बुधवार, 8 मई 2019

👉 विश्वास की दौलत

सऊदी अरब में बुखारी नामक एक विद्वान रहते थे। वह अपनी ईमानदारी के लिए मशहूर थे। एक बार वह समुद्री जहाज से लंबी यात्रा पर निकले। उन्होंने सफर के खर्च के लिए एक हजार दीनार अपनी पोटली में बांध कर रख लिए। यात्रा के दौरान बुखारी की पहचान दूसरे यात्रियों से हुई। बुखारी उन्हें ज्ञान की बातें बताते।

एक यात्री से उनकी नजदीकियां कुछ ज्यादा बढ़ गईं। एक दिन बातों-बातों में बुखारी ने उसे दीनार की पोटली दिखा दी। उस यात्री को लालच आ गया। उसने उनकी पोटली हथियाने की योजना बनाई। एक सुबह उसने जोर-जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया, ‘हाय मैं मार गया। मेरा एक हजार दीनार चोरी हो गया।’ वह रोने लगा। जहाज के कर्मचारियों ने कहा, ‘तुम घबराते क्यों हो। जिसने चोरी की होगी, वह यहीं होगा। हम एक-एक की तलाशी लेते हैं। वह पकड़ा जाएगा।’

यात्रियों की तलाशी शुरू हुई। जब बुखारी की बारी आई तो जहाज के कर्मचारियों और यात्रियों ने उनसे कहा, ‘अरे साहब, आपकी क्या तलाशी ली जाए। आप पर तो शक करना ही गुनाह है।’ यह सुन कर बुखारी बोले, ‘नहीं, जिसके दीनार चोरी हुए है उसके दिल में शक बना रहेगा। इसलिए मेरी भी तलाशी भी जाए।’ बुखारी की तलाशी ली गई। उनके पास से कुछ नहीं मिला।

दो दिनों के बाद उसी यात्री ने उदास मन से बुखारी से पूछा, ‘आपके पास तो एक हजार दीनार थे, वे कहां गए?’ बुखारी ने मुस्करा कर कहा, ‘उन्हें मैंने समुद्र में फेंक दिया। तुम जानना चाहते हो क्यों? क्योंकि मैंने जीवन में दो ही दौलत कमाई थीं- एक ईमानदारी और दूसरा लोगों का विश्वास। अगर मेरे पास से दीनार बरामद होते और मैं लोगों से कहता कि ये मेरे हैं तो लोग यकीन भी कर लेते लेकिन फिर भी मेरी ईमानदारी और सच्चाई पर लोगों का शक बना रहता। मैं दौलत तो गंवा सकता हूं लेकिन ईमानदारी और सच्चाई को खोना नहीं चाहता।

👉 बोझ

एक महात्मा ने पूछा कि सबसे ज्यादा बोझ कौन सा जीव उठा कर घुमता है ?........
किसी ने कहा गधा तो किसी ने बैल तो किसी ने ऊंट अलग अलग प्राणीयो के नाम बताए।
लेकिन महात्मा किसी के भी जवाब से संतुष्ट नहीं हुए।

महात्मा ने हंसकर कहा - गधे, बैल और ऊट के ऊपर हम एक मंजिल तक बोझ रखकर उतार देते हैं लेकिन, इंसान अपने मन के ऊपर मरते दम तक विचारों का बोझ लेकर घूमता है किसी ने बुरा किया है उसे न भूलने का बोझ, आने वाले कल का बोझ, अपने किये पापों का बोझ इस तरह कई प्रकार के बोझ लेकर इंसान जीता है।

जिस दिन इस बोझ को इंसान उतार देगा तब सही मायने मे जीवन जीना सीख जाएगा।

👉 आज का सद्चिंतन 8 May 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 8 May 2019


👉 The Absolute Law Of Karma (Part 14)

SUFERINGS RESULTING FROM NATURAL CALAMITIES (Bhautik Dukhas):

Of late, science has begun to appreciate the impact of lop-sided human activities on pervasive global life-sustaining elements of nature. Indiscriminate use of chloroflouro carbons by some developing countries is damaging the global atmosphere for entire humankind by producing the greenhouse effect. Reckless deforestation in certain parts of the world is creating worldwide ecological imbalances. Such examples illustrate that basic elements of nature are globally interdependent and local changes in them have universal implications. The following observations bring out this eternal truth.

“Pran”- the universal life force, is one of the vital elements of nature, which is an integral constituent of all animate beings. The entire human race is inter-connected with this allpervasive element. Each spark of life in the individual animate being, which is known as “Atma” in spiritual parlance, is part of the omnipresence of THAT universal life force. The science of spirituality maintains that karmas and samskars of all living beings are mutually interactive. In social milieu these reactions are quite prominent. A criminal brings shame to his parents and family as well.

The latter too suffer disgrace since disregarding their responsibilities by not performing the right karmas; they did not exert enough influence to make the person a good citizen. The responsibility for spiritual development of the child (a virtuous karma) lies with the parents and other adults of the family. Hence, though in the material world only the offender receives the punishment from the law enforcers and the society, the souls of the parents and other family
members too have to suffer partially for this dereliction of duty, which the divine jurisprudence considers as a sin. When the neighbor's house is on fire, you cannot remain a silent spectator, since soon you may also become a victim. If in spite of being capable of preventing, one looks on at acts of theft, burglary, rape, murder etc. indifferently, the society would look down upon such a person contemptuously and the law would also not spare him. The laws of divine justice too follow a similar norm.

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✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 25

👉 आत्मचिंतन के क्षण 8 May 2019

★ ये है तलवार कुछ भी काट दे इतनी है धार, शत्रु का विनाश करने में सक्षम, दूसरी ओर है ये ढाल किसी भी प्रहार को सहपाने में सक्षम, शत्रु से रक्षा की ढाल, रक्षा की दीवार है। इन दोनों के कार्य भिन्न हैं, इन दोनों का उद्देश्य भिन्न है, लेकिन इन दोनों के मूल एक ही हैं। दोनों बने हैं लोहे से। लोहे के खण्ड से बनी है ये तलवार, लोहे के खण्ड से बनी है ये ढाल। तलवार का मंतव्य है प्रहार, और ढाल का मंतव्य है बचाव। अन्तर किसका है? अन्तर है केवल सोच का। ये सोच ही है जो सच बनकर सामने आती है, संसाधन कभी भी व्यक्ति को सुखी नहीं करते, किन्तु सोच व्यक्ति का व्यक्तित्व बनाती है। या तो आप इन संसाधनों का प्रयोग नाश करने के लिये करो, या इन संसाधनों का प्रयोग उद्धार करने के करो। चयन आपका है।

◆ इस वृक्ष को देख रहे हैं आप कितना अडिग, दिनभर धूप में खड़ा रहता है, धूप में बैठने वाले को छाया देने के लिए। अब जैसे-जैसे समय बीतता है वैसे-वैसे इस वृक्ष की टहनियों पर पत्तों के साथ-साथ फूल खिलने लगते हैं। ये फूल बाद में फल बन जाते हैं। अब समय के साथ-साथ जब ऋतु बदलता है, तो ये फल तोड़े जाते हैं। कुछ फल गिर जाते हैं। पतझर आने पर इस पेड़ के पत्ते तक इसका साथ छोड़ देते हैं। किन्तु ये वृक्ष अडिग रहता है। नये फलों के आने का इंतजार करता रहता है। न फलों के आने का उत्सव मनाता है, न पतझड़ के आने का शोक और हम इस वृक्ष की पूजा करते हैं। क्योंकि ये वृक्ष अपने स्थान पर अडिग रहता है। इसी प्रकार सुख और दुःख हमारे जीवन का अभिन्न अंग हैं। सुख और दुःख हमेशा रहेंगे, इसलिये न कभी सुख के आने पर अभिमान से भर जाएँ, न कभी दुःख के आने पर शोक मनाएँ। क्योंकि सुख और दुःख जीवनरूपी वृक्ष के फल हैं, ये आते रहेंगे-जाते रहेंगे लेकिन सुख और दुःख में व्यक्ति अडिग होगा, वही पूजनीय होगा।

◇ हीरा। हमारे लिए अत्यंत प्रिय, अत्यंत चमकदार, हीरे की चमक तो सभी जानते हैं। किन्तु ये चमक आती कैसे है? किसी दूसरे हीरे से इस हीरे को तराशा गया है। तब जाके ये संभव हो पाया है। कितनी अच्छी बात है। स्वयं से स्वयं को तराशो और स्वयं को ही और बेहतर बना दो। अब सोचिये क्या कीचड़ से कीचड़ को साफ किया जा सकता है? नहीं। उसके लिये आपको आवश्यकता होगी शुद्ध-निर्मल जल की। इसी प्रकार अच्छाई से अच्छाई को, और भी सुन्दर बनाया जा सकता है, किन्तु बुराई से बुराई को सुधारा नहीं जा सकता। सर्वप्रथम अपने मन को पावन करें, अपने मन को शुद्ध करें और फिर देखें इस दृष्टि से संसार को। ये संसार अपने आप शुद्ध लगने लगेगा। यदि किसी में आप विकार देखो तो शुभ कर्म करके उसका विकार दूर करो, उसकी सहायता करो। ना कि उसके विकार देख के स्वयं के मन में विकार लाओ। क्योंकि आप हीरे हो, किसी और हीरे को तराशने में उसकी सहायता करो। अच्छा लगेगा।

सोमवार, 6 मई 2019

👉 आत्मचिंतन के क्षण 6 May 2019

★ धर्म ग्रन्थों में मामूली से कर्म काण्ड के फल बहुत ही बढ़ा-चढ़ा कर लिखे गये हैं। जैसे गंगा स्नान से सात जन्मों के पाप नष्ट होना, व्रत उपवास रखने से स्वर्ग मिलना, गौदान से वैतरणी तर जाना, मूर्ति पूजा से मुक्ति प्राप्त होना, यह सब बातें तत्व ज्ञान की दृष्टि से असत्य हैं क्योंकि इन कर्मकाण्डों से मन में पवित्रता का संचार होना और बुद्धि का धर्म की ओर झुकना तो समझ में आता है, पर यह समझ में नहीं आता कि इतनी सी मामूली क्रियाओं का इतना बड़ा फल कैसे हो सकता है? यदि होता तो योग यज्ञ और तप जैसे महान साधनों की क्या आवश्यकता रहती? टके सेर मुक्ति का बाजार गर्म रहता।

◆ भिक्षा अनैतिक है। भिक्षा व्यवसायी की मनोभूमि दिन-दिन पतित होती जाती है। उसका शौर्य, साहस, पौरुष, गौरव सब कुछ नष्ट हो जाता है और दीनता मस्तिष्क पर बुरी तरह छाई रहती है। अपराधी की तरह उसका सिर नीचा रहता है। अपनी स्थिति का औचित्य सिद्ध करने के लिए उसे हजार ढोंग रचने पड़ते हैं और लाख तरह की मूढ़ताएँ फैलानी पड़ती हैं। यह भार जनमानस को विकृत बनाने की दृष्टि से और भी अधिक भयावह है। हर विचारशील का कर्त्तव्य है कि भिक्षा व्यवसाय को  निरुत्साहित करे। $कुपात्रों को वाणी मात्र से भी उत्साह न दें।

◇ यह नहीं देखना चाहिए कि बुराई से वैभव बढ़ता है। यदि ऐसा हुआ भी तो वह क्षणिक ही होगा। बुराई  जितनी जल्दी बढ़ती है, उतनी ही जल्दी नष्ट हो जाती है, साथ ही कर्त्ता को भी नष्ट कर डालती है। आकाश तक फैलती है और अंत में सिकुड़कर स्वयं बुराई करने वाले के सिर पर आकर पड़ती है।

■ दुष्ट विचार हमारा सबसे बड़ा शत्रु है। पाप का विचार, चोरी, कपट, ईर्ष्या, निराशा का विचार हमारा सर्वनाश कर सकता है। ईश्वर का एक मानसिक चित्र अंतःकरण में तैयार कर लें और सत्य, प्रेम, न्याय से अपना हृदय नित्य विकसित करते रहें। स्वतंत्रता, स्वच्छन्दता और शान्ति के विचार हमारे दोस्त  हैं। ये हमें सिखाएँगे कि जीवन पूर्ण सुखमय है तथा उसके अनुभवों से झगड़ना मूर्खता में शामिल है।

शनिवार, 4 मई 2019

👉 सच्चे मित्र

कोई भी व्यक्ति संसार में अकेला नहीं जी सकता, क्योंकि वह अल्पशक्तिमान् है। इसलिए अपने सारे काम स्वयं नहीं कर सकता। एक दूसरे की सहायता लेनी ही पड़ती है। और सब लोग, सब की सहायता करते नहीं। सहायता लेने देने के लिए एक आपसी संबंध होता है, जिसे मित्रता कहते हैं। मित्र का अर्थ होता है, स्नेह करने वाला. यह स्नेह संबंध चाहे मां बेटी में हो, चाहे पिता पुत्र में हो, चाहे पति-पत्नी में हो, चाहे दो दोस्तों में हो,  इन सब में जो स्नेह का संबंध है, वही मित्रता है।

मित्र ऐसा बनाएं, जो एक दूसरे के कष्ट को समझे, और हृदय से उस की समस्याओं को दूर करने का पूरा प्रयत्न करे।

संसार में आपको बहुत से ऐसे लोग मिलेंगे, जिनमें इस प्रकार की मित्रता देखी जाती है। उदाहरण के लिए यदि बेटा बीमार हो जाए, तो माता-पिता को नींद नहीं आती। दिन-रात उसकी सेवा करते हैं। और पूरी शक्ति लगाकर वैद्य डॉक्टरों की सहायता से उसे स्वस्थ बना देते हैं । ऐसे ही यदि माता पिता को कष्ट हो, यदि वे रोगी या वृद्ध हो जाएँ, तो बच्चों को भी वैसी ही सेवा करनी चाहिए, जैसी माता पिता अपने बच्चों की करते हैं। बस इसी संबंध का नाम सच्ची मित्रता है। अन्यथा बहुत से लोग मित्रता का केवल दिखावा करते हैं। सच्ची मित्रता, सच्चा स्नेह उनमें नहीं होता। ऐसे नकली मित्रों से और नकली रिश्तेदारों से सावधान रहें।

सब लोगों को पहचानें। जो हृदय से सेवा करते हैं, सच्चे मित्र हैं, उनके साथ ही जीवन जीने में, जीवन का सच्चा आनंद है।

शुक्रवार, 3 मई 2019

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 3 May 2019

👉 आज का सद्चिंतन 3 May 2019


👉 प्रेम का अमरत्व और उसकी व्यापकता

कोई व्यक्ति जीवनभर प्राइमरी पाठशाला में ही पढ़ते रहने की जिद करे और अगले बड़े स्कूल में जाने के लिए तैयार न हो तो "उसे बाल बुद्धि ही कहा जाएगा।" "प्रेम" का प्रशिक्षण घर-परिवार में हो या किसी वस्तु अथवा व्यक्ति से प्रारम्भ हो, उसकी स्वाभाविकता समझ में आती है, पर जब कोई उतने तक ही सीमाबद्ध होकर रह जाएगा, "आगे न बढ़ेगा तो रुके हुए पानी की तरह सड़न पैदा हुए बिना न रहेगी।'

जो "प्यार" सीमा बद्ध होकर रह जाता है, उसे "मोह" कहते हैं, "मोह" में पक्षपात जुड़ जाता है, औचित्य का ध्यान नहीं रहता। प्रिय पात्र की त्रुटियों का परिमार्जन करने की इच्छा नहीं होती वरन "उन्हें भी प्रिय मानकर समर्थन किया जाने लगता है।" इससे "प्रेम" की महत्ता ही नष्ट हो जाती है।

"प्रेम" गंगाजल है, जिसे जहाँ छिड़का जाए, वहीं पवित्रता पैदा करे," पर यदि वह गंदे नाले में गिरकर अपनी पवित्रता खो दे तो इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा।

"प्रेम" लगाव का पात्र नहीं है और न पक्षपात के अथवा हर प्रकार के समर्थन-सहयोग का। "उसमें आदर्शो की अविच्छिन्नता जुड़ी रहती है।" "आदर्श विहीन प्यार को "मोह" कहेंगे।" "मोह" अपने प्रिय पात्र के अनुचित कार्यों का भी समर्थन करने लगता है, तब उसकी ऊँचा उठने की क्षमता नष्ट हो जाती है "मोह" को "प्रेम" की विकृति ही कह सकते हैं," इसलिए उसकी प्रशंसा नहीं की जा सकती है।

पं.श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जनवरी 1972 पृष्ठ 3

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 13)

PHYSICAL SUFFERINGS (Daihik Dukhas):

The cause of congenital deficiencies and genetic diseases is misutilisation of the corresponding organs in the previous life–cycles. After death, the soul discards the physical body but carries forward the astral body (Sookchma Shareer) to the next life. In the succeeding birth, the new body is shaped by this astral body. The astral body carries with it nuclei (seeds) of samskars of earlier physical existence to the next reincarnation. The corresponding components of physical organs, which are immorally used in the previous life, lose their vitality in the astral body but manifest as malfunctioning of those organs in the physical body of the next birth. Thus it is possible for a sexually indulgent person to be born with congenital impotence or with imperfections in sexual organs in the next life (Note that Roman Catholic Church defines indulgence as “a partial remission of the temporal punishment that is still due for sin after absolution). Giving exemplary punishment for over- indulgence in this manner, the divine justice also provides the being an excellent opportunity for self-upliftment.

The temporary period of non-function or malfunctions of the affected faculty serves the purpose of caution as well as rejuvenation for the next life. That is to say whichever organ of the body is recklessly misused for sense gratification is deemed to be engaged in a physical sin. In the next life that organ is either found missing or appears as a congenital defect. Thus congenital physical
deformities or diseases are for remission of sins. (ref. Absolution –Roman Catholic Theory.) The compulsive rest rejuvenates the organ of the body and also relieves the burden of sin from the mind through repentance. When a mental sin is intermixed with a physical sin and it has not been neutralized in the present life by punishment by the state, society or by atonement, it is also carried over to the next life.

However, if the sin is basically physical with little  or no input of mental sin (deliberate intention), the biological system immediately takes care of it. For instance man gets intoxicated and deranged on taking drugs, falls sick because of dietary irregularities or dies on consuming the poison. This is a physical punishment for a physical sin. The body cleans itself of the small physical sins speedily and these are neutralized in this very life. On the other hand, as mentioned earlier, serious physical vices, which are also associated with mental stimuli, are carried over by the astral body for being worked out in the next life.

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✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 24

👉 आत्मचिंतन के क्षण 3 May 2019

★ आज मित्रता की आड़ लेकर शत्रुता बरतने का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। इसे चतुरता, कुशलता समझा जाता है और इस प्रयास में सफल व्यक्ति आत्म-श्लाघा भी बहुत करते हैं। साथी को मित्रता के जाल में फँसाकर उसकी बेखबरी का-भोलेपन का अनुचित लाभ उठा लेना यही आज तथाकथित चतुर लोगों की नीति बनती जा रही है। ऐसी दशा में मित्र और शत्रु की कसौटी को हर घड़ी साथ रखने की आवश्यकता है।

◆ जिसे ईमानदारी का जीवन जीना हो, उसे पूर्व तैयारी मितव्ययी रहने की-सादा जीवन जीने की करनी चाहिए। जो कम में गुजारा करना जानता है, उसी के लिए यह संभव है कि कम आमदनी से संतोषपूर्वक निर्वाह कर ले। ईमानदारी से आय सीमित रहती है-उतनी नहीं हो सकती जितनी बेईमानी अपनाने से। ऐसी दशा में यदि श्रेष्ठ जीवन जीना हो तो अपने खर्च जहाँ तक संभव हो घटाने चाहिए। जिसने खर्च बढ़ा रखे हैं, उन्हें उनकी पूर्ति के लिए बेईमानी का रास्ता ही अपनाना पड़ेगा।

◇ सफलता का पथ निश्चय ही बड़ा कठिन और दुर्गम होता है। उसको सरल और प्रशस्त बनाने में मनुष्य की इच्छा शक्ति  का बड़ा उपयोग है। इच्छा शक्ति की दृढ़ता और प्रबलता मनुष्य को पराक्रमी, पुरुषार्थी और धीर-गंभीर बना देती है। प्रबल इच्छा शक्ति वाला जिस काम में हाथ डालता है, उसे तब तक नहीं छोड़ता जब तक पूरा नहीं कर लेता। वह बाधाओं, विरोधों से साहसपूर्वक लड़ता हुआ बढ़ता रहता है। उन्नति और सफलता का इसके सिवाय और कोई उपाय नहीं है।

■ किसी का सम्मान करने का अर्थ है- बदले में उसका सम्मान पाना। दूसरे कम कीमत में सम्मान पाने की बात बन ही नहीं सकती। सादगी से रहा जाय, शालीनता बरती जाये और दूसरों को संतुष्ट रखकर उन  पर अपना प्रभाव छोड़ने की कला सीखी जाये, इससे बढ़कर अपने आपको बड़ा बनाने-ऊँचा उठाने का कोई श्रेष्ठ उपाय है ही नहीं।

★ विचार एक शक्ति है, विशुद्ध विद्युत् शक्ति। जो इस पर समुचित नियंत्रण कर ठीक दिशा में संचालन कर सकता है वह बिजली की भाँति इससे बड़े-बड़े काम ले सकता है, किन्तु जो इसको ठीक से अनुशासित नहीं कर सकता, वह उलटा इसका शिकार बन जाता है, अपनी ही शक्ति से स्वयं नष्ट हो जाता है, अपनी  ही आग में जलकर भस्म हो जाता है। इसीलिए मनीषियों ने नियंत्रित विचारों को मनुष्य का मित्र और अनियंत्रित विचारों को उसका शत्रु बतलाया है।

सोमवार, 29 अप्रैल 2019

अंतःकरण के धन को ढ़ूंढो | Look for the Treasure Within Yourself

👉 आज का सद्चिंतन 29 April 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 29 April 2019


👉 सकारात्मक सोच की शक्ति!

हम हमेशा एक कहावत सुनते हैं, जैसा हम सोचते हैं वैसा ही हम बन जाते हैं. ये कहावत पूरी तरह से सही हैं, क्योकि हमारा Mind एक वक्त में एक ही विचार कर सकता हैं Negative या Positive!

आप लोग हमेशा सुनते होंगे, हमें positive सोच रखनी चाहिए negative नहीं. क्या है ये positive और negative विचार?

दुनिया में हो रही घटनाओं को देखने का हम सभी का अपना अलग अलग नजरिया होता है। कुछ लोग इसे negative रूप में देखते हैं, अर्थात हमेशा कुछ न कुछ कमी निकालते रहते हैं जब कि कुछ लोग उसी घटना को positive रूप में देखते हैं और उसमे ये खोजते है कि इसमें क्या अच्छाई है, और उसी अच्छाई से सिख लेकर नित अपना जीवन सफल बनाते चले जाते हैं। वास्तव में हमारे जीवन में जो होता हैं अच्छे के लिए होता है। हमें कुछ समय के लिए उस घटना से दुःख जरुर होता है लेकिन बाद में यही पता चलता है कि ये हमारे लिए अच्छा ही हुआ।

आइये पढ़ते हैं एक कहानी >>>

एक ऋषि के दो शिष्य थे जिनमें से एक शिष्य सकारात्मक सोच वाला था वह हमेशा दूसरों की भलाई का सोचता था और दूसरा बहुत नकारात्मक सोच रखता था और स्वभाव से बहुत क्रोधी भी था। एक दिन महात्मा जी अपने दोनों शिष्यों की परीक्षा लेने के लिए उनको जंगल में ले गये।

जंगल में एक आम का पेड़ था जिस पर बहुत सारे खट्टे और मीठे आम लटके हुए थे। ऋषि ने पेड़ की ओर देखा और शिष्यों से कहा की इस पेड़ को ध्यान से देखो। फिर उन्होंने पहले शिष्य से पूछा की तुम्हें क्या दिखाई देता है।

शिष्य ने कहा कि ये पेड़ बहुत ही विनम्र है लोग इसको पत्थर मारते हैं फिर भी ये बिना कुछ कहे फल देता है। इसी तरह इंसान को भी होना चाहिए, कितनी भी परेशानी हो विनम्रता और त्याग की भावना नहीं छोड़नी चाहिए। फिर दूसरे शिष्य से पूछा कि तुम क्या देखते हो, उसने क्रोधित होते हुए कहा की ये पेड़ बहुत धूर्त है बिना पत्थर मारे ये कभी फल नहीं देता इससे फल लेने के लिए इसे मारना ही पड़ेगा।

इसी तरह मनुष्य को भी अपने मतलब की चीज़ें दूसरों से छीन लेनी चाहिए। गुरु जी हँसते हुए पहले शिष्य की बडाई की और दूसरे शिष्य से भी उससे सीख लेने के लिए कहा। सकारात्मक सोच हमारे जीवन पर बहुत गहरा असर डालती है। नकारात्मक सोच के व्यक्ति अच्छी चीज़ों मे भी बुराई ही ढूंढते हैं।

उदाहरण के लिए:- गुलाब के फूल को काँटों से घिरा देखकर नकारात्मक सोच वाला व्यक्ति सोचता है की “इस फूल की इतनी खूबसूरती का क्या फ़ायदा इतना सुंदर होने पर भी ये काँटों से घिरा है ”जबकि उसी फूल को देखकर सकारात्मक सोच वाला व्यक्ति बोलता है की “वाह! प्रकृति का कितना सुंदर कार्य है की इतने काँटों के बीच भी इतना सुंदर फूल खिला दिया” बात एक ही है लेकिन फ़र्क है केवल सोच का।

अब ये हम पर निर्भर करता है कि हम अपने दुखों को देखकर और दुखी होते चले जाएँ ये इससे सिख लेकर अपने जीवन को एक नयी दिशा में ले जाएँ। प्रकृति का ये नियम है कि आप जितना संघर्ष करोगे आपके सफलता का प्रतिशत उतना ही अधिक होगा। इसलिए संघर्ष करना हमारे जीवन का महत्वपूर्ण हिसा इससे भागे नहीं बल्क़ि इसे अपना दोस्त बना लें।

आप जब चाहे Negative Thinking को Positive Thinking में बदल सकते हैं। यदि आप Positive Thinking को पुरे निश्चय के साथ कई बार दोहराए की मुझे इस काम से डर नहीं लगता या कोई आशंका नहीं हैं मैं इसे बहुत अच्छे से पूरा करुगा या मेरा ये काम अवश्य सिद्ध होगा, तो आप निश्चत ही अपने काम में सफल हो जाऐगे।

अंत में कोई परिस्थिति कितनी भी बुरी क्यों न हो हमें उसे सकरात्मक नजरिये से देखना चाहिए क्योंकि ये हमारे जीवन को सफल बना सकता है, हमें इसकी power को अनदेखा नहीं करनी चाहिए।

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 12)

MENTAL SUFFERINGS (Daivik–Dukhas):

All types of sorrows, mental suffering, are results of ‘Mental Sins’. Worry, anxiety, anger, humiliation, animosity, separation from a beloved one, fear, grief, etc. are signs of divine justice for mental sins. Mental sins are those willful karmas (deliberate acts) of mind, which are carried out under the influence of strong negative emotional stimuli. We may call mental sins as corrupt functions of mind like jealousy, perfidy, deception, annoyance, cruelty, etc., which pollute the environment around the inner psyche.Mental sins do not provide any physical gratification. Like a smoke-filled room, an environment created by pollutants of mind suffocates the soul. The soul, being a portion of the omnipresent Divinity, is intrinsically pure. It does not permit accumulation of sinful thoughts around itself and is always eager to push out of pollutants in someway or the other, in the same manner, as the body expels the harmful food. The soul is meticulously careful about its purity. The moment it finds the mental sins polluting its environment, it feels uncomfortable and immediately reacts to discard the pollutants. Though our external conscious mind is hardly aware, the inner, subtle mind is always seeking the opportunities to throw off this burden. Sometime, somehow, from somewhere, it involves man in situations, which neutralize the samskars created by mental sins through such reactions as humiliation, failure, disrepute, etc.

Death of a beloved person, loss in business and property, public-defamation, poverty etc. are also mental agonies. Such situations bringout the inner pain to the surface and the aggrieved person weeps, wails and is reminded of the futility of worldly attachments and impermanency of material things. Situations creating acute unhappiness bring out a greater awareness of the need for righteous living. Man is motivated to refrain from committing sinful deeds in future and follow an upright path in life. While attending funerals, people are reminded of the urgency of living a purposeful life. When suffering from financial loss man seeks God’s help. On being defeated and becoming unsuccessful, vanity is deflated. When the intoxication is over, the drunk begins to talk sense.

The only purpose of mental distress is to cleanse the mind of garbage of mental pollutants such as jealously, ingratitude, selfishness, cruelty, heartlessness cunning, hypocrisy and egoism. Through suffering, the intelligent divine mechanism ensures removal of samskars created by Prarabdha Karmas (discussed later). Pain and anguish spring forth to wash out the deleterious samskars generated by Prarabdha Karmas. Apparently, sins like theft, burglary, robbery, adultery, kidnapping and violence are committed physically, but since these are basically outer manifestation of mental stimuli such acts fall in the category of mental sins.

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✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 20

👉 अपनी इच्छा शक्ति को बढ़ाइए

‘जहाँ चाह है वहाँ राह है’ यह एक पुरानी कहावत है, परन्तु इसमें बड़ा बल है। मनुष्य की जैसी अच्छी बुरी इच्छा होती है वह उसी के अनुसार अपनी समस्...