गुरुवार, 21 फ़रवरी 2019

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1) श्लोक 16 से 17

जिज्ञासां नारदस्याथ ज्ञात्वा संमुमुदे हरि:।
उवाच च महर्षे त्वमात्थ यन्मे मनीषितम्  ॥१६॥
युगानुरूपं सामर्थ्य पश्यन्नन्न प्रसङ्गके ।
निर्धारणस्य चर्चाया व्यापकत्वं समीप्सितम् ॥१७॥

टीका- नारद की जिज्ञासा जानकर भगवान् बहुत प्रसन्न हुए और बोले-''देवर्षि आप तो हमारे मन की बात कह रहे हूँ । समय की आवश्यकता को देखते हुए इस प्रसंग पर चर्चा होना और निर्धारण को व्यापक किया जाना आवश्यक भी है ॥१६-१७॥"

व्याख्या- जो जिज्ञासा भक्त के मन में धुमड़ रही थी वही भगवान् के भी अंतःकरण में विद्यमान थी, भक्त हमेशा भगवान् की आकांक्षा के अनुरूप ही विचारते हैं एवं अपनी गतिविधियों का खाका बनाते हैं । सच्चे भक्त की कसौटी पर देवर्षि खरे उतरते हैं, जभी वे जन-सामान्य की समस्या को लेकर प्रभु से मार्गदर्शन माँगते हैं ।

ऋषिवर नारद से श्रेष्ठ और हो ही कौन सकता था जो सामयिक आवश्यकतानुसार अपने प्रभु के मन की इच्छा जानें व उनकी प्रेरणाओं-समस्याओं के समाधानों को जन-जन के गले उतार सकें।
 
.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 9

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पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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https://youtu.be/ys6_JpyYi8Y

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