गुरुवार, 17 सितंबर 2020

👉 अभागा राजा और भाग्यशाली दास:-

एक बार एक गुरुदेव अपने शिष्य को अहंकार के ऊपर एक शिक्षाप्रद कहानी सुना रहे थे।

एक विशाल नदी जो की सदाबहार थी उसके दोनो तरफ दो सुन्दर नगर बसे हुये थे! नदी के उस पार महान और विशाल देव मन्दिर बना हुआ था! नदी के इधर एक राजा था राजा को बड़ा अहंकार था कुछ भी करता तो अहंकार का प्रदर्शन करता वहाँ एक दास भी था बहुत ही विनम्र और सज्जन!

एक बार राजा और दास दोनो नदी के वहाँ गये राजा ने उस पार बने देव मंदिर को देखने की ईच्छा व्यक्त की दो नावें थी रात का समय था एक नाव मे राजा सवार हुआ और दुजि मे दास सवार हुआ दोनो नाव के बीच मे बड़ी दूरी थी!

राजा रात भर चप्पू चलाता रहा पर नदी के उस पार न पहुँच पाया सूर्योदय हो गया तो राजा ने देखा की दास नदी के उसपार से इधर आ रहा है! दास आया और देव मन्दिर का गुणगान करने लगा तो राजा ने कहा की तुम रातभर मन्दिर मे थे! दास ने कहा की हाँ और राजाजी क्या मनोहर देव प्रतिमा थी पर आप क्यों नही आये!

अरे मेने तो रात भर चप्पू चलाया पर .....

गुरुदेव ने शिष्य से पुछा वत्स बताओ की राजा रातभर चप्पू चलाता रहा पर फिर भी उसपार न पहुँचा? ऐसा क्यों हुआ? जब की उसपार पहुँचने मे एक घंटे का समय ही बहुत है!

शिष्य - हॆ नाथ मैं तो आपका अबोध सेवक हुं मैं क्या जानु आप ही बताने की कृपा करे देव!

ऋषिवर - हॆ वत्स राजा ने चप्पू तो रातभर चलाया पर उसने खूंटे से बँधी रस्सी को नही खोला!

और इसी तरह लोग जिन्दगी भर चप्पू चलाते रहते है पर जब तक अहंकार के खूंटे को उखाड़कर नही फेकेंगे आसक्ति की रस्सी को नही काटेंगे तब तक नाव देव मंदिर तक नही पहुंचेगी!

हॆ वत्स जब तक जीव स्वयं को सामने रखेगा तब तक उसका भला नही हो पायेगा! ये न कहो की ये मैने किया ये न कहो की ये मेरा है ये कहो की जो कुछ भी है वो सद्गुरु और समर्थ सत्ता का है मेरा कुछ भी नही है जो कुछ भी है सब उसी का है!

स्वयं को सामने मत रखो समर्थ सत्ता को सामने रखो! और समर्थ सत्ता या तो सद्गुरु है या फिर इष्टदेव है , यदि नारायण के दरबार मे राजा बनकर रहोगे तो काम नही चलेगा वहाँ तो दास बनकर रहोगे तभी कोई मतलब है!

जो अहंकार से ग्रसित है वो राजा बनकर चलता है और जो दास बनकर चलता है वो सदा लाभ मे ही रहता है!

इसलिये नारायण के दरबार मे राजा नही दास बनकर चलना!

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग २८)

नींद, जब आप होते हैं—केवल आप

सम्भावनाएँ केवल विभु  में ही नहीं, अणु में भी है। पर्वत में ही नहीं, राई में भी बहुत कुछ समाया है। जिन्हें हम तुच्छ समझ लेते हैं, क्षुद्र कहकर उपेक्षित कर देते हैं, उनमें भी न जाने कितना कुछ ऐसा है, जो बेशकीमती है। जागरण के महत्त्व से तो सभी परिचित हैं। महर्षि कहते हैं कि निद्रा भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। चौथी वृत्ति के रूप में इसके स्वरूप और सत्य को समाधिपाद के दसवें सूत्र में उद्घाटित करते हैं-
अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा ॥ १/१०॥
शब्दार्थ-अभाव-प्रत्यय-आलम्बना= अभाव की प्रतीति को आश्रय करने वाली; वृत्तिः =वृत्ति; निद्रा=निद्रा है।
  
अर्थात् मन की यह वृत्ति, जो अपने में किसी विषय वस्तु की अनुपस्थिति पर आधारित होती है-निद्रा है। यही निद्रा ही सार्थक और यथार्थ परिभाषा है। नींद के अलावा हर समय मन अनेकों विषय वस्तुओं से भरा रहता है। भारी भीड़ होती है मन में। विचारों की रेल-पेल, अन्तर्द्वन्द्वों की धक्का-मुक्की क्षण-प्रतिक्षण हलचल मचाए रहती है। कभी कोई आकांक्षा अंकुरित होती है, तो कभी कोई स्मृति मन के पटल पर अपना रेखा चित्र खींचती है, यदा-कदा कोई भावी कल्पना अपनी बहुरंगी छटा बिखेरती है। हमेशा ही कुछ न कुछ चलता रहता है। यह सब क्षमता तभी होती है, जब सोये होते हैं गाढ़ी नींद में। मन का स्वरूप और व्यापार मिट जाता है, केवल होते हैंआप—बिना किसी उपाधि और व्याधि के।
  
परम पूज्य गुरुदेव कहते थे-नींद के क्षण बड़े असाधारण और आश्चर्य जनक होते हैं। कोई इन्हें समझ ले और सम्हाल ले, तो बहुत कुछ पाया जा सकता है। ऐसा होने पर साधकों के लिए यह योगनिद्रा बन जाती है, जबकि सिद्धजन इसे समाधि में रूपान्तरित कर लेते हैं। दिन के जागरण में जितनी गहरी साधनाएँ होती हैं, उससे कहीं अधिक गहरी और प्रभावोत्पादक साधनाएँ रात्रि की नींद में हो सकती है। वैदिक संहिताओं में अनेकों प्रकरण ऐसे हैं, जिनसे गुरुदेव के वचनों का महत्त्व प्रकट होता है।
  
ऋग्वेद के रात्रि सूक्त में कुशिक-सौभर व भारद्वाज ऋषि ने रात्रि की महिमा का बड़ा ही तत्त्वचिंतन पूर्ण गायन किया है। इस सूक्त के आठ मंत्र निद्रा को अपनी साधना बनाने वाले साधकों के लिए नित्य मननीय है। इनमें से छठवें मंत्र में ऋषि कहते हैं-‘यावयावृक्यं वृकं यवय स्तेनभूर्म्ये। अथा नः सुतरा भव’॥ ६॥ ‘हे रात्रिमयी चित्शक्ति! तुम कृपा करके वासनामयी वृकी तथा पापमय वृक को अलग करो। काम आदि तस्कर समुदाय को भी दूर हटाओ। तदन्तर हमारे लिए सुख पूर्वक तरने योग्य बन जाओ। मोक्षदायिनी एवं कल्याणकारिणी बन जाओ।’

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ५२
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 Don’t run away from problems: Face them

Very often it is observed that people try to avoid or run away from pressing problems, instead of finding solutions to them. The amount of time that we waste in searching the modes and methods of escaping from a problem is much more than what is required in finding a solution to it. In fact, we should cultivate foresight in anticipating problems, big or small, relating to our home or job and should also search for and keep handy possible solutions. When a problem does crop up, we should develop courage to face it. If your inner-self says ‘I can overcome this problem’, you have already won half the battle.

Every person feels that his / her problem is far more severe than that of others whereas this may not be true. People are often seized by the negative thought ‘What sins have I committed that I am not getting rid of my problems?’ Thus they waste all their time in blaming circumstances or fate for their problems. Have you ever calmly thought: what could be the real cause of these problems? Accept it or not, all your problems have been generated by your own unorganized actions, lack of farsightedness in planning, dearth of practicality and wrong assessment of your own strengths.

Always remember that once you firmly resolve to find a solution to the impending problem, the whole scenario and the concerned people would change. The circumstances or God do not help a person who runs away from the problems instead of facing them boldly and wisely. Therefore, don’t run away from problems; face them.

✍🏻 Pt Shriram Sharma Acharya

बुधवार, 16 सितंबर 2020

👉 माँ तो माँ होती है

आज फिर से साहब का दिमाग उचट गया था ऑफिस में! बाहर बारिश हो रही थी, मन किया कि पास वाले ढाबे पर चलकर कुछ खाया जाए! सो ऑफिस का काम फटाफट निपटा कर पहुँच गए साहब ढाबे में!

रामू दौड़ता हुआ आया, हाथ  में पानी का गिलास मेज पर रखते हुए साहब को नमस्ते की और बोला "क्या बात है साहब काफी दिनों बाद आये हैं आज आप ?"

"हाँ  रामू , मैं शहर से बाहर गया था!" साहब ने जबाब दिया!
"आप बैठो साहब, मैं आपके लिए कुछ खाने को लाता हूँ!"

वो एक साधारण सा ढाबा था, मगर पता नहीं इतने बड़े साहब को वंहा आना बड़ा ही अच्छा लगता था! साहब को कुछ भी आर्डर देने की जरुरत नहीं पड़ती थी, बल्कि उनका  मनपसंद  भोजन अपने आप ही रामू ले आता था! स्वाद भी बहुत भाता था साहब को यहां के खाने का! पता नहीं रामू को कैसे पता लग जाता था की साहब को कब क्या अच्छा लगेगा! और पैसे भी काफी कम लगते थे यहां पर!

साहब बैठे सोच ही रहे थे की चिर-परिचित पकोड़ों की खुशबु से साहब हर्षित हो गए!

"अरे रामू, तू बड़ा जादूगर है रे! इस मौसम में इससे  अच्छा और कुछ हो ही नहीं सकता है!" साहब पकोड़े खाते हुए बोले!

"अरे साहब, पैट भर के खाईयेगा, इसके बाद अदरक वाली चाय भी लाता हूँ!" रामू बोला!

साहब का मूड एकदम फ्रेश हो गया था!

"देखो आज मैं तुम्हारे ढाबे के कुक से मिलकर ही जाऊँगा, बड़ा ही अच्छा खाना बनाता है वो!" साहब ने फिर से अपनी पुरानी जिद्द दोहरा दी!

हर बार रामू टाल देता था, मगर आज साहब ने भी जिद्द पकड़ ली थी कि रसोइये से मिलकर ही रहूँगा, उसका शुक्रिया अदा करूँगा!
साहब जबरदस्ती रसोई में घुस गए! आज रामू की एक ना चल पायी!
अंदर का नजारा साहब ने  देखा की एक बूढी सी औरत चाय बना रही थी, वो बहुत खुश थी!

"माँ" साहब के मुंह से निकला,

"मैने तो आपको वृद्धाश्रम में डाल दिया था.....!"

"हाँ बेटा, मगर जो सुख मेरे को यहाँ तुझे खाना खिला कर मिलता है वो वहां नहीं है!"

आज साहब को पता लग गया कि रामू को उसकी पसंद की डिशेज कैसे पता है और वहां पर पैसे कम क्यों लगते हैं!

👉 चुनौती को कौन स्वीकार करे?

यों इस देश में छप्पन लाख धर्म का व्यवसाय करके अपनी रोटी कमाने वाले पेशेवर धर्मसेवक मौजूद हैं जो दान दक्षिण के ऊपर अपना निर्वाह करते हैं और जिनसे स्वभावतः यह आशा की जानी चाहिए कि वे मनुष्य जाति के भौतिक एवं आत्मिक उत्कर्ष में कुछ योग दें। पर उस ओर तो अन्धेरा ही दीखता है। उजाला हमें अपने हृदय का तेल जलाकर करना पड़ेगा। कार्यव्यस्त गृहस्थ लोगों के द्वारा ही अब तक संसार की बड़ी प्रवृत्तियाँ चली हैं। युग-निर्माण के लिए भी वे बहुत कुछ कर सकते हैं।

अखण्ड-ज्योति परिवार के लोगों से इस प्रकार की आशा की जा सकती है। उत्कृष्टता और भावना की दृष्टि से हम लोग संख्या में थोड़े होते हुए भी एक बड़ी शक्ति के रूप में संगठित हैं। परमार्थ का लक्ष हमें प्रिय है। आत्मा में ईश्वरीय प्रकाश उत्पन्न करने के लिए हम लोग अपने को साधना और तपश्चर्या के द्वारा इस योग्य बना चुके हैं कि जो कुछ कहें उसे दूसरे सुनें, जो कुछ करें उसका दूसरे अनुकरण करें, कुछ प्रेरणा करें तो दूसरे उस पर चलना शुरू करें। हमारा लक्ष सत्य है, हमारे साधन शुद्ध हैं, हमारा कर्तृत्व  भावना पूर्ण है तो क्यों हमारी बात सुनी न जायगी? क्यों हमारी प्रेरणा मानी न जायगी?

युग-निर्माण के लिए हमें ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न करना है। जिन दुर्बलताओं और बुराइयों ने जन-मानस पर आधिपत्य जमा रखा है उनकी बुराइयों और हानियों को यदि मनुष्य भली प्रकार समझ ले तो उन्हें छोड़ने कि लिए अवश्य उत्सुक होगा। यदि प्रगति और शान्ति का सच्चा मार्ग उसे विश्वासपूर्वक उपलब्ध हो जाय तो अनैतिक, अपराधपूर्ण, खतरे से भरे हुए दुखदायी रास्ते पर वह क्यों चलेगा? संसार में जितनी भी क्रान्तियाँ हुई हैं उनमें सर्वप्रथम विचार विस्तार ही हुआ है। ज्ञान ही क्रिया का पूर्व रूप है। कोई तभी दृश्य रूप में आता है जब पहले वैसे विचार मन में गहराई तक अपनी जड़ जमा लेते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग २७)

कल्पना में भी है अक्षय ऊर्जा का भंडार

काव्य कला सहित विश्व-वसुधा की समस्त कलाएँ प्रायः इसी रीति से जन्मी, पनपी एवं विकसित हुई हैं। विश्व को चमत्कृत कर देने वाली शोध सृष्टि भी कल्पनाओं के तर्कपूर्ण विवेकयुक्त विचार से सम्बद्ध होने से हुई है। अन्तः भावनाओं एवं तर्कपूर्ण विचार से कल्पना के जुड़ने से इन दोनों के अलावा एक अन्य सुखद परिणति भी होती है और वह परिणति है- जीवन जीने की कला का विकास। जीवन में एक अपूर्व कलात्मकता,लयबद्धता का  सुखद् जन्म। इस सत्य से प्रायः बहुत कम लोग परिचित हो पाते हैं, लेकिन जो परिचित हो जाते हैं-उनका जीवन सुमधुर काव्य की भाँति सुरीला, संगीत की तरह लययुक्त एवं नवीन शोध की भाँति आश्चर्यजनक उपलब्धियों का भण्डार हो जाता है।

उचित कल्पना का संस्पर्श पाकर जीवन बड़े ही आश्चर्य रीति से बदल जाता है। यह बदलाव ऐसा होता है, जैसे कि पारस लोहे के काले-कलूटे टुकड़े का छूकर सुगन्धित स्वर्ण बना दिया हो। कहानी एमिली जेन की है, जो पहले अपने बचपन में कूड़ा-करकट बीनती थी और बाद में विश्व विख्यात अभिनेत्री बन गयी। उसकी जीवन कथा-‘वन्डर ऑप वर्ड्स’ के लेखक जेम्स एलविन का कहना है कि एमिली जब छोटी थी एक दिन वह कूड़ा-करकट से कुछ बीन रही थी। बीनती-बीनती वह थक गयी। साथ कुछ लड़के-लड़कियाँ और भी थे। मनोरंजन के लिए सब मिलकर नाचने लगे। तभी वहाँ से अनविन रोजर्ट का गुजरना हुआ।
  
रोजर्ट ने बच्चों के बीच नृत्य करती हुई एमिली को देखा। उसे संकेत से पास बुलाया और धीरे से कहा—प्यारी बच्ची! तुम अद्वितीय हो, सौंदर्य और कला का अपूर्व मिश्रण तुममें है। तुम चाहो तो क्या नहीं कर सकती? सचमुच ही मैं कुछ भी कर सकती हूँ? एमिली ने पूछा। हाँ, तुम कुछ भी कर सकती हो। इस एक कल्पना ने अन्तः भावनाओं एवं तर्कपूर्ण, विवेक-युक्त विचारों से मिलकर एमिली को नया जन्म दिया, वह एमिली जो कला की देवी मानी जाने लगी। तभी तो परम पूज्य गुरुदेव कहते थे-कल्पना को ख्याली पुलाव मत बनाओ। उसे अपनी शक्ति समझो। अपना ऊर्जा स्रोत बनाओ।
  
कल्पनाओं को यूँ भटकने देना, यूँ ही बहकने देना और उस बहाव में स्वयं भी भटकने व बहने लगना न केवल कल्पना शक्ति की बर्बादी है, बल्कि इससे जीवन भी बर्बाद होता है। ऐसे में विकल्प की यह वृत्ति क्लेश उत्पादक बन जाती है। लेकिन इसका सदुपयोग होने से यह क्लेश निवारक बन जाती है। बस, सब कुछ हम साधकों पर है कि उसे अपनी साधना का साधक तत्त्व बनाते हैं या फिर उसे बाधक बने रहने देते हैं। हमारी योग साधना के खरे होने की कसौटी इसे अपनी साधना का साधक तत्त्व बनाने में है। इस विकल्प वृत्ति की साधना यदि बहिर्मुखी हो तो हमें सांसारिक उपलब्धियों के वरदान देती है और यदि इसे अन्तर्मुखी करलें, कल्पना हमारी धारणा का स्वरूप ले ले, तो हमें यौगिक विभूतियों के वरदान देती है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ५०
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

मंगलवार, 15 सितंबर 2020

👉 मानव-जीवन का श्रृंगार

एक बार श्रीरंग अवधूतजी से एक भक्त ने प्रश्न किया: ‘‘महाराज! हमें श्रेय के दर्शन क्यों नहीं होते और अश्रेय के तो बार-बार होते हैं?’’

श्रीरंगजी बोले: ‘‘वेदशास्त्र और सद्गुरु-संतों का सेवन किये बिना ही श्रेय के दर्शन?’’

‘‘हम तो बहुत वर्षों से वेदशास्त्रों की बातें, कथाएँ आदि सुनते आ रहे हैं परंतु हमें कोई लाभ नहीं हो रहा है। अब तो हम थक गये हैं।’’

श्रीरंगजी: ‘‘भाई ! भगवद्भाव अनुभवगम्य वस्तु है। उसका अनुसरण करते हुए पुरुषार्थ करो तो ही उसका भाव मिलता है। सारी पृथ्वी को खोद डालो, उसमें से गुलाब, मोगरे की सुगंध मिलेगी ही नहीं। फिर आप कहोगे कि पृथ्वी में अमाप पुरुषार्थ करके देख लिया परंतु उसमें तो गुलाब, मोगरे की सुगंध है ही नहीं। मूल बात को समझनेवाला यदि कोई व्यक्ति दो गमले लाये और उसमें मिट्टी भरकर मोगरा व गुलाब के पौधे लगाये। उसमें से सुगंधित पुष्प सामने देखोगे तो तुम्हें विश्वास होगा कि सभी प्रकार के तत्त्व पृथ्वी में ही हैं। उन्हें प्रकट करने के लिए पहले उनका रूपक बनाना पड़ता है। जैसे इन मोगरा-गुलाब की सुवास को पृथ्वी से प्रकट करने के लिए उनके पौधे अथवा बीज हों तो तत्त्व द्वारा प्रकट होते हैं, ऐसे ही वेदशास्त्रों और संतों का सेवन अर्थात् वेदशास्त्रों का स्वाध्याय करो और संतों का सान्निध्य-लाभ लो, सेवा करो व उनके उपदेश के अनुसार आचार-व्यवहार करो। इसके द्वारा अपने भीतर के अशुभ संस्कारों को निर्मूल करो। गुरुगम्य जीवन बनाओ। फिर श्रेय के दर्शन की बात करना।’’

एक बार श्रीरंगजी ने अपने शिष्य को आज्ञा की:‘‘सिद्धपुर में नदी के किनारे ऐसी जगह घास की कुटिया बनाओ जहाँ किसी भी दिशा से लोग गाड़ियाँ लेकर नहीं आ सकें। मुझे पता है कि जीवन का सारा समय तो लोक-संग्रह में दे दिया पर अंतिम पलों के तो हमें खुद ही मालिक होना चाहिए। अंतिम लक्ष्य तो निर्गुण ही होना चाहिए।’’

श्रीरंगजी के मुख से ऐसी बात सुनते ही सारे भक्तों की आँखों से आँसुओं की धाराएँ बहने लगीं। तब महाराजजी उन्हें शांत करते हुए बोले: "मैं कहीं आता-जाता नहीं हूँ। पामरता त्यागो, वीरता का अनुभव करो। मानव-जीवन के क्षण बहुत महँगे हैं, फिर भी उनका मूल्य समझ में नहीं आता। कितनी सारी वनस्पतियों का तत्त्वसार शहद है। इससे वह हर प्रकार की मिठासों में प्रधान है और उत्पत्ति की दृष्टि से भी बहुत कीमती है। तो महामूल्यवान शरीर की कीमत कितनी। यदि मानव-देह इतनी ज्यादा कीमती है तो उसे ऐसे-वैसे नष्ट क्यों कर दें?’’

भक्त ने पूछा: ‘‘स्वामीजी! ऐसे मूल्यवान मानव-जीवन का श्रृंगार क्या है?’’

‘‘ब्रह्मचर्य, मौन-व्रत, सत्य और मीठी वाणी, मित भाषण, मिताहार, सत्य दर्शन, सत्य श्रवण, सत्य विचार और निष्काम कर्म - ये सारे मानव-जीवन के व्रत हैं किंतु ‘भगवत्प्रेम’ ही मानव-जीवन का श्रृंगार है।’’

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग २६)

कल्पना में भी है अक्षय ऊर्जा का भंडार

जीवन जागृति का संदेश देने के पश्चात् समाधिपाद के नवें सूत्र में योग सूत्रकार महर्षि तीसरी वृत्ति का खुलासा करते हुए कहते हैं-
शब्द ज्ञानानुयाती वस्तु शून्यो विकल्पः॥ १/९॥
  
अर्थात् शब्दों के जोड़ से हर एक का परिचय है। हम सभी अपने जीवन के क्षणों को कल्पनाओं से सँवारते रहते हैं। कई बार ये कल्पनाएँ हमारे अतीत से जुड़ी होती हैं और कई बार हम इन कल्पनाओं के धागों से अपने भविष्य का ताना-बाना बुनते हैं। हम में से बहुसंख्यक कल्पना करने के इतने आदी हो चुके हैं कि मन ठहरने का नाम ही नहीं लेता। किसी भी कार्य से उबरते ही कल्पनाओं के हिडोंले में झूलने लगता है। भाँति-भाँति की कल्पनाएँ, रंग-बिरंगी और बहुरंगी कल्पनाएँ, कभी-कभी तो विद्रूप और भयावह कल्पनाएँ चाहे-अनचाहे हमारे मन को घेरे रहती हैं। कभी हम इनकी सम्मोहकता में खो जाते हैं, तो कभी इनकी भयावहता के समक्ष हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। स्थिति यहाँ तक है कि कल्पना रस हमारा जीवन रस बन चुका है।
  
कल्पना रस में डूबे और विभोर रहने के बावजूद हमने इसे ठीक तरह से पहचाना नहीं है। परम पूज्य गुरुदेव इस सम्बन्ध में कहा करते थे- कल्पनाएँ सदा ही कोरी और खोखली नहीं होती, इन्हें ऊर्जा व शक्ति के स्रोत के रूप में भी अनुभव किया जा सकता है। जो योगी ऐसा कर पाते हैं, वे ही सही ढंग से मन की विकल्प वृत्ति का सदुपयोग करना जानते हैं। कैसे किया जाय यह सदुपयोग? इस प्रश्न का पहला बिन्दु है कि कल्पना में निहित शक्ति को उसकी सम्भावनाओं को पहचानिये। यह समस्त सृष्टि ब्रह्म की कल्पना ही तो है, हम सब उसके सनातन अंश हैं। ऐसी स्थिति में हमारी कल्पनाओं में भी सम्भावनाओं के अनन्त बीज छुपे हैं।
  
कल्पना में समायी शक्ति की सम्भावनाओं पर विश्वास करने के बाद दूसरा बिन्दु है-कल्पनाओं की दिशा। गुरुदेव का कहना था हमें सदा ही विधेयात्मक कल्पनाएँ करनी चाहिए, क्योंकि निषेधात्मक कल्पनाएँ हमारी अन्तःऊर्जा को नष्ट करती हैं, जबकि विधेयात्मक कल्पनाएँ हमारे अन्तःकरण को विशद् ब्रह्माण्ड की ऊर्जा  धाराओं से जोड़ती हैं। उसे ऊर्जावान् और शक्तिसम्पन्न बनाती है। इस तकनीक का तीसरा बिन्दु है - कल्पनाओं को अपनी अभिरुचि के अनुसार अन्तः भावनाओं अथवा विवेकपूर्ण विचार से जोड़ना। इस प्रक्रिया के परिणाम बड़े ही सुखद और आश्चर्यजनक होते हैं। अन्तः भावनाओं  से संयुक्त होकर कल्पना कला को जन्म देती है, जबकि विवेकपूर्ण विचार से जुड़कर कल्पना शोध की सृष्टि करती है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ४९
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 आज की महानतम आवश्यकता

युग-निर्माण का महान कार्य आज की प्रचण्ड आवश्यकता है। जिस खंडहर स्थिति में हमारे शरीर, मन और समाज के भग्नावशेष पड़े हैं उन्हें उसी दशा में पड़े रहने देने की उपेक्षा जिन्हें सन्तोष दे सकती है उन्हें ‘जीवित मृत’ ही कहना पड़ेगा। आज बेशक ऐसे ही लोगों की संख्या अधिक है, जिन्हें अपने काम से काम, अपने मतलब से मतलब—रखने की नीति पसंद है। पर ऐसे लोगों का बीज नष्ट नहीं हुआ है जो परमार्थ की महत्ता समझते हैं और लोकहित के लिए, विश्व-मानव के उत्कर्ष के लिए यदि उन्हें कुछ प्रयत्न या त्याग करना पड़े तो उसके लिए भी इनकार न करेंगे।

युग-निर्माण जैसी युग की पुकार सर्वथा अनसुनी, नितान्त उपेक्षित पड़ी रहे और उसके लिए कोई अपनी प्रसन्नता, अभिरुचि प्रकट न करे और कोई उसमें कुछ हाथ न बटावे अभी इतने आत्मिक पतन का जमाना नहीं आया है। नष्ट−भ्रष्ट स्वास्थ की पीड़ा से तड़पते हुए रुग्ण मनुष्यों को निरोग और दीर्घजीवी देखने के लिए—क्या किसी की आँखें उत्सुक नहीं? दुर्बुद्धि और दुराचार में डूबे हुए नर-पिशाच की तरह मानसिक अशान्ति की नारकीय ज्वाला में जलते हुए लोगों को सज्जनता, सद्भावना, स्नेह और सत्कर्मों में संलग्न रहकर शान्ति एवं सन्तोष के साथ मुसकराते हुए देखने के लिए क्या किसी का मन न हुलसेगा?

द्वेष, असहयोग, अविवेक, अन्धविश्वास एवं उच्छृंखलता के वातावरण को हटाकर स्नेह, सहयोग, न्याय, विवेक, व्यवस्था एवं अनुशासन से सुसम्पन्न सभ्य-समाज की स्थापना किसे प्रिय न लगेगी? यह तीनों ही बातें उत्तम, महत्वपूर्ण एवं आवश्यक हैं। किन्तु इनका प्रस्तुत होना तभी संभव है जब इसके लिए हम प्रयत्न करें। स्वार्थ में सिर से पैर तक उलझा हुआ मनुष्य इस प्रकार के निस्वार्थ कामों में तभी रुचि ले सकता है जब उसमें परमार्थ भावना जगे। विश्वास किया जाना चाहिए कि हमारे ऋषि रक्त में अभी परमार्थ भावना बिलकुल निस्वत्व नहीं हुई है। वह मूर्छित पड़ी है, उद्बोधन मिलने पर वह जग सकती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962

👉 Believe in yourself

If you wish that others should believe in you, the easiest and best way is that first you believe in yourself. There are many people who are considered irresponsible and unscrupulous; no one believes them; they are upbraided everywhere. Such people normally don’t have faith in themselves. Their faces, expressions and speech clearly indicate that they don’t believe in themselves.

People in the external world label us the way we present ourselves to them. When misery, poverty, incapability, disappointment, weakness, etc are expressed through our behavior, conduct and character, people consider us to be miserable, poor, incapable, disappointed, weak, etc and treat us accordingly. Those who meet the challenges of life courageously and confidently are surely able to achieve their objectives. God helps those who help themselves.

Whatever task is in your hands, try to accomplish it with full attention. Believe fully in your ability, wisdom and competence. Focus your entire energy and aim at accomplishing your target. Discard inferiority complex and laziness and learn to do the work in hand with seriousness, enthusiasm and confidence. Always keep in mind that only self-confident persons are successful in this world.

✍🏻 Pt Shriram Sharma Acharya

सोमवार, 14 सितंबर 2020

👉 सत्संग: -

एक बार एक युवक पुज्य कबीर साहिब जी के पास आया और कहने लगा,

‘गुरु महाराज! मैंने अपनी शिक्षा से पर्याप्त ज्ञान ग्रहण कर लिया है। मैं विवेकशील हूं और अपना अच्छा-बुरा भली-भांति समझता हूं, किंतु फिर भी मेरे माता-पिता मुझे निरंतर सत्संग की सलाह देते रहते हैं। जब मैं इतना ज्ञानवान और विवेकयुक्त हूं, तो मुझे रोज सत्संग की क्या जरूरत है?’

कबीर ने उसके प्रश्न का मौखिक उत्तर न देते हुए एक हथौड़ी उठाई और पास ही जमीन पर गड़े एक खूंटे पर मार दी। युवक अनमने भाव से चला गया।

अगले दिन वह फिर कबीर के पास आया और बोला,

 ‘मैंने आपसे कल एक प्रश्न पूछा था, किंतु आपने उत्तर नहीं दिया। क्या आज आप उत्तर देंगे?’

कबीर ने पुन: खूंटे के ऊपर हथौड़ी मार दी। किंतु बोले कुछ नहीं।

 युवक ने सोचा कि संत पुरुष हैं, शायद आज भी मौन में हैं।

वह तीसरे दिन फिर आया और अपना प्रश्न दोहराया।

कबीर ने फिर से खूंटे पर हथौड़ी चलाई। अब युवक परेशान होकर बोला,

‘आखिर आप मेरी बात का जवाब क्यों नहीं दे रहे हैं? मैं तीन दिन से आपसे प्रश्न पूछ रहा हूं।’

 तब कबीर ने कहा, ‘मैं तो तुम्हें रोज जवाब दे रहा हूं। मैं इस खूंटे पर हर दिन हथौड़ी मारकर जमीन में इसकी पकड़ को मजबूत कर रहा हूं। यदि मैं ऐसा नहीं करूंगा तो इससे बंधे पशुओं द्वारा खींचतान से या किसी की ठोकर लगने से अथवा जमीन में थोड़ी सी हलचल होने पर यह निकल जाएगा।"

 यही काम सत्संग हमारे लिए करता है। वह हमारे मनरूपी खूंटे पर निरंतर प्रहार करता है, ताकि हमारी पवित्र भावनाएं दृढ़ रहें।

युवक को कबीर ने सही दिशा-बोध करा दिया। सत्संग हर रोज नित्यप्रति हृदय में सत् को दृढ़ कर असत् को मिटाता है, इसलिए सत्संग हमारी दैनिक जीवन चर्या का अनिवार्य अंग होना चाहिए।

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग २५)

जानें, किस भ्रम में हैं हम

गुरुदेव कहते थे समाज और परिवार परम्पराओं, रूढ़ियों के नाम पर ऐसे असत् ज्ञान का विपर्यय का बोझ ढोए जा रहे हैं। समाज ही क्यों व्यक्ति के रूप में हमारी अपनी जीवन शैली भी विपर्यय से घिरी है। अनगिनत मिथ्या धारणाएँ हमें घेरे हैं। इनके कारण हमारी जीवन ऊर्जा बरबाद हो रही है। रस्सी को साँप समझकर हम डरे हुए हैं। रेगिस्तान की तपती रेत में पानी के भ्रम से भ्रमित होकर लोभ के कारण भाग रहे हैं। कहीं हमें भय सता रहा है, तो कहीं लोभ। जबकि दोनों ही औचित्यहीन हैं। मिथ्या धारणाओं से ग्रसित मन जो प्रक्षेपित करता है, उसी को सच समझ लेते हैं। हमारे पूर्वाग्रह, दुराग्रह से भरी हुई धारणाएँ हमारी जानने की शक्ति को ढके हुए हैं।
  
साधक वही है, जिसकी निगाहों में ताजगी हो। जो क्षण प्रतिक्षण मन-अन्तःकरण पर जमने वाली धूल-मिट्टी को हटाता रहे। अतीत के हर पल को मिटने दे और सच्चा सत्यान्वेषी हो। परम पूज्य गुरुदेव के अनुसार विपर्यय है तो मिथ्या ज्ञान। सामान्यतया इसे साधना के लिए बाधा ही समझा जाता है। पर यदि साधक समझदार हो, तो इसे भी अपनी साधना बना सकता है। भ्रम में समझदारी पैदा हो जाय। भ्रमित करने वाली वस्तु, विषय या विचार के प्रति जागृति हो जाय, तो भ्रम अपने आप ही टूट जाते हैं।
  
साधकों ने यदि गुरुदेव की पुस्तक ‘मैं क्या हूँ?’ पढ़ी होगी, तो इस तत्त्व को और गहराई से समझ सकते हैं। यदि किसी ने यह पुस्तक अब तक न पढ़ी हो, तो उसे अवश्य पढ़ना चाहिए। क्योंकि प्रकारान्तर से इसमें विपर्यय को साधना विधि बनाने की तकनीक है। और वह साधनाविधि विपर्यय के प्रति सचेत होना, जागरूक होना। उसे परत-दर-परत उद्घाटित करना मैं क्या हूँ? इस गहन जिज्ञासा के साथ ही विपर्यय की परतें उघड़ने लगती हैं। इस क्रम में पहले अपने को देह मानने का असत् ज्ञान टूटता है। फिर टूटता है अपने को प्राण मानने का परिचय। इसके बाद मन की मान्यता समाप्त होती है। फिर बुद्धि का तर्कजाल भी समाप्त होता है। अन्त में निदिध्यासन का यह क्रम भाव समाधि का स्वरूप लेता है और पता चलता है- आत्मा का परिचय। होता ‘अयमात्मा ब्रह्म’ का प्रगाढ़ बोध। जीवन के सारे विपर्यय समाप्त होते हैं। असत् का अँधेरा मिटकर सत् का प्रकाश होता है।
  
यह सब होता है विपर्यय के सत्य और तत्त्व को सही तरह से जानने पर। क्षण-प्रतिक्षण अपने ऊपर से मिथ्या धारणाओं के आवरण को हटाने पर। इस तरह क्लिष्ट कही जाने वाली विपर्यय वृत्ति भी अक्लिष्ट हो सकती है। बस इसके लिए साधकों में समझदारी भरी साधना होना चाहिए। उन्हें बस अपने जीवन शैली और जीवन तत्त्व दोनों ही आयामों में छाई हुई विपर्यय घटाओं के प्रति जागरूक होना पड़ेगा। तो आज और अभी से प्रारम्भ करें अपनी यह जागरूकता की ध्यान साधना।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ४६
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

शनिवार, 12 सितंबर 2020

👉 क्षण में शाश्वत की पहचान

क्षण में शाश्वत छुपा है और अणु में विराट्। अणु को जो अणु मानकर छोड़ दे, वह विराट् को ही खो देता हैं इसी तरह जिसने क्षण का तिरस्कार किया, वह शाश्वत से अपना नाता तुड़ा लेता है। क्षुद्र को तुच्छ समझने की भूल नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यही द्वार है परम का। इसी में गहरे -गहन अवगाहन करने से परम की उपलब्धि होती है।

जीवन का प्रत्येक क्षण महत्वपूर्ण है। किसी भी क्षण का मूल्य, किसी दूसरे क्षण से न तो ज्यादा है और न ही कम है। आनंद को पाने के लिए किसी विशेष समय की प्रतीक्षा करना व्यर्थ है। जो जानते है, वे प्रत्येक क्षण को ही आनंद बना लेते है और जो विशेष समय की, किसी खास अवसर की प्रतीक्षा करते रहते हैं, वे समूचे जीवन के समय और अवसर को ही गँवा देते हैं।

जीवन की कृतार्थता इकट्ठी और राशिभूत नहीं मिलती। उसे तो बिंदु-बिंदु और क्षण क्षण में ही पाना होता है। प्रत्येक बिन्दु सच्चिदानंद साँगर की ही अमृत अंश है और प्रत्येक क्षण अपरिमेय शाश्वत का सनातन अंश। इन्हें जो गहराइयों से अपना सका, वही अमरत्व का स्वाद चख पाता है।

एक फकीर के महानिर्वाण पर जब उनके शिष्यों से पूछा गया कि आपके सद्गुरु अपने जीवन में सबसे श्रेष्ठ और महत्वपूर्ण बात कौन सी मानते थे? इसके उत्तर में उन्होंने कहा था, “ वही जिसमें किसी भी क्षण वे संलग्न होते थे।”

बूँद-बूँद से सागर बनता है और क्षण-क्षण से जीवन। बूँद को जो पहचान ले, वह सागर को जान लेता है और क्षण को जो पा ले, वह जीवन को पा लेता है। क्षण में शाश्वत की पहचान ही जीवन का आध्यात्मिक रहस्य है।

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग २४)

जानें, किस भ्रम में हैं हम
    
प्रमाण वृत्ति के तीनों स्रोतों से साक्षात्कार करने के उपरांत समधिपाद के आठवें सूत्र में महर्षि ने दूसरी वृत्ति का खुलासा किया है। वह कहते हैं-
विपर्ययो मिथ्या ज्ञानमतद्रूप प्रतिष्ठिम्॥ १/८॥

यानि कि विपर्यय एक मिथ्या ज्ञान है, जो विषय से उस तरह मेल नहीं खाती, जैसा वह है। शास्त्रकारों ने विपर्यय को असत् ज्ञान कहा है। यानि कि किसी वस्तु, व्यक्ति या विचार के बारे में झूठी धारणा है। इसे चित्त की भ्रमित स्थिति भी कह सकते हैं। मजे की बात यह है कि ऐसी स्थिति हममें से किसी एक की नहीं है, बल्कि प्रायः हम सबकी है। जीवन के किसी न किसी कोने में हम सभी भ्रमित हैं। सच यही है कि हम तथ्य को जाने, सत्य को अनुभव करें, उसके पहले ही उस विषय या वस्तु के बारे में ‘अनगिन धारणाएँ’ बना लेते हैं।
  
कई बार तो ये धारणाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है। उस धारणा से सम्बन्धित असत् ज्ञान को जिस-किसी तरह निभाया जाता है। परम पूज्य गुरुदेव कहते थे कि व्यक्ति अकेला नहीं, परिवार और समाज भी असत् ज्ञान कि विपर्यय के भारी बोझ से लदे हैं। उसे ढोए जा रहे हैं। इस बारे में वह एक बड़ी रोचक कथा सुनाते थे। यह कथा प्रसंग एक ग्रामीण परिवार का था। इस परिवार में एक परम्परा थी कि शादी-विवाह के समय परिवार के लोग एक बिल्ली को पकड़कर एक टोकरी के नीचे ढक देते। शादी-विवाह का आयोजन चलता रहता। इसमें कई दिन बीत जाते। तब तक प्रायः बिल्ली मर जाती। बाद में उसे फेंक दिया जाता। ग्रामीण परिवार में यह प्रथा सालों से नहीं, पीढ़ियों से चल रही थी। कभी किसी ने इस प्रथा से जुड़ी धारणा के बारे में खोज-बीन करने की कोशिश नहीं की।
  
उस परिवार के लोगों का ध्यान ज्यादातर इस बात पर टिका रहता था कि घर में जब भी कोई शादी हो, तब एक बिल्ली को टोकरी के नीचे रख देना है। फिर जब सारा आयोजन समाप्त हो जाय, तो उस मरी हुई बिल्ली को कहीं फेंक देना है। परिवार की नयी पीढ़ी के लोग जिसने भी इस प्रथा के औचित्य को जानने की कोशिश की उसे झिड़क दिया गया। घर के बड़े-बूढ़ों ने उन्हें धमकाया, घर से बाहर निकाल देने की धमकी दी। और कहा कि बुजुर्गों की बातों पर सवाल उठाते हो? बस, इतना जान लो कि शादी के समय ऐसा करना शुभ होता है। बिल्ली को मार देने से भला शुभ का क्या सम्बन्ध है? इस सवाल का उत्तर किसी ने भी न दिया।
  
लेकिन परिवार के एक नवयुवक से रहा न गया। उसने बात की जड़ में जाने की ठान ली। उसने परिवार की पुरानी डायरियों को पलटा। गाँव के बड़े-बुजुर्गों से बात की। अंत में उसे सच्चाई का पता चला। सच्चाई यह थी कि सालों पहले पुरानी पीढ़ी में एक लड़की की शादी थी। सभी लोग शादी के काम में जुटे थे। घर में पालतू बिल्ली थी, जो इधर-उधर दौड़कर जब-तब चीज-सामानों को गिरा रही थी। गृहस्वामिनी उसके इस व्यवहार से परेशान हो गयी। अन्त में उसने उस बिल्ली को एक टोकरी के नीचे ढक दिया। काम-काज की व्यस्तता में वह उसे भूल गयी। शादी के बाद जब याद आयी, तो उसे टोकरी से निकाला, लेकिन तब तक बिल्ली मर चुकी थी। बड़े ही दुःखी मन से उसे बिल्ली को फेंकना पड़ा। इस सत्य ज्ञान को जानते ही असत् ज्ञान अपने आप ही खत्म हो गया। उस घर के लोगों को जब इस सच्चाई का  पता चला, तो उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ।
  
.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ४५
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

शुक्रवार, 11 सितंबर 2020

👉 समस्या रूपी बंदर:-

एक बार स्वामी विवेकानंद को बंदरों का सामना करना पड़ा था। वह इस आप बीती को कई अवसरों पर बड़े चाव के साथ सुनाया करते थे। इस अनुभव का लाभ उठाने की बात भी करते थे।

उन दिनों स्वामी जी काशी में थे वह एक तंग गली में गुजर रहे थे। सामने बंदरों का झुंड आ गया। उनसे बचने के लिए स्वामी जी पीछे को भागे। परंतु वे उनके आक्रमण को रोक नहीं पाए। बंदरों ने उनके कपडे तो फाड़े ही शरीर पर बहुत-सी खरोंचें भी आ गईं। दो-तीन जगह दांत भी लगे। शोर सुनकर पास के घर से एक व्यक्ति ने उन्हें खिड़की से देखा तुरंत कहा- “स्वामी जी! रुक जाओ, भागो मत। घूंसा तानकर उनकी तरफ बढ़ो। “स्वामी जी के पांव रुके। घूंसा तानते हुए उन्हें ललकारने लगे। बंदर भी डर गए और इधर-उधर भाग खड़े हुए। स्वामीजी गली को बड़े आराम से पार कर गए।

इस घटना को सुनाते हुए स्वामी जी अपने मित्रों तथा शिष्यों को कहा करते- “मित्रो! हमें चाहिए कि विपरीत हालात में डटे रहें, भागें नहीं। घूंसा तानें। सीधे हो जाएं। आगे बढ़ें। पीछे नहीं हटें। कामयाबी हमारे कदमों में होगी।“वास्तव में समस्या पलायन से नहीं सामना करने से खत्म होती है। भागने वालों का समस्या बंदर की भाँति पीछा करती है।

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग २३)

आखिर कैसे मिले—सम्यक् ज्ञान?
  
पतञ्जलि का कहना है कि सम्यक् ज्ञान के लिए हमें सम्यक् तर्क करना आना चाहिए। उदाहरण के लिए यदि हम इस विराट् सृष्टि को देखें,गौर से निहारें और तर्क का सम्यक् प्रयोग करें, तो ईश्वर के अस्तित्व का अनुमान होता है। यह ठीक है कि ईश्वर की सत्ता इन्द्रिय प्रत्यक्ष नहीं है। ईश्वर कहीं दिखाई नहीं देता, नजर नहीं आता। किन्तु यदि सम्यक् तर्क का प्रयोग करें,यह सोचें  कि विश्व ब्रह्माण्ड की व्यवस्था कितनी सुसंगत है,कितनी उद्देश्यपूर्ण है,तो इस निश्चय पर जरूर पहुँचेंगे कि ईश्वर के रूप में इसकी संचालक सत्ता का भी अस्तित्व होगा। इस तरह सम्यक् तर्क से ईश्वरीय सत्ता का बड़ा ही स्पष्ट अनुमान हो सकता है। बाद में योग साधना के द्वारा उसकी प्रत्यक्ष अनुभूति भी पायी जा सकती है।
  
अब है सम्यक् ज्ञान का तीसरा स्रोत-आगम। यह सबसे अधिक सौन्दर्यपूर्ण है। आगम को सम्यक् ज्ञान के स्रोत के रूप में स्वीकारना महर्षि पतञ्जलि की अपनी विशिष्टता है। यह आगम क्या है? तो महर्षि कहते हैं कि आगम महायोगियों के वचन हंै। ये ऋषियों की अनुभति की अभिव्यक्ति देने वाले शब्द है। इस बात को थोड़ा और स्पष्ट रीति से कहें, तो आगम-उन महान् विभूतियों के वचन हैं,जो जान चुके हैं। जो लक्ष्य तक पहुँच चुके हैं,जो कैवल्य ज्ञान को पा चुके हैं, जो ईश्वरीय सत्य का साक्षात्कार कर चुके हैं,उनके शब्द भी सम्यक् ज्ञान का स्रोत है।
  
परम्परा में आगम को वेद कहा जाता है। यह ठीक भी है क्योंकि वेद सत्य द्रष्टा ऋषियों के वचन है। परन्तु रूढ़ियों से ग्रस्त मूढ़ जन वेद के विराट् स्वरूप को केवल कतिपय मंत्र समुच्चय तक ही समेट देते हैं। यह ठीक नहीं है। आगम सत्य द्रष्टा ऋषियों के वचन है। भले ही संस्कृत में कहा गया हो,अथवा किसी अन्य भाषा में। व्यापक अर्थों में आगम में कबीर की साखी, मीरा के पद, श्रीरामकृष्ण का वचनामृत, महर्षि रमण के वचन, योगीराज अरविन्द का दिव्य जीवन संदेश और स्वयं परम पूज्य गुरुदेव के स्वर सभी कुछ समाहित हो जाता है। इन सत्य द्रष्टा ऋषियों—संतों के वचनों पर श्रद्धा, सम्यक् ज्ञान का स्रोत है। योगपथ पर चलने वाले साधकों के लिए सम्यक् ज्ञान का यह तीसरा स्रोत सबसे अधिक  मत्त्वपूर्ण एवं व्यावहारिक है। योग साधना करने वालों के लिए यह भी कहा जा सकता है कि अपने सद्गुरु के वचनों पर परिपूर्ण श्रद्धा-सम्यक् ज्ञान का स्रोत है। सद्गुरु के वचन कभी-कभी बड़े अटपटे होते हैं। परन्तु वे प्रेम लपेटे होते हैं। उन्हें ठीक-ठीक समझ न पाने पर भी यदि कोई साधक उन पर समग्र श्रद्धा के साथ आचरण करने लगता है,तो उसे अपने आप ही सम्यक् ज्ञान हो जाता है।
    
सद्गुरु के वचनों के सम्बन्ध में तर्क का कोई स्थान नहीं है, क्योंकि ये चेतना के जिस तल से कहे गए हैं, वहाँ तर्क, बुद्धि की पहुँच ही नहीं है। यदि इस बारे में तर्क किया जाए, तो हम वह सब गवाँ बैठेंगे, जो हमें हमारे सद्गुरु देना चाहते हैं। क्योंकि वे न केवल यह जानते हैं कि उन्हें हम शिष्यों को क्या देना है? बल्कि वे यह भी जानते हैं कि जो हमारे लिए देने योग्य है,वह सब  किस तरह से देना है। इसलिए केवल और केवल भक्ति पूर्ण श्रद्धा ही एकमात्र उपाय है। महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि सद्गुरु जो कहें,जिस भी तरह कहें,उसे परिपूर्ण श्रद्धा के साथ करने पर सम्यक् ज्ञान सुनिश्चित है। इसमें कोई संदेह नहीं। प्रमाणवृत्ति के ये तीनों स्रोत हमारी अन्तर्यात्रा में सहायक है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ४३
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 Prayer: The Nourishment of Soul

If I do not get food I am least worried but it makes me mad if I miss my prayer. Prayer is million times more beneficial than food. One may forego his food but not his prayer. Prayer is the very nourishment of soul. It would be too good, if we could contemplate on God whole day long, but since it is not possible for us all, it is desirable that we should sit at least for a few hours every day in contemplation of God.

Eulogy, worship and prayer are not blind faiths, but they are real and true acts like eating, drinking, walking and sitting; nay, if we say that it is the only truth and all the rest are false and unreal, it would be no exaggeration. Offering of prayer does not mean begging, but, in fact, it is the natural voice of soul. When we fully come to realize our incapabilities and leaving all other worldly recourses aside, confide our faith in God, the very outburst of our emotions in such a state is called prayer. The offering of prayer and singing songs in praise of God are not mere utterances of one's tongue but are actually the outpourings of one's heart. This is the reason that even the dumb, the stammerers, and the stupid persons can also offer prayer.

The main purpose of offering prayer is, to seek discourse with God and to gain light for the purification of the soul, so that we could win over our weaknesses. Prayer devoid of emotion is of no use.

What to talk of the other world, even in this world prayer is a source of peace and happiness. So if we really wish to become human, we must make our lives interesting and fruitful through prayer. It is, therefore, advisable for everyone to remain engrossed in prayer with heart and soul. All complicated riddles arising out of national, social and political problems find their easy and quick solutions through prayer than through intellect.

MAHATMA GANDHI

बुधवार, 9 सितंबर 2020

👉 सकारात्मक रहे.. सकारात्मक जिए!

एक दिन एक किसान का बैल कुएँ में गिर गया। वह बैल घंटों ज़ोर -ज़ोर से रोता रहा और किसान सुनता रहा और विचार करता रहा कि उसे क्या करना चाहिऐ और क्या नहीं।

अंततः उसने निर्णय लिया कि चूंकि बैल काफी बूढा हो चूका था अतः उसे बचाने से कोई लाभ होने वाला नहीं था और इसलिए उसे कुएँ में ही दफना देना चाहिऐ।।

किसान ने अपने सभी पड़ोसियों को मदद के लिए बुलाया सभी ने एक-एक फावड़ा पकड़ा और कुएँ में मिट्टी डालनी शुरू कर दी। जैसे ही बैल कि समझ में आया कि यह क्या हो रहा है वह और ज़ोर-ज़ोर से चीख़ चीख़ कर रोने लगा और फिर ,अचानक वह आश्चर्यजनक रुप से शांत हो गया। 

सब लोग चुपचाप कुएँ में मिट्टी डालते रहे तभी किसान ने कुएँ में झाँका तो वह आश्चर्य से सन्न रह गया.. अपनी पीठ पर पड़ने वाले हर फावड़े की मिट्टी के साथ वह बैल एक आश्चर्यजनक हरकत कर रहा था वह हिल-हिल कर उस मिट्टी को नीचे गिरा देता था और फिर एक कदम बढ़ाकर उस पर चढ़ जाता था। 

जैसे-जैसे किसान तथा उसके पड़ोसी उस पर फावड़ों से मिट्टी गिराते वैसे -वैसे वह हिल-हिल कर उस मिट्टी को गिरा देता और एक सीढी ऊपर चढ़ आता जल्दी ही सबको आश्चर्यचकित करते हुए वह बैल कुएँ के किनारे पर पहुंच गया और फिर कूदकर बाहर भाग गया ।  

ध्यान रखे आपके जीवन में भी बहुत तरह से मिट्टी फेंकी जायेगी बहुत तरह की गंदगी आप पर गिरेगी जैसे कि, आपको आगे बढ़ने से रोकने के लिए कोई बेकार में ही आपकी आलोचना करेगा कोई आपकी सफलता से ईर्ष्या के कारण आपको बेकार में ही भला बुरा कहेगा कोई आपसे आगे निकलने के लिए ऐसे रास्ते अपनाता हुआ दिखेगा जो आपके आदर्शों के विरुद्ध होंगे...

ऐसे में आपको हतोत्साहित हो कर कुएँ में ही नहीं पड़े रहना है बल्कि साहस के साथ हर तरह की गंदगी को गिरा देना है और उससे सीख ले कर उसे सीढ़ी बनाकर बिना अपने आदर्शों का त्याग किये अपने कदमों को आगे बढ़ाते जाना है।

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग २२)

आखिर कैसे मिले—सम्यक् ज्ञान?

परम पूज्य गुरुदेव कहते थे कि प्रत्यक्ष को चेतना-प्रत्यक्ष मानने से ही महर्षि पतञ्जलि जैसे महायोगी का भाव प्रकट होगा। यदि हम प्रत्यक्ष को केवल इन्द्रिय-प्रत्यक्ष की सीमा में सिकोड़ दें, तो हम उन्हें चार्वाक जैसे नास्तिक एवं जड़वादी दार्शनिकों की श्रेणी में  खड़ा कर देंगे। क्योंकि चार्वाक दर्शन के प्रवर्तक बृहस्पति का प्रमुख मत यही तो है कि जो कुछ इन्द्रियाँ अनुभव करती हैं, जो नजरों के सामने है-वही प्रमाण है। चार्वाक को भारतीय भौतिकवाद का स्रोत माना जाता है। इस दर्शन में बुद्धि चातुर्य तो है,पर चेतना का बोध नहीं है। चार्वाक कोरे बुद्धिवादी हैं, जबकि महर्षि पतञ्जलि सम्यक् बोध प्राप्त महायोगी हैं। उनके भाव को ठीक-ठीक समझने के लिए किसी महायोगी का बोध ही सहायक बन सकता है। परम पूज्य गुरुदेव हमें यही सहायता प्रदान करते हैं।
  
वह कहते हैं कि गहरे ध्यान अथवा समाधि में हमारी अर्न्तचेतना जिस ज्ञान की अनुभूति करती है,वही सत्य है। उसी को प्रमाण माना जा सकता है। इन्द्रियों से हमें जो जानकारी मिलती है,वह प्रायः आधी-अधूरी और दोषग्रस्त होती है। यही कारण है कि इन्द्रियाँ हमें भटकाती और भ्रमित करती हैं। काम-क्रोध,लोभ-मोह की दशाएँ इन्द्रियों को जब- तब आच्छादित करती है और परिणाम में व्यक्ति को कुछ का कुछ समझ में आने लगता है। कभी-कभी यही दशा नशेड़ी व्यक्ति की होती है। इस संबंध में  गुरुदेव अपने गाँव के पास का किस्सा सुनाया करते थे। उनके गाँव के पास के गाँव में एक ठाकुर बच्ची सिंह रहा करते थे। उनकी अफीम खाने की आदत थी। अफीम  खाने के बाद वे नशे में काफी ऊट-पटांग, हरकतें करते थे। एक बार उन्होंने शाम को ज्यादा अफीम खा ली। नशा गहरा होने पर वे कहने लगे,देखो अब मेरे पास उड़ने की ताकत आ गयी है, अब मैं उड़ सकता हूँ। ऐसा कहते हुए वह अपने मकान की छत से हाथ फैलाए हुए उड़ने की मुद्रा में नीचे कूद पड़े। सिर पर गहरी चोट लगने से उनकी मृत्यु हो गयी। बेचारे वह जान भी नहीं सके कि नशे के असर में वह अपनी इन्द्रियों द्वारा धोखा खा गए।
    
इन्द्रियाँ भरोसे काबिल हैं भी नहीं। बिना नशे के वे हमें भटकाती और भ्रमित करती रहती हैं। जो बचपन में समझ में आया, वह किशोरावस्था में बेकार नजर आती है। किशोरावस्था की बातें प्रौढ़ावस्था में बेमानी हो जाती है। यही सिलसिला चलता रहता है। ऐसे में सवाल उठता है कि प्रत्यक्ष बोध आखिर है क्या? तो जवाब यह है कि प्रत्यक्ष बोध वह है, जिसे इन्द्रियों के बिना जाना जा सके। इसलिए पहला सम्यक् ज्ञान केवल अपनी आन्तरिक सत्ता का हो सकता है। क्योंकि इसके लिए किसी भी इन्द्रिय सहायता की जरूरत नहीं है। कोई भी गहरे ध्यान अथवा समाधि में उतरकर इसे पा सकता है।
  
प्रमाणवृत्ति अथवा सम्यक् ज्ञान का दूसरा स्रोत अनुमान है। यह उनके लिए है, जो अभी प्रत्यक्ष बोध के लायक नहीं हुए हैं। जिनकी स्थिति अभी ध्यान और समाधि की गहराई में प्रवेश करने की नहीं है। जो सम्यक् ज्ञान पाना चाहते हैं, अनुमान उनके लिए एक सम्भावना है। यह अनुमान क्या है? परम पूज्य गुरुदेव के शब्दों में यह है विवेक युक्त तर्क। तर्क के बारे में गुरुदेव का कहना था कि तर्क दुधारी तलवार की तरह है, इसके इस्तेमाल के लिए गहरे विवेक की जरूरत है। विवेक के अभाव में यह सत्य ज्ञान की प्राप्ति में सहायक बनने की बजाय असत्य ज्ञान का पोषक भी हो सकता है। उदाहरण के लिए तर्क का प्रयोग चार्वाक एवं मार्क्स ने भी किया और आचार्य शंकर एवं महर्षि अरविन्द ने भी। परन्तु एक में विवेक का अभाव है, तो दूसरे में विवेक का प्रभाव। इस स्थिति में इनके दर्शन और दार्शनिकता का पूरा का पूरा ढाँचा बदल गया है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ४१
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 The key to success and self-fulfillment

Thus the key to a person’s success and fulfillment in life is the intensity and focus of his will and faith in his ability to manifest his indwelling divine potentialities. He works with the available resources and gets results according to the circumstances created by his deeds. One may call it destiny, fortune or the result of karma, but by and large it is the outcome of one’s own will and faith.

That is why it has been said that a man is the maker of his own destiny. Whosoever has achieved success and fulfillment in this world has worked whole heartedly to achieve his set goal. Such people have been ever active, with unwavering will, to achieve their aims. This strong will enabled them to overcome all the obstacles, keep hope and faith alive in the hour of failure and make fresh attempts, leading to ultimate success. Therefore, in one word, a strong will alone may be called the real basis of success.

मंगलवार, 8 सितंबर 2020

👉 परमात्मा ने जो दिया है

एक बहुत अरबपति महिला ने एक गरीब चित्रकार से अपना चित्र बनवाया, पोट्रट बनवाया। चित्र बन गया, तो वह अमीर महिला अपना चित्र लेने आयी। वह बहुत खुश थी। चित्रकार से उसने कहा, कि क्या उसका पुरस्कार दूं?

चित्रकार गरीब आदमी था। गरीब आदमी वासना भी करे तो कितनी बड़ी करे, मांगे भी तो कितना मांगे? हमारी मांग, सब गरीब आदमी की मांग है परमात्मा से। हम जो मांग रहे हैं, वहक्षुद्र है। जिससे मांग रहे हैं, उससे यह बात मांगनी नहीं चाहिए।तो उसने सोचा मन में कि सौ डालर मांगूं, दो सौ डालर मांगूं, पांच सौ डालर मांगूं। फिर उसकी हिम्मत डिगने लगी। इतना देगी, नहीं देगी! फिर उसने सोचा कि बेहतर यह हो कि इसी पर छोड़ दूं, शायद ज्यादा दे। डर तो लगा मन में कि इस पर छोड़ दूं, पता नहीं दे या न दे, या कहीं कम दे और एक दफा छोड़ दिया तो फिर! तो उसने फिर भी हिम्मत की। उसने कहा कि आपकी जो मर्जी। तो उसके हाथ में जो उसका बैग था, पर्स था, उसने कहा, तो अच्छा तो यह पर्स तुम रख लो। यह बडा कीमती पर्स है।

पर्स तो कीमती था, लेकिन चित्रकार की छाती बैठ गयी कि पर्स को रखकर करूंगा भी क्या? माना कि कीमती है और सुंदर है, पर इससे कुछ आता-जाता नहीं। इससे तो बेहतर था कुछ सौ डालर ही मांग लेते। तो उसने कहा, नहीं-नहीं, मैं पर्स का क्या करूंगा, आप कोई सौ डालर दे दें। उस महिला ने कहा, तुम्हारी मर्जी। उसने पर्स खोला, उसमें एक लाख डालर थे, उसने सौ डालर निकाल कर चित्रकार को दे दिये और पर्स लेकर वह चली गयी। सुना है कि चित्रकार अब तक छातीपीट रहा है और रो रहा है–मर गये, मारे गये, अपने से ही मारे गये!

आदमी करीब-करीब इस हालत में है। परमात्मा ने जो दिया है, वह बंद है, छिपा है। और हम मांगे जा रहे हैं–दो-दो पैसे, दो-दो कौड़ी की बात। और वह जीवन की जो संपदा उसने हमें दी है, उस पर्स को हमने खोल कर भी नहीं देखा है। जो मिला है, वह जो आप मांग सकते हैं, उससे अनंत गुना ज्यादा है। लेकिन मांग से फुरसत हो, तो दिखायी पड़े, वह जो मिला है।

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग २१)

आखिर कैसे मिले—सम्यक् ज्ञान?

पंच वृत्तियों का उल्लेख करने के उपरांत महर्षि पतञ्जलि इनमें पहली वृत्ति प्रमाण के बारे में सुस्पष्टता से समझाते हैं। वह कहते हैं-
प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणामि॥ १/७॥

अर्थात् सम्यक् ज्ञान अथवा प्रमाणवृत्ति के तीन स्रोत हैंः प्रत्यक्ष बोध,अनुमान और योग सिद्ध आप्त पुरुषों के वचन। यही वे तीन विधियाँ हैं, जिनके द्वारा योग साधक को ठीक-ठीक ज्ञान हो सकता है। इनमें पहली विधि प्रत्यक्ष बोध की है। यह सम्यक् ज्ञान का प्रथम स्रोत है। इसका मतलब है, आमने-सामने का साक्षात्कार। ज्ञाता और ज्ञेय के बीच किसी मध्यस्थ की जरूरत नहीं रहती। सत्य को समझाने-बतलाने के लिए किसी दुभाषिये की आवश्यकता नहीं रह जाती।
  
बात बिल्कुल साफ है,सरल और सीधी है। फिर भी अनेकों अड़चनें हैं—इसे समझने में। प्रायः योग सूत्र के भाष्यकारों, वार्तीककारों ने इस सीधी, सरल और साफ बात की बड़ी गलत व्याख्या की है। उन्होंने प्रत्यक्ष बोध को इन्द्रिय बोध की सँकरी सीमा में समेट दिया है। उदाहरण के लिए कई आचार्यों का कहना है कि प्रत्यक्ष वही है-जो आँखों के सामने है। लेकिन यह ठीक-ठीक आमने-सामने कहाँ हुआ? आँखें तो बीच में हैं ही। इसी तरह यदि कुछ सुना जाता है, तो कान माध्यम बनते हैं और ये आँखें या कान गलत खबर भी तो देख सकते हैं। इन्द्रिय बोध-सत्य बोध ही हो,यह कोई जरूरी तो नहीं । इन्द्रियों में थोड़ा सा भी दोष आ गया, तो सारी खबर गलत मिलती हैं। कुछ का कुछ दिखाई-सुनायी देने लगता है।
  
फिर प्रत्यक्ष बोध क्या  है? इस सवाल के उत्तर में परम पूज्य गुरुदेव का चिंतन सूत्र कहता है ‘चेतना प्रत्यक्ष।’ यानि कि हमारी चेतना बिना किसी इन्द्रिय माध्यम के सब कुछ साफ-साफ आमने-सामने देखे। गहरे ध्यान अथवा समाधि की भाव दशा में ही साधक को यह स्थिति प्राप्त होती है। तब देखने के लिए, जानने के लिए किसी माध्यम की जरूरत नहीं रह जाती। किसी इन्द्रिय की तो बिल्कुल भी नहीं। महात्मा बुद्ध, महर्षि रमण, श्री अरविन्द एवं परम पूज्य गुरुदेव जैसे महायोगी इसी रीति से सत्ता और सत्य की प्रत्यक्ष अनुभूति करते हैं। इससे इन्द्रियों की किसी तरह की कोई भागीदारी नहीं होती। ज्ञाता और ज्ञेय एकदम आमने-सामने  होते हैं, उनके बीच कुछ और नहीं होता। केवल प्रत्यक्षता ही सत्य अनुभव बनकर प्रकट होता है।
  
.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ३९
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 Quintessence of Religion

The element of religion can’t be found in the mirage of rituals, cults or communal doctrines and rites. If you are true seeker, want to adopt religion in the truest sense, you must first introspect and sincerely analyze your aspirations, interests, habits and behavior to whether and to what extent these might trouble or hurt others or hinder their justified rights… You must restrain and curtail the tendencies of selfish possession, passions for sensual pleasures and ruthlessness and insensitivity to others.

Simultaneously, the altruistic tendencies and sentiments of kindness, generosity, love, amity, feeling of service, sharing and
cooperation should be cultivated and enhanced consistently. The only measure of one’s religiousness is – the less one’s selfishness and the more his/her altruism, the greater is his/her religiousness and spirituality. It is only through this path or religiousness that the individual self realizes higher realms of divine grace and salvation.

The major cause of all misery, adversities and sufferings in the world is that – knowingly or unknowingly, people do not behave with others in a manner, which they expect and like others to behave. This disparity of – “different weight used in the same balance for buying and for selling” is the root of all mistrusts, conflicts and animosity. Ego, avarice and selfishness make one blind and debauch from the path of religion. If you do what your conscience would not allow, or what you would not like someone else doing to you, then you are committing a sin. So be vigilant towards your ambitions, attitude and actions.

📖 Akhand Jyoti, Mar. 1944

सोमवार, 7 सितंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग २०)

जीवन कमल खिला सकती हैं—पंच वृत्तियाँ

मन की चौथी वृत्ति निद्रा है। निद्रा मन की अद्भुत जीवनदायिनी शक्ति है। चिकित्साशास्त्री हमें बताते हैं कि नैसर्गिक निद्रा शारीरिक स्वास्थ्य के लिए बहुत अनिवार्य है। वैसा इसका अध्यात्मिक पक्ष भी है। हालाँकि इससे विरले साधक ही परिचित हो पाते हैं। सामान्य लोग तो नैसर्गिक निद्रा का भी आनन्द नहीं उठा पाते। क्योंकि निद्रा मन की समग्र निर्विषय अवस्था है। कोई क्रिया, कोई चेष्टा मन में नहीं है, ऐसी अवस्था। जिसमें मन को सम्पूर्ण विश्रान्ति है। यह बड़ी सुन्दर, सुमधुर एवं जीवनदायिनी अवस्था है। पर इसका लाभ कम ही लोग उठा पाते हैं। अधिकांश तो स्वप्नों के मकड़जाल में उलझते रहते हैं। वे निद्रा के आनन्दमय संगीत से हमेशा वंचित रहते हैं।
  
जबकि योग साधक आचार्य शंकर के शब्दों में ‘निद्रा समाधिस्थितिः’ का आनन्द उठाते हैं। क्योंकि मन की समग्र निर्विषय अवस्था में यदि जागरूक हुआ जा सके, तो समाधि फलित हो जाती है। सचमुच ही निद्रा में सब कुछ वैसा ही होता है, जैसा कि समाधि में होता है। बस, जागरूकता नहीं होती। आन्तरिक जागरूकता सध जाने पर भी शरीर सोया रहता है, मन विश्रान्ति में रहता है और आन्तरिक चेतना पूर्णतया जाग्रत् होती है। परम पूज्य गुरुदेव की निद्रा ऐसी ही होती थी। सामान्य साधक इसमें धीरे-धीरे उतर सकते हैं। इस भावदशा में उतरने पर निद्रा समाधि का आनन्दोल्लास बन जाती है।
  
मन की पाँचवी एवं अन्तिम वृत्ति है-स्मृति। इस शक्ति का भी जीवन में प्रायः दुरुपयोग ही होता है। यदि जो घटना जैसे घटी है, उसे ठीक तरह से याद रखकर उसकी सच्चाई को जाना जाय, तो एक अनूठी ध्यान साधना जन्म लेती है। पर हममे से प्रायः किसी के जीवन में ऐसा हो नहीं पाता। हमारा अपना जीवन, तो बस स्मृतियों का एक बड़ा गोदाम भर है। जिसमें अगणित स्मृतियाँ यूँ ही बेतरतीब पड़ी हुई हैं। कौन स्मृति कहाँ किस स्मृति में जा मिली है? कोई ठिकाना नहीं है। स्मृतियों की यह गड़बड़ जब-तब हमारे सपनों में उलझती रहती है। ध्यान-साधना ही वह उपाय है, जिससे कि स्मृति को योग साधना का रूप दिया जा सकता है। भगवान् बुद्ध ने इसीलिए ध्यान को ‘सम्यक् स्मृति’ भी कहा है। इस साधना से अपने अतीत को, अपने विगत जन्मों को जानकर एक नए साधनामय जीवन की सृष्टि की जा सकती है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ३८
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 अध्यात्म-लक्ष और उसका आवश्यक कर्तृत्व (अन्तिम भाग)

नृशंसता का प्रतिरोध

राजनैतिक पराधीनता एवं विदेशियों द्वारा बरती गई नृशंसता के विरुद्ध पिछले दिनों हमारे मनों में असंतोष उत्पन्न हुआ था तो उसका बाह्य स्वरूप स्वराज्य आन्दोलन के रूप में—स्वाधीनता संग्राम के रूप में—सामने आया था। जन-मानस का व्यापक असंतोष राजमुकुटों को तिनके के समान उड़ाकर फेंक सकता है। दुनियाँ का इतिहास साक्षी है कि बड़ी से बड़ी क्रूर सल्तनतें जन-असंतोष की आग में जलकर भस्म हो गईं। जनता की मनोभूमि जब करवट बदलती है तो बड़ी से बड़ी विडम्बनाएँ धराशायी हो जाती हैं। जिस हीन सामाजिक दुरवस्था में हम आज पड़े हैं वह भी तभी तक टिकी रह सकती है जब तक जन-मानस में उसके प्रति उभार नहीं आता। यह बुराइयाँ अभी अखरती तो हैं पर यदि काँटे की तरह उनकी चुभन हम अनुभव करने लगे तो फिर इन्हें उखाड़ फेंकने में कितनी देर लगेगी?

युग की प्रखर चुनौती

सामाजिक असभ्यता हमारे लिए राजनीतिक गुलामी से अधिक त्रासदायक स्थिति में हमारे सामने मौजूद है। स्वाधीनता संग्राम के बलिदानी सेनानी स्वर्ग से हमें पूछते हैं कि हमारा कारवाँ एक ही मंजिल पर पड़ाव डालकर क्यों पड़ा रहा? आगे का पड़ाव सामाजिक असभ्यता के उन्मूलन का था, अगला मोर्चा वहाँ जमना था—पर सैनिकों ने हथियार खोलकर क्यों रख दिये? युग की आत्मा इन प्रश्नों का उत्तर चाहती है। हमें इसका उत्तर देना होगा। यदि हम सामाजिक असभ्यता के उन्मूलन के लिए कुछ नहीं करना चाहते, कुछ नहीं कर सकते तो जहाँ भावी इतिहासकार जिस प्रकार स्वतन्त्रता संग्राम के सेनानियों को श्रद्धा से मस्तक झुकाते रहेंगे वहाँ हमें धिक्कारने में भी कसर न रहने देंगे।

लक्ष पूर्ति के लिए यह आवश्यक है

आध्यात्मिक लक्ष की पूर्ति के लिए अग्रसर हुए हम धर्मप्रेमी ईश्वरभक्त लोगों के कन्धों पर लौकिक कर्तव्यों की पूर्ति का भी एक बड़ा उत्तरदायित्व है। ईश्वर को हम पूजें और उसकी प्रजा से प्रेम करे; भगवान का अर्चन करें और उसकी वाटिका को—दुनियाँ को—सुरम्य बनावें तभी हम उसके सच्चे भक्त कहला सकेंगे तभी उसका सच्चा प्रेम प्राप्त करने के अधिकारी हो सकेंगे। हमारे आध्यात्मिक लक्ष की पूर्ति का प्रथम सोपान सुव्यवस्थित जीवन है। स्वस्थ शरीर स्वच्छ मन, सभ्य समाज उसके तीन आधार हैं। इन आधारों को संतुलित करने के लिए सबल और समर्थ बनाने के लिए हमें कुछ करना ही पड़ेगा, कटिबद्ध होना ही पड़ेगा। युग-निर्माण का महान कार्य हमारे इस कर्तृत्व पर ही निर्भर है। इसकी न तो अब उपेक्षा की जा सकती है और न आँखें चुराई जा सकती हैं। भगवान यही हम से कराना चाहते हैं। यही हमें करना भी होगा।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962 पृष्ठ 37

👉 TRUE PRAYER

True prayer is less about asking and begging for things we are attached to than it is about relinquishing our attachments to things, persons and possessions. We, in essence, being the sparks of the Divine Effulgence, ought to pray for illumination of our inner selves with the sublime glow of divinity –– no storm of hardship or turbulence of ups and downs of life could ever quaver the flame of our faith in our divine origin as souls.

“…. ‘O’ Lord! Please bless us with courage and wisdom so that we could welcome adversities as opportunities to refine our qualities and strengthen our potentials. Today’s blows of adversities should sound as messages of a brighter tomorrow….” –– This would be an ideal prayer to elevate our zeal and optimism and would protect us from becoming weak or coward.

We have to become intrepid warriors of the Spirit and not frightened fugitives in the battlefield of life.  Our attitude while praying should not be of begging but of ‘offering’ – “Lord, I am here, use me”.

~ Pt. Shriram Sharma Acharya

रविवार, 6 सितंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग १९)

जीवन कमल खिला सकती हैं—पंच वृत्तियाँ
  
यह अवरोधक शक्ति मन की दूसरी वृत्ति है, जिसका नाम है विपर्यय। विपर्यय का मतलब है, मिथ्या ज्ञान। मिथ्या ज्ञान का मतलब है कि है कुछ, पर दिखता है कुछ। है रस्सी, पर नजर आ रहा है साँप। प्रायः जीवन में यह स्थिति बेहोशी भरे अंधकार के कारण पनपती है। जैसे शराबी, भँगेड़ी, नशा गाढ़ा होने पर कुछ अजीबोगरीब अनुभूतियाँ करते हैं। वैसे ही इन्द्रिय लालसाओं, मानसिक वासनाओं एवं कामनाओं के ज्वार में भी इस मिथ्या ज्ञान की बाढ़ आती है। सारी उम्र कभी न खत्म होने पर भटकन की पर्याय बन जाती है। ध्यान रहे इस विपर्यय की समाप्ति ही प्रमाण का जागरण है। योग साधकों को अपने प्रयासों की दिशा इसी प्रमाण वृत्ति के जागरण की ओर मोड़नी होगी। लालसाओं, वासनाओं एवं कामनाओं का नशा उतरते ही मन की विपर्यय का अवसान हो जाता है।
  
तीसरी वृत्ति विकल्प अथवा कल्पना है। यह मन की बड़ी अद्भुत शक्ति है। सामान्य जन इस शक्ति का  दुरुपयोग करते हुए प्रायः ख्याली पुलाव पकाते रहते हैं। लेकिन जिन्हें इस शक्ति का थोड़ा-बहुत सदुपयोग करना आ जाता है, वे कवि या कलाकार बन जाते हैं। इस विकल्प वृत्ति का उत्कृष्ट उपयोग ही उनकी कला की उत्कृष्टता की पहचान बनता है। गुरुदेव कहते थे—विकल्प वृत्ति या कल्पना साधारण चीज नहीं है। यह योगियों, साधकों एवं मनस्वियों की चेतना शक्ति का माध्यम बनती है। इसके माध्यम से उनके प्राण प्रवाहित होते हैं। पश्चिम में एक मनोवैज्ञानिक हुए हैं- ‘कुए’। उसने अपने अनगिनत प्रयोगों से कल्पना शक्ति के चमत्कार को साबित कर दिखाया। उसने इस शक्ति का प्रयोग बड़े कठिन एवं जटिल रोगों से ग्रसित लोगों पर किया। अपने प्रयोगों में उसने इन रोगियों से कहा- ‘तुम अपने मन में प्रगाढ़ कल्पना करो कि मैं स्वस्थ हो रहा हूँ। अपना हर पल-हर क्षण इसी कल्पना में बिताओ।’ इस प्रयोग से कुए ने लाखों असाध्य रोगियों को ठीक किया।
  
अब तो पश्चिम में फेथ हीलिंग की एक समूची प्रक्रिया ही चल पड़ी है। यह और कुछ नहीं कल्पना शक्ति की प्रगाढ़ता से होने वाले परिणामों की चमत्कारी विधि है। इसकी महत्ता को न समझ करके हम इस बेशकीमती शक्ति का भारी दुरुपयोग करते हैं। परम पूज्य गुरुदेव कहा करते थे- कल्पना का सर्वश्रेष्ठ उपयोग शाश्वत् अनन्तता की अनुभूति में है। विश्व चिन्तन ने मनुष्य जाति को जो सर्वश्रेष्ठ कल्पनाएँ दी हैं, उनमें श्रेष्ठतम कल्पनाएँ उपनिषदों में है। इनमें से किसी एक को भी अपनाकर हम अपने जीवन को सार्थक कर सकते हैं। सोऽहम, अहं ब्रह्मास्मि जैसे श्रेष्ठतम महत्त्वाकांक्षाओं को जीवन में धारण कर कल्पना शक्ति की सहायता से उस परम तत्त्व की अनुभूति पायी जा सकती है।
  
.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ३७
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 अध्यात्म-लक्ष और उसका आवश्यक कर्तृत्व (भाग ३)

मैं अकेला नहीं हम सब

इस तथ्य को भगवान बुद्ध जानते थे। इसलिए उन्होंने अपना कार्यक्रम सुनिश्चित रूप से स्थिर कर लिया था। वे बारबार कहा करते थे कि—‟जब तक एक भी प्राणी इस बन्धन में है तब तक मैं मुक्त नहीं हो सकता। मैं हर बार जन्म लेकर दूसरों को मुक्ति की प्रेरणा दूँगा और जब तक कोई भी जीव भव-बन्धनों में बंधा मिलेगा तब तक उसे छुड़ाने को ही अपना लक्ष बनाये रहूँगा।” सामाजिक जीवन का व्यक्तिगत जीवन से अटूट संबंध है। समाज की उपेक्षा करके एक व्यक्ति यदि अपनी ही भलाई की बात सोचता है तो यह उसकी संकीर्णता है। संकीर्ण दृष्टिकोण वाला व्यक्ति कैसे अध्यात्मवादी कहला सकता है? और कैसे उस संकुचित हृदय वाले तुच्छ व्यक्ति को परमात्मा की महानता को समझने और प्राप्त करने का अवसर मिल सकता है? परमात्मा दूसरों के लिए ही सब कुछ करने में निरन्तर संलग्न है, फिर उसका सच्चा भक्त अनुदार, स्वार्थी, संकीर्ण एवं केवल अपनी ही बात सोचने तक सीमित कैसे रह सकता है? साधक पर साध्य का कुछ तो प्रभाव पड़ना ही चाहिए। उदार, दानी, सहृदय, उपकारी परमात्मा का भक्त क्या इन गुणों से सर्वथा रहित ही रह जाएगा? क्या वह दूसरों की सेवा और सहायता करके समाज में सज्जनता एवं शान्ति बढ़ाने के लिए कुछ भी न करके केवल पूजा पाठ में ही बैठा रहेगा?

भगवान का मंदिर तोड़ा न जाय

शरीर भगवान का मन्दिर है। आत्मा का निवास होने से उसकी पवित्रता सब प्रकार अक्षुण्य रखे जाने योग्य है। मंदिर को तोड़-फोड़ डालने वाला व्यक्ति पापी और दुष्ट कहा जाता है। फिर असंयम और अनियमितताओं की कुल्हाड़ी चलाकर शरीर को तोड़-फोड़ डालने वाला मनुष्य भला धर्मात्मा कैसे हो सकता है? मंदिरों का सुधारना, जीर्णोद्धार कराना पुण्य कार्यों में गिना जाता है तो अपने या दूसरों के शरीरों को स्वस्थ एवं सुन्दर बनाना, आत्मा के निवास मंदिर को ठीक करना भी एक धर्म कार्य ही माना जाएगा। हममें से प्रत्येक धर्म प्रेमी और अध्यात्मवादी को ईश्वर उपासना की भाँति ही स्वास्थ्य की समुन्नति की ओर भी रुचि लेनी चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962 पृष्ठ 35

शुक्रवार, 4 सितंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग १८)

जीवन कमल खिला सकती हैं—पंच वृत्तियाँ
  
महर्षि पतंजलि कहते हैं कि यह शक्ति मन में है। परम पूज्य गुरुदेव कहा करते थे कि प्रमाण हमारे मन की वह उच्चतम क्षमता है, जो सामान्य क्रम में अविकसित अथवा अल्प विकसित या अर्धविकसित दशा में होती है। यदि यह क्षमता ठीक तरह से विकसित या जाग्रत् हो जाए, तो फिर जो कुछ भी जाना जाय सत्य होता है। साधारण तौर पर प्रायः मन की यह शक्ति अविकसित ही रह जाती है। इसका प्रयोग हो ही नहीं पाता। मन की इस शक्ति को समझने के लिए पूज्य गुरुदेव एक उदाहरण दिया करते थे। वह कहते थे- ‘मान लो तुम जिस घर में रहते हो, उस घर में बिजली-बत्ती तो है, पर उसके स्विच का तुम्हें पता नहीं। एकदम घनघोर-घुप अन्धेरा वहाँ छाया रहता है। अब तुम्हें रहना उसी घर में है, और स्विच के बारे में तुम्हें पता नहीं है, तो क्या स्थिति होगी? बस जैसे-तैसे टटोल कर काम चलाना पड़ेगा। कई बार ठोकरें लगेंगी। यह भी हो सकता है कि कई बार सिर फूटे और पैर टूटे। इस अंधेरे के कारण न जाने कितनी मुश्किलें खड़ी होंगी।’
  
अब यदि किसी तरह प्रयास, प्रयत्न से अथवा गुरुकृपा या भगवत्कृपा से बिजली का स्विच मिल जाय, यही नहीं वह स्विच ऑन हो जाय और घर के कोने-कोने में रोशनी बिखर जाय, हर ओर उजियारा फैल जाय, तो एक पल में सारी परेशानियाँ, सारी मुश्किलें समाप्त हो जाएँगी। फिर सब कुछ साफ-साफ नजर आएगा। सत्य प्रश्न या जिज्ञासा की विषय वस्तु न बनकर जीवन का अनुभव हो जाएगा। बस यही है प्रमाणवृत्ति। इसके विकसित होने का मतलब है कि हाथ में स्विच आ गया। कहीं किसी तरह की कोई भटकन नहीं। किसी से कुछ पूछने की भी जरूरत नहीं। किसी तरह के भ्रम अथवा सन्देह की भी कोई गुंजाइश नहीं।
  
बुद्ध, महावीर, श्री रामकृष्ण परमहंस, महर्षि रमण या फिर स्वयं परम पूज्य गुरुदेव इन सबमें इस प्रमाणवृत्ति की स्वाभाविक जागृति थी। गुरुदेव अपने जीवन काल में हजारों जगह गए और वहाँ लाखों लोगों से मिले। लोगों से मिलने का यह सिलसिला तब भी चलता रहा, जब उन्होंने कहीं भी आना-जाना बन्द कर दिया। जहाँ कोई जो भी मिला, गुरुदेव ने उसके प्रश्नों का बड़ी सहजता से समाधान कर दिया। कई बार तो पूछने वाले ने संकोचवश प्रश्न पूछा भी नहीं, और गुरुदेव ने उसके सवाल का सही जवाब दे दिया। उनके प्रवचनों में यह बात रोज ही देखी जाती थी। उस समय जिस किसी व्यक्ति की जो भी जिज्ञासा, शंका या प्रश्न होते, गुरुदेव उसी का समाधान करते। उनके प्रवचनों में एक साथ अनेकों के समाधान का सिलसिला चलता रहता था।
  
किसी के पूछने पर वह हँस देते और कहते- अरे भाई! तुम सोचते हो, टटोलते हो, उलझते हो और मैं सब कुछ साफ-साफ देखता हूँ। मुझे तुम्हारा प्रश्न भी दिखाई देता है, उत्तर भी। मुझे तो तुम्हारे वे अजन्मे सवाल भी दिखाई देते हैं जो कल जन्म लेंगे। साथ ही वे समाधान भी नजर आते हैं, जिनकी तुम्हें कल जरूरत होगी। यह होती है—प्रमाण वृत्ति। इसके विकास का मतलब है सहज बोध की प्राप्ति। फिर उधार के विचारों की, किसी तरह के तर्कजाल की, बौद्धिक जोड़-तोड़ की कोई जरूरत नहीं। गुरुदेव कहते थे कि गायत्री महामंत्र की भावभरी साधना से मन की यह शक्ति अपने आप ही कुछ वर्षों में जाग जाती है। साथ ही इस शक्ति के जागरण में अवरोध उत्पन्न करने वाली शक्ति समूल नष्ट हो जाती है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ३६
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 अध्यात्म-लक्ष और उसका आवश्यक कर्तृत्व (भाग २)

छलाँग नहीं लगाई जा सकती

जो साधक इन आरम्भिक बातों की उपेक्षा करते हैं और समाधि तक ही सीधे पहुँचना चाहते हैं, जीवन को सब प्रकार अस्त-व्यस्त और पतित-गलित स्थिति में पड़ा रखकर जो आध्यात्मिक पूर्णता की बात सोचते हैं, वे अतिवादी ही कहे जायेंगे। आग के बिना जैसे भोजन पका लेना कठिन है वैसे ही आत्मिक प्रगति के आवश्यक उपकरणों का परित्याग कर, शरीर मन और समाज को हीन स्थिति में रखने से प्रयोजन कैसे सिद्ध होगा? प्राचीन काल में कठिन तपश्चर्या और साधना का मार्ग अपनाकर लोग इन तीनों साधनों को शुद्ध करते थे। आज के जल्दबाज लोगों ने अमुक जगह स्नान कर लेने, अमुक पुस्तक पढ़ लेने, अमुक जप कर लेने मात्र से चुटकियों में परम-लक्ष की प्राप्ति की कल्पना आरम्भ कर दी है। स्नान, पाठ, जप का पूरा लाभ उन्हीं को मिल सकता है जिनके साधन सबल हैं। सब प्रकार की हीन और पतित स्थिति में पड़े हुए लोगों का केवल इन उपचारों का मात्र सहारा लेकर भव-सागर से पार हो सकना कठिन है। यदि यह मार्ग इतना ही सरल होता तो प्राचीन काल में किसी को इतनी कष्ट-साध्य, श्रम-साध्य और समय साध्य साधनाऐं न करनी पड़तीं। वे भी आज के लोगों की तरह कुछ उपचार मात्र करके सब कुछ प्राप्त कर लेने की बात क्यों न सोच लेते?

राजमार्ग यही रहा है

प्राचीन इतिहास पर जब हम दृष्टिपात करते हैं तो हमें अध्यात्म-लक्ष की प्राप्त करने वाले महापुरुषों में प्रथम सोपान की सफलता प्रत्यक्ष रूप से परिलक्षित होती है। जिन्होंने परमात्मा की प्राप्ति की, वे परशुराम, विश्वामित्र, अगस्त, शुक्राचार्य, द्रोणाचार्य आदि क्या शारीरिक दृष्टि से दुर्बल थे? अत्रि, वशिष्ठ, अंगिरा, याज्ञवल्क्य, भारद्वाज, गौतम आदि ऋषियों के मानसिक स्तर क्या गिरे हुये थे? समाज को अवसाद की ओर जाते देखकर उसे रोकने के लिए व्यास जी ने पुराणों की साहित्य रचना आरम्भ की थी। चरक, सुश्रुत, वागभट्ट ने आयुर्वेद शास्त्र का निर्माण किया था। नारद जी प्रचार के लिए परिव्राजक बन गये थे। परशुरामजी ने लड़ाई ही ठान दी थी। भगवान बुद्ध, महावीर, कबीर, नानक, गाँधी, दयानन्द, विवेकानन्द, रामतीर्थ आदि अर्वाचीन ऋषियों ने भी अस्वस्थ समाज को स्वस्थ बनाने के प्रयत्न को ही अपनी प्रधान साधना बना लिया था। वे जानते थे कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है। समाज का अधिक भाग पतित स्थिति में पड़ा रहे तो थोड़े से साधना-रत व्यक्तियों के लिए भी उस कीचड़ को पार कर सकना कठिन होगा। बलवान हाथी भी दलदल में फंस जाता है, पतित-समाज की परिस्थितियाँ ध्यान, भजन में संलग्न व्यक्तियों का मन भी अपने जाल में उलझा लेती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962 पृष्ठ 35

गुरुवार, 3 सितंबर 2020

👉 *** जिंदगी की कहानी ***

टॉल्सटॉय की प्रसिद्ध कहानी है कि एक आदमी के घर एक संन्यासी मेहमान हुआ – एक परिव्राजक। रात गपशप होने लगी; उस परिव्राजक ने कहा कि तुम यहाँ क्या छोटी-मोटी खेती में लगे हो। साइबेरिया में मैं यात्रा पर था तो वहाँ जमीन इतनी सस्ती है मुफ्त ही मिलती है। तुम यह जमीन छोड़-छाड़कर, बेच-बाचकर साइबेरिया चले जाओ। वहाँ हजारों एकड़ जमीन मिल जाएगी इतनी जमीन में। वहाँ करो फसलें और बड़ी उपयोगी जमीन है और लोग वहाँ के इतने सीधे-सादे हैं कि करीब-करीब मुफ्त ही जमीन दे देते हैं।
उस आदमी को वासना जगी। उसने दूसरे दिन ही सब बेच-बाचकर साइबेरिया की राह पकड़ी। जब पहुँचा तो उसे बात सच्ची मालूम पड़ी। उसने पूछा कि मैं जमीन खरीदना चाहता हूँ। तो उन्होंने कहा, जमीन खरीदने का तुम जितना पैसा लाए हो, रख दो; और जीवन का हमारे पास यही उपाय है बेचने का कि कल सुबह सूरज के ऊगते तुम निकल पड़ना और साँझ सूरज के डूबते तक जितनी जमीन तुम घेर सको घेर लेना।

बस चलते जाना… जितनी जमीन तुम घेर लो। साँझ सूरज के डूबते-डूबते उसी जगह पर लौट आना जहाँ से चले थे- बस यही शर्त है। जितनी जमीन तुम चल लोगे, उतनी जमीन तुम्हारी हो जाएगी।

रात-भर तो सो न सका वह आदमी। तुम भी होते तो न सो सकते; ऐसे क्षणों में कोई सोता है ? रातभर योजनाएँ बनाता रहा कि कितनी जमीन घेर लूँ। सुबह ही भागा। गाँव इकट्ठा हो गया था। सुबह का सूरज ऊगा, वह भागा। उसने साथ अपनी रोटी भी ले ली थी, पानी का भी इंतजाम कर लिया था। रास्ते में भूख लगे, प्यास लगे तो सोचा था चलते ही चलते खाना भी खा लूँगा, पानी भी पी लूँगा। रुकना नहीं है; चलना क्या है; दौड़ना है। दौड़ना शुरू किया, क्योंकि चलने से तो आधी ही जमीन कर पाऊँगा, दौड़ने से दुगनी हो सकेगी – भागा …भागा।

सोचा था कि ठीक बारह बजे लौट पड़ूँगा; ताकि सूरज डूबते – डूबते पहुँच जाऊँ। बारह बज गए, मीलों चल चुका है, मगर वासना का कोई अंत है? उसने सोचा कि बारह तो बज गए, लौटना चाहिए; लेकिन सामने और उपजाऊ जमीन, और उपजाऊ जमीन…थोड़ी सी और घेर लूँ। जरा तेजी से दौड़ना पड़ेगा लौटते समय – इतनी ही बात है, एक ही दिन की तो बात है, और जरा तेजी से दौड़ लूँगा।

उसने पानी भी न पीया; क्योंकि रुकना पड़ेगा उतनी देर – एक दिन की ही तो बात है, फिर कल पी लेंगे पानी, फिर जीवन भर पीते रहेंगे। उस दिन उसने खाना भी न खाया। रास्ते में उसने खाना भी फेंक दिया, पानी भी फेंक दिया, क्योंकि उनका वजन भी ढोना पड़ा रहा है, इसलिए दौड़ ठीक से नहीं पा रहा है। उसने अपना कोट भी उतार दिया, अपनी टोपी भी उतार दी, जितना निर्भार हो सकता था हो गया।

एक बज गया, लेकिन लौटने का मन नहीं होता, क्योंकि आगे और-और सुंदर भूमि आती चली जाती है। मगर फिर लौटना ही पड़ा; दो बजे तक वो लौटा। अब घबड़ाया। सारी ताकत लगाई; लेकिन ताकत तो चुकने के करीब आ गई थी। सुबह से दौड़ रहा था, हाँफ रहा था, घबरा रहा था कि पहुँच पाऊँगा सूरज डूबते तक कि नहीं। सारी ताकत लगा दी। पागल होकर दौड़ा। सब दाँव पर लगा दिया। और सूरज डूबने लगा…। ज्यादा दूरी भी नहीं रह गई है; लोग दिखाई पड़ने लगे। गाँव के लोग खड़े हैं और आवाज दे रहे हैं कि आ जाओ, आ जाओ! उत्साह दे रहे हैं, भागे आओ! अजीब सीधे-सादे लोग हैं – सोचने लगा मन में; इनको तो सोचना चाहिए कि मैं मर ही जाऊँ, तो इनको धन भी मिल जाए और जमीन भी न जाए। मगर वे बड़ा उत्साह दे रहे हैं कि भागे आओ!

उसने आखिरी दम लगा दी – भागा – भागा…। सूरज डूबने लगा; इधर सूरज डूब रहा है, उधर वो भाग रहा है…। सूरज डूबते – डूबते बस जाकर गिर पड़ा। कुछ पाँच – सात गज की दूरी रह गई है, घिसटने लगा।

अभी सूरज की आखिरी कोर क्षितिज पर रह गई. घिसटने लगा। और जब उसका हाथ उस जमीन के टुकड़े पर पहुँचा, जहाँ से भागा था, उस खूँटी पर, सूरज डूब गया। वहाँ सूरज डूबा, यहाँ यह आदमी भी मर गया। इतनी मेहनत कर ली! शायद हृदय कर दौरा पड़ गया। और सारे गाँव के सीधे – सादे लोग जिनको वह समझाता था, हँसने लगे और एक – दूसरे से बात करने लगे!

ये पागल आदमी आते ही जाते हैं! इस तरह के पागल लोग आते ही रहते हैं! यह कोई नई घटना न थी; अक्सर लोग आ जाते थे खबरें सुनकर, और इसी तरह मरते थे। यह कोई अपवाद नहीं था; यही नियम था। अब तक ऐसा एक भी आदमी नहीं आया था, जो घेरकर जमीन का मालिक बन पाया हो।

यह कहानी तुम्हारी कहानी है, तुम्हारी जिंदगी की कहानी है, सबकी जिंदगी की कहानी है। यही तो तुम कर रहे हो – दौड़ रहे हो कि कितनी जमीन घेर लें! बारह भी बज जाते हैं, दोपहर भी आ जाती है, लौटने का भी समय होने लगता है – मगर थोड़ा और दौड़ लें! न भूख की फिक्र है, न प्यास की फिक्र है।

जीने का समय कहाँ है; पहले जमीन घेर लें, पहले जितोड़ी भर लें, पहले बैंक में रुपया इकट्ठा हो जाए, फिर जी लेंगे, फिर बाद में जी लेंगे, एक ही दिन का तो मामला है। और कभी कोई नहीं जी पाता। गरीब मर जाते हैं भूखे; अमीर मर जाते हैं भूखे, कभी कोई नहीं जी पाता। जीने के लिए थोड़ी विश्रांति चाहिए। जीने के लिए थोड़ी समझ चाहिए। जीवन मुफ्त नहीं मिलता।

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग १७)

जीवन कमल खिला सकती हैं—पंच वृत्तियाँ

ऐसा अनूठा रूप परिवर्तित करने वाली वृत्तियाँ हैं कौन सी, इस तत्व को छठे सूत्र में महर्षि पतंजलि इस तत्त्व को और भी अधिक सुस्पष्ट करते हैं। इस सूत्र में वह कहते हैं-
प्रमाणविपर्यय विकल्पनिद्रास्मृतयः॥ १/६॥
  
यानि कि ये वृत्तियां हैं- प्रमाण (सम्यक् ज्ञान), विपर्यय (मिथ्याज्ञान), विकल्प (कल्पना), निद्रा और स्मृति। ये पाँचों वृत्तियाँ मन की पाँच सम्भावनाएँ हैं, मन के पाँच रहस्य हैं। इन्हें जान-समझ लेने पर समूचे मन को जान-समझ लिया जाता है।  इन पाँच वृत्तियों को मन की पाँच शक्तियाँ भी कहा जा सकता है, जिनके सही सदुपयोग से जीवन सहस्रदल कमल की भांति पुष्पित एवं सुरभित हो उठता है।
  
इस बारे में परम पूज्य गुरुदेव कहा करते थे कि जीवन को समझना है, तो मन को समझना होगा और मन को समझने के लिए मन की पाँचों वृत्तियों को जान लेना बहुत जरूरी है। तो शुरूआत पहली वृत्ति से करते हैं। यह पहली वृत्ति है ‘प्रमाण’ यानि कि सम्यक् ज्ञान। ‘प्रमाण’ संस्कृत भाषा का बहुत गहरा शब्द है। इसकी गहराई इस कदर है कि किसी भी अन्य भाषा में इसका एकदम सही अनुवाद सम्भव नहीं। यह जो सम्यक् ज्ञान कहा गया, वह ‘प्रमाण’ का सही अर्थ नहीं, बल्कि अर्थ की हल्की सी छाया भर है। दरअसल प्रमाण मूल शब्द ‘प्रमा’ से आया है। इसका भावार्थ है- सत्य-अनुभव। इस प्रमा का करण यानि की प्रमाण। सार संक्षेप में प्रमाण को यथार्थ अनुभव सा सत्य अनुभव करने की शक्ति कहा जा सकता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ३५
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 अध्यात्म-लक्ष और उसका आवश्यक कर्तृत्व (भाग १)

आत्म-कल्याण का लक्ष प्राप्त करने के लिए आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण और आत्म-विकास की प्रक्रिया को अपनाना आवश्यक है। जप, तप, ध्यान-भजन की सारी आध्यात्मिक विधि व्यवस्था इसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए है। पर यह उद्देश्य जिन साधनों से प्राप्त होता है वह शरीर, मन और समाज हैं। इनके सुव्यवस्थित रहे बिना आत्म-कल्याण का लक्ष प्राप्त होना तो दूर जीवित रहने के दिन कटने भी कठिन हो जाते हैं। साधना का प्रथम सोपान, बाह्य-जीवन को सुव्यवस्थित बनाते हुए आत्मिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त करना है। इस प्रथम कक्षा को उत्तीर्ण किये बिना जो लोग छलाँग मारकर ऊपर चोटी पर चढ़ना चाहते हैं, सीधे प्रत्याहार, समाधि, चक्र-वेधन, कुण्डलिनी जागरण की बात सोचते हैं उन्हें असफलता ही मिलती है। आत्मिक पूर्णता का लक्ष मलीन और दूषित साधनों से कैसे प्राप्त किया जा सकेगा?

लक्ष की ओर गति

स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन और सभ्य समाज के सहारे ही आत्मा अपने लक्ष की ओर गतिवान होती है। इसलिए प्रगति की इस पहली मंजिल को हमें सावधानी से पूरा करना चाहिए। इसके बाद अगली मंजिलें बहुत ही सरल हो जाती हैं। प्रथम कक्षा कमजोर रहे तो आगे का काम कैसे चलेगा? जिसके पैर ही कमजोर हैं उससे दौड़ कैसे लगाई जा सकेगी? जिसने प्राथमिक पाठशाला के स्वर, व्यंजन, गिनती, पहाड़े ही ठीक तरह याद नहीं किए हैं, उसके लिए एम.ए. की उत्तीर्णता का स्वप्न, काल्पनिक ही रह जाएगा।

योग-साधना में पहले यम-नियमों की साधना करनी पड़ती है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह—यम और शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान—नियम इन दसों बातों पर बारीकी से ध्यान दिया जाय तो स्पष्ट हो जाता है कि इनका उद्देश्य शारीरिक, मानसिक और सामाजिक सुव्यवस्था ही है। ब्रह्मचर्य, शौच और तप का कार्यक्रम शारीरिक स्वास्थ्य की दृष्टि से रखा गया है। इन्द्रियों का संयम ब्रह्मचर्य के अन्तर्गत आता है। शरीर, वस्त्र, घर एवं उपकरणों की स्वच्छता का तात्पर्य शौच है। तप का अर्थ है शारीरिक और मानसिक श्रम—आसन, प्राणायाम, व्यायाम, तितिक्षा, कष्ट-सहिष्णुता आदि। इन्हीं या ऐसे ही सद्गुणों से स्वास्थ्य की रक्षा होती है। सत्य, सन्तोष, स्वाध्याय और ईश्वर उपासना यह चार आधार मानसिक स्वच्छता के लिए हैं। छल-कपट, दंभ-पाखंड आदि कुविचारों का शमन सत्य-निष्ठा से होता है। सन्तोषी को तृष्णाऐं और वासनाऐं क्यों सतावेंगी? स्वाध्याय और मनन-चिन्तन करते रहने से मन की मलीनता हटेगी ही। ईश्वर का उपासक सर्वत्र उस अंतर्यामी को उपस्थित देखेगा तो क्यों पाप में प्रवृत्त होगा और क्यों भय, चिन्ता, शोक, निराशा आदि में डूबेगा? इसी प्रकार सामाजिक सुव्यवस्था के लिए अहिंसा, अस्तेय और अपरिग्रह हैं। दूसरों में अपनी ही आत्मा देखकर उनसे प्रेम, सहयोग एवं उदारता का व्यवहार करना अहिंसा है। अपनी न्यायेपार्जित कमाई पर ही गुजारा करना अस्तेय है और निर्वाह की अनिवार्य आवश्यकताओं से बची हुई प्रतिभा, विद्या, क्षमता, समय एवं सम्पत्ति को समाज के हित में वापिस लौटा देना, दान कर देना अपरिग्रह है। इन्हीं तथ्यों पर कोई समाज फलता-फूलता और संगठित रहता है। यम और नियम योग-साधना के प्राथमिक कार्यक्रम हैं। योग से ही आत्मा की प्राप्ति संभव है। इसलिए लक्ष पूर्ति की सच्ची अभिलाषा जिन्हें है उन्हें सच्चा मार्ग भी अपनाना पड़ता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962 पृष्ठ 34

👉 Heard the Bhagwat four times

Parikshit Maharaj heard Bhagwat Puran from Shukdeo and attained salvation. A rich man on hearing this, developed great respect for the Bhagwat, and got eager to listen to it from a Brahmin to get liberated.

He searched and found a profound priest of Bhagwat. He told him his intention of hearing the Bhagwat. The priest told him that this is Kaliyug, all the pious activities in this age is reduced four times, thus he had to listen to it for four times. The reason behind the priest’s proposition was to get enough money out of the deal. He gave the fees to the priest and heard four Bhagwat lectures but it was of no use. The man then met a higher level of saint. He asked him, how Parikshit could get and he didn’t after listening to the Bhagwat.

The saint told him, that Parikshit Maharaj had known the death to be imminent and was completely detached from the world while hearing and Shukdeo Muni was narrating without the feeling of any kind of greed.

Whoever has got the knowledge in the form of an advice, free of any kind of self vested interests, that has produced desired results.

📖 Pragya Puran Stories

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 April 2026

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