सोमवार, 18 जुलाई 2016

👉 गुरु पूर्णिमा विशेष- (भाग 1) 👉 जनम-जनम के साक्षी व साथी हैं हमारे गुरुदेव

🔵 आषाढ़ महीने की हल्की फुहारें अंतर्मन को अनायास ही भिगो रही हैं। नील-गगन पर छाए उमड़ते-घुमड़ते मेघों से झरती बूँदों की ही तरह अंतर्गगन में परम पूज्य गुरुदेव की यादों की मेघमालाएँ छायी हुई हैं। और उनसे अनगिन भाव भरी यादों की झड़ी लगी हुई है। जिस तरह से वृक्ष-वनस्पतियों सहित भीगती धरती की ही तरह अन्तर्चेतना का कोना-कोना भीग रहा है।

🔴 आषाढ़ की पूर्णिमा यह मुखर सन्देशा लेकर आयी है, मनुष्य के अधूरेपन को, उसकी अतृप्ति को केवल गुरु ही पूर्णता का वरदान देता है। इसलिए आषाढ़ पूर्णिमा- गुरु पूर्णिमा है। गुरु जो करते हैं वह शिष्य की पूर्णता के लिए ही करते हैं। कभी तो वह ऐसा शिष्य की इच्छा को पूर्ण करके करते हैं, तो कभी वह ऐसा शिष्य की चाहत को ठुकरा कर करते हैं।

🔵 गुरु पूर्णिमा पर बरसती यादों की झड़ी में गुरुदेव की शिष्य वत्सलता के ऐसे रूप भी हैं। उस दिन भी वह नित्य की भाँति प्रसन्नचित्त लग रहे थे। पूर्णतया खिले हुए अरुण कमल की भाँति उनका मुख मण्डल तप की आभा से दमक रहा था। उनके तेजस्वी नेत्र समूचे वातावरण में आध्यात्मिक प्रकाश बिखेर रहे थे। उनकी ज्योतिर्मय उपस्थिति थी ही कुछ ऐसी जिससे न केवल शान्तिकुञ्ज का प्रत्येक अणु-परमाणु बल्कि उनसे जुड़े हुए प्रत्येक शिष्य व साधक की अन्तर्चेतना ज्योतिष्मान होती थी।

🔴 उनके द्वारा कहा गया प्रत्येक शब्द शिष्यों के लिए अमृत-बिन्दु था। वे कृपामय अपने प्रत्येक हाव-भाव में, शिष्यों के लिए परम कृपालु थे। उनके सान्निध्य में शिष्यों एवं भक्तों को कल्पतरु के सान्निध्य का अहसास होता था। सभी को विश्वास था कि उनके आराध्य सभी कुछ पूरा करने में समर्थ हैं।

🌹 अखण्ड ज्योति जुलाई 2003 पृष्ठ 38
http://literature.awgp.in/magazine/AkhandjyotiHindi/2003/July.38

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