सोमवार, 3 अप्रैल 2017

👉 उपासना के तत्व दर्शन को भली भान्ति हृदयंगम किया जाय (भाग 2)

🔵 चन्द्रमा तभी चमकता है जब वह सूर्य का प्रकाश पाता है। अपने आप में वह प्रकाशवान नहीं, उसकी अकेली कोई सत्ता नहीं। सूर्य का आलोक जब उसे प्राप्त नहीं होता तो अमावस्या के दिन चन्द्रमा के यथा स्थान रहते हुए भी उसका अस्तित्व लुप्त प्रायः ही रहता है। परमात्मा वह दिव्य शक्ति आलोक से भरा प्रकाश पुंज है जिससे हम सभी अनुप्राणित प्रकाशवान होते हैं। उपासना हमें उसके समीप ले जाकर स्थायी बल प्राप्त कराती है। जितना सामीप्य हमें ईश्वर का–परमात्मा सत्ता का–मिलता है, उतनी ही श्रेष्ठताएँ हमारे अन्तःकरण में उपजती तथा बढ़ती चली जाती हैं। इसी अनुपात में हमारी आत्मिक शाँति–प्रगति का पथ–प्रशस्त होता चला जाता है।

🔴 उपासना का बहिरंग स्वरूप क्या हो– इसके विस्तार में अभी न जाकर यह देखा जाय कि परमेश्वर साधक के आन्तरिक स्तर को कैसा चाहता है? रामकृष्ण परमहंस कहते थे–”ईश्वर का दर्शन तब होता है जब पाँच सत्प्रवृत्तियाँ अन्दर प्रवेश पाने व फलने–फूलने लगती है। ये पाँच सत्प्रवृत्तियाँ हैं–उत्कृष्टता, निर्मलता, सहृदयता, उदारता, आत्मीयता। ये ही परमात्मा के–ईश्वरीय सत्ता के–भी गुण हैं। जैसे −जैसे इन गुणों का अनुपात अपने अन्दर बढ़ने लगता है, समझना चाहिए जीव उतना ही ईश्वर के समीप पहुँच गया है।”

🔵 इन पाँच सत्प्रवृत्तियों को परमेश्वर का प्रतिनिधि–पंचदेव भी कह सकते हैं। इन्हीं पाँच पाण्डवों को आजीवन आँतरिक असुर कौरवों से लड़ना होता है। जब असुरता के उन्मूलन का हृदय मंथन आक्रोश पूर्वक हो रहा हो–स्पष्ट मान लेना चाहिये कि जीव रूपी अर्जुन ने गीता का ज्ञान स्वीकार कर लिया और वह कृष्ण की आज्ञा मान कर्त्तव्य पारायण–सच्चा योगी–ईश्वर भक्त हो गया। उपासना स्थली पर बैठकर इन सद्गुणों के सम्वर्धन का ही ध्यान किया जाय तो उल्टे ऋषिकेश को ही पार्थ अर्जुन का रथ चलाने–सफलता का पथ–प्रशस्त करने आना पड़ता है। भक्त और भगवान के बीच अनादिकाल से यही क्रम चलता आया है व चलता रहेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 -अखण्ड ज्योति – मार्च 1982 पृष्ठ 2

👉 आत्मचिंतन के क्षण 4 April

🔴 भजन-पूजन आध्यात्मिक उन्नति की ओर बढ़ने के लिए एक उपाय है, स्वयं में अध्यात्म नहीं। अध्यात्मवाद का आशय कुछ ऊंचा और विस्तृत है। उसे आत्म-विज्ञान अथवा जीवन-विज्ञान ही मानना चाहिये। अध्यात्म द्वारा ही मनुष्य का आत्म-सुधार, आत्म-विकास हो जाने से मनुष्य के पास सुख-शाँति उसी प्रकार आ जाती है, जिस प्रकार सूर्य उदय होने पर संसार को प्रकाश स्वतः प्राप्त हो जाता है।

🔵 भजन-पूजन का मूल आशय यह होता है कि मनुष्य अपनी बुराइयों तथा विकारों से मुक्त हो। धार्मिक क्रियाओं में निरत होना एक प्रकार से आचरण निर्माण का संकल्प है। जो व्यक्ति पूजा-पाठ करता है, उसके माध्यम से परमात्मा से संपर्क बढ़ाता है, वह उस उच्चादर्श के कारण बाध्य है कि अपनी बुराइयाँ दूर करे और गुण ग्रहण करे। जो ऐसा नहीं करता, वह उस पुण्य क्रिया से वंचित करता है और परमात्मा के उस पवित्र सम्बन्ध का अपमान करता है। ऐसी वंचक उपासना करने वाले लोग आनन्द और सुख के कल्याणकारी परिणाम से वंचित ही रहते हैं।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

🔴 जीवन वीणा की तरह है। यदि इसके तार ज्यादा कस दोगे तो वह टूट जायेगा यदि ढीले छोड़ दोगे तो उसमें से स्वर नहीं निकलेगा। जीवन को यदि विलासमय बनाओगे तो संसार की तृष्णा में फंसे रह जाओगे और यदि अत्यन्त कष्टमय बनाओगे तो जीते जी मर जाओगे अतः मध्य मार्ग अपनाओ। जब तार न ज्यादा कसे होते हैं और न ढीले होते हैं, तभी वीणा बजती है। जीवन के तार भी मध्यम स्तर पर कसो, तभी निर्वाण प्राप्त कर सकोगे।

🌹 महात्मा गौतम बुद्ध

👉 नवरात्रि साधना का तत्वदर्शन (भाग 5)

🔴 सृष्टि जितनी पुरानी है, उससे भी कहीं अधिक आयु की यह गायत्री माता है। फिर 16 साल की यह सुन्दर नयन-नक्शों वाली युवती क्यों बनायी ! अरे! हमने आपको विचार करना सिखाया कि युवा नारी के बारे में आपको पवित्र दृष्टि रखते हुए यौन शुचिता का अभ्यास करना चाहिए । आप बेहूदे हैं। नारी को बाहर के तरीके से देखते हैं । नारी में आपको माता, बहन, बेटी नहीं दिखाई पड़ती । आपको तो सब वेश्या ही वेश्या दिखाई पड़ती हैं। हम आपकी दृष्टि बदलना चाहते हैं। कामुकता प्रधान चिंतन से आपको निकालकर एक नई दृष्टि देना चाहते हैं । यही मानसिक ब्रह्मचर्य है। आपको इसका, मर्यादा का पालन करना चाहिए, यह हमने आपको सिखाया।

🔵 आप कहेंगे गुरुजी हम तो ब्रह्मचारी हैं। एक बार जेल चले गये थे, मारपीट हो गयी थी तो हम ढाई वर्ष पत्नी से दूर जेल में रहे। हाँ साहब आप तो पक्के ब्रह्मचारी हो गए। अखण्ड ब्रह्मचर्य से भारी तेजस्वी आँखों में आशीर्वाद-वरदान की क्षमता आप में आ गयी। पागल हैं न आप। ढेरों आदमी बीमार होते हैं, नपुँसक हो जाते हैं, सब ब्रह्मचारी होते हैं काहे का ब्रह्मचारी। मित्रों ! ब्रह्मचर्य चिन्तन शैली है। आपके विचारों का प्रतीक है, जो आपके जीवन में एक अंग बन गए हैं।

🔴 जो संस्कार आपके जन्म-जन्मान्तरों से चले आ रहे हैं, उनका एक रूप आपकी कुदृष्टि व विचारों की झलकी के रूप में देखने को मिलता है । किसी जमाने में आप 84 लाख योनियों में एक कुत्ते भी थे क्या? हाँ गुरुजी जरूर रहे होंगे। बढ़ते- बढ़ते तभी तो आदमी बने हैं। जब कुत्ते रहे होंगे तब आपके सामने माँ-बहन का कोई रिश्ता था? नहीं साहब हमारी माँ एक बार हमारे सामने आ गई। कुआर का महीना था। माँ और औरत में हम फर्क नहीं कर सके व उससे हमने बच्चा पैदा कर दिया। उस योनि में हमें न बेटी का ख्याल था, न बहिन का, न माँ का।

🔵 बिरादरी तो बिरादरी है उसमें भला क्या फर्क करना । आप अभी करते हैं क्योंकि आप आदमी हैं। समाज की मर्यादाओं का एक नकाब आपके ऊपर पड़ा हुआ है । यदि यह नकाब ऊपर उठा दिया जाय, आपको नंगा करके देखा जाय तो वस्तुतः आप अभी भी उस बिरादरी में हैं, जिसका मैं जिक्र कर रहा था। बार बार नाम लूँगा तो आपको बुरा लगेगा । लेकिन है कि नहीं, छाती पर हाथ रख कर देखिये।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1992/April/v1.57

👉 पूरा हुआ शक्तिपीठ की स्थापना का संकल्प

🔵 पहले मैं विभिन्न आध्यात्मिक विचारों में मत भिन्नता के कारण समझ नहीं पाता था कि किसे सही माना जाए। चमत्कारों की कहानियाँ अलग दुविधा में डालतीं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण कहता, ऐसा कैसे संभव है।

🔴 द्विविधा से घिरा अंतर्मन किसी गहरे में ऐसा कोई विश्वसनीय आधार खोज रहा था, जिसका आलम्बन लेकर आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ा जा सके। ऐसे में जब अखण्ड ज्योति पत्रिका में वैज्ञानिक अध्यात्म की विलक्षण व्याख्या मिली तो मैं सहज ही आकृष्ट होता चला गया।

🔵 पहली बार ९ दिनों का सत्र करने शांतिकुंज पहुँचा तो ऐसा प्रभावित हुआ कि जीवन दिशा ही पलट गई। फिर तो मैं गुरुदेव का ऐसा भक्त हो गया, लगता कि अपना सब कुछ उनको दे डालूँ, तो भी कम ही है। गुरुदेव को आज तक कितने ही रूपों में देखा- सभी अविस्मरणीय, सभी प्रेरक।

🔴 बात उन दिनों की है, जब पटना में शक्तिपीठ बनाने की तैयारियाँ चल रही थीं। संकल्प लिया जाना था। मथुरा से आदरणीय लीलापत शर्मा जी का लिखा हुआ पत्र देकर चितरंजन जी को हरिद्वार भेजा गया।

🔵 वे शान्तिकुञ्ज पहुँचकर गुरुदेव से मिले। संकल्प की बात सुनते ही गुरुदेव आग बबूला हो उठे। उन्होंने डाटकर कहा- किसने भेजा? डरते हुए चित्तरंजन जी ने मथुरा से लाया हुआ पत्र दिखाया। गुरुदेव उसी तरह फिर बोले- लीलापत कौन है? भाग जा। शक्तिपीठ क्या उसके बाप का है?

🔴 उसने लौटकर सारी घटना बताई। मैंने सोचा, मैं ही जाकर देखूँ, हो सकता है उस समय कुछ वैसा कारण हो गया हो। इस बार मैं स्वयं शान्तिकुञ्ज पहुँचा। सबसे पहले जाकर आद. वीरेश्वर उपाध्याय जी से मिला। उनसे सब बातें बताई और आग्रह किया कि संकल्प के लिए समय निर्धारित कराएँ।

🔵 उन्होंने गुरुदेव से भेंट कर संकल्प का समय ले लिया। अगले ही दिन का समय मिला था। सुबह- सुबह तैयार होकर मैं गया। लेकिन गुरुदेव ने मेरी तरफ देखा तक नहीं। मेरे साथ उपाध्याय जी भी थे। मैंने उनकी तरफ देखा। वे भी हैरान थे। काफी समय बीत गया, तो उन्होंने गुरुदेव का ध्यान आकृष्ट कराया- ये संकल्प के लिए आए हैं। गुरुजी ने बिना मेरी ओर देखे ही दो- टूक जवाब दिया- संकल्प नहीं होगा। इतना कहकर वे मौन हो गए।

🔴 असमंजस की मनःस्थिति में वापस लौटा। मैंने उपाध्याय जी से पूछा- कैसा टाइम लिया था आपने? वे कहते तो क्या कहते। वे खुद ही हैरत में थे।

🔵 मैं समझ नहीं पा रहा था कि अब आगे क्या करूँ। लौट जाऊँ या एक बार फिर प्रयास करके देखूँ। अगर बिना संकल्प किए लौटना पड़ा, तो लौटकर लोगों को क्या जवाब दूँगा? सच- सच बता भी दूँ, तो जब संकल्प के लिए मना करने का कारण पूछा जाएगा तो क्या कहूँगा? लोग तो यही सोचेंगे कि मेरी ही तरफ से कोई लापरवाही बरती गई होगी।

🔴 पूज्य गुरुदेव द्वारा शक्तिपीठ स्थापना के लिए इस कठोरता से मना करने के कारणों तक पहुँचने के लिए मैं बेचैन हो उठा। शुरू से आखिर तक के सभी प्रयासों की समीक्षा की, फिर आत्मविश्लेषण की दृष्टि से अपने आपको टटोला कि शायद मुझ में ही संकल्प की पात्रता न हो, जिसके कारण कार्य में बाधा आ रही हो।

🔵 गुरुदेव के क्रोध का कारण मैं हो सकता हूँ। यह सोचकर मेरा अन्तर्मन विचलित हो उठा। मन ही मन उनसे अनुनय विनय करने लगा कि कोई गलती हुई हो तो बता दीजिए। मुझे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है। मुझे बहुत दुःखी देखकर उपाध्याय जी ने समझाया- निराश मत होइए। अभी संकल्प का समय नहीं आया है, बाद में देखा जाएगा। अगले दिन मैं उदास मन से वापस पटना लौट आया।

🔴 करीब डेढ़ महीने बाद माताजी की बात से पूज्य गुरुदेव द्वारा संकल्प को कठोरतापूर्वक रोके जाने का रहस्य खुला। मेरे वापस जाने के बाद गुरुदेव ने कहा था कि उस समय संकल्प लेने से मेरे जीवन पर और शक्तिपीठ पर खतरा आ जाता।

🔵 मैं समझता हूँ, उस समय विरोध भाव रखने वाले कुछ व्यक्ति स्थानीय स्तर पर इतने अधिक प्रभावशाली थे कि भिड़ने की स्थिति भी बन सकती थी। आधिभौतिक दृष्टि से तो मैं इतना ही देख सका। इसके अलावा जो आधिदैविक और आध्यात्मिक अड़चनें रही होंगी, उनको तो गुरुदेव ही जानें।                   
  
🌹 मधेश्वर प्रसाद सिंह आई.ए.एस से.नि. पटना (बिहार)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Wonderful/pura

रविवार, 2 अप्रैल 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 3 April 2017


👉 अक्का महादेवी- जिसने वासना पर विजय पाई

🔵 कर्नाटक प्रांत के एक छोटे-से ग्राम उद्रुतडी में एक साधारण गृहस्थ के घर एक कन्या ने जन्म लिया-अक्का महादेवी उसका नाम रखा गया।

🔴 अक्का को उनके पिता श्री निर्मल ने संस्कृत की शिक्षा दिलाई। उससे धार्मिक संस्कार बल पा गए, उनके मन मे आध्यात्मिक जिज्ञासाएँ जोर पकड़ गई, उन्होंने सत्य की शोध का निश्चय कर लिया और उसी के फलस्वरूप वे ईश्वर-भक्ति, साधना और योगाभ्यास में लग गई।

🔵 आज हमें पाश्चात्य सभ्यता बंदी बना रही है। उन दिनों भारतवर्ष में मुस्लिम संस्कृति और सभ्यता की आँधी आई हुई थी। मुसलमान शासकों की दमन नीति से भयभीत भारतीय अपने धर्म अपनी संस्कृति को तेजी से छोड़ते जा रहे थे। ऐसे लोग थोडे़ ही रह गये जिनके मन में इस धार्मिक अवसान के प्रति चिंता और क्षोभ रहा हो, जिन्होंने अपने धर्म और संस्कृति के प्रति त्याग भावना का प्रदर्शन किया हो।

🔴 अक्का महादेवी-एक साधारण-सी ग्राम्य बाला ने प्रतिज्ञा की कि वह आजीवन ब्रह्मचारिणी रहकर, ईश्वर उपासना और समाज सेवा में रत रहकर अपने धार्मिक गौरव को बढायेगी।

🔵 अक्का का सौंदय वैसे ही अद्वितीय था, उस पर संयम और सदाचार की तेजस्विता की कांति सोने में सुहागा बन गई। उनके सौदर्य की तुलना राजकुमारियों से की जाने लगी।

🔴 तत्कालीन कर्नाटक के राजा कौशिक को अक्का महादेवी के अद्वितीय सौदर्य का पता चला तो उनके सामने विवाह का प्रस्ताव रखा। साधारण लोगों ने इसे अक्का का महान् सौभाग्य समझा पर अक्का ने उस प्रलोभन को भगवान् की उपस्थित की हुई परीक्षा अनुभव की। उन्होंने विचार करके देखा-सांसारिकता और धर्म-सेवा दोनों बातें एक साथ नहीं चल सकती। भोग और योग में कोई संबंध नहीं। यदि अपनी संस्कृति को जीवन देना है तो सांसारिक सुखोपभोग को बढ़ाया नहीं जा सकता।

🔵 इच्छाओं को बलिदान करके ही उस लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है। यह विचार आते ही उन्होने कौशिक का प्रस्ताव ठुकरा दिया।

🔴 जिनके उद्देश्य छोटे और तृष्णा-वासनाओं से घिरे हुए हों, वह बेचारे त्याग तपश्चर्या का महत्त्व क्या जान सकते हैं, कौशिक ने इसे अपना अपमान समझा। उसने अक्का के माता-पिता को बंदी बनाकर कारागार में डलवाकर एक बार पुन: संदेश भेजा- ''अब भी संबंध स्वीकार कर लो अन्यथा तुम्हारे माता-पिता का वध कर दिया जायेगा। ''

🔵 अक्का ने विचार किया-लोक में अपने माता-पिता, भाई-बंधु भी आते है। सबके कल्याण की बात सोंचें तो उनके ही कल्याण को क्यों भुलाऐं ? सचमुच यह बडा सार्थक भाव था उसे भुलाने का भाव ही पलायनवाद के रूप में इस देश में पनपा तो भी उन्होंने सूझ से काम लिया-इन्होंने एक शर्त पर प्रस्ताव स्वीकार कर लिया कि वह समाज-सेवा, संयम और साधना का परित्याग न करेगी। कौशिक ने यह बात मान ली।

🔴 विवाह उन्होंने कर लिया पर अपनी निष्ठा से अपने कामुक पति को बदलकर संत वना दिया। अक्का और कौशिक दोनों ने मिलकर अपने धर्म, अपनी संस्कृति का सर्वत्र खूब प्रसार किया, उसी का यह फल है कि कर्नाटक प्रांत अभी भी पाश्चात्य सभ्यता के बुरे रंग से बहुत कुछ बचा हुआ है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे

👉 उपासनाएँ सफल क्यों नहीं होतीं? (भाग 2)

🌹 नवरात्रि साधना के संदर्भ में विशेष -

🔴 भगवान और देवता कहाँ हैं? किस स्थिति में हैं? उनकी शक्ति कितनी है? इस तथ्य का सही निष्कर्ष यह है कि यह दिव्य चेतनसत्ता निखिल विश्वब्रह्माण्ड में व्याप्त है और पग-पग पर उनके समक्ष जो अणु-गति जैसी व्यस्तता के कार्य प्रस्तुत हैं, उन्हें पुरा करने में संलग्न हैं। उनके समक्ष असंख्य कोटि प्राणियों की, जड़-चेतन की बहुमुखी गतिविधियों को सँभालने का विशाल काय काम पड़ा है, सो वे उसी में लगी रहती हैं एक व्यवस्थित नियम और क्रम उन्हें इन ग्रह-नक्षत्रों की तरह कार्य संलग्नक रखता है।

🔵 व्यक्तिगत संपर्क में घनिष्ठता रखना और किसी की भावनाओं के उतार-चढ़ाव की बातों पर बहुत ध्यान देना उनके लिए समग्र रूप से सम्भव नहीं। वे ऐसा करती तो हैं, पर अपने एक अंश प्रतिनिधि के द्वारा। दिव्यसत्ताओं ने हर मनुष्य के भीतर उसके स्थूल-सूक्ष्म-कारण-शरीरों में अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश, आनन्दमय कोश जैसे आवरणों में अपना एक-एक अंश स्थापित किया हुआ है और यह अंश प्रतिनिधि ही उन व्यक्ति की इकाई को देखता-सँभालता है। वरदान आदि की व्यवस्था इसी प्रतिनिधि द्वारा सम्पन्न होती है।

🔴 व्यक्ति की अपनी निष्ठा, श्रद्धा, भावना के अनुरूप ही यह देव अंश समर्थ बनते हैं। या दुर्बल रहते हैं। एक साधक की निष्ठा में गहनता और व्यक्तित्व में प्रखरता हो, तो उसका देवता समुचित पोषण पाकर अत्यन्त समर्थ दृष्टिगोचर होगा और साधक ही आशा-जनक सहायता करेगा। दूसरा साधक आत्मिक विशेषताओं से रहित हो तो उसके अंतरंग में अवस्थित देव अंश पोषण के अभाव में भूखा, रोगी, दुर्बल बनकर एक कोने में कराह रहा होगा। पूजा भी नकली दवा की तरह भावना-रहित होने से उस देवता को परिपुष्ट न बना सकेगी और वह विधिपूर्वक मंत्र-जप आदि करते हुए भी समुचित लाभ न उठा सकेगा।

🔵 विराट बाह्य कितना ही महान क्यों न हो, व्यक्ति की इकाई में वह उस प्राणी की परिस्थिति में पड़ा हुआ लगभग उससे थोड़ा ही अच्छा बनकर रह रहा होगा। अन्तरात्मा की पुकार निश्चित रूप से ईश्वर की वाणी है, पर वह हर अन्तःकरण में समान रूप में प्रबल नहीं होती। सज्जन के मस्तिष्क में मनोविकारों का एक झोंका घुस जाएँ, तो भी उसकी अन्तरात्मा प्रबल प्रतिकार के लिए उठेगी और उसे ऐसी बुरी तरह धिक्कारेगी कि पश्चाताप ही नहीं प्रायश्चित किये बिना भी चैन न पड़ेगा। इसके विपरीत दूसरा व्यक्ति जो निरन्तर क्रूर-कर्म ही करता रहता है, उनकी अन्तरात्मा यदाकदा बहुत हलका-सा प्रतिवाद ही करेगी और वह व्यक्ति उसे आसानी से उपेक्षित करता रहेगा।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 उपासना के तत्व दर्शन को भली भान्ति हृदयंगम किया जाय (भाग 1)

🔵 साधना विधान का महत्वपूर्ण अंग है– उपासना। विडंबना यह है कि इस सम्बन्ध में जितने भ्रम−जंजाल फैले हैं उतने साधनादि अन्यान्य विषयों में नहीं। उपासना का दर्शन समझे बिना मात्र कर्मकाण्डों में उलझना एक प्रवंचना मात्र ही है। बहुसंख्य साधकों के साथ होता भी यही है। ऐसे व्यक्ति डींग तो बड़ी लम्बी−चौड़ी हाँकते हैं पर उपासना का कोई परिणाम उनके चिन्तन−चरित्र व्यवहार में परिलक्षित होता दीख नहीं पड़ता। लगता है या तो वह आधार गलत है जिस पर उपासना की गयी अथवा उपासना फलदायी होती ही नहीं। असफलता मिलने पर बहुतायत ऐसों की ही होती है जो अपने को नहीं, दोष दैव को−भाग्य को−देते देखे जाते हैं। प्रत्यक्ष मार्गदर्शन के अभाव में तथा श्रुतियों के भ्रम−जंजालों के कारण भोले साधना पारायण व्यक्ति भी इस विडंबना से ग्रस्त दुःखी होते देखे जाते हैं।

🔴 उपासना को सही अर्थों में समझाना हो तो पहले उसके अर्थ पर एक दृष्टि डाली जाय। उपासना अर्थात् उप−आसन। समीप बैठना। ईश्वर उपासना का अर्थ है ईश्वर का सामीप्य पाना– ईश्वर अर्थात् सद्.गुणों का समुच्चय आदर्शों से ओत−प्रोत परम सत्ता। ऐसी सत्ता जिसका वरण कर हम श्रेष्ठ बन सकें– वर्तमान स्थिति से स्वयं को ऊँचा उठा सकें। ईश्वर और जीवों में यों समीपता तो है, पर है वह उथली। जीव की सार्थकता तभी है जब उसका स्वरूप एवं स्तर भी उसी के अनुरूप ऊँचा उठे। शिश्नोदर परायण जीवन जीते हुए मनुष्य अपनी आस्थाओं को– आकाँक्षाओं को–दिव्य नहीं बना सकता। फिर तो उसे नर–कीट या नर–पशु ही कहना उचित होगा। कायिक विकास तो सभी कर लेते हैं, पर चेतना की दृष्टि से विकास न हो सका, ईश्वर का सामीप्य पाने की पात्रता न बन सकी तो आयु की दृष्टि से प्रौढ़ होते हुए भी ऐसे व्यक्ति अविकसित ही कहे जाएँगे।

🔵 पिछली योनियों की निकृष्टताओं से अपना पीछा छुड़ाने के लिये ही उपासना का, ईश्वर की समीपता का उपक्रम अपनाया जाता है। संगति का−समीप बैठने का– महत्व सर्वविदित है– चन्दन के समीप बहने वाली सुगन्धित पवन आस−पास के वृक्षों को भी वैसा ही सुरभित बना देती है। टिड्डा हरी घास में रहता है तो उसका शरीर वैसा ही हो जाता है और जब सूखी घास में रहता है तो पीला पड़ जाता है। महामानवों का सामीप्य पाने वाले उनकी शक्ति से–संगति से– लाभान्वित होते, उन्हीं गुणों से ओत−प्रोत होते देखे जाते हैं। महात्मा गाँधी एकाकी सत्ता के रूप में विकसित हुए पर इस वट वृक्ष के नीचे पलने – बढ़ने वाले पटेल, जवाहर, लाल बहादुर बने। यह संगति का सामीप्य का ही प्रतिफल है। कीट−भँगी का तद्रूपता का उदाहरण सुप्रसिद्ध है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 -अखण्ड ज्योति – मार्च 1982 पृष्ठ 2

👉 नवरात्रि साधना का तत्वदर्शन (भाग 4)

🔴 मित्रों! मैं आपको इस नवरात्रि अनुष्ठान के बारे में बताते हुए मूलभूत सिद्धान्तों की समीक्षा कर रहा था। यहाँ हमने आपको दबोचा है क्यों? क्योंकि आप अपने सोचने के तरीके से लेकर रहन-सहन, आहार-विहार के तरीकों को जब तक इस गलत प्रकार से अख़्तियार किये रहेंगे, सुधार और हेर फेर नहीं करेंगे तब तक आपकी एक भी समस्या हल नहीं होने वाली। नहीं गुरुजी! आप तो वरदान-आशीर्वाद देते हैं। सिद्ध पुरुष हैं। हाँ। हम वरदान भी देते हैं और आशीर्वाद भी। लोगों को चमत्कार भी दिखा देते हैं, यह बात भी सही है। पर हम देते उन्हीं को हैं जो अपनी सहायता स्वयं करते हैं, पहले अपने आपको ठीक करने के लिए एक कदम आगे बढ़ाते हैं।

🔵 चमत्कार तो सिरदर्द के लिए एस्पीरिन की दवा की तरह है। आप ठीक हो जाते हैं? नहीं, आप तब तक ठीक नहीं हो सकते, जब तक पेट ठीक नहीं करेंगे। टाइमली रिली फहम देते हैं पर ताकत तो ठीक होने की अंदर से उभारनी पड़ेगी। खून हम बाहर का आपको इसलिए लगाते हैं ताकि आपका अपना सिस्टम काम करना आरंभ कर दे। वरदान-चमत्कार किसी को परावलम्बी बनाने के लिए नहीं, उसे सहारा देने के लिए ताकि वह अपने पैरों पर खड़ा हो सके।

🔴 नवरात्रि अनुष्ठान में यही अध्यात्म के मूलभूत सिद्धान्त मैंने आपको समझाने का प्रयास किया कि आप अपने पैरों पर खड़ा होना सीखिए। अपने चिन्तन और व्यवहार को यही ढंग से रखना सीखिए। आपकी अब तक की जिन्दगी वहमों में बीत गयी। अब उनसे मुक्ति पाना सीखिए। अपने आपको दबोचना सीखिए यह नवरात्रि अनुष्ठान का तपश्चर्या वाला हिस्सा है, जिससे हमने आपको अपने आप पर नियंत्रण करना सिखाया। यह बताया कि कम खाने से शरीर का कोई नुकसान नहीं बल्कि लाभ ही होता है। इसलिए आपको आदतें बदलकर उपवास करना सिखाया, अस्वादव्रत समझाया। आध्यात्मिक प्रगति के रास्ते का यह पहला कदम है।

🔵 आहार संयम के बाद हमने आपको कहा था कि आपको विचारों पर संयम रखना आना चाहिए। आपको ब्रह्मचर्य से रहना चाहिए। गायत्री माता का फोटो आपने रखा था अपने सामने व उसी की आरती रोज करते रहे। क्यों कभी सोचा आपने! मूर्ति क्यों रखी है, सोचा आपने? बताइए इस चित्र व मूर्ति को देखकर कि इसकी उम्र कितनी होनी चाहिए? आपने देखा कि वह बीस साल की जवान युवती जैसी है। अस्सी साल की बुढ़िया तो नहीं है? नहीं गुरुजी वह तो उठती उम्र की जवान षोडशी दिखती है। आपका ख्याल ठीक है यह हमने जानबूझ कर बनाई है। गायत्री माता की असली उम्र तो न जाने कितनी होगी। उस उम्र की आप कल्पना भी नहीं कर सकते।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1992/April/v1.56

👉 गुरुकार्य में साधनों की कमी नहीं रहती

🔵 आँवलखेड़ा में अर्ध महापूर्णाहुति का कार्यक्रम शुरू होने वाला था। निर्धारित समय से दो सप्ताह पूर्व हम आँवलखेड़ा गुरु ग्राम पहुँचे। कबीर नगर में आवास मिला। अगले दिन जितेन्द्र रघुवंशी भाई साहब ने उस आवास में ठहरे हुए सभी भाई बहिनों की गोष्ठी ली। वहाँ जौनपुर (उ.प्र.) के चौदह भाई एक साथ बैठे थे। मुझे जौनपुर के भाइयों के साथ टोली नायक बनाकर आगरा से पन्द्रह- बीस किलोमीटर दक्षिण उस स्थान पर जाने के लिए कहा गया, जहाँ से आँवलखेड़ा मार्ग जाता है। दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान से आने वाली बसें उसी स्थान से होकर गुजरती हैं।

🔴 हम सभी को वहाँ जाने हेतु एक जीप मिली थी। आगरा के भाई प्रमोद अग्रवाल जी के यहाँ से नाश्ते का पैकेट प्राप्त कर वहाँ जाना था। जिसमें हरियाणा, राजस्थान से आने वाले भाइयों- बहिनों को नास्ता कराकर आँवलखेड़ा के लिए मार्गदर्शन करना था। हम सभी भाई आगरा के अग्रवाल जी से एक दूसरी गाड़ी में ३५००० नाश्ते का पैकेट प्राप्त कर गन्तव्य स्थान में पहुँचे। दो पक्के कमरे सड़क के बगल में बने हुए थे। एक कमरे में नाश्ते के पैकेट रखे और एक में हम सभी ने अपने ठहरने विश्राम करने का स्थान बनाया। ४ बजे संध्या से अपना- अपना दायित्व सम्भाल लिया।

🔵 चार भाइयों को नाश्ता हेतु बैठाने, चार को आने वाली बसों, गाड़ियों को रुकवाने, चार को नाश्ता लाने और दो भाइयों को यज्ञ स्थल जाने वालों के मार्गदर्शन का कार्य सौंपा गया। आने वाले भाइयों की संख्या और बस (गाड़ी) नं० रजिस्टर में दर्ज करने की जिम्मेवारी मैंने ली। तीसरे दिन शाम ४ बजे तक नाश्ते के पैकेट समाप्त होने लगा। एक भाई ने भण्डार गृह से आकर मुझे बतलाया- भाई साहब अब नाश्ते का लगभग दो ढाई हजार पैकेट बचे हुए हैं। मैंने राम प्रसाद गुप्ता जी को भेजकर अग्रवाल जी के यहाँ से ३५ हजार पैकेट और मँगवा लिए।

🔴 अगले दिन पुनः पैकेट घटने की सूचना पाकर मैंने गुप्ता जी को आगरा भेज दिया। लगभग ६ बजे शाम भण्डार गृह से दो भाइयों ने आकर बताया कि सौ डेढ़ सौ और पैकेट बचे हैं। उधर गुप्ता जी खाली हाथ लौट आए और बताया कि अग्रवाल भाई साहब ने हमें आगरा बुलाया है। हम ऐसी परिस्थिति के लिए कतई तैयार नहीं थे। नाश्ता समाप्त हो चला है। इतने लोगों को भूखे रखना पड़ेगा, सोचते ही खून सूखने लगा।

🔵 इतने में भण्डार गृह के दोनों भाई मुझे और राम प्रसाद जी को बुलाकर ले गए ताकि परिस्थिति को हम सही रूप में जान सकें। भण्डार गृह पहुँचे तो वहाँ का दृश्य देखकर हम अवाक रह गए। कमरे में पैकेटों का अंबार लगा था। हम सभी की आँखों में आँसू आ गए। हे गुरु देव! आपने समय पर लाज रख ली। उसी दिन हमने इस बात को अनुभव किया कि गुरु देव के काम में कभी साधनों की कमी नहीं रहती।                   
  
🌹 परशुराम गुप्ता, पूर्वी जोन, शांतिकुंज (उत्तराखण्ड)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
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शनिवार, 1 अप्रैल 2017

👉 आज का सद्चिंतन 2 April 2017


👉 आज का सद्चिंतन 2 April 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 April 2017


👉 रवींद्र की काव्य-साधना-गीतांजलि

🔴 आठ-नौ साल की आयु के रवींद्रनाथ को जब स्कूल में पढ़ने को भेजा गया तो शीघ्र ही एक दिन वहाँ से लौटने पर उन्होंने कहा- पिताजी मैं कल से स्कूल में पढ़ने नहीं जाऊंगा। वह तो कारागार है। वहाँ बालकों को दंड दिया जाता है, उन्हें बेंचों पर खडा कर दिया जाता है और फिर उन पर कक्षा की सभी स्लेटों का बोझ लाद दिया जाता है और फिर वहाँ कोई आकर्षण भी तो नहीं है। वही डेस्क, वही बेंच, सुबह से शाम तक एक-सी ही बातें होती रहती हैं।

🔵 पिता ने पुत्र की व्यथा को समझ लिया और शिक्षकों से कह दिया- यह बालक पढने के लिए पैदा नहीं हुआ। हम स्कूल वालों को जो वेतन देते हैं, वह केवल इसलिये है कि यह वहाँ बैठा रहे।'' पुस्तकों को याद करने और रटने के बजाय बाल्यावस्था में रविबाबू अपने विशाल भवन के एक बरामदे में रखी हुई पुरानी पालकी में घुसकर बैठ जाते। उस अँधेरे स्थान में पहुँचकर वे कल्पनाओं में निमग्न हो जाते। उस अवस्था में उनकी पालकी सैकडों कहारों के कंधों पर लदी हुई अनेक वन, पर्वतों को पार करती पृथ्वी के एक छोर से दूसरे छोर तक जा पहुँचकर स्थल का मार्ग समाप्त हो जाता और कहार कहने लगते है- अब आगे रास्ता नहीं है, अन्नदाता! सब तरफ जल ही जल ही दीख पड़ता है।'' पर बालक रवींद्र कल्पना की उडान में कब मानने वाला था ? उसकी पालकी असीम जलराशि पर तैरने लगती। कितनी ही प्रचंड लहरें पालकी से टकराती कितने ही भीषण तूफान आते, किंतु उसकी पालकी बराबर आगे बढ़ती हुई उस पार पहुँच जाती। उस प्रदेश के सुंदर भवन, बाग, संगीत और गान-वाद्य की स्वर लहरी नृत्य आदि उसे आनंद विभोर कर देते। वह स्वयं भी मस्त होकर कुछ गुनगुनाने लगता।

🔴 और कुछ साल बाद वास्तव में ऐसा समय आया जब बाल्यावस्था का स्वप्न साकार होने लगा। कवि अपनी रचनाओं के बल पर जहाज रूपी पालकी द्वारा योरोप, अमरीका तक जा पहुँचे, वहाँ के बडे-बडे विद्वानों, गुणवानों, श्रीमानों ने आपका स्वागत-सत्कार बडे प्रेम से किया। वहाँ के नर-नारी आपकी प्रतिभा और अपूर्व सौंदर्य पर मुग्ध हो गये और सैकड़ों विशाल सभाओं और गोष्ठियों में उन देशों के सर्वोत्तम संगीत और कला-प्रदर्शन द्वारा आपका स्वागत किया गया। धार्मिक जनों को आप ईसाइयों के किसी प्राचीन संत की तरह जान पडते थे और वे बड़ी श्रद्धा से आपके चोगे (लबादा) का दामन चूमने लगते थे।

🔵 कवि जब अपनी "गीतांजलि" की कविताओं को गाकर सुनाने लगते तो श्रोता मुग्ध होकर भाव-विभोर हो जाते और चारों तरफ से रवि बाबू पर साधुवादों की वर्षा होने लगती। अंत में वहाँ का विद्वान् समाज इनकी बहुमुखी प्रतिभा और योग्यता से इतना प्रभावित हुआ कि उस महाद्वीप का सर्वश्रेष्ठ समझा जाने वाला सवा लाख डॉलर का "नोबल पुरस्कार" "गीतांजलि" के उपलक्ष्य में उन्हीं को प्रदान किया गया। कलकत्ता विश्वविद्यालय ने विद्या की सबसे बडी़ उपाधि डी० लिट० (डॉक्टर आफ लिटरेचर) प्रदान की और समस्त देश ने एक स्वर से उनको "विश्वकवि" घोषित कर दिया। "गीतांजलि'' की महिमा-गान करते हुए कहा गया-

🔴 'यह आध्यात्मिक भावनाओं का सार है। इसमें वैष्णव कवियों की प्रेम भावना का अनुपम सम्मिश्रण है। उपनिषदों के सारगर्भित विचारों का इसमें बड़ी मार्मिकता से समावेश किया गया है और बताया गया है कि जो मनुष्य संपूर्ण प्राणियों में ईश्वर को देखता है। वह कभी न तो पाप कर सकता है और न पाप से प्रभावित हो सकता है। ऐसे व्यक्ति को मृत्यु तक का भय नहीं जान पडता, क्योंकि भगवान् को अपने अंतर में देख लेने पर वह अमर जीवन हो जाता है। आज भी गीतांजलि से यही वाणी मुखरित हो रही है।

 🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ ११६, ११७

👉 उपासनाएँ सफल क्यों नहीं होतीं? (भाग १)

🌹 नवरात्रि साधना के संदर्भ में विशेष -

🔴 स्वाति के जल से मोती वाली सीपें ही लाभान्वित होती हैं। अमृत उसी को जीवन दे सकता है, जिसका मुँह खुला हुआ हैं। प्रकाश का लाभ आँखों वाले ही उठा सकते हैं। इन पात्रताओं के अभाव में स्वाति का जल, अमृत अथवा प्रकाश कितना ही अधिक क्यों न हो, उससे लाभ नहीं उठाया जा सकता। ठीक वहीं बात देव-उपासना के सम्बन्ध में लागू होती है। घृत-सेवन का लाभ वही उठा सकता है, जिसकी पाचनक्रिया ठीक हो, देवता और मंत्रों का लाभ वे ही उठा पाते हैं, जिन्होंने अपने व्यक्तित्व को भीतर और बाहर से विचार और आचार से परिष्कृत बनाने की साधना कर ली है। औषधि का लाभ उन्हें ही मिलता है, जो बताये हुए अनुपात और पथ्य का भी ठीक तरह प्रयोग करते हैं। अतः पहले आत्म-उपासना फिर देव - उपासना की शिक्षा ब्रह्मविद्या के विद्यार्थियों को दी जाती रही है।

🔵 लोग उतावली में मंत्र और देवता के, भगवान और भक्ति के पीछे पड़ जाते हैं, इससे पहले आत्मशोधन की आवश्यकता पर ध्यान ही नहीं देते फलतः उन्हें निराश ही होना पड़ता है। बादल कितना ही जल क्यों न बरसाए, उसमें से जिसके पास जितना बड़ा पात्र है, उसे उतना ही मिलेगा। निरंतर वर्षा होते रहने पर भी आँगन में रखे हुए पात्रों में उतना ही जल रह पाता है, जितनी उनमें जगह होती है। अपने भीतर जगह को बढ़ाये बिना कोई बरतन बादलों से बड़ी मात्रा में जल प्राप्त करने की आशा नहीं कर सकता, देवता और मंत्रों से लाभ उठाने के लिए भी पात्रता नितान्त आवश्यक है।

🔴 गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से, आचरण और चिंतन की दृष्टि से यदि मनुष्य उत्कृष्टता और आदर्शवादिता से अपने को सुसम्पन्न कर लें तो उनके कषाय-कल्मषों की कालिमा हट सकती है और अन्तःकरण तथा व्यक्तित्व शुद्ध, स्वच्छ, पवित्र एवं निर्मल बन सकता है। ऐसा व्यक्ति मंत्र, उपासना, तपश्चर्या का समुचित लाभ उठा सकता है और देवताओं के अनुग्रह का अधिकारी बन सकता है। जब तक यह पात्रता न हो तब तक उत्कृष्ट वरदान माँगने की दूरदर्शिता ही उत्पन्न होगी और साधना के पुरुषार्थ से कुछ भौतिक लाभ भले ही मिल जाएँ, देवत्व का एक कण भी उसे प्राप्त न होगा और आसुरी भूमिका पर कोई सिद्धि मिल भी जाए, तो अन्ततः उसके लिए घातक ही सिद्ध होगी।

🔵 असुरों की साधना और उसके आधार पर मिली हुई सिद्धियों से उनका अन्ततः सर्वनाश ही उत्पन्न हुआ। अध्यात्म−विज्ञान का समुचित लाभ लेने के लिए साधक का अन्तःकरण एवं व्यक्तित्व कितना निर्मल होगा, उतनी ही उसकी उपासना सफल होगी। धुले हुए कपड़े पर रंग आसानी से चढ़ता है, मैले पर नहीं। स्वच्छ व्यक्तित्व सम्पन्न साधक किसी भी पूजा उपासना का आशाजनक लाभ सहज ही प्राप्त कर सकता है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉अजस्र अनुदानों को बरसाने वाली यह नवरात्रि-साधना

🔵 अनुष्ठान के अंतर्गत साधक संकल्पपूर्वक नियत संयम-प्रतिबन्धों एवं तपश्चर्याओं के साथ विशिष्ट उपासना पद्धति को अपनाता है और नवरात्रि के इन महत्वपूर्ण क्षणों में अपनी चेतना को परिष्कृत-परिशोधित करते हुए उत्कर्ष की दिशा में आगे बढ़ता है। चौबीस हजार के लघु गायत्री अनुष्ठान के अंतर्गत उपासना के क्रम में प्रतिदिन 27 माला गायत्री महामंत्र के जप का विधान है। जो अपनी गति के अनुसार तीन से चार घण्टे में पूरा हो जाता है। यदि कोई नवागन्तुक पूरा गायत्री मंत्र बोलने में असक्षम हो तो वह पंचाक्षरी गायत्री-’ॐ भूर्भुवः स्वः’ के साथ भी इस जप संख्या को पूरी कर सकता है। इसमें प्रतिदिन एक घण्टा समय लगता है। पूर्ण श्रद्धा के साथ सम्पन्न यह साधना आत्मोत्कर्ष की दृष्टि से चमत्कारिक रूप से फलित होती है, क्योंकि गायत्री परम सतोगुणी, शरीर-प्राण व अन्तःकरण में दिव्य तत्वों का, आध्यात्मिक विशेषताओं का अभिवर्धन करने वाली महाशक्ति है। यही आत्मकल्याण का राजमार्ग है।

🔴 यहाँ मन में असमंजस की स्थिति आ सकती है कि नवरात्रि को दुर्गा उपासना से जोड़कर रखा गया है फिर गायत्री अनुष्ठान का उससे क्या सम्बन्ध है। वास्तव में दुर्गा महाकाली भी गायत्री महाशक्ति का ही एक रूप है। दुर्गा कहते हैं- दोष-दुर्गुणों, कषाय-कल्मषों को नष्ट करने वाली महाशक्ति हो। नौ रूपों में माँ दुर्गा की उपासना इसलिए की जाती है कि वह हमारी इन्द्रिय चेतना में जड़ जमा चुके दुर्गुणों को नष्ट कर दें। मनुष्य की पापमयी वृत्तियां ही महिषासुर हैं। नवरात्रियों में उन्हीं प्रवृत्तियों पर मानसिक संकल्प द्वारा अंकुश लगाया तथा संयम द्वारा दमन किया जाता है। संयमशील आत्मा को ही दुर्गा, महाकाली, गायत्री की शक्ति से सम्पन्न कहा गया है। प्राण चेतना के परिष्कृत होने पर यही शक्ति महिषासुर मर्दिनी बन जाती है।

🔵 नवरात्रि अनुष्ठान में उपासना के अंतर्गत मन को उच्चतर दिशा की ओर प्रवाहमान बनाये रखने के लिए जप के साथ ध्यान की प्रक्रिया को सशक्त बनाया जाता है। साकार उपासना सूर्य मध्यस्थ गायत्री या गुरु सत्ता का तथा निराकार उपासक सूर्य एवं इससे निस्सृत किरणों के रूप में गायत्री शक्ति का ध्यान करते हैं। वैसे भावभूमि बनने पर मातृभाव में ध्यान तुरन्त लग जाता है, जप स्वतः ओठों पर चलता रहता है। उँगलियों में माला के मनके बढ़ते रहते हैं और ध्यान मातृसत्ता के अनन्त स्नेह व ऊर्जा पाते रहने के तथा अनन्त ऊर्जा देने वाले पयपान की ओर लगा रहता है। इस अवधि में आत्मचिंतन विशेष रूप से करना चाहिए। मन को चिंताओं से जितना खाली रखा जा सके, अस्त- व्यस्तता से जितना मुक्त रखा जा सके, रखना चाहिए। आत्मचिंतन में अब तक के जीवन की समीक्षा करते हुए, भूलों को समझने व प्रायश्चित द्वारा उनके परिशोधन की रूपरेखा बनानी चाहिए। वर्तमान जीवन क्रम में वाँछित उत्कृष्टता एवं श्रेष्ठता के समावेश का दृढ़तापूर्वक संकल्प करना चाहिए।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 नवरात्रि अनुशासन

🔵 उपवास का तत्वज्ञान आहार शुद्धि से सम्बन्धित है, “जैसा खाये अन्न वैसा बने मन” वाली बात आध्यात्मिक प्रगति के लिए विशेष रुप से आवश्यक समझी गई हैं। इसके लिए न केवल फल, शाक, दूध जैसे सुपाच्य पदार्थो को प्रमुखता देनी होगी, वरन् मात्र चटोरेपन की पूर्ति करने वाली मसाले तथा खटाई, मिठाई, चिकनाइ्र की भरमार से भी परहेज करना होगा। यही कारण है कि उपवासों से भी परहेज करना होगा। यही कारण हैं कि उपवासों की एक धारा, ‘अस्वाद व्रत’ भी हैं।

🔴 साधक सात्विक आहार करें और चटोरेपन के कारण अधिक खा जाने वाली आदत से बचें, यह शरीरगत उपवास हुआ। मनोगत यह है कि आहार को प्रसाद एवं औषधि की तरह श्रद्धा भावना से ग्रहण किय जाए और उसकी अधिक मात्रा से अधिक बल मिलने वालों की प्रचलित मान्यता से पीछो छुड़ाया जाए। वस्तुतः आम आदमी जितना खाता है उससे आधे में उसका शारीरिक एवं मानसिक परिपोषण भली प्रकार हो सकता हैं। एक तत्व ज्ञानी का यह कथन अक्षरशः सत्य है कि “आधा भोजन हम खाते हैं और शेष आधा हमें खाता रहता हैं।” लुकमान कहते थे कि-”हम रोटी नहीं खाते-रोटी हमें खाती है।” इन उक्तियों में संकेत इतना ही है कि शारीरिक और मानसिक स्वस्थ्य का महत्व समझने वालों को सर्वभक्षी नहीं स्वल्पाहारी होना चाहिए। नवरात्रि उपवास में इस आदर्श को जीवन भर अपनाने का संकेत हैं।

🔵 आध्यात्मिक दृष्टि से पौष्टिक एवं सात्विक आहार वह है जो ईमानदारी और मेहनत के साथ कमाया गया है। उपवास का अपना तत्वज्ञान है। उसमें सात्विक खाँद्यों का कम मात्रा में लेना ही नहीं, न्यायोपार्जित होने की बात भी सम्मिलित है। इतना ही नहीं उसी सिलसिले में एक और बात भी आती है कि इस प्रकार आत्म संयम बरतने से जा बचत होती है उसका उपयोग परमार्थ प्रयोजनों में होना चाहिए न कि संचय करके अमीर बनने में। यहीं कारण हैं कि जहाँ नवरात्रि अनुष्ठानों मं उपवास करकें जो कुछ बचाया जाता हैं उसे पूर्णाहुति के अन्तिम दिन ब्रह्मभोज में खर्च कर दिया जाता है।

🔴 ब्रह्मभोज अर्थात् सत्कर्मो का परिपोषण। प्राचीन काल में एक वर्ग ही इस प्रयोजन में रहता था, अस्तु उसका निर्वाह एवं अपनाई हुई प्रवृत्तियों का व्यवस्थाक्रम मिलाकर जो आवश्यकता बनती हैं उसकी पूर्ति को ब्रह्मभोज कहा जाता था। इस प्रयोजन के लिए दी गई राशि को दान या दक्षिणा भी कहा जाता था। नवरात्रि अनुष्ठान की पूर्णता यज्ञायोजन तथा ब्रह्मभोज के साथ सम्पन्न होती है। इसका कारण तलाश करने पर उपवास का रहस्य विज्ञान और विस्तार समझ में आता हैं।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 नवरात्रि साधना का तत्वदर्शन (भाग 3)

🔴 गाँधी जी तीस साल की उम्र के थे । आंतें सूख गयी थीं। रोज एनीमा से दस्त कराते थे। उनने लिखा है कि जब वे दक्षिणी अफ्रीका में थे तो सोचते थे कि यही कोई पाँच बरस और जियेंगे। एनीमा सेट कोई उठा ले गया व जंगल में फँस गए तो बेमौत मारे जाएँगे। जिंदगी का अब कोई ठिकाना नहीं है लेकिन ऐसा नहीं हुआ। गाँधी जी ने अपने आपको ठीक कर लिया, सुधार लिया अपना आहार ठीक कर लिया तो आंतें भी उसी क्रम से ठीक होती चलीं गयी। 80 वर्ष की उम्र में वे मरे, मरने से पहले वे कहते थे अभी हम 120 साल तक जियेंगे । मेरा ख्याल है कि वे जरूर जिये होते यदि गोली के शिकार नहीं होते ।

🔵 जब गाँधीजी की आंतें उन्हें क्षमा कर सकती हैं शरीर उन पर दया कर सकता है तो आपके साथ यह क्यों नहीं हो सकता? शर्त एक ही है कि आप अपनी जीभ को छुट्टल साँड़ की तरह न छोड़कर उस पर काबू करना सीखें । जीभ ऐसी जिसने आपकी सेहत को खा लिया, आपके खून को खा लिया, माँस को खा लिया। कौन जिम्मेदार है-जीवाणु वातावरण । नहीं आप स्वयं व आपकी यह जीभ। यदि आप इसे काबू में कर सके तो मैं बीमारियों की ओर से मुख्तार नामा लिखने को तैयार हूँ कि आपको कभी बीमारी नहीं होने वाली।

🔴 ऐसे कई नमूने मेरे सामने हैं, जिसमें लोगों ने नेचर के कायदों का पालन कर के अपनी बीमारी को दूर भगा दिया। चंदगीराम भरी जवानी में तपेदिक के मरीज हो गए थे । कटोरा भर खून रोज कफ के साथ निकलता था। हर डॉक्टर ने कह दिया था कि उसके बचने की कोई उम्मीद नहीं है। एक सज्जन आए व बोले आप अगर मौत को पसंद करते हों तो उस राह चलिए व यदि जिंदगी पसंद हो तो मेरे बताए मार्ग पर चलिए। जिंदगी का रास्ता क्या अपने ऊपर संयम जीभ पर संयम। आहार का संयम-विहार का संयम। शरीर से श्रम कीजिए व वर्जिश कीजिए। प्राणों का सागर चारों तरफ भरी पड़ा है, खींचिए, सादा भोजन कीजिए व सीमा में करिए । फिर देखिए, क्या होता है? देखते-देखते टीबी का रोगी वह व्यक्ति पहलवान चन्दगीराम बन गया।

🔵 आप में से हर व्यक्ति पहलवान बन सकता है, अपनी कमजोरियाँ ठीक कर सकता है, अपनी सेहत ठीक कर सकता है, अपनी परिस्थितियाँ अपने अनुकूल बना सकता है, तनावभरी इस दुनिया में भी प्रसन्नतापूर्वक रह सकता है। पर क्या करें मित्रों? आप दूसरों को -उसकी कमियों को तो खूब देखते हैं पर अपनी कमियों गलतियों असंयमों को कम देखते हैं। अपने आप पर नियंत्रण बिठाने का आपका कोई मन नहीं है। इसीलिए मैं आपको कभी अध्यात्मवादी नहीं कह सकता। मात्र दीन-दुर्बल आदतों का गुलाम भर कह सकता हूँ।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1992/April/v1.56

👉 परीक्षा के दिन हुआ बीमारी से बचाव

🔴 बचपन से ही मैं अपने परिवार में गायत्री साधना का क्रम देखता रहा हूँ। उस वातावरण में पले होने के कारण एक स्वाभाविक विश्वास तो बना हुआ था ही, पर उसमें वह तासीर तो तब आई, जब मैंने खुद अपने जीवन में उस साधना के चमत्कार को प्रत्यक्ष किया।

🔴 एक साधारण किसान परिवार में मेरा जन्म हुआ। सन् १९९६ में हमारे गाँव में पंचकुण्डीय गायत्री यज्ञ का अनुष्ठान हुआ। अनुष्ठान तीन दिनों का था, जिसका आयोजन मेरे पिताजी ने ही किया था। इस अनुष्ठान में कई तरह के संस्कार भी सम्पन्न कराए गए। जिनमें विद्यारम्भ संस्कार और दीक्षा संस्कार कराने वालों की संख्या ही अधिक थी। मुझे भी उसी समय दीक्षा मिली। तब मैं छठी कक्षा में पढ़ता था।

🔵 तब मैं दीक्षा का मतलब समझने लायक तो नहीं था पर इतना याद है कि उस दिन मैं बहुत खुश था, ऐसा लग रहा था, जैसे मैं महत्त्वपूर्ण हो गया हूँ। सच बताऊँ, तो मैं भी कोई हूँ, इसका आभास पहली बार मिला। दीक्षा में मुझे गायत्री मंत्र दिया गया।  मंत्र तो मैं पहले भी जानता था लेकिन बताई गई विधि के अनुसार साधना उसी समय से आरंभ हुई।

🔴 यह घटना उन दिनों की है जब, मैं आठवीं कक्षा में था। एक दिन अचानक मेरी तबियत खराब हुई। पेट में जोरों का दर्द होने लगा। इसके बाद दो- चार दिन बाद नाक से खून गिरने लगा। धीरे- धीरे यह एक सिलसिला बन गया।

🔵 अक्सर ही नाक से खून गिरने लगता और मैं पकड़कर चित लिटा दिया जाता। जब उठकर कुछ इधर- उधर चलने फिरने का प्रयास करता, तो सिर में चक्कर आने लगता और मैं गिर पड़ता। कई डॉक्टरों को दिखाया गया, तीन साल तक इलाज चलता रहा, पर बीमारी ज्यों की त्यों बरकरार रही। कई तरह की जाँच के बाद भी डॉक्टर यह समझ नहीं पाए कि हुआ क्या है।

🔴 इस बीच पढ़ाई जैसे- तैसे चलती रही। आठवीं से दसवीं में आ गया। बोर्ड की परीक्षा नजदीक आ गई। लेटे- लेटे ही पढ़ाई करता था। बैठकर पढ़ने का प्रयास करता तो नाक से खून आने लगता।

🔵 चिंता थी कि बोर्ड की परीक्षा कैसे दूँगा। यहाँ स्कूल में तो सारे ही शिक्षक अपने थे। उन्हें मेरे साथ हमदर्दी थी, इसलिए किसी तरह निभ गया। लेटे- लेटे ही परीक्षा देता रहा। लेकिन यहाँ बोर्ड परीक्षा में मेरी कौन सुनेगा? पिताजी को अपनी चिन्ता बताई। उन्होंने जैसे पहले से ही कुछ सोच रखा हो, वह बोले- देखता हूँ, कुछ तो रास्ता निकलेगा ही।

🔴 एडमिट कार्ड आ गया, तो पिताजी को दिखाया। वे उसे लेकर परीक्षा केंद्र में गए। प्रधानाध्यापक से मिलकर पूरी परिस्थिति बताई। उन्होंने सहयोग का आश्वासन दिया। बोले- मैं ऑफिस में उसके लिए ऐसी व्यवस्था कर दे सकता हूँ कि अकेले बैठकर या लेटे- लेटे ही परीक्षा दे सके। मैं खुश था चलो बोर्ड की परीक्षा छूटेगी नहीं।

🔵 १४ मार्च २००१ को परीक्षा आरंभ होने वाली थी। ठीक उसके एक दिन पहले ऐसा आभास हुआ कि गुरुदेव कह रहे हैं- तुम साधारण तरीके से सबके साथ बैठकर परीक्षा दोगे। डरो मत! हम तुम्हारे साथ हैं। परीक्षा के कुछ दिनों बाद तुम पूर्ण रूप से स्वस्थ हो जाओगे।

🔴 मैंने देखा कि मेरे सामने गुरुदेव और माताजी अभय मुद्रा में हाथ उठाए मुस्करा रहे हैं। अगले ही पल मैं आत्मविश्वास से भर गया और तय कर लिया कि सबके साथ बैठकर परीक्षा दूँगा।

🔵 आश्चर्य की बात है कि परीक्षा के सारे ही पेपर मैंने साधारण तरीके से सब लड़कों के साथ बैठकर दिए। एक दिन भी कुछ नहीं हुआ। इससे भी बड़े आश्चर्य की बात यह है कि जैसे- तैसे अध्ययन की प्रक्रिया चलते रहने के बावजूद इस परीक्षा में मुझे ७० प्रतिशत अंक मिले, जिसकी मुझे कल्पना तक नहीं थी। घर के सभी लोग आश्चर्यचकित थे।

🔴 परीक्षा के बाद दिल्ली अस्पताल में मेरा इलाज हुआ। इलाज करने वाले चिकित्सक थे डॉक्टर खक्कड़ साहब, वे भी गायत्री साधक हैं।

🔵 उन्होंने मुझसे कहा- गुरुदेव पर भरोसा रखो, सब ठीक होगा। नियमित गायत्री का जप करना। उन्होंने दवा दी, जिसे ६० दिनों तक खाना था। एक टिकिया की कीमत मात्र २५ पैसे थी।

🔴 जैसा पूज्य गुरुदेव ने कहा था ठीक वैसा ही हुआ। नवम्बर तक मैं पूर्ण स्वस्थ हो गया। अब मैंने अपना जीवन पूज्य गुरुदेव को समर्पित कर दिया। आज मैं इक्कीस साल का हूँ और पटना प्रज्ञा युवा प्रकोष्ठ के सक्रिय सदस्यों में गिना जाता हूँ।                   
  
🌹 निशांत रंजन,  सीवान (बिहार)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
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शुक्रवार, 31 मार्च 2017

👉 आज का सद्चिंतन 1 April 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 1 April 2017


👉 अनावश्यक वस्तुओं का क्या करूँ?

🔴 बल्लभाचार्य के समय में अनेक वैष्णव भक्त हुए पर उनमें कुंभनदास का नाम आज भी बडी़ श्रद्धा से लिया जाता है। यद्यपि वह परिवार में रहते थे पर परिवार उनमें नहीं। कषि कार्य करने के बाद भी वह इतना समय बचा लेते थे कि जिसमें भक्ति के अनेक सुंदर-सुंदर गीतों की रचना कर सकें।

🔵 जब वे अपने भक्ति-रस से पूर्ण गीतों को मधुर कंठ से गाते थे तो राह चलते लोग खड़े होकर सुनने लगते थे। भगवान् के भक्त निर्धनता को वरदान समझते हैं। उनका विश्वास है कि अभाव का जीवन जीने वाले भक्तों की ईश्वर को याद सदैव आती रहती है।

🔴 हाँ कुंभनदास भी भौतिक संपदाओं से वंचित थे। वह इतने निर्धन थे कि मुख देखने के लिए एक दर्पण तक न खरीद सकते थे। स्नान के बाद जब कभी चंदन लगाने की आवश्यकता होती तो किसी पात्र में जल भरकर अपना चेहरा देखते थे।

🔵 जल से भरे पात्र को सामने रखे कुंभनदास तिलक लगा रहे थे कि महाराजा मानसिंह उनके दर्शन हेतु पधार गये। महाराजा ने आकर अभिवादन में 'जय श्रीकृष्ण' कहा-उत्तर में भक्त ने भी उन्हें पास बैठने का संकेत देते हुए 'जय श्री कृष्ण' कहा। पर जल्दी में उस पात्र का जल फैल गया। अतः कुंभनदास ने अपनी पुत्री से पुनः जल भरकर लाने को कहा। राजा को वस्तु स्थिति समझते देर न लगी। उन्हें यह जानकर बडा दुःख हुआ कि भगवान् का भक्त एक छोटी-सी वस्तु दर्पण के अभाव में कैसा कष्ट उठा रहा है ? राजा मानसिंह ने अपने महल में एक सेवक भेजकर स्वर्णजटित दर्पण मँगवाया और भक्त के चरणों मे अर्पित कर क्षमा माँगी।

🔴 कुंभनदास बोले-'राजन्! हम जैसे निर्धन व्यक्ति के घर में इतनी मूल्यवान वस्तु क्या शोभा दे सकती है ?
 
🔵 मेरी तरफ से यह तुच्छ भेंट तो आपको स्वीकार ही करनी पडेगी। आपको जिन-जिन वस्तुओं की आवश्यकता हो उनकी सूची दे दीजिए। घर जाकर मैं आपकी सुख-सुविधा का पूर्ण ध्यान रखकर समस्त वस्तुओं की व्यवस्था करवा दूँगा। राजा मानसिंह ने आग्रह के स्वर में अपनी बात कही।

🔴 'राजन् निश्चिंत रहिए और अपनी जनता के प्रति उदार तथा कर्तव्य की भावना बनाए रखिए। मुझे किसी भी वस्तु की आवश्यकता नहीं, भगवान् की कृपा से सब प्रकार आनंद है। आप देखते नहीं भगवान का नाम स्मरण हेतु माला, आचमन और पूजन के लिए पंचपात्र बैठने के लिए आसन आदि सभी उपयोगी वस्तुऐं तो हैं। कृपया आप यह दर्पण वापिस ले जाइए। जिस दिन भक्त भी इसी प्रकार का भोग विलासमय जीवन व्यतीत करने लगेंगे उन दिन उनकी भक्ति समाप्त हो जायेगी।

👉 गायत्री चालीसा का अनुष्ठान

🔵 जो लोग अधिक कार्य व्यस्त हैं, जो अस्वस्थता या अन्य कारणों से नियमित साधन नहीं कर सकते वे गायत्री चालीसा के 108 पाठों का अनुष्ठान कर सकते हैं। 9 दिन नित्य 12 पाठ करने से करने से नवरात्रि में 108 पाठ पूरे हो सकते हैं प्रायः डेढ़ घण्टे में 12 पाठ आसानी से हो जाते हैं। इसके लिए किसी प्रकार के नियम, प्रतिबन्ध, संयम, तप आदि की आवश्यकता नहीं होती। अपनी सुविधा के किसी भी समय शुद्धता पूर्वक उत्तर को मुख करके बैठना चाहिए और 12 पाठ कर लेने चाहिए। अन्तिम दिन 108 या 24 गायत्री चालीसा धार्मिक प्रकृति के व्यक्तियों में प्रसाद स्वरूप बाँट देना चाहिए।

🔴 स्त्रियाँ, बच्चे, रोगी, वृद्ध पुरुष तथा अव्यवस्थित दिनचर्या वाले कार्य व्यस्त लोग इस गायत्री चालीसा के अनुष्ठान को बड़ी आसानी से कर सकते हैं। यों तो गायत्री उपासना सदा ही कल्याणकारक होती है पर नवरात्रि में उसका फल विशेष होता है। गायत्री को भू-लोक की कामधेनु कहा गया है। यह आत्मा की समस्त क्षुधा पिपासाओं को शान्त करती है। जन्म मृत्यु के चक्र से छुड़ाने की सामर्थ्य से परिपूर्ण होने के कारण उसे अमृत भी कहते हैं। गायत्री का स्पर्श करने वाला व्यक्ति कुछ से कुछ हो जाता है इसलिए उसे पारसमणि भी कहते हैं। अभाव, कष्ट, विपत्ति, चिंता, शोक एवं निराशा की घड़ियों गायत्री का आश्रय लेने से तुरन्त शाँति मिलती है, माता की कृपा प्राप्त होने से पर्वत के समान दीखने वाले संकट राई के समान हलके हो जाते हैं और अन्धकार में भी आशा की किरणें प्रकाशमान होती हैं।

🔵 गायत्री को शक्तिमान, सर्वसिद्धि दायिनी सर्व कष्ट निवारिणी कहा गया है। इससे सरल, सुगम, हानि रहित, स्वल्परमसाध्य एवं शीघ्र फलदायिनी साधना और कोई नहीं है। इतना निश्चित है कि कभी किसी की गायत्री साधना निष्फल नहीं जाती। अभीष्ट अभिलाषा की पूर्ति में कोई कर्म फल विशेष बाधक हो तो भी किसी न किसी रूप में गायत्री साधना का सत् परिणाम साधक को मिलकर रहता है। उलटा या हानिकारक परिणाम होने की तो गायत्री साधना में कभी कोई सम्भावना ही नहीं है। यों तो गायत्री साधना सदा ही कल्याणकारक होती है पर नवरात्रि में तो यह उपासना विशेष रूप से श्रेयष्कर होती है। इसलिए श्रद्धापूर्वक अथवा परीक्षा एवं प्रयोग रूप में ही सही-उसे अपनाने के लिए हम प्रेमी पाठकों से अनुरोध करते रहते हैं। गायत्री साधना के सत्य परिणामों पर हमारा अटूट विश्वास है। जिन व्यक्तियों ने भी यदि श्रद्धापूर्वक माता का अंचल पकड़ा है उन्हें हमारी ही भाँति अटूट विश्वास प्राप्त होता है।

🌹 अखण्ड ज्योति मार्च 1996

👉 अपनी नवरात्रि की साधना को प्रखर करे

🔵 जीवन में साधना, स्वाध्याय, संयम एवं सेवा के सूत्रों के समग्र समावेश का एक न्यूनतम कार्यक्रम बनाना चाहिए, जिसमें कि आत्म निर्माण के साथ परिवार एवं सामाजिक उत्तरदायित्वों के भी बखूबी निर्वाह की समग्र रूपरेखा निर्मित हो। यदि इस तरह भावी जीवन की एक स्पष्ट एवं परिष्कृत रूपरेखा बन सकी और उसे व्यवहार में उतारने का साहस जग सका तो समझना चाहिए कि उतने ही परिमाण में गायत्री माता का प्रसाद तत्काल मिल गया। यह सुनिश्चित मानकर चलना चाहिए कि श्रेष्ठ गतिविधियों को अपनाते हुए ही हम अपनी श्रेष्ठ सम्भावनाओं को साकार कर सकते हैं और ईश्वरीय अनुग्रह के सुपात्र-अधिकारी बन सकते हैं।

🔴 अपनी नवरात्रि की साधना को प्रखर करने के लिए कुछ साधना सूत्रों का कड़ाई से पालन करना चाहिए। इनमें प्रमुख है-उपवास, ब्रह्मचर्य, कठोर बिछौने पर शयन करना, किसी से सेवा न लेना एवं दिनचर्या को पूर्णतया नियमित एवं अनुशासित रखना।

🔵 इसके साथ मानसिक धरातल पर दिन भर उपासना के क्षणों के भावप्रवाह को बनाये रखने का प्रयास करें। अपने दैनिक कर्तव्य-दायित्व में संलग्न रहते हुए अधिक से अधिक अपने ईष्ट चिंतन में निमग्न रहें। ईर्ष्या-द्वेष, परिचर्चा-निन्दा आदि से दूर ही रहें। प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपना मानसिक संतुलन बनाये रखें। विपरीत परिस्थितियों को आदिशक्ति जगज्जननी माँ गायत्री व परम कृपालु गुरुदेव का कृपा प्रसाद मानकर प्रसन्न रहने का प्रयास करें।

🔴 सबके प्रति आत्मीयतापूर्ण सद्भाव रखें। सृष्टि के सभी प्राणी जगन्माता गायत्री की संतानें हैं। सबमें माँ ही समाई है, ऐसी भावानुभूति में जीने का प्रयास करें। स्वयं संयम, स्वाध्याय, साधना एवं सेवा के सत्मार्ग पर बढ़ें, दूसरों को भी इस पर बढ़ने के लिए प्रेरित करें। अपने स्तर पर सत्पात्र की सहायता करें।

🔵 इस भावभूमि में उपरोक्त सूत्रों के साथ सम्पन्न नवरात्रि की साधना निश्चित रूप से साधक पर गायत्री महाशक्ति एवं गुरुसत्ता के अजस्र अनुदानों को बरसाने वाली सिद्ध होगी और साधक अभीष्ट सिद्धि के साथ अनुष्ठान को सम्पन्न होते देखेगा। पूर्णाहुति के दिन साधक हवन में अवश्य भाग ले। प्रत्येक आहुति के साथ भाव करे कि देव परिवार के सदस्यों के सामूहिक साधनात्मक पुरुषार्थ से चहुँओर संव्याप्त विषम प्रवाह छँट रहा है और उज्ज्वल भविष्य की सुखद सम्भावनाएँ साकार हो रही हैं।

🌹 ~अखण्ड ज्योति मार्च 2004

👉 नवरात्रि साधना का तत्वदर्शन (भाग 2)

🔵 क्या नौ दिन काफी मात्र नहीं हैं? नहीं- नौ दिन काफी नहीं हैं। यह अभ्यास है सारे जीवन को कैसा जिया जाना चाहिए, उसका। आप इस शिविर में आकर और कुछ सीख पाए कि नहीं पर एक बात अवश्य नोट करके जाना। क्या? वह है अध्यात्म की परिभाषा- अध्यात्म अर्थात् “साइंस ऑफ सोल”। अपने आपको सुधारने की विधा, अपने आपको सँभालने की विधा, अपने आपको समुन्नत करने की विधा। आपने तो यह समझा है कि अध्यात्म अर्थात् देवता को जाल में फँसाने की विधा, देवता की जेब काटने की विधा। आपने यही समझ रखा है न। मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि आप जो सोचते हैं बिल्कुल गलत है। जब तक बेवकूफी से भरी बेकार की बातें आप अपने दिमाग में जड़ जमाए बैठे रहेंगे, झख ही झख मारते रहेंगे।

🔴 खाली हाथ मारे-मारे फिरेंगे। आप देवता को समझते क्या हैं? देवता को कबूतर समझ रखा है जो दाना फला दिया और चुपके-चुपके कबूतर आने लगे। बहेलिया रास्ते में छिपकर बैठ गया, झटका दिया और कबूतर रूपी देवता फँस गया। दाना फेंककर, नैवेद्य फेंककर, धूपबत्ती फेंककर बहेलिये के तरीके से फँसाना चाहते हैं, उसका कचूमर निकालना चाहते हैं? इसी का नाम भजन है? तपश्चर्या, साधना क्या इसी को कहते हैं? योगाभ्यास सिद्धान्त यही है? मैं आपसे ही पूछता हूँ, जरा बताइए तो सही।

🔵 आप देवियों को क्या समझते हैं? हम तो मछली समझते हैं । आटे की गोली बनाकर फेंकी व बगुले की तरह झट से उसे निगल लिया । धन्य हैं आप। आपके बराबर दयालु कोई नहीं हो सकता । मछली को पकड़ा तो कहा कि बहनजी आइए जरा। आपको सिंहासन पर बैठाएँगे आपकी आरती उतारेंगे और आपका जुलूस निकालेंगे। ऐसी ऐसी बाते करते हैं और जीवन भर इसी प्रवंचना में उलझे रहते हैं। देवियाँ कौन हैं? मछलियाँ । देवता कौन हैं? कबूतर। आप कौन हैं? बहेलिया । यही धन्धा है। चुप । बहेलिये का मछली मार का धन्धा करता है कहता है हम भजन करते हैं हम देवी के भक्त हैं । हम आस्तिक हैं। चुप, खबरदार। कभी मत कहना ऐसी बात। इसी को भजन कहते हैं तो हम यह कहेंगे कि यह भजन नहीं हों सकता आप ध्यान रखिएगा। आप अपने ख्यालातों को सही कीजिए अपने विचारों को सही कीजिए, अपने सोचने के तरीके को बदलिए यह हम आपको कहते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1992 पृष्ठ 55

👉 याद करते ही आ पहुँचे शान्तिकुंज के देवदूत

🔴 सन् २००१ ई. की बात है। मुझे कुछ ऐसी बीमारी हो गई कि मैं अन्दर ही अन्दर कमजोर होती जा रही थी। कुछ ही दिनों में चलना- फिरना कठिन हो गया। कई जगहों पर इलाज करवाया, मगर बीमारी ठीक होने का नाम नहीं ले रही थी। स्थिति जब असहाय- सी हो गई, तो दिल्ली के अपोलो अस्पताल में दिखाया गया। वहाँ काफी दिनों तक इलाज चला मगर वहाँ भी अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाया। उतने महँगे इलाज से भी जब स्वस्थ न हो सकी, तो घर के लोग काफी निराश हो गए। तभी किसी ने उड़ीसा से आए हुए एक डाक्टर के बारे में बताया। काफी नाम था उनका। उन्हीं के पास इलाज शुरू हुआ। वहाँ भी एक साल बीत गया,

🔵 सभी डाक्टर अंतिम रूप में जवाब दे चुके थे। सभी डॉक्टर यही कह रहे थे कितना भी इलाज कर लिया जाए, चलना- फिरना सम्भव न हो सकेगा। इलाज से केवल इतना ही किया जा सकता है कि आगे तकलीफ न बढ़े। उनका कहना था कि स्पाइनल कॉर्ड और मस्तिष्क के बीच का सम्बन्ध ठीक से स्थापित नहीं हो पा रहा है, जिससे हाथ पैर की पेशियों को मस्तिष्क से आदेश प्राप्त नहीं हो रहा। इसी वजह से उनमें गति नियंत्रण नहीं हो पा रहा है। सारे कामकाज, सारी सामाजिक गतिविधियाँ स्थगित पड़ी थीं। घर में पड़े- पड़े दिन भर समय काटना मुझे बोझ- सा लगने लगा। कोई इष्ट मित्र मिलने आते तो लगता उन्हें जाने न दूँ, पकड़ कर अपने पास बैठाए रखूँ। अब तो मिलने के लिए भी कोई कभी कभी ही आते थे।

🔴 अक्सर मन में यह प्रश्र उठता रहता कि क्या इसी तरह पूरी जिन्दगी कटेगी। निराशा की इसी स्थिति में एक दिन पूजा स्थल पर गुरुदेव के चित्र के सामने बैठकर फूट- फूट कर रोने लगी। रोते- रोते दुःख और हताशा के आवेग में मैं फट पड़ी। पिता होकर बेटी का यह दुःख साल भर से देख रहे हैं। आपको दया नहीं आती, क्या मैं इसी तरह अकेली पड़ी रहूँगी? इतने दिन हो गए मैं बीमार पड़ी हूँ और शान्तिकुञ्ज से कोई देखने तक नहीं आया। रोते- रोते मैं यहाँ तक कह गई कि मैं आपकी बेटी हूँ। इस तरह निकम्मी बनकर पड़ी नहीं रह सकती। या तो उठा ही लीजिए, नहीं तो पूरी तरह से ठीक कर दीजिये। अगर मैं ठीक हो गई, तो दूने उत्साह से आपका काम करूँगी।

🔵 इसी तरह रोते- रोते मन का गुबार निकालती हुई कब शांत होकर सो गई, मुझे पता ही नहीं चला। शाम को समाचार मिला कि शांतिकुंज से दो प्रतिनिधि आए हुए हैं। कुछ ही देर में वे शक्तिपीठ से लड्डा जी और दो अन्य प्रतिनिधियों को साथ लेकर मेरे आवास पर आए। वे आते ही मुझ पर बुरी तरह बरस पड़े कि पिछले तीन माह से कोई हिसाब नहीं मिला है। न ही कोई प्रगति रिपोर्ट मिली। मैंने अपनी स्थिति बताई और कहा कि ये सारी सूचनाएँ और हिसाब- किताब श्रीमती पूर्णिमा के पास है, क्योंकि मेरी अनुपस्थिति में सब काम- काज वही देख रही हैं। लड्डा जी ने जोर देकर कहा कि इसी वक्त चलिये पूर्णिमा जी के पास। मैंने अपनी असमर्थता जताई- मैं चल नहीं सकती। उन्होंने अनसुना करते हुए कहा- चलो उठो तैयार हो जाओ, जल्दी।

🔴 मैं स्लीपिंग गाउन पहने लेटी थी। उनके आने पर बिस्तर पर बैठकर बातें कर रही थी। मैंने कहा- कपड़े बदल लेती हूँ। लड्डा जी ने कहा कपड़े बदलने की कोई जरूरत नहीं। इसी तरह चलो, मुझे ये सारी जानकारियाँ अभी, इसी वक्त चाहिए। शायद उन्हें लग रहा था कि मैं बहाना बना रही हूँ। मुझे अपनी स्थिति पर रोना आ गया। मुझे तो बिस्तर से उठने में, घर के अन्दर चलने- फिरने में भी तकलीफ होती है। कैसे समझाऊँ इन्हें? किसी तरह संयत स्वर में मैंने कहा- थोड़ी देर बैठिए, मैं चलती हूँ आपके साथ।

🔵 लड्डा जी क्रोध से तमतमा उठे। उन्होंने एक- एक शब्द पर जोर देते हुए कहा- चलना तो तुमको अभी पड़ेगा। सहसा मुझे ऐसा लगा जैसे उनके भीतर सूक्ष्म रूप से पूज्य गुरुदेव ही प्रविष्ट हो गए हैं। मैं अचम्भे से उनके चेहरे की ओर देखने लगी। ऐसा आभास हुआ, जैसे सामने लड्डा जी नहीं स्वयं गुरुदेव ही खड़े हैं। उन्होंने मुझे बाँह पकड़ कर उठाया और बिस्तर से उठाकर लगभग घसीटते हुए पूजा घर में ले गए। उन्होंने मेरे माथे पर तिलक लगाकर शान्तिपाठ के साथ अभिसिंचन किया।

🔴 मेरे पूरे शरीर में जैसे बिजली की एक लहर दौड़ गई। उन्होंने कहा- अब चलो। मैंने जल्दी में शरीर पर एक शाल डाला और उनके साथ चल पड़ी। मैं आगे- आगे जा रही थी, मेरे ठीक पीछे लड्डा जी थे। और पीछे वे सारे परिजन, जो साथ आए थे। हम सभी पूर्णिमा के घर पहुँचे। उसने सारी रिपोर्ट लाकर दी। फिर बात- चीत के क्रम में उन्होंने मुझसे पूछा- तुम इतने दिनों से शक्तिपीठ क्यों नहीं आती हो? मैंने बताया- साल भर से मैं बीमार थी। चलना- फिरना मुश्किल हो गया है।

🔵 इतना कहते ही मुझे ध्यान आया कि अभी पूर्णिमा के घर तक तो बड़े आराम से चलकर आ गई हूँ और प्राण ऊर्जा से भरी हुई हूँ। अपने- आपको काफी स्वस्थ महसूस कर रही हूँ। इस आकस्मिक परिवर्तन को लक्ष्य करते हुए मैंने कहा- कल मैं जरूर आऊँगी।

🔴 अगले दिन सुबह पाँच बजे शक्तिपीठ जाकर मैंने हवन किया और उसी समय मेरी लम्बी बीमारी की इतिश्री हो गई। आदरणीय लड्डा जी को माध्यम बनाकर मुझे पल भर में नया जीवन देने वाली गुरुसत्ता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए मेरे पास कोई शब्द नहीं हैं।                   
  
🌹 श्रीमती रेखा थम्मन सोनारी, जमशेदपुर (झारखण्ड)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Wonderful/yaaden.1

👉 नवरात्रि पर्व और गायत्री की विशेष तप−साधना

🔵 गायत्री का विज्ञान और भी अधिक महत्वपूर्ण है उसके शब्दों का गुँथन स्वर शास्त्र के अनुसार सूक्ष्म विज्ञान के रहस्यमय तथ्यों के आधार पर हुआ है। इसका जप ऐसे शब्द कंपन उत्पन्न करता है जो उपासक की सत्ता में उपयोगी हलचलें उत्पन्न करे−प्रसुप्त दिव्य शक्तियों को जगाये और सत्प्रवृत्तियाँ अपनाने की उमंग उत्पन्न करे। गायत्री जप के कम्पन साधक के शरीर से निसृत जाकर समस्त वातावरण में ऐसी हलचलें उत्पन्न करते हैं जिनके आधार पर संसार में सुख−शान्ति की परिस्थितियां उत्पन्न हो सकें।

🔴 भारतीय धर्म की उपासना में प्रातः सायं की जाने वाली ‘संध्या विधि’ मुख्य है। संख्या कृत्य यों सम्प्रदाय मद में कई प्रकार किये जाते हैं, पर उन सब में गायत्री का समावेश अनिवार्य रूप से होता है। गायत्री को साथ लिए बिना संध्या सम्पन्न नहीं हो सकती। गायत्री को गुरु मन्त्र कहा गया है। यज्ञोपवीत धारण करते समय गुरु मन्त्र देने का विधान है। देव मन्त्र कितने ही हैं। सम्प्रदाय भेद से कई प्रकार के मन्त्रों के उपासना विधान हैं पर जहाँ तक गुरु मन्त्र शब्द का सम्बन्ध है वह गायत्री के साथ ही जुड़ा हुआ है। कोई गुरु किसी अन्य मन्त्र की साधना सिखाये तो उसे गुरु का दिया मन्त्र तो कहा जा सकता है, पर जब भी गुरु मन्त्र शब्द को शास्त्रीय परंपरा के अनुसार प्रयुक्त किया जायगा तो उसका तात्पर्य गायत्री मन्त्र से ही होगा। इस्लाम धर्म में कलमा का −ईसाई धर्म में बपतिस्मा का जो अर्थ है वही हिन्दू धर्म में अनादि गुरु मंत्र गायत्री को प्राप्त है।

🔵 साधना की दृष्टि से गायत्री को सर्वांगपूर्ण एवं सर्व समर्थ कहा गया है। अमृत, पारस, कल्प−वृक्ष और कामधेनु के रूप में इसी महाशक्ति की चर्चा हुई है। पुराणों में ऐसे अनेकानेक कथा प्रसंग भरे पड़े हैं जिनमें गायत्री उपासना द्वारा भौतिक ऋद्धियाँ एवं आत्मिक सिद्धियाँ प्राप्त करने का उल्लेख है। साधना विज्ञान में गायत्री उपासना को सर्वोपरि माना जाता रहा है। उसके माहात्म्यों का वर्णन सर्वसिद्धिप्रद कहा गया है और लिखा है कि तराजू के एक पलड़े पर गायत्री को और दूसरे पर समस्त अन्य उपासनाओं को रखकर तोला जाय तो गायत्री ही भारी बैठती है। राम, कृष्ण आदि अवतारों की−देवताओं और ऋषियों की उपासना पद्धति गायत्री ही रही है। उसे सर्वसाधारण के लिए उपासना अनुशासन माना गया है और उसकी उपेक्षा करने वाली की कटु शब्दों में भर्त्सना हुई है।

🔴 सामान्य दैनिक उपासनात्मक नित्यकर्म से लेकर विशिष्ट प्रयोजनों के लिए की जाने वाली तपश्चर्याओं तक में गायत्री को समान रूप से महत्व मिला है। गायत्री, गंगा, गीता, गौ और गोविन्द हिन्दू धर्म के पाँच प्रधान आधार माने गये हैं, इनमें गायत्री प्रथम है। बाल्मीक रामायण और श्रीमद्भागवत में एक−एक शब्द का सम्पुट लगा हुआ है। इन दोनों ग्रन्थों में वर्णित रामचरित्र और कृष्णचरित्र को गायत्री का कथा प्रसंगात्मक वर्णन बताया जाता है इन सब कथनोपकथनों का निष्कर्ष यही निकलता है कि गायत्री मन्त्र के लिए भारतीय धर्म में निर्विवाद रूप से सर्वोपरि मान्यता मिली है।

🔵 उसमें जिन तथ्यों का समावेश है उन्हें देखते हुए निकट भविष्य में मानव जाति का सार्वभौम मन्त्र माने जाने की पूरी−पूरी सम्भावना है। देश धर्म, जाति समाज और भाषा की सीमाओं से ऊपर उसे सर्वजनीय उपासना कहा जा सकता है। जब कभी मानवी एकता से सूत्रों को चुना जाय तो आशा की जानी चाहिए गायत्री को महामन्त्र के रूप में स्वीकारा जायगा। हिन्दू धर्म के वर्तमान बिखराव को समेटकर उसके केन्द्रीकरण की एक रूपता की बात सोची जाय तो उपासना क्षेत्र में गायत्री को ही प्रमुखता देनी होगी।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 ~अखण्ड ज्योति फरवरी 1976

👉 नवरात्रि अनुष्ठान

🔵 नवरात्रि अनुष्ठान में मन को एकाग्र तन्मय बनाने के साथ जप के साथ ध्यान की प्रक्रिया को सशक्त बनाया जाता है। मातृभाव में ध्यान तुरंत लग जाता है व जप स्वतः होठों से चलता रहता है। ध्यान तब माला की गिनती की ओर नहीं जाता। उँगलियों से माला के मन के बढ़ते जाते हैं, ध्यान मातृसत्ता का अनन्त स्नेह व ऊर्जा देने वाले पयपान की ओर लगा रहता है। इस अवधि में आत्मचिन्तन विशेष रूप से करना चाहिए। मन को चिन्ताओं से जितना खाली रखा जा सके-अस्तव्यस्तता से जितना मुक्त हुआ जा सकें, उसके लिए प्रयासरत रहना चाहिएं आत्मचिन्तन में अब तक के जीवन की समीक्षा करके उसकी भूलों को समझने और प्रायश्चित के द्वारा परिशोधन की रूपरेखा बनानी चाहिए। वर्तमान की गतिविधियों का नये सिरे से निर्धारण करना चाहिए।

🔴 उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्त्तव्य अपने क्रियाकलापों में अधिकतम मात्रा में कैसे जुड़ा रह सकता है, उसका ढांचा स्वयं ही खड़ा करना चाहिए और उसे दृढ़तापूर्वक निबाहने का संकल्प करना चाहिए। भावी जीवन की रूपरेखा ऐसी निर्धारित की जाय जिसमें शरीर और परिवार के प्रति कर्त्तव्यों का निर्वाह करते हुए आत्मकल्याण के लिए कुछ करते रहने की गुंजाइश बनी रहे। साधना-स्वाध्याय-संयम-सेवा, यही है आत्मोत्कर्ष के चार चरण। इनमें एक भी ऐसा नहीं है, जिसे छोड़ा जा सके और एक भी ऐसा नहीं है जिस अकेले के बल पर आत्मकल्याण का लक्ष्य पूरा किया जा सके।

🔵 अस्तु मनन और चिन्तन द्वारा इन्हें किस प्रकार कितनी मात्रा में अपनी दिनचर्या में सम्मिलित रखा गया, इस पर अति गम्भीरतापूर्वक विचार करते रहना चाहिए। यदि इससे भावी जीवन की कोई परिष्कृत रूपरेखा बन सकी और उसे व्यवहार में उतारने का साहस जग सका तो समझना चाहिए कि उतने ही परिमाण में गायत्री माता का प्रसाद तत्काल मिल गया। यह सुनिश्चित मानना चाहिए कि श्रेष्ठता भरी गतिविधियाँ अपनाते हुए ही भगवान की शरण में पहुँच सकना और उनका अनुग्रह प्राप्त करना सम्भव हो सकता है।

🔴 गायत्री परम सतोगुणी-शरीर और आत्मा में दिव्य तत्वों का आध्यात्मिक विशेषताओं का अभिवर्धन करने वाली महाशक्ति है। वर्ष की दो नवरात्रियों को गायत्री माता के दो आयातित वरदान मानकर हर व्यक्ति द्वारा सम्पन्न किया जाना चाहिए। इस अवधि में उनका कोमल प्राण धरती पर प्रवाहित होता है, वृक्ष वनस्पति नवलल्लव धारण करते हैं, जीवन-जन्तुओं में नई चेतना इन्हीं दिनों आती है। विधिपूर्वक सम्पन्न नवरात्रि साधना से स्वास्थ्य की नींव तक हिल जाती हैं एवं असाध्य बीमारियाँ तक इस नवरात्रि अनुष्ठान से दूर होती देखी गयी हैं।

अखण्ड ज्योति मार्च 1996

👉 आज का सद्चिंतन 31 March 2017


गुरुवार, 30 मार्च 2017

👉 नवरात्रि साधना का तत्वदर्शन (भाग 1)

परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी चैत्र नवरात्रि के परिप्रेक्ष्य में। 

11 अप्रैल 1981 को शाँतिकुँज हरिद्वार में आयोजित नवरात्रि सत्र में उनका समापन व्याख्यान।

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ बोलिए-
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

🔴 मित्रो! नवरात्रि अब समाप्त होने जा रही है। आइए जरा विचार करें, इन दिनों हमने क्या किया व किस लिए किया? इन दोनों प्रश्नों के उत्तर ठीक तरह से सोच लेंगे तो यह संभावना भी साकार होती चली जायेगी कि इससे हमें क्या मिलना चाहिए व क्या फायदा होना चाहिए? आपकी सारी गतिविधियों पर हमने दृष्टि डाली व उसमें से निष्कर्ष निकालते हैं कि आपको अपने स्वाभाविक ढर्रे में हेर फेर करना पड़ा है। स्वाभाविक ढर्रा यह था कि आप बहुत देर तक सोये रहते थे। दिन में जब नींद आ गई सो गए, रात्रि देर तक जागते रहे । अब? अब हमने आपको दबोच दिया है कि सबेरे साढ़े तीन बजे उठना चाहिए। उठना ही पड़ेगा। नहाने का मन नहीं है। नहाना ही पड़ेगा। ये क्या है? यह हमने आपको दबोच दिया व पुराने ढर्रे में आमूलचूल हेरफेर कर दिया है।

🔵 आप क्या खाते थे हमें क्या मालूम ? आप नीबू का अचार भी खाते थे, चटनी भी खाते थे, जाने क्या-क्या खाते थे। हमने आपको दबोच दिया कहा-यह नहीं चल सकता। यह खाना पड़ेगा व अपने पर अंकुश लगाना पड़ेगा। टाइम का आपका कोई ठिकाना नहीं था। जब चाहा तब बैठ गए मन आया तो पूजा कर ली नहीं आया तो नहीं ही करी। अब आपको व्रत संकल्प के बंधनों में बाँधकर हमने दबोच दिया कि सत्ताईस माला तो नियमित रूप से करनी ही होगी। ढाई घंटे तो बैठना ही पड़ेगा। संकल्प लेने के बाद उसे पूरा नहीं करेंगे तो गायत्री माता नाराज होंगी, आपको पाप लगेगा, आप नरक में जायेंगे, अनुष्ठान खण्डित हो जायेगा, यह डर दिखाकर आपको दबोच दिया गया। पूर्व की गतिविधियों में हेर फेर करके आपको इस बात के लिए मजबूर जब किया गया कि जो आदतें अपने स्वभाव में नहीं है, उनका पालन भी करना आना चाहिए।

🔴 क्या नौ दिन काफी मात्र नहीं हैं? नहीं- नौ दिन काफी नहीं हैं ।यह अभ्यास है सारे जीवन को कैसा जिया जाना चाहिए, उसका। आप इस शिविर में आकर और कुछ सीख पाए कि नहीं पर एक बात अवश्य नोट करके जाना। क्या? वह है अध्यात्म की परिभाषा- अध्यात्म अर्थात् “साइंस ऑफ सोल”। अपने आपको सुधारने की विधा, अपने आपको सँभालने की विधा, अपने आपको समुन्नत करने की विधा। आपने तो यह समझा है कि अध्यात्म अर्थात् देवता को जाल में फँसाने की विधा, देवता की जेब काटने की विधा। आपने यही समझ रखा है न। मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि आप जो सोचते हैं बिल्कुल गलत है।


🔵 जब तक बेवकूफी से भरी बेकार की बातें आप अपने दिमाग में जड़ जमाए बैठे रहेंगे, झख ही झख मारते रहेंगे। खाली हाथ मारे-मारे फिरेंगे। आप देवता को समझते क्या हैं? देवता को कबूतर समझ रखा है जो दाना फला दिया और चुपके-चुपके कबूतर आने लगे। बहेलिया रास्ते में छिपकर बैठ गया, झटका दिया और कबूतर रूपी देवता फँस गया। दाना फेंककर, नैवेद्य फेंककर, धूपबत्ती फेंककर बहेलिये के तरीके से फँसाना चाहते हैं, उसका कचूमर निकालना चाहते हैं? इसी का नाम भजन है? तपश्चर्या, साधना क्या इसी को कहते हैं? योगाभ्यास सिद्धान्त यही है? मैं आपसे ही पूछता हूँ, जरा बताइए तो सही।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1992/April/v1.55

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 30 March 2017


👉 राष्ट्र-हित के लिए सर्वस्व का त्याग 30 Mar

🔴 स्वतंत्रता के अमर पुजारी महाराणा प्रताप मेवाड रक्षा का अंतिम प्रयास करते हुए भी निराश हो चले थे। सारा राज्य-वैभव समाप्त हो गया। अकबर की विशाल सेना का मुकाबला मुट्ठी भर राजपूत ही कर रहे थे। अपने शौर्य, पराक्रम और वीरता से उन्होंने दुश्मनों के दाँत खट्टे कर दिए थे, परंतु बेचारे करते क्या ? इधर अल्पसंख्यक राजपूत, उधर टिड्डी दल की तरह मुगलों की अपरमित सेना। जब एक सेना समाप्त हो जाती, दूसरी पुनः लडने के लिये भेज दी जाती। जब एक जगह को रसद पानी समाप्त हो जाता, दूसरे जगह से शीघ्र ही सहायतार्थ पहुँचा दिया जाता। अकबर की इस विशाल सेना और अतुल साधन का मुकाबला महाराणा अपने थोडे़ सैनिक और अल्प-साधनों से अब तक करते आ रहे थे।

🔵 अंत में समय ऐसा आ गया जब सारा धन और सारी सेना समाप्त हो गई। अब न पास में पैसा रहा और न अन्य साधन ही, जिससे पुनः सेना तैयार करते। मातृभूमि की रक्षा के लिये उपाय सोचे बिना नहीं चूके, परंतु क्या करते अब एक भी वश नहीं चल रहा था। उधर सेना बढ़ती ही चली आ रही थी। अरावली की पहाडियों में छिपकर जीवन बिता लेने की कोई सूरत न दीख रही थी। शत्रुदल वहाँ भी अपनी टोह लगाए बैठा हुआ था।

🔴 अपने जीवन की ऐसी विषम घडि़यों में एक दिन महाराणा व्यथित हृदय एकांत में विचार करने लगे- ''अब मातृभूमि की रक्षा न हो सकेगी। माँ की रक्षा न कर सकने वाले मुझ अभागे को इस समय देश का त्याग कर कम से कम अपनी रक्षा तो कर ही लेनी चाहिए, जिससे भविष्य में कभी दिन लौटे और पुनः माँ को शत्रु के हाथों से स्वतंत्र कर सकूँ।''

🔵 दूसरे दिन प्रात: अपने परिवार और बचे-खुचे साथियों सहित वे सिंध प्रदेश की तरफ चल दिए। अभी थोडी ही दूर गए ही होंगे कि पीछे से किसी ने आर्त्त भरी आवाज लगाई- 

🔴 "राणा ठहरो' हम अभी जीवित है।" राणा ने पीछे मुड़कर देखा तो राज्य के पुराने मंत्री भामाशाह दौडते-हॉफते हुए उनकी ओर चले आ रहे है। उन्होंने अभी-अभी राणा के देश त्याग का समाचार पाया था।

🔵 समीप पहुँचकर आँखें डबडबाते हुये भामा बोले- 'राजन्! आप निराश हो जायेंगे तो आशा फिर किसके सहारे जीवित रहेगी' मुख मलीन किए हुए राणा प्रताप बोले, मंत्रिवर! देश रक्षा के मेरे सारे साधन समाप्त हो चले। किसी साधन की खोज में ही कहीं चल पड़ा हूँ। यदि सुयोग हुआ तो फिर लौट सकूँगा, वर्ना सदा के लिये मातृभूमि से नाता तोड़ के जा रहा हूँ।"

🔴 स्वतंत्रता के पुजारी और मेवाड़ के सिंह की बातें बूढे भामाशाह के कलेजे में तीर जैसी जा चुभी। वे हाथ जोडकर बोले- "अपने घोड़े की बाग को मोडिये और नए सिरे से लडा़ई की तैयारी पूरी कीजिए। इसमें जो कुछ भी खर्च पड़ेगा उसे मैं दूँगा। मेरे पास आपके पूर्वजों की दी हुई पर्याप्त धनराशि पड़ी हुई है। जिस दिन मेवाड़ शत्रु के हाथों चला जायेगा, उस दिन वह अतुल सपत्ति भी तो उसी की हो जाएगी। फिर इससे अधिक सुयोग और क्या हो सकता है" जब मातृ-भूमि से उपार्जित कमाई का एक-एक पैसा उसकी रक्षा मे लगा दिया जाए।

🔵 भामाशाह के इस अपूर्व त्याग और देशभक्ति की बातें सुनकर महाराणा प्रताप का दिल भर आया। वे वापस लौटे और उस संपत्ति से एक विशाल सेना तैयार करके शत्रु से जा डटे और सफलता प्राप्त की। कहते हैं कि भामाशाह ने इतनी संपत्ति अर्पित की जिससे महाराणा की पच्चीस हजार सेना का बारह वर्ष तक खर्च चला था। भामाशाह चले गए और राणा भी अब नहीं हैं, पर उनकी कृतियाँ अब भी है और सदा रहेंगी। देश को जब भी आवश्यकता पडेगी, उनकी प्रेरणाएँ अनेक राणा तैयार करेगी और उसी प्रकार अनेक भामाशाह भी पैदा होते रहेंगे जो अपनी चिर-संचित पूँजी को मातृभूमि के रक्षार्थ अर्पण करते रहेंगे।

बुधवार, 29 मार्च 2017

👉 आज का सद्चिंतन 29 March 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 29 March 2017


👉 संपत्ति में परिवार ही नही समाज भी हिस्सेदार

🔴 प्रसिद्ध साहित्यकार एवं दैनिक 'मराठा' के संपादक आचार्य प्रहलाद केशव अत्रे अपने पीछे एक वसीयत लिख गए। अपनी लाखों रुपये की संपत्ति का सही उपयोग की इच्छा रखने वाले अत्रे काफी दिनों से यह विचार कर रहे थे। परिवार के उत्तराधिकारी सदस्यों को तो अपनी संपति का वही भाग देना चाहिए, जो उनके लिए आवश्यक हो। जो संपत्ति बिना परिश्रम के प्राप्त हो जाती है जिसमें पसीना नहीं बहाना पडता, उसके खर्च के समय भी कोई विवेकशीलता से काम नहीं लेता और थोडे समय में ही लाखों की सपत्ति चौपट कर दी जाती है।

🔵 आचार्य अत्रे का हृदय विशाल था और दृष्टिकोण विस्तृत। उनका परिवार केवल भाई, भतीजे और पत्नी तक ही सीमित न था। वह तो संपूर्ण धरा को एक कुटुंब मानते थे। अत: उस कुटुंब के सदस्यो की सहायता करना प्रत्येक व्यक्ति का नैतिक कर्तव्य होना चाहिए। इसी भावना ने उन्हें विवश किया कि जीवन भर की जुडी हुई कमाई केवल अपने ही कहे जाने वाले पारिवारिक सदस्यों पर न खर्च की जाए वरन् उसका बहुत बड़ा भाग उन लोगो पर खर्च करना चाहिए, जिन्हें सचमुच आवश्यकता है।

🔴 आचार्य ने अपनी वसीयत में स्पष्ट लिखा है कि मुझे कोई भी पैतृक संपत्ति प्राप्त नहीं हुई थी। मैंने अपने परिश्रम से ही सारी संपत्ति अर्जित की है, जिस पर मेरा अधिकार है। मैंने जो प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बनाई हैं, उनमें किसी का नाम नहीं है। अतः मै अपनी संपत्ति महाराष्ट्र की जनता को सौंपता हूँ।

🔵 इस प्रकार आचार्य अत्रे ने महाराष्ट्र की जनता हेतु लगभग ५० लाख रुपये का दान दे दिया है और श्री एस० ए० डांगे. श्री डी० एस० देसाई. बैंकिंग विशेषज्ञ श्री वी० पी० वरदे तथा अपने निजी मित्र राव साहब कलके को ट्र्स्टी बनाया गया है। वसीयत में उन्होंने यह भी इच्छा प्रकट की कि 'मराठा' और 'सांज मराठा' का एक कर्मचारी भी ट्रस्टी रखा जाए, जिसका सेवा-काल दस साल से कम न हो।

🔴 श्री अत्रे ने वसीयत में पत्नी को केवल पाँच सौ रुपये मासिक और तीन नौकर रखने की सुविधा दी है। भाई को कुछ रुपये प्रतिमास तथा बहन को भी मासिक वृत्ति देने की व्यवस्था की गई है। उन्होंने अपनी समृद्ध पुत्रियाँ मे कुछ भी नहीं दिया है।

🔵 उनके निवास स्थान 'शिव शक्ति' के केवल एक भाग में रहने के लिये पत्नी को अधिकार दिया है। कुछ भाग को अतिथि-गृह बनाया जायेगा और सुभाष हाल को सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए सुरक्षित रखा जायेगा। ट्रस्टीज ने यह अनुरोध किया है कि यदि संभव हो तो एक अंग्रेजी दैनिक पत्र का प्रकाशन शुरू कर दे। लाखों रुपयो की संपत्ति की देखमाल के लिए प्रत्येक ट्रस्टी से कफी समय देना होगा, अतः उन्हों दो ट्र्स्टीज को पाँच-पाँच सौ रुपया प्रतिमाह वेतन लेने के लिये भी लिखा है। अन्य ट्र्स्टी मार्ग व्यय तथा दैनिक भत्ता मात्र प्राप्त कर सकते हैं।

🔴 शिक्षा प्रेमी अत्रे ने अपने गाँव के स्कूल के लिए पाँच हजार रुपये का दान तथा पूना विश्वाविद्यालय को मराठी लेकर बी० ए० में उच्च अंक प्राप्त करने वाले छात्रों को पाँच हजार रुपये के पुरस्कार की व्यवस्था की है। इस प्रकार उदारमना अत्रे ने अपनी संपति महाराष्ट्र के लोगो के कल्याण हेतु सौंपकर पूँजीपतियो के सम्मुख एक अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत किया है।

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 48)

🌹 सद्विचारों का निर्माण सत् अध्ययन—सत्संग से

🔴 मस्तिष्क में हर समय सद्विचार ही छाये रहें इसका उपाय यही है कि नियमित रूप से नित्य सद्साहित्य का अध्ययन करते रहा जाय। वेद, पुराण, गीता, उपनिषद्, रामायण, महाभारत आदि धार्मिक साहित्य के अतिरिक्त अच्छे और ऊंचे विचारों वाले साहित्यकारों की पुस्तकें सद्साहित्य की आवश्यकता पूरी कर सकती हैं। यह पुस्तकें स्वयं अपने आप खरीदी भी जा सकती हैं और सार्वजनिक तथा व्यक्तिगत पुस्तकालयों से भी प्राप्त की जा सकती हैं आजकल न तो अच्छे और सस्ते साहित्य की कमी रह गई है और न पुस्तकालयों और वाचनालयों की कमी। आत्म-कल्याण के लिए इन आधुनिक सुविधाओं का लाभ उठाना ही चाहिए।

🔵 समाज में फैली हुई अन्धता, मूढ़ता तथा कुरीतियों का कारण अज्ञान-अन्धकार होता है। अन्धकार में भ्रम होना स्वाभाविक ही है। जिस प्रकार अंधेरे में वस्तुस्थिति का ठीक ज्ञान नहीं हो पाता— पास रखी हुई चीज का स्वरूप यथावत् दिखाई नहीं देता, उसी प्रकार अज्ञान के दोष से स्थिति, विषय आदि का ठीक आभास नहीं होता। वस्तुस्थिति के ठीक ज्ञान के अभाव में कुछ का कुछ सूझते और होने लगता। विचार और उनसे प्रेरित कार्य के गलत हो जाने पर मनुष्य को विपत्ति संकट अथवा भ्रम में पड़कर अपनी हानि कर लेना स्वाभाविक ही है।

🔴 अन्धकार के समान अज्ञान में भी एक अनजान भय समाया रहता है। रात के अन्धकार में रास्ता चलने वालों को दूर के पेड़-पौधे, ठूंठ, स्तूप तथा मील के पत्थर तक चोर-डाकू, भूत-प्रेत आदि से दिखाई देने लगते हैं। अन्धकार में जब भी जो चीज दिखाई देगी वह शंकाजनक ही होगी, विश्वास अथवा उत्साहजनक नहीं। घर में रात के समय पेशाब, शौच आदि के लिए आने-जाने वाले अपने माता-पिता, बेटे-बेटियां तक अन्धकाराच्छन्न  होने के कारण चोर, डाकू या भूत-चुड़ैल जैसे भान होने लगते हैं और कई बार तो लोग उनकी पहचान न कर सकने के कारण टोक उठते हैं या भय से चीख मार बैठते हैं। यद्यपि उनके वे स्वजन पता चलने पर भूत-चुड़ैल अथवा चोर-डाकू नहीं निकले जो कि न पहचानने से पूर्व थे किन्तु अन्धकार के दोष से वे भय एवं शंका के विषय बने। भय का निवास वास्तव में न तो अन्धकार में होता है और न वस्तु में, उसका निवास होता है उस अज्ञान में जो अंधेरे के कारण वस्तुस्थिति का ज्ञान नहीं होने देता।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 28) 29 March

🌹 प्रखर प्रतिभा का उद्गम-स्रोत 

🔵 स्वयं का भार वहन करना भी आमतौर से कठिन काम माना जाता है। फिर अनेकों का भार वहन करते हुए उन्हें ऊँचा उठाने और आगे बढ़ाने को लक्ष्य पूरा करना तो और भी अधिक कठिन पड़ना चाहिये, पर यह कठिनाई या असमर्थता तभी तक टिकती है, जब तक अपने मेें सामर्थ्य की कमी रहती है। उसका बाहुल्य हो तो मजबूत क्रेनें रेलगाड़ी के पटरी से उतरे डिब्बों को अंकुश में लपेटकर उलटकर सीधा करतीं और यथास्थान चलने योग्य बनाकर अच्छी स्थिति में पहुँचा देती हैं।                   

🔴 इक्कीसवीं सदी में उससे कहीं अधिक पुरुषार्थ किये जाने हैं, जितना कि पिछले दो महायुद्धों की विनाश-विभीषिका में ध्वंस हुआ है; जैसे कि वायु-प्रदूषण ने जीवन-मरण का संकट उत्पन्न किया है; विषमताओं और अनाचारजन्य विभीषिकाओं ने भी संकट उत्पन्न किये हैं। शक्ति तो इन सभी में खर्च हुई, पर ध्वंस की अपेक्षा सृजन के लिये कहीं अधिक सामर्थ्य और साधनों की आवश्यकता पड़ती है। इसका यदि संचय समय रहते किया जा सके तो समझना चाहिये कि दुष्ट चिंतन और भ्रष्ट आचरण के कारण उन असंख्य समस्याओं का समाधान संभव होगा जो इन दिनों हर किसी को उत्तेजित, विक्षुब्ध और आतंकित किये हुए हैं।       
    
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 उत्तरदायित्वों को निभायें, महान बनें

उत्तरदायित्वों को जो बोझ मानकर उपेक्षा करता है। उस अच्छे परिणामों से वंचित रह जाना पड़ता है। प्रत्येक मानव की आजीविका कमाने में शर्म, संकोच ...