बुधवार, 30 अगस्त 2017

👉 अतृप्ति

🔵 अतृप्ति की पीड़ा से परेशान एक मनुष्य एक फकीर के पास गया और उसने उससे पूछा कि मेरी यह अतृप्ति कैेेसे मिट सकती है? मैं तृप्ति का अनुभव कैेेसे कर सकता हूँ? उस फकीर ने कहा- अरे ! इसमें क्या? तुम चलो मेरे साथ। मैं कुएँ पर जा रहा हूँ पानी भरने, लगे हाथ तुम्हें अपने सवाल का जवाब भी मिल जाएगा, कहने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। तुम देख कर ही समझ जाओगे।

🔴 अचरज तो उसे तब भारी हुआ जब फकीर ने एक बाल्टी कुएं में डाली जिसमें पेन्दी थी ही नहीं। फकीर ने खूब बाल्टी को डुबोया कुएं के भीतर, खूब अावाज अाइ, बाल्टी पानी में डूबी भी। उस बाल्टी को डूबने में देर भी न लगी क्योंकि उसमें पेन्दा तो था ही नहीं, जितनी बार भी उसे खीचा,, बाल्टी खाली ही ऊपर अाई। एक बार, दो बार, दस बार यह खेल चलता रहा। अन्त में उस व्यक्ति से रहा न गया। वह बोल पड़ा- तुम यह क्या कर रहे हो? यह तो कभी भी नहीं भरेगी।

🔵 फकीर हंस पड़ा और कहने लगा- यह बाल्टी मैं तुम्हारे लिए कुएं में डाल रहा हूँ। यह वासना भी बाल्टी है, कभी भी नहीं भरेगी। अाज तक किसी की नहीं भरी है। वासना से तृप्ति पाने के फेर में विषाद ही होता है। तुमने जितनी बार वासनाओं से तृप्त होने की कोशिश की, अतृप्ति ही मिली। कितनी बार लगा कि खूब बाल्टी भरी है कुएं के भीतर लेकिन जब तक हाथ में अाई, खाली हो गई। बार बार एेसा हुआ फिर भी तुम जागे नहीं,, फिर भी तुम चौंके नहीं। चलो अाज तुम चौंके तो सही। तुम्हें होश तो अाया कि वासनाओं की अतृप्ति कभी मिटती ही नहीं। तृप्ति तो सम्वेदनाओं की डगर पर चलने औेर सेवा करने पर मिलती है। जो इस पर चल सका उसे तृप्ति, तुष्टि औेर शान्ति तीनों अनायास ही मिल जाती है।

🍣 अखन्ड ज्योति नवम्बर 2006 पेज-3

2 टिप्‍पणियां:

Mukesh kumar ने कहा…

bahut hi adbhut aur jivan ki eek atut sacchi ka warnan kia gaya hai. Jai Gaytri Maa

बलराम शर्मा ने कहा…

गुरुदेव को सत सत प्रणाम

👉 गुरु पूर्णिमा-’युग निर्माण योजना’ का अवतरण पर्व (अंतिम भाग)

एक घंटा समय किस कार्य में लगाया जाय? इसका उत्तर यही है- ‘जन जागृति में’-विचार क्रान्ति का अलख जगाने में। बौद्धिक कुण्ठा ही राष्ट्रीय अवस...