गुरुवार, 3 मार्च 2016

आलोचना से डरें नहीं- उसके लिये तैयार रहें। (भाग 1)

दूसरा कोई समीक्षा करे तो स्वभावतः बुरा लगेगा। निन्दनीय स्थिति किसी की स्वीकार नहीं । उसे सुनने से कष्ट होता है और आमतौर से आलोचना बुरी लगती है।

यह अप्रिय के स्थान पर प्रिय भी हो सकती है, यदि हम वस्तुतः अच्छे हों, अच्छे व्यक्ति को द्वेषवश लाँछन लगाने का दुस्साहस कोई यदा कदा ही करता है। आमतौर से निन्दात्मक आलोचना हमारे दोष दुर्गुणों की ही होती है। नमक मिर्च लगाने की तो लोगों को आदत है पर जो कहा जाता है उसमें कुछ सार जरूर होता है।

आलोचना का लाभ यही है कि यह देखें कि जो कुछ निन्दापरक कहा जा रहा है उसमें कितना तथ्य और सत्य है। जो वास्तविकता हो उसे समझने का प्रयत्न करना चाहिए। अपना चेहरा अपने को दिखाई नहीं पड़ता, उसे देखना हो तो दर्पण का सहारा लेना पड़ेगा। आलोचक हमारे लिए दर्पण की तरह उपयोगी हो सकते हैं। और जहाँ कुरूपता है वहाँ सुधार के लिए प्रयत्न करने की प्रेरणा दे सकते हैं।

 क्रमशः जारी
 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
 अखण्ड ज्योति सितम्बर 1972 पृष्ठ 20
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1972/September.20

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