गुरुवार, 27 अक्टूबर 2016

👉 मैं क्या हूँ ? What Am I ? (भाग 12)

🌞 पहला अध्याय

🔴 अब तक उसे एक बहिन, दो भाई, माँ बाप, दो घोड़े, दस नौकरों के पालन की चिन्ता थी, अब उसे हजारों गुने प्राणियों के पालने की चिन्ता होती है। यही अहंभाव का प्रसार है। दूसरे शब्दों में इसी को अहंभाव का नाश कहते हैं। बात एक ही है फर्क सिर्फ कहने-सुनने का है। रबड़ के गुब्बारे जिसमें हवा भरकर बच्चे खेलते हैं, तुमने देखे होंगे। इनमें से एक लो और उसमें हवा भरो। जितनी हवा भरती जायेगी, उतना ही वह बढ़ता जाएगा और फटने के अधिक निकट पहुँचता जाएगा।

🔴 कुछ ही देर में उसमें इतनी हवा भर जायगी कि वह गुब्बारे को फाड़कर अपने विराट् रूप आकाश में भरे हुए महान वायुतत्त्व में मिल जाय। यही आत्म-दर्शन प्रणाली है। यह पुस्तक तुम्हें बतावेगी कि आत्म-स्वरूप को जानो, उसका विस्तार करो। बस इतने से ही सूत्र में वह सब महान विज्ञान भरा हुआ है, जिसके आधार पर विभिन्न अध्यात्म पथ बनाये गये हैं। वे सब फल इस सूत्र में बीज रूप में मौजूद हैं, जो किसी भी सच्ची साधना से कहीं भी और किसी भी प्रकार हो सकते हैं।

🔵 आत्मा के वास्तविक स्वरूप की एक बार झाँकी कर लेने वाला साधक फिर पीछे नहीं लौट सकता। प्यास के मारे जिसके प्राण सूख रहे हैं ऐसा व्यक्ति सुरसरि का शीतल कूल छोड़कर क्या फिर उसी रेगिस्तान में लौटने की इच्छा करेगा? जहाँ प्यास के मारे क्षण-क्षण पर मृत्यु समान असहनीय वेदना अब तक अनुभव करता रहा है। भगवान कहते हैं। ''यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्घाम् परमं मम।'' ''जहाँ जाकर फिर लौटना नहीं होता, ऐसा मेरा धाम है।'' सचमुच वहाँ पहुँचने पर पीछे को पाँव पड़ते ही नहीं। योग भ्रष्ट हो जाने का वहाँ प्रश्न ही नहीं उठता। घर पहुँच जाने पर भी क्या कोई घर का रास्ता भूल सकता है?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

बुधवार, 26 अक्टूबर 2016

👉 गायत्री की दैनिक साधना (भाग 2)

🔴 जिन्हें मन्त्र ठीक तरह शुद्ध रूप से याद न हो वे नीचे की पंक्तियों से उसे शुद्ध कर लें।
“ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।”

🔵 साधारणतः जप प्रतिदिन का नियम यह होना चाहिए कि कम से कम 108 मन्त्रों की एक माला का नित्य किया जाए। जप के लिए सूर्योदय का समय सर्वश्रेष्ठ है। शौच स्नान से निवृत्त होकर कुश के आसन पर पूर्वाभिमुख होकर बैठना चाहिए। धोती के अतिरिक्त शरीर पर और कोई वस्त्र न रहे। ऋतु अनुकूल न हो तो कम्बल या चादर ओढ़ा जा सकता है। जल का एक छोटा पात्र पास में रखकर शान्त चित्त से जप करना चाहिए। होंठ हिलते रहें, कंठ से उच्चारण भी होता रहे, परन्तु शब्द इतने मंद स्वर में रहे कि पास बैठा हुआ मनुष्य भी उन्हें न सुन सके। तात्पर्य यह है कि जप चुपचाप भी हो और कंठ ओष्ठ तथा जिह्वा को भी कार्य करना पड़े।

🔴 शान्त चित्त से एकाग्रतापूर्वक जप करना चाहिए। मस्तिष्क में त्रिकुटी स्थान पर सूर्य जैसे तेजस्वी प्रकाश का ध्यान करना चाहिए और भावना करनी चाहिए कि उस प्रकाश की तेजस्वी किरणें मेरे मस्तिष्क तथा समस्त शरीर को एक दिव्य विद्युत शक्ति से भरे दे रही है। जप और ध्यान साथ साथ आसानी से हो सकते हैं। आरम्भ में कुछ ऐसी कठिनाई आती है कि जप के कारण ध्यान टूटता है और ध्यान की तल्लीनता से जप में विक्षेप पड़ता है। यह कठिनाई कुछ दिनों के अभ्यास से दूर हो जाती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति 1944 सितम्बर

👉 मैं क्या हूँ ? What Am I ? भाग 11)


🌞 पहला अध्याय

🔴 अनेक साधक अध्यात्म-पथ पर बढ़ने का प्रयत्न करते हैं पर उन्हें केवल एकांगी और आंशिक साधन करने के तरीके ही बताये जाते हैं। खुमारी उतारना तो वह है जिस दशा में मनुष्य अपने रूप को भली-भाँति पहचान सके। जिस इलाज से सिर्फ हाथ-पैर पटकना ही बन्द होता है या आँखों की सुर्खी ही मिटती है वह पूरा इलाज नहीं है। यज्ञ, तप, दान, व्रत, अनुष्ठान, जप, आदि साधन लाभप्रद हैं, इनकी उपयोगिता से कोई इन्कार नहीं कर सकता।

🔴 परन्तु यह वास्तविकता नहीं है। इससे पवित्रता बढ़ती है, सतोगुण की वृद्घि होती है, पुण्य बढ़ता है किन्तु वह चेतना प्राप्त नहीं होता जिसके द्वारा सम्पूर्ण पदार्थों का वास्तविक रूप जाना जा सकता है और सारा भ्रम जंजाल कट जाता है। इस पुस्तक में हमारा उद्देश्य साधक को आत्मज्ञान की चेतना में जगा देने का है क्योंकि हम समझते हैं कि मुक्ति के लिए इससे बढ़कर सरल एवं निश्चित मार्ग हो ही नहीं सकता। जिसने आत्म स्वरूप का अनुभव कर लिया, सद्गुण उसके दास हो जाते हैं और दुर्गुणों का पता भी नहीं लगता कि वे कहाँ चले गये।

🔵 आत्म-दर्शन का यह अनुष्ठान साधकों को ऊँचा उठायेगा। इस अभ्यास के सहारे वे उस स्थान से ऊँचे उठ जायेंगे जहाँ कि पहले खड़े थे। इस उच्च शिखर पर खड़े होकर वे देखेंगे कि दुनियाँ बहुत बड़ी है। मेरा भार बहुत बड़ा है। मेरा राज्य बहुत दूर तक फैला हुआ है। जितनी चिन्ता अब तक थी, उससे अधिक चिन्ता अब मुझे करनी है। वह सोचता है कि मैं पहले जितनी वस्तुओं को देखता था, उससे अधिक चीजें मेरी हैं। अब वह और ऊँची चोटी पर चढ़ता है कि मेरे पास कहीं इससे भी अधिक पूँजी तो नहीं है? जैसे-जैसे ऊँचा चढ़ता है वैसे ही वैसे उसे अपनी वस्तुएँ अधिकाधिक प्रतीत होती जाती हैं और अन्त में सर्वोच्च शिखर पर पहुँचकर वह जहाँ तक दृष्टि फैला सकता है, वहाँ तक अपनी ही अपनी सब चीजें देखता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 62)

🔵 आलोचक कला की दीर्घाओं में विभिन्न चित्रों को देखता है जिसमें कुछ भीषण त्रासदिक होते हैं कुछ अत्यन्त सुन्दर होते हैं। किन्तु वह स्वयं वास्तव में उन चित्रों में अंकित भावनाओं से प्रभावित नहीं होता। तुम भी उसी प्रकार करो। जीवन मानो एक कला  दीर्घा है, अनुभव मानो विभिन्न चित्र हैं जो समय की दीवार पर टंगे हुए हैं। यदि तुम करना चाहते हो तो उनका अध्ययन करो किन्तु किसी भी प्रकार की भावनात्मक रुचि से स्वयं को मुक्त रखो। अध्ययन करो किन्तु उससे अप्रभावित रहो। इसे ध्यान में रखने पर तुम सचमुच ही साक्षी हो जाओगे। जिस प्रकार एक चिकित्सक शरीर या उसके रोगों का अध्ययन करता है उसी प्रकार अपने मन तथा अनुभवों का अध्ययन करो। अपने स्वयं की आलोचना में कठोर बनो तभी तुम वास्तविक उन्नति कर पाओगे।

🔴 रास्ता लम्बा है। (आत्म) शिक्षा की प्रक्रिया में कई जीवन आवश्यक हैं। किन्तु गहन जीवन जी कर व्यक्ति इस चक्करदार रास्ते से बच सकता है जिस पर की उथला जीवन जीनेवाले चलते हैं जिनका जीवन केवल उनके व्यक्तित्व के सतह पर ही होता है। आध्यात्मिक विषयों पर गहराई से लगातार विचार करना, इन्छाओं को उच्चाकाक्षा में बदलना, वासनाओं को आध्यात्मिक भाव से भर देना, ये सब इसके उपाय हैं। जब तक कि तुम्हारा संपूर्ण स्वभाव आध्यात्मिक आदर्श तथा इच्छाओं से परिपूर्ण नहीं हो जाता दिन भर की प्रत्येक घड़ी में सतत तद्रूप होने का दृढ़ निश्चय करो।

🔵 सदैव सावधान रहो। जो सभी शुभ वस्तुओं के दाता हैं उनके प्रति सभी कुछ समर्पित कर दो। जो तुम्हें आध्यात्मिक मार्ग पर स्थिर रखे, फिर चाहे वह मृत्यु का भय ही क्यों न हो, उसे पकड़ रखो। तुम एक नये पौधे हो जिसे सहारे की आवश्यकता है। जो भी वस्तु तुम्हें शक्तिशाली बनाये उसे पकड़ लो। दृढ़ता तथा प्रचण्डता से उससे चिपके रहो। अविचल, निष्ठावान, उद्यत चित्त, सदाचारी बनो तथा प्रत्येक क्षण एवं अवसर का लाभ उठाओ। पथ बहुत लम्बा है। समय भाग रहा है इसलिये जैसा कि मैंने पहले भी बार बार तुमसे कहा है अपने संपूर्ण व्यक्तित्व को समर्पित कर स्वयं को कार्य में झोंक दो और तब तुम लक्ष्य पर पहुँच जाओगे।

🌹 क्रमशः जारी
*🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर*

मंगलवार, 25 अक्टूबर 2016

👉 मैं क्या हूँ ? What Am I ? (भाग 10)

🌞 पहला अध्याय

🔴 काम क्रोधादि हमें इसलिए सताते हैं कि उनकी दासता हम स्वीकार करते हैं। जिस दिन हम विद्रोह का झण्डा खड़ा कर देंगे, भ्रम अपने बिल में धँस जायगा। भेड़ों में पला हुआ शेर का बच्चा अपने को भेड़ समझता था, परन्तु जब उसने पानी में अपनी तस्वीर देखी तो पाया कि मैं भेड़ नहीं शेर हूँ। आत्म-स्वरूप का बोध होते ही उसका सारा भेड़पन क्षणमात्र में चला गया। आत्मदर्शन की महत्ता ऐसी ही है, जिसने इसे जाना उसने उन सब दुःख दारिद्रयों से छुटकारा पा लिया, जिनके मारे वह हर घड़ी हाय-हाय किया करता था।

🔴 जानने योग्य इस संसार में अनेक वस्तुएँ हैं पर उन सबमें प्रधान अपने आपको जानना है। जिसने अपने को जान लिया उसने जीवन का रहस्य समझ लिया। भौतिक विज्ञान के अन्वेषकों ने अनेक आश्चर्यजनक आविष्कार किए हैं। प्रकृति के अन्तराल में छिपी हुई विद्युत शक्ति, ईथर शक्ति, परमाणु शक्ति आदि को ढूँढ़ निकाला है। अध्यात्म जगत के महान अन्वेषकों ने जीवन सिन्धु का मन्थन करके आत्मा रूपी अमृत उपलब्ध किया है। इस आत्मा को जानने वाला सच्चा ज्ञानी हो जाता है और इसे प्राप्त करने वाला विश्व विजयी मायातीत कहा जाता है।

🔵 इसलिए हर व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह अपने आपको जाने। मैं क्या हूँ, इस प्रश्न को अपने आपसे पूछे और विचार करे, चिन्तन तथा मननपूर्वक उसका सही उत्तर प्राप्त करे। अपना ठीक रूप मालूम हो जाने पर, हम अपने वास्तविक हित-अहित को समझ सकते हैं। विषयानुरागी अवस्था में जीव जिन बातों को लाभ समझता है, उनके लिए लालायित रहता है, वे लाभ आत्मानुरक्त होने पर तुच्छ एवं हानिकारक प्रतीत होने लगते हैं और माया लिप्त जीव जिन बातों से दूर भागता है, उसमें आत्म-परायण को रस आने लगता है। आत्म-साधन के पथ पर अग्रसर होने वाले पथिक की भीतरी आँखें खुल जाती हैं और वह जीवन के महत्वपूर्ण रहस्य को समझकर शाश्वत सत्य की ओर तेजी के कदम बढ़ाता चला जाता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 61)

🔵 स्वाधीन बनो! सभी उपायों से स्वाधीन बनो!! अपनी संभावनाओं तथा परमात्मा की कृपा पर विश्वास करो। दूसरों पर भरोसा तुम्हें  अधिकाधिक असहाय और दुःखी करेगा। यदि तुम स्वयं पर विश्वास नहीं करोगे तो अत्यन्त पीड़ादायक अनुभव तुम्हें वह करने के लिये बाध्य करेंगे। विधि के विधान में भावुकता या आत्मकरुणा के लिये कोई स्थान नहीं है। वह तुम्हारे पशुस्वभाव को खराद कर आध्यात्मिक आकार में बदल देगा। उसका एक मात्र उद्देश्य है तुम्हारे चरित्र में परिवर्तन करना।  

🔴 फिर विलम्ब क्यों? जिसकी अनुभूति इसी क्षण की जा सकती है उसे आगामी जन्म के लिये क्यों रख छोड़ो? निष्ठावान बनो। प्रचण्ड निष्ठावान बनो। अधिकारी या अनधिकारी होने का प्रश्न नहीं है। तुम्हारी  मुक्ति निश्चित है। क्योंकि उच्च जीवन में तुम्हें बलपूर्वक ठेल दिया जायगा। यही प्रत्येक व्यक्ति की नियति है। ईश्वरत्व को व्यक्त करना ही पड़ेगा।

🔵 उसी प्रकार एक आध्यात्मिक उदासीनता की भी आवश्यकता है। दिन भर में आनेवाली हजारों क्षुब्ध करने वाली घटनाओं की ओर क्यों ध्यान देते हो? स्वाधीन बनो। यह जान लो कि यह सब तुम्हारे उस पूर्वसंस्कार के महाप्रवाह की धाराएँ हैं जिनसे तुम्हें स्वयं को सदैव के लिये अलग कर लेना है। जो होता है होने दो, तुम्हारे विषय में लोग जो भी कहें कहने दो। तुम्हारे लिये यह सब मृगतृष्णा के समान हो जाना चाहिये। यदि सचमुच तुमने संसार का त्याग कर दिया है तो फिर तुम क्षुब्ध कैसे हो सकते हो! अपने आदर्श और प्रयत्नों में स्थिर रहो। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 गायत्री की दैनिक साधना (भाग 1)

🔴 निस्संदेह मन्त्रों में बहुत बड़ा बल मौजूद है और यदि कोई उनका ठीक ठीक उपयोग जान ले तो अपनी और दूसरों की बड़ी सेवा कर सकता है। गोस्वामी तुलसीदास जी का कथन है कि -
मंत्र परम लघु जासुबस विधि हरिहर सुर सर्व।
महामत्त गजरात कहँ बस करि अंकुश खर्व॥


🔵 यों तो बहुत से मन्त्र हैं। उनके सिद्ध करने और प्रयोग करने के विधान अलग अलग हैं और फल भी अलग अलग हैं। परन्तु एक मंत्र ऐसा है जो सम्पूर्ण मन्त्रों की आवश्यकता को अकेला ही पूरा करने में समर्थ है। यह गायत्री मन्त्र है। गायत्री मन्त्र ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद और सामवेद चारों वेदों में है। इसके अतिरिक्त और कोई ऐसा मन्त्र नहीं है जो चारों वेदों में पाया जाता हो। गायत्री वास्तव में वेद की माता है। तत्वदर्शी महात्माओं का कहना है कि गायत्री मन्त्र के आधार पर वेदों का निर्माण हुआ है, इसी महामन्त्र के गर्भ में से चारों वेद उत्पन्न हुए हैं। वेदों के मन्त्र दृष्टा ऋषियों ने जो प्रकाश प्राप्त किया है वह गायत्री से प्राप्त किया है।

🔴 गायत्री मन्त्र का अर्थ इतना गूढ़ गंभीर और अपरिमित है कि उसके एक एक अक्षर का अर्थ करने में एक एक ग्रन्थ लिखा जा सकता है। आध्यात्मिक, बौद्धिक, शारीरिक, साँसारिक, ऐतिहासिक, अनेक दिशाओं में उसका एक एक अक्षर अनेक प्रकार के पथ प्रदर्शन करता है। वह सब गूढ़ रहस्य यहाँ इन थोड़ी सी पंक्तियों के छोटे से लेख में लिखा नहीं जा सकता। यहाँ तो पाठकों को गायत्री का प्रचलित, स्थूल और सर्वोपयोगी भावार्थ यह समझ लेना चाहिए कि-तेजस्वी परमात्मा से सद्बुद्धि की याचना इस मन्त्र में की गई है।

🔵 श्रद्धापूर्वक इस मन्त्र की धारणा करने पर मनुष्य तेजस्वी और विवेकशील बनता है। गायत्री माता अपने प्रिय पुत्रों को तेज और बुद्धि का प्रसाद अपने सहज स्नेह वश प्रदान करती है। इसके अतिरिक्त अनेक आपत्तियों का निवारण करने की शक्ति गायत्री माता में है। कोई व्यक्ति कैसी ही विपत्ति में फँसा हुआ हो यदि श्रद्धापूर्वक गायत्री की साधना करे तो उसकी आपत्तियाँ कट जाती हैं और जो कार्य बहुत कठिन तथा असंभव प्रतीत होते थे वे सहज और सरल हो जाते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति 1944 सितम्बर

सोमवार, 24 अक्टूबर 2016

👉 मैं क्या हूँ ? What Am I ? (भाग 9)

🌞 पहला अध्याय

🔵 जीवन को शुद्ध, सरल, स्वाभाविक एवं पुण्य-प्रतिष्ठा से भरा-पूरा बनाने का राजमार्ग यह है कि हम अपने आपको शरीर भाव से ऊँचा उठावें और आत्मभाव में जागृत हों। इससे सच्चे सुख-शांति और जीवन लक्ष्य की प्राप्ति होती है। आध्यात्म विद्या के आचार्यों ने इस तथ्य को भली प्रकार अनुभव किया है और अपनी साधनाओं में सर्व प्रथम स्थान आत्मज्ञान को दिया है।

🔴 मैं क्या हूँ? इस प्रश्न पर विचार करने पर यही निष्कर्ष निकलता है कि मैं आत्मा हूँ। यह भाव जितना ही सुदृढ़ होता जाता है उतने ही उसके विचार और कार्य आध्यात्मिक एवं पुण्य रूप होते जाते हैं। इस पुस्तक में ऐसी ही साधनाएँ निहित हैं जिनके द्वारा हम अपने आत्म स्वरूप को पहिचानें और हृदयंगम करें। आत्मज्ञान हो जाने पर वह सच्चा मार्ग मिलता है जिस पर चलकर हम जीवन लक्ष्य को, परमपद को आसानी से प्राप्त कर सकते हैं।

🔵 आत्म स्वरूप को पहिचानने से मनुष्य समझ जाता है कि मैं स्थूल शरीर व सूक्ष्म शरीर नहीं हूँ। यह मेरे कपड़े हैं। मानसिक चेतनाएँ भी मेरे उपकरण मात्र हैं। इनसे मैं बँधा हुआ नहीं हूँ। ठीक बात को समझते ही सारा भ्रम दूर हो जाता है और बन्दर मुट्ठी का अनाज छोड़ देता है। आपने यह किस्सा सुना होगा कि एक छोटे मुँह के बर्तन में अनाज जमा था। बन्दर ने उसे लेने के लिए हाथ डाला और मुट्ठी में भरकर अनाज निकालना चाहा। छोटा मुँह होने के कारण वह हाथ निकल न सका, बेचारा पड़ा-पड़ा चीखता रहा कि अनाज ने मेरा हाथ पकड़ लिया है, पर ज्योंही उसे असलियत का बोध हुआ कि मैंने मुट्ठी बाँध रखी है, इसे छोड़ूँ तो सही। जैसे ही उसने उसे छोड़ा कि अनाज ने बन्दर को छोड़ दिया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/mai_kya_hun/part1.3

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 60)

🔵 मानसिक तथा नैतिक अनुभवों के महत् सातत्य पर विचार करो। तब तुम्हारे सामने यह स्पष्ट हो जायेगा कि जब तक प्रगति पूर्णता में पर्यवसित नहीं होती तब तक मनुष्य का पुन: पुन: जन्म होता ही रहता है। प्रत्येक व्यक्ति अपने विचारों, इच्छाओं तथा कर्मों द्वारा एक एक संसार का निर्माण कर रहा है जिसका कि वह स्वयं शासक होगा। वस्तुगत अनुभवों के समुद्र की तलहटी का स्पर्श कर तथा उससे परे व्यक्तिगत चेतना के शुद्ध आत्मा की अनुभूति के प्रयत्न में जीव को एक नहीं असंख्य शरीर धारण करने पड़ते है।

🔴 सिद्धियों तथा कोरी विद्या की इच्छा का दमन करो। मिथ्याज्ञान का बढ़ना तथा सिद्धियाँ प्राप्त करना अपने आप में विनाशकारी हैं क्योंकि वे अहंकार को बढ़ाते हैं तथा व्यक्ति को अधिक स्वार्थी बना देते हैं। चेतना का विभिन्न प्रकार से विस्तार आध्यात्मिक प्रक्रिया की एक मानी हुई घटना है। किन्तु यह पूर्णता: आनुसंगिक है। परन्तु जब इसे ही आत्मसाक्षात्कार के लक्ष्य श्रेष्ठ मान लिया जाता है तब यह साधना के मार्ग में हजारों गुण अधिक बाधा उत्पन्न कर देता है।

🔵 जैसे कि तुम एक पागल कुत्ते से सावधान रहते हो उसी प्रकार अहंकार से सावधान रहो। जिस प्रकार कि तुम विष का स्पर्श नहीं करोगे या विषधर साँप से नहीं खेलोगे, उसी प्रकार सिद्धियों, तथाकथित सिद्धियों से दूर रहो। अपने मन तथा बुद्धि की सभी शक्तियों को ईश्वर की ओर मोड़ दो। आध्यात्मिक जीवन का और क्या लक्ष्य होगा ?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

रविवार, 23 अक्टूबर 2016

👉 मैं क्या हूँ ? What Am I ? (भाग 8)

🌞 पहला अध्याय

🔵 आत्म भाव में जगा हुआ मनुष्य अपने आपको आत्मा मानता है और आत्मकल्याण के, आत्म सुख के कार्यों में ही अभिरुचि रखता और प्रयत्नशील रहता है। उसे धर्म संचय के कार्यों में अपने समय की एक-एक घड़ी लगाने की लगन लगी रहती है।

🔴 इस प्रकार शरीर भावी व्यक्ति का जीवन पाप की ओर, पशुत्व की ओर चलता है और आत्मभावी व्यक्ति का जीवन प्रवाह पुण्य की ओर, देवत्व की ओर प्रवाहित होता है। यह सर्व विदित है कि इस लोक और परलोक में पाप का परिणाम दुःखदाई और पुण्य का परिणाम सुखदाई होता है। अपने को आत्मा समझने वाले व्यक्ति सदा आनन्दमयी स्थिति का रसास्वादन करते हैं।

🔵 जिसे आत्मज्ञान हो जाता है वह छोटी घटनाओं से अत्यधिक प्रभावित, उत्तेजित या अशान्त नहीं होता। लाभ-हानि, जीवन-मरण, विरह-विछोह, मान-अपमान, लोभ-मोह, क्रोध, काम, भोग, राग-द्वेष आदि की कोई घटना उसे अत्यधिक क्षुभित नहीं करती, क्योंकि वह जानता है कि यह सब परिवर्तनशील संसार में नित्य का स्वाभाविक क्रम है।

🔴 मनोवांछित वस्तु या स्थिति सदा प्राप्त नहीं होती, कालचक्र के परिवर्तन के साथ-साथ अनिच्छित घटनाएँ भी घटित होती रहती हैं, इसलिए उन परिवर्तनों को एक मनोरंजन की तरह, नाट्य रंगमंच की तरह, कौतूहल और विनोद की तरह देखता है। किसी अनिच्छित स्थिति को सामने आया देखकर वह बेचैन नहीं होता। आत्मज्ञानी उन मानसिक कष्टों से सहज ही बचा रहता है जिनसे शरीर भावी लोग सदा व्यथित और बेचैन रहते हैं और कभी-कभी तो अधिक उत्तेजित होकर आत्महत्या जैसे दुःखद परिणाम उपस्थित कर लेते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/mai_kya_hun/part1.3

मंगलवार, 18 अक्टूबर 2016

👉 मैं क्या हूँ ? What Am I ? (भाग 7)

🔴 पहला अध्याय

🔵 इससे शरीर और मन का अभिरंजन तो होता है, पर आत्मा को इस लोक और परलोक में कष्ट उठाना पड़ता है। आत्मा के स्वार्थ के सत्कर्मों में शरीर को भी कठिनाइयाँ उठानी पड़ती हैं। तप, त्याग, संयम, ब्रह्मचर्य, सेवा, दान आदि के कार्यों में शरीर को कसा जाता है। तब ये सत्कर्म सधते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि शरीर के स्वार्थ और आत्मा के स्वार्थ आपस में मेल नहीं खाते, एक के सुख में दूसरे का दुःख होता है। दोनों के स्वार्थ आपस में एक-दूसरे के विरोधी हैं। 

🔴 इन दो विरोधी तत्त्वों में से हमें एक को चुनना होता है। जो व्यक्ति अपने आपको शरीर समझते हैं, वे आत्मा के सुख की परवाह नहीं करते और शरीर सुख के लिए भौतिक सम्पदाएँ, भोग सामग्रियाँ एकत्रित करने में ही सारा जीवन व्यतीत करते हैं। ऐसे लोगों का जीवन पशुवत् पाप रूप, निकृष्ट प्रकार का हो जाता है। धर्म, ईश्वर, सदाचार, परलोक, पुण्य, परमार्थ की चर्चा वे भले ही करें, पर यथार्थ में उनका पुण्य परलोक स्वार्थ साधन की ही चारदीवारी के अन्दर होता है। यश के लिए, अपने अहंकार को तृप्त करने के लिए, दूसरों पर अपना सिक्का जमाने के लिए वे धर्म का कभी-कभी आश्रय ले लेते हैं।

🔵 वैसे उनकी मनःस्थिति सदैव शरीर से सम्बन्ध रखने वाले स्वार्थ साधनों में ही निमग्न रहती है। परन्तु जब मनुष्य आत्मा के स्वार्थ को स्वीकार कर लेता है, तो उसकी अवस्था विलक्षण एवं विपरीत हो जाती है। भोग और ऐश्वर्य के प्रयत्न उसे बालकों की खिलवाड़ जैसे प्रतीत होते हैं। शरीर जो वास्तव में आत्मा का एक वस्त्र या औजार मात्र है, इतना महत्त्वपूर्ण उसे दृष्टिगोचर नहीं होता है कि उसी के ऐश-आराम में जीवन जैसे बहुमूल्य तत्त्व को बर्बाद कर दिया जाय।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 19 Oct 2016



सोमवार, 17 अक्टूबर 2016

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 18 Oct 2016

  

👉 गहना कर्मणोगति: (भाग 6)

चित्रगुप्त का परिचय

🔴 बाहरी दुनियाँ में मुलजिम को सजा दिलाने का काम दो महकमों के आधीन है, एक पुलिस, दूसरा अदालत। पुलिस तो मुलजिम को पकड़ ले जाती है और उसके कामों का सबूत एकत्रित करके अदालत के सामने पेश करती है, फिर अदालत का महकमा अपना काम करता है। जज महाशय अपराध और अपराधी की स्थिति के बारे में बहुत दृष्टियों से विचार करते हैं, तब जैसा उचित होता है वैसा फैसला करते हैं। एक ही जुर्म में आए हुए अपराधियों को अलग-अलग तरह की सजा देते हैं। तीन खूनी पकड़ कर लाए गए, इनमें से एक को बिल्कुल बरी कर दिया, दूसरे को पाँच साल की सजा मिली, तीसरे को फाँसी।

🔵 हत्या तीनों ने की थी, पर सजा देते वक्त मजिस्ट्रेट ने बहुत बातों पर विचार किया। जिसे बरी कर दिया गया था, वह मकान बनाने वाला मजदूर था, छत पर काम करते वक्त पत्थर का टुकड़ा उसके हाथ से अचानक छूट गया और वह नीचे सड़क पर चलते एक मुसाफिर के सिर में लगा, सिर फट गया, मुसाफिर की मृत्यु हो गई। जज ने देखा की हत्या तो अवश्य हुई, मजदूर निर्दोष है, उसने जान-बूझकर बुरे इरादे से पत्थर नहीं फेंका था, इसलिए उसे बरी कर दिया गया। दूसरा मुलजिम एक किसान था। खेत काटते हुए चोर को ऐसी लाठी मारी कि वह मर गया। मजिस्ट्रेट ने सोचा-चोरी होते देखकर गुस्सा आना स्वाभाविक है, पर किसान की इतनी गलती है कि मामूली अपराध पर इतना नहीं मारना चाहिए था, इसलिए उसे पाँच साल की सजा मिली। तीसरा मुलजिम एक मशहूर डाकू था। एक धनी पुरुष के घर में रात को घुस गया और उसका कत्ल करके धन-माल चुरा लाया। इसका अपराध जघन्य था इसलिए फाँसी की सजा दी गई।

🔴 तीनों ही अपराधियों ने खून किया था, जुर्म का बाहरी रूप एक-सा था, पर मजिस्ट्रेट सूक्ष्मदर्शी होता है, वह बाहरी बातों को देखकर ही सजा नहीं दे डालता वरन् भीतरी बारीकियों पर भली प्रकार विचार करके तब कुछ फैसला करता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/gah/chir.2

👉 मैं क्या हूँ ? What Am I ? (भाग 6)

🔴 पहला अध्याय

🔵 जीवन की वास्तविक सफलता और समृद्घि आत्मभाव में जागृत रहने में है। जब मनुष्य अपने को आत्मा अनुभव करने लगता है तो उसकी इच्छा, आकांक्षा और अभिरुचि उन्हीं कामों की ओर मुड़ जाती है, जिनसे आध्यात्मिक सुख मिलता है। हम देखते हैं कि चोरी, हिंसा, व्यभिचार, छल एवं अनीति भरे दुष्कर्म करते हुए अन्तःकरण में एक प्रकार का कुहराम मच जाता है, पाप करते हुए पाँव काँपते हैं और कलेजा धड़कता है इसका तात्पर्य यह है कि इन कामों को आत्मा नापसन्द करता है।

🔴 यह उसकी रुचि एवं स्वार्थ के विपरीत है। किन्तु जब मनुष्य परोपकार, परमार्थ, सेवा, सहायता, दान, उदारता, त्याग, तप से भरे हुए पुण्य कर्म करता है तो हृदय के भीतरी कोने में बड़ा ही सन्तोष, हलकापन, आनन्द एवं उल्लास उठता है। इसका अर्थ है कि यह पुण्य कर्म आत्मा के स्वार्थ के अनुकूल है। वह ऐसे ही कार्यों को पसन्द करता है। आत्मा की आवाज सुनने वाले और उसी की आवाज पर चलने वाले सदा पुण्य कर्मी होते हैं। पाप की ओर उनकी प्रवृत्ति ही नहीं होती इसलिए वैसे काम उनसे बन भी नहीं पड़ते।

🔵  आत्मा को तत्कालीन सुख सत्कर्मों में आता है। शरीर की मृत्यु होने के उपरान्त जीव की सद्गति मिलने में भी हेतु सत्कर्म ही हैं। लोक और परलोक में आत्मिक सुख-शान्ति सत्कर्मो के ऊपर ही निर्भर है। इसलिए आत्मा का स्वार्थ पुण्य प्रयोजन में है। शरीर का स्वार्थ इसके विपरीत है। इन्द्रियाँ और मन संसार के भोगों को अधिकाधिक मात्रा में चाहते हैं। इस कार्य प्रणाली को अपनाने से मनुष्य नाशवान शरीर की इच्छाएँ पूर्ण करने में जीवन को खर्च करता है और पापों का भार इकट्ठा करता रहता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 59)

गुरुदेव की वाणी ने पुन: मेरी आत्मा से कहा: -

🔵 अपने शरीर से ऐसा व्यवहार करो मानों वह तुमसे भिन्न कोई है। यदि तुम उससे कहो कि ऐसा कर तो वह करेगा। आचार्य ने कहा अंगीठी की सजावट के ऊपर की घड़ी के समान स्वयं को बैठे हुए कल्पना करो तथा तुम्हारे अपने आने जाने को देखो। तुम पाओगे कि उनमें से अधिकांश कितने व्यर्थ तथा निरर्थक हैं। अत: तात्कालिक घटनाओं को अनावश्यक महत्त्व न दो, न ही उनसे आसक्त होओ। यदि भौतिक वस्तुओं का अध्यात्मीकरण नहीं कर सकते तो उनकी उपेक्षा करो।

🔴 दैनंदिन जीवन में आध्यात्मिकता को लाना अवश्य ही बहुत कठिन है, किन्तु परीक्षा वही है। केवल (आध्यात्मिक) ऊँचाइयों में ही नहीं (सांसारिक परिस्थितियों) घाटियों में भी ईश्वर को अपने सामने देखना होगा। सचमुच वह मन कितना एकाग्र होता है जो कि साधारण परिस्थितियों में भी आध्यात्मिकता की झलक देख सकता है।

🔵 अहंकार के थोड़े से भी चिह्न को उखाड़ फेंको। जितना अधिक तुम अपने व्यक्तित्व का अध्ययन करोगे उतना ही अधिक तुम पाओगे कि तुम्हारे कार्यों तथा विचारों में अहंकार ही दौड़ा आ रहा है। अहंकार को केवल जीतना ही नहीं होगा अपितु उसका पूर्णतः दमन करना होगा। आत्मदोष तथा आत्माग्लानि में भी इस दमित अहंकार का अस्तित्व दीख पड़ता है। सच्चा आत्मसाक्षात्कारी पुरुष न तो दूसरों को दोष देता है ने -स्वयं को ही। महत् वस्तुओं से आवृत होने के कारण वह परिस्थितियों की उपेक्षा करता है।

🔴 अपने को मरा हुआ देखो। जीवित अवस्था में भी स्वयं को शरीर से भिन्न कर लो। वस्तुओं के रूप नहीं उनकी आत्मा को देखो। तब तुम्हारी नई और शुद्ध दृष्टि में समस्त जीवन एक नये आलोक में दीख पड़ेगा तथा तुम्हारे सामने उच्चतर और नये रूप में उद्भासित होगा। एकदम नये आध्यात्मिक रूपों में।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

रविवार, 16 अक्टूबर 2016

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 17 Oct 2016




👉 गहना कर्मणोगति: (भाग 5)

चित्रगुप्त का परिचय

🔴 पिछली पंक्तियों में पाठक पढ़ चुके हैं कि हमारा गुप्त चित्र अंतर्मन ही निरंतर चित्रगुप्त देवता का काम करता रहता है। जो कुछ भले या बुरे काम हम करते हैं, उनका सूक्ष्म चित्र उतार-उतार कर अपने भीतर जमा करता रहता है। सिनेमा की पर्दे पर मनुष्य की बराबर लम्बी-चौड़ी तस्वीर दिखाई देती है, पर उसका फिल्म केवल एक इंच ही चौड़ा होता है। इसी प्रकार पाप-पुण्य का घटनाक्रम तो विस्मृत होता है, पर उसका सूक्ष्म चित्र एक पतली रेखा मात्र के भीतर खिंच जाता है और वह रेखा गुप्त मन के किसी परमाणु पर अदृश्य रूप से जमकर बैठ जाती है। शार्टहैंड लिखने वाले बड़ी बात को थोड़ी सी उल्टी-सीधी लकीरों के इशारे पर जरा से कागज पर लिख देते हैं। कर्मरेखा को ऐसी ही दैवी शार्टहैंड समझा जा सकता है।

🔵 पाठकों को इतनी जानकारी तो बहुत पहले हो चुकी होगी कि मन के दो भाग हैं- एक बहिर्मन, दूसरा अंतर्मन। बाहरी मन तो तर्क-वितर्क करता है, सोचता है, काट-छाँट करता है, निर्णय करता है और अपने इरादों को बदलता रहता है, पर अंर्तमन भोले-भाले किंतु दृढ़ निश्चयी बालक के समान है, वह काट-छाँट नहीं करता वरन् श्रद्धा और विश्वास के आधार पर काम करता है। बाहरी मन तो यह सोच सकता है कि पाप कर्मों की रेखाएँ अपने ऊपर अंकित होने न दूँ और पुण्य कर्मों को बढ़ा-चढ़ाकर अंकित करूँ। जिससे पाप फल न भोगना पड़े और पुण्य फल का भरपूर आनंद प्राप्त हो, परंतु भीतरी मन ऐसा नहीं है।

🔴 यह सत्यनिष्ठ जज की तरह फैसला करता है, कोई लोभ, लालच, भय, स्वार्थ उसे प्रभावित नहीं करता। कहा जाता है कि मनुष्य के अंदर एक ईश्वरीय शक्ति रहती है, दूसरी शैतानी। आप गुप्त मन को ईश्वरीय शक्ति और तर्क, मन, छल-कपट, स्वार्थ, लोभ में रत रहने वाले बाह्य मन को शैतानी शक्ति कह सकते हैं। बाहरी मन धोखेबाजी कर सकता है, परंतु भीतरी मन तो सत्य रूपी आत्मा का तेज है, वह न तो मायावी आचरण करता है, न छल-कपट। निष्पक्ष रहना उसका स्वभाव है। इसलिए ईश्वर ने उसे इतना महत्वपूर्ण कार्य सौंपा है। दुनिया उसे चित्रगुप्त देवता कहती है। यदि वह भी पक्षपात करता, तो भला इतनी ऊँची जज की पदवी कैसे पा सकता था? हमारा गुप्त मन खुफिया जासूस की तरह हर घड़ी साथ-साथ रहता है और जो-जो भले-बुरे काम किए जाते हैं, उनका ऐमालनामा अपनी खुफिया डायरी में दर्ज करता रहता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/gah/chir.2

👉 मैं क्या हूँ ? What Am I ? (भाग 5)*

🔴 पहला अध्याय

🔵 आत्मा शरीर से पृथक् है। शरीर और आत्मा के स्वार्थ भी पृथक हैं। शरीर के स्वार्थों का प्रतिनिधित्व इन्द्रियाँ करती हैं। दस इन्द्रियाँ और ग्यारहवाँ मन यह सदा ही शारीरिक दृष्टिकोण से सोचते और कार्य करते हैं। स्वादिष्ट भोजन, बढ़िया वस्त्र, सुन्दर-सुन्दर मनोहर दृश्य, मधुर श्रवण, रूपवती स्त्री, नाना प्रकार के भोग-विलास यह इन्द्रियों की आकांक्षाएँ हैं।

🔴 ऊँचा पद, विपुल धन, दूर-दूर तक यश, रौब, दाब यह सब मन की आकांक्षाएँ हैं। इन्हीं इच्छाओं को तृप्त करने में प्रायः सारा जीवन लगता है। जब यह इच्छाएँ अधिक उग्र हो जाती हैं तो मनुष्य उनकी किसी भी प्रकार से तृप्ति करने की ठान लेता है और उचित-अनुचित का विचार छोड़कर जैसे भी बने स्वार्थ साधने की नीति पर उतर आता है। यही समस्त पापों का मूल केन्द्र बिन्दु है।

🔵 शरीर भाव में जाग्रत रहने वाला मनुष्य यदि आहार, निद्रा, भय, मैथुन के साधारण कार्यक्रम पर चलता रहे तो भी उस पशुवत जीवन में निरर्थकता ही है, सार्थकता कुछ नहीं। यदि उसकी इच्छाएँ जरा अधिक उग्र या आतुर हो जायें तब तो समझिये कि वह पूरा पाप पुंज शैतान बन जाता है, अनीतिपूर्वक स्वार्थ साधने में उसे कुछ भी हिचक नहीं होती। इस दृष्टिकोण के व्यक्ति न तो स्वयं सुखी रहते हैं और न दूसरों को सुखी रहने देते हैं।

🔴 काम और लोभ ऐसे तत्त्व हैं कि कितना ही अधिक से अधिक भोग क्यों न मिले वे तृप्त नहीं होते, जितना ही मिलता है उतनी ही तृष्णा के साथ-साथ अशान्ति, चिन्ता, कामना तथा व्याकुलता भी दिन दूनी और रात चौगुनी होती चलती है। इन भोगों में जितना सुख मिलता है उससे अनेक गुना दुःख भी साथ ही साथ उत्पन्न होता चलता है। इस प्रकार शरीर भावी दृष्टिकोण मनुष्य को पाप, ताप, तृष्णा तथा अशान्ति की ओर घसीट ले जाता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 58)

🔵 संसार जो अशांति का समुद्र है उसमें एक चट्टान की तरह के रहो। विविधता के इस असीम जंगल में सिंह के समान विचरण करो। सर्वशक्तिमत्ता तुम्हारे पीछे है, किन्तु पहले सांसारिक या केवल भौतिक शक्ति प्राप्ति की सभी इच्छाओं का दमन करो। तुम्हारे मार्ग में आने वाली माया की सभी बाधाओं को वैराग्य के खड्ग से दो टुकडे़ कर डालो। किसी पर शासन न करो।  किसी को तुम पर शासन न करने दो ।

🔴 मृत्यु से न डरो क्योंकि इसी क्षण भी मृत्यु तुम्हारा प्राण हरण कर ले तो भी यह जान रखो कि तुम सही मार्ग पर हो। अत: निर्भय हो कर बढ़ चलो। महत् जीवन में मृत्यु एक घटना मात्र है। मृत्यु के परे भी आध्यात्मिक उन्नति की सुविधायें और संभावनायें हैं। व्यक्ति क्या हो सकता है इसका कोई अन्त नहीं। सब कुछ व्यक्तिगत प्रयत्न पर निर्भर करता हैं। ईश्वर की कृपा तो -सदैव हमारे साथ है ही।

🔵 अपने आसपास की सभी वस्तुओं का अध्ययन करो। और तुम पाओगे कि प्रत्येक वस्तु में तुम्हारे लिये एक आध्यात्मिक सन्देश है। एक की ही सर्वोपरि सत्ता है। वह एक जो अनेक के प्रत्येक पक्ष में विद्यमान है। विविधता अपने विक्षेपकारी भेदों द्वारा भले ही तुम्हें छलती रहे तब भी तुम सर्वव्यापी एकत्व की पूजा करो। आभास छलता है जैसी कि कहावत है। किन्तु मनुष्य का यह कर्त्तव्य है की वह छल को पकड़े तथा सभी आभासों के पीछे के सत्य का दर्शन करे।

🔴 प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्मों का अभिरक्षक है, प्रत्येक व्यक्ति अपने बंधन को तोड़ने वाला है। प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं अपने लिये सत्य की खोज करनी होगी। दूसरा कोई रास्ता नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी ही भूमि पर खड़ा है। प्रत्येक को अपना युद्ध स्वयं लड़ना होगा। क्योंकि अनुभूति सदैव पूर्णत: व्यक्तिगत अनुभव ही है। अन्ततोगत्वा प्रत्येक व्यक्ति स्वयं का उद्धारकर्ता तथा स्वामी है। क्योंकि परमात्मा जो सर्वदा वर्तमान है वह पूर्ण एकत्व के रूप में व्यक्तित्व के प्रत्येक अंश में उद्भासित हो उठेगा। यही उपदेश है। इसकी ही अनुभूति करनी है और इसकी अनुभूति होने पर वह महान्- लक्ष्य (ईश्वर दर्शन) भी प्राप्त हो जायेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

💎 चार कीमती रत्न 💎

1~ पहला रत्न है: "माफी"🙏
 
तुम्हारे लिए कोई कुछ भी कहे, तुम उसकी बात को कभी अपने मन में न बिठाना, और ना ही उसके लिए कभी प्रतिकार की भावना मन में रखना, बल्कि उसे माफ़ कर देना।

2~ दूसरा रत्न है: "भूल जाना"🙂

अपने द्वारा दूसरों के प्रति किये गए उपकार को भूल जाना, कभी भी उस किए गए उपकार का प्रतिलाभ मिलने की उम्मीद मन में न रखना।

3~ तीसरा रत्न है: "विश्वास"�

हमेशा अपनी महेनत और उस परमपिता परमात्मा पर अटूट विश्वास रखना। यही सफलता का सूत्र है।

4~ चौथा रत्न है: "वैराग्य"

हमेशा यह याद रखना कि जब हमारा जन्म हुआ है तो निश्चित ही हमें एक दिन मरना ही है। इसलिए बिना लिप्त हुवे जीवन का आनंद लेना। वर्तमान में जीना।💫

🌻💥💐🌻💥💐

शनिवार, 15 अक्टूबर 2016

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 16 Oct 2016




👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 57)

🔵 अपनी जड़ता से स्वयं को जगाओ। अपने संपूर्ण स्वभाव का पुनर्निर्माण करो। सर्वव्यापी सौंदर्य के प्रति अपनी आँखे खोलो। प्रकृति  से संपर्क करो। बहुत सी बातें जो तुम्हें अभी ज्ञात नहीं हैं, वह प्रकृति तुम्हें सिखा देगी। वह तुम्हें व्यक्तित्व की महान शांति प्रदान करेगी। तुम्हारे चारों ओर के दृश्य में अदृश्य परमात्मा को देखो। साक्षी बनो। कर्त्ता कर्मफल के भार से दबा होता है। यदि तुम्हें कर्म करना ही फड़े तो कर्म में भी साक्षी बनो।

🔴 आत्मनिरीक्षण तथा आत्मसाक्षात्कार के अतिरिक्त और किसी बात की चिंता न करो तुममें जो सर्वश्रेष्ठ है उसे करो। दूसरों के मतामत की ओर ध्यान न दो। शक्तिशाली बनो। अपने स्वयं की आत्मा को गुरु बनाओ। महान् आदर्श तथा विचारों से उसे लबालब भर दो जिससे कि वह स्वयं सर्वोच्च परमात्मा को अभिव्यक्त करने के लिये व्याकुल हो उठे। एक बार सशक्त हो उठने पर वह स्वयं जाग उठेगा। तब स्वप्न में भी न सोची गई वस्तुएँ तुम्हारे सामने उद्घाटित हो उठेंगी।

🔵 निन्दा से बचो। क्या तुम अपने बंधु के रखवाले हो ? क्या तुम उसके कर्मों के संरक्षक हो ? किसने तुम्हें उसका निर्णायक बनाया है? दूसरों के अनुचित आचरण की सूक्ष्म स्मृति तक को पोंछ डालो। अपने स्वयं की चिन्ता करो। तुम स्वयं में ही बहुत सी निन्दनीय बातें पाओगे। साथ ही बहुत सी ऐसी भी बातें पाओगे जो तुम्हें आनन्द देंगी। प्रत्येक व्यक्ति का उसके अपने आप में उसका अपना संसार होना चाहिये।

🔴 तुम्हारे भीतर के (निम्न) मनुष्य को मर जाने दो जिससे कि परमात्मा प्रकाशित हो सके। किसी भी बात की चिन्ता न कर शांति से रहना क्या अच्छा नहीं है ? मनुष्य पर आस्था न रखो। आस्था रखो भगवान पर। वे तुम्हारा मार्गदर्शन करेंगे तथा तुम्हें आगे ले जायेंगे।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 मैं क्या हूँ ? What Am I ? (भाग 4)

 🔴 पहला अध्याय

🔵 मनुष्य शरीर में रहता है, यह ठीक है, पर यह भी ठीक है कि वह शरीर नहीं है। जब प्राण निकल जाते हैं तो शरीर ज्यों का त्यों बना रहता है, उसमें से कोई वस्तु घटती नहीं तो भी वह मृत शरीर बेकाम हो जाता है। उसे थोड़ी देर रखा रहने दिया जाय तो लाश सड़ने लगती है, दुर्गन्ध उत्पन्न होती है और कृमि पड़ जाते हैं। देह वही है, ज्यों की त्यों है, पर प्राण निकलते ही उसकी दुर्दशा होने लगती है। इससे प्रकट है कि मनुष्य शरीर में निवास तो करता है पर वस्तुतः वह शरीर से भिन्न है। इस भिन्न सत्ता को आत्मा कहते हैं। वास्तव में यही मनुष्य है। मैं क्या हूँ? इसका सही उत्तर यह है कि मैं आत्मा हूँ।
🔴 शरीर और आत्मा की पृथकता की बात हम लोगों ने सुन रखी है। सिद्घान्ततः हम सब उसे मानते भी है। शायद कोई ऐसा विरोध करे कि देह से जीव पृथक नहीं है, इस पृथकता की मान्यता सिद्घान्त रूप से जैसे सर्व साधारण को स्वीकार है, वैसे ही व्यवहार में सभी लोग उसे अस्वीकार करते हैं। लोगों के व्यवहार ऐसे होते हैं मानो वे वस्तुतः शरीर ही हैं। शरीर के हानि-लाभ उनके हानि-लाभ हैं। किसी व्यक्ति का बारीकी के साथ निरीक्षण किया जाय और देखा जाय कि वह क्या सोचता है? क्या कहता है? और क्या करता है? तो पता चलेगा कि वह शरीर के बारे में सोचता है, उसी के सम्बन्ध में सम्भाषण करता है और जो कुछ करता है, शरीर के लिए करता है। शरीर को ही उसने 'मैं' मान रखा है।

🔵 शरीर आत्मा का मन्दिर है। उसकी स्वस्थता, स्वच्छता और सुविधा के लिए कार्य करना उचित एवं आवश्यक है, परन्तु यह अहितकर है कि केवल मात्र शरीर के ही बारे में सोचा जाय, उसे अपना स्वरूप मान लिया जाय और अपने वास्तविक स्वरूप को भुला दिया जाय। मनुष्य अपने आपको शरीर मान लेने के कारण शरीर के हानि-लाभों को भी अपने हानि-लाभ मान लेता है और अपने वास्तविक हितों को भूल जाता है। यह भूल-भुलैया का खेल जीवन को बड़ा कर्कश और नीरस बना देता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गहना कर्मणोगति: (भाग 4)

चित्रगुप्त का परिचय

🔴 भले-बुरे कर्मों का ग्रे मैटर के परमाणुओं पर यह रेखांकन (जिसे प्रकट के शब्दों में अंतःचेतना का संस्कार कहा जा सकता है) पौराणिक चित्रगुप्त की वास्तविकता को सिद्ध कर देता है। चित्रगुप्त शब्द के अर्थों से भी इसी प्रकार की ध्वनि निकलती है। गुप्त चित्र, गुप्त मन, अंतःचेतना, सूक्ष्म मन, पिछला दिमाग, भीतर चित्र इन शब्दों के भावार्थ को ही चित्रगुप्त शब्द प्रकट करता हुआ दीखता है। ‘चित्त’ शब्द को जल्दी में लिख देने से ‘चित्र’ जैसा ही बन जाता है। सम्भव है कि चित्त का बिगाड़ कर चित्र बन गया हो या प्राचीनकाल में चित्र को चित्त और चित्र एक ही अर्थ के बोधक रहे हों। कर्मों की रेखाएँ एक प्रकार के गुप्त चित्र ही हैं, इसलिए उन छोटे अंकनों में गुप्त रूप से, सूक्ष्म रूप से, बड़े-बड़े घटना चित्र छिपे होते हैं, इस क्रिया प्रणाली को चित्रगुप्त मान लेने से प्राचीन शोध का समन्वय हो जाता है।

🔵 यह चित्रगुप्त निःसंदेह हर प्राणी के हर कार्य को, हर समय बिना विश्राम किए अपनी बही में लिखता रहता है। सबका अलग-अलग चित्रगुप्त है। जितने प्राणी हैं, उतने ही चित्रगुप्त हैं, इसलिए यह संदेह नहीं रह जाता कि इतना लेखन कार्य किस प्रकार पूरा हो पाता होगा। स्थूल शरीर के कार्यों की सुव्यवस्थित जानकारी सूक्ष्म चेतना में अंकित होती रहे, तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। ‘पौराणिक चित्र गुप्त एक है और यहाँ अनेक हुए’ यह शंका भी कुछ गहरी नहीं है। घटाकाश, मठाकाश का ऐसा ही भेद है। इंद्र, वरुण, अग्नि, शिव, यम, आदि देवता बोधक सूक्ष्मत्व व्यापक समझे जाते हैं। जैसे बगीचे की वायु गंदे नाले की वायु आदि स्थान भेद से अनेक नाम वाली होते हुए भी मूलतः विश्व व्यापक वायु तत्व एक ही है, वैसे ही अलग-अलग शरीरों में रहकर अलग-अलग काम करने वाला चित्रगुप्त देवता भी एक ही तत्त्व है।

🔴  यह हर व्यक्ति के कर्मों लेखाकिस आधार पर कैसा, किस प्रकार, कितना, क्यों लिखता है? यह अगली पंक्तियों में बताया जाएगा एवं चित्रगुप्त द्वारा लिखी हुई कर्म रेखाओं के आधार पर स्वर्ग-नरक का विवरण और उनके प्राप्त होने की व्यवस्था पर प्रकाश डाला जाएगा।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/gah/chir.2

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2016

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 15 Oct 2016





👉 गहना कर्मणोगति: (भाग 3)

चित्रगुप्त का परिचय

🔴 आधुनिक शोधों ने उपरोक्त अलंकारिक कथानक में से बड़ी ही महत्वपूर्ण सच्चाई को खोज निकाला है, डॉक्टर फ्राइड ने मनुष्य की मानसिक रचना का वर्णन करते हुए बताया है कि जो भी भले या बुरे काम ज्ञानवान प्राणियों द्वारा किए जाते हैं, उनका सूक्ष्म चित्रण अंतः चेतना में होता रहता है। ग्रामोफोन के रिकार्डों में रेखा रूप में गाने भर दिए जाते हैं। संगीतशाला में नाच-गाना हो रहा है और साथ ही अनेक बाजे बज रहे हैं, इन अनेक प्रकार की ध्वनियों का विद्युत शक्ति से एक प्रकार का संक्षिप्त एवं सूक्ष्म एकीकरण होता है और वह रिकार्ड में जरा-सी जगह में रेखाओं की तरह अंकित होता जाता है।

🔵 तैयार किया हुआ रिकार्ड रखा रहता है वह तुरंत ही अपने आप या चाहे जब नहीं बजने लगता वरन तभी उन संग्रहीत ध्वनियों को प्रकट करता है, जब ग्रामोफोन की मशीन पर उसे घुमाया जाता है और सुई की रगड़ उन रेखाओं से होती है। ठीक इसी प्रकार भले और बुरे जो भी काम किए जाते है, उनकी सूक्ष्म रेखाएँ अंतः चेतना के ऊपर अंकित होती रहती हैं और मन के भीतरी कोने में धीरे-धीरे जमा होती जाती हैं। जब रिकार्ड पर सुई का आघात लगता है, तो उसमें भरे हुए गाने प्रकट होते हैं। इसी प्रकार गुप्त मन में जमा हुई रेखाएँ किसी उपयुक्त अवसर का आघात लगने पर ही प्रकट होती हैं। भारतीय विद्वान् ‘कर्म रेखा’ के बारे में बहुत प्राचीनकाल से जानकारी रखते आ रहे हैं। ‘कर्म रेख नहिं मिटे, करे कोई लाखन चतुराई’ आदि अनेक युक्तियाँ हिंदी और संस्कृत साहित्य में मौजूद हैं, जिनसे प्रकट होता है कि कर्मों की कई रेखाएँ होती हैं,जो अपना फल दिए बिना मिटती नहीं।

🔴 भाग्य के बारे में मोटे तौर से ऐसा समझा जाता है कि सिर की अगली मस्तक वाली हड्डी पर कुछ रेखाएँ ब्रह्मा लिख देता है और विधि के लेख को मेंटनहारा अर्थात् उन्हें मिटाने वाला कोई नहीं है। डॉक्टर वीबेन्स ने मस्तिष्क में भरे हुए ग्रे मैटर (भूरा चर्बी जैसा पदार्थ) का सूक्ष्म दर्शक यंत्रों की सहायता से खोज करने पर वहाँ के एक-एक परमाणु में अगणित रेखाएँ पाई हैं, यह रेखाएँ किस प्रकार बनती हैं, इसका कोई शारीरिक प्रत्यक्ष कारण उन्हें नहीं मिला, तब उन्होंने अनेक मस्तिष्कों के परमाणुओं का परीक्षण करके यह निष्कर्ष निकाला की अक्रिय, आलसी एवं विचार शून्य प्राणियों में यह रेखाएँ बहुत ही कम बनती हैं, किंतु कर्मनिष्ठ एवं विचारवानों में इनकी संख्या बहुत बड़ी होती है। अतएव यह रेखाएँ शारीरिक और मानसिक कार्यों को संक्षिप्त और सूक्ष्म रुप से लिपिबद्ध करने वाली प्रमाणित हुईं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/gah/chir.1

👉 मैं क्या हूँ ? What Am I ? (भाग 3)


🔴 पहला अध्याय

🔵 जब वह समझ जाता है कि मैं क्या हूँ तब उसे वास्तविक ज्ञान हो जाता है और सब पदार्थों का रूप ठीक से देखकर उसका उचित उपयोग कर सकता है। चाहे किसी दृष्टि से देखा जाय आत्मज्ञान ही सर्वसुलभ और सर्वोच्च ठहरता है।

🔴 किसी व्यक्ति से पूछा जाय कि आप कौन हैं? तो वह अपने वर्ण, कुल, व्यवसाय, पद या सम्प्रदाय का परिचय देगा। ब्राह्मण हूँ, अग्रवाल हूँ, बजाज हूँ, तहसीलदार हूँ, वैष्णव हूँ आदि उत्तर होंगे। अधिक पूछने पर अपने निवास स्थान, वंश व्यवसाय आदि का अधिकाधिक विस्तृत परिचय देगा। प्रश्न के उत्तर के लिए ही यह सब वर्णन हों सो नहीं, उत्तर देने वाला यथार्थ में अपने को वैसा ही मानता है। शरीर-भाव में मनुष्य इतना तल्लीन हो गया है कि अपने आपको वह शरीर ही समझने लगा है।

🔵 वंश, वर्ण, व्यवसाय या पद शरीर का होता है। शरीर मनुष्य का एक परिधान, औजार है। परन्तु भ्रम और अज्ञान के कारण मनुष्य अपने आपको शरीर ही मान बैठता है और शरीर के स्वार्थ तथा अपने स्वार्थ को एक कर लेता है। इसी गड़बड़ी में जीवन अनेक अशान्तियों, चिन्ताओं और व्यथाओं का घर बन जाता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/mai_kya_hun/part1

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 56)

और तब गुरुदेव की वाणी ने कहा:-

🔵 वत्स! स्वयं को अन्तरतम में निविष्ट करो। बाह्य वस्तुएँ तीर और बर्छी के समान हैं जो आत्मा में खरोंचें लगाती हैं। अपनी अन्तरात्मा को अपना निवास स्थान बनाओ। सोलोमन महान ने ठीक ही कहा है - निस्सार वस्तुओं का अभिमान! सभी कुछ निस्सार है। सचमुच ऐसा ही है। मृत्यु के क्षणों में समस्त संसार का धन किस काम का है? उपनिषद के प्रसिद्ध नचिकेता ने कितना अच्छा कार्य किया। त्याग से प्राप्त होने वाली विजय के द्वारा उसने स्वयं यम को जीत लिया। सभी कुछ, जिनका रूप है अवश्य नष्ट होंगे। यही सभी रूपों की नियति है। मन भी एक रूप है इसका भी परिवर्तन तथा विघटन अनिवार्य है। इसलिये तुम नाम रूप के परे जाओ।

🔴 सर्वोच्च दृष्टिकोण से किसी भी वस्तु का उतना मूल्य नहीं है। सर्वोच्च अर्थ में एक बार यदि तुमने अपने हृदय को प्रभु को समर्पित कर दिया तो फिर तुम्हें कोई भी वस्तु बाँध नहीं सकती। इससे तुम्हारे मन में स्वाधीनता तथा विस्तार का भाव आना चाहिये। प्रेम सबसे बड़ी शक्ति है। प्रेम की शक्ति के द्वारा प्रेमास्पद को ढाँकने वाले सभी पर्दों को चीर दिया जा सकता है।

🔵 मन को शुद्ध करो। मन को शुद्ध करो!! यही धर्म का सर्वस्व है। धर्म का यही एक मात्र अर्थ है। सर्वोच्च दिशा में विचारों के सतत प्रवाह का अभ्यास करो। लक्ष्य की स्थिरता का अधिकाधिक विकास करो, तब कोई भी वस्तु तुम्हारा सामना नहीं कर सकेगी। जिस प्रकार चील उड़ती है उसी सरलता से तुम अपने लक्ष्य की ओर बढ़ सकोगे। अहो! यदि कोई सतत परमात्मा का चिन्तन कर सके तो वह स्वयं अपने आप में मुक्ति होगी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2016

👉 मैं क्या हूँ ? What Am I ? (भाग 2)

🔴 पहला अध्याय

कः कालः कानि मित्राणि, को देशः कौ व्ययाऽऽगमौ।
कश्चाहं का च मे शक्तिरितिचिन्त्यं मुहुर्मुहः॥
-चाणक्य नीति 4.18


🔵 ''कौन सा समय है, मेरे मित्र कौन हैं, शत्रु कौन हैं, कौन सा देश (स्थान) है, मेरी आय-व्यय क्या है, मैं कौन हूँ, मेरी शक्ति कितनी है? इत्यादि बातों का बराबर विचार करते रहो।'' सभी विचारकों ने ज्ञान का एक ही स्वरूप बताया है, वह है ''आत्म-बोध''। अपने सम्बन्ध में पूरी जानकारी प्राप्त कर लेने के बाद कुछ जानना शेष नहीं रह जाता। जीव असल में ईश्वर ही है। विचारों से बँधकर वह बुरे रूप में दिखाई देता है, परन्तु उसके भीतर अमूल्य निधि भरी हुई है। शक्ति का वह केन्द्र है और इतना है जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। सारी कठिनाइयाँ, सारे दुःख इसी बात के हैं कि हम अपने को नहीं जानते। जब आत्म स्वरूप को समझ जाते हैं, तब किसी प्रकार का कोई कष्ट नहीं रहता।

🔴 आत्म स्वरूप का अनुभव करने पर वह कहता है-

''नाहं जातो जन्म मृत्यु कुतो मे, नाहं प्राणः क्षुस्मिपासे कुतो मे।
नाहं चित्तं शोक मोहौ कुतो मे, नाहं कर्ता बंध मोक्षौ कुतो मे॥''


🔵 मैं उत्पन्न नहीं हुआ हूँ, फिर मेरा जन्म-मृत्यु कैसे? मैं प्राण नहीं हूँ, फिर भूख-प्यास मुझे कैसी? मैं चित्त नहीं हूँ, फिर मुझे शोक-मोह कैसे? मैं कर्ता नहीं हूँ, फिर मेरा बन्ध-मोक्ष कैसे?

🌹 क्रमशः जारी 🌹
🌹 मैं क्या हूँ? 🌹
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य 🌹

👉 गहना कर्मणोगति: (भाग 2)

चित्रगुप्त का परिचय

🔵 नयन्ति नरकं नूनं मात्मानो मानवान् हतः।
दिवं लोकं च ते तुष्टा इत्यूचुर्मन्त्र वेदिनः।।       

-पंचाध्यायी
           
🔴 (नूनं) निश्चय से (हताः) हनन की हुई (आत्मनः) आत्माएँ (मानवान्) मनुष्यों को (नरकं) नरक को (नयन्ति) ले जाती हैं (च) और (तुष्टा) संतुष्ट हुई (ते) वे आत्माएँ (दिव्य लोकं) दिव्य लोक को ले जाती हैं (इति) ऐसा (मंत्र वेदिनः) रहस्य को समझाने वालों ने (प्रोचुः) कहा है।

🔵 उपरोक्त श्लोक में कहा गया है कि हनन की हुई आत्मा नरक को ले जाती है और संतुष्ट की हुई आत्मा दिव्य लोक प्रदान करती है। श्लोक में इस गुत्थी को सुलझा दिया है कि स्वर्ग-नरक किस प्रकार मिलता है? गरुड़ पुराण में इस सम्बन्ध में एक अलंकारिक विवरण दिया गया है, जिसमें कहा गया है कि यमलोक में ‘चित्रगुप्त’ नामक देवता हर एक जीव के भले-बुरे कर्मों का विवरण प्रत्येक समय लिखते रहते हैं। जब प्राणी मरकर यमलोक में जाता है, तो वह लेखा पेस किया जाता है और उसी के आधार पर शुभ कर्मों के लिए स्वर्ग और दुष्कर्मों के लिए नरक प्रदान किया जाता है।

🔴 साधारण दृष्टि से चित्रगुप्त का अस्तित्व काल्पनिक प्रतीत होता है, क्योंकि पृथ्वी पर अरबों तो मनुष्य ही रहते है, फिर ऐसा ही तथाकथित चौरासी लाख योनियों, जिनमें से अनेक तो मनुष्य जाति से अनेक गुनी अधिक हैं, इन सब की संख्या गिनी जाए, तो इतनी अधिक हो जाएगी कि हमारे अंकगणित की वहाँ तक पहुँच भी न होगी। फिर इतने असंख्य प्राणियों द्वारा पल-पल पर किए जाने वाले कार्यों का लेखा दिन-रात बिना विश्राम के कल्प-कल्पांतों तक लिखते रहना एक देवता के लिए कठिन है। इस प्रकार चित्रगुप्त का कार्य असम्भव प्रतीत होता है, इस कथानक को एक कल्पना मान लेने पर चित्रगुप्त का अस्तित्व भी संदिग्ध हो जाता है।

🌹 क्रमशः जारी 🌹
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य 🌹
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👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 55)

🔵 वत्स! छोटी छोटी बातों पर ध्यान न दो। जब विश्वस्वरूप स्वयं तुम पर प्रकाशित हो उठा है तब व्यौरों का क्या महत्त्व है। व्यौरे सब केवल भौतिक हैं। उन पर अपने मन को केन्द्रित न करो। एकत्व की चिन्ता करो, बहुत्व की नहीं। वैराग्य की भावना लेकर, ब्यौरों के क्या अनुभव आते हैं, उनकी चिन्ता न करो। स्मरण रखो तुम स्वयं ही अपने शत्रु तथा कल्याणाकांक्षी हो। अपने पूर्ण संस्कारों के सके को तुम एक ही झटके से नहीं काट सकते। एक बार तुम्हारे मन में आवश्यक संकल्प जाग उठने पर यह कार्य सरल हो जायेगा तथा मेरी कृपा और आशीर्वाद इस संकल्प को दृढ़ बनाने में तुम्हारे साथ रहेंगे। विश्वास रखो और तुम्हारे साथ सभी शुभ होगा। 
🔴  दूसरों के मतों की चिन्ता क्यों करते हो? तुम्हारी इस मनोवृत्ति से क्या लाभ होगा? जब तक तुम दूसरों के मत की अपेक्षा करते हो तब तक यह जान लो कि तुम्हारे हृदय पर अहंकार का अधिकार है। स्वयं की दृष्टि में सदाचारी बनो फिर दूसरे लोग कुछ भी कहें तुम उनकी चिन्ता नहीं करोगे। परामर्श न लो अपनी उच्च का पालन। केवल अनुभव ही तुम्हें सिखा सकता है। अपने समय को व्यर्थ की चर्चा में नष्ट न करो। इससे तुम्हें कुछ भी लाभ न होगा। प्रत्येक व्यक्ति अपने अनुभव से ही परिचालित होता है। फिर कौन किसे परामर्श दे सकता है? सर्वतोभावेन स्वयं पर निर्भर रहो। मार्गदर्शन के लिये स्वयं के पास जाओ। दूसरों के पास नहीं।

🔵 तुम्हारी निष्ठा तुम्हें दृढ़ता प्रदान करेगी, तुम्हारी दृढ़ता तुम्हें लक्ष्य पर पहुँचा देगी। तुम्हारी निष्ठा तुम्हें दृढ़प्रतिज्ञ भी करेगी तथा तुम्हारी प्रतिज्ञायें तुम्हें सभी प्रकार के भय पर विजय प्रदान करेंगी। मेरा आशीर्वाद तुम पर है; सदैव के लिये है!

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 14 Oct 2016




👉 मैं क्या हूँ ? What Am I ? (भाग 1)

 🔴 भूमिका

🔵  इस संसार मे जानने योग्य अनेक बातें हैं। विद्या के अनेकों क्षेत्र हैं, खोज के लिए, जानकारी प्राप्त करने के लिए अमित मार्ग हैं। अनेकों विज्ञान ऐसे हैं जिनकी बहुत कुछ जानकारी प्राप्त करना मनुष्य की स्वाभाविक वृत्ति है। क्यों? कैसे? कहाँ? कब? के प्रश्न हर क्षेत्र में वह फेंकता है। इस जिज्ञासा भाव के कारण ही मनुष्य अब तक इतना ज्ञान सम्पन्न और साधन सम्पन्न बना है। सचमुच ज्ञान ही जीवन का प्रकाश स्तम्भ है।

🔴  जानकारी की अनेकों वस्तुओं में से ''अपने आपकी जानकारी*'' सर्वोपरि है। हम बाहरी अनेकों बातों को जानते हैं या जानने का प्रयत्न करते हैं पर यह भूल जाते हैं कि हम स्वयं क्या हैं? अपने आपका ज्ञान प्राप्त किए बिना जीवन का क्रम बड़ा डाँवाडोल, अनिश्चित और कंटकाकीर्ण हो जाता है। अपने वास्तविक स्वरूप की जानकारी न होने के कारण मनुष्य न सोचने लायक बातें सोचता है और न करने लायक कार्य करता है। सच्ची सुख-शान्ति का राजमार्ग एक ही है और वह है-''आत्म ज्ञान''।

🔵  इस पुस्तक में आत्म ज्ञान की शिक्षा है। ''मैं क्या हूँ?'' इस प्रश्न का उत्तर शब्दों द्वारा नहीं वरन् साधना द्वारा हृदयंगम कराने का प्रयत्न इस पुस्तक में किया गया है। यह पुस्तक अध्यात्म मार्ग के पथिकों का उपयोगी पथ प्रदर्शन करेगी, ऐसी हमें आशा है।

🌹 क्रमशः जारी 🌹
🌹 मैं क्या हूँ? 🌹
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य 🌹

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गहना कर्मणोगति: (भाग 1)

भूमिका

🔴 निःसंदेह कर्म की बड़ी गहन है। धर्मात्माओं को दुःख, पापियों को सुख, आलसियों को सफलता, उद्योगशीलों को असफलता, विवेकवानों पर विपत्ति, मूर्खों के यहाँ सम्पत्ति, दंभियों को प्रतिष्ठा, सत्यनिष्ठों को तिरस्कार प्राप्त होने के अनेक उदाहरण इस दुनियाँ में देखे जाते हैं। कोई जन्म से ही वैभव लेकर पैदा होते हैं, किन्हीं को जीवन भर दुःख ही दुःख भोगने पड़ते हैं। सुख और सफलता का जो नियम निर्धारित है, वे सर्वांश पूरे नहीं उतरते।

🔵 इन सब बातों को देखकर भाग्य, ईश्वर की मर्जी, कर्म की गति के सम्बन्ध में नाना प्रकार के प्रश्न और संदेहों की झड़ी लग जाती है। इन संदेहों और प्रश्नों का जो समाधान प्राचीन पुस्तकों में मिलता है, उससे आज के तर्कशील युग में ठीक प्रकार समाधान नहीं होता। फलस्वरूप नई पीढ़ी, उन पाश्चात्य सिध्दांतों की ओर झुकती जाती है, जिनके द्वारा ईश्वर और धर्म को ढोंग और मनुष्य को पंचतत्व निर्मित बताया जाता है एवं आत्मा के अस्तित्व से इंकार किया जाता है। कर्म फल देने की शक्ति राज्यशक्ति के अतिरिक्त और किसी में नहीं है। ईश्वर और भाग्य कोई वस्तु नहीं है आदि नास्तिक विचार हमारी नई पीढ़ी में घर करते जा रहे हैं।

🔴 इस पुस्तक में वैज्ञानिक और आधुनिक दृष्टिकोण से कर्म की गहन गति पर विचार किया गया है और बताया गया है कि जो कुछ भी फल प्राप्त होता है, वह अपने कर्म के कारण ही है। हमारा विचार है कि पुस्तक कर्मफल सम्बन्धी जिज्ञासाओं का किसी हद तक समाधान अवश्य करेगी ।

प.श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 इस पुस्तक में हम लोग पढेंगे

  •  चित्रगुप्त का परिचय
  •  आकस्मिक सुख-दुःख
  •  तीन दुःख और उनका कारण
  •  कर्मों की तीन श्रेणियाँ
  •  अपनी दुनियाँ के स्वयं निर्माता
  •  दुःख का कारण पाप ही नहीं है

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 54)

गुरुदेव ने पुन: कहा

🔵 शब्द कहे जा चुके हैं, उपदेश दिये जा चुके हैं अब कार्य करने की आवश्यकता है। बिना आचरण के उपदेश व्यर्थ हैं।तुमने बहुत पहले ही अपने संकल्पों तथा अन्तर्दृष्टि को आचरण में नहीं लाया। इस बात का तुम्हें कितना दुःख होगा! जब रास्ता मिल गया है तब वीरतापूर्वक बढ़ो। जिसने आत्मसाक्षात्कार का दृढ़ संकल्प कर लिया है उसके मार्ग में कौन बाधा दे सकता है! जब तुम अकेले खड़े होओगे तब ईश्वर तुम्हारा साथी होगा, मित्र होगा, सर्वस्व होगा। ईश्वर के सान्निध्य का और अधिक बोध हो सके इसके लिये अन्य सभी का त्याग करना क्या अधिक अच्छा न होगा? जब तुम प्रकृति का त्याग कर दोगे तब प्रकृति स्वयं अपने सौंदर्य को तुम्हारे सामने प्रगट कर देगी। इस प्रकार तुम्हारे लिये सभी कुछ आध्यात्मिक हो जायेगा। फिर एक घास का तिनका भी तुमसे आत्मा की ही बात कहेगा।  

🔴  जब तुमने सब कुछ त्याग दिया है और एकांत पथ में चले जा रहे हो तब स्मरण रखना कि मेरा प्रेम तथा ज्ञान सदैव तुम्हारे साथ रहेगा। तुम मेरे निकट, अत्यन्त निकट रहोगे। तुम्हें और अधिक अन्तर्दृष्टि प्राप्त होगी। इच्छाशक्ति के लिये वर्धिष्णु उद्देश्य प्राप्त होगा तथा विश्वबन्धुत्व के भाव का महान विकास होगा। तुम सभी वस्तुओं के साथ एक हो जाओगे।

वत्स, त्याग ही एक पथ है। स्वयं को आज ही मृत कल्पना करो।   

🔵 कितना भी अरुचिकर क्यों न लगे यह निश्चित जान लो कि कभी, चाहे जिस प्रकार हो, आत्मा के लिये शरीर की आहुति देनी होगी। देहात्मबुद्धि को अवश्य जीतना होगा। मंद उत्साह के साथ, दुर्बल निष्ठा के साथ तुम इस लम्बे पथ पर नहीं चल सकते। समय को सामने से पकड़ो। सुविधा का लाभ तुरंत उठा लो। तुम जैसे हो तथा जो होना चाहते हो, इसके बीच की बाधा को यदि तुम एक छलांग में नहीं पार कर सकते हो, तो उसे पार करने में शीघ्रता करो। जैसे एक शेर अपने शिकार पर टूट पड़ता है उसी -प्रकार स्वयं पर टूट पड़ो। अपने मर्त्य स्वरूप पर दया न करो। तब तुम्हारा अमर स्वरूप चमक उठेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

बुधवार, 12 अक्टूबर 2016

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 13 Oct 2016



👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 53)

🔵 सभी प्रकार के अनुभवों का स्वागत करो। अपने संकुचित दायरे से बाहर निकलो। निर्भीकता तुम्हें मुक्त कर देगी। जैसा कि यह निश्चित है कि जीवन में केवल धर्म ही सत्य है, वैसा ही यह भी निश्चित है कि संन्यास ही सच्चा आध्यात्मिक साधन है। धर्म के समान ही त्याग भी कोई एक विशेष विधान नहीं है। यह समग्रता है, चेतना की एक अवस्था है, व्यक्तित्व की एक स्थिति है। अनुभूति में तुम्हें स्वयं ईश्वर के आमने सामने होना होगा। त्याग में तुम्हें शाश्वत शांति प्राप्त करनी होगी। तुम्हारे लिए कोई दूसरा अनुभूति नहीं कर सकता। उसी प्रकार तुम्हारे लिये कोई दूसरा त्याग नहीं कर सकता। अत: साहसी बनो और स्वयं अपने पैरों पर खड़े हो जाओ। स्वयं तुम्हारी आत्मा के बिना और कौन तुम्हारी सहायता कर सकता है?    

🔴  अपने मन को अपना गुरु बनाकर, अपनी अन्तरात्मा को अपना भगवान बनाकर गैंडे के समान निर्भीक हो कर बढ़े चलो। जो भी अनुभव आवे आने दो। यह जान लो किए उससे शरीर ही प्रभावित होता है,आत्मा नहीं। ऐसा विश्वास और दृढ़ता रखो कि तुम्हें कोई भी जीत न सके। तब सब कुछ त्याग कर तुम पाओगे कि सभी वस्तुयें तुम्हारे अधीन हैं और तुम अब दास नहीं हो। किन्तु मिथ्या उत्साह से बचो। सुख या दुःख की संवेदनाओं की चिन्ता न करो। केवल बढ़े चलो, बिना पथ के, बिना भय के, बिना पश्चाताप के। सच्चे सन्यासी बनो। मिथ्या धारणाओं का आश्रय न लो। सभी परदों को फाड़- डालो। सभी बंधनों को -काट डालो। सभी भयों को जीत लो तथा आत्मा का साक्षात्कार करो।

🔵 देर न करो। समय कम है तथा जीवन क्षणभंगुर। कल बीत गया है, आज तीव्र गति से भाग रहा है। आगामी कल हाथों के पास आ गया है। केवल ईश्वर पर ही निर्भर रहो। त्याग के द्वारा ही तुम सब कुछ प्राप्त करते हो। त्याग के द्वारा ही तुम सब कर्तव्यों की पूर्ति करते हो। तुम्हारा जीवन दे कर ही तुम शाश्वत जीवन लाभ करते हो। क्योंकि किस जीवन का त्याग करते हो? इन्द्रियासक्त जीवन तथा इन्द्रियानुभूति पूर्ण विचारों का ही तो तुम त्याग करते हो। अपने व्यक्तित्व की गहराइयों में जाओ। वहाँ तुम पाओगे कि आत्मा का अन्तर प्रवाह कार्यरत है जो कि शीघ्र ही उदासीन सतह को त्याग तथा ईश्वर साक्षात्कार के प्रवाह से आप्लावित कर देगा। स्वयं पर विश्वास करो। बहुत समय' तक तुम उदासीन रहे, अब निष्ठावान बनो। अत्यन्त निष्ठावान बनो। तब आत्मा की सभी शुभ वस्तुएँ तुम्हारी हो जायेंगी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

सोमवार, 10 अक्टूबर 2016

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 11 Oct 2016




👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 52)



🔵 इस शरीर को निर्मूल करना ही होगा। अपनी आत्मा का साक्षात्कार करने के दृढ़ निश्चय में इसे जाने दो। वत्स! अंधकार में छलांग लगाओ तब तुम पाओगे कि वही अंधकार प्रकाश में परिवर्तित हो गया है। सभी बंधनों को काट डालो। वरंच शरीर को कल की अनिश्चितता के महाबंधन के अधीन कर दो और तुरंत तुम पाओगे कि तुमने सर्वोच्च स्वतंत्रता प्राप्त कर ली है तथा शरीर तुम्हारी आत्मा का दास बन गया है। 

🔴 आध्यात्मिक जीवन में साहस पूर्ण कदमों की आवश्यकता है जैसा कि सांसारिक जीवन के लिये आवश्यक है। जो खतरा मोल नहीं ले सकता उसे कभी कोई उपलब्धि भी नहीं हो सकती। शरीर को अनिश्चितता के समुद्र में फेंक दो। परिव्राजक सन्यासी के समान बनो। व्यक्तिं, स्थान या वस्तु से आसक्त न हो और यद्यपि तुम शरीर खो दोगे तुम्हें आत्मा की प्राप्ति होगी। शौर्य एक आवश्यक वस्तु है। जंगल के शेर का शौर्य। सशक्त हाथ ही माया के परदे को चीर सकते हैं। कल्पना से कुछ नहीं होगा।

🔵 आवश्यकता है पौरुष की। जब तक शरीर का भय है तब तक आत्मानुभूति नहीं हो सकती। थोड़ा विचार करके देखो, संसारी लोग संसारी वस्तुओं की उपलब्धि के लिए कितना त्याग करते हैं। तब क्या तुम आध्यात्मिक उपलब्धि के लिए त्याग न करोगे? ईश्वरप्राप्ति क्या केवल वाग्मिता या रूपमात्र से हो जायेगी। क्षुद्र आश्रय देने वाले प्रभावों से मुक्त जाओ। खुले में आ जाओ। असीम को अपना क्षितिज बनाओ, समस्त विश्व तुम्हारा क्षेत्र हो जहाँ तुम विचरण करो!

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2016

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 51)

ध्यान की दूसरी घड़ी में गुरुदेव ने कहा: -

🔵 वत्स! मृत्यु किसी भी क्षण आ सकती है, अत: जीवन का सदुपयोग कर लो। जब तुम्हारे मन में कोई उदात्त प्रेरणा जागे तो उसे लोलुपता पूर्वक पकड़ लो। कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारे भूल जाने के पाप के कारण वह सदैव के लिए लुप्त हो जाय। क्योंकि किसी भी आदर्श सिद्धान्त की अनुभूति का एक व्यावहारिक पथ है। अनुभूति की पद्धति भी उतनी ही महत्त्व है जितनी कि स्वयं तत्व की धारणा। अत्यल्प अभ्यास ही क्यों न उसकी तुलना में हजार बड़ी बातों का क्या महत्त्व है? बातों से भावनाएँ जाग सकती हैं किन्तु उस सिद्धांत की अनुभूति के लिए यदि तुम आवश्यक उत्तरदायित्व ग्रहण न करो तो समय तथा भावना व्यर्थ ही नष्ट हुई।    

🔴 अपने हृदय में कपट न रखो। अपनी अकर्मण्यता पर सोने की चादर डाल कर उसे शरणागति न कहो। निश्चित जान -लो आध्यात्मिक भावनाओं के प्रति तुम्हारी प्रतिक्रिया की कमी के पीछे शारीरिक सुख- सुविधा की अनुशोचना है। यदि तुम्हारे मन में कोई कठिन आध्यात्मिक साधना करने की बात पैठ जाय तो बहुत संभव है तुम्हारा शरीर कह उठे, मन, क्या यह आरामदायक होगा? ओह! शारीरिक कारणों से तुम अपने आदर्श से कितने नीचे गिर गये हो!

🔵 वत्स! सांसारिक संघर्षों में जितने साहस की आवश्यकता है उतना ही साहस आध्यात्मिक जीवन के लिए भी आवश्यक है। कृपण व्यक्ति स्वर्ण- संग्रह में जितना अध्यवसाय करता है, सैनिक शत्रु पर आक्रमण करने के लिए जितना साहस रखता है, अविनाशी कोष को प्राप्त करने के लिए सदैव के लिए शरीर को जीत लेने के लिए देहात्मबुद्धि को जीत लेने के लिए तुम्हें उतने ही अध्यवसाय की, उतने ही महान साहस की आवश्यकता। किसी भी प्रकार की अनुभूति के पीछे रहस्य है, अदम्य साहस, सर्वथा भयहीन साहस। आत्मविश्लेषण की क्षमता बढ़ाओ तब तुम देख पाओगे कि जब कभी तुम त्यागपूर्ण जीवन का  साहसपूर्वक पालन करने में असफल होते हो तो वह इसलिये कि तुम्हारा शरीर शुद्र स्वार्थपूर्ण नश्वर दैहिक इच्छाओं को पूर्ण करना चाहता है।  

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 उत्तरदायित्वों को निभायें, महान बनें

उत्तरदायित्वों को जो बोझ मानकर उपेक्षा करता है। उस अच्छे परिणामों से वंचित रह जाना पड़ता है। प्रत्येक मानव की आजीविका कमाने में शर्म, संकोच ...