शुक्रवार, 20 मई 2022

👉 विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग १ )

विधेयात्मक चिन्तन की फलदायी परिणतियां

जीवन की अन्यान्य बातों की अपेक्षा सोचने की प्रक्रिया पर सामान्यतः कम ध्यान दिया गया है, जबकि मानवी सफलताओं-असफलताओं में उसका महत्वपूर्ण योगदान है। विचारणा की शुरुआत मान्यताओं अथवा धारणा से होती है, जिन्हें या तो मनुष्य स्वयं बनाता है अथवा किन्हीं दूसरे से ग्रहण करता है या वे पढ़ने सुनने और अन्यान्य अनुभवों के आधार पर बनती है। अपनी अभिरुचि के अनुरूप विचारों को मानव मस्तिष्क में प्रविष्ट होने देता है जबकि जिन्हें पसन्द नहीं करता उन्हें निरस्त भी कर सकता है। जिन विचारों का वह चयन करता है उन्हीं के अनुरूप चिन्तन की प्रक्रिया भी चलती है। चयन किये गये विचारों के अनुरूप ही दृष्टिकोण का विकास होता है जो विश्वास को जन्म देता है—वह परिपक्व होकर पूर्व धारणा बन जाता है। व्यक्तियों की प्रकृति एवं अभिरुचि की भिन्नता के कारण मनुष्य मनुष्य के विश्वासों, मान्यताओं एवं धारणाओं में भारी अन्तर पाया जाता है।
चिन्तन पद्धति में अर्जित की गयी भली-बुरी आदतों की भी भूमिका होती है। स्वभाव-चिन्तन को अपने ढर्रे में घुमा भर देने में समर्थ हो जाता है। स्वस्थ और उपयोगी चिन्तन के लिए उस स्वभावगत ढर्रे को भी तोड़ना आवश्यक है जो मानवी गरिमा के प्रतिकूल है अथवा आत्म-विकास में बाधक है।

प्रायः अधिकांश व्यक्तियों का ऐसा विश्वास है कि विशिष्ट परिस्थिति में मन द्वारा विशेष प्रकार की प्रतिक्रिया व्यक्त करना मानवी प्रकृति का स्वभाव है, पर वास्तविकता ऐसी है नहीं। अभ्यास द्वारा उस ढर्रे को तोड़ना हर किसी के लिए सम्भव है। परिस्थिति विशेष में लोग प्रायः जिस ढंग से सोचते एवं दृष्टिकोण अपनाते हैं, उससे भिन्न स्तर का चिन्तन करने के लिए भी अपने मन को अभ्यस्त किया जा सकता है। मानसिक विकास के लिए अभीष्ट दिशा में सोचने के लिए अपनी प्रकृति को मोड़ा भी जा सकता है।

मन विभिन्न प्रकार के विचारों को ग्रहण करता है, पर जिनमें उसकी अभिरुचि रहती है, चयन उन्हीं का करता है। यह रुचि पूर्वानुभवों के आधार पर बनी हो सकती है, प्रयत्नपूर्वक नयी अभिरुचियां भी पैदा की जा सकती हैं।

प्रायः मन एक विशेष प्रकार की ढर्रे वाली प्रतिक्रियायें मात्र दर्शाता है, पर इच्छित दिशा में उसे कार्य करने के लिए नियन्त्रित और विवश भी किया जा सकता है। ‘बन्दरों की तरह उछलकूद मचाना उसका स्वभाव है। एक दिशा अथवा विचार विशेष पर वह एकाग्र नहीं होना चाहता। नवीन विचारों की ओर आकर्षित तो होता है, पर उपयोगी होते हुए भी उन पर टिका नहीं रह पाता। कुछ ही समय बाद उसकी एकाग्रता भंग हो जाती तथा वह परिवर्तन चाहने लगता है, पर अभ्यास एवं नियन्त्रण द्वारा उसके बन्दर स्वभाव को बदला भी जा सकता है। यह प्रक्रिया समय साध्य होते हुए भी असम्भव नहीं है। एक बार एकाग्रता का अभ्यास बन जाने से जीवनपर्यन्त के लिए लाभकारी सिद्ध होता है।

.... क्रमशः जारी
📖 विचारों की सृजनात्मक शक्ति पृष्ठ 3
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 भक्तिगाथा (भाग १३१)

दोषों को भी प्रभु को अर्पित करता है भक्त

इस पर देवर्षि ने कहा- ‘‘महर्षि आप धन्य हैं। आप वही कह रहे हैं, जो मुझे अपने सूत्र में कहना है।’’ उनकी यह बात सुनकर ऋषिश्रेष्ठ क्रतु ने कहा- ‘‘फिर भी हे देवर्षि! आपका सूत्र अमूल्य है। पहले आप उसे कहें। इसके बाद ही मैं सुशान्त की कथा पूरी करूँगा।’’ इस पर देवर्षि ने मुस्कराते हुए कहा- ‘‘मुझे आपकी आज्ञा शिरोधार्य है भगवन्!’’ इतना कहकर उन्होंने बड़े ही भावपूर्ण व मधुर स्वरों में उच्चारित किया-

तदर्पिताखिलाचारः सन् कामक्रोधाभिमानादिकं
तस्मिन्नेव करणीयम्॥ ६५॥

सब आचार भगवान के अर्पण कर चुकने पर यदि काम, क्रोध, अभिमानादि हों, तो उन्हें भी उस (भगवान) के प्रति ही करना चाहिए।

देवर्षि ने अपना यह सूत्र कहने के बाद महर्षि क्रतु से कहा- ‘‘भगवन्! आप सुशान्त शर्मा के घटनाप्रसंग को अवश्य कहें। मेरा विश्वास है कि आपके स्नेह ने सुशान्त को अवश्य ही भगवान का कृपापात्र बनाया होगा।’’ इस पर ऋषिश्रेष्ठ क्रतु ने कहा- ‘‘यह तो मैं नहीं कहता कि उसे भगवान का कृपापात्र किसने बनाया, मेरे स्नेह ने या फिर उसी के किसी शुभ संस्कार ने। पर इतना सच अवश्य है कि संसार से हर तरह से ठुकराए गए सुशान्त ने मेरे पास आकर सचमुच ही स्वयं के अस्तित्त्व को परमात्मा में विसर्जित करने की बड़ी निष्कपट कोशिश की।

मेरे पास आने के कुछ ही दिनों बाद वह मानसिक रूप से स्वस्थ व शारीरिक रूप से सबल होने लगा। थोड़े ही दिनों बाद उसकी स्थिति सामान्य हो गयी। मेरे सान्निध्य में उसे याद आने लगा अपने पिता का सान्निध्य। साथ ही उसे याद हो आए अपने पुराने बचपन के दिन। जब वह त्रैकालिक सन्ध्या नियमित किया करता था। जब वह सूर्यमध्यस्थ गायत्री से स्वयं के प्राणों के एकाकार होने की भावना करता था। इन बचपन की स्मृतियों ने उसे विह्वल कर दिया। इसी विह्वलता में एक दिन उसने कहा- हे देव! क्या मैं पुनः गायत्री उपासना प्रारम्भ कर सकता हूँ। इस पर मैंने कहा- अवश्य पुत्र! तब उसने कहा- भगवन्! क्या इतने वर्षों तक नीच कर्म करने के बाद भी मैं इस लायक हूँ।

उसकी इस बात पर मैंने कहा- पुत्र! शास्त्रों में प्रत्येक अशुभ कर्म के लिए प्रायश्चित विधान है। पहले तुम प्रायश्चित करो। फिर मैं तुम्हारा यज्ञोपवीत संस्कार पुनः करूँगा। तब तुम सम्पूर्ण विधि से सन्ध्यावन्दन के साथ गायत्री उपासना करना। मेरी यह बात सुनकर सुशान्त प्रसन्न हो गया। उसने निर्धारित विधान के अनुसार कृच्छ चान्द्रायण करते हुए लगातार एक वर्ष तक भगवान् के पावन नाम का जप किया। इस कठोर व्रत के साथ वह निरन्तर १८ घण्टे तक जप करता रहता। वर्ष पूरा होने पर मैंने उसका यज्ञोपवीत संस्कार किया।
जिस दिन उसका यह संस्कार हुआ, उस दिन वह आह्लादित था। उसके बाद उसने अपनी गायत्री साधना प्रारम्भ की। तीनों समय सन्ध्योपासना के साथ गायत्री आराधना। इसी आराधना में घुलते गए उसके हृदय के भाव। वह अपने सभी भावों को भगवती के चरणों में अर्पित करता गया। अभिमान अर्पित होकर समर्पण हो गया। क्रोध ने संकल्प का रूप धारण किया। काम जगन्माता में समर्पित होकर भक्ति बन गया। उसकी साधना अविराम बनी रही, साथ ही उसके दुर्गण, सद्गुण में रूपान्तरित होते गए। दिन बीते, मास-वर्ष बीते। साथ ही उसके कलंक धुलते गए। वह निष्कलंक, निष्कपट एवं निर्मल होता गया। अब तो उसे अपमानित करने वाले लोग उसे आश्चर्य से देखने लगे क्योंकि अब उन्हें भी उसकी साधना की सुगन्ध प्रभावित करने लगी। वे सब भी कहने लगे कि साधना के संस्कार सुप्त भले ही हो जाएँ पर लुप्त कभी नहीं होते।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २५७

गुरुवार, 19 मई 2022

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 19 May 2022

आखिर हम स्वयं क्या हैं और अपनी आँखें अपने को किस नजर से देखती हैं? आत्मा की अदालत में इन्साफ की तराजू पर तोले जायँ तो हमारा पलड़ा बुराई की ओर झुकता है या भलाई की ओर। यदि हम अपनी कसौटी पर खरे उतरते हैं तो गुमराह लोग जो भी चाहे कहते रहें हमें इसकी जरा भी परवाह नहीं करनी चाहिए, किन्तु यदि अपनी आत्मा के सामने हम खोटे सिद्ध होते हैं तो सारी दुनिया के प्रशंसा करते रहने पर भी संतोष नहीं करना चाहिए।

प्रशंसा का सबसे बड़ा कदम यह है कि आदमी अपनी समीक्षा करना सीखे, अपनी गलतियों को समझे-स्वीकार करे और अगला कदम यह उठाये कि अपने को सुधारने के लिए अपनी बुरी आदतों से लड़े और उन्हें हटाकर रहे। जिसने इतनी हिम्मत इकट्ठी कर ली, वह एक दिन इतना नेक बन जाएगा कि अपने आप अपनी भरपूर प्रशंसा की जा सके। यह प्रशंसा ही सच्ची प्रशंसा कही जा सकेगी।

बुराई मनुष्य के बुरे कर्मों की नहीं, वरन् बुरे विचारों की देन होती है। इसलिए वह एक बार में ही समाप्त नहीं हो जाती, वरन् स्वभाव और संस्कार का अंग बन जाती है। ऐसी स्थिति में बुराई भी भलाई जान पड़ने लगती है। इसलिए बुरे कामों से बचने के लिए सर्वप्रथम बुरे विचारों से बचना चाहिए। दुष्कर्म का फल तुरन्त भोगकर उसे शान्त किया जा सकता है, पर संस्कार बहुत काल तक नष्ट नहीं होते। वह जन्म-जन्मांतरों तक साथ-साथ चलते और कष्ट देते हैं।

घरेलू और सामाजिक व्यवस्था को बनाये रखने के लिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि क्रोध के विनाशक परिणामों पर ध्यान दें और उनके उन्मूलन का संपूर्ण शक्ति से प्रयत्न करें। इससे सदैव हानि ही होती है। प्रायः देखा गया है कि क्रोध का कारण जल्दबाजी है। किसी वस्तु को प्राप्त करने या इच्छापूर्ति में कुछ विलम्ब लगता है तो लोगों को क्रोध आ जाता है, इसलिए अपने स्वभाव में धैर्य और संतोष का विकास करना चाहिए।

असत्य से किसी स्थायी लाभ की प्राप्ति नहीं होती। यह तो धोखे का सौदा है, लेकिन खेद का विषय है कि लोग फिर भी असत्य का अवलम्बन लेते हैं। एक दो बार भले ही असत्य से कुछ भौतिक लाभ प्राप्त कर लिया जाय, किन्तु फिर सदा के लिए ऐसे व्यक्ति से दूसरे लोग सतर्क  हो जाते हैं, उससे दूर रहने का प्रयत्न करते हैं। असत्यभाषी को लोकनिन्दा का पात्र बनकर समाज से परित्यक्त जीवन बिताना पड़ता है। धोखेबाज, झूठे, चालाक व्यक्ति का साथ उसके स्त्री-बच्चे भी नहीं देते।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

बुधवार, 18 मई 2022

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 18 May 2022

जो प्राप्त है, उसमें प्रसन्नता अनुभव करते हुए अधिक के लिए प्रयत्नशील रहना बुद्धिमानी की बात है, पर यह पहले सिरे की मूर्खता है कि अपनी कल्पना के अनुरूप सब कुछ न मिल पाने पर मनुष्य खिन्न  और असंतुष्ट ही बना रहे। सबकी सब इच्छाएँ कभी पूरी नहीं हो सकतीं। अधूरे में भी जो संतोष कर सकता है, उसी को इस संसार में थोड़ी सी प्रसन्नता उपलब्ध हो सकती है, अन्यथा असंतोष और तृष्णा की आग में जल मरने के अतिरिक्त और कोई चारा नहींं है।

जिस तरह साधनों की पवित्रता आवश्यक है, उसी तरह साध्य की उत्कृष्टता भी आवश्यक है। साध्य निकृष्ट हो और उसमें अच्छे साधनों को भी लगा दिया जाये तो कोई हितकर परिणाम प्राप्त नहीं होगा। उलटे उससे व्यक्ति और समाज की हानि ही होगी। उत्कृष्ट साधन भी निकृष्ट लक्ष्य की पूर्ति के आधार बनकर समाज में बुराइयाँ पैदा करने लगते हैं। बुराइयाँ तो अपने आप भी फैल जाती हैं, लेकिन किन्हीं समर्थ साधनों का प्रयोग किया जाय तो वे व्यापक स्तर पर फैलने लगती हैं। अतः जिनके पास साधन हैं, माध्यम हैं, उन्हें आवश्यकता है उत्कृष्ट लक्ष्य के निर्धारण की।

अभी तक किसी महापुरुष के जीवन से ऐसा कोई उदाहारण नहीं  मिला, जहाँ घृणा, द्वेष, परदोष दर्शन तथा प्रतिशोध के द्वारा किसी मंगल कार्य की सिद्धि हुई हो। प्रतिशोध से मनुष्य की बुद्धि नष्ट होती है। विवेक चला जाता है। जीवन की सारी शान्ति और आनंद नष्ट हो जाता है। इस तरह के दोषपूर्ण विचार मानवीय प्रगति को रोक देते हैं। मनुष्य न तो सांसारिक उन्नति कर पाता है और न ही आध्यात्मिक उद्देश्य पूरा कर पाता है। इससे मानसिक जड़ता आती है और सारी क्रिया शक्ति बर्बाद हो जाती है।

दूसरों की आँखों में धूल डालकर स्वयं बुरे होते हुए भी अच्छाई की छाप डाल देना चतुरता का चिह्न माना जाता है और आजकल लोग करते भी ऐसा ही हैं। झूठी और नकली बातें अफवाहों के रूप में इस तरह फैला देते हैं कि लोग धोखा खा जाते हैं और बुरे को भी अच्छा कहने लगते हैं। ऐसे बहके हुए लोगों की बहकी बातों को सुनकर थोड़ी देर का बाहरी मनोरंजन भले ही कर लिया जाय पर उससे शान्ति कभी भी नहीं हो सकती।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 दुःख और सुख

पाप से मन को बचाये रहना और उसे पुण्य में प्रवृत्त रखना यही मानव जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ है।

एक बहुत अमीर सेठ थे। एक दिन वे बैठे थे कि भागती-भागती नौकरानी उनके पास आई और कहने लगीः

"सेठ जी! वह नौ लाख रूपयेवाला हार गुम हो गया।"

सेठ जी बोलेः "अच्छा हुआ..... भला हुआ।" उस समय सेठ जी के पास उनका रिश्तेदार बैठा था। उसने सोचाः बड़ा बेपरवाह है! आधा घंटा बीता होगा कि नौकरानी फिर आईः "सेठ जी! सेठ जी! वह हार मिल गया।" सेठ जी कहते हैं- "अच्छा हुआ.... भला हुआ।"

वह रिश्तेदार प्रश्न करता हैः "सेठजी! जब नौ लाख का हार चला गया तब भी आपने कहा कि 'अच्छा हुआ.... भला हुआ' और जब मिल गया तब भी आप कह रहे हैं 'अच्छा हुआ.... भला हुआ।' ऐसा क्यों?"

सेठ जीः "एक तो हार चला गया और ऊपर से क्या अपनी शांति भी चली जानी चाहिए? नहीं। जो हुआ अच्छा हुआ, भला हुआ। एक दिन सब कुछ तो छोड़ना पड़ेगा इसलिए अभी से थोड़ा-थोड़ा छूट रहा है तो आखिर में आसानी रहेगी।"

अंत समय में एकदम में छोड़ना पड़ेगा तो बड़ी मुसीबत होगी इसलिए दान-पुण्य करो ताकि छोड़ने की आदत पड़े तो मरने के बाद इन चीजों का आकर्षण न रहे और भगवान की प्रीति मिल जाय।

दान से अनेकों लाभ होते हैं। धन तो शुद्ध होता ही है। पुण्यवृद्धि भी होती है और छोड़ने की भी आदत बन जाती है। छोड़ते-छोड़ते ऐसी आदत हो जाती है कि एक दिन जब सब कुछ छोड़ना है तो उसमें अधिक परेशानी न हो ऐसा ज्ञान मिल जाता है जो दुःखों से रक्षा करता है।

रिश्तेदार फिर पूछता हैः "लेकिन जब हार मिल गया तब आपने 'अच्छा हुआ.... भला हुआ' क्यों कहा?"

सेठ जीः "नौकरानी खुश थी, सेठानी खुश थी, उसकी सहेलियाँ खुश थीं, इतने सारे लोग खुश हो रहे थे तो अच्छा है,..... भला है..... मैं क्यों दुःखी होऊँ? वस्तुएँ आ जाएँ या चली जाएँ लेकिन मैं अपने दिल को क्यों दुःखी करूँ ? मैं तो यह जानता हूँ कि जो भी होता है अच्छे के लिए, भले के लिए होता है।

जो हुआ अच्छा हुआ, जो हो रहा अच्छा ही है। होगा जो अच्छा ही होगा, यह नियम सच्चा ही है। मेरे पास मेरे सदगुरू का ऐसा ज्ञान है, इसलिए मैं बाहर का सेठ नहीं, हृदय का भी सेठ हूँ।"

हृदय का सेठ वह आदमी माना जाता है, जो दुःख न दुःखी न हो तथा सुख में अहंकारी और लम्पट न हो। मौत आ जाए तब भी उसको अनुभव होता है कि मेरी मृत्यु नहीं। जो मरता है वह मैं नहीं और जो मैं हूँ उसकी कभी मौत नहीं होती।

मान-अपमान आ जाए तो भी वह समझता है कि ये आने जाने वाली चीजें हैं, माया की हैं, दिखावटी हैं, अस्थाई हैं। स्थाई तो केवल परमात्मा है, जो एकमात्र सत्य है, और वही मेरा आत्मा है। जिसकी समझ ऐसी है वह बड़ा सेठ है, महात्मा है, योगी है। वही बड़ा बुद्धिमान है क्योंकि उसमें ज्ञान का दीपक जगमगा रहा है।

संसार में जितने भी दुःख और जितनी परेशानियाँ हैं उन सबके मूल में बेवकूफी भरी हुई है। सत्संग से वह बेवकूफी कटती एवं हटती जाती है। एक दिन वह आदमी पूरा ज्ञानी हो जाता है। अर्जुन को जब पूर्ण ज्ञान मिला तब ही वह पूर्ण संतुष्ट हुआ। अपने जीवन में भी वही लक्ष्य होना चाहिए।

सोमवार, 16 मई 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग २८

प्रशंसा का मिठास चखिए और दूसरों को चखाइए

अपने दोषों की ओर से ओंखें बंद करके उन्हें बढने दें या आत्मनिरीक्षण करना छोड दें, ऐसा हमारा कथन नहीं हैं। हमारा निवेदन इतना ही है किं बुराइयों को भुला कर अच्छाइयों को प्रोत्साहित करिए। अपने में जो दोष हैं, जो दुर्भाव हैं उन्हें ध्यानपूर्वक देखिए और उनको कठोर परीक्षक की तरह तीव्र दृष्टि से जाँचते- . रहिए। जो त्रुटियाँ दिखाई पड़े उनके विरोधी सद्गुणों को प्रोत्साहन देना आरभ करिए यही उन दोषों के निवारण का सही तरीका है। मान लीजिए कि आपको क्रोध अधिक आता है तो उसकी चिंता छोड कर प्रसन्नता का, मधुर भाषण का अभ्यास कीजिए क्रोध अपने आप दूर हो जाएगा। यदि क्रोध का ही विचार करते रहेंगे तो विनयशीलता का अभ्यास न हो सकेगा। यदि कोई आपको आदेश करे कि भजन करते समय बंदर का ध्यान मत आने देना, तो बंदर का ध्यान आए बिना न रहेगा। वैसे भजन करने में कभी बंदर का ध्यान नहीं आता पर निषेध किया जाए तो बढोत्तरी होगी। बुराई कोई स्वतंत्र वस्तु नहीं है, भलाई के अभाव को बुराई कहते हैं, पाप कोई स्वतंत्र वस्तु नहीं है,पुण्य के अभाव को पाप कहते हैं। यदि भलाई की ओर, पुण्य' की ओर आपकी प्रवृत्ति हो तो बुराई अपने आप घटने लगेगी और एक दिन उसका पूर्णत: लोप हो जाएगा।
 
पीठ थपथपाने में घोडा खुश होता है, गरदन खुजाने से गाय प्रसन्न होती है, हाथ फिराने से कुत्ता हर्ष प्रकट करता है, प्रशंसा से हृदय हुलस आता है। आप दूसरों की प्रशंसा करने में कंजूसी मत किया कीजिए जिनमें जो अच्छे गुण देखें, उनकी मुक्त कंठ से सराहना किया करें, सफलता पर बधाई देने के अवसरों को हाथ से न जाने दिया करें। इसकी आदत डालना घर से आरंभ करें अपने भाई-बहिनों बालक-बालिकाओं की अच्छाइयों को उनके सामने कहा कीजिए। अपनी पत्नी के रूप, सेवाभाव, परिश्रम, आत्मत्याग की भूरि- भूरि प्रशंसा किया कीजिए। बड़ों के प्रति प्रशंसा प्रकट करने का रूप कृतज्ञता है। उनके द्वारा जो सहायता प्राप्त होती है उसके लिए कृतज्ञता प्रकट करनी चाहिए। किसी ने आपके ऊपर अहसान किया हो तो शुक्रिया, धन्यवाद, मैं आपका ऋणी ' आदि शब्दों के द्वारा थोड़ा-बहुत प्रत्युपकार उसी समय चुका दिया कीजिए। बाद में आप देखेगे कि चारों ओर कितना मिठास बरसता है। शत्रु-मित्र बन जाते हैं। आपकी वाणी के प्रशंसा युक्त मिठास से आकर्षित होकर मित्र और प्रिय पात्रों का दल आपके पीछे-पीछे लगा फिरेगा। आज यह बातें छोटी भलें ही प्रतीत होती हैं परंतु अनुभव के पश्चात आप पावेंगे कि प्रशंसा परायणता में जितना आध्यात्मिक लाभ है, उससे भी अधिक भौतिक लाभ है। धनी बनने, प्रेम पात्र बनने, नेता बनने, शत्रु रहित बनने की यह कुंजी है। दूसरों का हदय जीतने की यह अचूक दवा है।

आप अपने में अच्छाइयाँ देखिए 'दूसरों  में अच्छाईयाँ देखिए इस संसार में श्रेष्ठताएँ उत्कृष्टताएँ संपदाए कम नहीं हैं। आप उन्हें देखिए रूचिपूर्वक पहिचानिए और आग्रह पूर्वक ग्रहण करिए,ऐसा करने से आपके अंदर-बाहर, चारों ओर अच्छाइयों से भरा हुआ प्रसन्नतापूर्ण वातावरण एकत्रित हो जाएगा। इस वातावरण मे आपको आनन्द का, उल्लास का दर्शन होगा।

आनंददायक उल्लास प्रदान करने वाली परिस्थितियाँ वस्तुएँ बाहर नहीं हैं। जड भूतों में, चैतन्य आत्मा को उल्लसित करने वाली कोई शक्ति नहीं है। आप बाहर की ओर देखना छोड़ कर अपने अंतःकरण को तलाश कीजिए। क्योंकि अखंड आनंद का अक्षय स्रोत वहीं छिपा हुआ है। अपने सत् तत्वों को जागृत कीजिए उन्हें विकसित और समुन्नत कीजिए आपका जीवन उल्लास से परिपूर्ण हो जावेगा।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ ४०

👉 भक्तिगाथा (भाग १३०)

दोषों को भी प्रभु को अर्पित करता है भक्त

‘‘क्लेशों से क्लान्त, कलंकित, अनेकों मनोग्रन्थियों के मार से दबा सुशान्त न तो कुछ सोच पा रहा था, न कुछ समझ पा रहा था। जिन्दगी की सारी राहें उसके लिए खो चुकी थीं। सब ओर घना अंधियारा छाया हुआ था। ऐसे घने मानसिक अंधकार से घिरा सुशान्त इधर-उधर मारा-मारा घूमता था। लावण्या ने उसे अपने यहाँ से निकाल दिया था। जिन मित्रों पर उसे गर्व था, वे सभी मित्र कब के उससे दूर जा चुके थे। पिता के द्वारा अर्जित विपुल चल एवं अचल सम्पत्ति धीरे-धीरे लावण्या के चरणों में समर्पित हो चुकी थी। अब तो बस दुत्कार-फटकार, अपमान-असम्मान ही बचा था। पंडित शशांक शर्मा के जो मित्र पहले उसे स्नेह भाव से देखा करते थे, वे अब उससे मुँह फेर चुके थे।

स्मृतियों के धुंधलेपन में उसे अब यह भी याद नही रह गया था कि वह पंडित शशांक शर्मा का सुपुत्र है। वह विप्रकुल में जन्मा है और उसने अपना बचपन संध्यावन्दन करते हुए वेदमाता गायत्री की आराधना में बिताया है। अब जो स्मृतियाँ कभी उभरती-उफनती थीं, वे सभी बड़े ही विदू्रप जीवन की थीं। उनमें लावण्या थी, जिसके सम्पर्क में उसका सदाचरण विषाक्त हुआ था। वे मित्र थे, जिनके कुसंग में वह कुपथ पर चला था। लेकिन अब ये सब भी उससे किनारा कर गये थे। बचा रह गया था तो केवल उसका दुर्भाग्य, जो उसे बार-बार मरण के लिए प्रेरित करता था। कलंक व अपमान की असंख्य चोटों से आहत उसके मन में मर जाने के अलावा अन्य कोई भी विचार नहीं आता था।

अपने विचार प्रवाह में डूबता-उतराता एक दिन वह पास के अरण्य में चला गया। वहाँ पर एक पहाड़ी थी, न जाने किस प्रेरणा से वह उस पर चढ़ता गया। इस पहाड़ी के नीचे एक नदी बहती थी- मकराक्षी। इस नदी में अनेकों मगरमच्छ रहते थे। उसने सोचा इसी नदी में कूद कर जीवन की समाप्ति कर ले। नदी में गिरने के बाद यह अधम शरीर किसी न किसी मगर के मुख का ग्रास बन जाएगा। यह सोचते हुए जैसे ही उसने छलांग लगाने की चेष्टा की, वैसे ही दैवयोग से मैं आ गया। मैंने उसका हाथ पकड़कर कहा- पुत्र! जब संसार अपने सभी द्वार बंद कर लेता है, उस समय पमरेश्वर उसके लिए अपने हृदय का द्वार खोल देते हैं। सुशान्त को मेरा यह स्नेहपूर्ण व्यवहार अटपटा व विचित्र लगा। पर जब उसने मेरी आँखों में देखा तो वहाँ उसे आत्मीय स्नेह नजर आया। काफी देर तक तो वह यूं ही गुमसुम खड़ा रहा। फिर वह मेरे से जोर से चिपट कर बिलखते हुए रोने लगा। रोते-रोते जब उसकी हिचकियाँ थमीं तब उसने कहा- महर्षि क्या अभी भी मेरे जीवन में कुछ सार्थक होना सम्भव है?

क्यों नहीं पुत्र! तुम जो हो जैसे हो, वैसे ही तुम परमेश्वर में समर्पित हो जाओ। क्या अपने दोषों को भी मैं भगवान को अर्पित कर दूँ। उत्तर में मैंने कहा- हाँ पुत्र! दोषों को भी। क्योंकि जब दोष भगवान के पावन चरणों में अर्पित होते हैं तब वे रूपान्तरित होकर सद्गुण में बदल जाते हैं।’’ जब महर्षि सुशान्त का विवरण सुना रहे थे, तब देवर्षि नारद उन्हें भावपूर्ण नेत्रों से निहारे जा रहे थे। जब उन्होंने दोषों को प्रभु अर्पित करने की बात कही तो देवर्षि के मुख से अचानक निकल गया- ‘‘अहा! यह कितना सत्य कथन है।’’ देवर्षि के कहने से महर्षि क्रतु का ध्यान उनकी ओर गया और वह बोले- ‘‘अरे मैं तो सुशान्त की कथा सुनाने के फेर में यह भूल ही गया कि हम सबको आपके सूत्र की प्रतीक्षा है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २५५

शनिवार, 14 मई 2022

👉 दहेज का असुर तो ऐसे मरेगा

भारतवर्ष में दहेज एक ऐसा असुर है, जिसकी क्रूरता से अगणित कन्याऐं अपना प्राण त्याग चुकीं, अनेकों वैधव्य का दुख भोग रही हैं, अनेकों परित्यक्ता बनकर त्रास पा रही हैं। कन्याओं के माता-पिता का तो यह असुर रक्त पान करके किसी योग्य ही नहीं रहने देता। कसाई और उसकी छुरी से बकरी जिस प्रकार डरती रहती है, उसी प्रकार दहेज कर भय कन्याओं के जीवन तथा उनके माता-पिताओं के साथ प्राणों पर बीतने वाली दिल्लगी किया करता है।

जिस साधारण आर्थिक स्थिति के व्यक्ति को कन्या का पिता बनने का दुर्भाग्य प्राप्त हो चुका है वह भुक्त-भोगी भली प्रकार जानता है कि किसी खाते-पीते घर का पढ़ा-लिखा लड़का पटाने में उसे कितनी दीनता, कितनी जलालत, कितनी गले न उतरने वाली कठोर शर्तें स्वीकार करने को विवश होना पड़ता है। इस कठिनाई ने कन्या और पुत्र के समान दर्जे की स्थिति ही बदल दी है, अब तो पुत्र का जन्म सौभाग्य का और कन्या का जन्म दुर्भाग्य का चिन्ह माना जाता है। पुत्र जन्म पर बाजे बजते हैं तो कन्या के जन्मते ही घर-घर में उदासी छा जाती है।

बालक-बालक के बीच माता-पिता की दृष्टि में भी ऐसे अन्तर उत्पन्न करने का हेतु प्रधानतया यह ‘दहेज’ का असुर ही है, जिसकी कल्पना जन्म के दिन ही कर ली जाती है और एक के साथ कुछ पाने की और दूसरे के साथ कुछ गवाने की दृष्टि उत्पन्न होने से स्नेह भाव में अन्तर आ जाता है। बच्चों के प्रति माँ-बाप की दृष्टि में ऐसी भेद बुद्धि उत्पन्न करा देना भी इस दहेज के असुर की ही माया है।

हर गृहस्थ में पुत्रों की भाँति कन्याऐं भी होती हैं, इसलिए कन्या की बारी आने पर उसे भी दहेज के बोझ से पिसना पड़ता है, इस प्रकार यह कटु अनुभव प्रायः सभी गृहस्थों को होता है, सभी दुखी और परेशान हैं और हर किसी को कन्या के अभिभावकों के रूप में दहेज की निन्दा करते देखा और सुना जा सकता है, किन्तु वही व्यक्ति जब पुत्र का पिता या वर पक्ष की स्थिति में आता है तो तुरन्त गिरगिट की तरह रंग बदल जाता है और दहेज को अपना अधिकार एवं प्रतिष्ठा का माध्यम और धन कमाने का एक स्वर्ण सुयोग मानकर उस अवसर से भरपूर लाभ उठाना चाहता है। मनुष्य का यह दोगला रूप देखकर आश्चर्य होता है कि थोड़ी सी देर में ही वह अपने अनुभव को भूल जाता है। यदि वर पक्ष के रूप में वह दहेज का समर्थक था तो अब कन्या पक्ष का बनने की स्थिति में अपना घर कुर्क कराने में क्यों झिझकता है। यदि कन्या पक्ष के रूप में दहेज को बुरा मानता है तो लड़के की शादी के अवसर पर बेचारे कन्या पक्ष वालों को अपनी जैसी कठिनाई में ग्रस्त मानकर उनके साथ सहानुभूति का बर्ताव क्यों नहीं करता। यह दुरंगी चाल दहेज के असुर को जीवित रहने में सहायक होती है और वचन तथा कार्य में भिन्नता बरतने वाले समाज-सुधारकों के लैक्चर तथा लेखों को एक कौतूहल मात्र समझे जाने की स्थिति से आगे नहीं बढ़ने देती।

हमें अपने विचार और कार्यों में एकता लानी होगी, यदि दहेज बुरा है तो लड़के के पिता के रूप में उसे समझाने को तैयार रहना होगा। यदि दहेज अच्छा है तो कन्या के पिता के रूप में भी उसे बिना शिकायत और रंज माने देना होगा। दुटप्पी चालें चलना हमारे नैतिक अधःपतन का चिन्ह है। पतित व्यक्ति चाहे वे धनी, विद्वान्, चौधरी, पंच कोई भी हों, कोई प्रभावशाली प्रेरणा देकर समाज का पथ-प्रदर्शन करने की क्षमता नहीं रखते। दहेज का विरोध जहाँ-तहाँ सुनाई पड़ता है पर उसके पीछे कोई बल नहीं होता क्योंकि वे विरोध करने वाले व्यक्ति ही कहनी और कथनी में अन्तर रखकर अपनी स्थिति उपहासास्पद बना लेते हैं। उनकी आवाज के पीछे कोई बल न होने के कारण यह सुधार आन्दोलन नपुँसक ही रहता है।

अब चौधरी, पंच और जातीय कर्णधारों द्वारा आयोजित सभा सम्मेलनों के प्रस्तावों पर निर्भर रहने से काम न चलेगा। इस विडम्बना की बहुत देर से परीक्षा होती चली आ रही है। अब कुछ ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। अन्यथा इस गिरती हुई आर्थिक स्थिति के जमाने में एक ऐसा सामाजिक संकट उत्पन्न हो जायगा जिसमें “जीवित रहते हुए आत्म-हत्या” करने जैसे कष्ट से कम त्रासदायक अनुभव न किया जायगा।

इस दिशा में लड़के और लड़कियाँ पहल कर सकते हैं। चालीस-पचास वर्ष से ऊपर की आयु के माता-पिता प्रायः अपना साहस खो बैठते हैं। लड़के का पिता लोभ नहीं छोड़ना चाहता और लड़की का पिता यह नहीं सोच सकता कि किसी निर्धन घर में कन्या को दे दूँ तथा जब तक सुयोग्य लड़का न मिले तब तक सयानी कन्या को अनिश्चित काल के लिए अविवाहित रहने दूँ। इन वयोवृद्धों को लाठी की तरह सहारा देकर लड़के और लड़कियाँ उन्हें रास्ता बता सकते हैं। भावनाशील लड़कों को प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि अपनी अपेक्षा निर्धन घर की कन्या से बिना प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दहेज के शादी करूंगा। अभिभावकों से उन आदर्शवादी युवकों को स्पष्ट शब्दों में कहना पड़ेगा कि प्रत्यक्ष ही नहीं, अप्रत्यक्ष दहेज की बात चलाई जायगी तो वह उस विवाह को करने के लिए कदापि तैयार न होंगे।

इसी प्रकार मनस्वी कन्याएँ अपना साहस बटोर कर अपने घर वालों को बता दें कि वे दहेज माँगने वाले सामाजिक कोढ़ी अमीरों के यहाँ जाने की अपेक्षा निर्धन और घटिया स्थिति के घरों में जाने के लिए तैयार हैं पर दहेज के साथ सम्पन्न घरों में तथा कथित ‘सुशिक्षित’ लड़कों के साथ विवाह करना पसंद न करेंगी। अनुकूल स्थिति न आने पर कन्याओं को आजीवन कुमारी रहने का व्रत लेना चाहिए और अपने त्याग से एक दूषित वातावरण को तोड़ने का आदर्श उपस्थित करना चाहिए। माता-पिता को आर्थिक संकट में डालने से बचाने के लिए कई कन्याऐं आत्म हत्याएँ कर चुकीं हैं, पर उससे अच्छा मार्ग यह आत्म-त्याग का है। कन्याओं के ऐसे आत्म-त्याग भी दहेज के लोभी रक्त पिपासुओं की आँखें खोलने में कुछ कारगर हो सकते हैं।

अर्थ-लोलुप वर पक्ष वालों को दहेज की बुराई की जड़ माना जाता है। बहुत अंशों में यह ठीक भी है, पर कन्या पक्ष वालों को भी उस सम्बन्ध में सर्वथा निर्दोष नहीं माना जाता। वे आर्थिक सम्पन्नता की दृष्टि से लड़के ढूँढ़ते हैं। जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी है, उन्हीं पर सैकड़ों लड़की वाले टूटते हैं, फलस्वरूप उन लड़के वालों का दिमाग खराब हो जाता है और लड़के को नीलाम की बोली पर चढ़ा देते हैं। यदि लड़की वाले अपेक्षाकृत निर्धन घर के और कम “सुशिक्षित” लड़के ढूँढ़कर सामान्य स्थिति के सम्बन्ध से काम चलाते तो अधिक अमीर और खूबसूरत लड़कों पर जो भीड़ टूटती है वह न टूटे और दहेज का प्रश्न बहुत अंशों तक हल हो जाय। दहेज न देने के साथ-साथ लड़की वालों को इसके लिए भी तैयार रहना चाहिए कि ऊँची कीमत जेवर कपड़े की न तो माँग की जाय और न उनका प्रदर्शन कराया जाय। अच्छा तो यह जो कि ‘भार्गव’ समाज में प्रचलित रिवाज की भाँति कन्या का पिता ही जो कुछ जेवर कपड़ा स्वेच्छापूर्वक दे सकता हो, वह देकर कन्या को विदा कर दे। विवाहोत्सव की भारी खर्चीली रिवाजें बन्द करके कम से कम व्यक्तियों की उपस्थिति में यह एक साधारण पारिवारिक आयोजन मात्र बना लिया जाय। दहेज का जितना धन इन प्रदर्शनों और तूमाल बाँधने की विडम्बना में खर्च हो जाता है, इसे बन्द करना भी दहेज बन्द करने के समान आवश्यक है।

अब स्थिति ऐसी आ गई है कि हमारे बच्चों को प्राण संकट में डालने वाले इस दहेज रूपी असुर का विनाश करने को किन्हीं ठोस आधारों पर कदम उठाया जाना चाहिए। यद्यपि व्यापक अर्थ लोलुपता से उत्पन्न अनेक अनैतिकताओं की भाँति यह भी एक सामाजिक अनैतिकता है, जिसके लिए केवल वर के पिता को ही दोषी मान लेना और केवल उसी के सुधरने से सब कुछ ठीक हो जाने की आशा नहीं की जा सकती। कन्या वाले भी अमीर घर इसलिए ढूँढ़ते हैं कि इनकी कन्या को उत्तराधिकार के विपुल धन की स्वामिनी तथा बहुमूल्य आभूषणों से सुशोभित बनने का अवसर मिले। उन्हें भी अपना यह दृष्टिकोण बदलना पड़ेगा। विवाह योग्य लड़के और लड़की यदि साहस से कार्य लें तो भी इस सत्यानाशी प्रथा को बदलने तथा गलत तरीके से सोचने वाले माँ-बापों को सही तरीके से सोचने के लिए विवश करने में महत्वपूर्ण कार्य कर सकते हैं।

समय की माँग है अब दहेज बन्द होना चाहिए। प्रसन्नता की बात है कि हमारी ही भाँति अनेक बुद्धिमान व्यक्ति सोच रहे हैं और दहेज के विरुद्ध तगड़ा मोर्चा लगाने की तैयारी में संलग्न हैं। आगरा-नौबस्ता निवासी पं. मुकुटबिहारीलाल शुक्ल बी. ए. एल-एल. बी. अपनी कन्या का विवाह बिना दहेज दिये बड़े आदर्श के साथ करने में सफल हो चुके हैं। बरेली के सुप्रसिद्ध कथा वाचक तथा ‘राधेश्याम रामायण’ के निर्माता पं. राधेश्यामजी सुप्रसिद्ध धनीमानियों में हैं, उनने भी अपनी सुशिक्षित विवाह योग्य नाती-नातनियों का विवाह बिना दहेज के ही करने का निश्चय किया है। जिन्हें आवश्यकता है- “पं. राधेश्याम शर्मा कथावाचक बरेली” इस पते पर उनसे अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। हम चाहते हैं कि अखंड-ज्योति तथा गायत्री परिवार के मनस्वी लड़के-लड़कियाँ तथा वर-कन्याओं के अभिभावक उपरोक्त भावनाओं के अनुसार दहेज के असुर का दमन करने के लिए कुछ वास्तविक एवं ठोस आदर्श उपस्थित करने के लिए कदम उठावें।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1956 पृष्ठ 36

शुक्रवार, 13 मई 2022

👉 तीन गुरु

बहुत समय पहले की बात है, किसी नगर में एक बेहद प्रभावशाली महंत रहते थे । उन के पास शिक्षा लेने हेतु कई शिष्य आते थे। एक दिन एक शिष्य ने महंत से सवाल किया, स्वामीजी आपके गुरु कौन है? आपने किस गुरु से शिक्षा प्राप्त की है?” महंत शिष्य का सवाल सुन मुस्कुराए और बोले, मेरे हजारो गुरु हैं! यदि मै उनके नाम गिनाने बैठ जाऊ तो शायद महीनो लग जाए। लेकिन फिर भी मै अपने तीन गुरुओ के बारे मे तुम्हे जरुर बताऊंगा।

एक था चोर।
एक बार में रास्ता भटक गया था और जब दूर किसी गाव में पंहुचा तो बहुत देर हो गयी थी। सब दुकाने और घर बंद हो चुके थे। लेकिन आख़िरकार मुझे एक आदमी मिला जो एक दीवार में सेंध लगाने की कोशिश कर रहा था। मैने उससे पूछा कि मै कहा ठहर सकता हूं, तो वह बोला की आधी रात गए इस समय आपको कहीं आसरा मिलना बहुत मुश्किल होंगा, लेकिन आप चाहे तो मेरे साथ ठहर सकते हो। मै एक चोर हु और अगर एक चोर के साथ रहने में आपको कोई परेशानी नहीं होंगी तो आप मेरे साथ रह सकते है।

वह इतना प्यारा आदमी था कि मै उसके साथ एक महीने तक रह गया! वह हर रात मुझे कहता कि मै अपने काम पर जाता हूं, आप आराम करो, प्रार्थना करो। जब वह काम से आता तो मै उससे पूछता की कुछ मिला तुम्हे? तो वह कहता की आज तो कुछ नहीं मिला पर अगर भगवान ने चाहा तो जल्द ही जरुर कुछ मिलेगा। वह कभी निराश और उदास नहीं होता था, हमेशा मस्त रहता था।

जब मुझे ध्यान करते हुए सालों-साल बीत गए थे और कुछ भी हो नहीं रहा था तो कई बार ऐसे क्षण आते थे कि मैं बिलकुल हताश और निराश होकर साधना-वाधना छोड़ लेने की ठान लेता था। और तब अचानक मुझे उस चोर की याद आती जो रोज कहता था कि भगवान ने चाहा तो जल्द ही कुछ जरुर मिलेगा।

और मेरा दूसरा गुरु एक कुत्ता था।
एक बहुत गर्मी वाले दिन मै बहुत प्यासा था और पानी के तलाश में घूम रहा था कि एक कुत्ता दौड़ता हुआ आया। वह भी प्यासा था। पास ही एक नदी थी। उस कुत्ते ने आगे जाकर नदी में झांका तो उसे एक और कुत्ता पानी में नजर आया जो की उसकी अपनी परछाई थी। कुत्ता उसे देख बहुत डर गया। वह परछाई को देखकर भौकता और पीछे हट जाता, लेकिन बहुत प्यास लगने के कारण वह वापस पानी के पास लौट आता। अंततः, अपने डर के बावजूद वह नदी में कूद पड़ा और उसके कूदते ही वह परछाई भी गायब हो गई। उस कुत्ते के इस साहस को देख मुझे एक बहुत बड़ी सिख मिल गई। अपने डर के बावजूद व्यक्ति को छलांग लगा लेनी होती है। सफलता उसे ही मिलती है जो व्यक्ति डर का साहस से मुकाबला करता है।

और मेरा तीसरा गुरु एक छोटा बच्चा है।
मै एक गांव से गुजर रहा था कि मैंने देखा एक छोटा बच्चा एक जलती हुई मोमबत्ती ले जा रहा था। वह पास के किसी गिरजाघर में मोमबत्ती रखने जा रहा था। मजाक में ही मैंने उससे पूछा की क्या यह मोमबत्ती तुमने जलाई है? वह बोला, जी मैंने ही जलाई है। तो मैंने उससे कहा की एक क्षण था जब यह मोमबत्ती बुझी हुई थी और फिर एक क्षण आया जब यह मोमबत्ती जल गई। क्या तुम मुझे वह स्त्रोत दिखा सकते हो जहा से वह ज्योति आई?

वह बच्चा हँसा और मोमबत्ती को फूंख मारकर बुझाते हुए बोला, अब आपने ज्योति को जाते हुए देखा है। कहा गई वह? आप ही मुझे बताइए।

मेरा अहंकार चकनाचूर हो गया, मेरा ज्ञान जाता रहा। और उस क्षण मुझे अपनी ही मूढ़ता का एहसास हुआ। तब से मैंने कोरे ज्ञान से हाथ धो लिए।

मित्रो, शिष्य होने का अर्थ क्या है? शिष्य होने का अर्थ है पुरे अस्तित्व के प्रति खुले होना। हर समय हर ओर से सीखने को तैयार रहना। जीवन का हर क्षण, हमें कुछ न कुछ सीखने का मौका देता है। हमें जीवन में हमेशा एक शिष्य बनकर अच्छी बातो को सीखते रहना चाहिए। यह जीवन हमें आये दिन किसी न किसी रूप में किसी गुरु से मिलाता रहता है, यह हम पर निर्भर करता है कि क्या हम उस महंत की तरह एक शिष्य बनकर उस गुरु से मिलने वाली शिक्षा को ग्रहण कर पा रहे हैं की नहीं!

👉 स्वभाव को कैसे सुधारा जाय

सामाजिक संस्कारों के अनुशीलन के सिलसिले में अनेकों खोजियों ने आश्चर्य के साथ देखा होगा कि सुखी और सम्पन्न घराने के लोगों ने किसी संवेग से प्रेरित हो किसी के साधारण मूल्य की वस्तुयें चुरा लीं। यद्यपि उतने पैसे या उन वस्तुओं का अभाव उन्हें जरा भी नहीं होता, फिर भी चुराने में उसे मजा आता है। और ये आदतें मार-पीट, दबाव और शासन से नहीं छूटती। मनुष्य इन आदतों को छोड़ने की इच्छा करके भी नहीं छोड़ पाते। इन जटिल आदतों को कैसे छुड़ाया जाय, इनके मूल कहाँ हैं, इन सभी बातों के लिये मन का विश्लेषण करना आवश्यक है।

इन आदतों की उत्पत्ति कैसे होती है, इस सम्बंध में प्रथम विचार, इस प्रकार के हैं-बार बार किसी कार्य को करते रहने से, उसके संस्कार कर्त्ता के मन पर क्रमशः जमते जाते हैं और एक दिन वे संस्कार घनीभूत होकर आदत में परिणत हो जाते हैं। जिस प्रकार बारम्बार के संघर्ष से जड़ पदार्थों में एक निश्चित संस्कार उत्पन्न हो जाता है, उसी प्रकार मनुष्यों में भी किसी काम को बारम्बार करते रहने से वह उसकी आदत ही बन जाती है। इसलिये कोमल शिशुओं को किसी काम में बारम्बार लगाने से उसकी आदत निर्मित करने के लिए पर्याप्त हैं और किसी आदत को बदलने के लिए उसके विपरित कार्यों को बारम्बार कराना भी पर्याप्त है।

नवीन मनोवैज्ञानिक विचारधारा कहती है कि प्रत्येक आदत की जड़ किसी संवेग में रहती है और इस संवेग के उत्तेजित होने पर आदत से होने वाले कात किए जाते हैं। संवेग की उत्तेजना, शिथिलता एवं विनाश ही, आदत की क्रिया शीलता, उसकी दिलाई एवं नाश का कारण बनता है। आदत मशीन है, संवेग उसकी चालक विद्युत शक्ति है। अभ्यास की बारम्बारता आदत निर्मित होने का कारण नहीं है। जटिल आदतें, मानसिक जटिलता, पेंचदार संवेगों के कारण ही उत्पन्न होती हैं।

यदि बुरी आदतें छुड़वाने और छोड़ने की जरूरत है तो इसके लिए आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार उन संवेगों के केन्द्र, मानसिक ग्रन्थियों के खोल देने ही से उन संवेगों के नष्ट हो जाने पर ही सम्भव है।

इस सम्बन्ध में मनोवैज्ञानिक चिकित्सा के अनुभवी श्री हेड फील्ड महाशय के कथन उल्लेख किये जाते हैं—

“मानसिक चिकित्सा में देखने में आता है कि जब किसी भावना ग्रन्थि को पूर्णतः नष्ट कर दिया जाता है, तो उससे सम्बन्धित बुरी आदत उसी प्रकार नष्ट हो जाती है, जिस प्रकार बिजली के प्रवाह की धारा तोड़ देने से बिजली का प्रकाश समाप्त हो जाता है। कारण के हटा देने पर कार्य का अन्त अपने आप हो जाता है। यदि आदत मानसिक ग्रन्थि के हटाने पर भी बनो रहे, या हटाने में समय ले रही हो, तो समझना चाहिए कि मानसिक ग्रन्थि अभी तक विद्यमान है।

इसका सबसे सुन्दर प्रत्यक्ष प्रमाण धार्मिक परिवर्तनों में देखा जाता है। बड़े से बड़ा पापी भी एक ही दिन में किसी अपने विशेष अनुभव से पुण्यात्मा बन जाता है। और अकस्मात् अपनी ऐसी आदतों को छोड़ देता है, जो जन्म से ही बनी आ रही थी। मनुष्य के संवेगात्मक जीवन में परिवर्तन होने से, उसकी बुरी आदतें उसे सदा के लिए छोड़ देती हैं। बुरी आदतों को मिटाने के लिए सम्भव है कि मानसिक चिकित्सकों को, उस ग्रन्थि को खोज निकालने में अनेकों सप्ताह अथवा महीने भी लगे, किंतु एक बार उस मानसिक ग्रन्थि को ढूंढ़ लेने पर (जो ग्रन्थि, उस आदत की जड़ है) तथा उसके निराकरण होने पर बुरी आदत अचानक ही नष्ट हो जाती है यह नियम न केवल आचरण की कुछ आदतों के लिए लागू होता है, वरन् शारीरिक अभ्यासों, मानसिक अकारण भयों,दुःखानुभूतियों आदि के लिए भी पूर्ण रूपेण लागू होता है। नैतिक सुधार में ही यह मनोवैज्ञानिक नियम कार्य करता है।

उस सिद्धाँतों का समर्थन ऐसे अनेकों उदाहरणों से किया जाता है। वाल्मीकि,तुलसीदास,सूरदास आदि इसके उदाहरण हैं। संवेग परिवर्तित होते ही इनके विचार ही नहीं,आचरण तक बदल गये। मनोवैज्ञानिक चिकित्सक प्रमाण के लिए ऐसे ही उदाहरण पेश करते हैं, जिसके कुछ नमूने नीचे दिये जा रहे हैं—

एक महाशय को रात के तीन बजे जग जाने की आदत पड़ गयी थी। वह स्वयं इस समय सोना चाहते थे, पर लाख चाहने पर उसे नींद नहीं आ पाती थी। इस आदत की स्वभाव ग्रन्थि की खोज करने पर पता चला कि एक बड़े ही तीव्र वेदना भरे अनुभवों के कारण ही वह जटिल ग्रन्थि बन गयी थी जिसने इस आदत का रूप धारण कर रक्खा था। कई वर्ष पूर्व उन्हें पेचिश की बीमारी हुई थी। इस बीमारी के कारण एक रात के तीन बजे सहसा ही इनकी नींद टूट गयी और उस समय उनके पेट में इतनी दुस्सह पीड़ा हुई कि उन्होंने समझ लिया कि अब मेरे प्राण शरीर से निकलने ही वाले हैं। पश्चात् ये पीड़ा और पेचिश एवं मृत्यु भय की बात उसकी याद में से धुल गयी पर उस मानसिक ग्रन्थि के निर्मित हो जाने के कारण उसे अनचाहे भी तीन बजे जग जाना पड़ता था। संवेगात्मक-अनुभव का संबन्ध तीन बजे रात के जगने से हो गया था, अतः संवेग के उत्तेजित होते ही आदत क्रियामाण हो पड़ता था, और वे नींद से वंचित हो जाते थे।

कभी-कभी मानव के जीवन में यह आश्चर्य भी उपस्थित होता है कि जिस व्यक्ति से हम सद्भाव पूर्वक बरतने का विचार रखते हैं, प्रेम करना चाहते हैं, उसी व्यक्ति को देखते ही कुछ ऐसे भाव भी उद्वन्द्व हो पड़ते हैं जो उस विचार और भाव के बिल्कुल विपरीत पड़ते हैं। वैसा व्यवहार करना हमारे विचार को जरा भी पसन्द नहीं, और न वैसा करना ही चाहते हैं, फिर भी एक संवेग वैसा कर डालने के लिये अनुप्रेरित करता रहता है। इसके भी एक उदाहरण जो मनोवैज्ञानिक जनों की ओर से दिए गए हैं, उसे देखिये और इस मनोवैज्ञानिक जटिलताओं के कारणात्मक सत्य की परख कीजिए—

एक अस्पताल में एक पुरुष “नर्स’ का काम करता था। उसी अस्पताल में एक “नर्स” का काम करने वाली महिला से उसे प्रेम हो गया। उसके प्रति उस (पुरुष) के हृदय में स्नेह के बाढ़ आते, तो उसकी सुन्दर कल्पना में विभोर हो उठता, पर ज्यों ही वह महिला उसके सामने आती तो उसमें एक संवेग उठता कि उसके सुकोमल गालों में जोर से एक घूंसा लगा दूँ। घूंसा मारने से तो प्रेम और विवाह होने की सारी स्थितियाँ बिगड़ ही जाएंगी, यही सोच कर वह अपने को रोक लेता, पर अन्तर से उठते हुए संवेग को रोकने में वह सदा ही असमर्थ रहता। एक दिन वह इसी चिंता में तल्लीन था कि अपनी प्रेमिका के प्रति, प्रतिकूल आचरण करने का संवेग जो मुझे होता है, वह क्यों? सहसा ही उसे याद आयी कि एकबार अस्पताल में नर्स का काम करते हुए उसे एक महिला नर्स ने नौकरी से वञ्चित कर वह स्वयं उस स्थान पर अधिकृत हो गयी थी। उसकी उस गर्हित नीचता से पुरुष को बड़ा क्रोध आया और उसने उस महिला नर्स से कहा--आज यदि मैं भी एक नारी होता तो तुम्हारे सुकोमल से कपोलों को जोर के घूंसे मारकर मरम्मत कर देता, किंतु अफसोस! वह आवेश उसने रोक लिया था और कुछ दिनों के बाद उसे भूल भी गया, पर उसी ने उसके मन में-स्वभाव में एक ग्रन्थि उत्पन्न कर दी थी; जिससे वैसे चेहरे वाली नर्सों के गाल उसके सामने आते ही उसके संवेग उत्तेजित हो उठते और उसे वह बड़ी कठिनाई से संयत कर पाता था।

यह स्मृति में आने के उपरान्त उसकी मानसिक ग्रन्थि खुल गयी और उस अनिच्छित संवेग की भी परिसमाप्ति हो गयी।

अतः आज का मनोविज्ञान चाहता है कि मनुष्यों की बुरी आदतों को छुड़ाने के लिए उसके विरुद्ध अच्छी आदतों का बारम्बार अभ्यास करना असफल प्रयोग है। बुरी आदतें तो तभी छूट सकती हैं जब उसकी आदत की कारण स्वरूपा मान सके ग्रन्थियों को ढूंढ़ कर सुलझायी खोल डाली जाय।

📖 अखण्ड ज्योति-अप्रैल 1956 पृष्ठ 30

गुरुवार, 12 मई 2022

👉 देखा जब उस वृद्ध को तो जिन्दगी बदल गई

एक सेठ के एक इकलौता पुत्र था पर छोटी सी उम्र मे ही गलत संगत के कारण राह भटक गया! परेशान सेठ को कुछ नही सूझ रहा था तो वो ईश्वर के मन्दिर मे गया और ईश दर्शन के बाद पुजारी को अपनी समस्या बताई !

पुजारी जी ने कहा की आप कुछ दिन मन्दिर मे भेजना कोशिश पुरी करेंगे की आपकी समस्या का समाधान हो आगे जैसी सद्गुरु देव और श्री हरि की ईच्छा !

सेठ ने पुत्र से कहा की तुम्हे कुछ दिनो तक मन्दिर जाना है नही तो तुम्हे सम्पति से बेदखल कर दिया जायेगा, घर से मन्दिर की दूरी ज्यादा थी और सेठ उसे किराये के गिनती के पैसे देते थे! अब वो एक तरह से बंदिश मे आ गया!

मंदिर के वहाँ एक वृद्ध बैठा रहता था और एक अजीब सा दर्द उसके चेहरे पर था और रोज वो बालक उस वृद्ध को देखता और एक दिन मन्दिर के वहाँ बैठे उस वृद्ध को देखा तो उसे मस्ती सूझी और वो वृद्ध के पास जाकर हँसने लगा और उसने वृद्ध से पुछा हॆ वृद्ध पुरुष तुम यहाँ ऐसे क्यों बैठे रहते हो लगता है बहुत दर्द भरी दास्तान है तुम्हारी और व्यंग्यात्मक तरीके से कहा शायद बड़ी भूलें की है जिंदगी मे?

उस वृद्ध ने जो कहा उसके बाद उस बालक का पूरा जीवन बदल गया! उस वृद्ध ने कहा हाँ बेटा हँस लो आज तुम्हारा समय है पर याद रखना की जब समय बदलेगा तो एक दिन कोई ऐसे ही तुम पर हँसेगा! सुनो बेटा मैं भी खुब दौड़ा मेरे चार चार बेटे है और उन्हे जिंदगी मे इस लायक बनाया की आज वो बहुत ऊँचाई पर है और इतनी ऊँचाई पर है वो की आज मैं उन्हे दिखाई नही देता हुं! और मेरी सबसे बड़ी भुल ये रही की मैंने अपने बारे मे कुछ भी न सोचा! अपने इन अंतिम दिनो के लिये कुछ धन अपने लिये बचाकर न रखा इसलिये आज मैं एक पराधीनता का जीवन जी रहा हुं! पर मुझे तो अब इस मुरलीधर ने सम्भाल लिया की यहाँ तो पराधीन हुआ हुं कही आगे जाकर पराधीन न हो जाऊँ!

बालक को उन शब्दो ने झकझोर कर रख दिया! बालक - मैंने जो अपराध किया है उसके लिये मुझे क्षमा करना हॆ देव! पर हॆ देव आपने कहा की आगे जाकर पराधीन न रहूँ ये मेरी कुछ समझ मे न आया?

वृद्ध - हॆ वत्स यदि तुम्हारी जानने की ईच्छा है तो बिल्कुल सावधान होकर सुनना अनन्त यात्रा का एक पड़ाव मात्र है ये मानवदेह और पराधीनता से बड़ा कोई अभिशाप नही है और आत्मनिर्भरता से बड़ा कोई वरदान नही है! अभिशाप की जिन्दगी से मुप्ति पाने के लिये कुछ न कुछ जरूर कुछ करते रहना! धन शरीर के लिये तो तपोधन आत्मा के लिये बहुत जरूरी है!

नियमित साधना से तपोधन जोडिये आगे की यात्रा मे बड़ा काम आयेगा! क्योंकि जब तुम्हारा अंतिम समय आयेगा यदि देह का अंतिम समय है तो धन बड़ा सहायक होगा और देह समाप्त हो जायेगी तो फिर आगे की यात्रा शुरू हो जायेगी और वहाँ तपोधन बड़ा काम आयेगा!

और हाँ एक बात अच्छी तरह से याद रखना की धन तो केवल यहाँ काम आयेगा पर तपोधन यहाँ भी काम आयेगा और वहाँ भी काम आयेगा! और यदि तुम पराधीन हो गये तो तुम्हारा साथ देने वाला कोई न होगा!

उसके बाद उस बालक का पुरा जीवन बदल गया!

इसलिये नियमित साधना से तपोधन इकठ्ठा करो!

बुधवार, 11 मई 2022

👉 गलतियाँ और उनके सुधार

तैरना सीखने वाला डूब जाने के सिवाय और सब गलतियाँ कर सकता है। तब वह अचानक किसी दिन देखता है कि उसे तैरना आ गया। इसलिए गलतियाँ होती है तो निराश होने की आवश्यकता नहीं है। जिस तरह बिना गलतियाँ किये तैरना नहीं आता उसी तरह गलतियों के बिना जिन्दगी जीना भी नहीं सीखा जाता।

मनुष्य अपूर्ण है इसलिए उसके कार्यों में गलती हो सकती है। इसमें शर्म की कोई बात नहीं है शर्म की बात यह है कि गलती को सही साबित करने और उस पर अड़े रहने की कोशिश की जाय। गलती को ढूँढ़ना मानना और सुधारना किसी मनुष्य के बड़प्पन का कारण हो सकता है। जो सीखने और सुधारने में लगा हुआ है वही एक दिन उस स्थिति को पहुँचेगा जिसमें त्रुटियों और बुराइयों से छुटकारा मिलता है।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 चार आधार

मित्रो ! चार आधार भावी युग निर्माण के मूलभूत आधार, तथ्य एवं आदर्श होंगे। इन्हीं सिद्धांतों पर व्यक्ति के अधिकार एवं कर्तव्य निर्धारित किए जाएंगे। प्रथा-परंपरा, कानून एवं आवरण इन्हीं सिद्धांत पर खड़े किए जाएंगे। ये आधार हैं-
  
(१) धन पर समाज का स्वामित्व-व्यक्तिगत संपदा का अंत,

(२) जाति और लिंग के नाम पर बरती जाने वाली असमानता का अंत और मनुष्य मात्र के समान नागरिक अधिकारों की प्रतिष्ठपना,

(३) विश्व बंधुत्व की मान्यता, प्रत्येक क्रिया-पद्धति मेें सहकारिता का, कौटुंबिकता की प्रवृत्ति का प्राधान्य। विश्व राष्ट की स्थापना, समस्त संसार का एक शासन, एक धर्म, एक संस्कृति, एक भाषा, एक आचार आदि एक्य सूत्रों का सार्वभौम प्रचलन,

(४) व्यक्तिवाद का अंत, समूहवाद का उदय, अधिकार की उपेक्षा और कर्तव्य की निष्ठा-तत्परता, उदारता और सज्जनता की मात्रानुसार मानवीय गरिमा का मूल्यांकन।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 10 मई 2022

👉 गहरे उतरें, विभूतियाँ हस्तगत करें

दृश्यमान व पदार्थ सम्पदा ही सब कुछ नहीें है। जो गहराई में विद्यमान है, उसका भी महत्व है। पेड़ की छाया ऊपर दीखती है, पर जड़ें जमीन की गहराई में ही पाई जा सकती हैं। समुद्र तट पर सीप और घोंघे बटोरे जा सकते हैं, पर मोती प्राप्त करने के लिए गहराई में उतरने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं। भूमि के ऊपर रेत और चट्टानें भी बिखरी पड़ी हैं, पर बहुमूल्य धातुओं के लिए जमीन खोदकर गहरी पर्तों तक प्रवेश करना पड़ता है।
 
पराक्रम के बलबूते वैभव हस्तगत किया जा सकता है, किन्तु मानवी गरिमा विकसित करने के लिए अन्तर्मुखी बनना और पैनी दृष्टि से दोष- दुर्गुणें को बुहारना पड़ता है। दैवी विभूतियाँ तो अन्तराल में विद्यमान हैं। गहन चिन्तन का समुद्र मन्थन करने पर ही वह हस्तगत हो सकती हैं। वैभव की तृष्णा एक लुभावनी चमक मात्र है। पर आन्तरिक सत्प्रवृत्तियों का परिपोषण रत्नों को खोद निकालने के समान है।
 
सौन्दर्य बाहर दीखता है, पर वह वस्तुतः नेत्रों की ज्योति, अभिरुचि एवं आत्मीयता का समुच्चय मात्र है। अच्छा हो हम अपने अन्तर का खजाना खोंजें और उन विभूतियों को प्राप्त करें, जो अपने कल्याण तथा समष्टि के कल्याण के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यक हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शुक्रवार, 6 मई 2022

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 06 May 2022

शुद्ध व्यवहार और सदाचार समाज की सुदृढ़ स्थिति के दो आधार स्तम्भ हैं। इनसे व्यक्ति का भाग्य और समाज का भविष्य विकसित होता है। शिक्षा, धन एवं भौतिक समुन्नति का सुख भी इसी बात पर निर्भर है कि लोग सद्गुणी और सदाचारी बनें। सामाजिक परिवर्तन का आधार व्यक्ति के अंतःकरण की शुद्धि है। यही समाज में स्वच्छ आचरण और सुन्दर व्यवहार के रूप में प्रस्फुटित होकर सुख और जनसंतोष के परिणाम प्रस्तुत करती है।

हमें मूक सेवा को महत्त्व देना चाहिए। नींव के अज्ञात पत्थरों की छाती पर ही विशाल इमारतें तैयार होती हैं। इतिहास के पन्नों पर लाखों परमार्थियों में से किसी एक का नाम संयोगवश आ पाता है। यदि सभी स्वजनों का नाम छापा जाने लगे तो दुनिया का सारा कागज इसी काम में समाप्त हो जाएगा। यह सोचकर हमें प्रशंसा की ओर से उदास ही नहीं रहना चाहिए, वरन् उसको तिलांजलि भी देनी चाहिए। नामवरी के लिए जो लोग आतुर हैं, वे निम्न स्तर के स्वार्थी ही माने जाने चाहिए।

जो बदले की नीयत से सत्कर्म कर रहा है, वह व्यापारी है। पुण्य और परमार्थ को वाहवाही के लिए बेच देने वाले व्यापारी हीरा बेंचकर काँच खरीदने वाले मूर्ख की तरह हैं। जिसने प्रशंसा प्राप्त कर ली उसे पुण्य फल नाम की और कोई चीज मिलने वाली नहीं है। दुहरी कीमत वसूल नहीं की जा सकती। अहंकार को तृप्त करने के लिए प्रशंसा प्राप्त कर लेने के बाद किसी को यह आशा नहीं करनी चाहिए कि इस कार्य में उसे परमार्थ का दुहरा लाभ भी मिल जाएगा।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 श्रद्धा का अर्थ


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 06 May 2022


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👉 आज का सद्चिंतन 06 May 2022

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👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग २६

प्रशंसा का मिठास चखिए और दूसरों को चखाइए

सोते हुए व्यक्ति को जगाना आवश्यक हो तो उसे हाथ पकड कर बिठाया जाता है और जब तक नींद खुल न जाए तब तक उसें सहारा देना पडता है। ठीक यही स्थिति आपको अपने सद्गुणों को जगाने में सामने आवेगी। कुछ दिनों तक ऐसा अभ्यास करना पड़ेगा कि इच्छा न रहते हुए भी मधुर, रुचिकर और प्रेम व्यवहार करें। यदि किसी को हानि ठगने, धोखा देने इच्छा से कोई बनावटी व्यवहार करते तब तो वह अधर्म है, 'किंतु निःस्वार्थ भाव से, हित कामना से, दूसरे की हृदय की कली खिलाने की इच्छा से, अपने संपूर्ण को उन्नत करने की आकांक्षा से बनावटी व्यवहार करते हैं वह निर्दोष है। लंगडा आदमी नकली टांग लगाकर अपना काम चलाता है तो इसमें किसी का कुछ भी अहित नहीं होता, बिना टांग के रहने की अपेक्षा नकली टांग लगवा लेना कोई बुरी बात नहीं है।

इस प्रतीक्षा में बैठे रहना ठीक नहीं है कि जब हमारा हृदय सात्विक प्रेम से परिपूर्ण हो जाएगा, प्राणिमात्र के प्रति आत्मभाव प्रवाहित होने लगेगा, हृदय में प्रसन्नता और उल्लास की तरंगें उठने लगेंगी तभी उनको प्रकट करना आरंभ करेंगे। यह तो ऐसी बात है जैसे कोई कहे कि पानी में पैर तब दूँगा जब तैरने की विद्या में निपुण हो जाऊँगा। तैरना तब आता है जब अनेक बार असफल प्रयत्न कर लिए जाते हैं, अभ्यास न होते हुए भी उलटे-सीधे हाथ- पैर फैंके जाते हैं, कुछ समय बाद अभ्यास परिपक्व हो जाता है और सफलता निकट आती है। विद्यार्थी पहले गलत-सलत लिखता है फिर ठीक-ठाक लिखने लगता है। अध्यापक की खींची हुई रेखाओं के ऊपर कलम फेर कर बालक अक्षरों को लिखता है पीछे बिना सहायता के स्वयं उन्हें बनाने लगता है। आपको अपने सद्गुणों की वृद्धि में भी इसी परिपाटी से काम लेना पड़ेगा। हृदय का सद्गुणों से परिपूर्ण हो जाना अंतिम सफलता है, यह एक दिन में प्राप्त नहीं होती वरन एक या एक से अधिक जन्मों का भी समय इसमें लग सकता है। साधना काल में बार-बार गिर पड़ने, फिर उठ कर चलने का क्रम जारी रहेगा। कई बार भूलें होंगी, कई बार संभलेंगे, प्रतिज्ञाएँ करें प्राचीन संस्कारों के प्रबल झकझोरों से वे टूटेंगी, फिर संभलेंगे, फिर गिरेंगे। हर एक साधक अनेक बार असफल होता है, गिरता पड़ता लगा रहता है तो .एक दिन लक्ष्य तक पहुँच ही जाता है।
 
आप असली-नकली के वितंडाबाद में पड़ कर बेकार ही बहस मत कीजिए। हम कहते हैं कि आप ' को बनावटी रूप से ही सही पर प्रकट करने की आदत इससे हानि किसी की नहीं और लाभ सबका है। अपने को सद्गुणी घोषित करिए अपने को अच्छे काम करने वाला, अच्छे विचार रखने वाला प्रकट होने दीजिए। अपनी अच्छाइयों को प्रकाश में आने दीजिए। अत्यंत, सुगंधित नयनाभिराम पुष्प यदि अज्ञात वन में खिले तो उसकी शोभा 'सुगंधि का लाभ कोई न उठा सकेगा, वह स्वयं भी देवता के ' चरणों पर चढ़ने का सौभाग्य प्राप्त न कर सकेगा। आप में बहुत सी अच्छाइयां हों और लोग उससे परिचित न होने के कारण कुछ लाभ न उठा सकें तो उन अच्छाइयों का क्या महत्त्व रहा? अज्ञात स्थान में छिपकर पड़ा हुआ शीतल जल किसके काम का? जबकि अनेक जीव-जंतु पानी की खोज के लिए सूखे कंठ को लेकर इधर-उधर मारे-मारे फिर रहें हैं।
प्यासों की प्यास न बुझी, उधर बिना खींचे कुँए का पानी सड़ गया, यह अज्ञातवास किसके लिए क्या लाभदायक हुआ? आप दीपक के अनुयायी बनिए। छदाम के मिट्टी के सकोरे में एक पैसे का तेल भरा हुआ है, एक दमड़ी की रुई मिला कर सवा पैसे का सामान है। वह इस बात की लज्जा नहीं करता कि मैं सवा पैसे की पूँजी वाला होकर सिर उठाकर क्यों चमकूँ। वह टुच्चा नहीं है इसलिए टुच्चे विचार भी नहीं करता। सवा पैसे का दीपक सिर उठा कर अपना प्रकाश फैलाता है उसके उजाले में बड़े-बडे धनी, विद्वान अपना काम चलाते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ ३८

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👉 भक्तिगाथा (भाग १२८)

भक्त के लिए जरूरी है दंभ का त्याग

‘‘सुशान्त तीव्रतर क्रम में जीवन के घने अंधेरे में घिरता-फँसता, उलझता जा रहा था। स्त्री, धन, वैरी व नास्तिक के विचारों व भावों में उसकी जीवनचेतना जकड़ गयी थी। इस जकड़न ने उसके व्यक्तित्व को बुरी तरह विषाक्त कर दिया था। अब वह पहले की तरह शान्त, शिष्ट, शालीन ब्राह्मणकुमार सुशान्त नहीं रहा। अब तो उसके व्यवहार में अभिमान व दम्भ की दुर्गन्ध फैलने लगी थी। उसे देखने वाले यकीन ही न कर पाते कि यही विप्रकुल शिरोमणि वेदाचार्य पंडित शशांक शर्मा का पुत्र सुशान्त शर्मा है। पंडित शशांक शर्मा का यश अभी भी आस-पास के क्षेत्र में चहुँ ओर व्याप्त था। जन-जन में उनकी चरित्रनिष्ठा, श्रद्धा-आस्था का विषय था। ऐसे विद्वान, तपस्वी ब्राह्मण के कुल में ऐसा पातक, ऐसा घना अंधियारा।

पर आज का सच यही था। जो पंडित शशांक शर्मा के हितैषी थे, उन्होंने उनके पुत्र सुशान्त को समझाने, सही राह पर लाने की बहुतेरी कोशिशें की। लेकिन उन्हें कोई कामयाबी न मिली। बल्कि उल्टे उन्हें सुशान्त के मित्रों के हाथों अपमानित व तिरस्कृत होना पड़ा। यद्यपि उन सबने इसका कोई बुरा नहीं माना। क्योंकि इन सब पर पंडित शशांक शर्मा ने अनेकों उपकार किए थे। उनका हार्दिक स्नेह व अपनत्व इन सबने पाया था। अभी तक इनमें से किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसा कैसे हो गया? बचपन से इतना अधिक सदाचरण में निरत रहने वाले सुशान्त में यह विषाक्तता आयी कैसे? लेकिन इसका उत्तर अभी तक किसी के पास न था।

रही बात सुशान्त की तो वह अभी भी नगरवधू लावण्या के रूपजाल में उलझा था। लावण्या और उसके सहयोगी मिलकर सुशान्त का धन-वैभव लूट रहे थे। वासना का विष, द्युत-क्रीड़ा का व्यसन, वैरियों के प्रति द्वेष उसकी चिन्तन चेतना में हावी हो चुका था। नास्तिकों के संग साथ के कारण नारायण का पावन नाम कब का विस्मृत-विलीन हो चुका था। जितने भी हितैषी थे, वे सभी परेशान-हैरान थे। जितने कुटिल कुचाली थे, उनकी खुशी का कोई ठिकाना न था।’’ ब्रह्मर्षि क्रतु सुशान्त शर्मा की स्थिति का वर्णन-विवरण दिए जा रहे थे। अन्य सभी शान्त भाव से उन्हें सुन रहे थे। लेकिन अचानक न जाने क्यों महर्षि क्रतु ने देवर्षि की ओर देखते हुए कहा- ‘‘हे भक्तश्रेष्ठ! आप भक्ति का अगला सूत्र कहें। मेरा विश्वास है कि आपका अगला सूत्र भक्ति के आचारशास्त्र को और भी अधिक प्रकट व प्रकाशित करेगा।’’

महर्षि के इस कथन पर देवर्षि गम्भीर हुए और बोले- ‘‘हे ऋषिश्रेष्ठ! आप परम भागवत हैं। आपसे अधिक भक्त के आचरण का ज्ञान किसे होगा? फिर भी आपकी आज्ञा शिरोधार्य करके मैं कहता हूँ’’-
‘अभिमानदम्भादिकं त्याज्यं’॥ ६४॥
अभिमान दम्भ आदि का त्याग करना चाहिए।

देवर्षि के इस सूत्र ने प्रायः सभी के चिन्तन सरोवर में अनेको विचारउर्मियों को अठखेलियाँ करने पर विवश कर दिया, हालांकि बोला कोई कुछ भी नहीं- सबके सब मौन बने रहे। काफी देर तक यूं ही नीरवता वातावरण में व्याप्त रही। फिर इस चुप्पी को तोड़ते हुए ऋषि क्रतु बोले- ‘‘जिस तरह से यह सच है कि भक्त को अभिमान व दम्भ आदि का त्याग कर देना चाहिए। उसी तरह से इस सच का दूसरा पहलू यह भी है कि भक्ति के अभाव में व्यक्ति अभिमान-दम्भ आदि से घिर जाता है जैसा कि सुशान्त शर्मा के जीवन में घटित हुआ।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २५२


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 April 2026

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