सोमवार, 5 दिसंबर 2022

👉 आध्यात्मिक साधना के त्रिदोष

👉 आध्यात्मिक साधना के त्रिदोष 

प्रत्येक प्राणी उन्नति की ओर अग्रसर होना चाहता है, पर जहाँ तक बाधक कारणों का सम्यक् परिज्ञान न हो एवं उनको दूर न किया जाये, उन्नति असंभव है। आध्यात्मिक उन्नति के लिए भी उसके बाधक कारणों को जानना परमावश्यक होता है। लेख में वैसे तीन दोषों पर संक्षेप में प्रकाश डाला जा रहा है। 1.ममत्व, 2.कपट और 3.अवगुणग्राही दृष्टि। जहाँ तक ये दोष रहेंगे, वहाँ तक साधना अग्रसर एवं फलवती नहीं होगी।

1.ममत्व- जहाँ तक साँसारिक पदार्थों में आत्मा की आशक्ति रहेगी, आत्मा का लक्ष्य बहिर्मुखी रहने के कारण आत्मानुभव का मार्ग बन्द ही रहेगा। इसलिए सारे भौतिक पदार्थों भाषों से अपनी आत्मा को अलग, भिन्न, समस्त कर उनके आकर्षण को रोकना बहुत ही आवश्यक है पर पदार्थों की आसक्ति हटते ही आत्मा के स्वरूप का दर्शन एवं अनुभव होगा, आत्मोन्नति का प्रथम सोपान है। जिन-जिन वस्तुओं को आत्मा मेरी अपनी समझता है उनकी प्राप्ति अभिवृद्धि में हर्ष एवं विनाश-क्षीणता में होता है। जहाँ ममत्व भाव नहीं वहाँ हर्ष शोक का प्रादुर्भाव नहीं होता है होता है तो अत्यल्प एवं क्षणिक।

आत्मा द्रव्य वास्तव में इन पाँच द्रव्यों से सर्वथा भिन्न है दृश्यमान सभी पदार्थ पौद्गलिक (भौतिक) है, क्योंकि पुद्गल के सिवाय सभी पदार्थ अरूपी हैं अरूपी पदार्थों पर आसक्ति नहीं होती । जिसे हम देखते हैं, सुनते हैं, खाते हैं, सूँघते हैं और स्पर्श करते हैं अर्थात् पाँचों इन्द्रियों द्वारा जिनके साथ हम अपना किसी प्रकार का सम्बन्ध करते हैं उन्हीं का मन विचार करता है अच्छे या बुरे मेरे या तेरे की कल्पना करता है उस कल्पना के द्वारा ही आत्मा अपने स्वरूप (विचार) से च्युत होकर उनके प्रति आकर्षित होती है। इसीलिए “मैं और मेरा” इसी को मोह का मूलमन्त्र माना गया है और मोह ही आत्मा का परम शत्रु सबसे प्रबल बाधक कारण माना गया है।

पर पदार्थों के संयोग से आत्मा विभाव दशा को प्राप्त होती है। इसीलिए सर्व संग परित्याग-अपरिग्रहता-निर्ग्रन्धता को जैन धर्म में प्रमुख स्थान दिया गया है। जैन तीर्थंकर स्वयं इनका आदर्श उपस्थित करते हैं अर्थात् साधना का आरम्भ सर्वसंग परिसंग परित्याग से ही करते हैं। आसक्ति का परिहार पदार्थों-द्रव्यों के स्वरूप को ज्ञान एवं परिणामों के द्वारा होता है। इनका मूलमन्त्र है “एगोहूँ नत्थि में कोह नाह मनस्स कस्सवि”-मैं किसी का नहीं-मेरी आत्मा अकेली है।” मनुष्य जरा सा विचार करे तो इस अकेलेपन का सहज अनुभव हो जाता है। जन्म-ग्रहण के समय आत्मा अकेली ही उत्पन्न होती है सत्य के समय भी सारे पदार्थों को छोड़कर वह अकेली ही परलोक जाती है। रोगादि दुख भी आत्मा को अकेले ही भोगने पड़ते है अतः आत्मा अकेली ही है बाह्य संयोग धन, दौलत, कुटुम्ब परिवार यावत् देह भी अपना नहीं हैं। तब उन पर समत्व रखना मूर्खता व अज्ञानता नहीं तो क्या है। योगी पुरुषों ने सबसे बड़ी भूल इसी को बतलाया है कि जो पदार्थ अपने नहीं उन्हें अपना मान लेना और अपने स्वरूप को भूल जाना

बहिर्मुखी वृति के कारण आत्मा की सारी शक्ति बाह्य पदार्थों की ओर लगी है और वह उनके लाभ हानि में ही सुख-दुख मान बैठा है, अन्यथा सुख व आनन्द कहीं बाहर से आने वाली चीज नहीं। सच्चे स्वरूप के अज्ञान के कारण ही वह इधर दौड़ धूप कर रहा है। यदि मैं अकेला हूँ, कोई भी चीज मेरी नहीं है तब उन पर आसक्ति कैसी? आनन्द यदि मेरे पास है तो उसकी प्राप्ति के लिए दौड़ धूप क्यों? इसी पर विचार करिये। पोद्गलिक-सभी पदार्थ रूप वाले विनाशी हैं, आत्मा अरूपी एवं अविनाशी है दृश्यमान सभी चीजें पुद्गल की बनी हुई हैं अतः ममत्व को हटाकर आत्मा का अन्तर्मुखी होना आध्यात्मिक साधना के लिए परमावश्यक कार्य है।

2. कपट- वस्तु के स्वरूप को अन्य प्रकार से दिखलाने का प्रयत्न कपट है मेरे हृदय में कुछ और ही। यह आत्मोन्नति का परम बाधक कारण है इस प्रपंच जाल से आत्मा बड़ी मलिन हो जाती है। भूमिका की शुद्धि के बिना सुभग चित्रों का आलेखन संभव नहीं। इसी प्रकार आत्मा का सरल-निष्कपट होना उसकी भूमिका शुद्धि है। जहाँ तक बकता है भ्रम फैलाने की वृति काम कर रही है, वहां तक सद्वृत्तियाँ पनप नहीं सकती। चित्त बहिर्मुखी बना रहता है। कैसे अपने दोषों को छिपाया जाये दूसरे को ठगा जाये, इसी में चित्त फंसा रहता है। वहाँ सुविचारों को अवकाश कहाँ? जो पापी है और अपने आपको छिपाने का प्रयत्न कर लोगों के समक्ष अपने को धर्मी दिखलाने की कोशिश करता है, उसका सुधार बहुत ही कठिन है।

3. अवगुणग्राही दृष्टि- यह भी एक बड़ा भारी अवगुण है इसके कारण मनुष्य अवगुणों की ओर अग्रसर होता है। ऐसी आत्मा हजार गुणों को नहीं देखती बल्कि छिद्रान्वेषी होकर अवगुण की ओर ही झुकती है। यह नहीं सोचती कि दोष हम सब में है किसी में कम और किसी में अधिक और पराये दोषों को देखने से लाभ ही क्या? एक सन्त ने इस सम्बन्ध में बहुत ही सुन्दर कहा है, “हे आत्मा दूर जलती हुई अग्नि को क्या देखता है। तेरे स्वयं पैरों में द्वेषों की अग्नि सुलग रही है उसे देखो, पराये मैल में कपड़े धोने से वे उज्ज्वल कैसे होंगे। थोड़े बहुत अवगुण सभी में होते हैं तुम्हारे में भी हैं तो अपने दोषों को क्यों नहीं देखते पराई निन्दा में क्यों लगे हो। निन्दा करने की यदि तुम्हारी आदत ही पड़ गई है तो अपने दोषों की निन्दा करो। अतः अपने दोषों की ओर दृष्टि डालों और दूसरे की निन्दा को छोड़ो।

“मनुष्य जैसे विचारों में रहता है वैसा ही बन जाता है” अवगुणों को ढूँढ़ने की दृष्टि रखने से स्वयं अवगुण का भाजन हो सकता है। इसीलिए इस दृष्टि दोष को निवारण कर हमें अपनी दृष्टि को गुण ग्राहक बनाना आवश्यक है। अवगुण देखने हो तो अपने देखो, जिससे उन्हें छोड़ने की भावना जगे तथा आत्मा दोष रहित बने। औरों के तो गुण ही देखो जिससे गुणी बने और गुणों के प्रति तुम्हारा आकर्षण बढ़े।

इन तीनों विवेचना का सार यही है कि इनके द्वारा आत्मा को बढ़ने का अवकाश भी नहीं होता। अतएव बहिर्मुखी वृत्तियों की ओर से हटकर अन्तर्मुखी होने का लक्ष्य रखा जाय। महत्व, कपट और अवगुण ग्राही दृष्टि से बचा जाय तभी आत्मोन्नति होगी।

📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1950 पृष्ठ 14

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👉 अध्यात्म क्षेत्र की सफलता का सुनिश्चित मार्ग

अध्यात्म का एक पक्ष है- योग और तप। दूसरा है पुण्य परमार्थ। दोनों की संयुक्त शक्ति से ही समग्र शक्ति उभरती और स्थायी सफलता की पृष्ठभूमि बनती है। एक पहिये की गाड़ी कहाँ चलती है? एक पैर से लम्बी यात्रा करना और एक हाथ से तलवार चलाते हुए युद्ध जीतने का उपक्रम कहाँ बनता है?  

योग का तात्पर्य है- भावना, आकाँक्षा, विचारणा की उत्कृष्टता के साथ जोड़ देने वाला चिन्तन प्रवाह। ताप का अर्थ है- संयम, अनुशासन, परिशोधन, साहस और अनौचित्य के साथ संकल्प युक्त संघर्ष। यहाँ उतना बन पड़े तो समझना चाहिए कि आत्मोत्कर्ष का सुनिश्चित आधार खड़ा हो गया। आत्मबल का भण्डार भरा और व्यक्ति सर्व समर्थ-सिद्ध पुरुष- महामानव बना।   

इस उपार्जित आत्म-शक्ति का उपयोग विलास, वैभव, यश सम्मान के लिए करना निषिद्ध है। उसे ईश्वर के खेत में बीज की तरह बोया और हजार गुना बनाने के लिए सोचा संजोया जाना चाहिए। यही है- पुण्य परमार्थ  का मार्ग। साधु ब्राह्मण-योगी-यती आजीवन लोक मंगल के प्रयोजनों में अपनी क्षमता नियोजित करते रहे हैं। यही है समग्रता का मार्ग जो भी साधक इस अध्यात्म तत्व दर्शन के सिद्धान्त एवं विज्ञान को समझेंगे अपनायेंगे। वे इस क्षेत्र में चरम सफलता प्राप्त कर सकने में समर्थ होंगे, यह निश्चित है। निराशा तो भ्रमग्रस्त में -टकराव में उलझने वाले-सस्ते रास्ते ढूंढ़ने वालों को ही हैरान करती है 

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- नवम्बर 1983 पृष्ठ 1


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रविवार, 4 दिसंबर 2022

👉 आध्यात्मिकता की कसौटी

कोई भी मनुष्य इसलिए बड़ा नहीं कि वह अधिक से अधिक सांसारिक पदार्थों का उपभोग कर सकता है। अधिक से अधिक ऐश्वर्य जुटाने वाले तो बहुधा लुटेरे होते हैं। वे संसार को जितना देते हैं, उससे कहीं अधिक उससे छीन लेते हैं।

हम मनुष्य की सेवा-शक्ति को दृष्टि में रख कर ही उसे महान नहीं कह सकते। उसकी महानता की कसौटी यह नहीं हो सकती, क्योंकि इसके द्वारा परखे जाने पर तो अनेक पशु-पक्षी भी उसकी श्रेणी में आ विराजेंगे। सभी जानते हैं कि चूहे, शृगाल, सुअर, कुत्ते, कौए, गिद्ध आदि पशु-पक्षी भी सड़े-गले और मल-मूत्रादि पदार्थों को खाकर वातावरण को शुद्ध कर देते हैं। यह भी प्रकट है कि सड़े-गले पदार्थों को शीघ्र ही हटा देने का जो उत्साह इन पशु-पक्षियों में पाया जाता है, वह प्राय: हम मनुष्य कहलाने वालों में भी नहीं पाया जाता। अतएव न तो कर्म का परिणाम और न कर्मोत्साह ही महानता की कसौटी हो सकता है।

अत: मनुष्य की परख उसके कार्य के परिणाम से नहीं, किन्तु उस कार्य को प्रेरणा देने वाली भावनाओं से की जानी चाहिए। जैसा मनुष्य का भाव हो, उसे वैसा ही समझना चाहिए। भगवान कृष्ण ने भी तो कहा है कि `सभी मनुष्यों की भावना (श्रद्धा) उनके अंत:करण के अनुरूप होती है। इसलिए जो पुरुष जैसी श्रद्धा वाला है, वह स्वयं भी वही है।’

पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति-मार्च 1948 पृष्ठ 17   

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👉 आत्म-ज्ञान को प्राप्त करो। (भाग 1)

हे सौम्य! हे सत्यकाम! ‘मैं कौन हूँ’ यह मालूम कर। अपने भीतर टटोल। इस संसार व शरीर की वास्तविकता को बूझ। जैसे ही तू जाग जाता है तेरा स्वप्न झूठा हो जाता है। इसी प्रकार जब तुझे आत्म ज्ञान हो जायगा तब यह संसार असत्य हो जायगा- अदृश्य हो जायगा। संसार केवल मन की उपज है। इसका अस्तित्व केवल सम्बन्ध रखता हुआ, परिवर्तनशील एवं परतन्त्र तथा दृष्टि विषयक और निर्भर रहने वाला है। यह ब्रह्म से निकला है, उसी में रहता है तथा अन्त में उसी में मिल जाता है।

हे सत्यकाम! तेरा प्रथम कर्त्तव्य अपनी आत्मा को पहचानना है। यह आत्मा अनन्त है तथा आत्मप्रकाश है। इस तुच्छ अपनेपन को नष्ट कर दें और सच्चिदानन्द आत्म से संपर्क रख। शरीर, स्त्री, सन्तान, तथा धन में जो आसक्ति है उसका त्याग कर दे। इच्छाओं स्वार्थ व ‘अपनेपन’ को तिलाँजलि दे दे तथा उस पूर्णज्ञान ‘निर्विकल्प समाधि’ को प्राप्त कर जिसमें न कोई विषय है, न उद्देश्य, न प्रसन्नता है, न दुःख, न सर्दी है न गर्मी, न भूख है न प्यास। तब तू सर्वश्रेष्ठ आनन्द, अनन्त शान्ति, असीम ज्ञान तथा अमर गति का भोग करेगा।

तू अज्ञान के आवरण से कृत्रिम निद्रा के वशीभूत है। तू आत्म ज्ञान द्वारा कृत्रिम निद्रा से जाग और ‘अमर गति’ को जान। तू कब तक माया के फन्दे में फंसा रहना चाहता है। बहुत हो चुका। अब तू इन बन्धनों को तोड़। अविधा की जंजीर को तोड़ दे-उन पाँच पर्दों को फाड़ दे और इस हाड़-माँस के पिंजरे से विजयी होकर निकल आ। मेमने की भाँति ‘मैं-मैं’ न कर, बल्कि ओऽम्-ओऽम्-ओऽम् की गर्जना कर, ओऽम्-ओऽम्-ओऽम् का स्मरण कर, स्वीकार कर, सिद्ध कर और पहचान। अपनी आत्मा को पहचान और इसी क्षण बन्धन से मुक्त हो जा। तू ही सम्राटों का सम्राट है- तू ही सर्वश्रेष्ठ है। उपनिषदों के अन्तिम शब्द ध्यान में ला। ‘तत् त्वं असि’- ‘तू’ ही ‘वह’ है। मेरे प्रिय सत्यकाम! ‘उसे’ जान- ‘उसे’ जानना ही ‘वह’ बन जाना है।

अपने भीतर टटोल। अपने को समस्त विचारों से विमुक्त कर ले। विचार शून्य बन जा। सत्य और असत्य की पहचान कर। अनन्त और अदृश्य में भेद कर। इस बहते हुए मन को बार-बार केन्द्रित करने की चेष्टा कर। विपरीत की द्वन्द्वता से ऊपर उठ। नेति-नेति, के पाठ का अध्ययन कर। धोखे के चक्रों का नाश कर दे। अपने को सर्वव्यापक आत्मा से मिला। आत्म ज्ञान प्राप्त कर और उस सर्वश्रेष्ठ आनन्द का भोग कर।

धर्म की प्रथम घोषणा यही है कि आत्मा एक है। ‘एक’ अनेक नहीं हो सकता। यह कैसे सम्भव है? एक अनेक के समान प्रतीत अवश्य होता है। जैसे रेगिस्तान में जल का आभास किसी स्थिति विशेष में मनुष्य, आकाश में नीलिमा, सीप की चाँदी तथा रस्सी का साँप। इसे ‘अध्यात्म’ कहते हैं। इस अध्यात्म को ब्रह्म- चिन्तन अथवा ज्ञान-अध्यात्म द्वारा नष्ट कर दे और ब्रह्मशक्ति द्वारा चमत्कृत हो। ब्रह्म अवस्था को पुनः प्राप्त करने की चेष्टा कर। अपने सत्-चित्त आनन्द स्वरूप में रमण कर।

अज्ञान के कारण ही दुख और क्लेश व्यापते हैं। अपनी वास्तविक प्रकृति को पहचान और अनुभव कर। वास्तव में अस्तित्व, ज्ञान और सुख सम्पूर्ण हैं। तू वास्तव में अमर है तथा सर्वव्यापक आत्मा है। उपनिषद् के इस उपदेश को स्मरण रख “जीव और ब्रह्म एक है” ओऽम् के रहस्य पर विचार कर और अपने स्वरूप में स्थित हो। केवल आत्म-ज्ञान द्वारा ही अज्ञान तथा तीनों क्लेशों का नाश किया जा सकता है। आत्म ज्ञान ही तुझे अमर गति, अनन्त सुख, चिरस्थायी शान्ति और सुख दे सकेगा।

तू वह अमर आत्मा है जो समय, स्थान और उत्पत्ति से भी परे है। तू इसमें तनिक भी संदेह न कर। समय, स्थान और उत्पत्ति मन की उपज है। वह केवल मन में ही रहते हैं। दूरदर्शिता को प्राप्त कर। ढूँढ़ने वाले को ढूँढ़, जानने वाले को जान, सुनने वाले को अनुभव कर। इन नामों और आकारों में जो एकता है उसको पहचान। उद्देश्य विषय से भिन्न नहीं है, तू सर्वदा ही विषय को समझता रहा है।

अज्ञान की इस दीर्घ निद्रा से जाग। जन्म-मरण तथा उसके साथ के पापों से मुक्ति प्राप्त कर। आकारों के भ्रम से छुटकारा पा ले। मोह, ममता, मेरा तथा अपनेपन का त्याग कर। अपने को सर्वव्यापक जाग्रति जान। आत्म-ज्ञान के साम्राज्य के सिंहासन पर आरुढ़ हो जा। यही तेरा सर्व प्रथम घर है-अनन्त प्रकाश तथा असीम घर का अमिट स्थान है।

इस “मैं” को क्रूरता के साथ नष्ट कर दे। अगर “मैं” अदृश्य हो जाएगा तो तेरे लिए ‘वह’ और ‘तू’ अथवा ‘यह’ और ‘वह’ नहीं रहेंगे। यह एक अभूतपूर्व असाधारण एवं अवर्णनीय अनुभव होगा। तब तू संसार की अन्तिम सुन्दरता को पा लेगा। तू तब ‘जीवन मुक्त’ हो जाएगा- एक स्वतंत्र पुण्यात्मा हो जायेगा। इस ज्ञान को दूसरों के साथ बाँट कर उन्हें भी ऊपर उठा। सत्य का सूर्य बन कर प्रकाश को चारों ओर फैला। इस अमित आनन्द और शाश्वत शाँति को जन-जन में बाँट, तू अमर हो जायगा।

स्वामी शिवानन्द जी
अखण्ड ज्योति सितम्बर 1942 पृष्ठ 3

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शनिवार, 26 नवंबर 2022

👉 सुझाव देने से पूर्व सोचो

मनुष्यों में एक प्रवृत्ति यह पाई जाती है कि वे दूसरे के कामों में बहुत जल्दी हस्तक्षेप करने लगते हैं। यदि विचारपूर्वक देखा जाए, तो कोई अन्य मनुष्य जो कुछ कहता, करता या विश्वास करता है, उससे तुम्हारा कोई सरोकार नहीं। तुम्हें उसकी बात पूर्णतया उसी की इच्छा पर छोड़ देनी चाहिए। तुम स्वयं अपने कार्यों में जिस प्रकार की स्वतंत्रता की इच्छा करते हो, वही दूसरों को भी देनी चाहिए।

वास्तव में किसी सज्जन व्यक्ति को कभी दूसरों के कार्यों और विश्वासों में कोई हस्तक्षेप न करना चाहिए, जब तक कि उनके किन्हीं कार्यों से सर्वसाधारण की प्रत्यक्ष हानि न होती हो। यदि कोई मनुष्य ऐसा व्यवहार करता है, जिससे कि वह अपने पड़ोसियों के लिए दु:खदायी बन जाता है, तो उसे उचित सम्मति देना कभी-कभी हमारा कत्र्तव्य हो जाता है, पर ऐसा मौका आने पर भी बात को बहुत नम्रता और सरलतापूर्वक प्रकट करना चाहिए।

अगर कोई व्यक्ति तुम्हारे विचार से कोई बड़ी भूल कर रहा है, तो तुम उसे एकांत में अवसर ढूँढ़ कर यह बतला सकते हो कि ‘आप ऐसा क्यों करते हो?’ संभव है ऐसा करने से वह तुम्हारी बात पर विश्वास कर सके, किन्तु अनेक स्थानों पर तो ऐसा करना भी अनुचित रूप से हस्तक्षेप ही करना होगा। किसी तीसरे व्यक्ति के सामने तो उस बात की चर्चा कदापि नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यह उसकी निंदा करना होगा, जो किसी सभ्य व्यक्ति को शोभा नहीं देता।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 त्यागमय जीवन

महात्मा ईसा ने अपने शिष्यों से कहा था कि-“जो बहुत जोड़ता है वह बहुत खोयेगा। जो स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना चाहता है वह सब कुछ छोड़कर मेरे साथ चले।” भगवान बुद्ध ने राज सिंहासन छोड़ा था पर वे किसी प्रकार घाटे में नहीं रहे। राजा विश्वामित्र से महर्षि विश्वामित्र का पद ऊंचा था, बैरिस्टर गाँधी से महात्मा गाँधी कुछ बुरे नहीं रहे। अकबर का दरबारी प्रताप सिंह बनने की अपेक्षा जंगलों में भटकने वाला राणाप्रताप क्या मूर्ख कहलाया ? भामा शाह अपना सब कुछ लुटा गये, क्या वे घाटे में रहे ? सिकन्दर अपनी दौलत को देख देखकर मरते वक्त बुरी तरह फूट फूट कर रोता था, मरने के बाद उसने अपने दोनों हाथ अर्थी से बाहर निकले रहने देने का आदेश किया था ताकि लोग यह जान सकें कि विपुल सम्पत्ति जमा करने वाला सिकन्दर अपने साथ कुछ भी न ले जा सका था उसके दोनों हाथ बिल्कुल खाली थे।

त्याग का अर्थ जिम्मेदारियों का कर्तव्य का त्याग नहीं है जैसा कि आजकल कितने ही नासमझ लोग अपने कठोर कर्तव्यों से विमुख होकर कायरतापूर्वक घर छोड़कर भाग खड़े होते हैं और विचित्र वेष बनाकर आलस्य में समय बिताते हुए दूसरों पर भार बनते हैं। त्याग का वास्तविक अर्थ है- अपनी दुर्भावना दुर्वासना स्वार्थपरता, ममता एवं लोभवृत्ति का त्याग। वेद भगवान ने कहा दे--“सौ हाथों से कमा, हजार हाथों से दान कर” हम तत्परतापूर्वक अपने श्रम का शक्ति का योग्यता का समय का पूरा पूरा उपयोग करते हुए आत्मिक और साँसारिक उत्पादन बढ़ावे और उस उत्पादन का आवश्यक अंश जीवन निर्वाह के लिए उपयोग करते हुए शेष को निर्लोभ भाव से परमार्थ में लगावें। यही गीता का कर्म योग हैं। यह त्यागमय जीवन बिताने की नीति मानव जीवन के सदुपयोग की सर्वोत्तम नीति है, आत्मोन्नति की सर्वोत्तम साधना है।

📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 24

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👉 हमारी अतृप्ति और असंतोष का कारण

👉 मनोनिग्रह-सफलता की कुँजी

एक विचारक का कथन है-“जो मनुष्य अधिकतम संतोष और सुख पाना चाहता है, उसको अपने मन और इन्द्रियों को वश में करना अत्यन्त आवश्यक है। यदि हम अपने आपको तृष्णा और वासना में बहायें, तो हमारे असंतोष की सीमा न रहेगी।”

अनेक प्रलोभन तेजी से हमें वश में कर लेते हैं, हम अपनी आमदनी को भूल कर उनके वशीभूत हो जाते हैं। बाद में रोते चिल्लाते हैं। जिह्वा के आनन्द, मनोरंजन आमोद प्रमोद के मजे हमें अपने वश में रखते हैं। हम सिनेमा का भड़कीला विज्ञापन देखते ही मन को हाथ से खो बैठते हैं और चाहे दिन भर भूखे रहें, अनाप-शनाप व्यय कर डालते हैं। इन सभी में हमें मनोनिग्रह की नितान्त आवश्यकता है। मन पर संयम रखिये। वासनाओं को नियंत्रण में बाँध लीजिये, पॉकेट में पैसा न रखिये। आप देखेंगे कि आप इन्द्रियों को वश में रख सकेंगे।

आर्थिक दृष्टि से मनोनिग्रह और संयम का मूल्य लाख रुपये से भी अधिक है। जो मनुष्य अपना स्वामी है और इन्द्रियों को इच्छानुसार चलाता है, वासना से नहीं हारता, वह सदैव सुखी रहता है।

प्रलोभन एक तेज आँधी के समान है जो मजबूत चरित्र को भी यदि वह सतर्क न रहे, गिराने की शक्ति रखती है। जो व्यक्ति सदैव जागरुक रहता है, वह ही संसार के नाना प्रलोभनों आकर्षणों, मिथ्या दंभ, दिखावा, टीपटाप से मुक्त रह सकता है। यदि एक बार आप प्रलोभन और वासना के शिकार हुए तो वर्षों उसका प्रायश्चित करने में लग जायेंगे।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1950 पृष्ठ 9

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/January/v1.9


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शुक्रवार, 25 नवंबर 2022

👉 भलाई करना ही सबसे बड़ी बुद्धिमानी है।

दुष्ट लोग उस मूर्खता से नहीं डरते, जिसे पाप कहते हैं। मगर विवेकवान सदा उस बेवकूफी से दूर रहते हैं। बुराई से बुराई ही पैदा होती है, इसलिए बुराई को अग्नि से भी भयंकर समझ कर उससे डरना और दूर रहना चाहिए। जिस तरह छाया मनुष्य को कभी नहीं छोड़ती वरन् जहाँ-जहाँ वह जाता है उसके पीछे-पीछे लगी रहती है। उसी तरह पाप कर्म भी पापी का पीछा करते हैं और अन्त में उसका सर्वनाश कर डालते हैं। इसलिए सावधान रहिए और बुराई से सदा डरते रहए।

जो काम बुरे हैं उन्हें मत करो। क्योंकि बुरे काम करने वालों को अन्तरात्मा के शाप की अग्नि में हर घड़ी झुलसना पड़ता है। वस्तुओं को प्रचुर परिमाण में एकत्रित करने की कामना से, इन्द्रिय भोगों की लिप्सा से और अहंकार को तृप्त करने की इच्छा से लोग कुमार्ग में प्रवेश करते हैं। पर यह तीनों ही बातें तुच्छ हैं। इनसे क्षणिक तुष्टि होती है, पर बदले में अपार दुख भोगना पड़ता है। खाँड मिले हुए विष को लोभवश खाने वाला बुद्धिमान नहीं कहा जाता, इसी प्रकार जो तुच्छ लाभ के लिए अपार दुख अपने ऊपर लेता है उसे भी समझदार नहीं कह सकते।

इस दुनिया में सबसे बड़ा बुद्धिमान, विद्वान, चतुर और समझदार वह है जो अपने को कुविचार और कुकर्मों से बचाकर सत्य को अपनाता है, सत्मार्ग पर चलता है और सत्विचारों को ग्रहण करता है। यही बुद्धिमानी अन्त में लाभदायक ठहरती है और दुष्टता करने वाले अपनी बेवकूफी से होने वाली हानि के कारण सिर धुन-धुन कर पछताते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1943 पृष्ठ 1

👉 मृत्यु का भय छोड़ दीजिए।

बालक मरें, चाहे जवान या बूढ़े मरें, हम इससे भयभीत क्यों हों? कोई पल ऐसा नहीं जाता जब इस जगत में कही किसी का जन्म और कही किसी की मृत्यु होती है। पैदा होने पर खुशियाँ मनाना और मौत से डरना बड़ी मूर्खता है, यह बात हमें अवश्य सदैव अनुभव करनी चाहिए। जो लोग आत्मवादी हैं, - और हममें कौन हिन्दू, मुसलमान या पारसी ऐसा होगा जो आत्मा के अस्तित्व को न मानता होगा? - वे जानते हैं कि आत्मा कभी मरती नहीं।

यही नहीं, बल्कि जीवित और मृत समस्त प्राणी एक ही हैं, उनके गुण भी एक ही हैं। इस दशा में, जबकि जगत में उत्पत्ति और लय पल पल-पर होता ही रहता है, हम क्यों खुशियाँ मनावें? और किस लिए शोक करें? सारे देश को यदि हम अपना परिवार मानें- देश में जहाँ कहीं किसी का जन्म हुआ हो, उसे अपने यहाँ ही हुआ मानें- तो कितने जन्मोत्सव मनाइयेगा? देश में जहाँ-जहाँ मौतें हों उन सबके लिए यदि हम रोते रहें तो हमारी आँखों के आँसू कभी बन्द ही न हों। यह सोचकर हमें मृत्यु का भय छोड़ देना चाहिए।

अन्य देशों की अपेक्षा प्रत्येक भारतवासी अधिक ज्ञानी, अधिक आत्मवादी होने का दावा रखता है, तिस पर भी मौत के सामने जितने दीन हम हो जाते हैं उतने और लोग शायद ही होते हों और उनमें भी मेरा खयाल है कि हिन्दू लोग जितने अधीर हो जाते हैं उतने भारत के दूसरे लोग नहीं। अपने यहाँ किसी का जन्म होते ही हमारे घरों में आनन्द मंगल उमड़ पड़ता है और जब कोई मर जाता है तब इतना रोना पीटना मचता है कि आस-पास के लोग भी हैरान हो जाते हैं। हमें इस अज्ञान जन्य हर्ष शोक को छोड़ ही देना चाहिए।

✍🏻 महात्मा गाँधी
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1943 पृष्ठ 6

गुरुवार, 24 नवंबर 2022

👉 गुण-ग्राहक दृष्टि को जाग्रत कीजिए

🔴 जिसके दोष देखने को हम बैठते हैं, उसके दोष ही दोष दिखाई पड़ते हैं। ऐसा मालूम पड़ता है कि इस प्राणी या पदार्थ में दोष ही दोष भरे हुए हैं, बुराइयाँ ही बुराइयाँ उसमें संचित हैं, पर जब गुण-ग्राहक दृष्टि से निरीक्षण करने लगते हैं, तो हर प्राणी में, हर पदार्थ में कितनी ही अच्छाइयाँ, उत्तमताऐ, विशेषताएँ दीख पड़ती हैं।

🔵 वस्तुत: संसार का हर प्राणी एवं पदार्थ तीन गुणों से बना हुआ हैं उसमें जहाँ कई बुराइयाँ होती हैं, वहाँ कई अच्छाइयाँ भी होती हैं। अब यह हमारे हाथ में है कि उसके उत्तम तत्त्वों से लाभ उठाएँ या दोषों को स्पर्श कर दु:खी बनें। हमारे शरीर में कुछ अंग बड़े मनोहर होते हैं, पर कुछ ऐसे कुरूप और दुर्गंधित हैं कि उन्हें ढके रहना ही उचित समझ जाता है।

🔴 इस गुण-दोषमय संसार में से हम उपयोगी तत्त्वों को ढूँढ़ें, उन्हें प्राप्त करें और उन्हीं के साथ विचरण करें, तो हमारा जीवन सुखमय हो सकता है। बुराइयों से शिक्षा ग्रहण करें, सावधान हों, बचें और उनका निवारण करने का प्रयत्न करके अपनी चतुरता का परिचय दें, तो बुराइयाँ भी हमारे लिए मंगलमय हो सकती हैं। चतुर मनुष्य वह है जो बुराइयों से भी लाभ प्राप्त कर लेता है। गुण-ग्राहक दृष्टि को जाग्रत करके हम हर स्थिति से लाभ उठा सकते हैं।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति-अप्रैल 1948 पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1948/April/v1.1

👉 क्या आप कर्जदार हैं?

🔵 क्या आप कर्जदार है? यदि ऐसा है तो आपकी आत्मा को शान्ति नहीं मिल सकती। उन धनी मानी व्यक्तियों के उदाहरण अपने सन्मुख रखिये जो आजन्म ऋण के बोझ से दबे रहे। हमारे ग्रामीण तो 80 प्रतिशत कर्ज के बोझ से दबे हुए हैं। गोल्डस्मिथ, बालजाक, मार्क टवैन, वेबस्टर, लार्ड वायरन, सर वाल्टर स्काट सब कर्जदार रहे। वाल्टरस्काट आजन्म कर्ज चुकाते रहे। रूसी लेखक डास्टाएन्सकी कर्ज में डूबा रहा। उसकी इच्छा थी कि कर्ज से मुक्त हो जावे किन्तु न हो सका।

🔴 गोल्डस्मिथ इतना फिजूल खर्च रहा कि जौनसन साहब की सहायता करने पर भी ऋण मुक्त न हो सका। कथाकार बालजाक अपने महाजनों से डरा-2 फिरा करता था। मार्क स्वेन का 300,000 रु॰ व्यापार में नष्ट हो गया था। लार्ड वायरन जैसे कवि का घर कई बार नीलाम होते होते बचा सुविख्यात चित्रकार व्हिरलय तथा हेडेन का जीवन सदैव दुःख में रहा।

🔵 श्री योगेन्द्र बिहारी लाल ऋण ग्रस्त व्यक्तियों के उदाहरण देते हुए लिखते हैं-“सौ वर्ष पहले ल्योब्रमेल इंग्लैंड का फैशन ‘सम्राट् कहा जाता था। उसके कपड़े पहनने का ढंग ही फैशन हो जाता था पर ऋण के कारण उसका सब कुछ बिक गया। जब नीलाम करने वाले उसके घर आते थे तो वह कपड़ों की अलमारियों के पीछे छिप जाता था। अन्त में वह पकड़ा गया। दरिद्रता के कारण उसे फटी कमीज पहननी पड़ती थी, और जनता उस भूतपूर्व फैशन सम्राट पर हंसती थी। विलियन पिट का विवाह कुमारी एडेन से होने जा रहा था, पर पिट के ऋण ग्रस्त होने से विवाह न हो सका था।”

🔴 अब्राहम लिंकन ने किसी से शराब की दुकान में साझीदार के मरने पर लिंकन ग्यारह वर्ष तक ऋण चुकाता रहा।

🔵 खर्च के विषय में बेखबर रहने से मनुष्य की पूरी आयु नष्ट हो जाती है। इसी के सदुपयोग से जीवन सरस बनता है, समाज में आदर और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। कौटिल्य ने कहा है-“केवल धन के द्वारा मनुष्य गुण, आनन्द एवं मोक्ष की प्राप्ति करता है।” वास्तव में आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न रहने से मनुष्य नैतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति भी सरलता से कर सकता है। रुपया पास होने से सूर्योदय और गुलाब भी हमें सुन्दर लगते हैं। एक कवि ने लिखा है-

“जब जेब में पैसा होता है,
जब पेट में रोटी होती है।
तब हर एक जर्रा हीरा है,
तब हर एक शबनम मोती होती है॥
इस उक्ति में एक शाश्वत सत्य अंतर्निहित है।

🌹 अखण्ड ज्योति जनवरी 1950 पृष्ठ 11

सोमवार, 21 नवंबर 2022

👉 तेरे नाम का आधार

मनुष्य की दुर्बलता का अनुभव करके हमारे परम कारुणिक साधु संतों ने उद्धार के बहुत से रास्ते ढूँढ़े। अन्त में उन्हें भगवान का नाम मिला। इससे उन्होंने गाया कि-राम नाम ही हमारा आधार है। सब तरह से हारे हुए मनुष्य के लिए बस, राम नाम ही एक तारक मंत्र है। राम नाम यानी श्रद्धा-ईश्वर की मंगलमयता पर श्रद्धा। युक्ति, बुद्धि, कर्म, पुरुषार्थ, सब सत्य हैं, परन्तु अन्त में तो राम नाम ही हमारा आधार है।

लेकिन आजकल का जमाना तो बुद्धि का जमाना कहलाता है। इस तार्किक युग में श्रद्धा का नाम ही कैसे लिया जाए? सच है कि दुनिया में अबुद्धि और अन्धश्रद्धा का साम्राज्य छाया है। तर्क, युक्ति और बुद्धि की मदद के बिना एक कदम भी नहीं चला जा सकता। बुद्धि की लकड़ी हाथ में लिए बिना छुटकारा ही नहीं। परन्तु बुद्धि अपंगु है। जीवन यात्रा में आखिरी मुकाम तक बुद्धि साथ नहीं देती। बुद्धि में इतनी शक्ति होती तो पण्डित लोग कभी के मोक्ष धाम तक पहुँच चुके होते। जो चीज बुद्धि की कसौटी पर खरी न उतरे, उसे फेंक देना चाहिये।

बुद्धि जैसी स्थूल वस्तु के सामने भी जो टिक सके उसकी कीमत ही क्या है? परन्तु जहाँ बुद्धि अपना सर्वस्व खर्च करके थक जाती हैं और कहती है-’न एतदशकं विज्ञातुँ यदेतद्यक्षमिति।’ वहाँ श्रद्धा क्षेत्र शुरू हो जाता है। बुद्धि की मदद से कायर भी मुसाफिरी के लिए निकल पड़ता है। परन्तु जहाँ बुद्धि रुक जाती है, वहाँ आगे पैर कैसे रखा जाय? जो वीर होता है, वही श्रद्धा के पीछे-2 अज्ञान की अंधेरी गुफा में प्रवेश करके उस ‘पुराणह्वरेष्ठ’ को प्राप्त कर सकता है।

बालक की तरह मनुष्य अनुभव की बातें करता है। माना कि, अनुभव कीमती वस्तु है, परन्तु मनुष्य का अनुभव है ही कितना? क्या मनुष्य भूत भविष्य को पार पा चुका है? आत्मा की शक्ति अनन्त है। कुदरत का उत्साह भी अथाह है। केवल अनुभव की पूँजी पर जीवन का जहाज भविष्य में नहीं चलाया जा सकता। प्रेरणा और प्राचीन खोज हमें जहाँ ले जायं, वहाँ जाने की कला हमें सीखनी चाहिए। जल जाय वह अनुभव, धूल पड़े उस अनुभव पर जो हमारी दृष्टि के सामने से श्रद्धा को हटा देता है।

*( यदि नाथ का नाम दयानिधि है | Yadi Nath Ka Naam Dayanidhi Hai | Rishi Chintan, https://www.youtube.com/watch?v=gMTWKRAPZIs )*

दुनिया यदि आज तक बढ़ सकी है तो वह अनुभव या बुद्धि के आधार पर नहीं, परन्तु श्रद्धा के आधार पर ही। इस श्रद्धा का माथा जब तक खाली नहीं होता, जब तक यात्रा में पैर आगे पड़ते ही रहेंगे, तभी तक हमारी दृष्टि अगला रास्ता देख सकेगी और तभी तक दिन के अन्त होने पर आने वाली रात्रि की तरह बार-बार आने वाली निराशा की थकान अपने आप ही उतरती जायगी। इस श्रद्धा को जाग्रत रखने का-इस श्रद्धा की आग पर से राख उड़ाकर इसे हमेशा प्रदीप्त रखने का-एकमात्र उपाय है राम-नाम।

राम-नाम ही हमारे जीवन का साथी और हमारा हाथ पकड़ने वाला परम गुरु है।

📖 अखण्ड ज्योति-मार्च 1949 पृष्ठ 21

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1949/March/v1.21


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शनिवार, 19 नवंबर 2022

👉 अपनी स्थिति के अनुसार साधना चाहिए।

साधु, संत और ऋषियों ने लोगों को अपने-अपने ध्येय पर पहुँचने के अनगिनत साधन बतलाये हैं। हर एक साधन एक दूसरे से बढ़कर मालूम होता है, और यदि वह सत्य है, तो उससे यह मालूम होता है कि ये सब साधन इतनी तरह से समझाने का अर्थ यह है कि ज्यादातर एक कोई भी साधन उपयोग में आ सकता है। और यह है भी स्वाभाविक ही कि वह किसी एक के लिए उपयोगी हो।

परन्तु बहुधा ऐसा होता है कि बहुत से साधन अपने अनुकूल नहीं होते। कठिनाई यह है कि हम लोगों में वह शक्ति नहीं है कि उस साधन को खोज निकालें जिसके कि हम सचमुच योग्य हैं। इसके विपरीत हम दूसरे ऐसे साधन अनिश्चित समय के लिए अपनाते हैं जो हमारी शारीरिक और मानसिक स्थिति के अनुकूल नहीं होते। आज ऐसे अनुभवी पथ-प्रदर्शकों की भी भारी कमी है जो अपनी सूक्ष्म दृष्टि से यह जान लें कि किस व्यक्ति के अनुकूल क्या साधन ठीक होगा।

जो व्यक्ति जिस साधना का अधिकारी है, उसी के अनुकूल कार्यक्रम उसके सामने रखा जाना चाहिए। बालकों का शिक्षण और अध्ययन भी इसी आधार पर होना चाहिए। रुचि के अनुकूल दिशा में शिक्षा मिलने पर बालक थोड़े ही समय में आश्चर्यजनक उन्नति कर लेता है। इसके विपरीत जो कार्यक्रम उसकी रुचि न होते हुए भी लादा जाता है वह बड़ी कठिनाई से जैसे-तैसे पार पड़ता है।

हमें चाहिए कि अपना एक ध्येय निर्धारित करें और उस लक्ष्य को पूरा करने के लिए ऐसे साधन चुनें जो निर्धारित उद्देश्य की ओर तेजी से हमें बढ़ा ले चलें, साथ ही उन साधनों का अपनी रुचि, प्रकृति और स्थिति के अनुकूल होना भी आवश्यक है। यदि ऐसा न हुआ तो उत्साह थोड़े ही समय में शिथिल हो जाता है और दुर्गम मार्ग पर चलने का अभ्यास न होने से बीच में ही यात्रा तोड़ने को विवश होना पड़ता है।

लक्ष्य-लक्ष्य के अनुकूल, साधन-साधन के अनुकूल, अपनी स्थिति- इन तीन बातों का जहाँ समन्वय हो जाता है यहाँ सफलता मिलने में संशय नहीं रहता। हमें अपना विवेक इतना जाग्रत करना चाहिए जो इस दिशा में समुचित ज्ञान रखता हो और अपने उज्ज्वल प्रकाश में हमें अभीष्ट लक्ष्य की ओर अग्रसर कर सके।

📖 अखण्ड ज्योति- मई 1949 पृष्ठ 23


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गुरुवार, 17 नवंबर 2022

👉 धर्म

अब धर्म भी एक शौकीनों की चीज बनता चला जाता है। घर में तरह के सुसज्जा साध और जी बहलाने वाले उपकरण रहते हैं, उसी तरह धर्म को भी घर के एक कोने में स्थान देने की आवश्यकता समझी जाती है। शौकीनी सुसज्जा में विभिन्न स्तर की वस्तुयें इकट्ठी करना पड़ती हैं, सभ्यता ने धर्म को भी एक ऐसा ही उपकरण समझना आरंभ किया है और कितने ही लोग अपने कई तरह के शोकों में एक शौक धर्म चर्चा का भी सम्मिलित कर लेते हैं।

यह स्थिति धर्म जैसे जीवन तत्व का उपहास करना है। स्नान घर सजाकर रखने मात्र से स्वच्छता की आवश्यकता पूरी नहीं होती। रसोई घर में आवश्यक वस्तुयें जमा कर देने भर से क्या भूख बुझ सकती है। पलंग भर बिछा रहे तो क्या बिना सोये नींद पूरी हो जायेगी?

दूसरों की दृष्टी में धर्मात्मा बनकर अपनी आंतरिक अधार्मिकता को छिपाने के लिए आवरण ओढ़ना किस काम का? यदि धर्म के प्रति सचमुच आस्था हो तो उसे न केवल दृष्टिकोण में वरन् क्रिया कलाप में भी समाविष्ट करना चाहिए। अन्यथा यह कम बुरा है कि हम अपना अधार्मिकता को उसी रूप में खुला रहने दें और धार्मिक बनने का दंभ न करें। इससे अधर्म के साथ दंभ को जोड़ने की दुहरी तो न बढ़ेगी।

✍🏻 रविन्द्र नाथ टैगोर
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1973 पृष्ठ 11

👉 पहले दो तब मिलेगा।

संसार का यह अचल नियम कितना सत्य है कि “पहले दो तब मिलेगा” पेट में पहले भोजन पहुँचाया जाता है तब वह हमें रक्त जैसी अमूल्य वस्तु प्रदान करता है, घड़ी में पहले चाबी दी जाती है तब वह हमें ठीक समय देती है, कुंए में पहले बर्तन डालते हैं तब उसमें पानी आता है, दान देने वाले पहले देते हैं तब यश और कीर्ति के भागी बनते हैं, ब्याज खाने वाले पहले रकम देते हैं तब उन्हें ब्याज की कौड़ियाँ मिलती हैं, चक्की में पहले गेहूँ डालते हैं, तब आटा मिलता है, किसान पहले बीज बोता है तब उसे कई गुना मिलता है।

व्यापारी पहले माल खरीदने में अपनी रकम लगाता है तब वह मुनाफा पाता है, पेड़ों को देखिये पहले वे बिना किसी आनाकानी के मीठे फल और पत्ते देते हैं तब उसकी जगह नये पत्ते और फल प्राप्त करते हैं, बिजली का पहले बटन दबाते हैं तब प्रकाश मिलता है, समुद्र पहले बादलों को अपना जल देता है तब उसे इन्द्र कई गुना वापिस लौटा देता है, पहले किसी की सेवा करते हैं तब वह हमें कुछ देता है, किसी के हृदय पर शासन करने के लिए पहले अपना हृदय देना पड़ता है तब उसका हृदय प्राप्त कर सकते हैं।

संसार की किसी जड़ चेतन वस्तु को लीजिये “पहले देने पर ही मिलेगा” यहाँ तक कि मन्द बुद्धि पशु जाति को ही लीजिये कुत्ते को रोटी और प्यार देने पर ही वह आपकी आज्ञा का पालन कर सकेगा, अन्यथा काट खाने को दौड़ेगा। भोले भाले अज्ञान बालक का हृदय भी देखिये पहले वह गेंद बिना किसी संकोच के धरती पर फेंक देता है लेकिन उस गेंद को धरती अपने पास नहीं रखती है बल्कि बालक को ही वापस लौटा देती है।

📖 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1944 पृष्ठ 12

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1944/February/v1.12

मंगलवार, 15 नवंबर 2022

👉 कर्त्तव्य की जिम्मेदारी

प्रकृति का वह अनिवार्य नियम है, कि जिसको आप जैसा समझते हैं कि वह आपको वैसा ही समझता है, भले ही आप उसे न जानते हों या आपको जानकर आश्चर्य और क्रोध आवे। जिसको आप छोटा समझते हैं, वह आपको वैसा ही समझता है। नागरिक कर्तव्यों और अधिकारों का ज्ञान अस्पृश्यता रूपी कलंक हम में से निकाल देना और सच्चा भ्रातृ-भाव हमारे बीच में फैलावेगा, वह हमको बतलायेगा कि जो बात अपने को बुरी लगती है, वही बात दूसरे को बुरी लगती है। जैसा व्यवहार हम दूसरों से चाहते हैं, वैसा ही व्यवहार हम दूसरों से करें, सब चीजें चाहती हैं कि हमारे साथ सद्व्यवहार किया जाय, चाहे वे जड़ हों या चेतन।

दुर्व्यवहार करने पर सभी वस्तुएं अपना बदला लेंगी। यदि भाई, नौकर, पड़ौसी, आदि चेतन जीवों से आप दुर्व्यवहार करते हैं तो अपना बदला लेते ही हैं। अचेत वस्तुएं भी ऐसा ही करती हैं। जूते के साथ दुर्व्यवहार कीजिएगा, उसे साफ नहीं रखिएगा तो वह काठ लेगा। छाते की फिक्र न कीजिएगा, उससे लापरवाही से पेश आइये, तो समय पर आप उसकी कमानी टूटी और कपड़ा कटा अर्थात् उसे बेकार पाइयेगा। यदि सुई की फिक्र न रखिएगा, तो किसी वक्त वह आपके शरीर में चुभ कर अपने अस्तित्व का माण आपको देगी। कार्यकुशल पुरुष सबके साथ सदा अच्छा और उचित व्यवहार करता है। इस कारण वह अपनी सब वस्तुएं, सब समय ठीक प्रकार से ठीक स्थान पर पाता है और सब चीजें उसकी सेवा करती हैं। उसका घर गन्दा नहीं रहता। उसके कपड़े मैले नहीं रहते। वह सदा चिड़चिड़ाया हुआ, घबराया हुआ, दूसरों पर अपना दोष लगाता हुआ, परेशान नहीं पाया जाता। उसका शरीर, उसकी आत्मा, उसका मस्तिष्क, सब स्वास्थ्य, स्थिर और प्रसन्न रहते हैं।

अपने नागरिक कर्तव्यों को न पालन कर हम देश की उन्नति में बाधा डाल रहे हैं। इसका प्रभाव हमारे आपस के प्रतिदिन के सम्बन्ध पर भी पड़ा है। जब हम मोची, दर्जी, धोबी आदि को कोई काम देते हैं तो हमें यह विश्वास नहीं रहता कि हम समय से काम कर देगा, न उसे विश्वास रहता है कि इस समय पर उसे दाम देंगे। इसी कारण परस्पर तकाजे पर तकाजा करते रहना पड़ता है। ऐसी दशा में समाज कैसे ठीक-ठीक चल सकता है? हालत यहाँ तक पहुँची है, कि यदि आप किसी को भोजन का निमन्त्रण दें और उन्होंने उसे स्वीकार भी कर लिया हो तो न आपको यह विश्वास रहता है कि वे आ जावेंगे तो भोजन मिल भी जायगा।

काशी में यह कायदा है कि शादी विवाह के भोज की याद निमन्त्रित सज्जनों को लोग आखिर तक बारबार स्वयं जाकर या दूसरों को भेज कर दिलाया करते हैं और मेरा खुद अनुभव है कि गाँव, देहात में निमन्त्रण स्वीकार करने के बाद जब समय से पहुँच गया हूँ तब वहाँ खाना पकाना शुरू किया गया है। मेजबानों को आखिर तक शंका रही कि वह आयेगा या नहीं। जब समाज की यह दशा है, जब किसी भी काम के लिये हम किसी दूसरे पर विश्वास नहीं कर सकते-तब क्या समाज का संगठन हो सकता है ? क्या समाज की प्रगति सम्भव है?

देश की उन्नति इने गिने बहुत थोड़े लोगों पर निर्भर नहीं रह सकती। देश की उन्नति, देश की प्रगति, देश का अभ्युदय, देश की स्वतन्त्रता, साधारण से साधारण व्यक्तियों के अपने कर्तव्यों और अधिकारों की जिम्मेदारी ठीक तरह समझने पर ही निर्भर है।

📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1943 पृष्ठ 6

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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 April 2026

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