति अपनत्व सघन होने लगता है।
🔵 प्रभु का विश्वस्त सेवक दुःख अपने साथ न रहे, तो अन्तरात्मा पर कषाय-कल्मष की परतें चढ़ती जाती हैं। ‘अहं’ का विषधर समूची चेतना को ही डस लेता है। आत्मा के प्रकाश के अभाव में प्रवृत्तियों एवं कृत्यों में पाप और अनाचार की बाढ़ आ जाती है। सत् और असत् का विवेक जाता रहता है। जीव सघन अँधेरे और घने कुहासे में घिर जाता है। इन अँधेरों में मूर्च्छना में वह संसार के छद्म जाल को अपना समझने लगता है और प्रभु के शाश्वत मृदुल प्रेम को पराया। और तब प्रभु अपने प्रिय को उबारने के लिए-उसे अपनाने के लिए अपने सबसे भरासेमन्द सेवक दुःख को उसके पास भेजते हैं।
🔴 जिनके लिए दुःख सहना कठिन है, उनके लिए भगवान् को अपना बनाना भी कठिन है। ईश्वर के साथ सम्बन्ध जोड़ने का अर्थ है-जीवन को आदर्शों की जटिल परीक्षाओं में झोंक देना। प्रभु के प्रति अपनी श्रद्धा को हर दिन नई आग में तपाते हुए, उसकी आभा को नित नये ढंग से प्रदीप्त रखना पड़ता है। तभी तो भगवान् को अपना बनाने वाले भक्त उनसे अनवरत दुःखों का वरदान माँगते हैं। कुन्ती, मीरा, राबिया, तुकाराम, नानक, ईसा, बुद्ध, एमर्सन, थोरो आदि दुनिया के हर कोने में रहने वाले परमात्मा के दीवानों ने अपने जीवन में आने वाले प्रचण्ड दुःखों को प्रभु के अपनत्व की कसौटी समझकर स्वीकार किया और हँसते-हँसते सहन किया। प्रभु ने जिनको अपनाया, जिन्होंने प्रभु को अपनाया, उन सबके हृदयों से यही स्वर गूँजे हैं कि ईश्वर-भक्ति एवं आदर्शों के लिए कष्ट सहना, यही दो हाथ हैं, जिन्हें जोड़कर भगवत्प्रार्थना का प्रयोजन सही अर्थों में पूरा हो पाता है।
🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 51
🔴 निःसन्देह यह दुःख ही ईश्वरीय अपनत्व की कसौटी है। च्यों ही इसका आगमन होता है, हमारी चेतना ईश्वरोन्मुख होने लगती है। दुःख का हर पल, दिल की गहराइयों में संसार की यथार्थता-उसकी असारता एवं निस्सारता की अनुभूति कराता है। इन्हीं क्षणों में हमें सत्य की सघन अनुभूति होती है कि मेरे अपने कितने अधिक पराए हैं? जिन सगे-सम्बन्धियों, मित्रों-परिजनों, कुटुम्बियों-रिश्तेदारों को अपना कहने और मानने में गर्व की अनुभूति होती थी, दुःख के सघन होते ही उनके पराएपन का रहस्य एक के बाद एक उजागर होने लगता हैं। इन्हीं पलों में ईश्वर की याद विकल करती है, ईश्वरीय प्रेम अंकुरित होता है। प्रभु के प्रति अपनत्व सघन होने लगता है।
🔵 प्रभु का विश्वस्त सेवक दुःख अपने साथ न रहे, तो अन्तरात्मा पर कषाय-कल्मष की परतें चढ़ती जाती हैं। ‘अहं’ का विषधर समूची चेतना को ही डस लेता है। आत्मा के प्रकाश के अभाव में प्रवृत्तियों एवं कृत्यों में पाप और अनाचार की बाढ़ आ जाती है। सत् और असत् का विवेक जाता रहता है। जीव सघन अँधेरे और घने कुहासे में घिर जाता है। इन अँधेरों में मूर्च्छना में वह संसार के छद्म जाल को अपना समझने लगता है और प्रभु के शाश्वत मृदुल प्रेम को पराया। और तब प्रभु अपने प्रिय को उबारने के लिए-उसे अपनाने के लिए अपने सबसे भरासेमन्द सेवक दुःख को उसके पास भेजते हैं।
🔴 जिनके लिए दुःख सहना कठिन है, उनके लिए भगवान् को अपना बनाना भी कठिन है। ईश्वर के साथ सम्बन्ध जोड़ने का अर्थ है-जीवन को आदर्शों की जटिल परीक्षाओं में झोंक देना। प्रभु के प्रति अपनी श्रद्धा को हर दिन नई आग में तपाते हुए, उसकी आभा को नित नये ढंग से प्रदीप्त रखना पड़ता है। तभी तो भगवान् को अपना बनाने वाले भक्त उनसे अनवरत दुःखों का वरदान माँगते हैं। कुन्ती, मीरा, राबिया, तुकाराम, नानक, ईसा, बुद्ध, एमर्सन, थोरो आदि दुनिया के हर कोने में रहने वाले परमात्मा के दीवानों ने अपने जीवन में आने वाले प्रचण्ड दुःखों को प्रभु के अपनत्व की कसौटी समझकर स्वीकार किया और हँसते-हँसते सहन किया। प्रभु ने जिनको अपनाया, जिन्होंने प्रभु को अपनाया, उन सबके हृदयों से यही स्वर गूँजे हैं कि ईश्वर-भक्ति एवं आदर्शों के लिए कष्ट सहना, यही दो हाथ हैं, जिन्हें जोड़कर भगवत्प्रार्थना का प्रयोजन सही अर्थों में पूरा हो पाता है।
🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 51
👉 समय का सदुपयोग करें (भाग 19)
🌹 समय के सदुपयोग का महत्व समझिए
🔴 समय संसार की सबसे मूल्यवान् सम्पदा है। विद्वानों एवं महापुरुषों ने वक्त को सारी विभूतियों का कारणभूत हेतु माना है। समय का सदुपयोग करने वाले व्यक्ति कभी भी निर्धन अथवा दुःखी नहीं रह सकते। कहने को कहा जा सकता है कि श्रम से ही सम्पत्ति की उपलब्धि होती है किन्तु श्रम का अर्थ भी वक्त का सदुपयोग ही है। असमय का श्रम पारिश्रमिक से अधिक थकान लाया करता है।
🔵 मनुष्य कितना ही परिश्रमी क्यों न हो यदि वह अपने परिश्रम के साथ ठीक समय का सामंजस्य नहीं करेगा तो निश्चय ही इसका श्रम या तो निष्फल चला जायेगा अथवा अपेक्षित फल न ला सकेगा। किसान परिश्रमी है, किन्तु यदि वह अपने श्रम को समय पर काम में नहीं लाता तो वह अपने परिश्रम का पूरा लाभ नहीं उठा सकता। वक्त पर न जोत कर असमय पर जोता हुआ खेत अपनी उर्वरता को प्रकट नहीं कर पाता। असमय बोया हुआ बीज बेकार चला जाता है। वक्त पर न काटी गई फसल नष्ट हो जाती है। संसार में प्रत्येक काम के लिये निश्चित वक्त पर न किया हुआ काम कितना भी परिश्रम करने पर भी सफल नहीं होता।
🔴 प्रकृति का प्रत्येक कार्य एक निश्चित वक्त पर होता है। वक्त पर ग्रीष्म तपता है, वक्त पर पानी बरसता है, वक्त पर ही शीत आता है। वक्त पर ही शिशिर होता और वक्त पर ही बसन्त आकर वनस्पतियों को फूलों से सजा देता है। प्रकृति के इस ऋतु-क्रम में जरा-सा भी व्यवधान पड़ जाने से न जाने कितने प्रकार के रोगों एवं इति-भीति का प्रकोप हो जाता है चांद-सूरज, गृह-नक्षत्र सब समय पर ही उदय अस्त होते, वक्त के अनुसार ही अपनी परिधि एवं कक्ष में परिभ्रमण किया करते हैं। इनकी सामयिकता में जरा-सा व्यवधान पड़ने से सृष्टि में अनेक उपद्रव खड़े हो जाते हैं और प्रलय के दृश्य दीखने लगते हैं, समय पालन ईश्वरीय नियमों में सबसे महत्त्वपूर्ण एवं प्रमुख नियम है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔴 समय संसार की सबसे मूल्यवान् सम्पदा है। विद्वानों एवं महापुरुषों ने वक्त को सारी विभूतियों का कारणभूत हेतु माना है। समय का सदुपयोग करने वाले व्यक्ति कभी भी निर्धन अथवा दुःखी नहीं रह सकते। कहने को कहा जा सकता है कि श्रम से ही सम्पत्ति की उपलब्धि होती है किन्तु श्रम का अर्थ भी वक्त का सदुपयोग ही है। असमय का श्रम पारिश्रमिक से अधिक थकान लाया करता है।
🔵 मनुष्य कितना ही परिश्रमी क्यों न हो यदि वह अपने परिश्रम के साथ ठीक समय का सामंजस्य नहीं करेगा तो निश्चय ही इसका श्रम या तो निष्फल चला जायेगा अथवा अपेक्षित फल न ला सकेगा। किसान परिश्रमी है, किन्तु यदि वह अपने श्रम को समय पर काम में नहीं लाता तो वह अपने परिश्रम का पूरा लाभ नहीं उठा सकता। वक्त पर न जोत कर असमय पर जोता हुआ खेत अपनी उर्वरता को प्रकट नहीं कर पाता। असमय बोया हुआ बीज बेकार चला जाता है। वक्त पर न काटी गई फसल नष्ट हो जाती है। संसार में प्रत्येक काम के लिये निश्चित वक्त पर न किया हुआ काम कितना भी परिश्रम करने पर भी सफल नहीं होता।
🔴 प्रकृति का प्रत्येक कार्य एक निश्चित वक्त पर होता है। वक्त पर ग्रीष्म तपता है, वक्त पर पानी बरसता है, वक्त पर ही शीत आता है। वक्त पर ही शिशिर होता और वक्त पर ही बसन्त आकर वनस्पतियों को फूलों से सजा देता है। प्रकृति के इस ऋतु-क्रम में जरा-सा भी व्यवधान पड़ जाने से न जाने कितने प्रकार के रोगों एवं इति-भीति का प्रकोप हो जाता है चांद-सूरज, गृह-नक्षत्र सब समय पर ही उदय अस्त होते, वक्त के अनुसार ही अपनी परिधि एवं कक्ष में परिभ्रमण किया करते हैं। इनकी सामयिकता में जरा-सा व्यवधान पड़ने से सृष्टि में अनेक उपद्रव खड़े हो जाते हैं और प्रलय के दृश्य दीखने लगते हैं, समय पालन ईश्वरीय नियमों में सबसे महत्त्वपूर्ण एवं प्रमुख नियम है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 कर्म की स्वतंत्रता
🔴 समस्त योनियों में से केवल मनुष्य योनि ही ऐसी योनि है, जिसमें मनुष्य कर्म करने के लिए पूर्ण स्वतंत्र है। ईश्वर की ओर से मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आदि इसलिए प्रदान किए गए हैं कि वह प्रत्येक काम को मानवता की कसौटी पर कसे और बुद्धि से तोल कर, मन से मनन करके, इंद्रियों द्वारा पूरा करे। मनुष्य का यह अधिकार जन्मसिद्ध है। यदि वह अपने इस अधिकार का सदुपयोग नहीं करता, तो वह केवल अपना कुछ खोता ही नहीं है, बल्कि ईश्वरीय आज्ञा की अवहेलना करने के कारण पाप का भागी बनता है।
🔵 कर्म करना मनुष्य का अधिकार है, परन्तु इसके विपरीत कर्म को छोड़ देने में वह स्वतंत्र नहीं है। किसी प्रकार भी कोई प्राणी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। यह हो सकता है कि जो कर्म उसे नहीं करना चाहिए, उसका वह आचरण करने लगे। ऐसी अवस्था में स्वभाव उसे जबरदस्ती अपनी ओर खींचेगा और उसे लाचार होकर यन्त्र की भाँति कर्म करना पड़ेगा।
🔴 गीता में भगवान ने कहा है-यदि तू अज्ञान और मोह में पड़कर कर्म करने के अधिकार को कुचलेगा, तो याद रख कि स्वभाव से उत्पन्न कर्म के अधीन होकर तुझे सब कुछ करना पड़ेगा। ईश्वर सब प्राणियों के हृदय प्रदेश में बसा हुआ है और जो मनुष्य अपने स्वभाव तथा अधिकार के विपरीत कर्म करते हैं, उनको यह माया का डंडा लगातार इस प्रकार घुमा देता है, जैसे कुम्हार चाक पर पऱ चढ़ाकर एक मिट्टी के बर्तन को घुमाता है।
🌹 ~अखण्ड ज्योति-अक्टू. 1946 पृष्ठ 17
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1946/October.17
🔵 कर्म करना मनुष्य का अधिकार है, परन्तु इसके विपरीत कर्म को छोड़ देने में वह स्वतंत्र नहीं है। किसी प्रकार भी कोई प्राणी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। यह हो सकता है कि जो कर्म उसे नहीं करना चाहिए, उसका वह आचरण करने लगे। ऐसी अवस्था में स्वभाव उसे जबरदस्ती अपनी ओर खींचेगा और उसे लाचार होकर यन्त्र की भाँति कर्म करना पड़ेगा।
🔴 गीता में भगवान ने कहा है-यदि तू अज्ञान और मोह में पड़कर कर्म करने के अधिकार को कुचलेगा, तो याद रख कि स्वभाव से उत्पन्न कर्म के अधीन होकर तुझे सब कुछ करना पड़ेगा। ईश्वर सब प्राणियों के हृदय प्रदेश में बसा हुआ है और जो मनुष्य अपने स्वभाव तथा अधिकार के विपरीत कर्म करते हैं, उनको यह माया का डंडा लगातार इस प्रकार घुमा देता है, जैसे कुम्हार चाक पर पऱ चढ़ाकर एक मिट्टी के बर्तन को घुमाता है।
🌹 ~अखण्ड ज्योति-अक्टू. 1946 पृष्ठ 17
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1946/October.17
👉 समय का सदुपयोग करें (भाग 18)
🌹 समय जरा भी नष्ट मत होने दीजिये
🔴 समय की बर्बादी आज-कल मनोरंजन के नाम पर भी बहुत होती है। रेडियो, सिनेमा, खेल-तमाशे, ताश, शतरंज आदि में हम नित्य ही अपना बहुत-सा समय बर्बाद करते रहते हैं। महात्मा गांधी ने एक बार अपने पुत्र मणिलाल को पत्र में लिखा था। ‘‘खेल-कूद मनोरंजन का समय बारह वर्ष की उम्र तक है।’’ आज हम इसमें अपना कितना वक्त खर्च करते हैं यह स्वयं ही अनुमान लगा सकते हैं। मनोरंजन खेल आदि को जीवन में रखा ही जाय तो उसके लिए भी एक नियत समय रखना चाहिये।
🔵 अपने आस-पास का वातावरण, ऐसा रखना चाहिए कि अपना समय किसी कारण बर्बाद न हो। वक्त बर्बाद करने वाले दोस्तों से दूर की ‘नमस्ते’ रखनी चाहिए। निठल्ले लोग ही अक्सर दूसरे का वक्त बर्बाद करने जा पहुंचते हैं। इन्हें दोस्त नहीं दुश्मन मानना ही उचित है।
स्मरण रखिये समय बहुत मूल्यवान् वस्तु है। इससे आप जितना लाभ उठा सकते हैं उठायें। आप वक्त को नष्ट करेंगे तो वक्त भी आपको नष्ट कर देगा। वक्त के सदुपयोग पर ही आप कुछ बन सकते हैं।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔴 समय की बर्बादी आज-कल मनोरंजन के नाम पर भी बहुत होती है। रेडियो, सिनेमा, खेल-तमाशे, ताश, शतरंज आदि में हम नित्य ही अपना बहुत-सा समय बर्बाद करते रहते हैं। महात्मा गांधी ने एक बार अपने पुत्र मणिलाल को पत्र में लिखा था। ‘‘खेल-कूद मनोरंजन का समय बारह वर्ष की उम्र तक है।’’ आज हम इसमें अपना कितना वक्त खर्च करते हैं यह स्वयं ही अनुमान लगा सकते हैं। मनोरंजन खेल आदि को जीवन में रखा ही जाय तो उसके लिए भी एक नियत समय रखना चाहिये।
🔵 अपने आस-पास का वातावरण, ऐसा रखना चाहिए कि अपना समय किसी कारण बर्बाद न हो। वक्त बर्बाद करने वाले दोस्तों से दूर की ‘नमस्ते’ रखनी चाहिए। निठल्ले लोग ही अक्सर दूसरे का वक्त बर्बाद करने जा पहुंचते हैं। इन्हें दोस्त नहीं दुश्मन मानना ही उचित है।
स्मरण रखिये समय बहुत मूल्यवान् वस्तु है। इससे आप जितना लाभ उठा सकते हैं उठायें। आप वक्त को नष्ट करेंगे तो वक्त भी आपको नष्ट कर देगा। वक्त के सदुपयोग पर ही आप कुछ बन सकते हैं।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
Title
👉 क्रान्ति का महापर्व
🔵 क्रान्ति के बीज किसी एक महान् विचारक के दिमाग में जमते हैं। वहाँ से फूल-फलकर क्रान्तिधर्मी साहित्य के रूप में बाहर आते हैं और संक्रामक रोग की तरह अन्य दिमागों में उपजकर बढ़ते हैं। सिलसिला जारी रहता है। क्रान्ति की उमंगों की बाढ़ आती है। सब ओर क्रान्ति का पर्व मनने लगता है। चिंगारी से आग और आग से दावानल बन जाता है। बुरे-भले सब तरह के लोग उसके प्रभाव में आते हैं। कीचड़ और दलदल में भी आग लग जाती है।
🔴 ऐसे में नियति का नियन्त्रण करने वाली अदृश्यसत्ता परिवर्तन के क्रान्तिकारी आवेग से भरी प्रतीत होती है। वेदमाता, आद्यशक्ति समूचे विश्व को अपने हाथों में लेकर उसे नया रूप देने का संकल्प लेती हैं। तोपों की गरज, फौजों के कदमों के धमाके, बड़े-बड़े सत्ताधीशों के अधःपतनों और समूचे विश्व में व्यापक उथल-पुथल के शोरगुल से भरे ये क्रान्ति के समारोह हर ओर तीव्र विनाश और सशक्त सृजन की बाढ़ ला देते हैं। क्रान्ति के इस पर्व में दुनिया को गलाने वाली कड़ाही में डाल दिया जाता है और वह नया रूप, नया आकार लेकर निकल आती है। महाक्रान्ति के इस पर्व में ऐसा बहुत कुछ घटित होता है, जिसे देखकर बुद्धिमानों की बुद्धि चकरा जाती है और प्राज्ञों की प्रज्ञा हास्यास्पद बन जाती है।
🔵 वर्तमान युग में विचार-क्रान्ति के बीजों को परमपूच्य गुरुदेव ने अपने क्रान्तिधर्मी साहित्य के माध्यम से जनमानस की उर्वर भूमि में बड़े यत्न से बोया है। वन्दनीया माताजी के साथ सतत तप करके इन्हें अपने प्राणों से सींचा है। इसके चमत्कारी प्रभावों से क्रान्ति की केसरिया फसल लहलहा उठी है। परिवर्तन की च्वालाएँ धधकने लगी हैं। क्रान्ति के महापर्व की उमंगों की थिरकन चहुँ ओर फैल रही है। ये वही महान् क्षण हैं, जब भारतमाता अपनी ही सन्तानों के असंख्य आघातों को सहते हुए असह्य वेदना और आँखों में आँसू लिए अपना नवल सृजन करने को तत्पर है।
🔴 अपने समय की इस महाक्रान्ति के लिए समर्पित युगसैनिक अपना धैर्य न खोएँ और न ही निराशा से अपनी आत्माओं को अभिभूत और हतोत्साहित होने दें। देवत्व और असुरता के इस महासंग्राम में जो हमारा नेतृत्व कर रहा है, वह स्वयं सर्वशक्तिमान महाकाल है। कालपुरुष, युगात्मा स्वयं इस क्रान्ति महोत्सव को सम्पन्न करने के लिए उठ खड़ा हुआ है। उसके प्रभाव, शक्तिमत्ता और अप्रतिरोध्यता को कौन रोक सकता है? वह तो केवल उस तिमिर का नाश कर रहा है, जो मानवता को अनेक रूपों से आक्रान्त किए हुए है। जो होने जा रहा है, उस उज्ज्वल भविष्य का तो वह सृजन कर रहा है।
🔵 यह समय युगसेनानियों की चेतना में महाकाल के दिव्यप्रकाश के अवतरण के लिए हैं। उन्हें यह चेताने के लिए हैं कि इस क्रान्ति के अवसर में हृदय मूर्छित न होने पाए और न ही उदासी छाए तथा कोई अदूरदर्शी उत्तेजना भी न हो। हमारी भयंकर परीक्षा का समय है। मार्ग सरल नहीं होने का, मुकुट सस्ते में नहीं मिल जाएगा। भारत मौत के साए की घाटी से, अंधकार और यंत्रणा के घोर संत्रास से गुजर कर ही इक्कीसवीं सदी में विश्वगुरु बनने का गौरव प्राप्त करेगा। क्रान्ति के इस अवसर पर पहली अपेक्षा साहस की है, ऐसे साहस की जो पीछे हटना बिलकुल न जानता हो। क्रान्ति के संवर्ग समारोहों में शामिल होने वाले ऐसे साहसी व्यक्ति ही क्रान्तिवीरों का गौरव प्राप्त करेंगे।
🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 49
🔴 ऐसे में नियति का नियन्त्रण करने वाली अदृश्यसत्ता परिवर्तन के क्रान्तिकारी आवेग से भरी प्रतीत होती है। वेदमाता, आद्यशक्ति समूचे विश्व को अपने हाथों में लेकर उसे नया रूप देने का संकल्प लेती हैं। तोपों की गरज, फौजों के कदमों के धमाके, बड़े-बड़े सत्ताधीशों के अधःपतनों और समूचे विश्व में व्यापक उथल-पुथल के शोरगुल से भरे ये क्रान्ति के समारोह हर ओर तीव्र विनाश और सशक्त सृजन की बाढ़ ला देते हैं। क्रान्ति के इस पर्व में दुनिया को गलाने वाली कड़ाही में डाल दिया जाता है और वह नया रूप, नया आकार लेकर निकल आती है। महाक्रान्ति के इस पर्व में ऐसा बहुत कुछ घटित होता है, जिसे देखकर बुद्धिमानों की बुद्धि चकरा जाती है और प्राज्ञों की प्रज्ञा हास्यास्पद बन जाती है।
🔵 वर्तमान युग में विचार-क्रान्ति के बीजों को परमपूच्य गुरुदेव ने अपने क्रान्तिधर्मी साहित्य के माध्यम से जनमानस की उर्वर भूमि में बड़े यत्न से बोया है। वन्दनीया माताजी के साथ सतत तप करके इन्हें अपने प्राणों से सींचा है। इसके चमत्कारी प्रभावों से क्रान्ति की केसरिया फसल लहलहा उठी है। परिवर्तन की च्वालाएँ धधकने लगी हैं। क्रान्ति के महापर्व की उमंगों की थिरकन चहुँ ओर फैल रही है। ये वही महान् क्षण हैं, जब भारतमाता अपनी ही सन्तानों के असंख्य आघातों को सहते हुए असह्य वेदना और आँखों में आँसू लिए अपना नवल सृजन करने को तत्पर है।
🔴 अपने समय की इस महाक्रान्ति के लिए समर्पित युगसैनिक अपना धैर्य न खोएँ और न ही निराशा से अपनी आत्माओं को अभिभूत और हतोत्साहित होने दें। देवत्व और असुरता के इस महासंग्राम में जो हमारा नेतृत्व कर रहा है, वह स्वयं सर्वशक्तिमान महाकाल है। कालपुरुष, युगात्मा स्वयं इस क्रान्ति महोत्सव को सम्पन्न करने के लिए उठ खड़ा हुआ है। उसके प्रभाव, शक्तिमत्ता और अप्रतिरोध्यता को कौन रोक सकता है? वह तो केवल उस तिमिर का नाश कर रहा है, जो मानवता को अनेक रूपों से आक्रान्त किए हुए है। जो होने जा रहा है, उस उज्ज्वल भविष्य का तो वह सृजन कर रहा है।
🔵 यह समय युगसेनानियों की चेतना में महाकाल के दिव्यप्रकाश के अवतरण के लिए हैं। उन्हें यह चेताने के लिए हैं कि इस क्रान्ति के अवसर में हृदय मूर्छित न होने पाए और न ही उदासी छाए तथा कोई अदूरदर्शी उत्तेजना भी न हो। हमारी भयंकर परीक्षा का समय है। मार्ग सरल नहीं होने का, मुकुट सस्ते में नहीं मिल जाएगा। भारत मौत के साए की घाटी से, अंधकार और यंत्रणा के घोर संत्रास से गुजर कर ही इक्कीसवीं सदी में विश्वगुरु बनने का गौरव प्राप्त करेगा। क्रान्ति के इस अवसर पर पहली अपेक्षा साहस की है, ऐसे साहस की जो पीछे हटना बिलकुल न जानता हो। क्रान्ति के संवर्ग समारोहों में शामिल होने वाले ऐसे साहसी व्यक्ति ही क्रान्तिवीरों का गौरव प्राप्त करेंगे।
🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 49
सोमवार, 1 मई 2017
👉 MANAN (Part 1)
(motivating the self-being for present & future period) & its Significance.
🔴 Now comes, the second leg that is to be considered after first leg of ‘CHINTAN’ during the period you are in solitude. Its name is ‘MANAN’ (motivating the self-being). What is ‘MANAN’? ‘MANAN’ again like ‘CHINTAN’ comprises of two stages. The first stage here is called ‘SELF-INCULCATING/ AUTO-SUGGESTION’ while the second one is ‘SELF-DEVELOPMENT’. What to do in ‘INCULCATING’. ‘INCULCATING’ here stands for incorporating some new specification that you usually do not have by now in your temperament, virtue and action. For example you are illiterate and have no knowledge, so now starts trying for that. What to try? You have to start studying.
🔵 We are honest, do not smoke, that is nice but I ask why you do not fill the gap created due to your illiteracy or being uneducated? If you do not do that how progress will begin? How your knowledge-base will widen? How your mind will develop? That is why there is bulk of jobs to be done here as far as building your personality is concerned. Your health is weak due to smoking but your commitment alone to stop smoking will not work as it will only put a break to incurring losses. Yes, it was to be compulsorily stopped but one more thing will also have to be done. To add to your health, you will also have to make necessary changes in your food-habits. You will have to exercise celibacy besides adopting some new way of physical exercise. These new specifications for what, for unleashing the chain of progress as all these are the parts of ‘SELF-INCULCATING’.
🌹 to be continue...
🌹 ~Pt Shriram Sharma Aachrya
🔴 Now comes, the second leg that is to be considered after first leg of ‘CHINTAN’ during the period you are in solitude. Its name is ‘MANAN’ (motivating the self-being). What is ‘MANAN’? ‘MANAN’ again like ‘CHINTAN’ comprises of two stages. The first stage here is called ‘SELF-INCULCATING/ AUTO-SUGGESTION’ while the second one is ‘SELF-DEVELOPMENT’. What to do in ‘INCULCATING’. ‘INCULCATING’ here stands for incorporating some new specification that you usually do not have by now in your temperament, virtue and action. For example you are illiterate and have no knowledge, so now starts trying for that. What to try? You have to start studying.
🔵 We are honest, do not smoke, that is nice but I ask why you do not fill the gap created due to your illiteracy or being uneducated? If you do not do that how progress will begin? How your knowledge-base will widen? How your mind will develop? That is why there is bulk of jobs to be done here as far as building your personality is concerned. Your health is weak due to smoking but your commitment alone to stop smoking will not work as it will only put a break to incurring losses. Yes, it was to be compulsorily stopped but one more thing will also have to be done. To add to your health, you will also have to make necessary changes in your food-habits. You will have to exercise celibacy besides adopting some new way of physical exercise. These new specifications for what, for unleashing the chain of progress as all these are the parts of ‘SELF-INCULCATING’.
🌹 to be continue...
🌹 ~Pt Shriram Sharma Aachrya
👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 90)
🌹 जीवन साधना जो कभी असफल नहीं जाती
🔴 गुरुदेव के निर्देशन में अपनी चारों ही सम्पदाओं को भगवान के चरणों में अर्पित करने का निश्चय किया। १-शारीरिक श्रम, २-मानसिक श्रम, ३-भाव संवेदनाएँ, ४-पूर्वजों का उपार्जित धन। अपना कमाया तो कुछ था ही नहीं। चारों को अनन्य निष्ठा के साथ निर्धारित लक्ष्य के लिए लगाते चले आए हैं। फलतः सचमुच ही वे सौ गुने होकर वापस लौटते रहे हैं। शरीर से बाहर घण्टा नित्य श्रम किया है। इससे थकान नहीं आई। वरन् कार्य क्षमता बढ़ी ही है। इन दिनों इस बुढ़ापे में भी जवानों जैसी कार्य क्षमता है। मानसिक श्रम भी शारीरिक श्रम के साथ सँजोए रखा। उसकी परिणति यह है कि मनोबल में-मस्तिष्कीय क्षमता में कहीं कोई ऐसे लक्षण प्रकट नहीं हुए जैसे कि आमतौर से बुढ़ापे में प्रकट होते हैं।
🔵 हमने खुलकर प्यार बाँटा और बिखेरा है। फलस्वरूप दूसरी ओर से भी कमी नहीं रही है, व्यक्तिगत स्नेह, सम्मान, सद्भाव ही नहीं, मिशन के लिए जब-जब, जो-जो अपील, अनुरोध प्रस्तुत किए जाते रहे हैं, उनमें कमी नहीं पड़ी है। २४०० प्रज्ञापीठों का दो वर्ष में बनकर खड़े हो जाना इसका जीवंत उदाहरण है। आरम्भ में मात्र अपना ही धन था। पैतृक संपत्ति से ही गायत्री तपोभूमि का निर्माण हुआ। जन्मभूमि में हाईस्कूल खड़ा किया गया, बाद में एक और शक्तिपीठ वहाँ विनिर्मित हो गया। आशा कम ही थी कि लोग बिना माँगे देंगे और निर्माण का इतना बड़ा स्वरूप खड़ा हो जाएगा।
🔴 आज गायत्री तपोभूमि, शान्तिकुञ्ज गायत्री तीर्थ, ब्रह्मवर्चस् की इमारतों को देखकर भी यह अनुमान लगाया जा सकता है कि बोया हुआ बीज सौ गुना होकर फलता है या नहीं। यह श्रद्धा का अभाव ही है, जिसमें लोग अपना संचय बगल में दबाए रखना चाहते हैं, भगवान से लाटरी अथवा लोगों से चंदा माँगते हैं। यदि बात आत्मसमर्पण से प्रारंभ की जा सके तो उसका आश्चर्यजनक परिणाम होगा। विनिर्मित गायत्री शक्ति पीठों में से जूनागढ़ के निर्माता ने अपने बर्तन बेचकर कार्य आरम्भ किया था और वही अब तक विनिर्मित, सभी इमारतों में मूर्धन्यों में से एक है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/jivan.4
🔴 गुरुदेव के निर्देशन में अपनी चारों ही सम्पदाओं को भगवान के चरणों में अर्पित करने का निश्चय किया। १-शारीरिक श्रम, २-मानसिक श्रम, ३-भाव संवेदनाएँ, ४-पूर्वजों का उपार्जित धन। अपना कमाया तो कुछ था ही नहीं। चारों को अनन्य निष्ठा के साथ निर्धारित लक्ष्य के लिए लगाते चले आए हैं। फलतः सचमुच ही वे सौ गुने होकर वापस लौटते रहे हैं। शरीर से बाहर घण्टा नित्य श्रम किया है। इससे थकान नहीं आई। वरन् कार्य क्षमता बढ़ी ही है। इन दिनों इस बुढ़ापे में भी जवानों जैसी कार्य क्षमता है। मानसिक श्रम भी शारीरिक श्रम के साथ सँजोए रखा। उसकी परिणति यह है कि मनोबल में-मस्तिष्कीय क्षमता में कहीं कोई ऐसे लक्षण प्रकट नहीं हुए जैसे कि आमतौर से बुढ़ापे में प्रकट होते हैं।
🔵 हमने खुलकर प्यार बाँटा और बिखेरा है। फलस्वरूप दूसरी ओर से भी कमी नहीं रही है, व्यक्तिगत स्नेह, सम्मान, सद्भाव ही नहीं, मिशन के लिए जब-जब, जो-जो अपील, अनुरोध प्रस्तुत किए जाते रहे हैं, उनमें कमी नहीं पड़ी है। २४०० प्रज्ञापीठों का दो वर्ष में बनकर खड़े हो जाना इसका जीवंत उदाहरण है। आरम्भ में मात्र अपना ही धन था। पैतृक संपत्ति से ही गायत्री तपोभूमि का निर्माण हुआ। जन्मभूमि में हाईस्कूल खड़ा किया गया, बाद में एक और शक्तिपीठ वहाँ विनिर्मित हो गया। आशा कम ही थी कि लोग बिना माँगे देंगे और निर्माण का इतना बड़ा स्वरूप खड़ा हो जाएगा।
🔴 आज गायत्री तपोभूमि, शान्तिकुञ्ज गायत्री तीर्थ, ब्रह्मवर्चस् की इमारतों को देखकर भी यह अनुमान लगाया जा सकता है कि बोया हुआ बीज सौ गुना होकर फलता है या नहीं। यह श्रद्धा का अभाव ही है, जिसमें लोग अपना संचय बगल में दबाए रखना चाहते हैं, भगवान से लाटरी अथवा लोगों से चंदा माँगते हैं। यदि बात आत्मसमर्पण से प्रारंभ की जा सके तो उसका आश्चर्यजनक परिणाम होगा। विनिर्मित गायत्री शक्ति पीठों में से जूनागढ़ के निर्माता ने अपने बर्तन बेचकर कार्य आरम्भ किया था और वही अब तक विनिर्मित, सभी इमारतों में मूर्धन्यों में से एक है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/jivan.4
👉 यम के दूत निकट नहीं आवें
🔵 मैं अपने परिवार के साथ मई २००४ में शान्तिकुञ्ज दर्शन करने आया। हमें याद है, मैं शान्तिकुञ्ज में चार- पाँच दिन रुका था। १८ मई को वापस बलरामपुर अपने सरकारी आवास पर पहुँच गया। रास्ते की थकान होने के कारण हमें काफी सुस्ती महसूस हो रही थी। इसी बीच भाई की पत्नी भी आ गई। उसे मालूम हुआ कि हम लोग शान्तिकुञ्ज से वापस आ गए हैं। इसलिए एक दिन के लिए मिलने चली आई थी। उस दिन रुककर २० तारीख शाम को ४ बजे वापस चली गई।
🔴 चूँकि हम लोग काफी थके हुए थे, इसलिए उस दिन जल्दी खाना बन गया। हम लोग खा- पीकर जल्दी सो गए। रात में, करीब १२- १ बजे का समय रहा होगा- सात- आठ अज्ञात लोग अचानक मेरे घर में घुस आए। घर में आवाज सुनकर मैं हड़बड़ाकर जाग उठा। मेरी पत्नी और लड़का सो रहा था। मैं बहुत घबड़ा गया था। सोचा उठकर शोर मचाऊँ, तो शायद कोई पड़ोसी ही पहुँच जाए। इतने सारे हथियार बंद लोगों के सामने मेरी क्या औकात थी? उन लोगों ने मेरी आँखों के सामने मेरी पत्नी के हाथ पैरों को बाँध दिया। उसने उठकर चिल्लाने की कोशिश की तो मुँह पर टेप चिपका दिया। मैंने उन्हें रोकने का प्रयास किया तो उन लोगों ने कट्टे के बट से मेरी कनपटी पर वार कर दिया, जिसके कारण मेरे सिर से खून की धार बह निकली। मेरी स्थिति को देख पत्नी अचेत हो गई। मैं अन्दर से बुरी तरह काँप उठा। मुझे लगा कि अब मेरा परिवार तो गया। मैं बुरी तरह जख्मी हो गया था। मेरी दोनों लड़कियाँ दूसरे कमरे में सो रही थीं। मेरा मन आशंका से भर उठा कि वे लोग अब न जाने क्या करें? शरीर से खून बह जाने के कारण कमजोर इतना हो गया था कि उठा भी नहीं जा रहा था। वे लोग मुझे साक्षात् यम के दूत की तरह से लग रहे थे।
🔵 अब पूज्य गुरुदेव को पुकारने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं सूझ रहा था। मैं व्याकुल होकर कह उठा- हे गुरुदेव! मैंने कौन सा अपराध किया है, जिसका मुझे इस तरह दण्ड मिल रहा है। अब तो मेरे परिवार का अन्त हो जाएगा। आपके रहते ऐसा कैसे सम्भव है? मेरे मन में न जाने कितने भाव आ रहे थे! इधर मैं प्रार्थना में तल्लीन था। इस बीच घटना ने किस तरह मोड़ लिया यह मैंने बाद में अपनी पत्नी से सुना। मुझे चोटिल देख उसे मूर्छा आ गई थी। मूर्छा में ही उसने सुना कि बाहर से कोई दरवाजा खोलने के लिए कह रहा है। फिर पता नहीं कैसे दरवाजा अपने आप खुल गया। उसने देखा कि स्वयं गुरुदेव कमरे में प्रवेश कर रहे हैं। सफेद धोती कुर्ता पहने हुए हैं। उनको देखते ही पत्नी की मूर्छा टूट गई। वह चिल्लाई गुरुदेव- गुरुदेव! इतने में सारे बदमाश अचानक डर गए। वे समझे इन लोगों को बचाने वाले आ गए।
🔴 इतना सब कुछ होने के बावजूद कोई व्यक्ति सहायता के लिए नहीं पहुँचा था। अचानक मैंने देखा कि कर्नल साहब का चपरासी अन्दर चिल्लाते हुए आया कि क्या बात है? न जाने मुझमें कहाँ से हिम्मत आ गई। मैं एक ईंट उठाकर बदमाशों के पीछे- पीछे भागा। पता नहीं कैसी कृपा गुरुदेव की हुई कि थोड़ी देर पहले मैं डर के मारे परेशान था, बोलने की हिम्मत नहीं थी। मैंने उन लोगों को बहुत दूर तक दौड़ा दिया। वे लोग डर कर भाग गए।
🔵 इतना घाव एवं रक्त बहने के बावजूद मैं कपड़े से अपने सर को पकड़े हुए एक हाथ से जीप चलाते हुए थाने पहुँच गया। वहाँ मैंने रिपोर्ट लिखवाई। मेरे दिमाग में काफी चोट आने के कारण मेरा दिमागी संतुलन बिगड़ गया था। मुझे बात भूलने की समस्या हो गई थी। लेकिन धीरे- धीरे गुरुकृपा से सब सामान्य हो गया। सभी बदमाश पकड़े गए। मुकदमा चला लेकिन बाद में मंैने मुकदमा समाप्त करा दिया। सभी को बाद में बरी करवा दिया।
🔴 मुझे अपने गुरु पर पूर्ण विश्वास हो गया था। जब उनकी कृपादृष्टि है तो मेरा कुछ नहीं बिगड़ सकता। मैं किसी को दण्ड क्यों दूँ। सारा न्याय तो ऊपर वाले के हाथ में है। इस प्रकार गुरुकृपा से थोड़े दिनों के भीतर सारी परिस्थितियाँ सामान्य हो गईं। अगर गुरुजी का सहारा न होता तो हमारे परिवार का न जाने क्या हाल होता! इस घटना के बाद से मेरी श्रद्धा गुरुदेव के प्रति हमेशा के लिए बँध गई।
🌹 सुरेश कुमार सोनी तहसीलदार, धामपुर बिजनौर (उ.प्र.)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
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🔴 चूँकि हम लोग काफी थके हुए थे, इसलिए उस दिन जल्दी खाना बन गया। हम लोग खा- पीकर जल्दी सो गए। रात में, करीब १२- १ बजे का समय रहा होगा- सात- आठ अज्ञात लोग अचानक मेरे घर में घुस आए। घर में आवाज सुनकर मैं हड़बड़ाकर जाग उठा। मेरी पत्नी और लड़का सो रहा था। मैं बहुत घबड़ा गया था। सोचा उठकर शोर मचाऊँ, तो शायद कोई पड़ोसी ही पहुँच जाए। इतने सारे हथियार बंद लोगों के सामने मेरी क्या औकात थी? उन लोगों ने मेरी आँखों के सामने मेरी पत्नी के हाथ पैरों को बाँध दिया। उसने उठकर चिल्लाने की कोशिश की तो मुँह पर टेप चिपका दिया। मैंने उन्हें रोकने का प्रयास किया तो उन लोगों ने कट्टे के बट से मेरी कनपटी पर वार कर दिया, जिसके कारण मेरे सिर से खून की धार बह निकली। मेरी स्थिति को देख पत्नी अचेत हो गई। मैं अन्दर से बुरी तरह काँप उठा। मुझे लगा कि अब मेरा परिवार तो गया। मैं बुरी तरह जख्मी हो गया था। मेरी दोनों लड़कियाँ दूसरे कमरे में सो रही थीं। मेरा मन आशंका से भर उठा कि वे लोग अब न जाने क्या करें? शरीर से खून बह जाने के कारण कमजोर इतना हो गया था कि उठा भी नहीं जा रहा था। वे लोग मुझे साक्षात् यम के दूत की तरह से लग रहे थे।
🔵 अब पूज्य गुरुदेव को पुकारने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं सूझ रहा था। मैं व्याकुल होकर कह उठा- हे गुरुदेव! मैंने कौन सा अपराध किया है, जिसका मुझे इस तरह दण्ड मिल रहा है। अब तो मेरे परिवार का अन्त हो जाएगा। आपके रहते ऐसा कैसे सम्भव है? मेरे मन में न जाने कितने भाव आ रहे थे! इधर मैं प्रार्थना में तल्लीन था। इस बीच घटना ने किस तरह मोड़ लिया यह मैंने बाद में अपनी पत्नी से सुना। मुझे चोटिल देख उसे मूर्छा आ गई थी। मूर्छा में ही उसने सुना कि बाहर से कोई दरवाजा खोलने के लिए कह रहा है। फिर पता नहीं कैसे दरवाजा अपने आप खुल गया। उसने देखा कि स्वयं गुरुदेव कमरे में प्रवेश कर रहे हैं। सफेद धोती कुर्ता पहने हुए हैं। उनको देखते ही पत्नी की मूर्छा टूट गई। वह चिल्लाई गुरुदेव- गुरुदेव! इतने में सारे बदमाश अचानक डर गए। वे समझे इन लोगों को बचाने वाले आ गए।
🔴 इतना सब कुछ होने के बावजूद कोई व्यक्ति सहायता के लिए नहीं पहुँचा था। अचानक मैंने देखा कि कर्नल साहब का चपरासी अन्दर चिल्लाते हुए आया कि क्या बात है? न जाने मुझमें कहाँ से हिम्मत आ गई। मैं एक ईंट उठाकर बदमाशों के पीछे- पीछे भागा। पता नहीं कैसी कृपा गुरुदेव की हुई कि थोड़ी देर पहले मैं डर के मारे परेशान था, बोलने की हिम्मत नहीं थी। मैंने उन लोगों को बहुत दूर तक दौड़ा दिया। वे लोग डर कर भाग गए।
🔵 इतना घाव एवं रक्त बहने के बावजूद मैं कपड़े से अपने सर को पकड़े हुए एक हाथ से जीप चलाते हुए थाने पहुँच गया। वहाँ मैंने रिपोर्ट लिखवाई। मेरे दिमाग में काफी चोट आने के कारण मेरा दिमागी संतुलन बिगड़ गया था। मुझे बात भूलने की समस्या हो गई थी। लेकिन धीरे- धीरे गुरुकृपा से सब सामान्य हो गया। सभी बदमाश पकड़े गए। मुकदमा चला लेकिन बाद में मंैने मुकदमा समाप्त करा दिया। सभी को बाद में बरी करवा दिया।
🔴 मुझे अपने गुरु पर पूर्ण विश्वास हो गया था। जब उनकी कृपादृष्टि है तो मेरा कुछ नहीं बिगड़ सकता। मैं किसी को दण्ड क्यों दूँ। सारा न्याय तो ऊपर वाले के हाथ में है। इस प्रकार गुरुकृपा से थोड़े दिनों के भीतर सारी परिस्थितियाँ सामान्य हो गईं। अगर गुरुजी का सहारा न होता तो हमारे परिवार का न जाने क्या हाल होता! इस घटना के बाद से मेरी श्रद्धा गुरुदेव के प्रति हमेशा के लिए बँध गई।
🌹 सुरेश कुमार सोनी तहसीलदार, धामपुर बिजनौर (उ.प्र.)
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