गुरुवार, 14 सितंबर 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 66)

🌹  मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है, इस विश्वास के आधार पर हमारी मान्यता है कि हम उत्कृष्ट बनेंगे और दूसरों को श्रेष्ठ बनाएँगे, तो युग अवश्य बदलेगा

🔴 पुरुषार्थ का नियम है और भाग्य उसका अपवाद। अपवादों को भी अस्तित्व तो मानना पड़ता है, पर उनके आधार पर कोई नीति नहीं अपनाई जा सकती, कोई कार्यक्रम नहीं बनाया जा सकता। कभी-कभी स्त्रियों के पेट से मनुष्याकृति से भिन्न आकृति के बच्चे जन्म लेते देखे गए हैं। कभी-कभी कोई पेड़ असमय में ही फल-फूल देने लगता है, कभी-कभी ग्रीष्म ऋतु में ओले बरस जाते हैं, यह अपवाद है। इन्हें कौतूहल की दृष्टि से देखा जा सकता है, पर इनको नियम नहीं माना जा सकता। इसी प्रकार भाग्य की गणना अपवादों में तो हो सकती है, पर यह नहीं माना जा सकता कि मानव जीवन की सारी गतिविधियाँ ही पूर्व निश्चित भाग्य-विधान के अनुसार होती हैं। यदि ऐसा होता तो पुरुषार्थ और प्रयत्न की कोई आवश्यकता ही न रह जाती। जिसके भाग्य में जैसा होता है, वैसा यदि अमिट ही है, तो फिर पुरुषार्थ करने से भी अधिक क्या मिलता और पुरुषार्थ न करने पर भी भाग्य में लिखी सफलता अनायास ही क्यों न मिल जाती?
 
🔵 हर व्यक्ति अपने-अपने अभीष्ट उद्देश्यों के लिए पुरुषार्थ करने में संलग्न रहता है, इससे प्रकट है कि आत्मा का सुनिश्चित विश्वास पुरुषार्थ के ऊपर है और वह उसी का प्रेरणा निरंतर प्रस्तुत करती रहती है। हमें समझ लेना चाहिए कि ब्रह्मा जी किसी का भाग्य नहीं लिखते, हर मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है। जिस प्रकार कल का जमाया हुआ दूध आज दी बन जाता है, उसी प्रकार कल का पुरुषार्थ आज भाग्य बनकर प्रस्तुत होता है। आज के कर्मों का फल आज ही नहीं मिल जाता। उसका परिपाक होने में, परिणाम प्राप्त होने में, परिणाम निकलने में कुछ देर लगती है। यह देरी ही भाग्य कही जा सकती है। परमात्मा समदर्शी और न्यायकारी है, उसे अपने सब पुत्र समान रूप से प्रिय हैं, फिर वह किसी का भाग्य अच्छा, किसी का बुरा लिखने का अन्याय या पक्षपात क्यों करेगा? उसने अपने हर बालक को भले या बुरे कर्म करने की पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान की है, पर साथ ही यह भी बता दिया है कि उनके भले या बुरे परिणाम भी अवश्य प्राप्त होंगे। इस प्रकार कर्म को ही यदि भाग्य कहें तो अत्युक्ति न होगी।

🔴 हमारे जीवन में अगणित समस्याएँ उलझी हुई गुत्थियों के रूप में विकसित वेष धारण किए सामने खड़ी हैं। इस कटु सत्य को मानना ही चाहिए। उनके उत्पादक हम स्वयं हैं और यदि इस तथ्य को स्वीकार करके अपनी आदतों, विचारधाराओं, मान्यताओं और गतिविधियों को सुधारने के लिए तैयार हों, तो इन उलझनों को हम स्वयं ही सुलझा सकते हैं। बेचारे ग्रह-नक्षत्रों पर दोष थोपना बेकार है। लाखों-करोड़ों मील दूर दिन-रात चक्कर काटते हुए अपनी मौत के दिन पूरे करने वाले ग्रह-नक्षत्र भला हमें क्या सुख-सुविधा प्रदान करेंगे? उनको छोड़कर सच्चे ग्रहों का पूजन आरंभ करें, जिनकी थोड़ी-सी कृपा-कोर से ही हमारा सारा प्रयोजन सिद्ध हो सकता है, सारी आकांक्षाएँ देखते-देखते पूर्ण हो सकती हैं।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.98

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.17

👉 वैराग्य भावना से मनोविकारों का शमन (भाग 1)

🔴 मनुष्य के मस्तिष्क की रचना कुछ इस प्रकार हुई है कि उसमें जिस प्रकार के विचार आयेंगे, वैसा ही आचरण और शरीर पर प्रभाव पड़ेगा। विचार-भावनाओं के अनुरूप ही मनुष्य का निर्माण होता है। विचार शक्ति के द्वारा ही उसके जीवन में उतार-चढ़ाव और परिवर्तन होते हैं। अच्छे विचारों से बुरे विचारों को दबाया जा सकता है। इस प्रकार यह मनुष्य की विशेषता है कि वह जैसा जीवन निर्मित करना चाहे, अपने विचार, अपनी भावनाओं के परिष्कार द्वारा वैसा ही कर सकता है।

🔵 वैराग्य भावना में निस्संदेह बड़ी शक्ति है। बुरे से बुरे संस्कार वैराग्य के बादलों से धुलते देखे गये हैं। कामासक्त तुलसीदास, दुष्ट दुराचारी बाल्मीक, हिंसक व्याध और अंगुलिमाल जैसे व्यक्तियों के हृदय में जब वैराग्य भावना का प्रवाह उमड़ा तो उनके जीवन की धारायें ही बदल गईं। सारे के सारे सन्त, महात्मा और महान् पण्डित बन गये।

🔴 विचार, भाव तथा क्रिया में अत्यन्त सूक्ष्म ग्रहण शीलता रखते हुये साँसारिक विषयों के प्रति निरपेक्ष बने रहने का नाम वैराग्य है। संक्षेप में राग द्वेष के बन्धनों से मुक्त होना ही वैराग्य है। यह भी कह सकते है कि वैराग्य उस अवस्था या स्थिति का नाम है, जब मनुष्य की चित्तवृत्तियाँ विभिन्न भावों से हटकर चिर सत्य की ओर जागृत हों। इन भावनाओं की शक्ति और सामर्थ्य की थाह पाना निश्चय ही कठिन बात है, क्योंकि जिस किसी के जीवन में भी इन भावनाओं का उदय हुआ, उनका तीव्र विरोध, उपहास और साँसारिक विषय, विकार कुछ कर नहीं पाये। षट-विकारों के शमन का भी श्रेष्ठ उपाय वैराग्य भावनाओं को ही मान सकते हैं। वैराग्य द्वारा ही सात्विक कार्य सम्पन्न होते हैं। वैराग्य का अर्थ है- त्याग, समर्पण, विवेक और सत्य के प्रति श्रद्धा की अनन्य भावना। इस प्रकार वैराग्य में वह सम्पूर्ण शक्तियाँ सन्निहित हैं, जिनमें मनुष्य अपने जीवन में सन्तुलन बनाये रख सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1965 पृष्ठ 2

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/February/v1.2

👉 आज का सद्चिंतन 14 Sep 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 Sep 2017


👉 भिखारी ने लौटाया धन

🔵 किसी नगर में एक भिखारी भीख माँगा करता था और वह वंहा पर एक कटोरा लेकर बैठा होता जिसे कुछ देकर जाना होता वो उस कटोरे में डालकर चला जाता। वर्षों से यही चल रहा था और वह सुबह आकर वंहा बैठा जाता और शाम को अँधेरा होने से पहले वंहा से चला जाया करता। कभी किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि वो कन्हा से आता है और कन्हा जाया करता है।

🔴 वह अन्य भिखारियों की तरह गिडगिडाता भी नहीं था हाँ जब भी कोई आता तो अपना कटोरा आगे कर देता कि जिसको मन होता वह डालकर चला जाता और जिसका मन नहीं होता वो आगे बढ़ जाता लेकिन भिखारी को किसी से कोई शिकायत नहीं थी एक दिन क्या होता है कि एक आदमी आया उसकी चाल ढाल और महंगे कपडे देख कर और गले मे पड़ी सोने की चैन को देखकर लगता था जैसे वो कोई बहुत ही बड़े घर का आदमी है यही जानकार भिखारी ने भी अपने कटोरे को आगे कर दिया लेकिन वो आदमी ने इस तरह मुह बनाया जैसे कोई कडवी चीज़ उस के मुह में आ गयी हो लेकिन फिर अनमने मन से उनसे अपनी जेब से चवन्नी निकली और कटोरे की जगह नीचे फेंककर आगे बढ़ गया।

🔵 भिखारी वह सब हरकतें देख रहा था उसने आव देखा न ताव और चवन्नी को उठाकर उसकी और फेंकते हुए बोला ये ले अपनी दौलत मुझे तुम जैसे गरीब का पैसा नहीं चाहिए उस अमीर आदमी के पैर वही ठिठक गये। तभी उसे एक धर्म ग्रन्थ में पढ़ी हुई एक बात याद आ गयी की जिस दान के साथ दानदाता खुद को नहीं देता वह दान व्यर्थ है इसलिए उसे अपने किये पर शर्मिंदगी महसूस हुई।

🔴 जिसके पास दिल नहीं है दूसरों के दर्द को समझने की भावना नहीं है उसके पास करोडो की सम्पति होते हुए भी वो गरीब है।

बुधवार, 13 सितंबर 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 65)

🌹  मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है, इस विश्वास के आधार पर हमारी मान्यता है कि हम उत्कृष्ट बनेंगे और दूसरों को श्रेष्ठ बनाएँगे, तो युग अवश्य बदलेगा

🔴 परिस्थितियों का हमारे ऊपर बड़ा प्रभाव पड़ता है। आस-पास का जैसा वातावरण होता है, वैसा बनने और करने के लिए मनोभूमि का रुझान होता है और साधारण स्थिति के लोग उन परिस्थितियों के साँचे में ढल जाते हैं। घटनाएँ हमें प्रभावित करती हैं, व्यक्ति का प्रभाव अपने ऊपर पड़ता है। इतना होते हुए भी यह मानना पड़ेगा कि सबसे अधिक प्रभाव अपने विश्वासों का ही अपने ऊपर पड़ता है। परिस्थितियाँ किसी को तभी प्रभावित कर सकती हैं, जब मनुष्य उनके आगे सिर झुका दे। यदि उनके दबाव को अस्वीकार कर दिया जाए तो फिर कोई परिस्थिति किसी मनुष्य को अपने दबाव में देर तक नहीं रख सकती। विश्वासों की तुलना में परिस्थितियों को प्रभाव निश्चय ही नगण्य है।
 
🔵 कहते हैं कि भाग्य की रचना ब्रह्मा जी करते हैं। सुना जाता है कि कर्म-रेखाएँ जन्म से पहले ही लिख दी जाती हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि तकदीर के आगे तदवीर की नहीं चलती। ये किंवदंतियाँ एक सीमा तक ही सच हो सकती हैं। जन्म से अंधा, अपंग उत्पन्न हुआ या अशक्त, अविकसित व्यक्ति ऐसी विपत्ति सामने आ खड़ी होती है, जिससे बच सकना या रोका जा सकना अपने वश में नहीं होता। अग्निकाण्ड, भूकम्प, युद्ध, महामारी, अकाल-मृत्यु दुर्भिक्ष, रेल, मोटर आदि का पलट जाना, चोरी, डकैती आदि के कई अवसर ऐसे आ जाते हैं और ऐसी विपत्ति सामने आ खड़ी होती है, जिससे बच सकना या रोका जा सकना अपने वश में नहीं होता।

🔴 ऐसी कुछ घटनाओं के बारे में भाग्य या होतव्यता की बात मानकर संतोष किया जाता है। पीड़ित मनुष्य के आंतरिक विक्षोभ को शांत करने के लिए भाग्यवाद की तड़पन दूर करने के लिए डॉक्टर लोग नींद की गोली खिला देते हैं , मर्फिया का इंजेक्शन लगा देते हैं, कोकीन आदि की फुरहरी लगाकर पीड़ित स्थान को सुन्न कर देते हैं। ये विशेष परिस्थितियों के विशेष उपचार हैं। यदा-कदा ही ऐसी बात होती है, इसलिए इन्हें अपवाद ही कहा जाएगा।

 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.97

👉 आज का सद्चिंतन 13 Sep 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 13 Sep 2017


👉 स्वार्थ भरा संशय

🔴 एक अमीर व्यक्ति था। उसने समुद्र में तफरी के लिए एक नाव बनवाई। छुट्टी के दिन वह नाव लेकर समुद्र की सैर के लिए निकल पडा। अभी मध्य समुद्र तक पहुँचा ही था कि अचानक जोरदार तुफान आया। उसकी नाव थपेडों से क्षतिग्रस्त हो, डूबने लगी, जीवन रक्षा के लिए वह लाईफ जेकेट पहन समुद्र में कुद पडा।

🔴 जब तूफान थमा तो उसने अपने आपको एक द्वीप के निकट पाया। वह तैरता हुआ उस टापू पर पहुँच गया। वह एक निर्जन टापू था, चारो और समुद्र के अलावा कुछ भी नजर नहीं आ रहा था। उसने सोचा कि मैने अपनी पूरी जिदंगी किसी का, कभी भी बुरा नहीं किया, फिर मेरे ही साथ ऐसा क्यों हुआ..?

🔵 एक क्षण सोचता, यदि ईश्वर है तो उसने मुझे कैसी विपदा में डाल दिया, दूसरे ही क्षण विचार करता कि तूफान में डूबने से तो बच ही गया हूँ। वह वहाँ पर उगे झाड-पत्ते-मूल आदि खाकर समय बिताने लगा। भयावह वीरान अटवी में एक मिनट भी, भारी पहाड सम प्रतीत हो रही थी। उसके धीरज का बाँध टूटने लगा। ज्यों ज्यों समय व्यतीत होता, उसकी रही सही आस्था भी बिखरने लगी। उसका संदेह पक्का होने लगा कि इस दुनिया में ईश्वर जैसा कुछ है ही नहीं!

🔴 निराश हो वह सोचने लगा कि अब तो पूरी जिंदगी इसी तरह ही, इस बियावान टापु पर बितानी होगी। यहाँ आश्रय के लिए क्यों न एक झोपडी बना लुं..? उसने सूखी डालियों टहनियों और पत्तो से एक छोटी सी झोपडी बनाई। झोपडी को निहारते हुए प्रसन्न हुआ कि अब खुले में नहीं सोना पडेगा, निश्चिंत होकर झोपडी में चैन से सो सकुंगा।

🔵 अभी रात हुई ही थी कि अचानक मौसम बदला, अम्बर गरजने लगा, बिजलियाँ कड‌कने लगी। सहसा एक बिजली झोपडी पर आ गिरी और आग से झोपडी धधकनें लगी। अपने श्रम से बने, अंतिम आसरे को नष्ट होता देखकर वह आदमी पूरी तरह टूट गया। वह आसमान की तरफ देखकर ईश्वर को कोसने लगा, “तूं भगवान नही , राक्षस है। रहमान कहलाता है किन्तु तेरे दिल में रहम जैसा कुछ भी नहीं। तूं समदृष्टि नहीं, क्रूर है।”

🔴 सर पर हाथ धरे हताश होकर संताप कर रहा था कि अचानक एक नाव टापू किनारे आ लगी। नाव से उतरकर दो व्यक्ति बाहर आये और कहने लगे, “हम तुम्हे बचाने आये है, यहां जलती हुई आग देखी तो हमें लगा कोई इस निर्जन टापु पर मुसीबत में है और मदद के लिए संकेत दे रहा है। यदि तुम आग न लगाते तो हमे पता नही चलता कि टापु पर कोई मुसीबत में है!

🔵 ओह! वह मेरी झोपडी थी। उस व्यक्ति की आँखो से अश्रु धार बहने लगी। हे ईश्वर! यदि झोपडी न जलती तो यह सहायता मुझे न मिलती। वह कृतज्ञता से द्रवित हो उठा। मैं सदैव स्वार्थपूर्ती की अवधारणा में ही तेरा अस्तित्व मानता रहा। अब पता चला तूं अकिंचन, निर्विकार, निस्पृह होकर, निष्काम कर्तव्य करता है। कौन तुझे क्या कहता है या क्या समझता है, तुझे कोई मतलब नहीं। मेरा संशय भी मात्र मेरा स्वार्थ था। मैने सदैव यही माना कि मात्र मुझ पर कृपा दिखाए तभी मानुं कि ईश्वर है, पर तुझे कहाँ पडी थी अपने आप को मनवाने की। स्वयं के अस्तित्व को प्रमाणीत करना तेरा उद्देश्य भी नहीं।

मंगलवार, 12 सितंबर 2017

👉 धर्मात्मा की परख

🔵 एक बार बड़ा भयानक दुर्भिक्ष पड़ा। लोग भूखों मरने लगे। मुसीबत के समय भी किसी का धर्म टिका हुआ है क्या, यह जाँचने के लिए स्वर्ग से तीन देवदूत पृथ्वी पर आए। उनने आपत्ति में धर्म को न त्यागने वाले सत्पुरुषों को ढूँढ़ना शुरू किया। अपनी यात्रा पूरी करके तीनों देवदूत एक स्थान पर मिले और उनने अपने अनुभव में आए धर्मात्माओं की चर्चा शुरू की। एक देवदूत ने कहा मैंने एक सेठ देखा जिसने भूखों के लिए सदावर्त लगा दिया है। हजारों व्यक्ति बिना मूल्य भोजन करते हैं। दूसरे देवदूत ने कहा मैंने इससे भी बड़े एक धर्मात्मा को देखा जिसने अपने गुजारे भर को रखकर, उसके पास जो धन दौलत थी वह सभी भूखों के लिए अर्पित कर दी।

🔴 तीसरे ने कहा यह क्या है, मेरा देखा हुआ धर्मात्मा आप दोनों के अनुभवों से बड़ा है। वह व्यक्ति बहुत ही भूखा था। कई दिन से अन्न न मिलने के कारण बहुत दुर्बल हो रहा था। उसे किसी उदार मनुष्य ने दो रोटी खाने को दी। पर खाने से पहल उसे ध्यान आया कि कही मुझसे भी अधिक भूखा कोई और तो नहीं है, उसने देखा तो पास ही एक ऐसा कुत्ता पड़ा था जिसके भूख से प्राण निकल रहे थे और वह उन दो रोटियाँ की और कातरता भरी दृष्टि से देख रहा था। उस भूखे मनुष्य के हृदय में करुणा जागी। उसने अपनी दोनों रोटियाँ उस कुत्ते को दे दी और खुद भूखा का भूखा ही रह गया।

🔵 तीनों देव दूत जब अपनी कथा सुना रहे थे तो दुर्भिक्ष का राक्षस चुपचाप छिपा खड़ा उनकी बातें सुन रहा था। कुत्ते की भूख मिटाने के लिए भूखा रहने वाले धर्मात्मा की कथा सुनकर उसका भी दिल पिघल गया। उसने कहा जब ऐसे धर्मात्मा इस देश में मौजूद है तो फिर यहाँ अब मेरा रहना नहीं तो सकता। दुर्भिक्ष चला गया और प्रजा के कष्ट दूर हुए।
श्रेष्ठ भावनाओं के सामने विपत्तियाँ देर तक नहीं ठहर सकती।

🌹 अखण्ड ज्योति मई 1961

👉 पितरों को श्रद्धा दें, वे शक्ति देंगे (भाग 2)

🔵 प्राणियों का शास्त्रीय वर्गीकरण शरीरधारी और अशरीर दो भागों में किया गया है। अशरीरी वर्ग में— (1) पितर (2) मुक्त (3) देव (4) प्रजापति हैं। शरीरधारियों में (1) उद्भिज (2) स्वेदज (3) अंडज (4) जरायुज हैं।

🔴 चौरासी लाख योनियां शरीरधारियों की हैं। वे स्थूल जगत में रहती हैं और आंखों से देखी जा सकती हैं। दिव्य जीव जो आंखों से नहीं देखे जा सकते हैं उनका शरीर दिव्य होता है। सूक्ष्म जगत में रहते हैं। इनकी गणना तत्वदर्शी मनीषियों ने अपने समय में 33 कोटि की थी। तेतीस कोटि का अर्थ उनके स्तर के अनुरूप तेतीस वर्गों में विभाजित किये जा सकने योग्य भी होता है। कोटि का एक अर्थ वर्ग या स्तर होता है। दूसरा अर्थ है—करोड़। इस प्रकार यह भी कहा जा सकता है कि उस दिव्य सत्ताधारियों की गणना तेतीस करोड़ की संख्या में सूक्ष्मदर्शियों ने की होगी। जो हो उनका अस्तित्व है—कारण और प्रभाव भी।

🔵 जीवों के विकास क्रम को देखने से पता चलता है कि कितनी ही प्राचीन जीव जातियां लुप्त होती हैं और कितने ही नये प्रकार के जीवधारी अस्तित्व में आते हैं। फिर देश काल के प्रभाव से भी उनकी आकृति प्रकृति इतनी बदलती रहती है कि एक वर्ग को ही अनेक वर्गों का माना जा सके। फिर कितने ही जीव ऐसे हैं जिन्हें अनादि काल से जन-सम्पर्क से दूर अज्ञात क्षेत्रों में ही रहना पड़ा है और उनके सम्बन्ध में मनुष्य की जानकारी नहीं के बराबर है। कुछ प्राणी ऐसे हैं जो खुली आंखों से नहीं देखे जा सकते। सूक्ष्मदर्शी यन्त्रों से ही उन्हें हमारी खुली आंखें देख सकती हैं। इतने छोटे होने पर भी उनका जीवन-क्रम अन्य शरीरधारियों से मिलता जुलता ही चलता रहता है।

🔴 अपनी पृथ्वी बहुत बड़ी है उस पर रहने वाले जलचर— थलचर— नभचर कितने होंगे, इसकी सही गणना कर सकना स्थूल बुद्धि और मोटे ज्ञान साधनों से सम्भव नहीं हो सकती, केवल मोटा अनुमान ही लगाया जा सकता है, पर सूक्ष्मदर्शियों के असाधारण एवं अतीन्द्रिय ज्ञान से साधारणतया अविज्ञान समझी जाने वाली बातें भी ज्ञात हो सकती हैं। ऋषियों की सूक्ष्म दृष्टि ने अपने समय में जो गणना की होगी उसे अविश्वसनीय ठहराने का कोई कारण नहीं जब कि जीवन शास्त्रियों की अद्यावधि खोज ने भी लगभग उतनी ही योनियां गिनली हैं। इसमें कुछ ही लाख की कमी है जो शोध प्रयास जारी रहने पर नवीन उपलब्धियों के अनवरत सिलसिले को देखते हुए कुछ ही समय में पूरी हो सकती है, वरन् उससे भी आगे निकल सकती है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/pitaron_ko_shraddha_den_ve_shakti_denge/v1.83

http://literature.awgp.org/book/pitaron_ko_shraddha_den_ve_shakti_denge/v2.7

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 12 Sep 2017


👉 आज का सद्चिंतन 12 Sep 2017


👉 बुलंद हौसले

🔴 एक कक्षा में शिक्षक छात्रों को बता रहे थे कि अपने जीवन का एक लक्ष्य निर्धारित करो। वे सभी से पूछ रहे थे कि उनके जीवन का क्या लक्ष्य है? सभी विद्यार्थी उन्हें बता रहे थे कि वह क्या बनना चाहते हैं। तभी एक छात्रा ने कहा, 'मैं बड़ी होकर धाविका बनकर, ओलिंपिक में स्वर्ण पदक जीतना चाहती हूं, नए रेकॉर्ड बनाना चाहती हूं।' उसकी बात सुनते ही कक्षा के सभी बच्चे खिलखिला उठे। शिक्षक भी उस लड़की पर व्यंग्य करते हुए बोले, 'पहले अपने पैरों की ओर तो देखो। तुम ठीक से चल भी नहीं सकती हो।'

🔵 वह बच्ची शिक्षक के समक्ष कुछ नहीं बोल सकी और सारी कक्षा की हंसी उसके कानों में गूंजती रही। अगले दिन कक्षा में मास्टर जी आए तो दृढ़ संयमित स्वरों में उस लड़की ने कहा, 'ठीक है, आज मैं अपाहिज हूं। चल-फिर नहीं सकती, लेकिन मास्टर जी, याद रखिए कि मन में पक्का इरादा हो तो क्या नहीं हो सकता। आज मेरे अपंग होने पर सब हंस रहे हैं, लेकिन यही अपंग लड़की एक दिन हवा में उड़कर दिखाएगी।'

🔴 उसकी बात सुनकर उसके साथियों ने फिर उसकी खिल्ली उड़ाई। लेकिन उस अपाहिज लड़की ने उस दिन के बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा। वह प्रतिदिन चलने का अभ्यास करने लगी। कुछ ही दिनों में वह अच्छी तरह चलने लगी और धीरे-धीरे दौड़ने भी लगी। उसकी इस कामयाबी ने उसके हौसले और भी बुलंद कर दिए। देखते ही देखते कुछ दिनों में वह एक अच्छी धावक बन गई। ओलिंपिक में उसने पूरे उत्साह के साथ भाग लिया और एक साथ तीन स्वर्ण पदक जीतकर सबको चकित कर दिया। हवा से बात करने वाली वह अपंग लड़की थी अमेरिका के टेनेसी राज्य की ओलिंपिक धाविक विल्मा गोल्डीन रुडाल्फ, जिसने अपने पक्के इरादे के बलबूते पर न केवल सफलता हासिल की अपितु दुनियाभर में अपना नाम किया।

सोमवार, 11 सितंबर 2017

👉 "फर्क"

🔴 मधू को घर से मां का फोन आया कि कब घर आ रही हे तेरे पापा रोज गली कोई मोड़ पर खडे तेरी राह देखते हे तूने ही कहा था दो तीन दिन मे आउंगी, तेरा भाई अपनी 4 महीने की बेटी का नाम नही रखने देता कहता हैं ये हक उसकी बुआ का हे जब आएगी वही रखेगी मेरी इस चूहिया का नाम।

🔵 आ जा मेरी बेटी तुझे देखे पूरा एक साल हो गया, जल्दी आउंगी कहते कहते पूरा साल निकाल दिया तूने, मधू आँखों मे आँसू लिए,- हाँ मां जल्दी आउंगी तभी सास कि आवाज आई तो बोली अच्छा मां बाद मे बात करती हूँ, फिर फोन रखकर सासू मां से बोली- मम्मी अभी मां का फोन आया था पूछ रही थी कब आ रही है चली जाऊँ 4 ,5 दिनो के लिए, सास - कोई जरूरत नही अब इस उम्र मे मुझसे चूल्हा चौका नही होता,कौन खिलाएगा तेरे आदमी को ओर हमें, घर का साफ सफाई कौन देखेगा, मेरी ओर इनकी दवाओं का खयाल कौन रखेगा, ना भैया मना कर दे इस बार कोई जरूरत नही जाने की।

🔴 रात को पति से मधू - सुनिए मां पापा भैया, ओर उस चूहिया को देखने का मन हे कुछ दिनो के लिए मायके हो आऊं, पति- क्यों अभी पिछले साल ही तो गई थी ओर यहाँ का काम कौन देखेगा सब वैसे भी शादी के बाद लडकी का घर पति का घर होता हे चुपचाप यही रहो, मगर मधू बोली, कोई बहस नहीं, पति बोला, रात भर अपने मम्मी पापा, भैया भाभी ओर अपनी भतीजी के ले सुबुकती रही, कुछ दिन बाद मधू की ननद आई सास ससुर को मानो खजाना मिल गया।

🔵 पति देव बच्चो से खेलते रहते, घर का सारा काम सिर्फ मधू पर आखिर ननद आई हे घर की बेटी, पूरे 15 दिनो बाद ननद के जाने पर, सास बोली- ऐसे ही आते रहा कर थोड़े थोड़े दिनो पे बोलती हे तो बोलने दिया कर बुढिया को मेरी फूल सी बेटी को नौकरानी बनाकर रखा है पति को काबू मे रखा कर नही तो मुझे बता मे तेरे पापा ओर भाई के साथ ठीक कर दूंगी ओर खाती पीती रहा कर, कितनी दुबली हो गई, कुछ काम बुढिया से भी करवाया कर मोटी भैंस बैठ बैठकर हुक्म चलाती है ननद के विदा हो जाने के बाद मधू सोच रही थी आखिर बेटी बेटी होती है ओर बहु, आखिर बहु,ऐसा क्यों?

🔴 समाज का एक चेहरा ऐसा भी है सचमुच कुछ लोग बहू को सिर्फ नौकरानी कि तरह एक मशीन की तरह घर मे रखना चाहते है मगर बात वही बेटी से जुडी हो तो खयालात बदल जाते है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 Sep 2017


👉 आज का सद्चिंतन 11 Sep 2017


👉 दृष्टिकोण का अन्तर

🔵 बाहर की परिस्थितियों में अपने अपने दृष्टिकोण के कारण भिन्न भिन्न प्रकार की अनुभूतियाँ होती है। एक भिखारी को देखकर किसी के मन में दया उपजती है और उसकी यथाशक्ति सहायता करता है। किन्तु दूसरा उसे निकम्मा और आलसी मानकर घृणा करता है। सहायता करना उसके निकम्मेपन को बढ़ाने वाला मानकर अनुचित समझता है। कोई दूसरा उसे दे रहा हो तो उसे भी रोकता है। यह भिन्न प्रकार की अनुभूतियाँ भिन्न दृष्टिकोणों के कारण ही है। बुद्धि बेचारी तो खरीदे हुए गुलाम की तरह है, उसे भावनाओं की हाँ में हाँ मिलानी पड़ती है। भाग्य के सताये हुए भिक्षुक की सहायता करना सहृदय और मानवता की पुकार है, इस आदर्श के पक्ष में बुद्धि के द्वारा बहुत कुछ कहा जा सकता है।

🔴 इसी प्रकार निकम्मे लोगों की गति विधियों पर अंकुश लगाने के लिए उन्हें अपनी गतिविधियाँ छोड़ने के लिए बाध्य करने के पक्ष में भी बहुत कुछ मसाला बुद्धि के पास निकल आयेगा। अन्तिम निर्णय कैसे हो, दोनों से कौन सा पक्ष सही है, इसका निष्कर्ष निकालना सरल नहीं है। वह भिखारी वस्तुतः भीख माँगने के लिए मजबूर था या निकम्मा था? दूसरा निर्णय क्षण भर में उसकी शक्ल देखने मात्र से नहीं हो सकता। इसके लिए उनकी परिस्थितियों को समझने के लिए गहराई तक जाना होगा और बहुत खोज बीन करनी पड़ेगी। इतना अवकाश न होने पर वास्तविकता तक पहुँचना कठिन है।

🔵 वास्तविकता के समुचित जानकर न होते हुए भी एक भिखारी के सम्बन्ध में दो मनुष्यों ने दो अलग अलग प्रकार के जो निष्कर्ष निकाले और अलग अलग प्रकार के व्यवहार किये उसमें उनकी मान्यता और भावना ही प्रधान कारण थी। आमतौर से होता यही है कि अपने दृष्टिकोण के अनुसार ही संसार के पदार्थों की, परिस्थितियों की तथा व्यक्तियों की परख की जाती है और उसी के आधार पर उन्हें भला या बुरा माना जाता है। यों हर वस्तु में गुण और अवगुण, भलाई और बुराई, उपयोगिता और अनुपयोगिता को न्यूनाधिक मात्रा मौजूद है और उसका विश्लेषण तार्किक बुद्धि से हो भी सकता है, पर आम तौर से दूसरों के विषय में जो अभिमत प्रकट किए जाते है उनमें अपना दृष्टिकोण ही प्रधान कारण होता है। उसी के आधार पर हम दूसरों को भला या बुरा समझते है और तदनुसार ही घृणा, उपेक्षा, सहानुभूति या प्रेम का व्यवहार करते है।

🌹 अखण्ड ज्योति मई 1961
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1961/May/v1.24

👉 आत्मचिंतन के क्षण 11 Sep 2017

🔵 शक्ति धारण करने का सिद्धान्त यह है कि एक ओर विविध साधनों से उसे प्राप्त करें और दूसरी ओर से अपव्यय को रोक दें। धन अर्जित करना हो तो किसी उद्यम रोजगार से उसे प्राप्त करते हैं और मितव्ययी बनते हैं। दोनों क्रियाओं के सम्मिश्रण से धनवान बनना सरल हो जाता है। किसी बड़े बर्तन में पानी भरना चाहते हों और उसके छिद्र बन्द न करें तो पानी देर तक टिका न रहेगा। यह सिद्धान्त जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में लागू होता है। एक क्रिया रचनात्मक होती है, दूसरी में निषेध का बर्ताव करना होता है, तभी कुछ सफलता प्राप्त की जा सकती है। समाज में प्रतिष्ठावान् बनने के लिए यह जरूरी है कि अधिक से अधिक सद्गुणों का विकास करें और दूसरों के साथ दुर्व्यवहार तथा असम्मान का आचरण न करें।

🔴 आत्मबुद्धि एवं आत्म विकास का कार्य नियमपूर्वक चलाने के लिए साथ-साथ संयमित जीवनचर्या भी परमावश्यक है। रेलगाड़ी के चलाने के लिए पहले भाप को एकत्रित करते हैं और सावधानी से उसे ‘पिस्टन’ तक पहुँचाते हैं। यह शक्ति यदि इधर-उधर विश्रृंखलित हो जाय, तो बेचारा इंजन रेलगाड़ी को खींचने की असमर्थता ही प्रकट करेगा। आत्मा की सान्निध्यता में पहुँच कर हम जिस शक्ति की कल्पना करते हैं, वह भी ठीक इसी प्रकार है। अपनी सम्पूर्ण चेष्टाओं को केन्द्रीभूत करना पड़ता है। इस सामूहिक शक्ति को जीवन के जिस क्षेत्र, जिस कार्य में लगा देते हैं, वहीं महत्वपूर्ण सफलता के दर्शन होने लगते हैं।

🔵 शक्ति के इस अपव्यय को रोकने का नाम ही ‘संयम’ है। किसी वस्तु को प्राप्त करना निस्संदेह कठिन व महत्वपूर्ण बात है, किन्तु संग्रहीत वस्तु को सुरक्षित बनाये रखना उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। संग्रह और त्याग की दोनों क्रियाएं साथ-साथ चलती रहें तो कहीं भी शक्ति एकत्रित न होगी। शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक दृष्टि से शक्तिवान बनने का एक ही तरीका है कि इनकी क्रिया शक्ति का दुरुपयोग न हो, तभी मनोवाँछित ध्येय सिद्धि या सफलता मिल सकती है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 64)

🌹  मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है, इस विश्वास के आधार पर हमारी मान्यता है कि हम उत्कृष्ट बनेंगे और दूसरों को श्रेष्ठ बनाएँगे, तो युग अवश्य बदलेगा

🔴 परिस्थितियों का हमारे ऊपर बड़ा प्रभाव पड़ता है। आस-पास का जैसा वातावरण होता है, वैसा बनने और करने के लिए मनोभूमि का रुझान होता है और साधारण स्थिति के लोग उन परिस्थितियों के साँचे में ढल जाते हैं। घटनाएँ हमें प्रभावित करती हैं, व्यक्ति का प्रभाव अपने ऊपर पड़ता है। इतना होते हुए भी यह मानना पड़ेगा कि सबसे अधिक प्रभाव अपने विश्वासों का ही अपने ऊपर पड़ता है। परिस्थितियाँ किसी को तभी प्रभावित कर सकती हैं, जब मनुष्य उनके आगे सिर झुका दे। यदि उनके दबाव को अस्वीकार कर दिया जाए तो फिर कोई परिस्थिति किसी मनुष्य को अपने दबाव में देर तक नहीं रख सकती। विश्वासों की तुलना में परिस्थितियों को प्रभाव निश्चय ही नगण्य है।
 
🔵 कहते हैं कि भाग्य की रचना ब्रह्मा जी करते हैं। सुना जाता है कि कर्म-रेखाएँ जन्म से पहले ही लिख दी जाती हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि तकदीर के आगे तदवीर की नहीं चलती। ये किंवदंतियाँ एक सीमा तक ही सच हो सकती हैं। जन्म से अंधा, अपंग उत्पन्न हुआ या अशक्त, अविकसित व्यक्ति ऐसी विपत्ति सामने आ खड़ी होती है, जिससे बच सकना या रोका जा सकना अपने वश में नहीं होता। अग्निकाण्ड, भूकम्प, युद्ध, महामारी, अकाल-मृत्यु दुर्भिक्ष, रेल, मोटर आदि का पलट जाना, चोरी, डकैती आदि के कई अवसर ऐसे आ जाते हैं और ऐसी विपत्ति सामने आ खड़ी होती है, जिससे बच सकना या रोका जा सकना अपने वश में नहीं होता।

🔴 ऐसी कुछ घटनाओं के बारे में भाग्य या होतव्यता की बात मानकर संतोष किया जाता है। पीड़ित मनुष्य के आंतरिक विक्षोभ को शांत करने के लिए भाग्यवाद की तड़पन दूर करने के लिए डॉक्टर लोग नींद की गोली खिला देते हैं , मर्फिया का इंजेक्शन लगा देते हैं, कोकीन आदि की फुरहरी लगाकर पीड़ित स्थान को सुन्न कर देते हैं। ये विशेष परिस्थितियों के विशेष उपचार हैं। यदा-कदा ही ऐसी बात होती है, इसलिए इन्हें अपवाद ही कहा जाएगा।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.96

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.17

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 139)

🌹  स्थूल का सूक्ष्म शरीर में परिवर्तन सूक्ष्मीकरण

🔵 सूक्ष्म शरीर धारियों का वर्णन और विवरण पुरातन ग्रंथों में विस्तार पूर्वक मिलता है। यक्ष और युधिष्ठिर के मध्य विग्रह तथा विवाद का महाभारत में विस्तार पूर्वक वर्णन है। यक्ष, गंधर्व, ब्रह्मराक्षस जैसे कई वर्ग सूक्ष्म शरीर धारियों के थे। विक्रमादित्य के साथ पाँच ‘‘वीर’’ रहते थे। शिवजी के गण ‘‘वीरभद्र’’ कहलाते थे। भूत-प्रेत, जिंद, मसानों की अलग ही बिरादरी थी। ‘‘अल्लादीन का चिराग’’ जिनने पढ़ा है उन्हें इस समुदाय की गतिविधियों की जानकारी होगी। छाया पुरुष द्वारा साधना में अपने निज के शरीर से ही एक अतिरिक्त सत्ता गढ़ ली जाती है और वह एक समर्थ साथी सहयोगी जैसा काम करती है।

🔴 इन सूक्ष्म शरीर धारियों में अधिकांश का उल्लेख हानिकारक या नैतिक दृष्टि से हेय स्तर पर हुआ है। सम्भव है उन दिनों अतृप्त विक्षुब्ध स्तर के योद्धा रणभूमि में मरने के उपरांत ऐसे ही कुछ हो जाते रहे हों। उन दिनों युद्धों की मार-काट ही सर्वत्र संव्याप्त थी, साथ ही सूक्ष्म शरीरधारी देवर्षियों का भी कम उल्लेख नहीं है। राजर्षि और ब्रह्मर्षि तो स्थूल शरीरधारी ही होते थे, पर जिनकी गति सूक्ष्म शरीर में भी काम करती थी, वे देवर्षि कहलाते थे। वे वायुभूत होकर विचरण करते थे। लोक-लोकांतरों में जा सकते थे। जहाँ आवश्यकता अनुभव करते थे, वहाँ भक्तजनों का मार्गदर्शन करने के लिए अनायास ही जा पहुँचते थे।

🔵 ऋषियों में से अन्य कइयों के भी ऐसे उल्लेख मिलते हैं। वे समय-समय पर धैर्य देने, मार्गदर्शन करने या जहाँ आवश्यकता समझी है, वहाँ पहुँचे, प्रकट हुए हैं। पैरों से चलकर जाना नहीं पड़ा है। अभी भी हिमालय के कई यात्री ऐसा विवरण सुनाते हैं कि वह राह भटक जाने पर कोई उन्हें उपयुक्त स्थल तक छोड़कर चला गया। कइयों ने किन्हीं गुफाओं में, शिखरों पर अदृश्य योगियों को दृश्य तथा दृश्य को अदृश्य होते देखा है। तिब्बत के लामाओं की ऐसी कितनी ही कथा गाथाएँ सुनी गई हैं। थियोसोफिकल सोसायटी की मान्यता है कि अभी हिमालय के ध्रुव केंद्र पर एक ऐसी मण्डली है, जो विश्व शान्ति में योगदान करती है, इसे उन्होंने ‘‘अदृश्य सहायक’’ नाम दिया है।

🔴 यहाँ स्मरण रखने योग्य बात यह है कि यह देवर्षि समुदाय भी मनुष्यों का ही एक विकसित वर्ग है। योगियों, सिद्ध पुरुषों और महामानवों की तरह वह सेवा-सहायता में दूसरों की अपेक्षा अधिक समर्थ पाया जाता है, पर यह मान बैठना गलती होगी कि वे सर्व समर्थ हैं और किसी की भी मनोकामना को तत्काल पूरी कर सकते हैं, या अमोघ वरदान दे सकते हैं। कर्मफल की वरिष्ठता सर्वोपरि है, उसे भगवान् ही घटा या मिटा सकते हैं। मनुष्य की सामर्थ्य से वह बाहर है। जिस प्रकार बीमार की चिकित्सक, विपत्तिग्रस्त की धनी सहायता कर सकता है, ठीक उसी प्रकार सूक्ष्म शरीरधारी देवर्षि भी समय-समय पर सत्कर्मों के निमित्त बुलाने पर अथवा बिना बुलाए भी सहायता के लिए दौड़ते हैं। इससे बहुत लाभ भी मिलता है। इतने पर भी किसी को यह नहीं मान बैठना चाहिए कि पुरुषार्थ की आवश्यकता नहीं रही, या उनके आड़े आते ही निश्चित सफलता मिल गई। ऐसा रहा होता तो लोग उन्हीं का आसरा लेकर निश्चिंत हो जाते और फिर निजी पुरुषार्थ की आवश्यकता न समझते। निजी कर्मफल आड़े आने परिस्थितियों के बाधक होने की बात को ध्यान में ही न रखते।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.156

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.17

👉 Could have done, but didn’t

🔴 Ravan and Vibhishan were real brothers born in the same family; both of them were wise and brave fighters. One chose his path different and the other chose to fight against lawlessness and the wrong. God has given humans the power to change the direction of the tide so that he can become his assistant.

🔵 God has also given the will of asking boons. Ravan was Shiva’s devotee. He asked that he become powerful but also that he would die from the hands of a man. To end his tyranny, God himself had to take birth in the form of Ram. Shiva worshiped Ram. If the master of unusual powers and a wise man such as Ravan did not want to take the right guidance from Shiva, then his end is imminent. God has given the free will to humans.

🔴 Living beings come on earth as pure water drops. On coming to earth, the water drop becomes mud; likewise the humans become disillusioned by Maya. It is up to the human to either lie in the mud or be in the ocean and expanding his consciousness become the clouds and showers his services over the society.

🔵 God wouldn’t have even thought that human will chose the wrong path due to his free will. As far as other living beings are concerned they just follow the discipline laid out by God and live a natural life style. They are just confined to activities of eating, sleeping and mating. But most people are seen to follow such lifestyles, exhibit short sightedness and ultimately suffer and repent. This can be compared to a fly jumping into sweet syrup.

🔴 A fly jumps into a bowl of sweet syrup to finish it off at once and gets trapped and kills itself. Whereas a wise fly sits at the corner, tastes it, fills its stomach and flies into the air. This restlessness causes man to go for quick results and doesn’t let him wait for the right duration, which if he had otherwise waited for, would have easily got the results.

🔵 A fish only sees the bait. It doesn’t have the patience to find out whether there is some danger in it. The allurement of getting the food without any effort is so strong that it can hardly resist. The result doesn’t take long to come. The pin sticks in its intestines and finally gets removed after taking its life.

🌹 From Pragya Puran

👉 Only Determination Leads Your Rise. (Last Part)

🔵 Strong, should be the determination of man. Very this after all is the life-line of spirituality. If no power of determination is there then, if no courage is there then the man becomes a rolling stone and keeps coloring spirituality to match his comfort, in absence of knowledge of the real colour of it. Determination or a determined mind leads a man to cover half the distance.
 
🔴 The power of determination is just like a cudgel that helps you do not fall but provides you needed courage to proceed ahead and rise in your life. You too must chart out some self-discipline in order to grow your will-power or power of determination. You must start with some such jobs in fields of celibacy, food-habits, time-donation and money-donation to reflect that you have done for what you had determined. It will boost your confidence level. This is how will-power can further be strengthened.
 
🔵 Nothing in the world is superior to force of determination that may lead a man to induce his personality, intellect and character. It makes it essential to grow your will-power that you start with small legs of it for short durations that you will not do that unless you do this. For example no sleep without having few pages of a particular book read, no breakfast without having the morning session of BHAJAN completed. What is this? This is a kind of outside discipline attached with a particular job just to accelerate the growth of your will power.

🔴 Vow and determination are the most precious elements in human life. Please, do like that. Finished, today’s session.

🌹 Finish
🌹 Pt Shriram Sharma Aachrya

रविवार, 10 सितंबर 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 63)

🌹  राष्ट्रीय एकता एवं समता के प्रति निष्ठावान् रहेंगे। जाति, लिंग, भाषा, प्रांत, सम्प्रदाय आदि के कारण परस्पर कोई भेदभाव न बरतेंगे।

🔴 बूँदें अगल-अलग रह कर अपनी श्री गरिमा का परिचय नहीं दे सकतीं। उन्हें हवा का एक झोंका भर सुखा देने में समर्थ होता है, पर जब वे मिलकर एक विशाल जलाशय का रूप धारण करती हैं, तो फिर उनकी समर्थता और व्यापकता देखते ही बनती है। इस तथ्य को हमें समूची मानव जाति को एकता के केन्द्र पर केंद्रित करने के लिए साहसिक तत्परता अपनाते हुए संभव कर दिखाना होगा।
 
🔵 धर्म सम्प्रदायों की विभाजन रेखा भी ऐसी ही है, जो अपनी मान्यताओं को सच और दूसरों के प्रतिपादनों को झूठा सिद्ध करने में अपने बुद्धि-वैभव से शास्त्रार्थों, टकरावों के आ पड़ने पर उभरती रही है। अस्त्र-शस्त्रों वाले युद्धों ने कितना विनाश किया है, उसका प्रत्यक्ष होने के नाते लेखा-जोखा लिया जा सकता है, पर अपनी धर्म मान्यता दूसरों पर थोपने के लिए कितना दबाव और कितना प्रलोभन, कितना पक्षपात और कितना अन्याय इन कामों में लगाया गया है, इसकी परोक्ष विवेचना किया जाना संभव हो तो प्रतीत होगा कि इस क्षेत्र के आक्रमण भी कम दुःखदायी नहीं रहे हैं। आगे भी इसका इसी प्रकार परिपोषण और प्रचलन होता रहा तो विवाद, विनाश और विषाद घटेंगे नहीं बढ़ते ही रहेंगे। अनेकता में एकता खोज निकालने वाली दूरदर्शिता को सम्प्रदायवाद के क्षेत्र में भी प्रवेश करना चाहिए।

🔴 आरंभिक दिनों में सर्व-धर्म-समभाव सहिष्णुता, बिना टकराए अपनी-अपनी मर्जी पर चलने की स्वतंत्रता अपनाए रहना ठीक है, काम चलाऊ नीति है। अंततः विश्व मानव का एक ही मानव धर्म होगा। उसके सिद्धांत चिंतन, चरित्र और व्यवहार के साथ जुड़ने वाली आदर्शवादिता पर अवलंबित होंगे। मान्यताओं और परम्पराओं में से प्रत्येक को तर्क, तथ्य, प्रमाण, परीक्षण एवं अनुभव की कसौटियों पर कसने के उपरांत ही विश्व धर्म की मान्यता मिलेगी। संक्षेप में उसे आदर्शवादी व्यक्तित्व और न्यायोचित निष्ठा पर अवलंबित माना जाएगा। विश्व धर्म की बात आज भले ही सघन तमिस्रा में कठिन मालूम पड़ती हो, पर वह समय दूर नहीं जब एकता का सूर्य उगेगा और इस समय जो अदृश्य है, असंभव प्रतीत होता है, वह उस वेला में प्रत्यक्ष एवं प्रकाशवान होकर रहेगा। यही हैं आने वाली सतयुगी समाज व्यवस्था की कुछ झलकियाँ, जो हर आस्तिक को भविष्य के प्रति आशावान् बनाती हैं।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.90

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.16

👉 Only Determination Leads Your Rise. (Part 3)

🔵 ‘Determination’ must be developed. What is ‘Determination’? Determination is one of the so many faculties of mind, where we become committed to do one thing and not to do the other at any cost. If you determine like that for anything, then believe that your mental firmness will lead you to proceed on the way you intend to. If you do not have any such determination or willpower, your dreams of flying high will lead you reach nowhere. Your dreams that- I will do this, will study, will start doing exercise and doing this or that will come out to be mere imaginations. You can never do anything in absence of determination. No imagination singly has so far been come true of anyone whereas no determination has so far been left unfulfilled of any one. So let your determination lead your genuine imagination.
 
🔴 That is why you must pledge to get support of power of determination. Be pledged. To do some good job, to proceed on way to progress you must determine in your mind that you will do this.

🔵 Many persons impose conditions on themselves that they will not do that unless they do this. For example no salt, no ghee etc. etc. what is this? To see these things look unimportant. What is relation of salt with doing that work and if you stop consuming ghee, what difference it will make? Meaning, these things do not have. But what matters is your so tough decision that you have taken to do a job in a planned way. Then believe your job will not be left unfinished. CHANKAYA determined not to comb his hairs until & unless he had destroyed lineage of NAND. It is a way of symbolizing one’s determination. Determinations are often forgotten by people, but an outside discipline attached with it does not allow this to happen.

🌹 to be continue...
🌹 Pt Shriram Sharma Aachrya

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 138)

🌹  स्थूल का सूक्ष्म शरीर में परिवर्तन सूक्ष्मीकरण

🔵 यह स्थिति शरीर त्यागते ही हर किसी को उपलब्ध हो जाए, यह सम्भव नहीं। भूत-प्रेत चले तो सूक्ष्म शरीर में जाते हैं, पर वे बहुत ही अनगढ़ स्थिति में रहते हैं। मात्र सम्बन्धित लोगों को ही अपनी आवश्यकताएँ बताने भर के कुछ दृश्य कठिनाई से दिखा सकते हैं। पितर स्तर की आत्माएँ उससे कहीं अधिक सक्षम होती हैं। उनका विवेक एवं व्यवहार कहीं अधिक उदात्त होता है। इसके लिए उनका सूक्ष्म शरीर पहले से ही परिष्कृत हो चुका होता है। सूक्ष्म शरीर को उच्चस्तरीय क्षमता-सम्पन्न बनाने के लिए विशेष प्रयत्न करने पड़ते हैं। वे तपस्वी स्तर के होते हैं। सामान्य काया को सिद्ध पुरुष अपनी काया की सीमा में रहकर जो दिव्य क्षमता अर्जित कर सकते हैं, कर लेते हैं, उसी से दूसरों की सेवा सहायता करते हैं, किन्तु शरीर विकसित कर लेने वाले उन सिद्धियों के भी धनी देखे गए हैं जिन्हें योगशास्त्र में अणिमा, महिमा, लघिमा आदि कहा गया है।

🔴 शरीर का हलका, भारी, दृश्य, अदृश्य हो जाना, यहाँ से वहाँ जा पहुँचना, प्रत्यक्ष शरीर के रहते हुए सम्भव नहीं क्योंकि शरीरगत परमाणुओं की संरचना ऐसी नहीं है जो पदार्थ विज्ञान की सीमा मर्यादा से बाहर जा सके। कोई मनुष्य हवा में नहीं उड़ सकता और न पानी पर चल सकता है। यदि ऐसा कर सका होता तो उसने वैज्ञानिकों की चुनौती अवश्य स्वीकार की होती और प्रयोगशाला जाकर विज्ञान के प्रतिपादनों में एक नया अध्याय अवश्य ही जोड़ता। किम्वदन्तियों के आधार पर कोई किसी से इस स्तर की सिद्धियों का बखान करने भी लगे, तो उसे अत्युक्ति ही माना जाएगा। अब प्रत्यक्ष को प्रामाणिक किए बिना किसी की गति नहीं।

🔵 प्रश्न सूक्ष्मीकरण साधना का है, जो हम इन दिनों कर रहे हैं। यह एक विशेष साधना है, जो स्थूल शरीर के रहते हुए भी की जा सकती है और उसे त्यागने के उपरांत भी करनी पड़ती है। दोनों ही परिस्थतियों में यह स्थिति बिना अतिरिक्त प्रयोग-पुरुषार्थ के, तप-साधना के सम्भव नहीं हो सकती। इसे योगाभ्यास तपश्चर्या का अगला चरण कहना चाहिए।

🔴 इसके लिए किसे क्या करना होता है, यह इसके वर्तमान स्तर एवं उच्चस्तरीय मार्गदर्शन पर निर्भर होता है। सबके लिए एक पाठ्यक्रम नहीं हो सकता। किंतु इतना अवश्य है कि अपनी शक्तियों का बहिरंग अपव्यय रोकना पड़ता है, अंडा जब तक पक नहीं जाता तब तक एक खोखले में बंद रहता है इसके बाद वह इस छिलके को तोड़कर चलने-फिरने और दौड़ने-उड़ने लगता है। लगभग यही अभ्यास सूक्ष्मीकरण के हैं, जो हमने पिछले दिनों किए हैं। प्राचीनकाल में गुफा सेवन, समाधि आदि का प्रयोग प्रायः इसी निमित्त होता था।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.156

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.20

👉 आत्मचिंतन के क्षण 10 Sep 2017

🔵 अपने गुण और दोष देखने में जब तक ईमानदारी और सच्चा दृष्टिकोण नहीं अपनाते संस्कार परिवर्तन में तभी तक परेशानी रहती है। मनुष्य आत्म दुर्बल तभी तक रहता है जब तक वह आत्म विवेचन का सच्चा स्वरूप ग्रहण नहीं करता। झूठे प्रदर्शनों और स्वार्थपूर्ण आचरण के कारण ही जीवन में परेशानियाँ आती हैं। सच्चाई की मस्ती ही अनुपम है। उसकी एक बार जो क्षणिक अनुभूति कर लेता है वह उसे जीवनपर्यन्त छोड़ता नहीं। सत्य मनुष्य को ऊँचा उठाता है, साधारण स्थिति से उठाकर परमात्मा के समीप पहुँचा देता है।

🔴 सत् संस्कारों का बल, कुसंस्कारों की अपेक्षा अनन्त गुना अधिक होता है किन्तु कुसंस्कारों में जो क्षणिक सुख और तृप्ति दिखाई देती है उसी के कारण लोग दुष्कर्मों की ओर बड़ी जल्दी खिंच जाते हैं। अतएव जब कभी ऐसे अनिष्टकारी विचार मस्तिष्क में उठें तब उनसे भागने या शीघ्र निर्णय का प्रयत्न करना चाहिए। किसी बुराई से डरने या भागने से वह जीवन का अंग बन जाती हैं किन्तु जब विचारों में मौलिक परिवर्तन करते हैं और बुराई की गहराई तक छान-बीन करते हैं तो अन्तःकरण की दिव्य ज्योति के समक्ष सच और झूठ की स्वतः अभिव्यक्ति हो जाती है।

🔵 आप जिस कार्य के लिये भी पूर्ण रुचि लगन और तत्परता के साथ काम करेंगे उसमें सफलता अवश्य मिलेगी। बुराइयों से बचाव और अच्छाइयों को धारण करने के लिये अपनी संपूर्ण चेष्टाओं को एकत्रित करके ही कुछ कार्यक्रम चलाये जा सकते है उन्हीं से स्थायी लाभ मिलता है। अपने जीवन में अशुभ संस्कारों के निवारण के लिए स्मृतियों, अनुभवों और आदतों का विश्लेषण करना चाहिए ताकि वस्तुस्थिति का सच्चा ज्ञान मिले। मनुष्य प्रायः अज्ञान में ही बुराइयाँ करता है। इसलिए वह दुख भी पाता है। बुरे संस्कारों का परिणाम भी सदैव दुःखदाई ही होता है। इसलिए बुराई त्याग करने के लिए साहस और धैर्य का आत्म विवेचन करते रहना चाहिए।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 10 Sep 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 Sep 2017


👉 वैभव की दुर्गंध:-


🔴 अवंतिका देश का ‘राजा रवि सिंह’ ‘महात्मा आशुतोष’ पर बड़ी ही श्रद्धा रखते थे। वह उनसे मिलने रोज कुटिया में जाते थे, लेकिन हर बार जब महात्मा को राजा अपने महल में आने के लिए आमंत्रित करते तो महात्मा मना कर देते।

🔵 एक दिन राजा रवि सिंह ने जिद पकड़ ली। तब महात्मा ने कहा- ‘मुझे तुम्हारे महल में दुर्गंध महसूस होती है।’

🔴 रवि सिंह अपने महल लौट आए लेकिन काफी देर तक महात्मा की बातों पर विचार करते रहे।

🔵 कुछ दिनों बाद जब राजा फिर से महात्मा के पास पहुंचे तो महात्मा राजा को पास के ही गांव में घुमाने ले गए। दोनों जंगल को पार करते हुए एक गांव में पहुंचे। उस गांव में कई पशु थे। उनके चमड़े के कारण दुर्गंध आ रही थी।

🔴 जब दुर्गंध सहन करने योग्य नहीं रह गई तो राजा ने महात्मा से कहा- ‘चलिए महात्मा यहां से, मुझसे ये दुर्गंध बर्दाश्त नहीं हो रही।’ तब महात्मा ने कहा- ‘यहां सभी हैं लेकिन दुर्गंध आप को ही आ रही है।’

🔵 राजा ने कहा- ‘ये लोग आदी हो चुके हैं, मैं नहीं।’

🔴 तब महात्मा ने कहा- ‘राजन! यही हाल तुम्हारे महल का है। जहां भोग और विषय की गंध फैली रहती है। तुम इसके आदी हो चुके हो लेकिन मुझे वहां जाने की कल्पना से ही कष्ट होने लगता है।’

🔵 जब हम अपनी जिंदगी में किसी वातावरण, व्यवहार के आदी हो जाते हैं तो उसकी भली-भांति परीक्षा करने की क्षमता खो देते हैं। हमारी दृष्टि संकुचित हो जाती है। इसलिए जब तक वातावरण से दूर होकर विचार, कर्म और जीवन की गतिविधियों का चिंतन नहीं किया जाता तब तक हमें सही गलत का ज्ञान नहीं होता है।

शनिवार, 9 सितंबर 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 64)

🌹  राष्ट्रीय एकता एवं समता के प्रति निष्ठावान् रहेंगे। जाति, लिंग, भाषा, प्रांत, सम्प्रदाय आदि के कारण परस्पर कोई भेदभाव न बरतेंगे।

🔴 संसार भर में एक ही जाति का अस्तित्व रहेगा और वह है सुसंस्कृत, सभ्य मनुष्य जाति का। काले, पीले, सफेद, गेहुँआ आदि रंगों की चमड़ी होने से किसी को भी अपनी अलग बिरादरी बनाए रह सकना अब संभव न होगा। समझदारी के माहौल में मात्र न्याय ही जीवित रहेगा और औचित्य ही सराहा, अपनाया जाएगा, तूती उसी की ही बोलेगी।
धर्म सम्प्रदायों के नाम पर, भाषा, जाति, प्रथा, क्षेत्र आदि के नाम पर जो कृत्रिम विभेद की दीवारें बन गई हैं, वे लहरों की तरह अपना-अपना अलग प्रदर्शन भले ही करती रहें, पर वे सभी एक ही जलाशय की सामयिक हलचल भर मानी जाएँगी। पानी में उठने वाले बबूले थोड़ी देर उछलने-मचलने का कौतूहल दिखाते हैं, इसके बाद त्वरित ही उनका अथाह जलराशि में विलय, समापन हो जाता है।

🔵 मनुष्य को अलगाव और बिखराव में बाँधने वाले प्रचलन इन दिनों कितने ही पुरातन, शास्त्र-सम्मत अथवा संकीर्णता पर आधारित होने के कारण कितने ही प्रबल प्रतीत क्यों न होते हों, पर अगले तूफान में इन बालुई घर-घरोंदों में से एक का भी पता न चलेगा। मनुष्य जाति अभी इन दिनों भले ही एक न हो, पर अगले ही दिनों वह सुनिश्चित रूप से एक बन कर रहेगी। धरातल एक देश बन कर रहेगा। देशों की कृत्रिम दीवारें खींचकर उसके टुकड़े बने रहना न तो व्यावहारिक रहेगा, न सुविधाजनक। इनके रहते शोषण, आक्रामकता, आपाधापी का माहौल बना ही रहेगा। देश भक्ति के नाम पर युद्ध छिड़ते रहेंगे और समर्थ दुर्बलों को पीसते रहेंगे। ‘‘जंगल का कानून-मत्स्य न्याय’’ इस अप्राकृतिक विभाजन की व्यवस्था ने ही उत्पन्न किया है। हर क्षेत्र का नागरिक अपनी ही छोटी कोठरियों में रहने के लिए बाधित है। वहाँ यह सुविधा नहीं कि अपनी अनुकूलता वाले किसी भी क्षेत्र में बस सकें।

🔴 कुछ देशों के पास अपार भूमि है, कुछ को बेतुकी घिचपिच में रहना पड़ता है। कुछ देशों ने अपने क्षेत्र की खनिज एवं प्राकृतिक सम्पदाओं पर अधिकार घोषित करके धन कुबेर जैसी स्थिति प्राप्त कर ली है और कुछ को असीम श्रम करने पर भी प्राकृतिक सम्पदा का लाभ न मिलने पर असहायों की तरह तरसते रहना पड़ता है। भगवान ने धरती को अपने सभी पुत्रों के लिए समान सुविधा देने के लिए सृजा है। प्राकृतिक सम्पदा पर सभी का समान हक है। फिर कुछ देश अनुचित अधिकार को अपनी पिटारी में बंद कर शेष को दाने-दाने के लिए तरसावें, यह विभाजन अन्यायपूर्ण होने के कारण देर तक टिकेगा नहीं।

🔵 आज की दादागीरी आगे भी इसी प्रकार अपनी लाठी बजाती रहेगी, यह हो नहीं सकेगा। विश्व एक देश होगा और उस पर रहने वाले सभी मनुष्य ईश्वर प्रदत्त सभी साधनों का उपयोग एक पिता की संतान होने के नाते कर सकेंगे। परिश्रम और कौशल के आधार पर किसी को कुछ अधिक मिले, यह दूसरी बात है, पर पैतृक सम्पदा पर तो सभी संतानों का समान अधिकार होना ही चाहिए। औचित्य होना चाहिए, ऐसा मनीषा ने घोषित किया है। न्याय युग में उसे ‘‘हो रहा है’’ या ‘‘हो गया’’ कहा जाएगा।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.88

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.16

👉 कर्ण की उदारता

🔵 भगवान कृष्ण एक दिन कर्ण की उदारता की चर्चा कर रहे थे। अर्जुन ने कहा-युधिष्ठिर से बढ़कर वह क्या उदार होगा? कृष्ण ने कहा-अच्छा परीक्षा करेंगे? एक दिन वे ब्राह्मण का वेश बनाकर युधिष्ठिर के पास आये और कहा-एक आवश्यक यज्ञ के लिए एक मन सूखे चंदन की आवश्यकता है। युधिष्ठिर ने नौकर लाने को भेजे। पर वर्षा की झड़ी लग रही थी इसलिए सूखा चन्दन नहीं मिल रहा था जो कट कर आता वह पानी में भीग कर गीला हो जाता। युधिष्ठिर सेर, दो सेर चन्दन दे सके, अधिक के लिए उसने अपनी असमर्थता प्रकट कर दी।

🔴 अब वे कर्ण के पास पहुँचे और वही एक मन सूखे चन्दन का सवाल किया। वह जानता था कि वर्षा में सूखा चन्दन न मिलेगा। इसलिए उसने अपने घर के किवाड़ चौखट उतार कर फाड़ डाले और ब्राह्मण को सूखा चन्दन दे दिया।

🔵 तब श्रीकृष्ण जी ने अर्जुन से कहा-देखो युधिष्ठिर उतना दान करते हैं जितने से उनकी अपनी कुछ हानि न हो। कर्ण अपने को कष्ट में डालकर भी दान करता है, उसकी उदारता अधिक बड़ी है।

🌹 अखण्ड ज्योति मई 1961

👉 Only Determination Leads Your Rise. (Part 2)

🔵 You must have seen that stairs are needed to go up. Even then it takes its time and botheration to reach at some specified height. But is there any delay if it comes to fall? Here stair stands for your Determination. Meteors from space keep falling down themselves whereas a rocket needs a lot of money and fuel to rise to be positioned in its orbit in space. It was about rocket to rise and meteor to fall. What about you?  You must gather courage to accept that you are under influence of ill-faculties of 8.4 millions of previous births with none of them being a human.
 
🔴 You must gather courage to accept that only this birth in the form of a human being opens the door of possibilities to take a stand & wage a war against accumulated ill-faculties being carried over for millions of previous births. How to do that? Make yourself strong but doing that means engineering a rocket and managing a lot of means to ensure its rising in order to be positioned in orbit. Doing not that means meteors falling down and down again with no needed support from any quarter and here in reference it means that your previous ill-faculties will drag you back to behave as you had been behaving throughout all your previous births.

🔵 Making strong is actually a systematic chain of CHINTAN (self-inspection /review and self-rectification) and MANAN ( self-inculcation and self-development)  and that is to be unleashed only when you are in solitude and your eyes closed for your outside world. Just convince your mind. It is bound to follow you provided you do that in a proper and systematic manner then it will go on the way it ought to go. What should be done?

🌹 to be continue...
🌹 Pt Shriram Sharma Aachrya

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 137)

🌹  स्थूल का सूक्ष्म शरीर में परिवर्तन सूक्ष्मीकरण

🔵 हमें अपनी प्रवृत्तियाँ बहुमुखी बढ़ा लेने के लिए कहा गया है। इसमें सबसे बड़ी कठिनाई स्थूल शरीर का सीमा बंधन है। यह सीमित है, सीमित क्षेत्र में ही काम कर सकता है। सीमित ही वजन उठा सकता है। काम असीम क्षेत्र से सम्बन्धित है और ऐसे में जिनमें एक साथ कितनों से ही वास्ता पड़ना चाहिए। यह कैसे बने? इसके लिए एक तरीका यह है कि स्थूल शरीर को बिल्कुल ही छोड़ दिया जाए और जो करना है, उसे पूरी तरह एक या अनेक सूक्ष्म शरीरों से सम्पन्न करते रहा जाए। निर्देशक को यदि यही उचित लगेगा, तो उसे निपटाने में पल भर की भी देर नहीं लगेगी। स्थूल शरीरों का एक झंझट है कि उनके साथ कर्मफल के भोग विधान जुड़ जाते हैं। यदि लेन-देन बाकी रहे तो अगले जन्म तक वह भार लदा चला जाता है और फिर खींचतान करता है। ऐसी दशा में उसके भोग भुगतते हुए जाने में निश्चिन्तता रहती है।

🔴 रामकृष्ण परमहंस ने आशीर्वाद वरदान बहुत दिए थे। उपार्जित पुण्य भण्डार कम था। हिसाब चुकाने के लिए गले का कैंसर बुलाया गया। बेबाकी तब हुई। आद्य शंकराचारर्य की भी भगंदर को फोड़ा ही जान लेकर गया था। महात्मा नारायण स्वामी को भी ऐसा ही रोग सहना पड़ा। गुरु गोलवलकर कैंसर से पीड़ित होकर स्वर्गवासी हुए। ऐसे ही अन्य उदाहरण हैं जिनमें पुण्यात्माओं को अंतिम समय व्यथा पूर्वक बिताना पड़ा। इसमें उनके पापों का दण्ड कारण नहीं होता, वह पुण्य व्यतिरेक की भरपाई करना होता है, वे कइयों का कष्ट अपने ऊपर लेते रहते हैं। बीच से चुका सके तो ठीक अन्यथा अंतिम समय हिसाब-किताब बराबर करते हैं, ताकि आगे के लिए कोई झंझट शेष न रहे और जीवन मुक्त स्थिति बने रहने में पीछे का कोई कर्मफल व्यवधान न करे।

🔵 मूल प्रश्न जीव सत्ता के सूक्ष्मीकरण का है। सूक्ष्म व्यापक होता है। बहुमुखी भी। एक ही समय में कई जगह काम कर सकता है। कई उत्तरदायित्व एक साथ ओढ़ सकता है। जबकि स्थूल के लिए एक स्थान, एक सीमा के बंधन हैं। स्थूल शरीरधारी अपने भाग दौड़ के क्षेत्र में ही काम करेगा। साथ ही भाषा ज्ञान के अनुरूप विचारों को आदान-प्रदान कर सकेगा। किन्तु सूक्ष्म में प्रवेश करने पर भाषा सम्बन्धी झंझट दूर हो जाते हैं। विचारों का आदान-प्रदान चल पड़ता है। विचार सीधे मस्तिष्क या अंतराल तक पहुँचाए जा सकते हैं। उनके लिए भाषा माध्यम आवश्यक नहीं। व्यापकता की दृष्टि से यह एक बहुत बड़ी सुविधा है यातायात की व्यवस्था भी स्थूल शरीरधारी को चाहिए।

🔴 पैरों के सहारे तो यह एक घण्टे में प्रायः तीन मील ही चल पाता है। वाहन जिस गति का होगा, उसकी दौड़ भी उतनी ही रह जाएगी। एक व्यक्ति की एक जीभ होती है। उसका उच्चारण उसी से होगा, किन्तु सूक्ष्म शरीर की इंद्रियों पर इस प्रकार का बंधन नहीं है। उनकी देखने की, सुनने की, बोलने की सामर्थ्य स्थूल शरीर की तुलना में अनेक गुनी हो जाती है। एक शरीर समयानुसार अनेक शरीर में भी प्रतिभाषित हो सकता है, रास के समय श्रीकृष्ण के अनेक शरीर गोपियों का अपने साथ सहनृत्य करते दीखते थे। कंस वध के समय तथा सिया स्वयंवर के समय उपस्थित समुदाय को कृष्ण और राम  की विभिन्न प्रकार की आकृतियाँ दृष्टिगोचर हुईं थीं। विराट रूप के दर्शन में भगवान् ने अर्जुन को, यशोदा को जो दर्शन कराया था, वह उनके सूक्ष्म एवं कारण शरीर का ही आभास था। अलंकार काव्य के रूप में उसकी व्याख्या की जाती है, सो भी किसी सीमा तक ठीक ही है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.154

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.20

👉 आत्मचिंतन के क्षण 9 Sep 2017

🔵 जैसा मनुष्य का स्वभाव होता है उसी के अनुरूप उसकी मनोदशा बनती रहती है और जब वही आदत अपने जीवन का अंग बन जाती है तो उसे संस्कार मान लेते हैं। शराब पीना प्रारम्भ में एक छोटी सी आदत दीखती है किन्तु जब वही आदत गहराई तक जक जाती है, तो शराब के सम्बन्ध में अनेकों प्रकार की विचार रेखायें मस्तिष्क में बनती चली जाती हैं जो एक स्थिति समाप्त हो जाने पर भी प्रेरणा के रूप में मस्तिष्क में उठा करती हैं। जैसे कोई कामुक प्रवृत्ति का मनुष्य स्वास्थ्य सुधार या किसी अन्य कारण से प्रभावित होकर ब्रह्मचर्य रहना चाहता है। इसके लिये वह तरह-तरह की योजनायें और कार्यक्रम भी बनाता है तो भी उसके पूर्व जीवन के कामुक विचार उठने से रुकते नहीं और वह न चाहते हुये भी उस प्रकार के विचारों और प्रभाव से टकराता रहता है।

🔴 संस्कार जैसे भी बन जाते है वैसा ही मनुष्य का व्यवहार होगा। यहाँ यह न समझना चाहिये कि यदि पुराने संस्कार बुरे पड़ गये हैं, विचारों में केवल हीनता भरी है, तो मनुष्य सद्व्यवहार नहीं कर सकता। यदि पूर्व जीवन के कुसंस्कार जीवन सुधार में किसी प्रकार का रोड़ा अटकाते है तो भी हार नहीं माननी है। चूँकि अब तक अच्छे कर्म नहीं किये थे इसलिये यह पुराने कुविचार परेशान करते हैं किन्तु यदि अब विचार और व्यवहार में अच्छाइयों का समावेश करते हैं तो यही एक दिन हमारे लिए शुभ संस्कार बन जायगा। तब यदि कुकर्मों की ओर बढ़ना चाहेंगे तो एक जबर्दस्त प्रेरणा अन्तःकरण में उठेगी और हमें बुरे रास्ते में भटकने से बचा लेगी।

🔵 आत्म विश्लेषण का अर्थ है प्रवृत्तियों के मूल कारण की तलाश करना। अर्थात् द्वेषपूर्ण भावनायें जिस आधार पर उठीं, उस आधार को ढूँढ़ना और उसे नष्ट करना। आत्म निरीक्षण का अर्थ है अपने विचारों और कार्यों की न्यायपूर्ण समीक्षा करना। बुराइयाँ पक्षपातपूर्ण विचार पद्धति के कारण ही उठती हैं। मनुष्य की यह सबसे बड़ी भूल है कि वह जिस वस्तु को चाहता है उसे किसी न किसी भूमिका के साथ टिका देता है। इसी को विचार और कार्यों का पक्षपात कहते हैं। जैसे बीड़ी, सिगरेट, या अन्य कोई मादक पदार्थ सेवन करने वालों की हमेशा यह दलील रहती है कि उससे उन्हें शान्ति मिलती है या मानसिक तनाव दूर होता है। पर यदि कठोरतापूर्वक विचार करें तो यह स्पष्ट दिखाई देता है कि शराब, सिगरेट के पक्ष में जो दलीलें देते रहते हैं वे सर्वथा निस्सार हैं। यह तो मन बहलाव के लिए गढ़ी बातें हैं। वस्तुतः उनसे मानसिक परेशानियाँ तथा स्वास्थ्य और पाचन प्रणाली में शिथिलता ही आती है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 9 Sep 2017


👉 जैसा कर्म करोगे वैसा ही फल मिलेगा

🔴 ये सच है कि हम जैसे कर्म करते है, हमें उसका वैसा ही फल मिलता है। हमारे द्वारा किये गए कर्म ही हमारे पाप और पुण्य तय करते है। हम अच्छे कर्म करते है तो हमें उसके अच्छे फल मिलते है और अगर हम बुरे कर्म करते है तो हमें उसके बुरे फल मिलते है। हमारे जीवन में जो भी परेशानियां आती हैं, उनका संबंध कहीं ना कहीं हमारे कर्मों से होता है।

🔵 कबीरदास जी का ये दोहा हमें हमेशा ये एहसास दिलाता है कि बुरे कर्मों का फल हमेशा बुरा ही होता है।

करता था सो क्यों किया, अब करि क्यों पछताय।
बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से खाय॥

🔴 कभी कभी हम जान बूझकर गलत काम करते हैं तो कभी अनजाने में गलत काम कर जाते हैं। जिसके कारण हमें आगे चलकर परेशानी उठानी पड़ती हैं। और जब हम पर कोई परेशानी आती हैं तब हम पछताते हैं कि काश हमने ऐसा काम ना किया होता तो शायद आज हम इस मुश्किल में ना पड़ते।

🔵 पुराने समय में एक राजा था।  वह अक्सर अपने दरबारियों और मंत्रियों की परीक्षा लेता रहता था। एक दिन राजा ने अपने तीन मंत्रियों को दरबार में बुलाया और तीनो को आदेश दिया कि एक एक थैला लेकर बगीचे में जायें और वहाँ से अच्छे अच्छे फल तोड़ कर लायें। तीनो मंत्री एक एक थैला लेकर अलग अलग बाग़ में गए। बाग़ में जाकर एक मंत्री ने सोचा कि राजा के लिए अच्छे अच्छे फल तोड़ कर ले जाता हूँ ताकि राजा को पसंद आये। उसने चुन चुन कर अच्छे अच्छे फलों को अपने थैले में भर लिया। दूसरे मंत्री ने सोचा “कि  राजा को कौनसा फल खाने है?” वो तो फलों को देखेगा भी नहीं। ऐसा सोचकर उसने अच्छे बुरे जो भी फल थे, जल्दी जल्दी इकठ्ठा करके अपना थैला भर लिया। तीसरे मंत्री ने सोचा कि समय क्यों बर्बाद किया जाये, राजा तो मेरा भरा हुआ थैला ही देखेगे। ऐसा सोचकर उसने घास फूस से अपने थैले को भर लिया। अपना अपना थैला लेकर तीनो मंत्री राजा के पास लौटे।  राजा ने बिना देखे ही अपने सैनिकों को उन तीनो मंत्रियों को एक महीने के लिए जेल में बंद करने का आदेश दे दिया और कहा कि इन्हे खाने के लिए कुछ नहीं दिया जाये। ये अपने फल खाकर ही अपना गुजारा करेंगे।

🔴 अब जेल में तीनो मंत्रियों के पास अपने अपने थैलो के अलावा और कुछ नहीं था। जिस मंत्री ने अच्छे अच्छे फल चुने थे, वो बड़े आराम से फल खाता रहा और उसने बड़ी आसानी से एक महीना फलों के सहारे गुजार दिया। जिस मंत्री ने अच्छे बुरे गले सड़े फल चुने थे वो कुछ दिन तो आराम से अच्छे फल खाता रहा रहा लेकिन उसके बाद सड़े गले फल खाने की वजह से वो बीमार हो गया। उसे बहुत परेशानी उठानी पड़ी और बड़ी मुश्किल से उसका एक महीना गुजरा। लेकिन जिस मंत्री ने घास फूस से अपना थैला भरा था वो कुछ दिनों में ही भूख से मर गया।

🔵 दोस्तों ये तो एक कहानी है। लेकिन इस कहानी से हमें बहुत अच्छी सीख मिलती है कि हम जैसा करते हैं, हमें उसका वैसा ही फल मिलता है। ये भी सच है कि हमें अपने कर्मों का फल ज़रूर मिलता है। इस जन्म में नहीं, तो अगले जन्म में हमें अपने कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है। एक बहुत अच्छी कहावत हैं कि जो जैसा बोता हैं वो वैसा ही काटता है। अगर हमने बबूल का पेड़ बोया है तो हम आम नहीं खा सकते। हमें सिर्फ कांटे ही मिलेंगे।

🔴 मतलब कि अगर हमने कोई गलत काम किया है या किसी को दुःख पहुँचाया है या किसी को धोखा दिया है या किसी के साथ बुरा किया है, तो हम कभी भी खुश नहीं रह सकते। कभी भी सुख से, चैन से नहीं रह सकते। हमेशा किसी ना किसी मुश्किल परेशानी से घिरे रहेंगे।

🔵 तो दोस्तों, अब ये हमें देखना है कि हम अपने जीवन रुपी थैले में कौन कौन से फल इकट्ठे कर रहे हैं? अगर हमने अच्छे फल इकट्ठे किये है मतलब कि अगर हम अच्छे कर्म करते है तो हम ख़ुशी से अपनी ज़िंदगी गुजारेंगे। लेकिन अगर हमने अपने थैले में सड़े गले फल या घास फूस इकठ्ठा किये हैं तो हमारी ज़िंदगी में कभी ख़ुशी नहीं आ सकती। हम कभी सुख से, चैन से नहीं रह सकते। हमेशा दुखी और परेशान ही रहेंगे। इसलिए हमेशा अच्छे कर्म करें और दूसरों को भी अच्छे काम करने के लिए प्रेरित करें।

शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 63)

🌹  राष्ट्रीय एकता एवं समता के प्रति निष्ठावान् रहेंगे। जाति, लिंग, भाषा, प्रांत, सम्प्रदाय आदि के कारण परस्पर कोई भेदभाव न बरतेंगे।

🔴 इक्कीसवीं सदी की सम्पूर्ण व्यवस्था एकता और समता के सिद्धांतों पर निर्धारित होगी। हर क्षेत्र में, हर प्रसंग में, उन्हीं का बोलबाला दृष्टिगोचर होगा। इस भवितव्यता के अनुरूप हम अभी से धीमी-धीमी तैयारियाँ शुरू कर दें तो यह अपने हित में होगा। ब्रह्म मुहूर्त्त में जागकर नित्यकर्म से निपट लेने वाले व्यक्ति सूर्योदय होते ही अपने क्रियाकलापों में जुट जाते हैं, जबकि दिन चढ़े तक सोते रहने वाले कितने ही कामों में पिछड़ जाते हैं।

🔵 मूर्धन्य मनीषियों का कहना है कि अगले दिनों एकता, एक सर्वमान्य व्यवस्था होगी। सभी लोग मिलजुल कर रहने के लिए विवश होंगे। डेढ़ चावल की खिचड़ी पकाने, ढाई ईंट की मस्जिद खड़ी करने का कोई उपहासास्पद खिलवाड़ नहीं करेगा। सभ्यता के बढ़ते चरणों में एकता ही सबकी आराध्य होगी। बिलगाव का प्रदर्शन करने वाली बाल-खिलवाड़ देर तक अपनी अलग पहचान न रह सकेगी। बिखराव सहन न होगा। बिलगाव को कहीं से भी समर्थन नहीं मिलेगा। संकीर्ण स्वार्थपरता और अपने मतलब से मतलब रखने वाली क्षुद्रता किसी भी क्षेत्र में व्यावहारिक न होगी। मिलजुल कर रहने पर ही शांति, सुविधा और प्रगति की दिशा में बढ़ा जा सकेगा। वसुधैव कुटुंबकम् का आदर्श अब समाजवाद, समूहवाद, संगठन, एकीकरण का विधान बन कर समय के अनुरूप कार्यान्वित होगा। उसे सभी विज्ञजनों का समान समर्थन भी मिलेगा।

🔴 अगली दुनिया एकता का लक्ष्य स्वीकारने के लिए निश्चय कर चुकी है। अड़ंगेबाजी से निबटना ही शेष है। वे प्रवाह में बहने वाले पत्तों की तरह लहरों पर उछलते कूदते कहीं से कहीं जा पहुँचेंगे। चक्रवात से टकराने की मूर्खता करने वाले तिनकों के अस्तित्व उस वायु भँवर में फँस कर अपना अस्तित्व तक गँवा बैठते हैं। एकता अब अपरिहार्य होकर रहेगी। जाति-पाँति के नाम पर रंग, वर्ण और लिंग के आधार पर अलग-अलग कबीले बसा कर रहना आदिम काम में ही संभव था, आज के औचित्य को समर्थन देने वाले युग में नहीं।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.87

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.16

👉 Only Determination Leads Your Rise. (Part 1)

🔵 Such fantastic law is of this universe that obvious is the fall here and very tedious job here is the Rise. Leave water on its own, you will find it flowing downwards demanding no labour in this connection. Neither hardship nor any pursuit is involved in falling down. Such strange law is of the world. You will find there bulk of means in support of your downfall, your ill-acts. You will get books and helping hands to help you fall down and suppose there is no one to support in this regard then your faculties of previous births will much help you in this connection after all why the impressions of 8.4 million YONIs should not matter?
 
🔴 They will continue to encourage you to fall down. No teacher is required for that, no outsider is required for that. These things have almost become your nature. In this world everywhere is seen involved in an attempt to fall down and if you take no precaution, do not oppose it and do not wage a war against it then be sure you will fall and continue to fall. The whole of society misled by so-called managers of god is heading downwards right now.

🔵 Look all around you. Where will you get man fighting in favor of principles and idealism? Majority of people will be seen heading towards wickedness. Their CHINTAN & MANAN will be heading on the path of sinful acts and downfall. Their character too heads towards fall and their thinking too. Then what should you do now? You, being desirous of being better positioned and of rising in your life must gather courage from within. What courage? We too must be determined in the same way as have been the people who sometime in past had vowed to rise with the help of courage.

🌹 to be continue...
🌹 Pt Shriram Sharma Aachrya

👉 आत्मचिंतन के क्षण 8 Sep 2017

🔵 महानता के विकास की सबसे बड़ी बाधा असंयम है। दुःख और सन्ताप दीनता और आत्म-हीनता की अधोगामी परिस्थितियाँ मानव-जीवन में शारीरिक व मानसिक असंयम के कारण आती हैं। आत्म-संयमी न होने से मनुष्य का व्यक्तित्व गिर जाता है। संयम साक्षात् स्वर्ग का द्वार है। यह मनुष्य जीवन में शान्तिदायक परिणाम प्रस्तुत करता है। मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन संयम से प्रकाशित होता है। इसी से दिव्य ज्ञान की प्राप्ति होती है। आध्यात्मिक स्वतन्त्रता तथा वैभव की प्राप्ति के लिये संयमित दिनचर्या की प्रबल आवश्यकता होती है। इसके बिना आत्म-ज्ञान का अत्यन्त आवश्यक क्षेत्र अधूरा ही रहा जाता है। मानव जीवन की सार्थकता इस बात पर है कि इस शरीर की महत्वपूर्ण शक्तियों का लाभ उठाकर अपना पारलौकिक लक्ष्य पूरा कर लें। यह प्रक्रिया आत्मसंयम से पूरी होती है।

🔴 महानता के विकास में अहंकार सबसे बड़ा घातक शत्रु है। स्वार्थवादी दृष्टिकोण के कारण घमण्डी व्यक्ति दूसरों को उत्पीड़ित किया करते है। शोषण, अपहरण के बल पर दूसरों के अधिकार छीन लेने की दुष्प्रवृत्ति लोगों को नीचे गिरा देती है। जब तक ऐसी भ्रान्त धारणायें बनी रहती हैं तब तक लोग बाह्य सफलतायें भले ही इकट्ठा कर लें, वस्तुतः वे गरीब ही माने जायेंगे। साँसारिक दृष्टि से बड़ा आदमी बन जाने से किसी की महानता परिलक्षित नहीं होती। ऐसा होता तो शारीरिक दृष्टि से बलिष्ठ, धनकुबेरों, और दस्यु सामन्तों की ही सर्वत्र पूजा की जाती, उन्हें ही मानवता का श्रेय मिलता। किन्तु यथार्थ बात यह नहीं है। महान व्यक्ति कहलाने का सौभाग्य व्यक्ति को उदारतापूर्वक दूसरों की सेवा करने से मिलता है।

🔵 मनुष्य की महानता का सम्बन्ध बाह्य जीवन की सफलताओं से नहीं है। आन्तरिक दृष्टि से निर्मल, पवित्र और उदारमना व्यक्ति चाहे वह साधारण परिस्थितियों में ही क्यों न हो, महान आत्मा ही माना जायेगा। यह महानता साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा के साधन चतुष्टय से परिपूर्ण होती है। हम आदर्शों की उपासना करें, विचारों में निर्मलता और जीवन में आत्मसंयम का अभ्यास करें, दूसरों की सेवा को ही परमात्मा की सच्ची सेवा मानें तो ही महानता का गौरव प्राप्त करने के अधिकारी बन सकते है। अतः हमें साधना, स्वाध्याय, संयम एवं सेवा कार्यों में कभी भी आलस्य और प्रमाद नहीं करना चाहिये।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 8 Sep 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 8 Sep 2017


👉 समय सब को जवाब दे देता है!

🔴 कच्चे घड़े को चाहो जैसै रंग मे रंग दो, कच्ची मिट्टी को चाहो जैसा आकार दे दो चाहो जैसा मोड़ दे दो पर समय निकल जाने के बाद कुछ नही!

🔵 बचपन मे किये अपराधों पर मिली शह से पुरी मानव देह झरझर हो जाया करती है।

🔴 एक गाँव मे एक नामी जागीरदार रहा करते थे अपने समय मे उनकी बड़ी धाक हुआ करती थी अपने गाँव मे ही नही आसपास के गाँवों मे भी उनका बड़ा रुतबा था!

🔵 ऐश्वर्य की कोई कमी न थी और उनका एक मात्र पुत्र रंगलाल था उसे बड़े ही लाड़ प्यार से पाला!

🔴 एक दिन नगर के बीच चौराहे पर बड़ी भीड़ जमा हो रखी थी एक वृद्ध अध्यापक अपने बेटे के साथ खड़े थे उन्होंने पुछा बेटे ये भीड़ कैसी है इतने मे किसी ने एक इंसान को जोर से लात मारी और वो अध्यापक के पैरों मे जा गिरा और दोनो की नजरे आपस मे मिल गई!

🔵 और उस इंसान ने अध्यापक जी से कहा बहुत अच्छी शिक्षा दी आपने और अध्यापक जी को हँसी आ गई!

🔴 सब सोचने लगे किसी की दुर्दशा पर अध्यापक जी हँसे क्यों?

🔵 एक समय मे रंगलाल इन्ही के विद्यालय मे पढ़ता था और एक दिन रंगलाल और कुछ लडको ने किसी अध्यापक के साथ अभद्र व्यवहार किया था तो इन्ही अध्यापक जी ने उन सभी को डंडे से पिटा था सब ने गलती न दोहराने का संकल्प लिया पर रंगलाल ने अपने पिता से जाकर कहा तो रंगलाल के जागीरदार पिता ने इन अध्यापक जी को वहाँ से निकलवा दिया और बीच चौराहे पर इनका बड़ा अपमान किया था तब अध्यापक जी ने कहा की जागीरदार जी क्यों आप अपने पुत्र की जिंदगी को तबाही की और ले जा रहे हो मेरा तो कुछ नही यहाँ नही कही और चला जाऊँगा पर आपकी इन गलत शह की वजह से आपकी सन्तान कही आपके हाथ से न चली जायें तो उस बीच चौराहे पर इसी जागीरदार ने अध्यापक जी को थप्पड़ मारी थी और इसी रंगलाल ने हँसकर अपने पिता का स्वागत किया था!

🔴 तब गाँव के कई लोगो को बड़ा दुःख हुआ तो अध्यापक जी ने कहा अरे आप दुःखी क्यों होते हो दुःखी न होओ क्योंकि समय एक दिन सब को जवाब दे देता है!

🔵 और समय बीतता गया और जागीरदार का पुत्र हाथ से निकलता चला गया और फिर एक दिन इसी रंगलाल ने अपने पिता की सारी सम्पति को अय्याशियों मे उड़ा दिया और अब ये उनसे पैसा माँग रहा है पैसा न मिलने की वजह से रंगलाल अपने जागीरदार पिता को बीच चौराहे पर पिट रहा है!

लोग बोले की दोनों ही कितने अभागे थे!

🔴 अध्यापक जी ने कहा अभागे केवल ये दोनो ही नही है! क्योंकि हर वो शक्स अभागा है जिसे बचपन मे सही राह और सुसंस्कृत नींव न मिली। अभागा नही वो महाअभागा है जिसे न तो सुसंस्कृत नींव मिली, न सुसंस्कार मिले और ऊपर से गलत कर्म पर शह मिली! जिसे समय पर दण्ड न मिला उसका जीवन धीरे धीरे अन्धकार मे लुप्त हो गया! जिस जिस ने गलत कर्म पर मिलने वाली शह का स्वागत किया वास्तव मे उसने अपने अंधकारमय भविष्य का स्वागत किया!

🔵 वैसे अध्यापक जी जागीरदार की दुर्दशा पर नही हँसे वो तो इसलिये हँसे की इतना कुछ हो जाने के बाद भी जागीरदार अपने अपराध को अध्यापक जी पर थोप रहे थे।

🔴 तो मेरे प्यारे मित्रों आप लोग मत तो किसी को गलत कर्म पर शह देना और मत किसी के भविष्य के साथ कोई खिलवाड़ करना वरना अंजाम अच्छे न होंगे! क्यों की जो दुर्गति जागीरदार और उसके पुत्र की हुई वही दुर्गति हर उस शक्स की हो सकती है जो गलत शह देगा और उसका स्वागत करेगा!

🔵 बचपन और गीली मिट्टी एक समान है चाहो जैसा मोड़ दे दो और चाहो जिस रंग मे रंग दो !

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 April 2026

Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें। ➨ YouTube:  https://yugrishi-erp....