बुधवार, 24 मई 2023

👉 समर्थ और प्रसन्न जीवन की कुँजी (भाग 4)

किसी मित्र या सहयोगी से आड़े वक्त में आप सहायता की आशा करते थे पर उसने सहानुभूति तक न दिखाई। इसमें भी आवेश क्रोध करने की आवश्यकता नहीं। किन्हीं से आपके अच्छे सम्बन्ध रहे हो, इसे आप अपनी सज्जनता का तकाजा समझे। जितने अधिक लोगों के साथ आपके सद्भाव रहे उतना ही अच्छा पर इसका मूल्य कोई आपकी सहायता करके चुकाये यह आवश्यक नहीं। आप अपने निज के बल पर विश्वास कीजिए। इतना साहस रखिये कि अपनी गुत्थियों को अपने बलबूते सुलझा लेंगे न सुलझेगी तो उस अन सुलझा स्थिति से भी काम चलायेंगे आपकी इच्छानुरूप सारी समस्याओं का हल निकलता रहे यह आवश्यक नहीं। गुत्थियाँ और भी अधिक उलझ सकती है।

प्रतिकूलताओं का दबाव और भी अधिक बढ़ सकता है। यह अनुमान लगाकर चलेंगे तो आप जीवन संग्राम के सच्चे खिलाड़ी कहे जा सकते है। खिलाड़ी का पहला और आवश्यक गुण यह है कि वह हारती हुई मुख मुद्रा में भी संतुलित मन स्थिर और निश्चय वाला होना चाहिए। उसके लिए तैश, आवेश किन्हीं भी परिस्थितियों में क्षम्य नहीं है। हर आदमी खिलाड़ी तो नहीं हो सकता, पर उसे समझदार तो होना ही चाहिए। समझदारी की जिम्मेदारियाँ खिलाड़ी जिम्मेदारी से किसी भी प्रकार कम नहीं है। उसका स्वभाव उससे भी घटिया नहीं होना चाहिए। उसका मानसिक स्वास्थ्य सही रहना चाहिए।

बीमारियों को यदि दो भागों में विभक्त करना पड़े तो उनमें एक आवेशजन्य और दूसरी अवसादजन्य होगी। रक्तचाप के उदाहरण से इसे और भी अच्छी तरह समझा जा सकता है। एक हाई ब्लड प्रेशर दूसरा लो ब्लड प्रेशर। मानसिक रोगियों में एक किस्म उत्तेजितों की है। दूसरी अवसाद ग्रस्तों की। अवसाद ग्रस्त अर्थात् निराश, उदास, आलसी, अकर्मण्य, डरपोक, कायर आदि। उत्तेजितों में क्रोधी, आवेश ग्रस्त, जल्दबाज, झगड़ालू आदि दुःस्वभाव ग्रस्त। दो ही प्रकृति वाले अस्वाभाविक जीवन जीते है और अर्ध विक्षिप्त कहलाते है। यदि उनके सामने कोई गुत्थी या कठिनाई आए तो वे उसे हल करना तो दूर अपनी मानसिक अस्त–व्यस्तता के कारण दूनी बढ़ा लेंगे। सफलता के अवसर सामने होंगे तो उन्हें जल्दी ही गंवा देंगे। ऐसे लोग इस या उस प्रकार असफल ही रहेंगे। हैरानी उन्हें हर घड़ी घेरे रहेगी

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1988 पृष्ठ 57

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