सोमवार, 15 नवंबर 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ८५)

दुर्लभ है महापुरुषों का संग

महर्षि अंगिरा की वाक्य वीथियों में गुजरते हुए सभी के अन्तर्मन भक्तिसुधा में निमज्जित होते रहे। उनके विचारों में यह सतत स्पन्दित होता रहा कि भक्ति से न केवल भावनाएँ परिशोधित होती हैं, बल्कि सम्पूर्ण जीवन रूपान्तरित होता है। दस्यु दुर्दम्य हो या फिर कोई और, जिसके भी हृदय में भक्ति का अंकुरण हुआ, वहाँ रूपान्तरण के पुष्प खिले बिना नहीं रहते। इन विचार स्पन्दनों ने पहले से ही सुरभित एवं सुवासित हिमवान के आंगन को और भी सुरभित एवं सुवासित कर दिया। वहाँ एक मीठी सी सुगन्ध बिखर गयी जिसे हिमालय के श्वेत शिखर अपने में समेट लेने के लिए प्रयत्नशील हो गए। हिमालय का यह दिव्य क्षेत्र परम पावन एवं अति अलौकिक था और आज भी है। यह वह अतिगुह्य क्षेत्र है, जो स्वः महः जनः तपः आदि ऊर्ध्व लोकों को धरती से जोड़ता है। इसकी विशेषताएँ अनूठी एवं अनोखी हैं। यह सम्पूर्ण क्षेत्र सदा ही एक शक्तिशाली आध्यात्मिक चुम्बकत्व से आच्छादित रहता है। यही वजह है कि सामान्य जन यहाँ पहुँचकर भी नहीं पहुँच पाते हैं। उनकी दृष्टि इसे देखने एवं पहचानने में सदा असमर्थ रहती है।

यहीं इसी दिव्य भूमि में ऋषियों एवं देवों का भक्तिसमागम पिछले काफी समय से चल रहा था। अब तो इसकी चर्चा सुदूर लोकों में भी होने लगी थी। देव, गन्धर्व, सिद्ध, विद्याधर, जनः एवं तपः लोकों के महर्षि भी यहाँ आने के लिए हमेशा उत्सुक रहते थे क्योंकि उन्हें यह ज्ञात था कि केवल भक्ति से ही मनुष्य को सम्पूर्ण शान्ति एवं परमतृप्ति मिलती है। आज भी यहाँ पर एक परम दुर्लभ विभूति के आने के संकेत मिल रहे थे। प्रातः उदीयमान सूर्य की अरूण किरणें उनके स्वागत में सुवर्ण वर्षा करने लगी थीं। वह देवों के लिए भी पूज्य थे। भक्तजन तो उन्हें अपना आदर्श मानते ही थे। उनका कठोर तप त्रिलोकविख्यात था। उन्होंने विश्व का सर्वप्रथम काव्य ग्रन्थ लिखा था। आदिकवि महर्षि वाल्मीकि ने ऊर्ध्वलोकों से अपने आगमन के संकेत दिए थे। उनके आगमन के इन संकेतों ने सभी को एक अपूर्व प्रसन्नता एवं पुलकन दी थी। ब्रह्मर्षि वसिष्ठ एवं ब्रह्मर्षि विश्वामित्र तो विशेष आनन्दित थे, क्योंकि इनकी अनेकों यादें उन महान् विभूति से जुड़ी थीं।

इन यादों के सघन होते ही सभी ने एक स्वर्णिम प्रकाशपुञ्ज को गगन से धरा पर अवतीर्ण होते देखा। इसकी प्रभा एवं प्रकाश के सामने उदय हो रहे भगवान भुवनभास्कर का प्रकाश मद्धम पड़ गया था। इस अनोखे प्रकाशपुञ्ज से बिखर रही प्रकाश रश्मियों के साथ एक दिव्य सुगन्ध चहुं ओर बिखर रही थी जिससे सभी के तन, मन एवं आत्मा स्नात हो रहे थे। थोड़े ही पलों में यह प्रकाशपुञ्ज मानवाकृति में बदल गया। उन गौरवर्णीय दिव्य महापुरुष की छवि अवर्णनीय थी। माथे पर श्वेत केशराशि लहरा रही थी। मुख पर श्वेत दाढ़ी-मूंछें उनकी आभा को गौरवपूर्ण बना रहे थे। उनके नेत्र तो जैसे तरल प्रकाश का स्रोत थे। उनकी सम्पूर्ण देहयष्टि एक अनोखे प्रकाश वलय से घिरी थी।

उन्हें सबसे पहले ब्रह्मर्षि वशिष्ठ एवं ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने पहचाना। देवर्षि का उन्होंने स्वयं अभिवादन किया। प्रत्युत्तर में देवर्षि ने उन्हें हृदय से लगा लिया। महर्षियों में भी सर्वपूज्य वाल्मीकि को अपने बीच पाकर सभी आह्लादित थे। काफी समय तक सभी इस दैवी आनन्द में डूबे रहे। फिर परम तेजस्वी विश्वामित्र ने देवर्षि की ओर साभिप्राय देखा। उनकी दृष्टि के मर्म को  देवर्षि नारद ने तुरन्त पहचान लिया और मुस्कराते हुए उन्होंने सभी की ओर देखा। सभी की आँखों में नवीन भक्तिसूत्र के श्रवण की आतुर जिज्ञासा दिखी। देवर्षि ने भी बिना देर लगाए अपना नवीन भक्तिसूत्र उच्चारित किया-

‘महत्सङ्गस्तु दुर्लभोऽगम्योऽमोघश्च’॥३९॥
महापुरुषों का सङ्ग दुर्लभ, अगम्य और अमोघ है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १५७

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