गुरुवार, 14 दिसंबर 2017

👉 जो सर्वश्रेष्ठ हो वही अपने ईश्वर को समर्पित हो

🔶 एक नगर मे एक महात्मा जी रहते थे और नदी के बीच मे भगवान का मन्दिर था और वहाँ रोज कई व्यक्ति दर्शन को आते थे और ईश्वर को चढाने को कुछ न कुछ लेकर आते थे! एक दिन महात्मा जी अपने कुछ शिष्यों के साथ नगर भ्रमण को गये तो बीच रास्ते मे उन्हे एक फल वाले के वहाँ एक आदमी कह रहा था की कुछ सस्ते फल दे दो भगवान के मन्दिर चढाने है! थोड़ा आगे बढे तो एक दुकान पर एक आदमी कह रहा था की दीपक का घी देना और वो घी ऐसा की उससे अच्छा तो तेल है! आगे बढे तो एक आदमी कह रहा था की दो सबसे हल्की धोती देना एक पण्डित जी को और एक किसी और को देनी है!

🔷 फिर जब वो मन्दिर गये तो जो नजारा वहाँ देखा तो वो दंग रह गये!

🔶 उस राज्य की राजकुमारी भगवान के आगे अपना मुंडन करवा रही थी और वहाँ पर एक किसान जिसके स्वयं के वस्त्र फटे हुये थे पर वो कुछ लोगों को नये नये वस्त्र दान कर रहा था! जब महात्मा जी ने उनसे पूछा तो किसान ने कहा हॆ महात्मन चाहे हम ज्यादा न कर पाये पर हम अपने ईश्वर को वो समर्पित करने की ईच्छा रखते है जो हमें भी नसीब न हो और जब मैं इन वस्त्रहीन लोगों को देखता हूँ तो मेरा बड़ा मना करता है की इन्हे उतम वस्त्र पहनावे!

🔷 और जब राजकुमारी से पूछा तो उस राजकुमारी ने कहा हॆ देव एक नारी के लिये उसके सिर के बाल अति महत्वपुर्ण है और वो उसकी बड़ी शोभा बढ़ाते है तो मैंने सोचा की मैं अपने इष्टदेव को वो समर्पित करूँ जो मेरे लिये बहुत महत्वपुर्ण है इसलिये मैं अपने ईष्ट को वही समर्पित कर रही हूँ!

🔶 जब उन दोनो से पूछा की आप अपने ईष्ट को सर्वश्रेष्ठ समर्पित कर रहे हो तो फिर आपकी माँग भी सर्वश्रेष्ठ होगी तो उन दोनो ने ही बड़ा सुन्दर उत्तर दिया!

🔷 हॆ देव हमें व्यापारी नही बनना है और जहाँ तक हमारी चाहत का प्रश्न है तो हमें उनकी निष्काम भक्ति और निष्काम सेवा के अतिरिक्त कुछ भी नही चाहिये!

🔶 जब महात्मा जी मन्दिर के अन्दर गये तो वहाँ उन्होने देखा वो तीनों व्यक्ति जो सबसे हल्का घी, धोती और फल लेकर आये साथ मे अपनी मांगो की एक बड़ी सूची भी साथ लेकर आये और भगवान के सामने उन मांगो को रख रहे है!

🔷 तब महात्मा जी ने अपने शिष्यों से कहा हॆ मेरे अतिप्रिय शिष्यों जो तुम्हारे लिये सबसे अहम हो जो शायद तुम्हे भी नसीब न हो जो सर्वश्रेष्ठ हो वही ईश्वर को समर्पित करना और बदले मे कुछ माँगना मत और माँगना ही है तो बस निष्काम-भक्ति और निष्काम-सेवा इन दो के सिवा अपने मन मे कुछ भी चाह न रखना!

🔶 इसीलिये एक बात हमेशा याद रखना की भले ही थोड़ा ही समर्पित हो पर जो सर्वश्रेष्ठ हो बस वही समर्पित हो !

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 15 Dec 2017


👉 आज का सद्चिंतन 15 Dec 2017


👉 प्रतिकूलतायें जीवन को प्रखर बनाती हैं

🔷 आग के बिना न भोजन पकता है, न सर्दी दूर होती है और न ही धातुओं का गलाना- ढलाना सम्भव हो पाता है। आदर्शों की परिपक्वता के लिए यह आवश्यक है कि उनके प्रति निष्ठा की गहराई कठिनाइयों की कसौटी पर कमी और खरे- खोटे की यथार्थता समझी जा सके। बिना तपे सोने को प्रमाणिक कहाँ माना जाता है? उसका उपयुक्त मूल्य कहाँ मिलता है? यह तो प्रारंभिक कसौटी है।       

🔶 कठिनाइयों के कारण उत्पन्न हुई असुविधाओं को सभी जानते हैं। इसलिए उनसे बचने का प्रयत्न भी करते हैं। इसी प्रयत्न के लिए मनुष्य को दूरदर्शिता अपनानी पड़ती है और उन उपायों को ढूँढना पड़ता है, जिनके सहारे विपत्ति से बचना सम्भव हो सके। यही है वह बुद्धिमानी जो मनुष्यों को यथार्थवादी और साहसी बनाती है। जिननेकठिनाईयों में प्रतिकूलता को बदलने के लिए पराक्रम नहीं किया, समझना चाहिए कि उन्हे सुदृढ़ व्यक्तित्व के निर्माण का अवसर नहीं मिला। कच्ची मिट्टी के बने बर्तन पानी की बूँद पड़ते ही गल जाते हैं। किन्तु जो देर तक आँवे की आग सहते हैं, उनकी स्थिरता, शोभा कहीं अधिक बढ़ जाती है।

🔷 तलवार पर धार रखने के लिए उसे घिसा जाता है। जमीन से सभी धातुऐँ कच्ची ही निकलती हैं। उनका परिशोधन भट्ठी के अतिरिक्त और किसी उपाय से सम्भव नहीं। मनुष्य कितना विवेकवान, सिद्धन्तवादी और चरित्रनिष्ठ है, इसकी परीक्षा विपत्तियों में से गुजरकर इस तप- तितीक्षा में पक कर ही हो पाती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सुख चाहिए किन्तु दुःख से डरिये मत (भाग 3)

🔶 सुख-सुविधा की कामना बेशक की जाये और उसके लिए अथक प्रयत्न भी, पर साथ ही कठिनाइयों का स्वागत करने के लिए भी प्रस्तुत रहना चाहिए। अनुकूलता पाकर हर्षोन्मत्त हो उठना और प्रतिकूलता देखते ही रो उठना मानसिक हीनता का लक्षण है। मनोहीन मनुष्य संसार में कुछ भी करने लायक नहीं होता। वह जीता जरूर है लेकिन मृतकों से भी बुरी जिन्दगी। जिसका हृदय विषाद से आक्रान्त है, चिन्ताओं से अभिभूत है उसका जीना जीने में नहीं गिना जा सकता। जिन्दगी वास्तव में वही है जिसमें जीने के साथ कुछ ऊंचा और अच्छा करते रहने का उत्साह सक्रिय होता रहे।
   
🔷 यह उत्साहपूर्ण सक्रियता केवल उसी में सम्भव है जो हर समय कठिनाइयों से लड़ने का साहस रखता है आपत्तियों से संघर्ष करने की हिम्मत वाला है। जो व्यग्र है त्रस्त है और निराश है वह न केवल संसार पर ही बल्कि अपने पर भी बोझ बना हुआ श्वासों का भार ढोया करता है। चिन्तित तथा निराश मनःस्थिति वाला व्यक्ति किसी पुरुषार्थ के योग्य नहीं रहता। जिसकी जड़ में दीमक लग चुकी है अथवा जिसका मूल किसी कीड़े ने काट डाला है उस लता से, उस वृक्ष से सुन्दर फल-फूलों की आशा नहीं की जा सकती।

🔶 सुख-सुविधा की कामना अवश्य करिए यह उपयुक्त है। किन्तु साथ ही कठिनाइयों से लोहा लेने के लिए भी सदैव तत्पर रहिये। कठिनाइयां स्वयं कष्ट लेकर नहीं आतीं। वे केवल आती है आपकी मानसिक प्रसन्नता, आपकी आशा तथा आपके उत्साह पर आवरण डालने। यदि आपने उनको अपनी इन आत्म-किरणों पर परदा डाल लेने दिया तो आपके मनो-मन्दिर में अन्धकार हो जायगा और तब तमोजन्य निराश, क्षोभ, दुःख, भय तथा असन्तोष की अशिव भावनायें आपको तरह-तरह से त्रस्त करने लगेंगी और आप अकारण ही पीड़ित रहने लगेंगे।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- दिसंबर 1966 पृष्ठ 23
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/July/v1.22

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.3

👉 Be Silent, Be Strong

🔶 World serve both as nectar & poison. The speech which is true, inspiring & encouraging, free from deceit, sweet & beneficial will be called nectarine. On the contrary, the words which are harsh, egoistic, mocking. taunting, shallow & inimical will be poisonous & others.

🔷 Words should never be misused. If possible, observe silence for a day in a week or a month & engage the mind in self-analysis & contemplation of truth. Silence is very dynamic. The language of an individual who controls his words & observes silence. as for as possible is very sweet. Speak only as much as is necessary. Misuse of words wastes a large part of our energy. Therefore, just as brahmacharya etc. have been ordained for control of senses, similarly the practice of silence has been laid down for control of speech.

🔶  Mahatma Gandhi has said- “Silence is the best speech.” If it is necessary to speak, speak as little as possible. If one word can do, don’t use two. In Franklin’s words, “No teacher is better than an ant & it remains silent.” Carlyle has said- “Silence has more word-power than speech.”

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 संजीवनी विद्या बनाम जीवन जीने की कला (भाग 6)

🔶 हमने अपने जीवन के इस अन्तिम समय में सारी हिम्मत और शक्ति इस बात में लगा दी है कि शान्तिकुञ्ज को हम एक विश्वविद्यालय बना देंगे। पाँच सौ व्यक्तियों के लिए हमने एक माह में शिक्षण देने की व्यवस्था की है। इतना बड़ा काम व मात्र एक महीना? हमने इसलिए बड़ा नहीं रखा, क्योंकि हमको कम समय में एक लाख से अधिक सही जीवन जीने वाले आदमी तैयार करने हैं। हमने पाँच सौ आदमियों को प्रत्येक माह ट्रेण्ड करके स्वयं का महान् और शानदार जीवन जीने के लिए शिक्षण देने का प्रबन्ध किया है। न केवल स्वयं का जीवन बल्कि समाज की सेवा का शिक्षण। न केवल समाज की सेवा बल्कि यह भी कि आज की समस्याएँ क्या हैं? गुत्थियों का हल और समाधान निकालने के लिए क्या कदम बढ़ाए जाने चाहिए और किस तरीके से काम करना चाहिए? यह सिखाने का प्रबन्ध किया है।
                  
🔷 एक और आपको अचम्भा होगा। यहाँ बहुत दिनों से जब से यह आश्रम बना है, यहाँ के निवास के लिए, बिजली तो जलती है, कुएँ से पानी जो लेते हैं, उसके लिए किसी से कुछ भी नहीं लिया गया है। अब एक और हिम्मत बढ़ाई है। वह यह कि अब खाने की जिम्मेदारी भी हम अपने कन्धों पर उठाएँगे, गरीब और अमीर दोनों के लिए कोई खर्च वसूला नहीं जाएगा। यदि कोई कहे कि हमने आपका खाया है, दान का पैसा है, ब्राह्मण का, साधु का पैसा है, हम खाना नहीं चाहते तो हम कहेंगे कि मुट्ठी बन्द करके दे जाइए, हम रसीद काट देंगे आपकी। तो इस शिक्षण में यह नवीन विशेषता है कि अधिक से अधिक आदमी लाभान्वित हो सकें।
    
🔶 सरकारी स्कूलों-कॉलेजों में आपने देखा होगा कि वहाँ बोर्डिंग फीस अलग देनी पड़ती है। पढ़ाई की फीस अलग देनी पड़ती है, लाइब्रेरी फीस अलग व ट्यूशन फीस अलग। लेकिन हमने यह हिम्मत की है कि कानी कौड़ी की भी फीस किसी के ऊपर लागू नहीं की जाएगी। यही विशेषता नालन्दा-तक्षशिला विश्वविद्यालय में भी थी। वही हमने भी की है, लेकिन बुलाया केवल उन्हीं को है, जो समर्थ हों, शरीर या मन से बूढ़े न हो गए हों, जिनमें क्षमता हो, जो पढ़े-लिखे हों। इस तरह के लोग आयेंगे तो ठीक है, नहीं तो अपनी नानी को, दादी को, मौसी को, पड़ोसन को लेकर के यहाँ कबाड़खाना इकट्ठा कर देंगे तो यह विश्वविद्यालय नहीं रहेगा? फिर तो यह धर्मशाला हो जाएगी। साक्षात् नरक हो जाएगा। इसे नरक मत बनाइए आप।

🔷 जो लायक हों वे यहाँ की ट्रेनिंग प्राप्त करने आएँ और हमारे प्राण, हमारे जीवट से लाभ उठाना चाहें, चाहे हम रहें या न रहें, वे लोग आएँ। प्रतिभावानों के लिए निमन्त्रण है, बुड्ढों, अशिक्षितों, उजड्डों के लिए निमन्त्रण नहीं है। आप कबाड़खाने को लेकर आएँगे तो हम आपको दूसरे तरीके से रखेंगे, दूसरे दिन विदा कर देंगे। आप हमारी व्यवस्था बिगाड़ेंगे? हमने न जाने क्या-क्या विचार किया है और आप अपनी सुविधा के लिए धर्मशाला का लाभ उठाना चाहते हैं? नहीं, यह धर्मशाला नहीं है। यह कॉलेज है, विश्वविद्यालय है। कायाकल्प के लिए बनी एक अकादमी है। हमारे सतयुगी सपनों का महल है। आपमें से जिन्हें आदमी बनना हो, बनाना हो, इस विद्यालय की संजीवनी विद्या सीखने के लिए आमन्त्रण है। कैसे जीवन को ऊँचा उठाया जाता है, समाज की समस्याओं को कैसे हल किया जाता है? यह आप लोगों को सिखाया जाएगा। दावत है आप सबको। आप सबमें जो विचारशील हों, भावनाशील हों, हमारे इस कार्यक्रम का लाभ उठाएँ। अपने को धन्य बनाएँ और हमको भी।

🌹  हमारी बात समाप्त।
🌹  ॐ शान्ति।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 166)

🌹  तीन संकल्पों की महान् पूर्णाहुति
🔷 तीसरा वर्ग प्रज्ञा परिवार का है। इसमें हमारा व्यक्तिगत लगाव है। लम्बे समय से जिस-जिस बहाने साथ-साथ रहने के कारण घनिष्ठता ऐसी और इतनी बढ़ गई है कि उसका समापन किसी भी प्रकार हो सकना सम्भव नहीं। इसके कई कारण हैं। प्रथम यह कि हमें अनेक जन्मों का स्मरण है। लोगों को नहीं। जिनके साथ पूर्व जन्मों में सघन सम्बन्ध रहे हैं उन्हें संयोगवश या प्रयत्नपूर्वक हमने परिजनों के रूप में एकत्रित कर लिया है और वे जिस-तिस कारण हमारे इर्द-गिर्द जमा हो गए हैं। इन्हें अखण्ड ज्योति अपने आँचल में समेटे बटोरे रही है। संगठन के नाम पर चलने वाले रचनात्मक कार्यक्रम भी इस संदर्भ में आकर्षण उत्पन्न करते रहे हैं।

🔶  इसके अतिरिक्त बच्चों और अभिभावकों के बीच जो सहज वात्सल्य भरा आदान -प्रदान रहता है, वह भी चलता रहा है। बच्चे सहज स्वभाव अभिभावकों से कुछ चाहते हैं। भले ही मुँह खोलकर माँगे नहीं अथवा भाव-भंगिमा से प्रकट करते रहें। बच्चों की आकाँक्षा बढ़ी-चढ़ी होती हैं। भले ही वह उपयोगी हो या अनुपयोगी, आवश्यक हो या अनावश्यक। दे दिलाकर ही उन्हें चुपाया जाता है। इतनी समझ होती नहीं कि पैसा व्यर्थ जाने और वस्तु किसी काम न आने का तर्क उसके गले उतारा जा सके। बच्चों और अभिभावकों के बीच यह दुलार भरी खींचतान तब तक चलती रहती है, जब तक वे परिपक्व नहीं हो जाते और उपयोगिता-अनुपयोगिता का अंतर नहीं समझने लगते। हमारे साथ एक रिश्ता परिजनों का यह भी चलता रहा है।

🔷 मान्यता सो मान्यता। आदत सो आदत। प्रत्यक्ष रिश्तेदारी न सही पूर्व संचित सघनता का दबाव सही। एक ऐसा सघन सूत्र हम लोगों के बीच विद्यमान है जो विचार विनियम, सम्पर्क-सान्निध्य तक ही सीमित नहीं रहता, कुछ ऐसा भी चाहता है कि अधिक प्रसन्नता का कोई साधन कोई अवसर हाथ लगे। कइयों के सामने कठिनाइयाँ होती हैं। कई भ्रमवश जंजाल में फँसे रहते हैं। कइयों को अधिक अच्छी स्थिति चाहिए। कारण कई हो सकते हैं, पर देखा यह जाता है कि अधिकाँश लोग इच्छा आकाँक्षा लेकर आते हैं। वाणी से या बिना वाणी के व्यक्त करते हैं, साथ ही सोचते हैं कि हमारी बात यथा स्थान पहुँच गई। उसका विश्वास उन्हें तब होता है जब पूरा न सही आधा-अधूरा उपलब्ध भी हो जाता है।

🔶 याचक और दानी का रिश्ता दूसरा है, पर बच्चों और अभिभावकों के बीच यह बात लागू नहीं होती। बछड़ा दूध न पिए तो गाय का बुरा हाल होता है। मात्र गाय ही बछड़े को नहीं देती, बछड़ा भी गाय को देता है। यदि ऐसा न होता तो कोई अभिभावक बच्चे जनने और उनके लालन-पालन में समय लगाने, पैसा खर्च करने का झंझट मोल न लेते।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.192

बुधवार, 13 दिसंबर 2017

👉 हीरों से भरा खेत

🔶 हफीज अफ्रीका का एक किसान था। वह अपनी जिंदगी से खुश और संतुष्ट था। हफीज खुश इसलिए था कि वह संतुष्ट था। वह संतुष्ट इसलिए था क्योंकि वह खुश था। एक दिन एक अक्लमंद आदमी उसके पास आया। उसने हफीज से कहा, ‘अगर तुम्हारे पास अंगूठे जितना बड़ा हीरा हो, तो तुम पूरा शहर खरीद सकते हो, और अगर तुम्हारे पास मुट्ठी जितना बड़ा हीरा हो तो तुम अपने लिए शायद पूरा देश ही खरीद लो।‘ वह अक्लमंद आदमी इतना कह कर चला गया। उस रात हफीज सो नहीं सका। वह असंतुष्ट हो चुका था, इसलिए उसकी खुशी भी खत्म हो चुकी थी।

🔷 दूसरे दिन सुबह होते ही हफीज ने अपने खेतों को बेचने और अपने परिवार की देखभाल का इंतजाम किया, और हीरे खोजने के लिए रवाना हो गया। वह हीरों की खोज में पूरे अफ्रीका में भटकता रहा, पर उन्हें पा नहीं सका। उसने उन्हें यूरोप में भी दूंढ़ा, पर वे उसे वहां भी नहीं मिले। स्पेन पहुंचते-पहुंचते वह मानसिक, शारीरिक और आर्थिक स्तर पर पूरी तरह टूट चुका था। वह इतना मायूस हो चुका था कि उसने बार्सिलोना नदी में कूद कर खुदखुशी कर ली।

🔶 इधर जिस आदमी ने हफीज के खेत खरीदे थे, वह एक दिन उन खेतों से होकर बहने वाले नाले में अपने ऊंटों को पानी पिला रहा था। तभी सुबह के वक्त उग रहे सूरज की किरणें नाले के दूसरी और पड़े एक पत्थर पर पड़ी, और वह इंद्रधनुष की तरह जगमगा उठा। यह सोच कर कि वह पत्थर उसकी बैठक में अच्छा दिखेगा, उसने उसे उठा कर अपनी बैठक में सजा दिया। उसी दिन दोपहर में हफीज को हीरों के बारे में बताने वाला आदमी खेतों के इस नए मालिक के पास आया। उसने उस जगमगाते हुए पत्थर को देख कर पूछा, ‘क्या हफीज लौट आया?‘ नए मालिक ने जवाब दिया, ‘नहीं, लेकिन आपने यह सवाल क्यों पूछा?‘

🔷 अक्लमंद आदमी ने जवाब दिया, ‘क्योंकि यह हीरा है। मैं उन्हें देखते ही पहचान जाता हूं।‘ नए मालिक ने कहा, ‘नहीं, यह तो महज एक पत्थर है। मैंने इसे पाले के पास से उठाया है। आइए, मैं आपको दिखता हूं। वहां पर ऐसे बहुत सारे पत्थर पड़े हुए हैं। उन्होंने वहां से नमूने के तौर पर बहुत सारे पत्थर उठाए, और उन्हें जांचन-परखने के लिए भेज दिया। वे पत्थर हीरे ही साबित हुए। उन्होंने पाया कि उस खेत में दूर-दूर तक हीरे दबे हुए थे।

🔶 इससे हमें सीख मिलते हैं-

🔷 जब हमारा नजरिया सही होता है, तो हमें महसूस होता है कि हम हीरों से भरी हुई जमीन पर चल रहे हैं। मौके हमेशा हमारे पावों तले दबे हुए हैं। हमें उनकी तलाश में कहीं जाने की जरूरत नहीं है। हमें केवल उनको पहचान लेना है।

🔶 दूसरे के खेत की घास हमेंशा हरी लगती है। जिन्हें मौके की पहचान नहीं होती, उन्हें मौके का खटखटाना शोर लगता है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 Dec 2017


👉 आज का सद्चिंतन 14 Dec 2017


👉 सुख चाहिए किन्तु दुःख से डरिये मत (भाग 2)

🔶 मन प्रसन्न है तो संसार में सभी ओर प्रसन्नता ही प्रसन्नता दृष्टिगोचर होगी, सुख ही सुख अनुभव होगा। तब ऐसी सहज प्रसन्नता की दशा में परिस्थितियों के अनुकूल होने की अपेक्षा नहीं रहती। परिस्थितियां अनुकूल हैं—मनभावनी हैं—बहुत अच्छा। परिस्थितियां अनुकूल नहीं हैं तब भी कोई अन्तर नहीं पड़ता। प्रसन्न-मन मानव उन्हें अनुकूल करने के लिए प्रयत्न करेगा, संघर्ष करेगा, पसीना बहायेगा, मूल्य चुकायेगा, कष्ट उठायेगा किन्तु दुःखी नहीं होगा। वह, यह सब हंसते-हंसते, प्रसन्न मनो मुद्रा में ही करता रहेगा। उसे परिश्रम में आनन्द आयेगा। संघर्ष में सुख मिलेगा। असफलता पर हंसी आयेगी और सफलता का स्वागत करेगा। जीवन की विविध परिस्थितियां तथा विविध उपलब्धियां उसकी प्रसन्नता को बढ़ा ही सकती हैं घटा नहीं सकती।
   
🔷 यह सही है कि संसार का कोई मनुष्य दुःख की कामना नहीं करता। यदि चाहता है तो केवल सुख ही चाहता है। किन्तु एक मात्र सुख की स्वार्थपूर्ण कामना का अर्थ यह है कि दुःख क्लेश आ जाने पर हाय-हाय करते हुए हाथ-पैर छोड़कर बैठे रहना और दुर्भाग्य अथवा नियति को कोसते रहना। इस प्रकार की निरुत्साह वृत्ति ही सुख की स्वार्थ कामना है जो कि किसी मानव को शोभा नहीं देती।

 🔶 एक मात्र सुख की आकांक्षा रखने वाले दुःख क्लेशों से भयभीत होने वाले न केवल स्वार्थी ही होते हैं अपितु कायर भी होते हैं। कायरता मनुष्य जीवन का कलंक है जो संघर्षों, मुसीबतों एवं आपत्तियों से डरता है, उनके आने पर निराश अथवा निरुत्साहित हो जाता है वह और कोई बड़ा काम कर सकना तो दूर साधारण मनुष्यों की तरह साधारण जीवन भी यापन नहीं कर सकता है। संसार में न तो आज तक ऐसा कोई मनुष्य हुआ है और न आगे ही होगा जिसके जीवन में सदा प्रसन्नता की परिस्थितियां ही बनी रहे। उसे कभी दुःख क्लेश के तप्त झोंके न सहन करने पड़े हों।

🔷 राजा से लेकर रंक तक और बलवान से लेकर निर्बल तक प्रत्येक प्राणी को अपनी-अपनी स्थिति में अपनी तरह के दुःख क्लेश उठाने ही पड़ते हैं। कभी शारीरिक कष्ट, कभी मानसिक क्लेश, कभी सामाजिक कठिनाई कभी आर्थिक अभाव तो कभी आध्यात्मिक अन्धकार मनुष्य को सताते ही रहते हैं। सदा सर्वदा कोई भी व्यक्ति कष्ट एवं कठिनाइयों से सर्वथा मुक्त नहीं रह सकता। तब ऐसी अनिवार्य अवस्था में किसी प्रकार की कठिनाई, आ जाने पर निराश, चिन्तित अथवा क्षुब्ध हो उठना इस बात का प्रमाण है कि हम संसार के शाश्वत नियमों से सामंजस्य स्थापित नहीं करना चाहते, हम असामान्यता के प्रति हठी अथवा दुराग्रही बने रहना चाहते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- दिसंबर 1966 पृष्ठ 21
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/July/v1.21

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.3

👉 How To Develop Personality?

🔶 Can development of personality be possible through speeches & writings? This issue is worth consideration. Today only these two means are adopted to achieve any thing. Speeches & writhing can also be necessary to some extent to obtain general information; but this alone will not do. Creative means will have to be adopted for this purpose. It is only by injecting spirituality & theism in this purpose.

🔷 It is only by injecting spirituality & theism in the innerself that faith can be increased in the ideals. Which can eliminate an individual’s evil & animal tendencies & inculcate divine tendencies. This alone is Sadhana (Practice). Sadhana is taken as capable of disentangling every knote of human life, and remover of all obstructions.
 
🔶 This belief is not untrue. The practice which can eliminate the impurities & perplexity covering the Atma can also open the gates of peace, happiness & prosperity. The scientific method of spiritual development alone is called by the name of Sadhana (Practice). The job of spiritual development is more important than construction of a huge workshop or a large factory.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 संजीवनी विद्या बनाम जीवन जीने की कला (भाग 5)

🔶 ट्रेनिंग बड़ी आवश्यक है। विश्वमित्र राम व लक्ष्मण को उनके पिता से माँगकर ले गए थे और उनको ट्रेनिंग दी थी। काहे की ट्रेनिंग दी थी। बड़ी महत्त्वपूर्ण ट्रेनिंग थी। शिवाजी का इतना भारी धनुष तोड़ा जाए? लंका में जो राक्षस रहते हैं, उनको किस तरीके से समाप्त किया जाए? रामराज्य की स्थापना कैसे की जाए? ये सारी बातें विश्वमित्र के आश्रम में जाकर सीखी थीं। ऐसी ही एक ट्रेनिंग की व्यवस्था हमने अपने शान्तिकुञ्ज में की है, ताकि आप समाज में छाई असुरता से लड़ सकें।
                  
🔷 शान्तिकुञ्ज को पहले से भी हमारा तीस गुना करने का मन था, किन्तु अब बहुत दिनों से नालन्दा और तक्षशिला विश्वविद्यालय, यही हमारे दिमाग में घूमते रहते हैं। हमें यही सपना आते रहता है कि नालन्दा, जिसमें हजारों धर्म-प्रचारक तैयार किए गए थे एवं तक्षशिला जिसमें हजारों संस्कृति प्रचारक तैयार किए गए थे, यहाँ पर बने। धर्म का नाम तो मैं अब नहीं लूँगा। यह नाम बहुत बदनाम हो गया है। मैं समाज-सेवा की बात आपसे कहूँगा। यह कहूँगा कि आपकी महानता की वृद्धि के लिए सेवा नहीं करेंगे, तब तक आप उन्नतिशील नहीं बनेंगे? आपकी आत्मा में सन्तोष और शान्ति का निवास नहीं होगा।
    
🔶 आत्मसन्तोष के अलावा समाज का सहयोग व भगवान् का अनुग्रह कैसे मिल सकता है, शानदार जिन्दगी कैसे जीनी चाहिए? इसके लिए हमारे यहाँ ट्रेनिंग चलती है। ट्रेनिंग तो पहले भी चलती थी। नौ दिन की, पाँच दिन व एक माह की, पर अब हमने सारे के सारे शान्तिकुञ्ज को विश्वविद्यालय के रूप में परिणत कर दिया है। कानूनन तो यह विश्वविद्यालय नहीं है, क्योंकि विश्वविद्यालय के लिए तो खानापूर्ति की जाती है, वह बहुत बड़ी है लेकिन पुराने समय में नालन्दा में कोई खानापूर्ति नहीं हुई थी और न तक्षशिला में कोई खानापूर्ति हुई थी। ये गवर्नमेण्ट से कोई सम्बन्धित नहीं हुए थे। हमारा यह विश्वविद्यालय इसी प्रकार का है।

🔷 आज मनुष्य को जीना कहाँ आता है? जीना भी एक कला है। सब आदमी खाते हैं, पीते हैं, सोते हैं और मौत के मुँह में चले जाते हैं, किन्तु जीना नहीं जानते। जीना बड़ी शानदार चीज है। इसको संजीवनी विद्या कहते हैं—जीवन जीने की कला। यहाँ हम अपने विश्वविद्यालय में, शान्तिकुञ्ज में जीवन जीने की कला सिखाते हैं और यह सिखाते हैं कि आज के गए-बीते जमाने में आप अपनी नाव पार करने के साथ-साथ सैकड़ों आदमियों को बिठाकर पार किस तरह से लगा पाते हैं? नाव चलाना भी एक कला है। हम आपको नाव दे दें व आपको नदी के किनारे छोड़ दें, कहें कि आप जाइए तो इतने मात्र से आप नाव नहीं चला सकेंगे। कहीं लहरों के चक्कर में पड़ेंगे और बहते हुए चले जाएँगे। नाव को डुबो देंगे और आप भी डूब जाएँगे। लेकिन अगर आपको ट्रेनिंग मिली हो तो आप सकुशल पार हो जाएँगे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 165)

🌹  तीन संकल्पों की महान् पूर्णाहुति

🔷 युग संधि २००० तक चलेगी। तब तक हमें स्थूल या सूक्ष्म शरीर से सक्रिय रहना है। हमें सौंपे गए सभी कामों को पूरा करके ही जाना है। परिजन अब तक के सभी महत्त्वपूर्ण कार्यों में साथ देते, हाथ बँटाते और कदम से कदम मिलाकर चलते रहे हैं। विश्वास किया गया है कि इस अग्निपरीक्षा की घड़ी में वे साथ नहीं छोड़ेंगे, मुँह नहीं मोड़ेंगे। इस श्रेय साधना में सभी प्राणवानों की बराबर की भागीदारी रहेगी।

🔶 साधना से उपलब्ध अतिरिक्त सामर्थ्य को विश्व के मूर्धन्य वर्गों को हिलाने उलटने में लगाने का हमारा मन है। अच्छा होता सुई और धागे को आपस में पिरो देने वाले कोई सूत्र मिल जाते। अन्यथा सर्वथा अपरिचित रहने की स्थिति में तारतम्य बैठने में कठिनाई होगी। मूर्धन्यों में सत्ताधीश, धनाध्यक्ष, वैज्ञानिक और मनीषी वर्ग का उल्लेख है। यह सर्वोच्च स्तर के भी होंगे और सामान्य स्तर के भी। सर्वोच्च स्तर वालों की सूक्ष्मता जहाँ पैनी होती है वहाँ वे अहंकारी और आग्रही भी कम नहीं होते। इसलिए मात्र उच्च वर्ग तक ही अपने को सीमित न रखकर हम मध्यम वृत्ति के इन चारों की भी अपनी पकड़ में ले रहे हैं ताकि बात नीचे से उठते-उठते ऊपर तक पहुँचने का भी कोई सिलसिला बने।

🔷 दूसरा वर्ग जाग्रत आत्माओं का है, इसका उत्पादन सदा से भारतभूमि में अधिक होता रहा है। महामानव, ऋषि, मनीषी, देवता यहाँ जितने जन्मे हैं, उतने अन्यत्र कहीं नहीं। यही हमारे लिए समीप भी पड़ा है। अस्तु प्रयत्न करेंगे कि जहाँ कहीं भी पूर्व संचित संस्कारों वाली आत्माएँ दृष्टिगोचर हों उन्हें समय का संदेश सुनाएँ, युगधर्म बताएँ और समझाएँ कि यह समय व्यामोह में कटौती करके, किसी प्रकार निर्वाह भर में संतोष करने का है। जो हस्तगत है उसे बोया उगाया और हजार गुना बढ़ाया जाना चाहिए। हम अकेले ही उगे, बढ़े और गलकर समाप्त हो गए तो यह एक दुर्घटना होगी। एक से हजार वाली बात सोची और कही जा रही है तो उसकी प्रत्यक्ष परिणति भी वैसी ही होनी चाहिए। प्रज्ञा परिवार बड़ा है। फिर भारत भूमि की उर्वरता कम नहीं है। इसके अतिरिक्त अपनी योजना विश्वव्यापी है।

🔶 उसकी परिधि में अकेला भारत ही नहीं समूचा संसार भी आता है। अस्तु प्रयत्न यह चला है कि विचार-क्रान्ति की प्रक्रिया को परिस्थितियों के अनुरूप व्यापक बनाने के लिए जाग्रत आत्माओं का समुदाय हर क्षेत्र में हर देश में मिले। कार्य पद्धतियाँ क्षेत्रीय वातावरण के अनुरूप बनती रहेंगी, पर लक्ष्य एक ही रहेगा-ब्रेन वाशिंग, विचार परिवर्तन, प्रज्ञा अभियान। हम तीर की तरह सनसनाते हुए ही लक्ष्य तक पहुँचने का प्रयत्न करेंगे। जिनमें इस प्रकार की जीवटता होगी, वे अनुभव करेंगे कि उन्हें कोई कोंचता, कुरेदता, झकझोरता, घसीटता और बाधित करता है। यों ऐसे लोग समय की पुकार पर अंतरात्मा की प्रेरणा से भी जग पड़ते हैं। ब्रह्ममुहूर्त में मुर्गा बाँग लगाने के लिए उठ खड़ा होता है, तो कोई कारण नहीं कि जिनमें प्राण चेतना विद्यमान है, वे महाकाल का आमंत्रण न सुनें ओर पेट-प्रजनन की आड़ में व्यस्तता और अभावग्रस्तता की ही बहानेबाज़ी करते रहें। समय की पुकार और हमारी मनुहार का संयुक्त प्रभाव कुछ भी न पड़े ऐसा हो ही नहीं सकता। विश्वास किया गया है कि इस स्तर का एक शानदार वर्ग उभरकर ऊपर आएगा और सामने ही कटिबद्ध खड़ा दृष्टिगोचर होगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.191

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.23

👉 प्रज्ञायुग में परिवार की जिम्मेदारी समझी जाएगी

🔷 प्रज्ञा युग में हर व्यक्ति सामाजिक नीति मर्यादाओं को महत्व देगा। कोई ऐसा काम न करेगा जिससे मानवी गरिमा एवं समाज व्यवस्था को आँच आती हो। शिष्टाचार, सौजन्य, सहयोग, ईमानदारी, वचन का पालन, निश्छलता जैसी कसौटियों पर पारस्परिक व्यवहार खरा उतरना चाहिए। अनीति का न तो सहयोग किया जाय और न प्रत्यक्ष परोक्ष समर्थन। सामाजिक सुव्यवस्था के लिए यह आवश्यक है कि मूढ़ मान्यताओं का, अवाँछनीय प्रचलनों का, हानिकारक कुरीतियों का, विरोध किया जाय। इस प्रकार छल, शोषण उत्पीड़न जैसे अनाचारों से भी असहयोग, प्रतिरोध एवं संघर्ष का रुख अपनाया जाय। अनीति आचरण एवं अनुपयुक्त प्रचलनों को समान रूप से अहितकर माना जायेगा और उन्हें अपनाना तो दूर कोई उनका समर्थन तक करने को सहमत न होगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1984 पृष्ठ 30
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1984/July/v1.30

मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

👉 ईश्वर क्या है?

🔶 टेहरी राजवंश के 15-16 वर्षीय राजकुमार के हृदय में एक  प्रश्न उठा  ईश्वर क्या है?

🔷 वह स्वामी रामतीर्थ के चरणों में पहुँचा और प्रणाम करके पूछाः "स्वामी जी ! ईश्वर क्या है ?"

🔶 उसकी प्रबल जिज्ञासा को देखकर रामतीर्थ जी ने कहा, "अपना परिचय लिखकर दो।"

🔷 उसने लिखा, "मैं अमुक राजा का पुत्र हूँ और अमुक मेरा नाम है।'

🔶 रामतीर्थ जी ने पत्र देखा और कहा, "अरे राजकुमार ! तुम नहीं जानते कि तुम कौन हो। तुम उस निरक्षर, अनाड़ी आदमी की तरह हो, जो राजा से मिलना चाहता है पर अपना नाम तक नहीं लिख सकता। क्या राजा उससे मिलेगा ? अतः तुम अपना नाम ठीक से बताओ, तब ईश्वर तुमसे मिलेगा।"

🔷 लड़के ने कुछ देर चिंतन करके कहा, "अब मैं समझा मैंने केवल शरीर का पता बताया। मैं मन हूँ। क्या वास्तव में ऐसा ही है?"

🔶 "अच्छा कुमार ! यदि यह बात सही है तो बताओ कि आज सवेरे तुमने जो भोजन किया था, वह तुम्हारे शरीर में कहाँ रखा है?"

🔷 "जी, मेरी बुद्धि वहाँ तक नहीं पहुँचती और मेरा मन इसकी धारणा नहीं कर सकता।"

🔶 "प्यारे राजकुमार ! तुम्हारी बातों से सिद्ध होता है कि तुम मन, बुद्धि नहीं हो। तो तुम खूब विचारो, तब मुझे बताओ कि तुम क्या हो ? उसी समय ईश्वर तुम तक आ जायेगा।"

🔷 खूब मनन कर लड़का बोला, "मेरा मन, मेरी बुद्धि वहाँ तक जाने में जवाब दे देते हैं।"

🔶 "अब तक तुम्हारी बुद्धि जहाँ तक पहुँची है, उस पर विचार करो कि 'मैं शरीर नहीं हूँ, मैं मन नहीं हूँ, मैं बुद्धि नहीं हूँ।' यदि ऐसा है तो इसकी अनुभूति करो। अमल में लाओ। यदि तुम सत्य का केवल इतना अंश भी व्यवहार में लाना सीख जाते हो तो तुम्हारी समस्त शोक-चिंताएँ समाप्त हो जायेंगी।" बालक को यह जताने में रामतीर्थ जी द्वारा कुछ उपदेश दिया गया कि वह स्वयं क्या है।

🔷 इसके बाद रामतीर्थ जी द्वारा दिन भर में किये गये कार्यों का विवरण पूछने पर राजकुमार ने अपने जागने, स्नान व भोजन करने, पढ़ने एवं चिट्ठियाँ लिखने आदि का ब्यौरा बताया। रामतीर्थ जी- "राजकुमार! इन छोटे-छोटे कामों के अतिरिक्त तुमने अगणित कार्य किये हैं।"

🔶 राजकुमार किंकर्तव्यविमूढ़ होकर उनकी बात पर मनन करने लगा।

🔷 रामतीर्थ जीः "तुम भोजन करते हो, उसे आमाशय में पहुँचाते हो, उसका रस बनाते हो, रक्त, मांस, मज्जा बनाते हो, हृदयगति चलाते हो, शरीर की शिरा-शिरा में रक्त का संचार करते हो। तुम्हीं बाल उगाते हो, शरीर के प्रत्येक अंग को पुष्ट करते हो। अब ध्यान दो कि कितने कार्य, कितनी क्रियाएँ तुम प्रत्येक क्षण करते रहते हो।"

🔶 लड़का बारम्बार सोचने लगा और बोलाः "महाराज जी! वस्तुतः इस शरीर में हजारों क्रियाएँ एक साथ हो रही हैं, जिन्हें बुद्धि नहीं जानती, मन जिनसे बेखबर है और फिर भी वे सब क्रियाएँ हो रही हैं। इन सबका कारण अवश्य मैं ही हो सकता हूँ। इन सबका कर्ता मैं ही हूँ। अतः मेरा यह कथन सर्वथा गलत था कि मैंने कुछ ही काम किये हैं।"

🔷 रामतीर्थ जी ने शरीर में इच्छा और अनिच्छा से होने वाले कार्यों के बारे में समझाते हुए कहाः "लोग यह भयंकर भूल करते हैं कि केवल उन्हीं कार्यों को अपने किये हुए मानते हैं जो मन अथवा बुद्धि के माध्यम से होते हैं और उन सब कार्यों को अस्वीकार कर देते हैं जो मन अथवा बुद्धि के माध्यम के बिना सीधे-सीधे हो रहे हैं। इस भूल तथा लापरवाही से ही वे अपने शुद्ध स्वरूप को मन के बंदीगृह में बंदी बना लेते हैं। इस प्रकार वे असीम को ससीम और परिच्छिन्न (सीमित) बनाकर दुःख भोगते हैं। ईश्वर तुम्हारे भीतर हैं और वह ईश्वर तुम स्वयं हो।

🔶 तुम जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं का साक्षी हो। तुम सर्वत्र विराजमान हो। तुम्हारी शक्ति सर्वव्यापिनी है। वही सितारों को चमका रही है, वही तुम्हारी आँखों में देखने की शक्ति दे रही है, वही नदियों को प्रवाहित कर रही है, वही ब्रह्माण्डों को क्षण-प्रतिक्षण बना-बिगाड़ रही है। क्या तुम वह शक्ति नहीं हो ? सचमुच तुम वही शक्ति हो, वही चैतन्य हो जो मन बुद्धि से परे है, जो सम्पूर्ण विश्व का शासन कर रहा है। वही आत्मदेव तुम हो, वही अज्ञेय, वही तेज, तत्त्व, शक्ति, जो जी चाहे कह लो, वही सर्वरूप जो सर्वत्र विद्यमान है, वही तुम हो।" इस प्रकार स्वामी रामतीर्थ ने बालक को आत्मानुभव की झलक चखा दी और वह उनके मार्गदर्शन अनुसार आत्मानुसंधान कर आत्मस्वरूप में स्थित हुआ, ज्ञातज्ञेय हो गया।

🔷 राजकुमारः "मैंने सवाल किया था कि ईश्वर क्या है? और मुझे पता चल गया कि मेरा अपना आपा ही ईश्वर है। मुझे अपने को ही जानना था। मेरे जानने से ईश्वर का पता लग गया।"

🔶 'ईश्वर क्या है?', 'मैं कौन हूँ ?' – ये प्रश्न बहुत सरल लगते हैं लेकिन इनका जवाब पाने की जिज्ञासा जिनके हृदय में जागती है, उनके माता-पिता धन्य हैं, कुल गोत्र धन्य हैं। धन्या माता पिता धन्यो.... ऐसे लोग बहुत कम होते हैं। जिन्हें इसका जवाब पाये बिना चैन नहीं आता, ऐसे तो कोई-कोई विरले होते हैं और ऐसे सच्चे जिज्ञासु को ईश्वर-तत्त्व का अनुभव किये हुए किन्हीं महापुरुष की शरण मिल जाये तो फिर इस खोज को पूर्ण होने में बहुत देर नहीं लगती।

🔷 भगवान श्रीराम जी के गुरुदेव वसिष्ठजी महाराज कहते हैं, "हे राम जी! ज्ञान समझना मात्र है, कुछ यत्न नहीं। संतों के पास जाकर प्रश्न करना कि 'मैं कौन हूँ? जगत क्या है? जीव क्या है? परमात्मा क्या है? संसार-बंधन क्या है? और इससे तरकर कैसे परम पद को प्राप्त होऊँ?' फिर ज्ञानवान जो उपदेश करें, उसके अभ्यास से आत्मपद को प्राप्त होगा, अन्यथा न होगा।"

🔶 में भी यही युक्ति बताते हुए कहते हैं, "तुम अपने-आपसे पूछो- "मैं कौन हूँ?' खाओ, पियो, चलो, घूमो, फिर पूछोः 'मैं कौन हूँ?'

🔷 'मैं विक्रम हूँ, मैं मनीषा हूँ, मै मंदीप हूँ, मै सुदर्शन हूँ ।'

🔶 यह तो तुम्हारी देह का नाम है। तुम कौन हो ? अपने को पूछा करो। जितनी गहराई से पूछोगे, उतना दिव्य अनुभव होने लगेगा। एकांत में शांत वातावरण में बैठकर ऐसा पूछो.... ऐसा पूछो कि बस, पूछना ही हो जाओ। पूछो की में पिछले जनम में भी था तो फिर जिसको जलाया गया, दफनाया गया, पानी में डुबाया गया वो कोन था, वो शरीर था, तुम कौन हो???

🔷 लगे रहो। खूब अभ्यास करोगे तब 'मैं कौन हूँ? ईश्वर क्या है?' यह प्रकट होने लगेगा और मन की चंचलता मिटने लगेगी, बुद्धि के विकार नष्ट होने लगेंगे तथा शरीर के व्यर्थ के विकार शांत होने लगेंगे। यदि ईमानदारी से साधना करने लगो न, तो छः महीने में वहाँ पहुँच जाओगे जहाँ छः साल से चला हुआ व्यक्ति भी नहीं पहुँच पाता है। तत्त्वज्ञान हवाई जहाज की यात्रा है।"

🔶 महापुरुषों के सत्संग का जीवन में जितना आदर होता है, जितनी 'ईश्वर क्या है ? मैं कौन हूँ ?' यह जानने की जिज्ञासा तीव्र होती है, उतनी महापुरुषों की कृपा शीघ्र पचती है और जीव चौरासी लाख योनियों की भटकने से बचकर अपने ईश्वरत्व का, अपने ब्रह्मत्व का साक्षात्कार कर लेता है।

👉 वैभव की कमी नहीं, पर आवश्यकता जितना हो समेटें

🔷 पक्षियों को देखिये! पशुओ को देखिये! वे प्रातः से लेकर सायंकाल तक उतनी खुराक बीनते चलते हेैं, जितनी वे पचा सकते हैं। पृथ्वी पर बिखरे चारे- दाने की कमी नहीं। सबेरे से शाम तक घाटा नहीं पड़ता। पर लेते उतना ही हैं, जितना मुँह माँगता और पेट सम्हालता है। यही प्रसन्न रहने की नीति है।       

🔶 जब उन्हें स्नान का मन होता है, तब इच्छित समय तक स्नान करते हैं। उतना ही बड़ा घोंसला बनाते हैं, जिसमें उनका शरीर समा सके। कोई इतना बड़ा नहीं बनाता, जिसमें समूचे समुदाय को बिठाया सुलाया जाय।

🔷 पेड़ पर देखिये हर पक्षी ने अपना छोटा घोंसला बनाया हुआ है। जानवर अपने रहने लायक छाया का प्रबन्ध करते हैं। वे जानते हैं कि सृष्टा के सम्राज्य में किसी बात की कमी नहीं। जब जिसकी जितनी जरूरत है, आसानी से मिल जाता है। आपस में लड़ने का झंझट क्यों मोल लिया जाय? हम इतना ही लें, जितनी तात्कालिक आवश्यकता हो। 

🔶 ऐसा करने से हम सुख- शांतिपूर्वक रहेंगे भी और उन्हें भी रहने देंगे, जो उसके हकदार हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 13 Dec 2017


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