मंगलवार, 29 अगस्त 2017

👉 कुत्सा भड़काने वाली अश्लीलता को मिटाया जाय (भाग 2)

🔵 यौनाचार की पृष्ठभूमि उन अंगों के नग्न प्रदर्शन से बनती है। जिन्हें देखने या छूने का अधिकार परस्पर पति-पत्नि को ही है। छूने के साथ ही देखने की भी गणना होती है। यह आधार चित्रों तक चला गया है। निर्वस्त्र चित्र, जिनमें कामुकता भड़काने वाले अवयव दिखते हैं अश्लीलता की परिधि में आते हैं और उनका देखना, दिखाना, बेचना, खरीदना दण्डनीय अपराध माना जाता है। यह इसलिए कि इससे ऐसी कामुकता भड़कती है जो नर-नारी के पवित्र एवं वैध सम्बन्धों का उल्लंघन करने के लिए उत्तेजित करती है। यह उत्तेजन दृश्य साधनों से भी हो सकता है एवं श्रव्य साधनों से भी। इन दिनों दोनों ही समाज में खूब प्रचलित हैं। इनका खुला विरोध तो बहुत कम देखा जाता है, किन्तु मौन रूप में उन्हें सुनते-देखते अपनी कामुकता की वृत्ति को पोषण देते अनेकों देखे जा सकते हैं। पतनोन्मुख प्रवाह स्वाभाविक रूप से नीचे की ओर बढ़ता है और इस झोंके में बहुसंख्य व्यक्ति आ जाते हैं। सच्चे साहसी वे होते हैं जो इनसे अप्रभावित हो इनका खुला विरोध करते हैं। औरों को भी आदर्शों के प्रति सहमत करते व स्वयं आगे बढ़ते देखे जाते हैं।

🔴 सामान्यतया फिल्मी गीतों, शादी-ब्याह में गाये जाने वाले गानों, लोक गीतों में प्रयुक्त शब्दों की अनदेखी कर दी जाती है। इसी प्रकार कैलेंडरों में देवी-देवताओं के चित्रों में भाव-भंगिमाओं, वस्त्र परिधान आदि भी उत्तेजक बनाये जाते हैं। यह भी अनुचित है। यही कारण है कि अश्लीलता की व्यापक परिभाषा में उत्तेजना प्रदान करने वाले दृश्य एवं श्रव्य उपकरणों की भी गणना होती है।

🔵 इस संदर्भ में कई कदम आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। ऐसी साज सज्जा अथवा आकृति मुद्रा को क्या कहा जाय जो कामुकता की दृष्टि उत्पन्न करती है। इसका निरूपण करना हो तो किसी ऐसी सज्जा या मुद्रा में करनी चाहिए जो हमारी बहिन या पुत्री की हो। स्वभावतः हम चाहते हैं कि वे सौम्य हों। उनके वस्त्र अथवा अंगशील मर्यादा का पालन करते हों। उन पर अश्लीलता की उँगली न उठती हो। इस मर्यादा के टूटने पर हमारी आँखें नीची हो जाती हैं। जिसने वह चित्र मुद्रा अथवा सज्जा बनाई हो, उस पर क्रोध आता है। ऐसे निर्माण में यदि अपनी बहिन या पुत्री ने सहयोग दिया हो, उत्साह दिखाया हो, आग्रह किया हो तो उस पर भी क्रोध आता है। निकटवर्ती सगे सम्बन्ध होते हुए भी इसे चरित्रहीन कहने की मान्यता पनपती है और इच्छा होती है कि वह दृश्य जल्दी ही आँखों के सामने से हटा दिया जाये।

🌹 क्रमश जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1984 पृष्ठ 45
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1984/October/v1.45

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