मंगलवार, 14 अप्रैल 2020

👉 शाश्वत नियम

वसन्त आती है, चली जाती है। पतझड़ आती है, चली जाती है। सुख आते हैं, चले जाते हैं। दुःख आते हैं, चले जाते हैं। सुख और दुःख का आना-जाना ठीक वसन्त व पतझड़ के आने व जाने की तरह है। आना और जाना यही इस जगत् का शाश्वत नियम है। जो इस शाश्वत नियम को जान लेता है, उसका जीवन क्रमशः बन्धनों से मुक्त होने लगता है।
  
एक अँधियारी रात में कोई प्रौढ़ व्यक्ति नदी के तट से कूदकर आत्महत्या करने पर विचार कर रहा था। मूसलाधार बारिश थी, नदी पूरे बाढ़ पर थी। आकाश में घने बादल छाए हुए थे, बीच-बीच में बिजली चमक रही थी। वह उस क्षेत्र का सबसे धनी व्यक्ति था। लेकिन अचानक घाटे में उसकी सारी सम्पदा चली गयी। इसी वजह से वह आत्महत्या का निश्चय करके यहाँ आया था। लेकिन वह नदी में कूदने के लिए जैसे ही चट्टान के किनारे पहुँचने को हुआ, कि किन्हीं दो वृद्ध, परन्तु मजबूत हाथों ने उसे थाम लिया। तभी बिजली चमकी और उसने देखा कि आचार्य रामानुज उसे पकड़े हुए हैं।
  
उन्होंने उससे इस अवसाद का कारण पूछा और सारी कथा सुनकर वह हँसने लगे और बोले, तो तुम यह स्वीकार करते हो कि पहले तुम सुखी थे? वह बोला- हाँ तब मेरे सौभाग्य का सूर्य पूरे प्रकाश से चमक रहा था और अब सिवाय अंधियारे के मेरे जीवन में और कुछ भी बाकी नहीं है। यह सुनकर आचार्य रामानुज फिर से हँस पड़े और बोले, दिन के बाद रात्रि और रात्रि के बाद दिन। जब दिन नहीं टिका तो रात्रि कैसे टिकेगी? परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है। जब अच्छे दिन नहीं रहे तो बुरे दिन भी नहीं रहेंगे। जो इस शाश्वत नियम को जान लेता है, उसका जीवन उस अडिग चट्टान की भाँति हो जाता है, जो वर्षा व धूप में समान ही बनी रहती है।

सुख व दुःख को जो समभाव से ले, समझो कि उसने जीवन के शाश्वत नियम को जान लिया। इस शाश्वत नियम की अनुभूति करने वाला, एक दिन स्वयं को भी जान लेता है। क्योंकि समत्व में ठहर जाना ही स्वयं के अस्तित्त्व में प्रतिष्ठित होना है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २१४

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