मंगलवार, 14 जनवरी 2020

👉 यार~यार की लड़ाई

एक बार एक महात्मा जी बीच बाजार में से कहीँ जा रहे थे। वहीं पास के एक कोठे की छत पर एक वैश्या पान खा रही थी। अचानक उसने बेख्याली से उसने पान की पीक नीचे थूकी और वो पीक नीचे जा रहे महात्मा जी के ऊपर गिरी।

महात्मा जी ने ऊपर देखा वेश्या की ओर तथा मुस्करा कर आगे की और बढ़ गए। यह देखकर वैश्या को अपना अपमान समझ, गुस्सा आया। उसने वहीं पर बैठे अपने यार को कहा कि तुम्हारे होते, कोई मुझे देखकर मुस्कुरा रहा है और तुम यहाँ बैठे हो।

इतना सुनकर उसके यार ने वहीं पड़ा डंडा उठाया और नीचे उतरकर आगे जा रहे महातमा जी के सर पर जोर से दे मारा और वैश्या की तरफ देखकर मुस्कुराया, कि देख, मैंने बदला ले लिया है।

महात्मा जी ने अपना सर देखा जिसमे से खून निकल रहा था। तब भी महात्मा जी कुछ नहीं बोले और मुस्करा दिए और वहीं पास के एक पेड़ के नीचे बैठ गए। उस वैश्या का यार मुस्कुराता हुआ वापस लौटने लगा। जब वो कोठे की सीढ़ियां चढ़ रहा था, तो सबसे ऊपर की सीढ़ी से उसका पैर फिसला और वो सबसे नीचे आ गिरा और उसके बहुत ज्यादा चोट लगी।

ये सब वो वैश्या देख रही थी और वो समझ गई कि वो महात्मा जी बहुत ही नाम जपने वाले और सच्चे है। वो नीचे आई और महात्मा जी के पास जाकर पैरो में गिरकर बोली - महात्मा जी मुझे माफ़ कर दो मैंने ही आपके पीछे अपने यार को भेजा था। उसने ही आपके सर पर वार किया था मुझे माफ़ कर दो ।

तो उन महात्मा जी ने मुस्करा कर कहा कि बेटी इस सारे झगड़े में तू और मैं कहाँ से आ गए। इसमें  तुम्हारा और मेरा कोई दोष नहीं है ये यार~यार की लड़ाई है। "तुम्हारे यार से तुम्हारी बेइज्जती नहीं देखी गई" और मेरा यार जो वो ऊपरवाला है उससे मेरी तकलीफ नहीं देखी गई। इसलिए इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है। और तुम्हारा यार तो तुम्हारे पास कभी कभी ही आता है कभी दिन में कभी रात में, लेकिन मेरा यार हर वक़्त मेरे साथ ही रहता है।

इसलिए तुम भी उसी की शरण लो जो हर वक़्त तुम्हारे साथ ही रहे। "जिंदगी में भी और जिंदगी के बाद भी "

👉 विदुर का भोजन और श्रीकृष्ण


👉 असंयम ही रोग का कारण

स्वास्थ्य संयम पर निर्भर है। इन्द्रियों का संयम, आहार का संयम, ब्रह्मचर्य का संयम, दिनचर्या का संयम, उत्तेजनाओं का संयम यदि रखा जा सके तो फिर स्वास्थ्य बिगड़ने का प्रारब्धजन्य कर्म भोगों के अतिरिक्त और कोई कारण शेष नहीं रह जाता। यदि संयम साध लिया जाय तो गरीबी में दिन काटने वाला, घटिया आहार पाकर भी निरोग और दीर्घजीवी रह सकता है। इसके विपरीत असंयमी व्यक्ति विपुल धनवान होकर मूल्यवान आहार और औषधियों का सहारा मिलने पर भी रोगों से ग्रसित बना रहेगा। कमजोरी और बीमारी का अभिशाप असंयम के दंड स्वरूप मिलता है। यदि इन आपत्तियों से छूटना हो तो अपनी उच्छृंखल आदतों को संयमित करना पड़ेगा। इसके बिना स्वास्थ्य सुधार के जितने भी उपाय किये जायेंगे वे क्षणिक चमत्कार भले ही दिखा दें अन्ततः असफल ही रहेंगे।

कोई औषधि कोई पद्धति ऐसी नहीं है जो असंयम के रहते हुए आरोग्य को सुरक्षित रख सके। जिसने संयम साध लिया उसके लिए उपयोगी आहार का कोई विशेष महत्त्व नहीं रह जाता। घास खाकर घोड़ा, पत्ती खाकर हाथी, मैला खाकर सुअर यदि बलवान रह सकता है तो कोई कारण नहीं कि अन्न शाक और दूध जैसे उत्तम पदार्थ प्राप्त करके भी मनुष्य निरोग एवं दीर्घजीवी न रह सके। असंयम ही वह असुर है जो हमारी स्वास्थ्य संपदा को सब प्रकार चौपट किये दे रहा है। इसे मार भगाने का व्यापक अभियान यदि आरंभ किया जाय तो ही स्वास्थ्य की समस्या हल हो सकेगी। अस्पताल और डाक्टर तो क्षणिक उपचार कर सकते हैं, तात्कालिक लाभ दिखा सकते हैं। आरोग्य तो हमारी आदतों पर निर्भर है, यदि जीवन-यापन संबंधी आदतें बिगड़ी हुई हैं तो निरोगता को स्थिर रख सकना किसी भी प्रकार संभव न होगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962

👉 QUERIES ABOUT JAP AND DAILY UPASANA (Part 1)

Q.1. What is significance of correct pronunciation of the Mantra?

Ans. All Ved Mantras have a poetic composition (syntax) with specified musical notes. When a Mantra is recited acoustic vibrations surpassing ultrasonic frequencies are produced. These waves travel in an “extra-sensory telepathic medium” enveloping the cosmos and interact with the thought processes of all living beings. In order to strengthen the intensity of these waves, the Gayatri Mantra is recited in course of Yagya-Havan, on auspicious occasions and at the beginning of all religious ceremonies. Three different types of musical (phonetic) compositions are mentioned for the Gayatri Mantra  in the Vedas. The one specified in the Yajurveda is recommended for the masses.

Q.2. What is the methodology of chanting of Mantra during Jap?

Ans. During the routine, solo Jap, the Mantra is pronounced in such a way that although there is a slight movement of lips, larynx and tongue, it produces a resonance inaudible to anyone except the worshipper. In a mass the Mantra is pronounced loudly in unison.

Q.3. How is it possible for illiterate persons and children to do Gayatri Sadhana, for whom the pronunciation of the Mantra is somewhat difficult? 
              
Ans. Illiterate persons who cannot utter Gayatri Mantra correctly, can perform Jap of Panchakshari Gayatri “Om bhoor Bhuvaha Swaha.” If they cannot utter even these words correctly, they can perform Jap of  “Hari Om Tat-Sat.” This also serves the purpose of Panchakshari Gayatri Mantra.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 51

👉 गुरुगीता

गुरुगीता शिष्यों का हृदय गीत है। गीतों की गूँज हमेशा हृदय के आँगन में ही अंकुरित होती है। मस्तिष्क में तो सदा तर्कों के संजाल रचे जाते हैं। मस्तिष्क की सीमा बुद्धि की चहारदिवारी तक है, पर हृदय की श्रद्धा सदा विराट् और असीम है। मस्तिष्क तो बस गणितीय समीकरणों की उलझनों तक सिमटा रहता है। इसे अदृश्य, असम्भव, असीम एवं अनन्त का पता नहीं है। मस्तिष्क मनुष्य में शारीरिक-मानसिक संरचना व क्रिया की वैज्ञानिक पड़ताल कर सकता है, परन्तु मनुष्य में गुरु को ढूँढ लेना और गुरु में परमात्मा को पहचान लेना हृदय की श्रद्धा का चमत्कार है।
  
गुरुगीता के महामंत्र इसी चमत्कारी श्रद्धा से सने हैं। इनकी अनोखी-अनूठी सामर्थ्य का अनुभव श्रद्धावान् कभी भी कर सकते हैं। योगेश्वर श्रीकृष्ण के वचन हैं-‘श्रद्धावान् लभते ज्ञानं’ जो श्रद्धावान् हैं वही ज्ञान पाते हैं। यह श्रद्धा बड़ी दुस्साहस की बात है। कमजोर के बस की बात नहीं है, बलवान की बात है। श्रद्धा ऐसी दीवानगी है कि जब चारों तरफ मरूस्थल हो और कहीं हरियाली का नाम न दिखाई पड़ता हो, तब भी श्रद्धा भरोसा करती है कि हरियाली है, फूल खिलते हैं। जब जल का कहीं कण भी न दिखाई देता हो, तब भी श्रद्धा मानती है कि जल के झरने हैं, प्यास तृप्त होती है। जब चारों तरफ पतझड़ हो तब भी श्रद्धा में वसन्त ही होता है।
  
जो शिष्य हैं उनका अनुभव यही कहता है कि श्रद्धा में वसन्त का मौसम सदा ही होता है। श्रद्धा एक ही मौसम जानती है-वसन्त। बाहर होता रहे पतझड़, पतझड़ के सारे प्रमाण मिलते रहें, लेकिन श्रद्धा वसन्त को मानती है। इस वसन्त में भक्ति के गीत गूँजते हैं। समर्पण का सुरीला संगीत महकता है। जिनके हृदय भक्ति से सिक्त हैं, गुरुगीता के महामंत्र उनके जीवन में सभी चमत्कार करने में सक्षम हैं। अपने हृदय मंदिर में परम पूज्य गुरुदेव की प्राण-प्रतिष्ठा करके जो भावभरे मन से गुरुगीता का पाठ करेंगे, उनका अस्तित्व गुरुदेव के दुर्लभ अशीषों की वृष्टि से भीगता रहेगा। गुरुगीता उन्हें प्यारे सद्गुरु की दुर्लभ अनुभूति कराती रहेगी। ऐसे श्रद्धावान् शिष्य की आँखों से करुणामय परम पूज्य गुरुदेव की झाँकी कभी ओझल न होगी।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १६१

👉 चुनौतियों से कैसे लड़े

कंकड़ इतना छोटा सा की ऊंगली पर आ जाए। किन्तु यदि सोचिये यही कंकड़ आँख में लग जाए, तो कितनी बड़ी समस्या बन जाता है? अब सोचिये ये कंकड़ आपके मार्ग में है, आप पादुकाएँ पहन बड़ी सरलता से आगे निकल जा सकते हैं। किन्तु यही कंकड़ आपके पांव और पादुकाओं के बीच फँस जाए, तो आप ठीक से चल नहीं पायेंगे, भले ही वो मार्ग पुष्पों से भरा क्यों न हो। अर्थात आप बाहर की समस्याओं से उन चुनौतियों से लड़ सकते हैं, भीतर की नहीं। भीतर की समस्याओं से लड़ना अत्यंत कठिन होता है। इसलिये सर्वप्रथम आप भीतर से शक्तिशाली हो जाइये, भीतर से पूर्ण हो जाइये, फिर आप इस संसार की सब चुनौतियों, समस्याओं से लड़ सकते हैं। विजयी हो सकते हैं।

सोमवार, 13 जनवरी 2020

👉 अहंकार का प्रदर्शन


👉 नव निर्माण हेतु विभूतियों का आह्वान (अन्तिम भाग)

(६) सम्पदा-विभूतियों में इन दिनों सर्वोपरि मान्यता पूँजी को मिली है। धन का वर्चस्व सर्वविदित है। सम्पत्ति में स्वयं कोई दोष नहीं। दोष उसके दुरुपयोग में है। व्यक्तिगत विलासिता में, अहंता की वृद्धि में यदि उसका उपयोग होता है, संग्रह बढ़ता है एवं उसका लाभ बेटे-पोतों तक ही रखने का प्रयत्न किया जाता है, तो निस्संदेह ऐसा धन निन्दनीय है। अगले दिनों समता के आधार पर ही समाज व्यवस्था बनेगी। सामर्थ्य भर श्रम एवं आवश्यकता भर साधन प्राप्त करने का क्रम चले तभी सम्पदा पर व्यक्ति का नहीं समाज का अधिकार होगा। न कोई गरीब दिखाई देगा न अमीर। पर जब तक वह स्थिति नहीं बन जाती तब तक संग्रहीत पूँजी को लोकमंगल के लिए लगाने की दूरदर्शिता दिखाने के लिए धनपतियों को कहा जायेगा।

दान न सही कम से कम इतना तो होना ही चाहिए कि युग परिवर्तित का पथ प्रशस्त करने वाले प्रचारात्मक कार्यक्रमों में पूँजी की कमी न पड़े। भले ही यह व्यवसाय बुद्धि से किया जाय तो भी इतना होना ही चाहिए कि युग परिवर्तन के प्रवाह में अनुकूलता उत्पन्न करने वाला विनियोग इस पूँजी का हो सके। पिछले पृष्ठों पर ऐसे कितने ही क्रिया कलापों की चर्चा की गई है, जिसमें पूँजी के रूप में भी यदि धन लग सके, यदि उन क्रिया कलापों को व्यावसायिक रूप में खड़ा किया जा सके तो भी बहुत कुछ हो सकता है। (१) साहित्य प्रकाशन (२) चित्र प्रकाशन (३) अभिनय मंडलियाँ (४) ग्रामोफोन रिकार्ड (५) फिल्म निर्माण। यह पाँच कार्य ऐसे हैं, जिनके लिए विशालकाय अर्थसंस्थान खड़े किये जाने चाहिए और लोकमानस को परिष्कृत बनाने की आवश्यकता पूरी की जानी चाहिए।

(७) प्रतिभायें-प्रतिभा एक वशिष्ठ और अतिरिक्त विभूति है। कुछ लोगों के व्यक्तित्व ऐसे साहसी, स्फूर्तिवान् सूक्ष्मदर्शी, मिलनसार, क्रियाकुशल और प्रभावशाली होते हैं कि वे जिस काम को भी हाथ में लें उसी को अपने मनोयोग एवं व्यवहार कुशलता के आधार पर गतिशील बनाते चले जाते है और सफलता के उच्च शिखर तक पहुँचा देते हैं। इस विशेषता को प्रतिभा कहते हैं। सूझबूझ, आत्म विश्वास, कर्मठता जैसे अनेक सद्गुण उनमें भरे रहते हैं। आमतौर से ऐसे ही लोग महान कार्यों के संस्थापक एवं संचालक होते हैं। सफलतायें उनके पीछे छाया की तरह फिरती हैं, क्योंकि उन्हें ज्ञान होता है कि कठिनाइयों से कैसे निपटा जाता है, उन्हें सरल कैसे बनाया जाता है।

प्रतिभाशाली व्यक्ति ही सफल सन्त, राजनेता, समाजसेवी, साहित्यकार, कलाकार, व्यवसायी, व्यवस्थापक होते देखे गये हैं। प्रतिभाएँ ही डाकू, चोर, ठग जैसे दुस्साहस पूर्ण कार्य करती हैं। सेनाध्यक्षों के रूप में, लड़ाकू योद्धाओं के रूप में उन्हें ही अग्रिम पंक्ति में देखा जाता है। क्रान्तिकारी भी इसी तरह के लोग बनते हैं। प्रतिभाशाली तत्व जहाँ कहीं भी चमक रहे हो वहाँ से उन्हें आमंत्रित किया जा रहा है कि वे अपने ईश्वरीय अनुदान को निरर्थक विडम्बनाओं में खर्च न करें वरन् उसे नव निर्माण के ऐसे महान प्रयोजन में नियोजित कर दें जिसमें उनका, उनकी प्रतिभा का तथा समस्त संसार का हित साधन हो सके।

.....समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 युवा शक्ति

संवेदना और साहस की सघनता में युवा शक्ति प्रज्वलित होती है। जहाँ भाव छलकते हों और साहस मचलता हो, समझो वहीं यौवन के अंगारे शक्ति की धधकती ज्वालाओं में बदलने के लिए तत्पर हैं। विपरीतताएँ इसे प्रेरित करती हैं, विषमताओं से इसे उत्साह मिलता है। समस्याओं के संवेदन इसमें नयी ऊर्जा का संचार करते हैं। काल की कुटिल व्यूह रचनाओं की छुअन से यह और अधिक उफनती है और तब तक नहीं थमती जब तक कि यह इन्हें पूरी तरह से छिन्न-भिन्न न कर दे।
  
हारे मन और थके तन से कोई कभी युवा नहीं होता, फिर भले ही उसकी आयु कुछ भी क्यों न हो? यौवन तो वहीं है, जहाँ शक्ति का तूफान अपनी सम्पूर्ण प्रचण्डता से सक्रिय है। जो अपने महावेग से समस्याओं के गिरि शिखरों को ढहाता, विषमताओं के महावटों को उखाड़ता और विपरीतताओं के खाई-खड्ढों को पाटता चलता है। ऐसा क्या है? जो युवा न कर सके? ऐसी कौन सी मुश्किल है जो उसकी शक्ति को थाम ले? अरे वह युवा शक्ति की क्या? जिसे कोई अवरोध रोक ले।
  
समस्याओं की परिधि व्यक्तिगत हो या पारिवारिक, सामाजिक-राष्ट्रीय हो अथवा वैश्विक, युवा शक्ति इनका समाधान करने में कभी नहीं हारी है। रानी लक्ष्मीबाई, वीर सुभाष, स्वामी विवेकानन्द, शहीद भगतसिंह के रूप में इसके अनगिन आयाम प्रकट हुए हैं। यह प्रक्रिया आज भी जारी है। देह का महाबल, प्रतिभा की पराकाष्ठा, आत्मा का परम तेज और सबसे बढ़कर महान उद्देश्यों के लिए इन सभी को न्यौछावर करने के बलिदानी साहस से युवा शक्ति ने सदा असम्भव को सम्भव किया है। इनकी एक हुंकार से साम्राज्य सिमटे हैं, राज सिंहासन भूलुंठित हुए हैं और नयी व्यवस्थाओं का नवोदय हुआ है।
    
सचमुच ही यौवन भगवती महाशक्ति का वरदान है। यहाँ वह अपनी सम्पूर्ण महिमा के साथ प्रदीप्त होती है। दुष्ट दलन, सद्गुण पोषण एवं कलाओं के सौन्दर्य सृजन के सभी रूप यहीं प्रकट होते हैं। ध्यान देने की बात यह है कि यौवन में शक्ति के महानुदान मिलते तो सभी को हैं, पर टिकते वहीं हैं जहाँ इनका सदुपयोग होता है। जरा सा दुरुपयोग होते ही शक्ति यौवन की संहारक बन जाती है। कालिख की अँधेरी कालिमा में इसकी प्रभा विलीन होने लगती है। इसलिए युवा जीवन की शक्ति सम्पन्नता सार्थक यौवन में ही संवर्धित हो पाती है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १५९

👉 FALLACIES ABOUT SCRIPTURAL RESTRICTIONS (Part 5)

Q.5. Is audible chanting of Gayatri scripturally permissible?
Ans. Some people say that Gayatri Mantra being a “secret” Mantra should only be whispered in the ear during initiation. This may apply to Tantrik Mantras but not to Gayatri Mantra. According to scriptures the Ved Mantras should be chanted loudly with tune or accent according to specified notation. Whispering is needed only for secrecy and it is done in seclusion in conspiracies. There is nothing in Gayatri Mantra necessitating such a secrecy.  

Nowhere in the scriptures, audible chanting of Gayatri is forbidden. The tradition of whispering the Mantra in the ears of the person being initiated owes its origin to the vested interests of the dark middle ages, when a particular class of society amongst the Hindus claimed exclusive rights to Gayatri worship and its initiation in order to prove its superiority in spiritual matters. Nothing can be more ludicrous than preaching secrecy and advocating intellectual proprietary rights on worship of God. (During the medieval period the Popes in Europe indulged in similar corrupt practices.)    In fact, the scriptures clearly emphasize the need to rhyme the Gayatri Mantra . In Devi Bhagwat (11.3.11) it is mentioned that “Since it protects its singer, it is known as Gayatri”. The ‘Chandogyaupnishad” (Shankar Bhasya) too confirms this assertion. The ‘Niruktam’ says that since this Mantra was used by the Devtas for praying (Stuti), it came to be known as Gayatri Mantra (7.12). Besides, literally the word Gayatri is composed of two words- Gai and Train. In sanskrit Gai stands for ‘To sing’ and Train means ‘to look after’ or ‘to protect’, i.e. it protects the one who sings it.

Hence, arguments against audible chanting of this Mantra have no basis whatsoever.
          
Ordinarily Jap should be performed in such a way that throat, lips, tongue may go on moving but even a person sitting close by may not be able to hear. It is possible to have estimation of average time and number of Japs with the help of a Mala. Those who do not possess a Mala can estimate the number approximately with the help of time. Tulsi, Sandal-wood Malas are most appropriate ones for performance of Jap. For Tantrik applications Rudraksh Malas are used.
  
Ordinarily, words are pronounced by the movement of throat, palate, tongue, lips etc., According to spiritual science it is also mentioned that there are some subtle centres, channels etc. within the human body which vibrate along with utterance of words.      
As soon as the key of a type-writer is pressed, there is a stroke on the paper and the particular letter is typed on it. The letters of Gayatri Mantra have been selected in such a manner that by utterance thereof specific ultrasonic sound waves are created and positive attributes of Gun (virtues), Karma (action) and Swabhav (nature) get activated. A  Sadhak gains spiritually as well as materially by this Sadhana.
  
Mental Jap without moving the lips can be performed during illness or in a journey when a person cannot take a bath and during the period of Sootak when there is birth or death in a family. It can also be done while walking on a the road or lying on the bed at night.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 49

Om Namah Namo Omkar | ॐ नमः नमो ओमकार | Shantikunj Haridwar



Title

शनिवार, 11 जनवरी 2020

👉 नारी का सम्मान


👉 दिमाग की शक्ति


👉 भारत माता

भारत माता का आँचल हिमालय के श्वेत शिखरों से लेकर केरल की हरियाली तक फैला हुआ है। कन्याकुमारी के महासागर की तरंगों में इसकी तिरंगी आभा लहराती है। माता अपने आँचल में अपनी सभी एक सौ तीस करोड़ संतानों को समेटे हुए हैं। सभी जातियाँ, सभी वंश इसी की कोख से उपजे हैं। अपनी छाती चीरकर सभी के लिए पोषण की व्यवस्था जुटाती है। संतानों का सुख ही इस माँ का सुख है, संतानों का दुःख ही इसकी पीड़ा।
  
इस प्रेममयी जननी ने अपने पुत्रों के लिए, पुत्रियों के लिए बहुत कुछ सहा है। परायों के आघातों ने इसे कष्ट तो दिया, पर इसके धैर्य को डिगा नहीं पाये। गोरी, गजनी जैसे आक्रान्ताओं की मर्मान्तक चोटों को इसने न केवल सहा, बल्कि उन्हें उदारतापूर्वक क्षमा भी किया। तैमूरलंग, चंगेजखान की क्रूरताओं को इसने बिना विचलित हुए बर्दाश्त किया। यहाँ तक कि इन सभी के वंशजों को अपनी संतान समझकर अपने आँचल की छाँव दी।
  
यह क्षमामयी माता बिलखी तो तब, तड़पी तो तब, जब अपनों ने ही मीरजाफर, जयचन्द बनकर इस पर वार किये। माँ की ममता को छला, इसकी भावनाओं को आहत किया, कोख को लजाया। आज भी जब इसके अपने बच्चे परायों के बहकावे में आकर अपनों को आतंकित करते हैं, क्रूरता के कुकृत्य करते हैं, तो इस धैर्यमयी का धीरज रो पड़ता है। समझ में नहीं आता कि यह किससे कहें, कैसे कहें अपनी पीड़ा? कहाँ बाँटें अपना दर्द।
  
हालाँकि भारत माता के सत्पुत्रों, सत्पुत्रियों की भी कमी नहीं है। वीर शिवाजी, महाप्रतापी राणाप्रताप, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, इसके यश को दिगन्तव्यापी बनाने वाले विवेकानन्द, इस पर अपने सुखों को न्यौछावर करने वाले सुभाष, गाँधी, इसके दुःखों को मिटाने के लिए सदा-सर्वदा तप में रत युगऋषि आचार्य श्रीराम शर्मा-इन मातृभक्तों ने ही तो इसे गुलामी से मुक्त कर गौरान्वित किया। आज माता ने फिर से अपनी संतानों की संवेदना को पुकारा है, जो इसकी कोख का मान रखें, इसके आँचल की अखण्डता बनाये रखें।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १५८

👉 FALLACIES ABOUT SCRIPTURAL RESTRICTIONS (Part 4)

Q.4. I have already taken Diksha (initiation) from a Guru. Will it be proper for me to seek another Guru?

Ans. There are no restrictions on choosing more than one Guru. It all depends on the type and level of achievement sought for. Ram had Vashistha as his family Guru and Vishwamitra for learning of martial and other branches of knowledge. Dattatreya is known for having twenty four Gurus. Durvasa was family-Guru of Krishna and Brahaspati was his Guru in respect of learning the specific branches of knowledge.              

In schools, with the change in class, teachers also change. Village Purohit, Teerth Purohit, Family Purohit, Dikcha Purohit, Sadhana Purohit are all different. They do not contradict but supplement each other.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 48

👉 नव निर्माण हेतु विभूतियों का आह्वान (भाग ४)

(४) विज्ञान-विज्ञान की उपलब्धियाँ आश्चर्यजनक हैं। उसने मानवी सुख सुविधाओं में आश्चर्यजनक अभिवृद्धि की है। पर यह भी सही है कि उसके दुरुपयोग से होने वाली हानियाँ भी कम नहीं उठानी पड़ रही हैं। अस्त्रों के उत्पादन में विशेषतया गैसें, किरणें एवं अणु विस्फोटजन्य अस्त्रों ने तो संसार के अस्तित्व को ही संकट में डालने वाली विभीषिका उत्पन्न कर दी है। यदि यह शोध, आविष्कार सृजनात्मक प्रयोजनों तक ही सीमित रहे, तो उसका प्रतिफल धरती पर स्वर्गीय परिस्थितियाँ उत्पन्न कर सकता है। ध्वंसात्मक उपकरण जुटाने में जितने साधन खपाये जा रहे हैं, यदि उन्हें मानवी अभावों और शोक-सन्तापों की निवृत्ति में लगा दिया जाय, तो उसका प्रतिफल इस संसार को स्वर्गोपम बनाने में हो सकता है। समुद्र के खारे पानी से मीठा जल प्राप्त किया जा सकता है। जमीन के नीचे बहने वाली विशाल नदियों का जल धरती पर लाया जा सकता है और सारी दुनियाँ सचमुच शस्यश्यामला बन सकती है। कृषि, पशुपालन, बागवानी, वन सम्पदा, स्वास्थ्य सम्वर्धन और मस्तिष्कीय विकास की दिशा में विज्ञान को अभी बहुत काम करना बाकी है। प्रकृति के प्रकोपों से लोहा लेने के साधन जुटाने में, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, महामारी, भूकम्प, बाढ़, तूफान, शीत-ताप की असहनीयता का सामना करने योग्य शक्ति का उपार्जन हो सकता है। वाहनों को सरल एवं सस्ता बनाया जा सकता है, संचार साधनों के विस्तार की अभी बहुत गुंजायश है।

(५) शासन सत्ता-राज सत्ता जिनके हाथ में इन दिनों है अथवा अगले दिनों आने वाली है, उन्हें संकीर्ण राष्ट्रीयता के अपने प्रिय क्षेत्र या वर्ग के लोगों को लाभान्वित करने की बात छोड़कर समस्त विश्व में समान रूप से सुख शान्ति की बात सोचनी होगी और समस्त संसार को एक परिवार बनाने की नीति अपना कर प्रकृति प्रदत्त साधनों एवं मानवी उपार्जन को समान रूप से सर्वसाधारण के लिए उपलब्ध करना होगा। युद्धों की भाषा में सोचना बन्द कर न्याय का आधार स्वीकार करना होगा। वर्गभेद और वर्णभेद की जड़े उखाड़नी होंगी।

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 April 2026

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