मंगलवार, 7 जनवरी 2020

👉 अनुभव और समझ

एक बहुत विशाल पेड़ था। उस पर कई हंस रहते थे। उनमें एक बहुत सयाना हंस था। बुद्धिमान और बहुत दूरदर्शी। सब उसका आदर करते ‘ताऊ’ कह कर बुलाते थे। एक दिन उसने एक नन्ही-सी बेल को पेड़ के तने पर बहुत नीचे लिपटते पाया।

ताऊ ने दूसरे हंसों को बुलाकर कहा- ‘‘देखो !! उस बेल को नष्ट कर दो। एक दिन यह बेल हम सबको मौत के मुंह में ले जाएगी।’’

एक युवा हंस हंसते हुए बोला- ‘‘ताऊ यह छोटी-सी बेल हमें कैसे मौत के मुंह में ले जाएगी?’’

सयाने हंस ने समझाया- ‘‘आज यह तुम्हें छोटी-सी लग रही है। धीरे-धीरे यह पेड़ के सारे तने को लपेटा मारकर ऊपर तक आएगी। फिर बेल का तना मोटा होने लगेगा और पेड़ से चिपक जाएगा, तब नीचे से ऊपर तक पेड़ पर चढऩे के लिए सीढ़ी बन जाएगी। कोई भी शिकारी सीढ़ी के सहारे चढ़कर हम तक पहुंच जाएगा और हम मारे जाएंगे।’’

किसी हंस ने ताऊ की बात को गंभीरता से नहीं लिया। समय बीतता रहा। बेल लिपटते-लिपटते ऊपरी शाखाओं तक पहुंच गई। बेल का तना मोटा होना शुरू हुआ और सचमुच ही पेड़ के तने पर सीढ़ी बन गई। एक दिन जब सब हंस दाना चुगने बाहर गए हुए थे तब एक बहेलिया उधर आ निकला। पेड़ पर बनी सीढ़ी को देखते ही उसने पेड़ पर चढ़ कर जाल बिछाया और चला गया। सांझ को सारे हंस लौट आए और पेड़ पर उतरे तो बहेलिए के जाल में बुरी तरह फंस गए। सब ताऊ की बात न मानने के लिए लज्जित थे और अपने आपको कोस रहे थे।

एक हंस ने हिम्मत करके कहा- ‘‘ताऊ हम मूर्ख हैं,लेकिन अब हमसे मुंह मत फेरो।’’

दूसरा हंस बोला- ‘‘इस संकट से निकलने की तरकीब तुम ही हमें बता सकते हो। आगे हम तुम्हारी बात नहीं टालेंगे।’’

सभी हंसों ने हामी भरी, तब ताऊ ने उन्हें बताया- "‘‘मेरी बात ध्यान से सुनो। सुबह जब बहेलिया आएगा, सब मुर्दा होने का नाटक करना। बहेलिया तुम्हें मुर्दा समझकर जाल से निकाल कर जमीन पर रखता जाएगा। वहां भी मरे समान पड़े रहना। जैसे ही वह अंतिम हंस को नीचे रखेगा, मैं सीटी बजाऊंगा। मेरी सीटी सुनते ही सब एक साथ उड़ जाना।’’

सुबह बहेलिया आया। हंसों ने वैसा ही किया, जैसा ताऊ ने समझाया था। सचमुच बहेलिया हंसों को मुर्दा समझ कर जमीन पर पटकता गया। सीटी की आवाज के साथ ही सारे हंस उड़ गए। बहेलिया अवाक् होकर देखता रह गया।

👉 पुष्ट इकाइओं से बना समर्थ राष्ट्र


👉 सद्गृहस्थ की सिद्धि-साधना


👉 शालीन परिवार


👉 सद्गृहस्थ सुधन्वा की शक्ति


👉 नव निर्माण हेतु विभूतियों का आह्वान (भाग २)

(२) शिक्षा एवं साहित्य-व्यक्ति की समस्त गरिमा उसकी मनःस्थिति पर, विचार प्रक्रिया पर निर्भर है। इस जीवन प्राण के मर्म स्थल को शिक्षा एवं साहित्य के माध्यम से ही परिष्कृत बनाया जा सकता है। व्यक्ति और समाज के निर्माण में शिक्षा और साहित्य की महत्ता सर्वविदित है। युग परिवर्तन की इन घड़ियों में दोनों माध्यमों का समुचित उपयोग किया जाना चाहिए।

सरकारों को अपने ढंग से काम करने देना चाहिए। वर्तमान वातावरण में उनके लिये यह कठिन ही है। नये युग के अनुरूप मस्तिष्क ढालने वाली वाली शिक्षा पद्धति के बारे में वे सही ढंग से कुछ सोच सकें और वैसा ही कुछ सही कदम उठा सकें। सरकारें भौतिक जानकारियाँ देने वाली जो शिक्षा प्रक्रिया चला रही हैं उससे लाभ उठाना चाहिये, किन्तु भाव परिष्कार की पूरक धर्म शिक्षा, नैतिक शिक्षा, भावनात्मक नव निर्माण की शिक्षा पद्धति का संचालन जनता स्तर पर होना चाहिए। प्रौढ़ शिक्षा का कार्य भी जनता को ही अपने हाथ में लेना चाहिए। ये सरकारी स्तर पर नहीं, जन स्तर पर ही हल हो सकता है। विवाहित महिलाओं की शिक्षा का प्रबन्ध सरकारी विद्यालय कर सकेंगे, यह आशा रखनी व्यर्थ है। दृष्टिकोण का परिष्कार, आज की परिस्थितियों में चरित्र निर्माण का व्यवहार पक्ष, समाज संरचना की अगणित समस्याएँ और हल, विश्व परिवार के लिए बाध्य करने वाले प्रचण्ड वातावरण का निर्माण, यह सब प्रयोजन जन स्तर के विद्यालय ही पूरा कर सकेंगे। पूरे या अधूरे समय के-जहाँ वे जिस स्तर पर भी खुल सकें खोले जायें। जनता अपनी रोटी, कपड़ा, दवा, मनोरंजन आदि का खर्च स्वयं उठाती है, इसके लिए सरकार से अनुदान नहीं माँगती, तो फिर भावनात्मक नव-निर्माण की शिक्षा के लिए सरकार का मुँह ताका जाय, इसकी क्या आवश्यकता है?

साहित्यकारों से इसी दिशा में लेखनी उठाने के लिए कहा जा रहा है। कवियों से मूर्छना को जागृति में परिणित कर सकने वाले अग्नि गीत लिखने के लिए कहा गया है। कहानीकार कथा माध्यमों से हृदयग्राही चित्रण प्रस्तुत कर सकते हैं। पत्रकार अपने पत्र-पत्रिकाओं में इस प्रकार के समाचारों और लेखों को स्थान देना आरम्भ करें। प्रकाशक ऐसी ही पुस्तकें छापें। संसार में लगभग ६०० भाषाएँ हैं। भारत में ही सरकारी मान्यता प्राप्त १४ भाषाएँ है और इससे कई गुनी संख्या उन भाषाओं की है जिन्हें मान्यता प्राप्त नहीं है। इन सभी भाषाओं में प्रचुर साहित्य लिखा जाना, अनुवादित किया जाना, छापा जाना और विक्रय किया जाना आवश्यक है। इस प्रकाशन व्यवसाय के लिए पूँजी और प्रतिभा दोनों की ही जरूरत है। मात्र लेखक नहीं प्रकाशक भी जब इस क्षेत्र में उतरेंगे तो उनके परस्पर सहयोग, समन्वय से कुछ काम चलेगा।

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 बुद्धि से बोध तक

बुद्ध पूर्णिमा में आध्यात्मिक जीवन की सम्पूर्णता का प्रकाश है। सच तो यह है कि जहाँ बोध ही बुद्ध हैं, वहीं पूर्णिमा है और जहाँ बुद्धि है, वहीं अमावस। बुद्धत्व में अनुभव का बोध है, जबकि बुद्धि में केवल बीते हुए पुराने पड़ चुके अनुभवों का संकलन और अनुमान की भटकन। अपनी आँखें न हों तो करोड़ों सूर्य मिलकर भी जीवन का अँधियारा नहीं मिटा सकते। ऐसे में लकड़ी और छड़ी कितनी ही मजबूत क्यों न हों, पर इनसे आँखों का अनुभव नहीं पाया जा सकता।
  
भगवान् बुद्ध ने मानवता को इसी सत्य की सीख दी। उन्होंने जीवन की जो राह दिखाई, उसका आदि तो बुद्धि में है, पर अंत बोध में है। उन्हें अपना प्रारम्भ बुद्धि से करना पड़ा, क्योंकि हम सब यहीं खड़े हैं, परन्तु अंत बुद्धि में नहीं हैं। अंत तो परम अतिक्रमण है, जहाँ सब विचार खो जाते हैं, सब बुद्धिमत्ता विसर्जित हो जाती है, रह जाता है तो केवल निर्वाण, शान्ति व शून्यता भरा साक्षी भाव। यही बोध और अनुभव का चरम शिखर है।
  
मानवता के इन परम सद्गुरु ने बुद्धि के प्रयोग को अस्वीकारा नहीं। उन्होंने कहा कि बुद्धि के प्रयोग करो, संदेह, तर्क, विश्लेषण, विवेचन एक-एक कर सभी अथवा एक साथ सभी। पर इनकी गति अनुभव की ओर होना चाहिए। अनुभव की ओर गति न हो सकी तो बुद्धि केवल अमावस बनकर रह जायेगी। भले ही फिर इस अमावस के अँधेरे में संदेह, तर्क विश्लेषण, विवेचन जुगनुओं की भाँति चमकते हैं, किन्तु यदि बुद्धि की प्रतिबद्धता अनुभव रही तो प्रतिपदा, द्वितीया के क्रमिक सोपानों को पार करते हुए पूर्णिमा का प्रकाश आ ही जायेगा।
  
भगवान् तथागत के उपदेशों का सार यही है कि आध्यात्मिक जीवन का प्रारम्भ भले ही अनुभवों का संकलन एवं विश्लेषण से हो पर इस यात्रा का चरम स्वयं के अनुभव एवं परसंश्लेषण में होना चाहिए। बुद्धि से बोध तक यही है अनुभवाधारित पूर्णिमा की आध्यात्मिक यात्रा। इस यात्रा की सम्पूर्णता का अर्थ है-बोध की सम्पूर्णता। जहाँ कहीं, जब, जिस किसी के जीवन में यहाँ सम्पूर्णता आयी समझो उसके अंतस् में बुद्ध पूर्णिमा की चाँदनी बरस गयी।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १५३

👉 FALLACIES ABOUT SCRIPTURAL RESTRICTIONS (Part 1)

Q.1. Is Gayatri worship conditioned? (Is Gayatri ‘keelit’)?

Ans. There are two methods for invoking powers of  Gayatri. One the simple divine method for spiritual progress and the other an intricate method of ‘Tantra Shastra’ for immediate fulfilment of worldly desires. The Mantras of Tantra Shastra also have a destructive power. Unless, they are practised with a strict discipline and for proper objective, they are capable of inflicting harm on the practitioner. A person with an ulterior motive can inflict harm on others through the power obtained by invocation of occult powers through ‘Tantra Sadhana’. Hence specific key procedures are required to unlock the powers of Tantrik Mantras. This,  too, is possible only with the help of an experienced Guru. As doses of a high potency medicine are to be decided by an experienced doctor, decoding or unlocking a Mantra (in the above discipline) depends on the spiritual status of the one practitioner. ‘Durga Shaptshati’ which requires ‘Kavach’, ‘Keelan’ and ‘Argal’ may be quoted as an example).  

Vedic Mantras (such as Gayatri) are not bound by such strict restrictions, as they are practised exclusively for one’s inherent spiritual growth and for developing god-gifted capabilities for performing noble deeds. Vedic Mantras, therefore, do not require any ‘unlocking keys’. Nevertheless, as a sick person or a student needs an experienced doctor or a teacher for proper treatment or teaching a beginner in this field too requires the guidance of an accomplished Guru, in the absence of which he wanders aimlessly without making any progress whatsoever in the path of Sadhana.

None should entertain any apprehension that in Kalyug, Gayatri Mantra has been accursed or that its Sadhana goes in vain. Who can curse God and what effect can it have? This is nothing but a ruse meant to undermine the faith of the people and to allure them to join some other sect.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 44

👉 ज्ञान और विज्ञान एक दूसरे का अवलम्बन अपनाएँ

ज्ञान और विज्ञान यह दोनों सहोदर भाई हैं। ज्ञान अर्थात् चेतना को मानवी गरिमा के अनुरूप चिन्तन तथा चरित्र के लिए आस्थावान बनने तथा बनाने की प्रक्रिया। यदि ज्ञान का अभाव हो तो मनुष्य को भी अन्य प्राणियों की भाँति स्वार्थ परायण रहना होगा। उसकी गतिविधियाँ पेट की क्षुधा निवारण तथा मस्तिष्कीय खुजली के रूप में कामवासना का ताना-बाना बते रहने में ही नष्ट हो जायेंगी।
  
मनुष्य भी एक तरह का पशु है। जन्मजात रूप से उसमें भी पशु, प्रवृत्तियाँ भरी होती हैं। उन्हें परिमार्जित करके सुसंस्कारी एवं आदर्शवादी बनाने का काम जिस चिन्तन पद्धति का है उसे ज्ञान कहा गया है। गीताकार का कथन है कि—‘‘ज्ञान से अधिक श्रेष्ठ और पवित्र अन्य कोई वस्तु नहीं है। ‘न हि ज्ञानेन पवित्रमिद्द विद्यते।’
  
ज्ञान वह अग्नि है जो सड़े-गले उबले लोहे को अग्नि संस्कार करके माण्डूर भस्म—लौह भस्म आदि अमतोपम गुण दिखा सकने योग्य बनाती है। पतित, पापी, मूढ़, पशु, महामानव, ऋषि आदि की काया एक ही तरह की होती है। उनकी बनावट और रहन-सहन पद्धति में कोई अन्तर नहीं होता। फिर जो एक को गया-गुजरा और दूसरों को आकाश में छाया देखते हैं। वह उसकी ज्ञान चेतना का ही चमत्कार है। वह हेय स्तर की ही तो मनुष्य निरर्थक या अनर्थ मूलक कामों में लगा हुआ दृष्टिगोचर होगा। यदि यह ज्ञान पवित्र, श्रेष्ठ और उत्साहवर्धक हो तो वही शरीर ऐसा काम करते हुए दिखाई देगा जिनसे असंख्यों को प्रेरणा मिले और उसका अनुगमन करने वालों के लिए भी प्रगति का मार्ग प्रशस्त हो।
  
ज्ञान आन्तरिक जीवन से सम्बन्धित है और वह चेतना क्षेत्र में प्रभावित करके उचित-अनुचित का अन्तर करना सिखाता है। दूरदर्शी विवेकशीलता के आधार पर जो निर्णय या निर्धारण किए जाते हैं उन्हें ज्ञान का, सद्ज्ञान का ही अनुदान कहना चाहिए।
  
ज्ञान का सहोदर है—विज्ञान। विज्ञान अर्थात् पदार्थ ज्ञान। हमारे चारों ओर अगणित वस्तुएँ बिखरी पड़ी हैं। वे अपने मूलरूप में प्रायः निरर्थक जैसी हैं उन्हें उपयोगी बनाने और उनकी विशेषताओं को समझने की प्रक्रिया विज्ञान है। विज्ञान ने मनुष्य को साधन सम्पन्न बनाया है। अन्य प्राणी इस जानकारी से रहित हैं इसलिए वे निकटवर्ती आहार को उपलब्ध करने में ही अपनी क्षमता समाप्त कर लेते हैं। यौवन की तरंग मन में उठने पर वे प्रजनन कृत्य में भी अपना विशेष पुरुषार्थ प्रदर्शित करते देखे जाते हैं। यह प्रकृति प्रदत्त शरीर के साथ मिलने वाली स्वाभाविकता है। उन्हें विज्ञान नहीं मिला। विज्ञान केवल मनुष्य की विशेष उपलब्धि है। आग जलाना, कृषि, पशुपालन, वास्तुशिल्प, भाषा, चिकित्सा आदि एक से एक बढ़कर जानकारियाँ उसने प्राप्त की हैं और उनके सहारे साधन सम्पन्न बना है।
  
कभी विज्ञान की परिधि छोटी थी और उसके सहारे जीवनोपयोगी वस्तुओं तक का ही उत्पादन एवं प्रस्तुतीकरण होता था, पर अब बात बहुत आगे बढ़ गई और प्रकृति ने अनेकानेक रहस्य खोज निकाल लिए गए हैं। इतना ही नहीं वरन् इससे भी आगे बढ़कर दूसरों के साधन छीनने वाले, उन्हें असमर्थ बनाने वाले प्राण घातक अस्त्र-शस्त्र भी बनने लगे हैं। जिस विज्ञान से सुख साधनों की वृद्धि का स्वप्न देखा जाता है वही यदि विनाश या पतन की सामग्री प्रस्तुत करने लगे तो आश्चर्य और असमंजस की बात है।
  
आज ज्ञान और विज्ञान दोनों ही अपनी प्रौढ़ावस्था में हैं। विडम्बना एक ही है कि वे सीधी राह चलने की अपेक्षा उल्टी दिशा अपना रहे हैं और एकदूसरे का सहयोग न करके विरोध का रुख अपनाए हुए हैं और तरह-तरह के दाँव-पेचों का आविष्कार कर रहे हैं। इन गतिविधियों से वह धारा अवरुद्ध हो गई, जो अब तक मनुष्य को समर्थ और सुखी बनाती रही है। अब उनमें प्रयास भस्मासुर जैसे ही चले हैं। जिसने उन्हें विकसित किया उसी मनुष्य का हेय, हीन बनाते और जीवन संकट खड़ा करने के लिए उद्यत दीखते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 विश्व स्तरीय चालीस दिवसीय साधना अनुष्ठान


Note :
चालीस दिवसीय साधना अनुष्ठान की यह साधना साधकों को अपने घर पर रह कर ही संपन्न करनी है । इस के लिए शांतिकुंज  नहीं आना होगा । पंजीयन करने का उद्देश्य सभी साधकों की सूचना एकत्र करना एवं शांतिकुंज स्तर पर दोष परिमार्जन एवं संरक्षण एवं मार्गदर्शन की व्यवस्था करना है ।

प्रखर साधना किस लिये ??

#युग परिवर्तन के चक्र को तीव्र करने हेतु
#संक्रमण काल में युगशिल्पियों को तपाने हेतु
#आतंकवादी / आसुरी शक्तियों के निरस्तीकरण हेतु
#वंदनीया माता जी को श्रद्धांजलि हेतु
 # नव सृजन की गतिविधियों को शक्ति एवं संरक्षण प्रदान करने हेतु

आत्मीय परिजन,

सन् 2026 में परम वंदनीया माताजी के जन्म, अखण्ड दीप प्रज्ज्वलन एवं श्री अरविन्द महर्षि के अति मानस अवतरण की शताब्दी मनाई जानी है। प्रखर साधना के अभाव में समस्त सामाजिक, सांस्कृतिक आंदोलन धराशायी हो गये। युग निर्माण आन्दोलन इसलिये प्रखर है क्योंकि इसमें ऋषियुग्म का तप एवं युग साधकों की प्रखर साधना है। इस विषम बेला में और अधिक प्रखरता की अपेक्षा की जा रही है। इस हेतु शांतिकुंज ने  2026 तक वार्षिक चालीस दिवसीय अनुष्ठान की योजना बनाई है।

    क्या करें ??

 * चूँकि विश्व स्तर पर 24000 साधकों द्वारा साधना की जायेगी, इस हेतु जोन/ उप जोन / जिला समितियों को अपनी जवाबदारी सुनिश्चित करनी है।
*  सक्रिय 108 जिलों में 240 साधक प्रति जिले के हिसाब से एवं अन्य जिले में 108 या 51 साधक तैयार/सहमत/संकल्पित करें।
* तपोनिष्ठ पूज्यवर ने 24 लाख के 24 महापुरश्चरण किये थे तो हम छोटा- सा सवा लाख मंत्रों का चालीस दिवसीय अनुष्ठान तो करें ही।
*  पूज्यवर ने 24 वर्षों तक जौ की रोटी और छाछ पर तप किया, हम यथा संभव 40 दिनों तक नमक और (या) शक्कर का त्याग करें।
*  पूज्यवर ने जीवनकाल में 3200 के आसपास पुस्तकें लिखीं, हम चालीस दिनों में दो- तीन पुस्तकों का स्वाध्याय तो कर ही लें ।।
 * उन्होंने करोड़ों व्यक्तियों/साधकों का निर्माण किया, हम अपने जैसे / अपने से बेहतर 24 व्यक्तियों को साधक / कार्यकर्ता बना दें तभी हम उनके पुत्र कहलायेंगे, इससे कम में बात नहीं बनेगी।
*  शान्तिकुन्ज में पाँच दिवसीय मौन (अंत:ऊर्जा) शिविर चलते हैं, अपने जिले में चालीस दिनों में एक दिन, एक दिवसीय मौन शिविर इस दौरान संचालित करें।
 * पूर्णाहुति, समस्त शक्तिपीठों पर एक साथ एक समय पर संपन्न हो।

कैसे करें ?- अनुशासन, अणुव्रत :-

1.  उपासना :: न्यूनतम 33 मालाओं का चालीस दिनों तक जप प्रतिदिन करना है, भले ही
दो या तीन चरणों में हो। जप के साथ हिमालय के सर्वोच्च शिखर पर उदीयमान भगवान
सविता का ध्यान। जप से पूर्व अनुलाम- विलाम अथवा प्राणसंचार प्राणायाम करें। जप गिनती के लिये नही, अपितु उसकी गहराई को बढ़ाते हुये, भावविह्वल होकर करें। अपनी ही माला से जप करें।
2. साधना :: चालीस दिनों में ब्रह्मचर्य का पालन, हो सके तो एक समय उपवास, सात्विक, अस्वाद व्रत, न्यूनतम दो घंटे मौन, अपनी सेवा अपने हाथों से, मेरा अनुष्ठान है इस बात का सार्वजनिक प्रचार न करना, अर्थ संयम, विचार संयम के साथ समय संयम का पालन का प्रयास करना। भाव शुद्धि, चित्त शुद्धि का अधिकाधिक प्रयास। साधना का अहंकार न पालें, पूज्यवर करा रहे हैं, यही भाव प्रकट हो। मोह से पिंड छुड़ाने हेतु कभी कभी शक्तिपीठ पर विश्राम करें। लोभ निवारण हेतु अपनी प्रिय वस्तुयें बांटने का प्रयत्न करें। चालीस दिनों तक निंदा से बचना, परिजनों की प्रशंसा को लक्ष्य बनावें, गुण ग्राहक बनें। स्वास्थ्य के अनुकूल हो तो, गोझरण/गौमूत्र/तुलसी जल का सेवन करें इससे ध्यान सहज लगेगा।
3. स्वाध्याय :: स्वाध्याय से श्रद्धा संवर्धन होता है। अत: गायत्री महाविज्ञान, हमारी वसीयत विरासत, महाकाल की प्रत्यावर्तन प्रक्रिया, लोकसेवियों हेतु दिशा बोध इन पुस्तकों का अनिवार्य स्वाध्याय हो। हमको सब मालूम है इस अकड़ में न रहें, पुस्तकों का श्रद्धापूर्वक पाठ करें।
4. आराधना :: समयदान, जन संपर्क एवं देवालय सेवा का लक्ष्य रखें। परिणाम की चिंता किये बगैर 40 दिनों में न्यूनतम 10 लोगों तक साहित्य पहुँचा कर उनका हालचाल पूछें एवं अच्छे श्रोता की तरह सुनें, यथोचित समाधान दें। साप्ताहिक रूप से शक्तिपीठ / प्रज्ञापीठ / केन्द्र की स्वच्छता करना। स्नानगृह, शौचालय अनिवार्य रूप से स्वच्छ रखना। प्रज्ञा संस्थान दूर हो तो ग्राम के ही देवालय की स्वच्छता करना। समय बचाने हेतु वाटस्एप एवं अन्य सोशल मीडिया का विवेकयुक्त उपयोग करना।
5. अखण्ड जप/दीपयज्ञ :: इन चालीस दिनों में प्रत्येक साधक अपने निवास पर एक दिन का अखण्ड- जप रखे जिसका समापन दीपयज्ञ से होगा। इस तरह 24000 अखण्ड जप एवं इतने ही दीपयज्ञ भी संपन्न होंगे।
6. अंशदान :: चाय का खर्चा बचा कर 5 रु प्रतिदिन जमा कर रू 200.00 पूर्णाहुति में लगायें। यह क्रम वर्ष भर एवं निरंतर चलने दें। इसका उपयोग विद्या विस्तार में करें।
7. विशेष :: साधना के दौरान सूतक, अशौच इत्यादि की बाधा आवे तो उतने दिन आगे बढ़ा देवें परंतु इसे बहाना न बनावें। ये समस्त अनुशासन घर के लिये हैं, यात्रा, कार्यक्रम, बीमारी आदि में आपद्धर्म का पालन करें। अपनी ही माला से जप करें, हो सके तो अपना ही आसन लें। गोमुखी का प्रयोग अर्थात् माला को ढंक कर जप करें। स्वच्छ वस्त्रों में, संभव हो तो पीले में ही जप करें। अनुष्ठान के पूर्व यज्ञोपवीत को बदल लें। साप्ताहिक रूप से घर पर, संभव हो तो शक्तिपीठ पर यज्ञ में भाग लेवें।
8. चिन्तन :: साधना में हैं तो सारे काम बंद, ऐसा न करें। गुरु कार्य हेतु ही साधना कर रहे हैं, अत: गुरु कार्य ही जीवन साधना है इसका ध्यान रहे। हर सुबह नया जीवन- हर रात नई मौत का चिंतन, आत्म बोध, तत्व बोध की साधना हो। अन्य विषयों पर बेकार की चर्चा में भाग न लें, विनम्रतापूर्वक वहाँ से हट जायें।
9. मौन साधना :: चालीस दिनों में एक बार, एक दिन के मौन शिविर में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें।
10. वृक्ष गंगा अभियान :: 24000 साधक, तरुपुत्र / तरुमित्र योजना में भाग लेकर वृक्ष देव की स्थापना का संकल्प करें। वृक्ष को पितृवत्, मित्रवत् पालने, रक्षा करने एवं संवर्धन करने हेतु तत्पर हों।
11. पूर्णाहुति :: समस्त शक्तिपीठों में एक साथ एक समय पर संपन्न होगी। न्यूनतम 108 आहुतियाँ देनी ही हैं। साधकों के यज्ञ में कृपणता न हो। लोक जागरण के यज्ञ सादगी, मितव्ययिता के साथ संपन्न करावें किंतु इस पूर्णाहुति को भाव श्रद्धा से युक्त होकर करें। समस्त साधक अपने घर पर तैयार किये गये मिष्ठान्न का गायत्री माता को भोग लगायें। पूर्णाहुति पर कार्यकर्ता सम्मेलन में अनुयाज के संकल्प किये जायें।
12. ब्रह्मभोज :: अनुष्ठान के समापन पर ब्रह्मभोज हेतु सत्साहित्य का वितरण करें।
13. अनुयाज :: 24000 साधक 10 याजकों को प्रशिक्षित कर न्यूनतम दस घरों में 7 मई 2020, गुरुवार  ( वैशाख पूर्णिमा- बुद्ध पूर्णिमा ) को गृहे- गृहे यज्ञ अभियान में यज्ञ करावें तो व्यक्ति निर्माण के साथ वातावरण परिशोधन का क्रम एक साथ चल पड़ेगा एवं कार्यकर्ताओं का सुनियोजन भी होगा।
14. उपरोक्त अनुशासनों के पालन में अपने स्वास्थ्य का भी ध्यान रखें, अधिक कठोर अभ्यास से स्वास्थ्य संबंधी कष्ट हो सकता है अत: तदनुसार कार्य करें।

‘तुम्हारी शपथ हम, निरंतर तुम्हारे, चरण चिन्ह की राह चलते रहेंगे॥’
आईये, प्रखर साधना अभियान हेतु आपको भाव- भरा आमंत्रण ॥


Registration,@

www.awgp.org http://diya.net.in/
 
https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSd9pL7DFc8ybxUFpWQj5wK2ERbVn1BnlGyfRCI6NFdYMKXG5w/viewform

विस्तृत मार्गदर्शन हेतु प.पू गुरुदेव द्वारा लिखित गायत्री की अनुष्ठान एवं पुरश्चरण साधनाएँ,  का सन्दर्भ लें|
शंका समाधान हेतु शान्तिकुन्ज से पत्र अथवा मेल से सम्पर्क करें।

Contact US : 

For any Question Mail Us:-
 youthcell@awgp.org
Contact No - 9258360652,
                        9258360600


पूर्ण शान्ति की प्राप्ति
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
Poorn Shanti Ki Prapti
Pt Shriram Sharma Acharya
👇👇👇
https://youtu.be/XWDPHgjYpEg


हे प्रभो जीवन हमारा यज्ञ मय कर दीजिये

प्रज्ञा गीत संगीत
श्रद्धेया शैलबाला पंड्या जीजी
👇👇👇
https://youtu.be/dg1ixwuvNvc


देवत्व को बचाने, संघर्ष भी किये हैं।
Devatwa Ko Bachane Sangharsh Bhi Kiye Hai
प्रज्ञा गीत संगीत
श्रद्धेया शैलबाला पंड्या जीजी 
👇👇👇
https://youtu.be/7nHWFLcWZS0

शुक्रवार, 3 जनवरी 2020

Vartman Paristhitiyan | वर्तमान परिस्थितियाँ | Pt Shriram Sharma Acharya



Title

👉 जिंदगी का सफर-ये कैसा सफर

एक प्रोफेसर अपनी क्लास में कहानी सुना रहे थे, जोकि इस प्रकार है–

एक बार समुद्र के बीच में एक बड़े जहाज पर बड़ी दुर्घटना हो गयी। कप्तान ने शिप खाली करने का आदेश दिया। जहाज पर एक युवा दम्पति थे। जब लाइफबोट पर चढ़ने का उनका नम्बर आया तो देखा गया नाव पर केवल एक व्यक्ति के लिए ही जगह है। इस मौके पर आदमी ने औरत को धक्का दिया और नाव पर कूद गया।

डूबते हुए जहाज पर खड़ी औरत ने जाते हुए अपने पति से चिल्लाकर एक वाक्य कहा।

अब प्रोफेसर ने रुककर स्टूडेंट्स से पूछा – तुम लोगों को क्या लगता है, उस स्त्री ने अपने पति से क्या कहा होगा? ज्यादातर विद्यार्थी फ़ौरन चिल्लाये – स्त्री ने कहा – मैं तुमसे नफरत करती हूँ! I hate you!

प्रोफेसर ने देखा एक स्टूडेंट एकदम शांत बैठा हुआ था, प्रोफेसर ने उससे पूछा कि तुम बताओ तुम्हे क्या लगता है?

वो लड़का बोला – मुझे लगता है, औरत ने कहा होगा – हमारे बच्चे का ख्याल रखना!

प्रोफेसर को आश्चर्य हुआ, उन्होंने लडके से पूछा – क्या तुमने यह कहानी पहले सुन रखी थी ? लड़का बोला- जी नहीं, लेकिन यही बात बीमारी से मरती हुई मेरी माँ ने मेरे पिता से कही थी।

प्रोफेसर ने दुखपूर्वक कहा – तुम्हारा उत्तर सही है!

प्रोफेसर ने कहानी आगे बढ़ाई – जहाज डूब गया, स्त्री मर गयी, पति किनारे पहुंचा और उसने अपना बाकि जीवन अपनी एकमात्र पुत्री के समुचित लालन-पालन में लगा दिया। कई सालों बाद जब वो व्यक्ति मर गया तो एक दिन सफाई करते हुए उसकी लड़की को अपने पिता की एक डायरी मिली। डायरी से उसे पता चला कि जिस समय उसके माता-पिता उस जहाज पर सफर कर रहे थे तो उसकी माँ एक जानलेवा बीमारी से ग्रस्त थी और उनके जीवन के कुछ दिन ही शेष थे।

ऐसे कठिन मौके पर उसके पिता ने एक कड़ा निर्णय लिया और लाइफबोट पर कूद गया। उसके पिता ने डायरी में लिखा था – तुम्हारे बिना मेरे जीवन को कोई मतलब नहीं, मैं तो तुम्हारे साथ ही समंदर में समा जाना चाहता था। लेकिन अपनी संतान का ख्याल आने पर मुझे तुमको अकेले छोड़कर जाना पड़ा।
जब प्रोफेसर ने कहानी समाप्त की तो, पूरी क्लास में शांति थी।

इस संसार में कईयों सही गलत बातें हैं लेकिन उसके अतिरिक्त भी कई जटिलतायें हैं, जिन्हें समझना आसान नहीं। इसीलिए ऊपरी सतह से देखकर बिना गहराई को जाने-समझे हर परिस्थिति का एकदम सही आकलन नहीं किया जा सकता।

◆ कलह होने पर जो पहले माफ़ी मांगे, जरुरी नहीं उसी की गलती हो। हो सकता है वो रिश्ते को बनाये रखना ज्यादा महत्वपूर्ण समझता हो।

◇ दोस्तों के साथ खाते-पीते, पार्टी करते समय जो दोस्त बिल पे करता है, जरुरी नहीं उसकी जेब नोटों से ठसाठस भरी हो। हो सकता है उसके लिए दोस्ती के सामने पैसों की अहमियत कम हो।

■ जो लोग आपकी मदद करते हैं, जरुरी नहीं वो आपके एहसानों के बोझ तले दबे हों। वो आपकी मदद करते हैं क्योंकि उनके दिलों में दयालुता और करुणा का निवास है।

👉 नव निर्माण हेतु विभूतियों का आह्वान (भाग १)

यों सभी मनुष्य ईश्वर के पुत्र हैं, पर जिनमें विशेष विभूतियाँ चमकती हैं उन्हें ईश्वर के विशेष अंश की सम्पदा से सम्पन्न समझा जाना चाहिए। गीता के विभूति योग अध्याय में भगवान कृष्ण ने विशिष्ट विभूतियों में अपना विशेष अंश होने की बात उदाहरणों समेत बताई है। यों जीवनयापन तो अन्य प्राणियों की तरह मनुष्य भी करते हैं, पर जिनके पास विशेष शक्तियाँ, विभूतियाँ हैं, कुछ महत्त्वपूर्ण कार्य वे ही कर पाते हैं। इसलिए भावनात्मक नव निर्माण जैसे युगान्तरकारी अभियानों में उनका विशेष हाथ रहना आवश्यक है।

विभूतियों को सात भागों में विभक्त कर सकते हैं। (१) भावना (२) शिक्षा-साहित्य (३) कला (४) सत्ता (५) सम्पदा (६) भौतिकी (७) प्रतिभा। इन सातों के सदुपयोग से ही व्यक्ति और समाज का कल्याण होता है।

(१) भावना (धर्म एवं अध्यात्म)-व्यक्तित्व को उत्कृष्ट और गतिविधियों को आदर्श बनाने की अन्तःप्रेरणा को भावना कहा जाता है। धर्म धारणा और अध्यात्म साधना के समस्त कलेवर को इसी प्रयोजन के लिए खड़ा किया गया है। पिछले दिनों कुछ कर्मकाण्डों, परम्पराओं एवं विधानों को पूरा कर लेना भर धार्मिकता एवं आध्यात्मिकता समझी जाती रही है। वस्तुतः चरित्र गठन का नाम धर्म और अपनी क्षमताओं को लोक मंगल के लिए समर्पित करने की पृष्ठभूमि का नाम अध्यात्म है। भावनाओं के कल्पना लोक में नहीं उड़ते रहना चाहिए वरन् उन्हें अपने तथा समाज के समग्र निर्माण में संलग्न होना चाहिए। यही उनका वास्तविक प्रयोजन भी है।

धर्म की प्राचीनता और दार्शनिकता से प्रभावित लोगों को कहा जा रहा है कि अपने सम्प्रदाय की संख्या बढ़ाने, धर्म परिवर्तन के प्रति उत्साह में शक्तियों का अपव्यय न करें। हमारा सतत प्रयास है सब धर्मों के प्रति परस्पर सहिष्णुता, समन्वय की वृत्ति उत्पन्न करना। वे अपने स्वरूप को भले ही पृथक बनाये रहे, पर विश्वधर्म का एक घटक बनकर रहें और अपने प्रभाव को चरित्र गठन एवं परमार्थ प्रयोजन में ही नियोजित करें। प्रथा परम्पराओं वाले कलेवर को गौण समझें। सभी धर्म सम्प्रदाय अपनी परम्पराओं में से उत्कृष्टता का अंश अपनाकर विश्व एकता के, उत्कृष्ट मानवता और आदर्श समाज रचना के लक्ष्य को लेकर आगे बढ़े और एक ही केन्द्र पर केन्द्रित हो। धर्मों के जीवित रहने का, अपनी उपयोगिता बनाये रहने का मात्र यही तरीका है।

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 असम्भव में सम्भव

जीवन के हर पल में विषमताएँ विपन्नताएँ एवं द्वन्द्व हैं। ये इतनी अधिक हैं कि इनको मिटाना असम्भव जान पड़ता है। जीवन के हर तल में, यहाँ तक कि मनुष्य के कण-कण में महाभारत का महासमर छिड़ा हुआ है। प्रत्येक व्यक्ति नित नये कौरवी चालों और आघातों को झेलने एवं इनसे जूझने के लिए कुरुक्षेत्र में खड़ा है। महाभारत के ऐतिहासिक क्षण बीत चुके, ऐसा नहीं है। यह महासमर तो अभी भी जारी है। नये बच्चे के साथ पैदा हो रहा है।
  
गीता में कुरुक्षेत्र को धर्मक्षेत्र कहा है, क्योंकि यहाँ निर्णय होता है धर्म और अधर्म का, प्रकाश और अंधकार का, प्रेम एवं घृणा का। प्रत्येक व्यक्ति के भीतर निर्णायक घटना घटित होती है। इसीलिए तो भारी चिंता है, किसी को कहीं राहत नहीं है, आदमी बेचैन है। इस बेचैनी के बड़े कारण भी हैं, क्योंकि घृणा के पक्ष में, अंधकार और अधर्म के पक्ष में बड़ी फौज है। महाभारत में कृष्ण की नारायणी सेना कौरवों के ही साथ थी। केवल कृष्ण, वे भी पूरी तरह से निहत्थे पाण्डवों के साथ थे। यह बात बड़ी अर्थपूर्ण है। जिन्दगी के भी यही हाल हैं। संसार की सारी शक्तियाँ आज अधर्म एवं अँधेरे के पक्ष में हैं। संसार की शक्तियाँ यानि कि परमात्मा की सेना, कृष्ण की समूची नारायणी सेना। केवल कृष्ण भर अपने पक्ष में हैं, वे भी बिना किसी हथियार के । भरोसा नहीं होता कि जीत अपनी ही हो सकेगी। पूरी तरह से असम्भव लगता है कि निहत्थे परमात्मा के साथ विजय कैसे हो सकेगी।
  
कृष्ण अर्जुन के ही सारथी थे, ऐसा नहीं है। हमारी जिन्दगी के रथ पर भी जो सारथी बैठा है, वे कृष्ण ही हैं। प्रत्येक के भीतर परमात्मा ही रथ को सम्भाल रहे हैं। लेकिन सामने विरोध में दिखाई दे रही है, बड़ी सेनाएँ, घातक व्यूह रचनाएँ, चतुर चालों एवं षड्यंत्रों का बड़ा विराट् आयोजन। ऐसे असम्भव में घबराहट स्वाभाविक है। अर्जुन भी घबराया था। हमारे भी हाथ-पाँव थरथरा रहे हैं। सब तरह से, गणित के हर ढंग से, प्रत्येक तर्क से हार सुनिश्चित मालूम पड़ रही है और जीत असम्भव। लेकिन इस असम्भव में सम्भव घटित हो सकता है, यदि कृष्ण के ‘मामेकंशरण व्रज’ की स्वर लहरियों को सुना जा सके। जो कृष्ण को समर्पित हैं, जिनके जीवन के हर कर्म अपने हृदय में वास करने वाले परमात्मा को अर्पित हैं, जीवन में अंतिम विजय उन्हीं की होती है। उनके जीवन के प्रत्येक असम्भव में सम्भव साकार होते हैं।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १५२

👉 QUERIES ABOUT THE MANTRA (Part 8)

Q.8. What is a Beej Mantra? How is it applied?

Ans. All religions of the world make use of a part of their scriptures as a representative Beej Mantra. Thus Mohammedans have their Kalma the Christians Baptism, and the Jains Namonkar Mantra. The Gayatri Mantra is the Beej Mantra for the Hindus.

An abbreviation of a Ved Mantra is also known as its Beej Mantra. Literally the word ‘Beej’ Means ‘Seed’. In the seed are inherent all the characteristics of the tree. The DNA of a person is also akin to the seed of a plant, since it contains all genetic characteristics of a living organism. Beej Mantras, like the microchips in the computer, are small but extraordinarily effective for invocation of specific streams of divine powers for particular objectives. The application of Beej Mantras, however , belongs to Tantrik System and these can only be made use of under the guidance of an expert.

In Gayatri Mantra as a whole, there are Beej Mantras Bhur, Bhuwaha and Swaha, corresponding to each of its three segments. Besides, each of its 24 letters has a beej Mantra of its own. The Beej Mantra in Gayatri is applied after the ‘Vyahriti’ (Bhur  Bhuwaha Swaha) prefixing “Tatsaviturvarniyam...” It is also used as a suffix (samput) after “Prachodayat. (Ref. “Gayatri Ka Har Akshar Shakti Shrot”).

Q.9. How is rishi Vishwamitra related to Gayatri Mantra?   

Ans. Vishwamitra was the first rishi of this kalpa (the present cycle of creation) who could access all powers of Gayatri. In spiritual parlance,  he was the first master of  Gayatri Sadhana. Rishi Vishwamitra standardised the procedures of Gayatri Sadhana for the common man.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 42

👉 गायत्री और यज्ञ

भारत की प्रसुप्त अंतरात्मा को जगाने के लिए ज्ञान और विज्ञान की प्रतिष्ठापना करना सर्वप्रथम कार्य है। इन दोनों के बल पर ही कोई व्यक्ति या राष्ट्र उन्नति कर सकता है। जब इनमें से एक की भी कमी हो जाती है, तो अधःपतन आरंभ हो जाता है। ज्ञान का अर्थ है-विद्या बुद्धिमत्ता, विवेक दूरदर्शिता, सद्भावना, उदारता, न्याय प्रियता। विज्ञान का अर्थ है- योग्यता, साधन, शक्ति, सम्पन्नता, शीघ्र सफलता प्राप्त करने की सामर्थ्य आत्मिक और भौतिक दोनों ही क्षेत्रों में जब संतुलित उन्नति होती है, तभी उसे वास्तविक विकास माना जाता है। भारत प्राचीन काल में बुद्धिमान बनने के लिए ज्ञान की और बलवान बनने के लिए विज्ञान की उपासना करने में सदैव संलग्न रहता था। योगी लोग जहाँ भक्ति भावना द्वारा भगवान में संलग्न होते थे वहाँ कष्ट साध्य साधनाओं तथा तपश्चर्याओं द्वारा अपने में अनेक प्रकार की सामर्थ्य भी उत्पन्न करते थे। भावना से भगवान और साधना से शक्ति प्राप्त होती है, यह निर्विवाद है।
  
आज का ज्ञान प्रत्यक्ष दृश्यों, अनुभवों तथा विज्ञान मशीनों पर अवलंबित है। भौतिक जानकारी तथा शक्तियाँ प्राप्त करने के लिए भौतिक उपकरणों का ही आज के वैज्ञानिक प्रयोग कर रहे हैं यह तरीका बहुत खर्चीला, श्रमसाध्य, स्वल्पफलदायक एवं अचिर-अस्थायी है जो ज्ञान बड़े-बड़े विद्वानों, प्रोफेसरों, द्वारा उत्पन्न किया जा रहा है, वह भौतिक जानकारी तो काफी बढ़ा देता है, पर उससे अंतःकरण में आत्मिक महानता, उदार दृष्टि तथा लोकसेवा के लिए आत्म त्याग करने की भावना पैदा नहीं होती। आज का तथाकथित ज्ञान मनुष्य को अधिक स्वार्थी, खर्चीला एवं बनावट पसंद बनाता जा रहा है। दूसरी ओर जो वैज्ञानिक उन्नति हो रही है, उससे एक ओर जहाँ थोड़ा-सा लाभ होता है, दूसरी ओर उससे अधिक हानि हो जाती है।
  
प्राचीनकाल में ज्ञान और विज्ञान के आधार आज से भिन्न थे। आज जिस प्रकार हर वस्तुतः जड़ जगत् में से, भौतिक परमाणुओं में से खोजी जाती और उपलब्ध की जाती है, उसी प्रकार प्राचीन काल में प्रत्येक बात, प्रत्येक वस्तु, प्रत्येक शक्ति आत्मिक जगत् में से ढूँढ़ी जाती थी। आज का आधार भौतिकता है, प्राचीनकाल का आधार आध्यात्मिकता था।
  
ज्ञान और विज्ञान की हमारी प्राचीन शोध गायत्री और यज्ञ के आधार पर होती थी, क्योंकि यही दोनों अध्यात्म विद्या के माता-पिता हैं। गायत्री ज्ञान रुपिणी है, यज्ञ विज्ञान प्रतीक है। गायत्री मंत्र के ख्ब् अक्षरों में मनुष्य जाति का ठीक प्रकार प्रदर्शन करने वाली शिक्षाएँ भरी हुई हैं। इसके अतिरिक्त इन अक्षरों का गुंथन रहस्यमय विद्या के रहस्यमय आधार पर भी है। इन अक्षरों के नियमित उपासना से अलौकिक शक्तियाँ एवं आध्यात्मिक गुणों की तेजी से अभिवृद्धि होती है, बुद्धि तीव्र होती है, जिसके आधार पर जीवन की समस्या की अनेक गुत्थियों को सरल किया जा सकता है।
  
यज्ञ का विज्ञान अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण है। वेदमंत्रों की शब्द शक्ति को विशिष्ट कुण्डों, समिधाओं, हवियों चरुओं के साथ उत्पन्न की हुई विशेष सामर्थ्यवान अग्नि में सम्मिश्रित कर देने पर रेडियो सक्रिय शक्ति तरंगों का आविर्भाव होता है। यह शक्ति तरंगें रैडार यंत्र की तरह संसार के किसी भी भाग में भेजी जा सकती है, किसी व्यक्ति विशेष प्रयोजन के शरीर में भरी जा सकती है, प्रकृति के गुह्य गह्वर में किसी विशेष प्रयोजन के लिए प्रविष्ट कराई जा सकती है।
  
सांस्कृतिक पुनरुत्थान ज्ञान और विज्ञान के बिना असंभव है। भारतीय संस्कृति का बीज मंत्र गायत्री है। उसकी शिक्षाओं तथा शक्तियों के आधार पर हमारा सारा ढाँचा खड़ा हुआ है। भौतिक माता-पिता हमें शरीर संपत्ति, शिक्षा सुविधा, आश्रय, सहयोग, स्नेह आदि बहुत कुछ देते हैं। गायत्री माता और यज्ञ पिता की यदि हम प्रतिष्ठा और उपासना करें, तो इसके द्वारा हम और भी उत्तम एवं महत्त्वपूर्ण वस्तुएँ प्राप्त कर सकते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

गुरुवार, 2 जनवरी 2020

👉 जिसे आप नही पचा सकते हो उसे भला कोई और कैसे पचा पायेगा .....?

राजा अक्षय का राज्य बहुत सुन्दर, समृध्द और शांत था।  राजा महावीर और एक पराक्रमी योद्धा थे ! परन्तु सुरक्षा को लेकर अक्षय कुछ तनाव में रहते थे क्योंकि सूर्यास्त के बाद शत्रु अक्सर उनके राज्य पर घात लगाकर आक्रमण करते रहते थे परन्तु कभी किसी शत्रु को कोई विशेष सफलता न मिली क्योंकि उनका राज्य एक किले पर स्थित था और पहाडी की चढ़ाई नामुंकिन थी और कोई भी शत्रु दिन में विजय प्राप्त नही कर सकता था !

राज्य में प्रवेश के लिये केवल एक दरवाजा था और दरवाजे को बँद कर दे तो शत्रु लाख कोशिश के बावजूद भी अक्षय के राज्य का कुछ नही बिगाड़ सकते थे !
मंत्री राजकमल हमेशा उस दरवाजे को स्वयं बँद करते थे !

एकबार मंत्री और राजा रात के समय कुछ विशेष मंत्रणा कर रहे थे तभी शत्रुओं ने उन्हे बन्दी बनाकर कालकोठरी में डाल दिया !

कालकोठरी में राजा और मंत्री बातचीत कर रहे थे ......

अक्षय - क्या आपने अभेद्य दरवाजे को ठीक से बन्द नही किया था मंत्री जी ?

राजकमल - नही राजन मैंने स्वयं उस दरवाजे को बन्द किया था !

वार्तालाप चल ही रही थी की वहाँ शत्रु चंद्रेश अपनी रानी व उसके भाई के साथ वहाँ पहुँचा जब अक्षय ने उन्हे  देखा तो अक्षय के होश उड़ गये! और राजा अक्षय अपने गुरुदेव से मन ही मन क्षमा प्रार्थना करने लगे ! फिर शत्रु व उसकी रानी वहाँ से चले गये !

राजकमल - क्या हुआ राजन? किन विचारों में खो गये ?

अक्षय - ये मैं तुम्हे बाद में बताऊँगा पहले यहाँ से बाहर जाने की तैयारी करो !

राजकमल - पर इस अंधेर कालकोठरी से बाहर निकलना लगभग असम्भव है राजन !

अक्षय - आप उसकी चिन्ता न कीजिये कल सूर्योदय तक हम यहाँ से चले जायेंगे ! क्योंकि गुरुदेव ने भविष्य को ध्यान में रखते हुये कुछ विशेष तैयारियाँ करवाई थी !

कालकोठरी से एक गुप्त सुरंग थी जो सीधी राज्य के बाहर निकलती थी जिसकी पुरी जानकारी राजा के सिवा किसी को न थी और उनके गुरुदेव ने कुछ गहरी राजमय सुरंगों का निर्माण करवाया था और राजा को सख्त आदेश दिया था की इन सुरंगों का राज किसी को न देना, राजा रातोंरात वहाँ से निकलकर मित्र राष्ट्र में पहुँचे सैना बनाकर पुनः आक्रमण किया और पुनः अपने राज्य को पाने में सफल रहे।

परन्तु इस युध्द में उनकी प्रिय रानी, उनका पुत्र और आधी से ज्यादा जनता समाप्त हो चुकी थी! जहाँ चहुओर वैभव और समृद्धता थी राज्य शान्त था खुशहाली थी आज चारों तरफ सन्नाटा पसरा था मानो सबकुछ समाप्त हो चुका था!

राजकमल - हॆ राजन मॆरी अब भी ये समझ में नही आया की वो अभेद्य दरवाजा खुला कैसे? शत्रु ने प्रवेश कैसे कर लिया? जब की हमारा हर एक सैनिक पुरी तरह से वफादार है आखिर गलती किसने की ?

अक्षय - वो गलती मुझसे हुई थी मंत्रीजी! और इस तबाही के लिये मैं स्वयं को जिम्मेदार मानता हूँ यदि मैंने गुरू आदेश का उल्लंघन न किया होता तो आज ये तबाही न आती मॆरी एक गलती ने सबकुछ समाप्त कर दिया ..!

राजकमल - कैसी गलती राजन?

अक्षय - शत्रु की रानी का भाई जयपाल कभी मेरा बहुत गहरा मित्र हुआ करता था और उसके पिता अपनी पुत्री का विवाह मुझसे करना चाहते थे पर विधि को कुछ और स्वीकार था और फिर एक छोटे से जमीनी विवाद की वजह से वो मुझे अपना शत्रु मानने लगा! और इस राज्य में प्रवेश का एक और दरवाजा है जो गुरुदेव और मेरे सिवा कोई न जानता था और गुरुदेव ने मुझसे कहा था की शत्रु कब मित्र बन जाये और मित्र कब शत्रु, कोई नही जानता है इसलिये जिन्दगी में एक बात हमेशा याद रखना की जो राज तुम्हे बर्बाद कर सकता है उस राज को राज ही रहने देना कोई कितना भी घनिष्ठ क्यों न हो उसे भी वो राज कभी मत बताना जिसकी वजह से तुम्हारा पतन हो सकता है!

और बस यही पर मैंने वो गलती कर दी और वो राज उस मित्र को जा बताया जो शत्रु की रानी का भाई था! जो कभी मित्र था राजदार था वही आगे जाकर शत्रु हो गया इसीलिये आज ये हालात हो गये!

राजा राज्य को चारों तरफ से सुरक्षित करके मंत्री को सोप दिया और स्वयं वन को चले गये !

ऐसा कोई भी राज जो गोपनीय रखा जाना बहुत आवश्यक हो जिस राज के बेपर्दा होने पर किसी प्रकार का अमंगल हो सकता है सम्भवतः उसे घनिष्ठ से घनिष्ठ व्यक्ति को भी मत बताना क्योंकि काल के गर्भ में क्या छिपा कौन जाने? जिसे आप स्वयं राज नही रख सकते हो उसकी उम्मीद किसी और से क्यों करते हो की वो उस राज को राज बनाये रखेगा .......

आज का दिन आपके लिए शुभ एवं मंगलमय हो।

👉 अन्तराल के परिशोधन की प्रायश्चित प्रक्रिया (अन्तिम भाग)

आज की दुःखद परिस्थितियों के लिए भूतकाल की भूलों पर दृष्टिपात किया जा सकता है। इसी प्रकार सुखी समुन्नत होने के सम्बन्ध में भी पिछले प्रयासों को श्रेय दिया जा सकता है। इस पर्यवेक्षण का सीधा निष्कर्ष यही निकलता है कि अशुभ विगत को धैर्यपूर्वक सहन करें या फिर उसका प्रायश्चित करके परिशोधन की बात सोचें। शुभ पूर्वकृत्यों पर सन्तोष अनुभव करें और उस सत्प्रवृत्ति को आगे बढ़ाये। यह नीति निर्धारण की बात हुई। अब देखना यह है कि आधि-व्याधियों के रूप में अशुभ कर्मों की काली छाया सिर पर घिर गई है तो उसके निवारण का कोई उपाय है क्या?

जो कर्मफल पर विश्वास न करते हों, उन्हें भी मानवी अन्तःकरण की संरचना पर ध्यान देना चाहिए और समझना चाहिए कि वहाँ किसी के साथ कोई पक्षपात नहीं। पूजा प्रार्थना से भी दुष्कर्मों का प्रतिफल टलने वाला नहीं है। देव-दर्शन, तीर्थ-स्नान आदि से इतना ही हो सकता है कि भावनायें बदलें, भविष्य के दुष्कृत्यों की रोकथाम बन पड़े। अधिक बिगड़ने वाले भविष्य की सम्भावना रुके। पर जो किया जा चुका, उसका प्रतिफल सामने आना ही है। उसके उपचार के लिए शास्त्रीय परम्परा और मनःसंस्थान की संरचना को देखते हुए इसी निष्कर्ष पर पहुँचना होता है कि खोदी हुई खाई को पाटा जाय। प्रायश्चित के लिए भी वैसा ही साहस जुटाया जाय, जैसा कि दुष्कर्म करते समय मर्यादा उल्लंघन के लिए अपनाया गया था। यही एकमात्र उपचार हैं, जिससे दुष्कर्मों की उन दुःखद प्रक्रियाओं का समाधान हो सकता है, जो शारीरिक रोगों, मानसिक विक्षोभों, विग्रहों, विपत्तियों, प्रतिकूलताओं के रूप में सामने उपस्थित हो कर जीवन को दूभर बनाये दे रही हैं। यह विषाक्तता लदी ही रही, तो भविष्य के अन्धकारमय होने की भी आशंका है। अस्तु प्रायश्चित प्रक्रिया को अपनाकर वर्तमान भविष्य को और सुखद बनाना ही दूरदर्शिता है।

.....समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 सम्भावनाओं की सुबह, संघर्षों के दिन

इक्कीसवीं सदी के इस नववर्ष ने देश और धरती को सम्भावनाओं की सुबह का अनूठा उपहार दिया है। इस नये वर्ष 2020 में सम्भावनाएँ हैं, भविष्य के नये उजाले की, नयी मुस्कराहटों की, नयी समृद्धि एवं खुशहाली की। लेकिन इन सम्भावनाओं को साकार करने में संघर्ष भी कम नहीं है। सुबह यदि सम्भावनाओं की है तो दिन संघर्षों का है। हाँ यह सच है कि नववर्ष की हर नयी सुबह-सम्भावनाओं के नये संदेश लायेगी, पर इन्हें साकार वही कर पायेंगे जो नये साल के हर दिन को अपने संघर्षों की चुनौती समझेंगे। यह सच व्यक्ति के जीवन का है तो परिवार के जीवन का भी। समाज, राष्ट्र और विश्व भी इससे अलग नहीं है।
  
नववर्ष के पटल पर उभर रहे दृश्यों की गहरी पड़ताल करें तो एक ही सच सब के लिए है कि प्रकृति एवं प्रवृत्ति में बढ़ रहे अंधाधुंध प्रदूषण को रोकना है। क्योंकि इसी ने उज्ज्वल भविष्य की सभी सम्भावनाओं को रोक रखा है। प्रकृति में असंतुलित प्रदूषण ने ही भूकम्प, बाढ़ जैसी विनाशकारी आपदाओं के भयावह दृश्य खड़े किये हैं। दिल-दहला देने वाली इन महा-आपदाओं से उपजी करुण-कराह की अनसुनी भला कौन कर सकता है? ठीक यही, बल्कि इससे भी कहीं ज्यादा तबाही इंसानी प्रवृत्तियों में आये प्रदूषण ने की है।
  
इंसान की अपनी ही प्रदूषित प्रवृत्तियाँ हैं जो रोज नये बम धमाके करती हैं। सामूहिक हत्या एवं खौफनाक संहार के विद्रूप आयोजन करती हैं। इंसानियत का संघर्ष इन्हीं से है। संवेदनशीलों को अपने अंदर बलिदानी साहस पैदा करना है। प्रकृति एवं प्रवृत्ति के इस विनाशकारी ताण्डव नर्तन को आज और अभी से रोकना है। अब यह न पूछें कि शुरुआत कहाँ से करनी है?
  
क्योंकि इसके जवाब में सारी ऊँगलियाँ हमारी अपनी ओर ही उठ रही हैं। व्यक्ति के रूप में हमें ही व्यक्तिगत शुरुआत करनी है। समाज के जिम्मेदार घटक के रूप में हमें ही इसके सामूहिक आयोजन करने हैं। यह जिम्मेदारी राष्ट्रीय भी है और विश्व भर की भी। स्वस्थ प्रकृति एवं स्वच्छ प्रवृत्ति को अपना ध्येय वाक्य माने बिना उज्ज्वल भविष्य की सम्भावनाएँ साकार नहीं होंगी। लेकिन इसे कर वही पायेंगे जो अपनी हर सुबह को सम्भावनाओं की सुबह और हर दिन को संघर्षों का दिन बना लेंगे।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १५०

👉 गायत्री का अवलम्बन परम श्रेयस्कर

गायत्री उपासना से मानव शरीर में सन्निहित अगणित संस्थानों में से कितने ही जाग्रत एवं प्रखर हो चलते हैं। इस जागृति का प्रभाव मनुष्य के व्यक्तित्व को समान रूप से विकसित होने में सहायक सिद्ध होता है।
  
व्यायाम से शरीर पुष्ट होता है, अध्ययन से विद्या आती है, श्रम करने से धन कमाया जाता है, सत्कर्मों से यश मिलता है। सद्गुणों से मित्र बढ़ते हैं। इसी प्रकार उपासना द्वारा अंतरंग जीवन में प्रसुप्त पड़ी हुई अत्यंत ही महत्त्वपूर्ण शक्तियाँ सजग हो उठती हैं और उस जागृति का प्रकाश मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में एक विशिष्टता का रूप धारण करके प्रकट करता हुआ प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होता है। गायत्री उपासक में तेजस्विता की अभिवृद्धि स्वाभाविक है। तेजस्वी एवं मनस्वी व्यक्ति स्वभावतः हर दिशा में सहज सफलता प्राप्त करता चलता है।
  
मानवीय मस्तिष्क में जो शक्ति केन्द्र भरे पड़े हैं, उनका पूरी तरह उपयोग कर सकना तो दूर, अभी मनुष्य को उनका परिचय भी पूरी तरह नहीं मिला है। मनोवैज्ञानिकों को अंतर्मन की जितनी जानकारी अभी तक विशाल अनुसंधानों के बाद मिल सकी है, उसे वे दो प्रतिशत जानकारी मानते हैं। इसी प्रकार शरीर शास्त्री डॉक्टरों ने बाहरी मस्तिष्क का केवल आठ प्रतिशत ज्ञान प्राप्त किया है शेष के बारे में वे अभी भी अनजान हैं। मस्तिष्क सचमुच एक जादू का पिटारा है। इसमें सोचने समझने की क्षमता तो है ही, साथ ही उसमें ऐसे चुम्बक तत्त्व भी हैं, जो अनंत आकाश में भ्रमण करने वाली अद्भुत सिद्धियों, विभूतियों एवं सफलताओं को अपनी ओर खींचकर आकर्षित कर सकते हैं, सूक्ष्म जगत् में अपने अनुकूल वातावरण बना सकते हैं। मनोबल बढ़ने से ऐसी विद्युत धारा अंतर्मन के प्रसुप्त क्षेत्रों में गतिशील हो जाती है कि अब तक अपने प्रयोजन में आया हुआ मस्तिष्कीय चुम्बक सक्रिय हो उठता है और वे उपलब्धियाँ सामने लाकर खड़ी कर देता है, जिन्हें आमतौर से सिद्धियाँ, विभूतियों का वरदान एवं दैवीय सहायता कहा जा सके।
  
उपासना में बरती गई तपश्चर्या से द्रवित होकर गायत्री माता ने अमुक सिद्धि या सफलता प्रदान की। यह भावुक भक्त का दृष्टिकोण है। इसी तथ्य का वैज्ञानिक दृष्टिकोण यह है कि कठोर नियम, प्रतिबंधों का पालन करने में जो प्रतिरोधात्मक क्षमता बढ़ी, उसने मनोबल का विकास किया। उसने अंतर्मन के प्रसुप्त शक्ति केन्द्रों का चुम्बकत्व जगाया और उसी जागरण ने अभीष्ट सफलताएँ खींचकर सामने ला खड़ी कर दीं। मनुष्य अपने आप में एक देवता है। उसके भीतर वे समस्त दैवी शक्तियाँ बीज रूप में विद्यमान रहती हैं, जो इस विश्व में अन्यत्र कहीं भी हो सकती हैं। अन्यत्र रहने वाले देवता अपनी निर्धारित जिम्मेदारियाँ पूरी करने में लगे रहते हैं। वे हमारे व्यक्तिगत कामों में इतनी अधिक दिलचस्पी नहीं ले सकते कि अगणित उपासकों या भक्तों की अगणित प्रकार की समस्याओं के सुलझाने में सहयोगी हो सकें। हमारी समस्याओं को हल करने की क्षमता हमारे अपने भीतर रहने वाले देवता में ही होती है और उसी को किसी अनुष्ठान द्वारा सशक्त एवं गतिशील बना करके साधक को अपना प्रयोजन वस्तुतः आप ही पूरा करना पड़ता है।
  
गायत्री उपासना मनुष्य जीवन को बहिरंग एवं अंतरंग दोनों ही दृष्टियों से समृद्ध और समुन्नत बनाने का राजमार्ग है। बाह्य उपचार से बाह्य जीवन की प्रगति होती है, पर अंतरंग विकास के बिना उसमें पूर्णता नहीं आ पाती। बाहरी जीवन की विशेषताएँ छोटा सा शोक, संताप, रोग, कष्ट अवरोध एवं दुर्दिन सामने आते ही अस्त-व्यस्त हो जाती है, पर जिस व्यक्ति के पास आंतरिक दृढ़ता, समृद्धि एवं क्षमता है, वह बाहर के जीवन में बड़े से बड़ा अवरोध आने पर भी सुस्थिर बना रहता है और भयानक भँवरों को चीरता हुआ अपनी नाव पार ले जाता है। भौतिक समृद्धि और आत्मिक शांति के लिए उपासना की वैज्ञानिक प्रक्रिया अचूक साधना है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 April 2026

Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें। ➨ YouTube:  https://yugrishi-erp....