मानवता का ही दूसरा नाम-भारतीय धर्म, भारतीय सभ्यता, भारतीय संस्कृति है। हमारे पूर्वज मनुष्यता के उपासक रहे हैं। उन्होंने साध्य की प्राप्ति के लिए साधन की पवित्रता की कभी भी उपेक्षा नहीं की है। वरन् इस बात पर जोर दिया है कि हमारी आवश्यकताएँ तथा इच्छाएँ भले ही अपूर्ण रह जावें, परन्तु उनकी प्राप्ति का मार्ग न्यायोचित एवं धर्मानुकूल ही होना चाहिए। अधर्म एवं अन्याय से प्राप्त होने वाले सुख एवं वैभव की यहाँ सदा निन्दा ही की जाती रही ह्रै।
झूठ किसी भी तरह, किसी भी बहाने से, किसी भी कारण क्यों न बोला जाय, आखिर वह झूठ ही है और उससे व्यक्ति तथा समाज का जीवन प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। झूठ के दुष्परिणाम व्यक्ति और समाज दोनों को ही भुगतने पड़ते हैं। जिस समाज में झूठ का बोलबाला जितना अधिक होगा, वह उतना ही पतित और अविकसित होता जाएगा।
स्वाध्यायशील व्यक्ति अपनी आत्मा का सफल चिकित्सक होता है। स्वाध्याय से उपार्जित ज्ञान द्वारा वह अपनी आत्मिक व्याधियों को जान लेता है और उनका निदान निर्धारित कर लेता है। निदान खोज लेने पर व्याधियों का उपचार तो सहज ही में हो जाता है। मानसिक एकाग्रता की उपलब्धि उसे इस मार्ग में सहायक बनकर बढ़ाया करती है, जिससे उसका जीवन उच्छृंखलताओं एवं अवांछनीयताओं से मुक्त होकर महान् एवं सुखी बन जाता ह्रै।
झूठ किसी भी तरह, किसी भी बहाने से, किसी भी कारण क्यों न बोला जाय, आखिर वह झूठ ही है और उससे व्यक्ति तथा समाज का जीवन प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। झूठ के दुष्परिणाम व्यक्ति और समाज दोनों को ही भुगतने पड़ते हैं। जिस समाज में झूठ का बोलबाला जितना अधिक होगा, वह उतना ही पतित और अविकसित होता जाएगा।
स्वाध्यायशील व्यक्ति अपनी आत्मा का सफल चिकित्सक होता है। स्वाध्याय से उपार्जित ज्ञान द्वारा वह अपनी आत्मिक व्याधियों को जान लेता है और उनका निदान निर्धारित कर लेता है। निदान खोज लेने पर व्याधियों का उपचार तो सहज ही में हो जाता है। मानसिक एकाग्रता की उपलब्धि उसे इस मार्ग में सहायक बनकर बढ़ाया करती है, जिससे उसका जीवन उच्छृंखलताओं एवं अवांछनीयताओं से मुक्त होकर महान् एवं सुखी बन जाता ह्रै।
















































