गुरुवार, 19 अक्टूबर 2017

👉 देवत्व विकसित करें, कालनेमि न बनें (भाग 7)

🔴 कुछ नई स्कीम है, जो आज गुरुपूर्णिमा के दिन कहना है और वह यह है कि प्रज्ञा विद्यालय तो चलेगा यहीं, क्योंकि केन्द्र तो यही है, लेकिन जगह-जगह प्रज्ञा पाठशालाओं की स्थापना हमें करनी है। इसके लिए आप सब जितने भी आदमी हैं, उनको एक काम सौंपते हैं। एक महीने की प्रज्ञा पाठशालाएँ तो यहीं होंगी, पर पन्द्रह दिन की पाठशाला क्षेत्रों में शक्तिपीठों पर चलेंगी। यहाँ बड़े साइज का प्रमाण-पत्र उत्तीर्ण होने पर दिया जाता है, पर वहाँ छोटे साइज का दिया जाएगा। परीक्षा ली जाएगी और वहाँ भी हम नेता बनाएँगे। आपको हम हिन्दुस्तान का ही नहीं, सारे विश्व का नेता बनाने वाले हैं। हिन्दुस्तान में हमने दस-दस गाँवों के खण्ड काटे हैं और उन्हें एक-एक व्यक्ति के सुपुर्द किया है और कहा कि आप अपने यहाँ प्रज्ञा पाठशालाएँ चलाएँ। पिछले साल आप लोगों ने हमारे कहने पर किसी ने यज्ञ किए, किसी ने शक्तिपीठ बनाए, किसी ने क्या किया, हजारों काम बताए और लोगों ने किए हैं। इस वर्ष अब आप सब लोग यह विचार लेकर जाएँ कि या तो हम प्रज्ञा पाठशाला चलवाएँगे। इस कार्य में कोई रुकावट नहीं आवेगी।
      
🔵 आज गुरुपूर्णिमा के दिन से आप लोग एक काम यह करना कि हमेशा यह अनुभव करना कि आप देवता हैं। रीछ-बन्दर का लिवास पहने बैठे हैं। कोई कुर्ता पहने बैठा है, कोई धोती पहने बैठा है, कोई चश्मा लगाए बैठा है, तो कोई कुछ किए बैठा है, पर आप हैं वास्तव में देवता, जो किसी खास काम के लिए, खास उद्देश्य के लिए, किसी खास निमन्त्रण पर आप काम करने के लिए आए हैं। यह हुई बात नम्बर एक। दो, जो आपको मुश्किल जान पड़ती है कि संसार में से बुराइयाँ कैसे दूर होंगी और बुराईयों की वृद्धि कैसे दूर होंगी और अच्छाइयों की वृद्धि कैसे होगी? इस सम्बन्ध में नोस्ट्राडेमस की राजनीतिक भविष्यवाणी तो हमने बता दी है और अब अपनी स्वयं की भविष्यवाणी बताते हैं कि हमने आपके बैरियों को दुश्मनों को मार दिया है।

🔴 वे मरे हुए रखे हैं और आपके लिए श्रेय जीवित हैं, सौभाग्य जीवित है। आपके लिए मुकुट जीवित है, बड़प्पन जीवित है, आप उस बड़प्पन को उठा लेना। आज आपसे तीसरी बात यह कहनी थी कि नालन्दा विश्वविद्यालय बनाने का हमने संकल्प लिया था कि एक लाख कार्यकर्ता हम देश को, समाज को, विश्व को देंगे। इस काम में आप लोग हमारी मदद कीजिए, और पन्द्रह-पन्द्रह दिन के लिए अपने यहाँ प्रज्ञा पाठशाला चलाने के लिए कोशिश कीजिए। हम वहाँ पढ़ाने के लिए तो नहीं आएँगे, पर अपनी शक्ति देंगे, अपनी बुद्धि देंगे, अपनी भावना देंगे, अपना प्राण देंगे, अपना जीवट देंगे—सब चीज देंगे, इसलिए जब आदमी जाएगा तो कुछ का कुछ होकर जाएगा।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

बुधवार, 18 अक्टूबर 2017

👉 देवत्व विकसित करें, कालनेमि न बनें (भाग 6)

🔴 यह तो नमूने के लिए बता रहा हूँ। उसकी ऐसी भविष्यवाणियाँ कवितामय पुस्तक में लिपिबद्ध हैं, जिसे फ्रान्स के राष्ट्रपति मितरॉ सिरहाने रखकर सोया करते हैं। उस कवितामय पुस्तक पर हजारों आदमियों ने टिप्पणियाँ की हैं। उसी में से एक आप अखण्ड-ज्योति अगले अंक में पढ़ेंगे, जो उसने हिन्दुस्तान के बारे में की है। उसकी भविष्यवाणी है कि हिन्दुस्तान का अध्यात्म और पाश्चात्य का तत्व-विज्ञान यह दोनों आपस में मिल जाएँगे, पाश्चात्य भौतिक विज्ञान और अध्यात्म मिल जाएँगे, रूस और हिन्दुस्तान मिल जाएँगे, चीन से अमेरिका की लड़ाई हो जाएगी, आदि-आदि बहुत-सी भविष्यवाणियाँ हैं।
      
🔵 उन बहुत-सी भविष्यवाणियों में से आपके काम की एक ही है कि हिन्दुस्तान सारी दुनिया का नेतृत्व करेगा, जैसा कि आजकल अमेरिका कर रहा है। चाहे वह बम बनाए, चैलेंजर बनाए, स्टारवार की योजना बनाए, किन्तु बाद का नेतृत्व भारत करेगा। हिन्दुस्तान को सारी दुनिया का नेतृत्व करने के लिए बड़े कर्मठ व्यक्ति चाहिए, बड़े शक्तिशाली और क्षमता सम्पन्न व्यक्ति चाहिए, बड़े लड़ाकू योद्धा चाहिए, बड़े इंजीनियर चाहिए, बड़े-बड़े समर्थ आदमी चाहिए और वही मैं तलाश कर रहा हूँ। बेटे, तुममें योग्यता नहीं है तो तुम्हें योग्यता हम देंगे। तुम्हारी खेती-बाड़ी को ही नहीं सँभालूँगा, वरन् योग्यता भी दूँगा, ताकि तुम संसार का नेतृत्व कर सको।

🔴 नालन्दा विश्वविद्यालय के तरीके से हमने यहाँ नेता बनाने का एक विद्यालय बनाया है। नालन्दा विश्वविद्यालय में चाणक्य जहाँ पढ़ाता था, उसमें दस हजार विद्यार्थी पढ़ते थे एक साथ। हमारी भी इच्छा है कि हम दस हजार विद्यार्थी एक साथ पढ़ाएँ, पर यहाँ इतने विद्यार्थियों के लिए जगह नहीं है। अभी यहाँ कल तक साढ़े अट्ठाइस सौ आदमी थे, आज चार हजार से अधिक व्यक्ति नहीं आ सकते, जबकि हमारा मन है कि जिस तरीके से चाणक्य दस हजार आदमियों को पढ़ाता था और पढ़ाकर के हिन्दुस्तान से लेकर सारे विश्व में अपने आदमी भेजता था। चन्द्रगुप्त को उसने चक्रवर्ती राजा बनाया था। हमारी भी इच्छा है कि ऐसे-ऐसे नेता बनाएँ, पर बना नहीं सकते, क्योंकि जगह हमारे पास कम है। ऐसे में पढ़ा नहीं सकते, तो फिर क्या योजना है?
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 आस्तिक बनो (भाग 2)

🔴 बुरा काम करने वाला पहले यह भली प्रकार देखता है कि मुझे देखने वाला या पकड़ने वाला तो कोई यहाँ नहीं है। जब वह भली-भाँति विश्वास कर लेता है कि उसका पाप कर्म किसी भी दृष्टि या पकड़ में नहीं आ रहा है तभी वह अपने काम में हाथ डालता है। इसी प्रकार जो व्यक्ति अपने का परमात्मा की दृष्टि या पकड़ से बाहर मानते हैं वे ही दुष्कर्म करने को उद्यत हो सकते हैं। पाप कर्म करने का स्पष्ट अर्थ यह है कि यह व्यक्ति ईश्वर का मानने का दंभ भले ही करता हो पर वास्तव में वह परमात्मा के आस्तित्व से इनकार करता है। उसके मन को इस बात पर भरोसा नहीं है कि परमात्मा यहाँ मौजूद है।

🔵 यदि विश्वास होता तो इतने बड़े हाकिम के सामने किस प्रकार उसके कानूनों का तोड़ने का साहस करता है। जो व्यक्ति एक पुलिस के चपरासी को देखकर भय से थर-थर कापा करते हैं वे लोग इतने दुस्साहसी नहीं हो सकते कि परमात्मा जैसे सृष्टि के सर्वोच्च अफसर की आँखों के आगे, न करने योग्य काम करें, उसके कानून को तोड़े, उसको क्रुद्ध बनावें, उसका अपमान करें। ऐसा दुस्साहस तो सिर्फ वही कर सकता है जो यह समझता हो कि ‘परमात्मा’ कहने, सुनने भर की चीज है। वह पोथी पत्रों में मन्दिर मठों में नदी, तालाबों में या कहीं स्वर्ग नरक में भले ही रहना चाहेगा, पर हर जगह वह नहीं है। मैं उसकी दृष्टि और अकड़ से बाहर हूँ।

🔴 जो लोग परमात्मा की सर्व व्यापकता पर विश्वास नहीं करते, वे ही नास्तिक है। जो प्रकट या अप्रकट रूप से दुष्कर्म करने का साहस कर सकते हैं वे ही नास्तिक हैं। इन नास्तिकों में कुछ तो भजन पूजा बिल्कुल नहीं करते, कुछ करते हैं। जो ही करते ही वे सोचते हैं व्यर्थ का झंझट मोल लेकर उसमें समय गंवाने से क्या फायदा? जो पूजन भजन करते हैं वे भीतर से तो न करने वालों के समान ही होते हैं पर व्यापार बुद्धि से रोजगार के रूप में ईश्वर की खाल ओढ़ लेते हैं। कितने ही लोग ईश्वर के नाम के बहाने ही अपने जीविका चलाते हैं हमारे देश में करीब 56 लाख आदमी ऐसे हैं जिनकी कमाई पेशा, रोजगार ईश्वर के नाम पर है।

🔵 यदि वे यह प्रकट करें कि हम ईश्वर को नहीं मानते तो उसी दिन उनकी ऐश आराम देने वाली बिना परिश्रम की कमाई हाथ से चली जायेगी। इसलिए इन्हें ईश्वर को उसी प्रकार ओढ़े रहना पड़ता है। जैसे जाड़े से बचने के लिए गर्मी देने वाले कम्बल को ओढ़े रहते हैं जैसे ही वह जरूरत पूरी हुई वैसे ही कम्बल को एक कोने में पटक देते हैं। यह तिजारती लोग जनता के समझ अपनी ईश्वर भक्ति का बड़ा भारी घटाटोप बाँधते हैं क्योंकि जितना बड़ा घटाटोप बाँध सकेंगे उतनी ही अधिक कमाई होगी। तिजारती उद्देश्य पूरा होते ही वे अपने असली रूप में आ जाते हैं। पापों से खुलकर खेलते हुए एकान्त में उन्हें जरा भी झिझक नहीं होती।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- दिसम्बर 1945 पृष्ठ 3

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1945/December/v1.3

👉 आज का सद्चिंतन 17 Oct 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 Oct 2017


मंगलवार, 17 अक्टूबर 2017

👉 रास्ते की बाधा....

🔴 बहुत पुराने समय की बात है एक राज्य के राजा ने अपने राज्य के मुख्य दरवार पर एक बड़ा सा पत्थर रखवा दिया इस पत्थर के रखवाने का मुख्य कारण था  राजा अपने राज्य के लोगों की परीक्षा लेना चाहता था राजा अपने राज्य के लोगों की सोच को परखना चाहता था। राजा उस पत्थर से कुछ दूरी पर छुपकर यह देखने लगा के आखिर इस पत्थर को कोई रास्ते से हटाएगा जा नहीं। बहुत सारे लोग वहां से गुजरे वो सभी उस पत्थर को हटाने की वजाय वो रास्ते में पत्थर रखने वाले को कोसते रहते और वहां से चले जाते। अब तक किसी ने भी उस पत्थर को हटाने का प्रयास तक नहीं किया था।

🔵 काफ़ी दिनों तक वो पत्थर वही पड़ा रहा अचानक एक दिन वहां से एक लकड़हारा गुजर रहा था उसके कंधे पर लकड़ियों की गठरी लदी हुई थी। रास्ते में पड़े पत्थर को देखते ही उसने लकड़ियों की गठरी को नीचे रख दिया उसने पत्थर को हटाने की कोशिश की परन्तु पत्थर तो काफ़ी भारा था उसने अपने पूरे ज़ोर से पत्थर को हटाने की कोशिश की परन्तु फिर भी उससे पत्थर हट नहीं रहा था। वो कुछ देर के लिए रुक गया परन्तु कुछ देर बाद उसने अपने पूरे जोश और ताकत के साथ उस पत्थर को एक किनारे पर खिसका दिया। जिस किनारे उसने पत्थर को खिसकाया था वहां पर एक छोटे से पत्थर के नीचे एक थैली रखी हुई थी जब उस लकड़हारे ने उस थैली को खोलकर देखा तो उसमें सोने के सिक्के थे और उसमें राजा का लिखा हुआ एक पत्र था उस पत्र में लिखा था “यह सभी सोने के सिक्के इस पत्थर को हटाने वाले को इनाम के रूप में हैं।

🔴 सोने के सिक्के पाकर वो लकडहारा बहुत ख़ुश था और वो ख़ुशी -ख़ुशी वहां से चला गया।

🔵 मित्रो इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है के हम में से ज्यादातर लोग जिन्दगी में आने वाली छोटी -छोटी बाधायों से घबरा जाते हैं और उन्हें दूर करने का प्रयास तक नहीं करते और उस परेशानी का दोष हम दूसरों पर निकालने लगते हैं जैसा के इस कहानी में हुआ दोस्तों मुश्किल कितनी भी बढ़ी क्यों ना हो हमें कभी हार नहीं माननी चाहिए देखना फिर यह बाधाएं कैसे दूर हो जाती हैं और हमारे मार्ग में आने वाली हर मुश्किल या बाधा हमें आगे बढ़ने का अवसर देती हैं।

👉 देवत्व विकसित करें, कालनेमि न बनें (भाग 5)

🔴 दूसरा वह जिसमें हम आपको संसार का नेता बनाना चाहते हैं। हमको भगवान ने नेता बनाकर भेजा है। चाणक्य को नेता बनाकर भेजा था। वह नालन्दा विश्वविद्यालय के डीन थे। अब्राहम लिंकन को, जार्ज वाशिंगटन को, गारफील्ड को नेता बनाकर भेजा था। विनोबा को नेता बनाकर भेजा था। हम भी आपमें से हर एक आदमी को नेता बनाना चाहते हैं, नेता बनाने की हमारी इच्छा है। आपकी इच्छाएँ क्या हैं, यह हमको मालूम हो या न हो तो आप लिखकर दे जाना। हमारा एक क्रम है। जब हम बैठते हैं तब देख लेते हैं। रात में हमारा क्रम पूजा-उपासना का रहता है। सबेरे से लेकर दोपहर तक हम अपना लेख लिखते हैं ताकि अखण्ड ज्योति बीस साल तक बराबर निकलती रहे। बीस साल के लिए लेख और जो पुस्तकें लिखनी हैं, वह हम सब लिखकर रख जाएँगे।
     
🔵 जब यह युगसन्धि समाप्त होगी और सन् २००० आएगा, उस वक्त तक आप यह अनुभव करेंगे कि गुरुजी जो लिखकर गए थे, उनकी लेखनी में कोई फर्क नहीं आया, उनके अक्षरों में कोई फर्क नहीं आया। उनकी पुस्तकों में, पत्रिकाओं में कोई फर्क नहीं आया। मिशन में कोई फर्क नहीं आया है और न ही आएगा। दोपहर बाद तो अब हमने मिलना भी शुरू कर दिया है। पाँच-पच्चीस आदमी को ऊपर बुला भी लेते हैं। यह हमारा दोपहर से शाम तक का क्रम है। इस तरीके से कभी आएँगे तो जब किसी को बहुत जरूरी काम हो तो मिल लेना। सांसारिक कठिनाइयाँ हों तो माताजी से कहिएगा। कोई आध्यात्मिक बात हो या कुछ ऊँचा उठना हो तो हमारे पास आवें। हम आपके बड़े कदम उठाने में मदद करेंगे। हमने इस दुनिया में बड़े कदम उठाए हैं और बड़े कदम उठाने के लिए आपसे भी कहते हैं। दो बातें हो गई है आप ध्यान रखना।

🔴 एक और बात मैं अपने सबूत में आपके बताता हूँ जो विश्व के एक बहुत बड़े भविष्यवक्ता ने सैकड़ों वर्ष पूर्व कही थी। संसार में ऐसे भविष्यवक्ता तो बहुत-से हैं जो हाथ देखकर यह बताते हैं कि तेरा विवाह कब हो आएगा, पैसा कब आएगा, कब क्या हो जाएगा? इसी तरह जन्मपत्री बनाने वाले बहुत-से लोग हैं, किन्तु दुनिया में एक ऐसा व्यक्ति भी हुआ है, जिसने सारे संसार की राजनीति के बारे में लिखा है। जिसमें से आठ सौ भविष्यवाणियाँ सही हो चुकी हैं। एक हजार वर्ष पहले हुआ था, वह था—नोस्ट्राडेमस। उसने ऐसी भविष्यवाणियाँ की थीं, जो एको-एक सौ फीसदी सही हो जाती थीं। ब्रिटेन का तब नामोनिशान नहीं था, जब नोस्ट्राडेमस पैदा हुआ था। स्काटलैण्ड था, आयरलैण्ड था, इंग्लैण्ड था, पर ब्रिटेन नहीं था, लेकिन उसमें लिखा था कि ब्रिटेन बनेगा, इतने दिनों तक राज्य करेगा और सन् १८४२ में इसका सिराजा बिखर जाएगा और अब जितना भी उसका राज्यमण्डल है सब खत्म हो जाएगा। वह सब एक-एक अक्षर सही हुआ।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 आस्तिक बनो (भाग 1)

🔴 परमात्मा सर्वत्र व्यापक है, इस सत्य को जानते तो अनेक लोग हैं पर उसे मानते नहीं। व्यवहार में नहीं लाते। जो परमात्मा को सर्वव्यापी, घट-घट वासी मानेगा, उसका जीवन उसी क्षण पूर्ण पवित्र, निष्पाप और कषाय-कल्मषों से रहित हो जायेगा। गीता में भगवान ने कहा है कि जो मेरी शरण में आता है, जो मुझे अनन्य भाव से भजता है वह तुरन्त ही पापों से छूट जाता है निःसंदेह बात ऐसी ही है। भगवान की शरण में जाने वाला, उस पर सच्चा विश्वास करने वाला, उस पर पूर्ण आस्था रखने वाला, एक प्रकार से जीवन मुक्त ही हो जाता है।

🔵 ईश्वर का विश्वास और सच्चा जीवन एक ही वस्तु के दो नाम हैं। जो भगवान का भक्त है, जिसने तब छोड़ कर प्रभु के चरणों में आत्म समर्पण कर गया है। जो परमात्मा की उपासना करता है उसे जगत-पिता की सर्व व्यापकता पर आस्था जरूर होनी चाहिए। यदि वह विश्वास दृढ़ हो जाय कि भगवान जर्रे-जर्रे में समाया हुआ है, हर जगह मौजूद है तो पाप कर्म करने का साहस ही नहीं हो सकता। ऐसा कौन सा चोर है जो सावधान खड़ी हुई सशस्त्र पुलिस के सामने चोरी करने का साहस करे, चोरी, व्यभिचार, ठगी, धूर्तता, दंभ, असत्य, हिंसा आदि के लिए आड़ की, पर्दे की, दुराव की जरूरत पड़ती है।

🔴 जहाँ मौका होता है इन बुरे कामों को पकड़ने वाला नहीं होता, वहीं इनका किया जाना संभव है। जहाँ धूर्तता की भली प्रकार समझने वालों देखने वाले और पकड़ने वाले लोगों की मजबूत ताकत सामने खड़ी होती है। वहाँ पाप कर्मों का हो सकना संभव नहीं। इसी प्रकार जो इस बात पर सच्चे मन से विश्वास करता है कि परमात्मा सब जगह मौजूद है वह किसी भी दुष्कर्म के करने का साहस नहीं कर सकता।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- दिसम्बर 1945 पृष्ठ 3
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1945/December/v1.3

👉 आज का सद्चिंतन 16 Oct 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 17 Oct 2017


👉 जो जाग्रत है, वह नियम के बाहर है

🔴 बुद्ध के जीवन की बड़ी मीठी कथा है। जब उनका जन्म हुआ, तो ज्योतिषियों ने कहा कि यह व्यक्ति या तो सम्राट होगा या संन्यासी होगा। सब लक्षण सम्राट के थे। फिर बुद्ध तो भिक्षु हो गए, संन्यासी हो गए। और सम्राट साधारण नहीं, चक्रवर्ती सम्राट होगा, सारी पृथ्वी का सम्राट होगा।

🔵 बुद्ध एक नदी के पास से गुजर रहे हैं, निरंजना नदी के पास से गुजर रहे हैं। रेत पर उनके चिह्न बन गए, गीली रेत है, तट पर उनके पैर के चिह्न बन गए। एक ज्योतिषी काशी से लौट रहा था। अभी-अभी ज्योतिष पढ़ा है। यह सुंदर पैर रेत पर देख कर उसने गौर से नजर डाली। पैर से जो चिह्न बन गया है नीचे, वह खबर देता है कि चक्रवर्ती सम्राट का पैर है। ज्योतिषी बहुत चिंतित हो गया। चक्रवर्ती सम्राट का अगर यह पैर हो, तो यह साधारण सी नदी के रेत पर चक्रवर्ती चलने क्यों आया? और वह भी नंगे पैर चलेगा कि उसके पैर का चिह्न रेत पर बन जाए! बड़ी मुश्किल में पड़ गया। सारा ज्योतिष पहले ही कदम पर व्यर्थ होता मालूम पड़ा। अभी-अभी लौटा था निष्णात होकर ज्योतिष में। अपनी पोथी, अपना शास्त्र साथ लिए हुए था। सोचा, इसको नदी में डुबा कर अपने घर लौट जाऊं, क्योंकि अगर इस पैर का आदमी इस रेत पर भरी दुपहरी में चल रहा है नंगे पैर–और इतने स्पष्ट लक्षण तो कभी युगों में किसी आदमी के पैर में होते हैं कि वह चक्रवर्ती सम्राट हो–तो सब हो गया व्यर्थ। अब किसी को ज्योतिष के आधार पर कुछ कहना उचित नहीं है।

🔴 लेकिन इसके पहले कि वह अपने शास्त्र फेंके, उसने सोचा, जरा देख भी तो लूं, चल कर इन पैरों के सहारे, वह आदमी कहां है। उसकी शक्ल भी तो देख लूं। यह चक्रवर्ती है कौन, जो पैदल चल रहा है! तो उन पैरों के सहारे वह गया। एक वृक्ष की छाया में बुद्ध विश्राम कर रहे थे। और भी मुश्किल में पड़ गया, क्योंकि चेहरा भी चक्रवर्ती का था, माथे पर निशान भी चक्रवर्ती के थे। बुद्ध की आंखें बंद थीं, उनके दोनों हाथ उनकी पालथी में रखे थे; हाथ पर नजर डाली, हाथ भी चक्रवर्ती का था। यह देह, यह सब ढंग चक्रवर्तियों का, और आदमी भिखारी था, भिक्षा का पात्र रखे, वृक्ष के नीचे बैठा था, भरी दुपहरी में अकेला था।

🔵 हिला कर बुद्ध को उसने कहा कि महानुभाव, मेरी वर्षों की मेहनत व्यर्थ किए दे रहे हैं, सब शास्त्र नदी में फेंक दूं, या क्या करूं? मैं काशी से वर्षों से मेहनत करके, ज्योतिष को सीख करके लौट रहा हूं। और तुममें जैसे पूरे लक्षण प्रगट हुए हैं, ऐसे सिर्फ उदाहरण मिलते हैं ज्योतिष के शास्त्रों में। आदमी तो कभी-कभी हजारों-लाखों साल में ऐसा मिलता है। और पहले ही कदम पर तुमने मुझे मुश्किल में डाल दिया। तुम्हें होना चाहिए चक्रवर्ती सम्राट और तुम यह भिक्षापात्र रखे इस वृक्ष के नीचे क्या कर रहे हो?

🔴 तो बुद्ध ने कहा कि शास्त्रों को फेंकने की जरूरत नहीं है, तुझे ऐसा आदमी दुबारा जीवन में नहीं मिलेगा। जल्दी मत कर, तुझे जो लोग मिलेंगे, उन पर तेरा ज्योतिष काम करेगा। तू संयोग से, दुर्घटनावश ऐसे आदमी से मिल गया है, जो भाग्य की सीमा के बाहर हो गया है। लक्षण बिलकुल ठीक कहते हैं। जब मैं पैदा हुआ था, तब यही होने की संभावना थी। अगर मैं बंधा हुआ चलता प्रकृति के नियम से तो यही हो जाता। तू चिंता में मत पड़, तुझे बहुत बुद्ध-पुरुष नहीं मिलेंगे जो तेरे नियमों को तोड़ दें। और जो अबुद्ध है, वह नियम के भीतर है। और जो अजाग्रत है, वह प्रकृति के बने हुए नियम के भीतर है। जो जाग्रत है, वह नियम के बाहर है।

सोमवार, 16 अक्टूबर 2017

👉 देवत्व विकसित करें, कालनेमि न बनें (भाग 4)

🔴 श्रीकृष्ण ने अर्जुन का रथ चलाया था, आपका रथ हम चलाएँगे। काहे का रथ? आपके कारोबार का रथ, आपके व्यापार का रथ? आपके धन्धे का रथ, आपके शरीर का रथ, आपकी गृहस्थी का रथ-यह सब हम चलायेंगे, इसका हम वायदा करते हैं, लेकिन साथ-साथ आपसे यह निवेदन भी करते हैं कि आप हमारे रास्ते पर आइए, साथ-साथ चलिए। हमारे कन्धे से कन्धा मिलाइए। इसमें आपको कोई नुकसान नहीं होगा। आप यह यकीन रखिए हमने उन विरोधियों को मारकर रखा है और विजय की माला आपके लिए गूँथकर रखी है। पाँचों पाण्डवों के लिए विजय की मालाएँ बनी हुई रखी थीं। आपको पहनना है, आपको श्रेय भर लेना है।
    
🔵 यह जो नवयुग का क्रम चल रहा है, उसमें जब आप भागीदार होंगे तो श्रेय आपको ही मिलेगा। आप पूछें-गुरुजी हमारे बीबी-बच्चों का क्या होगा? बेटे, उनकी जिम्मेदारी हमारी है। यदि वे बीमार रहते हैं तो हम उनकी बीमारियाँ दूर कर देंगे। व्यापार में नुकसान होता है तो तेरे उस नुकसान को पूरा करना हमारी जिम्मेदारी है। तेरे व्यापार में जो घाटा पड़ जाए तो तू हमसे वसूल ले जाना। लेकिन जब बच्चा बड़ा हो जाता है, तब कुछ बड़ी चीज दी जाती है जो छोटे बच्चे को नहीं दी जा सकती। अब आप जवान हो गए हैं। अब हम सबको काम-धन्धे से लगाएँगे और जो हमारे पास बाकी बचा है वह भी आप सबको बाँट देंगे। नहीं गुरुजी, जब आप जाएँगे तब अपनी कमाई भी अपने संग ले जाएँगे? बेटे, हम ऐसा नहीं करेंगे। हम आपको देकर जाएँगे। चाहे वह पुण्य की कमाई हो, चाहे वह सांसारिक कमाई हो, चाहे आध्यात्मिक कमाई हो। उस कमाई में तुम्हारा हिस्सा है।

🔴 साथियो ! हमने जीवन भर दिया है। बाप-दादों की दो हजार बीघे जमीन थी, वह हम दे आए और स्त्री के पास जेवर था, वह भी हम दान में दे आए। बच्चों की गुल्लक में पैसे थे वह भी हम दे आए। अब आपके पास कुछ और धन है? नहीं बेटे, धन के नाम पर एक कानी कौड़ी का लाखवाँ हिस्सा भी हमारे पास नहीं है। आपको तलाशी लेना हो या मरने के बाद पता लगाना हो कि गुरुजी के पास क्या मिला, तो मालूम पड़ेगा कि शान्तिकुञ्ज में एक ऋषि रहा करता था और यहाँ की रोटी खाया करता था। बेटे, धन के नाम पर हमारे पास कुछ भी नहीं है, लेकिन हाँ एक पूँजी है हमारे पास, यदि वह न होती तो हम इतनी बड़ी बात क्यों कहते? हमारे पास वह पूँजी है तप की, जिसको हम सामान्य क्लास का कहते हैं। जिससे हम आपकी मुसीबतों में, कठिनाइयों में सहायता कर सकते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 सौभाग्य भरे क्षणों को तिरस्कृत न करें

🔴 ईश्वर ने मनुष्य को एक साथ इकट्ठा जीवन न देकर उसे अलग−अलग क्षणों में टुकड़े−टुकड़े करके दिया है। नया क्षण देने से पूर्व वह पुराना वापिस ले लेता है और देखता है कि उसका किस प्रकार उपयोग किया गया। इस कसौटी पर हमारी पात्रता कसने के बाद ही वह हमें अधिक मूल्यवान क्षणों का उपहार प्रदान करता है।।

🔵 समय ही जीवन है। उसका प्रत्येक क्षण बहुमूल्य है। वे हमारे सामने ऐसे ही खाली हाथ नहीं आते वरन् अपनी पीठ कीमती उपहार लादे होते हैं। यदि उनकी उपेक्षा की जाय तो निराश होकर वापिस लौट जाते है किन्तु यदि उनका स्वागत किया जाय तो उन मूल्यवान संपदाओं को देकर ही जाते है किन्तु यदि ईश्वर ने अपने परम प्रिय राजकुमार के लिए भेजी है।

🔴 जीवन का हर प्रभात सच्चे मित्र की तरह नित नये अनुदान लेकर आता है। वह चाहता है उस दिन का शृंगार करने में इस अनुदान के किये गये सदुपयोग को देख कर प्रसन्नता व्यक्त करें।

🔵 उपेक्षा और तिरस्कार पूर्वक लौटा दिये गये जीवन के क्षण−घटक दुखी होकर वापिस लौटते हैं। आलस्य और प्रमाद में पड़ा हुआ मनुष्य यह देख ही नहीं पाता कि उसके सौभाग्य का सूर्य दरवाजे पर दिन आता है और कपाट बन्द देख कर निराश वापिस लौट जाता है।

🌹 रवीन्द्रनाथ टैगोर
🌹 अखण्ड ज्योति- अप्रैल 1974 पृष्ठ 1

👉 आज का सद्चिंतन 16 Oct 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 16 Oct 2017


👉 क्रोध से बचिये:-

🔴 विश्वामित्र का महर्षि वशिष्ठ से झगड़ा था। विश्वामित्र बहुत विद्वान थे। बहुत तप उन्होंने किया। पहले महाराजा थे, फिर साधु हो गये। वशिष्ठ सदा उनको राजर्षि कहते थे।

🔵 विश्वामित्र कहते थे, "मैंने ब्राह्मणों जैसे सभी कर्म किये हैं, मुझे ब्रह्मर्षि कहो।"

🔴 वसिष्ठ मानते नहीं थे; कहते थे, "तुम्हारे अंदर क्रोध बहुत है, तुम राजर्षि हो।"

🔵 यह क्रोध बहुत बुरी बला है। सवा करोड़ नहीं, सवा अरब गायत्री का जाप कर लें, एक बार का क्रोध इसके सारे फल को नष्ट कर देता है।

🔴 विश्वामित्र वास्तव में बहुत क्रोधी थे। क्रोध में उन्होंने सोचा,'मैं इस वसिष्ठ को मार डालूँगा, फिर मुझे महर्षि की जगह राजर्षि कहने वाला कोई रहेगा नहीं।'

🔵 ऐसा सोचकर एक छुरा लेकर, वे उस वृक्ष पर जा बैठे जिसके नीचे बैठकर महर्षि वसिष्ठ अपने शिष्यों को पढ़ाते थे। शिष्य आये; वृक्ष के नीचे बैठ गये। वसिष्ठ आये; अपने आसन पर विराजमान हो गये। शाम हो गई। पूर्व के आकाश में पूर्णमासी का चाँद निकल आया।

🔴 विश्वामित्र सोच रहे थे,'अभी सब विद्यार्थी चले जाएँगे, अभी वसिष्ठ अकेले रह जायेंगे, अभी मैं नीचे कूदूँगा, एक ही वार में अपने शत्रु का अन्त कर दूँगा।'

🔵 तभी एक विद्यार्थी ने नये निकले हुए चाँद की और देखकर कहा,"कितना मधुर चाँद है वह ! कितनी सुन्दरता है !"

🔴 वसिष्ठ ने चाँद की और देखा ; बोले, "यदि तुम ऋषि विश्वामित्र को देखो तो इस चांद को भूल जाओ। यह चाँद सुन्दर अवश्य है परन्तु ऋषि विश्वामित्र इससे भी अधिक सुन्दर हैं। यदि उनके अंदर क्रोध का कलंक न हो तो वे सूर्य की भाँति चमक उठें।

🔵 "विद्यार्थी ने कहा,"महाराज ! वे तो आपके शत्रु हैं। स्थान-स्थान पर आपकी निन्दा करते हैं।"

🔴 वसिष्ठ बोले, "मैं जानता हूँ,मैं यह भी जानता हूँ कि वे मुझसे अधिक विद्वान् हैं, मुझसे अधिक तप उन्होंने किया है, मुझसे अधिक महान हैं वे, मेरा माथा उनके चरणों में झुकता है।"

🔵 वृक्ष पर बैठे विश्वामित्र इस बात को सुनकर चौंक पड़े। वे बैठे थे इसलिए कि वसिष्ठ को मार डालें और वसिष्ठ थे कि उनकी प्रशंसा करते नहीं थकते थे। एकदम वे नीचे कूद पड़े, छुरे को एक ओर फेंक दिया, वसिष्ठ के चरणों में गिरकर बोले, "मुझे क्षमा करो !"

🔴 वसिष्ठ प्यार से उन्हें उठाकर बोले, "उठो ब्रह्मर्षि !"

🔵 विश्मामित्र ने आश्चर्य से कहा, "ब्रह्मर्षि? आपने मुझे ब्रह्मर्षि कहा? परन्तु आप तो ये मानते नहीं हैं?"

🔴 वसिष्ठ बोले,"आज से तुम ब्रह्मर्षि हुए। महापुरुष! तुम्हारे अन्दर जो चाण्डाल (क्रोध) था, वह निकल गया।"

रविवार, 15 अक्टूबर 2017

👉 देवत्व विकसित करें, कालनेमि न बनें (भाग 3)

🔴 साथियो ! आज गुरुपूर्णिमा का दिन है, आप में से हर एक आदमी की, देवता की जिम्मेदारी हम उठाते हैं। देवता जब रीछ-बन्दर बनकर चले आए थे तो पीछे उनके घर बीवी-बच्चे रह गए थे, कुटुम्ब रह गया था, उन सबको भगवान ने सँभाला था। आपके घर को सँभालने की, व्यापार को सँभालने की, खेती-बाड़ी को सँभालने की, हारी-बीमारी को सँभालने की जिम्मेदारी हमारी है और यह सब जिम्मेदारियाँ हम उठाते हैं। आप हमारा काम कीजिए हम आपका काम करेंगे। हम आपको यकीन दिलाते हैं, आप हमारा विश्वास कीजिए हम आपका काम जरूर करेंगे। पिता ने बच्चे का हर काम किया है। पिता से बच्चे ने जब जो माँगा है, दिया है।
   
🔵 जब टॉफी माँगी टॉफी दी है, झुनझुना माँगा तो झुनझुना दिया है। तुम तो छोटे बच्चे हो, इसलिए यही माँगते रहते हो। अब आगे से जो भी कहना हो बेटे लिखकर दे जाना। लिखना और कहना बराबर है और फिर हमारा जवाब सुनते जाना और नोट करके ले जाना कि गुरुजी ने यह वायदा किया है कि चौबीस पुरश्चरणों का जो पुण्य पहले कमाया था उसका और अब हमको तीन साल हो गए हैं, एकान्त मौन रहकर साधना की है, उसकी पुण्य-सम्पदा जो हमारे पास जमा है, उसमें आपका हिस्सा बराबर है। माँ के पेट में जब बच्चा आता है, तब कानूनन उसका हक बाप की जायदाद पर हो जाता है।

🔴 इसी तरह हमारी कमाई पर आपका हक है। प्रार्थना मत कीजिए, निवेदन मत कीजिए, मनुहार मत कीजिए, वरदान मत माँगिए। आप अपना हक माँगिए, हम आपका काम करते हैं और आपको हक चुकाना पड़ेगा। आप बीमार रहते हैं तो हम आपकी बीमारी को अच्छा करेंगे। आप पैसे की तंगी में आ गए हैं तो हम उस तंगी को भी दूर करेंगे। आप लड़ाई-झगड़े में फँस गए हैं तो हम उसमें भी आपकी मदद करेंगे। आप पर मुसीबत आ गई है तो आपकी ढाल बनकर उस मुसीबत को रोकेंगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 आज का सद्चिंतन 15 Oct 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 15 Oct 2017


शनिवार, 14 अक्टूबर 2017

👉 अनीति से हानि

🔴 गौरा ग्राम में एक देवतादीन नामक ब्राह्मण रहते थे। वे बचपन में तो बहुत ही दरिद्र घर में उत्पन्न हुए थे। पर जब बड़े हुए तो लेन-देन के व्यापार में रुपये वाले हो गये। जिस गरीब भाई को एक रुपया भी कर्ज में दे आते, तो उसका बीसों वर्ष तक पीछा नहीं छोड़ते। उस रुपये का सूद बढ़ा कर उसको गड़बड़ी में डाल देते और बदले में बेगार करवाते, हल जोतवाते, उनके बच्चों से पशु चरवाते इसी प्रकार आस पास के गाँवों में प्रायः करके दीन-दरिद्र लोगों को ही अपना ऋणी बनाते, जिससे कि उनके साथ वंचकता करने में कुछ भी कठिनाई नहीं पड़ती थी। इस व्यवसाय के द्वारा बहुतों का तो घर छीन लिया, अनेकों की डिगरी करा कर माल व बगिया ले लिये, बहुतों के खेतपात लेकर निहत्था कर दिया। इसी प्रकार कुछ वैभव बढ़ जाने पर गाँव के मुखिया बन बैठे। अब इनके यहाँ पुलिस और रियासत के हाकिमों की सगे रिश्तेदारों की सी सेवा-सुश्रूषा होने लगा। इससे इनका शासन दीन-दुखियों पर और भी अधिक बढ़ गया। जिसको चाहते उस को निरपराध ही पकड़वा कर मनमाना अत्याचार करते।

🔵 परमात्मा अनीति को अधिक नहीं बढ़ने देता। पूर्व सुकर्मों का फल समाप्त होते ही करनी आगे आने लगी। तीन साल तक लगातार प्रति वर्ष अग्नि-काण्ड होते रहे, जिससे बहुत सम्पत्ति स्वाहा हुई। अठारह वर्ष का विवाहित लड़का चिरस्थायी राजरोग का शिकार बना, जिस पर बहुत धन व्यय हुआ। दूसरा लड़का 12 वर्ष का था, उसकी झूला पर से गिरने के कारण जीभ कट गई। देवतादीन को आम वात ने घेरा, एक वर्ष तक चारपाई सेवन करके काल के गाल में चले गये। कुछ ही दिन बाद बड़ा लड़का जो राजरोग से पीड़ित था, मर गया। तत्पश्चात् छोटा लड़का भी संप्रहणी रोग से पीड़ित होकर पंचत्वगामी हो गया।

🔴 सम्प्रति उनके घर की यह हालत है कि जिन चौपालों में बैठ कर वे मित्रों के साथ माँ बाप मदिरा का पान करते थे वेश्याएं नचाते थे उन की दीवारें गिरी हुई पड़ी हैं। जिस द्वार पर नौबत बजती थी, वहाँ पर अब कुत्तों के चबाने से बचे हुए हाड़ दृष्टिगोचर हो रहे हैं। घर की औरतें फटे पुराने कपड़े पहन कर मजदूरी का काम करने जाती है।

🔵 ऐसी घटनायें ढूँढ़ने पर हर जगह मिल सकती हैं, पर वैभव के मद में अंधे हुए मनुष्य उस ओर से आंखें बन्द कर के अन्याय का मार्ग ही पकड़े रहते हैं और अपने स्वार्थ के लिए दूसरों के गले पर छुरी चलाते रहते हैं। यदि यह लोग अनीति से होने वाले हानिकर परिणामों पर सोचें, तो निस्सन्देह उन्हें अपना हाथ रोकना पड़ेगा।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 April 2026

Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें। ➨ YouTube:  https://yugrishi-erp....