गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

👉 कुँठित भावनाओं को निकाल दीजिए। (भाग 1)

मन का भाव दब कर मन की एक ग्रन्थि बन जाता है। जो व्यक्ति अनेक मानसिक व्याधियों से ग्रस्त हैं उसका कारण यह दबे हुए नाना प्रकार के कुँठित भाव ही हैं। बचपन की किस कटु अनुभूति के कारण ये दलित भाव दुःख और व्याधि के कारण बनते हैं और मनुष्य को परेशान किए रहते हैं।

क्रोधी, चिड़चिड़ी, बात बात में झगड़ने वाली कर्कशा नारी के बिगड़े हुए स्वभाव का कारण बचपन में उस पर नाना प्रकार के दमन हैं। कठोर व्यवहार भी विकसित होकर गुप्त भावना ग्रन्थि का रूप धारण कर लेता है। जो नारी या पुरुष बच्चों को घृणा करता है, उसका कारण यह है कि उसमें मातृत्व या पितृत्व के सहज स्वाभाविक भाव पनपने नहीं पाये हैं। अनेक पाश्चात्य अविवाहित नारियाँ पालतू कुत्तों तथा बिल्लियों को अपने पास रखती हैं, उनका प्रेम से चुम्बन करती हैं और अपने मातृत्व के सहज वात्सल्य का माधुर्य लूटती हैं। जो कोमल स्नेह नारी की प्राकृतिक सम्पदा है जिससे मानव शिशु पलता - पनपता है, वह कुत्ते बिल्लियों पर न्यौछावर कर के तृप्त किया जाता है। वात्सल्य और प्रेम की इन भावनाओं को निकालने से पाश्चात्य नारियाँ कृत्रिम मातृत्व के सुख का अनुभव करती हैं तथा मन में आह्लादित रहती हैं।

जिन पुरुषों तथा नारियों में इस प्रकार की अन्य अनेक इच्छाएँ कुँठित पड़ी हैं, वे समाज के भय से दलित होकर मन में कुण्ठा उत्पन्न कर सकती हैं। महत्वाकाँक्षा, प्रसिद्धि, महत्ता आदि न मिलने से मनुष्य चोर, डाकू या शैतान बन सकता है। नारियों की सेक्स भावना अतृप्त रहने से उनमें हिस्टीरिया, प्रमाद, चिड़चिड़ापन उत्पन्न हो सकते हैं। अतः मानसिक स्वास्थ्य के लिए प्रत्येक स्वस्थ स्त्री पुरुष का अवरुद्ध भावनाओं को निकालने के मार्ग ढूँढ़िये। ऐसी नारियाँ समाज सेवा में तन मन लगा कर अपने हृदय का भार हलका कर सकती हैं अथवा यतीम खाने के अनाथ बच्चों की देख रेख, प्यार, सेवा, पालन, पोषण, सेवा, सुश्रूषा कर मातृत्व की सहज वृत्ति की तृप्ति कर सकती हैं। उन्हें चाहिए कि वे गरीबों की बस्तियों की ओर निकल जाया करें। वहाँ के अर्द्धनग्न और भूखे बच्चों की देख रेख किया करें। उन्हें स्नान करायें और स्वच्छ वस्त्र धारण करायें, उनके साथ खेलें, गायें, बातचीत करें। इस प्रेम से गुप्त भावनाओं को निकालने का स्वस्थ मार्ग मिलता है जो मानसिक स्वास्थ्य और सुख के लिए अमृत तुल्य है। आपके मन की कोई भी भावना, यदि अतृप्त है तो मानसिक संस्थान में भावना ग्रन्थि (काम्लेक्त) उत्पन्न करेंगी और नाना मनोविकारों में प्रस्फुटित होंगी। वह हमारे गुप्त प्रदेश में बाहर निकलने और तृप्ति प्राप्त करने के अवसर देखा करती हैं। जो उसे निर्दयता से कुचल डालते हैं, वे मानसिक रोगों के शिकार बनते हैं।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति 1960 मार्च

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👉 निराशा से बचने का उपाय-कम कामनाएं (भाग 2)

साहस रहित मनुष्य का वैराग्य, असफलता जन्य विरक्ति और निराशा से उपजी हुई आत्म-ग्लानि बड़ी भयंकर होती है। इससे मनुष्य की अन्तरात्मा कुचल जाती है।

ऐसे असात्विक वैराग्य का मुख्य करण मनुष्य की मनोवाँछाओं की असफलता ही है जिसके कारण अपने से तथा संसार से घृणा हो जाती है। प्रतिक्रिया स्वरूप संसार भी उससे नफरत करने लगता है। ऐसी स्थिति में मनुष्य की मनोदशा उस भयानक बिन्दु के पास तक पहुँच जाती है जहाँ पर वह त्रास से त्राण पाने के लिए आत्म-हत्या जैसे जघन्य पाप की ओर तक प्रवृत्त होने लगता है।

जो भी अधिक इच्छाएं रखेगा बहुत प्रकार की कामनाएँ करेगा उसका ऐसी स्थिति में पहुँच जाना स्वाभाविक ही है। किसी मनुष्य की सभी मनोकामनाएं सदा पूरी नहीं होती। वह हो भी नहीं सकतीं। मनुष्य की वांछाएं इतनी अधिक होती हैं कि यदि संसार के समस्त साधन लगा दिये जायें, तब भी वे पूरी न होंगी।

ऐसा नहीं है कि मनुष्यों की इच्छायें पूर्ण नहीं होती हों, किन्तु इच्छायें उसी मनुष्य की पूर्ण होती हैं जो उनको सीमित एवं नियंत्रित रखता है। जिसकी आकाँक्षायें अनियंत्रित हैं जिनका कोई ओर-छोर ही नहीं है उसकी कोई भी महत्वाकाँक्षा पूर्ण होने में सन्देह रहता है। बहुधा अनन्त आकाँक्षाओं वाले व्यक्ति को घोरतम निराशा का ही सामना करना पड़ता है।

इच्छाओं के ऐसे दुष्परिणाम देखकर ही भारतीय मनीषियों ने इच्छाओं को त्याज्य बतलाया है। उन्होंने अच्छी प्रकार इस सत्य को अनुभव कर लिया था कि जो इच्छाओं के प्रति त्याग भावना नहीं रखता उसकी इच्छायें धीरे-धीरे एक से दो और दो से चार होती हुई शीघ्र ही बढ़ती चली जाती हैं और फिर वे न तो नियंत्रण में आ पाती हैं न पूरी हो पाती हैं। फलस्वरूप मनुष्य को घोर निराशा की स्थिति में पहुँचा देती हैं। अतएव ऋषि मुनियों ने हृदय को पूर्ण रूप से निष्काम रखने का ही आदेश दिया है।

इस इच्छा त्याग का गलत अर्थ लगाकर लोग यह कह उठते हैं कि जिसमें कोई इच्छा नहीं होगी, वह कोई काम ही न करेगा और यदि एक दिन संसार का हर मनुष्य इच्छा रहित निष्काम हो जाये तो सृष्टि की सारी गति-विधि ही नष्ट हो जाये और यह चौपट हो जाये।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
📖 अखण्ड ज्योति 1966 मार्च

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👉 उत्तम जीवन व्यवहार ही हमारा धर्म है। (भाग 1)

वर्तमान समय में अपने को धार्मिक कहने वाले व्यक्ति प्रायः यह मत प्रकट किया करते हैं कि संसार में धर्म ही सर्वोपरि है, इसलिये जीवन से सम्बन्ध रखने वाले आर्थिक, राजनीतिक, वैज्ञानिक आदि विषयों को गौण समझना चाहिये, और उनका निर्णय धर्म को प्रमुख स्थान देकर ही करना चाहिये। यह बात सुनने में तो बहुत अच्छी लगती है, पर कार्य रूप में इसका पालन संभव नहीं होता। क्योंकि धर्म राजनीति, विज्ञान आदि सभी मानव-प्रकृति के अंग हैं और उनका आधार “सत्य” पर है। जिस चीज का आधार सत्य के बजाय असत्य पर होगा, वह न तो कल्याणकारी हो सकती है और न स्थायी। इसलिये जो लोग अर्थ और राजनीति, विज्ञान आदि की उपेक्षा करके धर्म को ही प्रधानता देते हैं, वे प्रायः पाखंडी और ढोंगी हो जाते हैं, उनके कहने और करने में ऐक्य का भाव नहीं पाया जाता। वे मुँह से धर्म के लिये गला फाड़-फाड़ कर चिल्लाने पर भी जहाँ अपना स्वार्थ होता है वहाँ सर्वथा विपरीत मार्ग से चलते हैं और इस प्रकार संसार के अन्य लोगों को भी धर्म-विमुख करने में सहायक बनते हैं।

प्राचीनकाल में मनुष्य जीवन में इतना अधिक विरोध-भाव नहीं पाया जाता था। इसका खास कारण यह था कि उस समय विज्ञान की इतनी प्रगति नहीं हुई थी, और जो कुछ हुई थी वह साधारण जनता में वर्तमान समय की भाँति प्रचारित नहीं की गई थी। इसलिये धर्म और दर्शन के सिद्धान्तों के अनुसार ही राज्य और समाज के नियम भी निश्चित किये गये थे। इससे लोगों के व्यवहार और सिद्धान्तों में इतना परस्पर विरोधी-भाव उत्पन्न नहीं होता था। अब विज्ञान का विकास बहुत अधिक हो गया है और उसे सर्वसाधारण की शिक्षा का एक प्रमुख अंग बना दिया गया है, इससे परस्पर विरोधिता का भाव अकल्पित रूप से बढ़ गया है।

इससे भी अधिक विचारणीय दशा धर्म और राजनीति के सम्बन्ध में दिखलाई पड़ती है। इसका बहुत स्पष्ट उदाहरण देखना हो तो वर्तमान ईसाई राष्ट्रों पर निगाह डालना चाहिये। कहाँ तो ईसा का पूर्ण क्षमा-भाव रखने का उपदेश, और कहाँ आज कल के ईसाई कहलाने वाले शासकों की कूट नीति, हथियारों की प्रतिद्वंदिता और करोड़ों व्यक्तियों का संहार करने वाले महासमरों का आयोजन। ये ईसाई जिस प्रकार अपने व्यापारिक लाभ को अधिकाधिक बढ़ाने के लिये युद्ध-कला की दृष्टि से निर्बल राष्ट्रों का शोषण करते हैं और बराबरी वाले राष्ट्रों को युद्ध की भीषणता द्वारा नष्ट करने के उपाय करते हैं- ये दोनों बातें ईसा के उपदेशों के सर्वथा विपरीत हैं। पर ईसा के इन्हीं उपदेशों को बाईबल में प्रतिदिन पढ़ते और स्कूलों में सर्वत्र उनकी शिक्षा देते हुये ये लोग किस हृदय से लाखों करोड़ों लोगों के संहार की योजना बनाते रहते हैं, यह समझ में नहीं आता। एक ओर तो ये लोग गिरिजाघरों के लिये करोड़ों रुपए खर्च करते रहते हैं और बाईबल का संसार के कोने-काने में प्रचार करने का प्रयत्न कर रहे हैं, और दूसरी ओर वे ही लोग घातक से घातक अस्त्र तैयार करके अन्य देशों के बड़े-बड़े नगरों को दो चार मिनट के भीतर ही मटियामेट कर डालते हैं। इस प्रकार का कार्य एक बड़ा मिथ्याचार है और उसके फल से ईसाई सभ्यता का भवन ढहे बिना नहीं रह सकता।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति 1960 फरवरी

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 30 April 2026



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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 30 April 2026


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‼️ आत्मबोध चिन्तन—तत्वबोध मनन ‼️

“हर दिन नया जन्म, हर रात नयी मौत” की मान्यता लेकर जीवनक्रम बनाकर चला जाए तो वर्तमान स्तर से क्रमशः ऊँचे उठते चलना सरल पड़ेगा। मस्तिष्क और शरीर की हलचलें अन्तःकरण में जड़ जमाकर बैठने वाली आस्थाओं की प्रेरणा पर अवलंबित रहती हैं। आध्यात्मिक साधनाओं का उद्देश्य इस संस्थान को प्रभावित एवं परिष्कृत करना ही होता है। इस उद्देश्य की पूर्ति में वह साधना बहुत ही उपयोगी सिद्ध होती है, जिसमें उठते ही नये जन्म की और सोते ही नई मृत्यु की मान्यता को जीवन्त बनाया जाता है।

प्रातः बिस्तर पर जब आँख खुलती है तो कुछ समय आलस को दूर करके शैया से नीचे उतरने में लग जाता है। प्रस्तुत उपासना के लिए यही सर्वोत्तम समय है। मुख से कुछ भी कहने की आवश्यकता नहीं पर यह मान्यता−चित्र मस्तिष्क में अधिकाधिक स्पष्टता के साथ जमाना चाहिए कि “आज का एक दिन एक पूरे जीवन की तरह है; इसका श्रेष्ठतम, सदुपयोग किया जाना चाहिए। समय का एक भी क्षण न तो व्यर्थ गँवाया जाना चाहिए और न अनर्थ कार्यों में लगाना चाहिए।” सोचा जाना चाहिए कि “ईश्वर ने अन्य किसी जीवधारी को वे सुविधाएँ नहीं दीं जो मनुष्य को प्राप्त हैं। यह पक्षपात या उपहार नहीं; वरन् विशुद्ध अमानत है। जिसे उत्कृष्ट आदर्शवादी रीति−नीति अपनाकर पूर्णता प्राप्त करने—स्वर्ग और मुक्ति का आनन्द इसी जन्म में लेने के लिए दिया गया है। यह प्रयोजन तभी पूरा होता है जब ईश्वर की इस सृष्टि को अधिक सुन्दर, समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनाने के लिए उपलब्ध जीवन सम्पदा का उपयोग किया जाय। उपयोग के लिए यह सुर−दुर्लभ अवसर मिला है। यह योजनाबद्ध सदुपयोग करने में ईश्वर की प्रसन्नता और जीवन की सार्थकता है।”

मंत्र जाप की तरह इन शब्दों को दुहराने की जरूरत नहीं है वरन् अत्यंत गम्भीरतापूर्वक इस तथ्य को हृदयंगम किया जाना चाहिए। कल्पना चित्र सिनेमा फिल्म की तरह स्पष्ट उभरने चाहिएँ और उनके साथ इतनी गहरी आस्था का पुट देना चाहिए कि यह चिन्तन, वस्तु स्थिति बनकर मस्तिष्क को पूरी तरह आच्छादित कर ले।

अमृत सन्देश:- हर सुबह नया जन्म हर रात नई मौत : संध्या वंदन, https://youtu.be/sdkyVwe0pnk?si=GN0GZYPcYQlkHxv1

*शौच जाने की आवश्यकता अनुभव हो तो विलम्ब नहीं करना चाहिए और शय्या त्याग कर नित्य कर्म में लग जाना चाहिए। थोड़ी गुंजाइश हो तो उठने से लेकर सोने के समय तक की दिन−चर्या इसी समय बना लेनी चाहिए। यों नित्य कर्म करते हुए भी दिन भर का समय विभाजन कर लेना कुछ कठिन नहीं है। फुर्ती और चुस्ती से काम निपटाये जायं तो कम समय में अधिक काम हो सकता है। सुस्ती और उदासी में ही समय का तो भारी अपव्यय होता है, योजनाबद्ध दिन−चर्या बनाई जाय और उसका मुस्तैदी से पालन किया जाय तो ढेरों समय बच सकता है। एक काम के साथ दो काम हो सकते हैं। जैसे आजीविका उपार्जन के बीच खाली समय में स्वाध्याय तथा मित्रों में परामर्श हो सकता है। 
परिवार, व्यवस्था में मनोरंजन का पुट रह सकता है। निद्रा, नित्य कर्म, आजीविका उपार्जन, स्वाध्याय, उपासना, परिवार व्यवस्था, लोक−मंगल आदि कार्यों में, कौन, कब, किस प्रकार कितना समय देगा यह हर व्यक्ति की अपनी परिस्थिति पर निर्भर है, पर समन्वय इन सब बातों का रहना चाहिए। दृष्टिकोण यह रहना चाहिए कि आलस्य प्रमाद में एक क्षण भी नष्ट न हो और सारी गतिविधियाँ इस प्रकार चलती रहें जिनमें आत्मकल्याण परिवार निर्माण एवं लोक−मंगल के तीनों तथ्यों का समुचित समावेश बना रहे। इन सारे क्रिया−कलापों में आदर्शवादी दृष्टिकोण अपनाया जाय। दुष्प्रवृत्तियों को दुर्भावनाओं को स्थान न मिलने दिया जाय। जहाँ भी जब भी गड़बड़ दिखाई पड़े तब वहीं उसकी रोकथाम की जाय और गिरते कदमों को संभाल लिया जाय। समय, श्रम, चिन्तन एवं धन का तनिक−सा अंश भी अवाँछनीय प्रयोजन में नष्ट न होने दिया जाये इन चारों ही सम्पदाओं का एक−एक कण सदुपयोग में लगता रहे, इस तथ्य पर तीखी दृष्टि रखी जाय, भूलों को तत्काल सुधारते रहा जाय तो उस दिन के —उस जीवन को संतोषजनक रीति से जिया जा सकता है।*

जल्दी सोने और जल्दी उठने का नियम जीवन साधना में रुचि रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को बनाना ही चाहिए। ब्रह्ममुहूर्त का समय अमृतोपम है, उस समय किया गया हर कार्य बहुत ही सफलतापूर्वक संपन्न होता है। अस्तु जो भी अधिक महत्वपूर्ण कार्य प्रतीत होता हो उसे उसी समय में करना चाहिए। सवेरे जल्दी उठना उन्हीं के लिए सम्भव है जो रात्रि को जल्दी सोते हैं। इस मार्ग में जो अड़चने हों उन्हें बुद्धिमतापूर्वक हल करना चाहिए; किन्तु जल्दी सोने और जल्दी उठने की परम्परा तो अपने लिए ही नहीं पूरे परिवार के लिए बना ही लेनी चाहिए।

रात्रि को सोते समय वैराग्य एवं संन्यास जैसी स्थिति बनानी चाहिए। बिस्तर पर जाते ही यह सोचना चाहिए कि निद्रा काल एक प्रकार की मृत्यु विश्राम है। आज का नाटक समाप्त कल दूसरा खेल खेलना है। परिवार ईश्वर का उद्यान है उसमें अपने को कर्तव्य−निष्ठ माली की भूमिका निभानी थी। शरीर, मन, ईश्वरीय प्रयोजनों को पूरा करने के लिए मिले जीवन रथ के दो पहिये हैं, इन्हें सही राह पर चलाना था। धन, प्रभाव, पद यह विशुद्ध धरोहर है उन्हें सत्प्रयोजनों में ही लगाना था। देखना चाहिए कि वैसा ही हुआ या नहीं? जहाँ गड़बड़ी हुई दिखाई दे वहाँ पश्चाताप करना चाहिए और अगले दिन वैसी भूल न होने देने में कड़ी सतर्कता बरतने की अपने आपको चेतावनी देनी चाहिए।

संन्यासी अपना सब कुछ ईश्वर अर्पण करके परमार्थ प्रयोजन में लगता है। सोते समय साधक की वैसी ही मनःस्थिति होनी चाहिए। मिली हुई अमानतें और सौंपी हुई जिम्मेदारियाँ आज ईमानदारी के साथ संभाली गईं। यदि कल वे फिर मिलीं तो फिर उन्हें ईश्वरीय आदेश मान कर संभाला जायगा। अपना स्वामित्व किसी भी व्यक्ति या पदार्थ पर नहीं। यहाँ जो कुछ है सो सब ईश्वर का है। अपना तो केवल कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व भर है। उसे पूरी ईमानदारी और पूरी तत्परता से निवाहते भर रहना अपने लिये पर्याप्त है। परिणाम क्या होते हैं, क्या नहीं—यह परिस्थितियों पर निर्भर है अस्तु सफलता असफलता की चिन्ता न करते हुए हमें आदर्शवादी कर्तव्य परायणता अपनाये रहने मात्र में पूरा−पूरा संतोष अनुभव करना चाहिए।

सोते समय ईश्वर की अमानतें ईश्वर को सौंपने और स्वयं खाली हाथ प्रसन्न चित्त विदा होने की—निद्रा देवी की गोद में जाने की बात सोचनी चाहिए। हलके मन से शाँति पूर्वक गहरी नींद में सो जाना चाहिए। चिन्ता, आशंका, खीज, क्रोध जैसी किसी भी उद्विग्नता को मन पर लाद कर नहीं सोना चाहिए। यह प्रयास शाँत निद्रा लाने की दृष्टि से भी उपयोगी है। साथ ही आत्म-परिष्कार की दृष्टि से भी अति−महत्वपूर्ण है।

मृत्यु को भूलने से ही जीवन संपदा को निरर्थक कामों में गँवाते रहने की चूक होती है, दुष्कर्म बन पड़ते हैं और वासना तृष्णा अहंता की क्षुद्रताओं में समय गुजरता है। यदि यह ध्यान बना रहेगा कि मृत्यु का निमंत्रण कभी भी सामने आ सकता है तो यह ध्यान बना रहेगा कि इस महान अवसर का सही उपयोग किया जाय और पूरा लाभ उठाया जाय। निद्रा की तुलना मृत्यु से करते रहने पर मौत का भय मन से निकल जाता है और अलभ्य अवसर के सदुपयोग की बात चित्त पर छाई रहती है।

प्रातः उठते समय नये दिन की मान्यता—जीवनोद्देश्य की स्पष्टता तथा सुव्यवस्थित दिनचर्या बनाने का कार्य संपन्न करना चाहिए। रात्रि को सोते समय मृत्यु का चिन्तन, आत्म, निरीक्षण, पश्चाताप और कल के लिए सतर्कता—वैरागी एवं संन्यासी जैसी मालिकी त्यागने की हलकी फुलकी मनः स्थिति लेकर शयन किया जाय। दिन भर हर घड़ी चुस्ती फुर्ती मुस्तैदी और दिलचस्पी के साथ प्रस्तुत कार्यों को निपटाया जाय। भीतर दुर्भावनाओं और बाहरी दुष्प्रवृत्तियों के उभरने का अवसर आते ही उनसे जूझ पड़ा जाय और निरस्त करके ही दम लिया जाय। यह है वह जीवन साधना जिसमें चौबीसों घन्टे निमग्न रह कर और इसी जीवन में स्वर्ग जैसे उल्लास आनन्द और मुक्ति जैसे आनन्द का हर घड़ी अनुभव करते रहा जा सकता है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
📖 अखण्ड ज्योति 1976 जनवरी

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बुधवार, 29 अप्रैल 2026

👉 निराशा से बचने का उपाय-कम कामनाएं (भाग 1)

“मनुष्य कुछ भी नहीं है, वह एक चलता फिरता धूल-पिण्ड है, उसकी शक्तियाँ सीमित हैं। वह नियति के हाथ की कठपुतली है, भाग्य का खिलौना और हर समय काल का कवल है।”

इस प्रकार के निषेधात्मक एवं निराशापूर्ण विचार रखने वाले निःसन्देह धूल-पिंड भाग्य की कठपुतली और जीवित अवस्था में भी मृतक ही होते हैं। जो कायर और निराशावादी है वह अभागा ही है। जहाँ संसार में लोग कंधे से कंधा भिड़ाकर उन्नति और विकास के लिये निरंतर संघर्ष कर रहे हैं, वहाँ निराशावादी विषाद का रोग पाले हुए दुनिया के एक कोने में पड़े हुए मक्खियाँ मारा करते हैं। समाज की निरपेक्षता तथा संसार की नश्वरता को कोसा करते हैं। मनुष्य की इस दशा को दुर्भाग्य नहीं तो और क्या कहा जायेगा।

मनुष्य-योनि में आकर जिसने जीवन में कोई विशेष कार्य नहीं किया, किसी के कुछ काम नहीं आया, उसने मनुष्य शरीर देने वाले उस परमात्मा को लज्जित कर दिया। अपने में अनन्त शक्ति होने पर भी दीनतापूर्ण जीवन बिताना, दयनीयता को अंगीकार करना अपने साथ घोर अन्याय करना है। मनुष्य जीवन रोने कलपने के लिए नहीं, हँसते मुस्कराते हुए अपना तथा दूसरों का उत्कर्ष करने के लिए है।

मनुष्य जीवन के लिए निराशा अस्वाभाविक है। यह एक प्रकार का मानसिक रोग है जो मनुष्य को हीन विचारों, जीवन में आई कठिनाइयों और असफलता के कारण लग जाता है। इच्छाओं की पूर्ति न होने, मनचाही परिस्थितियाँ न पाने से मनुष्य में संसार के प्रति, अपने प्रति तथा समाज के प्रति घृणा हो जाती है। बार-बार असफलता पाने से मनुष्य का साहस टूट जाता है और वह निराश होकर बैठ जाता है। जीवन के प्रति उसका कोई अनुराग नहीं रह जाता।

निराशाग्रस्त मनुष्य दिन-रात अपनी इच्छाओं कामनाओं और वाँछाओं की आपूर्ति पर आँसू बहाता हुआ उनका काल्पनिक चिन्तन करता हुआ तड़पा करता है। एक कुढ़न, एक त्रस्तता एक वेदना हर समय उसके मनों-मन्दिर को जलाया करती है। बार-बार असफलता पाने से मनुष्य का अपने प्रति एक क्षुद्र भाव बन जाता है । उसे यह विश्वास हो जाता है कि वह किसी काम के योग्य नहीं है। उसमें कोई ऐसी क्षमता नहीं है, जिसके बल पर वह अपने स्वप्नों को पूरा कर सके, सुख और शान्ति पा सके।

*.....क्रमशः जारी*
✍️ *परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य* 
📖 *अखण्ड ज्योति 1966 मार्च

👉 ईश्वर है या नहीं? (अंतिम भाग )

प्राणियों के शरीर में खाद्य पदार्थों को रक्त माँस के रूप में परिणत करते रहने वाली पाचन-प्रणाली ऐसी आश्चर्यजनक है कि उसकी रासायनिक क्षमता देखते ही बनती है। रोगों की निरोधक शक्ति स्वयं ही बीमारियों से लड़ती और रोग-मुक्ति का साधन बनती है। चिकित्सकों से उपचारों द्वारा उसे थोड़ी सहायता ही मिलती है। इस प्रक्रिया की आश्चर्यजनक शक्ति को देखते हुए वैज्ञानिकों को दांतों तले उँगली दबाकर रह जाना पड़ता है। शरीर में लगा हुआ एक- एक कल पुर्जा इतना संवेदनशील और अद्भुत कारीगरी से भरा हुआ है कि उसे अपने आप बना हुआ, अपने आप काम करने वाला नहीं माना जा सकता।

प्राणियों की उत्पत्ति एवं विनाश की प्रक्रिया में सन्तुलन रहना एक ऐसा तथ्य है, जिसे किसी विचारवान् सत्ता का ही कार्य कहा जा सकता है। विभिन्न प्राणी अपनी सन्तानोत्पत्ति बड़ी तेजी से करते हैं। मनुष्य चार-छः बच्चे तो साधारणतः पैदा कर ही लेता है। सुअर और कुत्ते तो अपने जीवन काल में सौ-पचास बच्चे पैदा करते हैं। मक्खी,मच्छर, मछली, चींटी, दीमक आदि तो कई-कई सौ अण्डे देती है। मुर्गी को ही देखिए वह अपने जीवन में कई-सौ अण्डे देती होगी। यह उत्पादन-क्रम विश्व के लिए एक संकट सिद्ध हो सकता है। यदि एक भी प्राणी की यह वंश-वृत्ति निर्बाध गति से चले तो उसके बच्चे ही इस सारी धरती पर कुछ ही वर्षों में छा जावें और अन्य प्राणियों को खड़े रहने के लिए भी जगह न बचे। पर कोई सूक्ष्म सत्ता इस वृद्धि को नियन्त्रित करने के लिए रोग, युद्ध, दुर्भिक्ष, अभाव आदि पैदा करती रहती है और वे सीमित संख्या में उतने ही बने रहते हैं, जितने के लिए धरती पर गुंजाइश है। यदि ऐसा न होता तो करोड़ों वर्षों से चले आ रहे जीवधारी अब तक इतने हो गये होते कि उन्हें अन्य लोक में भेजने के अतिरिक्त और कोई मार्ग न रहता।

जिस ऋतु में जो रोग होता है, उसको शमन करने वाली जड़ी-बूटियाँ भी उसी ऋतु में होती हैं। फल, शाक और अन्नों के बारे में भी यही बात है। ऋतु की आवश्यकता के अनुसार ही पृथ्वी में से वनस्पति और फल-फूल पैदा होते हैं। जहाँ के निवासियों को वहीं की जलवायु और अन्न, शाक, औषधि अनुकूल पड़ती है। यह कार्य किसी विचारवान शक्ति का ही हो सकता है।

नियन्त्रण और सन्तुलन की यह महत्वपूर्ण प्रक्रिया अपने आप होती रहे, ऐसा संभव नहीं। इसके पीछे कोई विचारशील चेतन सत्ता ही काम करती है। उस ज्ञानवान् चित्त-शक्ति को ईश्वर नाम दिया जाता है। उसके अस्तित्व से इन्कार करना, दिन रहते सूरज को न मानने जैसा दुराग्रह ही कहा जायेगा।

.....समाप्त
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1964

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 29 April 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 29 April 2026


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मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

👉 ईश्वर है या नहीं? (भाग 2)

मशीन से सम्बन्धित जितनी भी वस्तुएँ हैं वे सभी चालक की अपेक्षा रखती हैं। सञ्चालन करने एवं प्रयोग करने वाला न हो तो वे महत्वपूर्ण होते हुए भी किसी के कुछ काम नहीं आतीं। इससे प्रकट होता है कि जड़ पदार्थ किसी सञ्चालक की प्रेरणा से ही सक्रियता धारण करते हैं। विशाल सृष्टि के कार्यक्रम में जो सक्रियता, नियमितता और व्यवस्था दीख पड़ती है, उसके पीछे भी चेतन सत्ता का हाथ होना आवश्यक है। इतना बड़ा सृष्टि-साम्राज्य अपने आप इतने विवेकपूर्ण ढंग से नहीं चल सकता। हवा को बहाने वाली, ऋतुओं को बदलने वाली, पौधों को उगाने और सुखाने वाली, कोई शक्ति मौजूद है- यह मानना पड़ेगा। इसे प्रकृति कहें या परमेश्वर, इस नाम-भेद से कुछ बनता बिगड़ता नहीं।

पदार्थों में क्षमता मौजूद भले ही हो, पर उसे गतिशील बनाने वाली एक प्रेरक शक्ति का भी पृथक से अस्तित्व मौजूद है। अणु अपनी धुरी पर अपने आप नहीं घूमते, उन्हें घुमाने वाली भी कोई प्रेरक शक्ति होनी ही चाहिए। इतने नियमबद्ध, इतने विशाल विश्व ब्रह्माण्ड का ठीक प्रकार सञ्चालन होते रहना किसी चैतन्य-सत्ता के द्वारा ही सम्भव है। बुद्धिहीन जड़ पदार्थ अपने आप अपना कार्य नियमपूर्वक करते रहेंगे,यह कैसे सम्भव हो सकता है? सूर्य-चन्द्रमा ग्रह-नक्षत्र अपनी-अपनी धुरी तथा कक्षा में निर्धारित गति से घूमते हैं। यदि इसमें तनिक भी अन्तर आ जाय तो एक ग्रह दूसरे ग्रह से टकरा कर टूटने लगे और इसकी प्रतिक्रिया से अन्य ग्रह नक्षत्रों की भी गति-व्यवस्था बिगड़ जाय। पर होता ऐसा नहीं, क्योंकि इन सबका सञ्चालन एक सावधान सत्ता द्वारा हो रहा है।

जो भी वस्तुएं हमारे उपयोग में आती हैं वह किसी न किसी के द्वारा बनाई हुई होती हैं। रोटी, कपड़ा, दवा, मकान,चारपाई, बर्तन, लालटेन, पुस्तक, घड़ी आदि हमारे उपयोग की सभी चीजें किसी के द्वारा बनाई गई हैं। इनके मूल पदार्थ- अन्न, धातु, कपास आदि को तथा उनके भी मूल पञ्च-तत्वों को बनाने वाला भी कोई होना चाहिए। इसी निर्मात्री और सञ्चालन शक्ति का नाम ईश्वर है।

विश्व का सञ्चालन और नियन्त्रण करने वाली कोई विचारशील सत्ता है। उसका अनुमान उसकी कृतियों को ध्यानपूर्वक देखने से सहज ही लग जाता है। जिस प्राणी को जिस परिस्थिति में उत्पन्न किया है उसके अनुकूल ही उसे साधन भी दिये हैं। माँसाहारी जीवों के दाँत और नाखून ऐसे बनाये है कि वे शिकार को पकड़ और फाड़ कर खा सकें। इसी प्रकार शाकाहारी जीवों को उसी व्यवस्था के अनुरूप खाने और पचाने के यन्त्र मिले हैं। ठण्डे बर्फीले प्रदेशों में रहने वाले जानवरों के शरीर पर बड़े-बड़े बाल और गर्म भूमि पर रहने वालों के शरीर उष्णता सहन करने की क्षमता-सम्पन्न होते हैं।

*.....क्रमशः जारी*
✍️ *परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य* 
*📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1964*

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👉 ईश्वर है या नहीं? (भाग 1)

कई व्यक्ति ईश्वर के अस्तित्व से इन्कार करते हैं और कहते हैं-इस सृष्टि को बनाने एवं चलाने वाली कोई चेतन सत्ता नहीं है। प्रकृति के परमाणु अपने आप अपना काम करते रहते हैं और उसी से जीवों का जन्म-मरण होता रहता है। वे आत्मा की सत्ता को भी नहीं मानते और कहते हैं कि पेड़-पौधों की तरह मनुष्य भी एक बोलने वाला पौधा मात्र है। वह रज-वीर्य के संयोग से जन्मता और रोग एवं बुढ़ापे की क्रिया से मर जाता है।

यह नास्तिकवादी विचारधारा दिन-दिन अधिक तेजी से बढ़ रही है। विज्ञानवेत्ताओं को अपनी प्रयोगशालाओं में ईश्वर के अस्तित्व का प्रत्यक्ष प्रमाण किन्हीं यन्त्रों दुर्बीनों या खुर्दबीनों में नहीं मिल सका है। इसलिए वे यही कहते हैं कि वैज्ञानिक प्रमाणों के अभाव में हम ईश्वर के अस्तित्व का समर्थन नहीं कर सकते। विज्ञान की वर्तमान मान्यताओं को ही सब कुछ मानने वाले लोगों को इससे और भी अधिक प्रोत्साहन मिला है।

ईश्वर की मान्यता से नीति धर्म और सदाचार के बन्धनों में रहने के लिए मनुष्य को विवश होना पड़ता। उच्छृंखलतावादी ईश्वर की मान्यता रखने पर भी धर्म-कर्म के बन्धनों को तोड़ते रहते थे। अब उन्हें कम्युनिज्म और विकास का समर्थन मिल जाने से और भी अधिक छूट मिलती है। इस प्रकार उच्छृंखलता और अनैतिकता का मार्ग और भी अधिक प्रशस्त हो जाता है। यह मान्यताएं यदि इसी प्रकार बढ़ती और पनपती रहीं तो नैतिकता, श्रम और सदाचार के लिए एक विश्व-व्यापी संकट खड़ा होने का खतरा उत्पन्न हो जायेगा। इसलिए यह आवश्यक है कि अनीश्वरवादी विचारधारा के तर्कों का परीक्षण किया जाय और यह देखा जाय कि उनके कथन में कुछ सार भी है या नहीं?

ईश्वर कहाँ हैं? | Ishwar Kahan Hai | Shantikunj Rishi Chintan, https://youtu.be/6FIYJ6T1DTA?si=Btn7Hr4GatfwuWwX

अनीश्वरवादियों का कथन है कि-प्रकृति के जड़ परमाणु अपने आप अपनी धुरी पर घूमते हैं, बदलते और हलचल करते हैं, उसी से सृष्टि का क्रम चलता है तथा प्राणियों की उत्पत्ति होती है। ईश्वर की इसमें कुछ भी आवश्यकता नहीं है।

इस कथन पर विचार करते हुए हमें देखना होगा कि क्या चेतन की प्रेरणा बिना जड़ पदार्थों में एक क्रमबद्ध एवं सुव्यवस्थित गति-विधि निरन्तर चलते रहना सम्भव हो सकता है? देखते हैं कि कोई रेल, मोटर, जहाज, मशीन, अस्त्र आदि कितना ही महत्वपूर्ण एवं शक्ति शाली क्यों न हो, उसे चलाने के लिए चालक की बुद्धि ही काम करती है। राकेट से लेकर उपग्रह तक स्वचालित यन्त्र तभी अपनी सक्रियता जारी रख पाते हैं, जब रेडियो सक्रियता के माध्यम से मनुष्य उन्हें किसी दिशा विशेष में चलाते हैं। चालक के अभाव में अपनी इच्छा और शक्ति से यदि वस्तुएँ अपने आप ही चलने और काम करने लगें तो फिर उन्हें जड़ ही क्यों कहा जाय?

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1964

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👉 जीवन साधना के तीन सूत्र (भाग 1)

यों जीवन साधना का क्रम सारे दिन हर समय चलने का हैं। पर उसका प्रारम्भ, शुभारम्भ एक चिन्तन पद्धति के साथ किया जाना चाहिए। इस पद्धति के तीन अंग हैं- 
(1) जीवन के स्वरूप, उद्देश्य एवं उपयोग को समझना और उसके अनुरूप गतिविधियों का निर्माण करना, 
(2 “हर दिन नया जन्म, हर रात नई मौत” सूत्र के अनुसार जीवन का श्रेष्ठतम उपयोग करने के लिए दिन भर की शारीरिक कार्य पद्धति एवं मानसिक विचार पद्धति का निर्धारण करना। 
(3 रात को सोते समय मृत्यु के समय आवश्यक वैराग्य का अनुभव करना। इन तीन चिन्तन क्रम में से दो को प्रातः और तीसरे को रात्रि के सोते समय प्रयुक्त करना चाहिए।

हर दिन प्रातःकाल उठते ही बिस्तर पर बैठकर अपने आपसे इस संदर्भ में तीन प्रश्न पूछने चाहिए और उनके उत्तर भी स्वयं ही उपलब्ध करने चाहिए। पर प्रश्नोत्तर प्रातःकाल जीवन का क्रम आरम्भ करते हुए नित्य ही दुहराने चाहिए ताकि जीवन का स्वरूप, उद्देश्य और उपयोग सदा स्मरण बना रहे और इस स्मरण के आधार पर अपनी दिशाएं ठीक रखने में भूल-चूक न होने पावें।

अपने आपस तीन प्रश्न पूछने चाहिए-

(1) भगवान के सभी प्राणी समान रूप से प्रिय पात्र है। फिर मनुष्य को ही बोलने, सोचने, लिखने एवं असंख्य सुख, सुविधाएं प्राप्त करने का विशेष अनुदान क्यों मिला? मनुष्य को हर दृष्टि से उत्कृष्ट स्तर का प्राणी बनाने में इतना असाधारण श्रम क्यों किया?
उत्तर एक ही हो सकता है- “अपने उद्यान - इस संसार को अधिक सुन्दर और सुव्यवस्थित बनाने के लिए परमेश्वर को साथी सहचरों की जरूरत पड़ी और अपनी क्षमताओं से सुसज्जित एक सर्वांगपूर्ण प्राणी- मनुष्य इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए बनाया। विशेष साधन सुविधाएं इसलिए दी कि उनके द्वारा वह ईश्वरीय प्रयोजनों की पूर्ति ठीक तरह कर सकें।”

(2) दूसरा प्रश्न अपने आपसे पूछना चाहिए कि- “जो सुविधाएं विभूतियाँ संपदाएं हमें उपलब्ध हैं- उनका लाभ यदि हम अकेले ही उठाते हैं तो इसमें क्या कोई हर्ज है?”
उत्तर एक ही मिलेगा- “अन्य प्राणियों के अतिरिक्त जितनी भी बौद्धिक आर्थिक, प्रतिभायुक्त एवं अन्य किसी प्रकार की विशेषताएं हैं, वे विश्व मानव की ही पवित्र अमानत हैं और इनका उपयोग लोक मंगल के लिए ही किया जाना चाहिए। शरीर रक्षा भर के आवश्यक उपकरण के अतिरिक्त इन साधनों का विश्व कल्याण के लिए ही उपयोग किया जाय।”

(3) तीसरा प्रश्न अपने आपसे करना चाहिए कि- “ क्या इस सुरदुर्लभ मानव शरीर का सही सदुपयोग हो रहा है?”

उत्तर यही मिलेगा- “हम सदाचारी संयमी, परिश्रमी, उदार, सज्जन, हँसमुख, सेवाभावी बने बिना मानव जीवन को सार्थक नहीं बना सकते। इसलिए इन सद्गुणों का अभ्यास बढ़ाने के लिए जीवनयापन की रीति-नीति में उत्कृष्टता और आदर्शवादिता का सभ्यता और सज्जनता का -पुरुषार्थ और साहस का समुचित समावेश करना चाहिए।’

इन्हीं प्रश्नोत्तरों में अध्यात्म तत्वज्ञान का सार सन्निहित हैं। यदि वे प्रश्न जीवन की महान समस्या के रूप में सामने आयें और उन्हें सुलझाने के लिए हम अपने पूरे विवेक का उपयोग करें तो भावी जीवन यापन के लिए एक व्यवस्थित दर्शन और कार्यक्रम सामने आ खड़ा होगा। यदि इस तत्वज्ञान को ठीक तरह हृदयंगम किया जा सका तो आकाँक्षाओं और कामनाओं का स्वरूप बदला हुआ होगा। रीति-नीति और कार्य पद्धति में वैसा परिवर्तन परिलक्षित होगा जैसा आत्म ज्ञान सम्पन्न मनुष्य में प्रत्यक्षतः दृष्टिगोचर होना चाहिए।

*📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1975*

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सोमवार, 27 अप्रैल 2026

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रविवार, 26 अप्रैल 2026

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शनिवार, 25 अप्रैल 2026

👉 साधना में आत्म-समर्पण की आवश्यकता (भाग १)

योग-साधन में सबसे बड़ी कठिनाई मन को वश में करने की होती है। इसकी चंचलता और शैतानी का कुछ ठिकाना नहीं। मन बिल्ली की तरह ताक लगाये बैठा रहता है और जैसे ही कोई महान विचार उदय होता है यह उस पर झपट पड़ता है और फिर नई-नई वासनाओं या कामनाओं का पचड़ा आरम्भ कर देता है। इच्छा का स्वरूप भी लगभग ऐसा ही है। हमने प्रायः देखा है कि श्रेष्ठ इच्छा का आगमन होते ही पुरानी इच्छा अपने पुराने अभ्यास के अनुसार उस पर चढ़ बैठती है। थोड़ी दूर चलने पर मालूम पड़ता कि इस विचार या इच्छा में तो कोई भूल थी। तब फिर मन को शान्त अवस्था प्राप्त होती है। इस प्रकार यह मन का विद्रोह बहुत समय तक चलता रहता है। धैर्य धारण करके धीरता के सहारे ही मन के इन भोगों को हटाना चाहिये। इसके पश्चात् मन धीरे-धीरे शिष्ट बनने लगता है।

साधना दो प्रकार की होती है—एक अपने लिये तपस्या करना और दूसरी साधना। इन्हीं को “कर्म योग“ और “ज्ञान योग“ के नाम से पुकार सकते हैं। ज्ञान-योग का स्वरूप साधारणतः यह है कि हम सब से अलग होकर यह निरीक्षण करते रहें कि मन के भीतर कैसी-कैसी आकाँक्षाएँ, प्रभाव और विचार उमड़ रहे हैं और शान्त हो रहे हैं। हमें उदासीन भाव से यह देखना चाहिये कि किस वस्तु से हानि पहुँच रही है। आरम्भ में तो इन वस्तुओं के साथ स्वयं भी मिलना पड़ता है, क्योंकि इसके बिना उन पर दृष्टि ही नहीं पड़ती। धीरे-धीरे अभ्यास हो जाने पर सभी बातें प्रकृति के त्रिगुण की क्रीड़ा-तरंगों से ही उत्पन्न होती हैं। वस्तुतः हम अपनी निजी शक्ति से किसी भी विचार, बोध या कार्य की उत्पत्ति होना नहीं मान सकते। सब प्रकृति का दिया हुआ ही होता है, प्रकृति द्वारा ही इन सब में हमारी प्रवृत्ति होती है। इसलिए हम कह सकते हैं कि यह सब प्रकृति की ही ठगविद्या या विशेषता है—हम तो सिर्फ उससे मिले हुये ज्ञान रहित होकर पड़े हैं। 

सुख-दुख, पाप-पुण्य, फलाफल का द्वन्द्व मचा हुआ है। इससे बचने का एक मात्र उपाय यह है कि हम भी इसके विरुद्ध एक तरकीब या चाल से काम लेकर प्रकृति के कौशल को परास्त कर दें। वह चाल है अपना पृथक करण अर्थात् अपने को पूर्णतः प्रकृति से अलग समझना। भीतर का द्रष्टा पुरुष जितने अविचल भाव से स्थित हो सकेगा; उतना ही अधिक बन्धन स्वरूप द्वंद्व ढीला होगा और फिर अन्त में फिर द्वंद्व की इतिश्री हो जायगी। यही “ज्ञान योग“ का सार है। किन्तु इस ज्ञान योग के हो जाने से भी सब काम समाप्त नहीं हो जाता। प्रकृति के तीनों गुणों से अपने को मुक्त कर लेना ही पर्याप्त नहीं है, वरन् उन गुणों का रूपांतर हो जाना चाहिये। गीताकार ने भी “निस्त्रेगुण्य” के परे हो जाने का निर्देश किया है, पर उसकी विशेष व्याख्या नहीं की है। अब हमको इस ओर स्वयं ही ध्यान देना चाहिये।

“कर्म योग“ का रहस्य भी इसी तरह का है। पहले फलाफल को समर्पण करके—अर्थात् फलाफल की आशा त्यागकर कार्य करते जाना चाहिए। हृदय में भगवान है ऐसा समझ कर, उनका स्मरण करते हुये सब कामों को आरम्भ करना चाहिये, जैसे कि गीता में भगवान ने कहा “यथा नियुक्तोऽस्मि” (इनमें भी “मैं” करता हूँ) इसके पश्चात् इस कतृत्व (कर्तापन) के अभिमान का भी त्याग (उत्सर्ग) कर देना चाहिये। फल के साथ ही साथ कर्म का भी समर्पण करना पड़ता है। हमको यह समझना चाहिये कि सब कर्म प्रकृति के गुणों के अनुसार ही होते हैं, इसे पुरुष द्रष्टा भाव से देखता रहे। ऐसा होने से आपको जान पड़ेगा एक विश्वभाव-युक्त शक्ति ही समस्त विचारों, अनुभवों और कार्यों में चल कर सृष्टि का सम्पादन कर रही है। ऐसा होने से ही हमको एक शान्त, समदर्शी और साक्षी की अवस्था प्राप्त होती है। तब भी हमारे भीतर द्वंद्व रहता है, किन्तु वह मन, प्राण और शरीर के ऊपरी भाग में ही रहता है—भीतर तो समता ही स्थिर रहती है। इस अवस्था में बाहर के अन्य लोग इसमें भी दोष गुण, छोटे-बड़े का आस्तित्व ही देखते हैं, किन्तु साधक के भीतर का पुरुष गुणातीत और शाँति मग्न अवस्था में ही रहता है। यह अवस्था निःसंदेह बहुत ऊँची है, फिर भी हमको इससे आगे बढ़ना आवश्यक है क्योंकि पक्की अवस्था तभी मानी जायगी जब गुणों का भी परिवर्तन हो जाय।

*.....क्रमशः जारी*
योगीराज अरविन्द
📖 अखण्ड ज्योति जून 1959

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👉 कुँठित भावनाओं को निकाल दीजिए। (भाग 2)

सेक्तमाहना की अतृप्ति से नैराश्य और उदासीनता उत्पन्न हो जाती है। कुछ स्त्री पुरुष तो अर्द्धविक्षिप्त से हो जाते हैं, कुछ का विकास रुक जाता ह...