गुरुवार, 21 फ़रवरी 2019

👉 सिंह शावक गीदडों के बीच

एक गीदड़ ने सिंह के बच्चे को नवजात अवस्था में कहीं पड़ा देखा, उठाया और उसे अपने बच्चों के साथ पालने लगा। सिंह शावक गीदड़ों के बच्चों के साथ पलते- पलते उस परिकर में विकसित होते कभी स्वयं को नहीं पहचान पाया। एक बार यह परिवार शिकार को गया। मरे हाथी पर जैसे ही खाने के लिए टूटे वैसे ही स्वयं वनराज सिंह वहाँ पधार गये। उन्हें देखते ही गीदड़ परिवार कूच कर गया पर सिंह की पकड़ में सिंह शावक आ गया। सिंह ने उससे पूछ- "वह कैसे उनके साथ था और भयभीत क्यों होता है?"

शावक समझ ही नहीं पा रहा था कि यह सब क्या है? उसे भय से काँपते देख वनराज सब समझ गये। उन्होनें उसे पानी में अपनी परछाई दिखाई वे भी स्वयं अपना चेहरा। स्वयं दहाड़े और उसे भी स्वयं दहाड़ने को कहा। तब उसे अपने विस्मृत आत्म- स्वरूप का भान हुआ और वह सिंह बिरादरी में शामिल हो उमुक्त- भयमुक्त विचरण करने लगा।

ऐसे लोगों की संख्या अधिक होती है जो अपना स्वरूप भूलकर दिवास्वप्न अधिक देखते हैं।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग १


ज्ञान के आभाव की आवश्यकता पूरी की जाए।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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https://youtu.be/zEdJw7vEYXM

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