सोमवार, 9 अक्टूबर 2017

👉 दुनियाँ बदलने के लिए खुद को बदलिये

🔴 एक बार की बात है किसी दूर राज्य में राजा शासन करता था। उसके राज्य में सारी प्रजा बहुत संपन्न थी किसी को कोई भी दुःख नहीं था ना ही किसी का कोई ऋण था। राजा के पास भी खजाने की कमी नहीं थी वह बहुत वैभवशाली जीवन जीता था।

🔵 एक बार राजा के मन में ख्याल आया कि क्यों ना अपने राज्य का निरिक्षण किया जाये, देखा जाये कि राज्य में क्या चल रहा है और लोग कैसे रह रहे हैं। तो राजा ने कुछ सोचकर निश्चय किया कि वह बिना किसी वाहन के पैदल ही भेष राज्य में घूमेगा जिससे वो लोगों की बातें सुन सके और उनके विचार जान सके । फिर अगले दिन से ही राजा भेष बदल कर अकेला ही राज्य में घूमने निकल गया उसे कहीं कोई दुखी व्यक्ति दिखाई नहीं दिया फिर धीरे धीरे उसने अपने कई किलों और भवनों का निरिक्षण भी किया।

🔴 जब राजा वापस लौटा तो वह खुश था कि उसका राज्य संपन्न है लेकिन अब उसके पैरों में बहुत दर्द था क्योंकी ये पहला मौका था जब राजा इतना ज्यादा पैदल चला हो । उसने तुरंत अपने मंत्री को बुलाया और कहा – राज्य में सड़के इतने कठोर पत्थर की क्यों बनाई हुई हैं देखो मेरे पैरों में घाव हो गए हैं, मैं इसी वक्त आदेश देता हूँ कि पुरे राज्य में सड़कों पे चमड़ा बिछवा दिया जाये जिससे चलने में कोई दिक्कत नहीं होगी। मंत्री यह सुनते की सन्न रह गया, बोला – महाराज इतना सारा चमड़ा कहाँ से आएगा और इतने चमड़े के लिए ना जाने कितने जानवरों की हत्या करनी पड़ेगी और पैसा भी बहुत लगेगा। राजा को लगा कि मंत्री उसकी बात ना मान कर उसका अपमान कर रहा है, इस पर राजा ने कहा- आपको जो आदेश दिया गया उसका पालन करो देखो मेरे पैरों में पत्थर की सड़क पे चलने से कितना दर्द हो रहा है।

🔵 मंत्री बहुत बुद्धिमान था, मंत्री ने शांत स्वर में कहा – महाराज पुरे राज्य में सड़क पर चमड़ा बिछवाने से अच्छा है आप चमड़े के जूते क्यों नहीं खरीद लेते। मंत्री की बात सुनते ही राजा निशब्द सा होकर रह गया।

🔴 मित्रों इसी तरह हम रोज अपनी जिन्दगी में ना जाने कितनी परेशानियों को झेलते हैं और हम सारी परेशानियों के लिए हमेशा दूसरों को दोषी ठहराते हैं, कुछ लोगों को तो दुनिया की हर चीज़ और हर नियम में दोष दिखाई देता है। हम सोचते हैं कि फलां आदमी की वजह से आज मेरा वो काम बिगड़ गया या फलां व्यक्ति की वजह से मैं आज ऑफिस के लिए लेट हो गया या फलां व्यक्ति की वजह से मैं फेल हो गया, सड़क पर पड़े कूड़े को देखकर सभी लोग नाक पर रुमाल रखकर दूसरों को गलियां देते हुए निकल जाते हैं लेकिन कभी खुद सफाई के लिए आगे नहीं आ पाते वगैहरा वगैहरा।

🌹 लेकिन हम कभी खुद को सुधारने की कोशिश नहीं करते, कभी खुद परिवर्तन का हिस्सा बनने की कोशिश नहीं करते। मित्रों एक एक बूंद से घड़ा भरता है और आपका प्रयास एक बूंद ही सही लेकिन वो बूंद घड़ा भरने के लिए बहुत जरुरी है। दूसरों को दोष देना छोड़िये और खुद को बदलिये फिर देखिये दुनियाँ खुद बदल जाएगी।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 9 Oct 2017


👉 आज का सद्चिंतन 9 Oct 2017


👉 आत्मचिंतन के क्षण 8 Oct 2017

🔵 हराम की कमाई खाने वाले,भष्ट्राचारी बेईमान लोगों के विरुद्ध इतनी तीव्र प्रतिक्रिया उठानी होगी जिसके कारण उन्हें सड़क पर चलना और मुँह दिखाना कठिन हो जाये। जिधर से वे निकलें उधर से ही धिक्कार की आवाजें ही उन्हें सुननी पडें। समाज में उनका उठना-बैठना बन्द हो जाये और नाई, धोबी, दर्जी कोई उनके साथ किसी प्रकार का सहयोग करने के लिए तैयार न हों।

🔴 व्यक्तिगत, सामाजिक और राजनैतिक क्षेत्र में संव्याप्त अगणित दुष्प्रवृत्तियों के विरुद्ध व्यापक परिमाण में संघर्ष आरम्भ किया जाये। इसलिए हर नागरिक को अनाचार के विरुद्ध आरम्भ किये धर्म युद्ध में भाग लेने के लिए आह्वान करना होगा। किसी समय तलवार चलाने वाले और सिर काटने में अग्रणी लोगो को योध्धा कहा जाता था, अब माप दण्ड बदल गया। चारों ओर संव्याप्त आतंक और अनाचार के विरुध्ध संघर्ष में जो जितना साहस दिखा सके और चोट खा सके उसे उतना बड़ा बहादुर माना जायेगा। उस बहादुरी के ऊपर ही शोषण में विहीन समाज की स्थापना संभव हो सकेगी। दुर्बुध्धि से कुत्सा और कुण्ठा से लड सकने में जो लोग समर्थ होंगे उन्हीं का पुरुषार्थ पीड़ित मानवता को त्राण दे सकने का यश संचित कर सकेगा।

🔵 उपासना की निष्ठा को जीवन में हमने उसी तरीके से घोलकर रखा है जैसे एक पतिव्रता स्त्री अपने पति के प्रति निष्ठावान रहती है और कहती है- ‘सपनेहु आन पुरुष जग नाही।’ आपके पूजा की चौकी पर तो कितने बैठे हुए हैं। ऐसी निष्ठा होती है कोई? एक से श्रद्धा नहीं बनेगी क्या? मित्रो! हमारे भीतर श्रद्धा है। हमने एक पल्ला पकड़ लिया है और सारे जीवन भर उसी का पल्ला पकड़े रहेंगे। हमारा प्रियतम कितना अच्छा है। उससे अधिक रूपवान, सौंदर्यवान, दयालु और संपत्तिवान और कोई हो नहीं सकता। हमारा वही सब कुछ है, वही हमारा भगवान् है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पराया धन, धूलि समान

🔴 भक्त राँका बाँका अपनी स्त्री समेत भगवत् उपासना में लगे रहते है। वे दोनों जंगल से लकड़ी काट-काट अपना गुजारा करते है और भक्ति भावना में तल्लीन रहते हैं। अपने परिश्रम पर ही गुजर करना उनका व्रत था। दान या पराये धन को वे भक्ति मार्ग में बाधक मानते थे। रास्ते में मुहरों की थैली पड़ी मिली। वे पैर से उस पर मिट्टी डालने लगे। इतने में पीछे से उनकी स्त्री आ गई। उसने पूछा थैली को दबा क्यों रहे हैं? उनने उत्तर दिया मैंने सोचा तुम पीछे आ रही हो कही पराई चीज के प्रति तुम्हें लोभ न आ जाय इसलिये उसे दाब रहा था। स्त्री ने कहा- मेरे मन में सोने और मिट्टी में कोई अन्तर नहीं आप व्यर्थ ही यह कष्ट कर रहे थे। उस दिन सूखी लकड़ी न मिलने से उन्हें भूखा रहना पड़ा तो भी उनका मन पराई चीज पर विचलित न हुआ।

🔵 पराये धन को धूलि समान समझने वाले, अपने ही श्रम पर निर्भर करने वाले साधारण दीखने वाले भक्त भी उन लोगों से अनेक गुने श्रेष्ठ है जो सन्त महन्त का आडम्बर बनाकर पराये परिश्रम के धन से गुलछर्रे उड़ाते हैं।

🌹 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 Yudhishthir wins time

🔴 Once a Brahmin went to Yudhishthir and asked for donation. He was busy in his work so he asked the Brahmin to come the next day. This incident didn’t please Bhim much. He called some servant and asked them to play victorious music and he himself started playing an instrument. Hearing this Yudhishthir came running and asked the reason for the celebration. 

🔵 Bhim told him, “Maharaj, we are happy that you have conquered time so we are playing the instruments. Calling the Brahmin tomorrow means that you have control over time till tomorrow.” Yudhishthir understood his intent and said, “Really Bhim, we shouldn’t delay in doing good work.”

🌹 From Pragya Puran

👉 मनुज देवता बने, बने यह धरती स्वर्ग समान (अमृतवाणी भाग 5)

🔴 यहाँ देवता की प्रशंसा कर रहा हूँ। देवता कैसे होते हैं? देवता ऐसे होते हैं जो आदमी के ईमान में घुसे रहते हैं और उसके भीतर से एक ऐसी हूक, एक ऐसी उमंग और एक ऐसी तड़पन पैदा करते हैं जो सारे के सारे जाल-जंजालों को मकड़ी के जाले की तरीके से तोड़ती हुई सिद्धान्तों की ओर, आदर्शों की ओर बढ़ने के लिए आदमी को मजबूर कर देती है। इसे कहते हैं देवता का वरदान। इससे कम में देवता का वरदान नहीं हो सकता। आदमी के भीतर जब गुणों की, कर्मों की, स्वभाव की विशेषताएँ पैदा हो जाती हैं तो विश्वास रखिए तब उसकी उन्नति के दरवाजे खुल जाते हैं। गुणों के हिसाब से दुनिया के इतिहास में जितने भी आदमी आज तक विकसित हुए हैं, किसी भी क्षेत्र में सफल हुए हैं और जिनके सम्मान हुए हैं, वे प्रत्येक व्यक्ति गुणों के आधार पर बढ़े हैं।
   
🔵 देवता का वरदान गुण और चिन्तन की उत्कृष्टता है। संसार के महापुरुषों में से हर एक सफल व्यक्ति का इतिहास यही रहा है। सभी छोटे-छोटे खानदानों में पैदा हुए थे। छोटे-छोटे घरों में, परिस्थितियों में पैदा हुए थे, लेकिन उन्नति के ऊँचे शिखर पर, ऊँचे से ऊँचे स्थान पर जरूर पहुँचते चले गए ।। कौन जा पहुँचे? लालबहादुर शास्त्री को लीजिए, जिनके ऊपर देवता का अनुग्रह था। एक ही अनुग्रह की पहचान है—जिम्मेदार और समझदारी का होना। भक्त और भगवान के बीच में यही सिलसिला चला है। इनसान के यहाँ और भगवान के यहाँ एक ही तरीका है।

🔴 पूजा क्यों करते हैं? पूजा का मतलब एक ही है—इनसानी गुणों का विकास, इनसानी कर्म का विकास, इनसानी स्वभाव का विकास। आपने जो समझ रखा है कि पूजा के आधार पर यह मिलेगा, वह मिलेगा, यह सारी गलतफहमी इसलिए हुई है। पूजा के आधार पर वस्तुतः दयानतदारी मिलती है, शराफत मिलती है, ईमानदारी मिलती है। आदमी को ऊँचा दृष्टिकोण मिलता है। अगर आपने गलत पूजा की होगी, तब आप भटक रहे होंगे। पूजा आपको इस एक ही तरीके से करनी चाहिए कि जो पूजा के लाभ आज तक इतिहास में मनुष्यों को मिले हैं, हमको भी मिलने चाहिए। हमारे गुणों का विकास, कर्म का विकास, चरित्र का विकास और भावनाओं का विकास होना चाहिए। देवत्व इसी का नाम है।

🔵 देवत्व अगर आपके पास आएगा तो आपके पास सफलताएँ आवेंगी। हिन्दुस्तान के इतिहास पर दृष्टि डालिए, उसके पन्ने पर जो बेहतरीन आदमी दिखाई पड़ते हैं, वे अपनी योग्यता के आधार पर नहीं, अपनी विशेषता के आधार पर महान् बने हैं। महामना मालवीय जी का उदाहरण सुना है आपने, कैसे शानदार व्यक्ति थे वे। उन पर देवताओं का अनुग्रह बरसा था और छोटे आदमी से वे महान हो गए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 143)

🌹  इन दिनों हम यह करने में जुट रहे है

🔵 अब प्रश्न यह रहा है कि पाँच वीरभद्रों को काम क्या सौंपना पड़ेगा और किस प्रकार वे क्या करेंगे? उसका उत्तर भी अधिक जिज्ञासा रहने के कारण अब मिल गया। इससे निश्चिंतता भी हुई और प्रसन्नता भी।

🔴 संसार में आज भी ऐसी कितनी ही प्रतिभाएँ हैं, जो दिशा पलट जाने पर अभी जो कर रही हैं, उसकी तुलना में अत्यंत महत्त्वपूर्ण कार्य करने लगेंगी। उलटे को उलट कर सीधा करने के लिए जिस प्रचण्ड शक्ति की आवश्यकता होती है उसी को हमारे अंग-अंग वीरभद्र करने लगेंगे। प्रतिभाओं की सोचने की यदि दिशा बदली जा सके तो उनका परिवर्तन चमत्कारी जैसा हो सकता है।

🔵 नारद ने पार्वती, ध्रुव, प्रह्लाद, वाल्मीकि, सावित्री आदि की जीवन दिशा बदली, तो वे जिन परिस्थितियों में रह रहे थे। उसे लात मारकर दूसरी दिशा में चल पड़े और संसार के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण बन गए। भगवान् बुद्ध ने आनन्द, कुमार जीव, अंगुलिमाल, अंबपाली, अशोक, हर्षवर्धन, संघमित्रा आदि का मन बदल दिया तो वे जो कुछ कर रहे थे, उसके ठीक उलटा करने लगे और विश्व विख्यात हो गए। विश्वामित्र ने हरिश्चंद्र को एक मामूली राजा नहीं रहने दिया वरन् इतना वरेण्य बना दिया कि उनकी लीला अभिनय देखने मात्र से गाँधी जी विश्ववंद्य हो गए। महाकृपण भामाशाह को संत विठोबा ने अंतःप्रेरणा दी और उनका सारा धन महाराणा प्रताप के लिए उगलवा दिया। आद्य शंकराचार्य की प्रेरणा से मान्धाता ने चारों धामों के मठ बना दिए।

🔴 अहिल्या बाई को एक संत ने प्रेरणा देकर कितने ही मंदिरों घाटों का जीर्णोद्धार करा लिया और दुर्गम स्थानों पर नए देवालय बनाने के संकल्प को पूर्ण कर दिखाने के लिए सहमत कर लिया। समर्थ गुरु रामदास ने शिवाजी को वह काम करने की अंतःप्रेरणा दी जिसे वे अपनी इच्छा से कदाचित ही कर पाते। रामकृष्ण परमहंस ही थे, जिन्होंने नरेन्द्र के पीछे पड़कर उसे विवेकानन्द बना दिया। राजा गोपीचंद का मन वैराग्य में लगा देने का श्रेय संत भर्तृहरि को था।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.162

रविवार, 8 अक्टूबर 2017

👉 मनुज देवता बने, बने यह धरती स्वर्ग समान (अमृतवाणी भाग 4)

🔴 क्या आप चाहते है? आपको देवत्व के स्थान पर तीन चार सौ रुपये की नौकरी दिलवा दें। कोई देवता, सन्त या आशीर्वाद या कोई मन्त्र तो वह नाचीज हो सकती है। लेकिन अगर देवता देवत्व प्रदान करते हैं, तो वह नौकरी आपके लिए इतनी कीमत की करवा देंगे कि आप निहाल हो जाएँगे। विवेकानन्द रामकृष्ण परमहंस के पास नौकरी माँगने गए थे, पर मिला क्या, देवत्व, भक्ति, शक्ति और शान्ति। यह क्या चीज थे—गुण। मनुष्य के ऊपर कभी सन्त कृपा करते हैं। सन्तों ने कभी किसी को दिया है तो उन्होंने एक ही चीज दी है अन्तरंग में उमंग। एक ऐसी उमंग, जो आदमी को घसीटकर सिद्धान्तों की ओर ले जाती है।
   
🔵 जब आदमी के ऊपर सिद्धान्तों का नशा चढ़ता है, तब उसका मैग्नेट, उसका आकर्षण, उसकी वाणी, उसकी प्रामाणिकता इस कदर सही हो जाती है कि हर आदमी खिंचता हुआ चला आता है और हर कोई सहयोग करता है। विवेकानन्द को सम्मान और सहयोग दोनों मिला। यह किसने दी थी—काली ने। काली अगर किसी को कुछ देगी तो यही चीज देगी। अगर दुनिया में दुबारा कोई रामकृष्ण जिन्दा होंगे या पैदा होंगे, तो इसी प्रकार का आशीर्वाद देंगे, जिससे आदमी के व्यक्तित्व विकसित होते चले जाएँ। व्यक्तित्व अगर विकसित होगा तो जिसको आप चाहते हैं वह सहयोग बरसेगा। सहयोग माँगा नहीं जाता, बरसता है। आदमी फेंकता जाता है और सहयोग बरसता है। देवत्व जब आता है तब सहयोग बरसता है। बाबा साहब आम्टे का उदाहरण आपके सामने है, जिन्होंने कुष्ठ रोगियों के लिए, अपंगों के लिए अपना सर्वस्व लगा दिया। यह क्या है? सिद्धान्त है, आदर्श है और वरदान है। इससे कम में न किसी को वरदान मिला है और न इससे ज्यादा में किसी को मिलेगा। भीख माँगने से न किसी को मिला है और न भविष्य में मिलेगा।

🔴 देवता एक काम करते हैं। क्या कहते हैं? फूल बरसाते हैं। रामायण में कोई पचास जगह किस्से आते हैं, जब देवताओं ने फूल क्या बरसाते हैं, सहयोग बरसाते हैं। फूल किसे कहते हैं? सहयोग को कहते हैं। कौन बरसाता है? देवत्व जो इस दुनिया में अभी जिन्दा है। देवत्व ही दुनिया में जिन्दा था और जिन्दा ही रहने वाला है। देवत्व मरेगा नहीं। यदि हैवान या शैतान नहीं पर सका तो भगवान् क्यों मरेगा? इनसान, इनसान को देखकर आकर्षित होता है और भगवान, भगवान को देखकर आकर्षित होता है और श्रेष्ठता को देखकर सहयोग आकर्षित करता है। पहले भी यही होता रहा था, अभी भी होता है और आगे भी होता रहेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Picture of opportunity

🔴 Once an artist displayed his paintings. Several rich and famous people of the town came to see it. A girl also came to see the paintings. She saw a man portrayed in the last painting whose face was covered with hairs and who had wings attached to his legs. Under the painting was written in big letters “opportunity”. The painting was not very attractive so most people would move on without noticing it.

🔵 The girl’s attention was there on the painting from the beginning. The girl went near the artist and asked, “Why are the hairs covering the person’s face and the wings attached to his feet in the painting?” To this the painter replied,”Daughter, this is painting of opportunity. Since normally people can’t recognize it so I have covered its face so that at least people become curious to know who he is. Wings are attached to his feet because opportunity which is there today won’t be there tomorrow and thus it should be grabbed before it flies off and utilized to maximum”. The girl got the message and got engaged in making her destiny.

🔴 Time is life. Nobody has control over time.

🌹 From Pragya Puran

👉 आज का सद्चिंतन 8 Oct 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 8 Oct 2017


शनिवार, 7 अक्टूबर 2017

👉 मनुज देवता बने, बने यह धरती स्वर्ग समान (अमृतवाणी भाग 3)

🔴 सफलता साहसिकता के आधार पर मिलती है। यह एक आध्यात्मिक गुण है। इसी आधार पर योगी को भी सफलता मिलती है, तांत्रिक को भी और महापुरुष को भी। हर एक को इसी साहसिकता के आधार पर सफलता मिलती है। वह डाकू क्यों न हो। आप योगी हैं तो अपनी हिम्मत के सहारे फायदा उठायेंगे। नेता हैं, महापुरुष हैं तो भी इसी आधार पर सफलता पायेंगे। यह एक दैवी गुण है। इसे आप अपनी इच्छा के अनुसार इस्तेमाल कर सकते हैं, यह आप पर निर्भर है। इनसान के भीतर जो विशेषता है, वह गुणों की विशेषता है।
  
🔵 देवता अगर किसी आदमी को देंगे तो गुणों की विशेषता देंगे, गुणों की सम्पदा देंगे। गायत्री माता, जिसकी आप उपासना करते हैं, अनुष्ठान करते हैं, अगर कभी कुछ देंगी तो गुणों की विशेषता देंगी। गुणों से क्या हो जाएगा? गुणों से ही होता है सब कुछ। भौतिक अथवा आध्यात्मिक जहाँ कहीं भी आदमी को उन्नति मिली है, केवल गुणों के आधार पर मिली है। श्रेष्ठ गुण न हों तो, न भौतिक उन्नति मिलने वाली है, न आध्यात्मिक उन्नति मिलने वाली है।

🔴 आदमी जितना समझदार है, नासमझ उससे भी ज्यादा है। यह भ्रान्ति न जाने क्यों आध्यात्मिक क्षेत्र में घुस पड़ी है कि देवता मनोकामना पूरी करते हैं, पैसा देते हैं, दौलत देते हैं, बेटा देते हैं, नौकरी देते हैं। इस एक भ्रान्ति ने इतना ज्यादा व्यापक नुकसान पहुँचाया है कि आध्यात्मिकता का जितना बड़ा लाभ, जितना बड़ा उपयोग था, सम्भावनाएँ थीं, उससे जो सुख होना सम्भव था, उस सारी की सारी सम्भावना को इसने तबाह कर दिया।

🔵 देवता आदमी को एक ही चीज देंगे और उनने एक ही चीज दी है, प्राचीनकाल के इतिहास में और भविष्य में भी। देवता अगर जिन्दा रहेंगे, भक्ति अगर जिन्दा रहेगी, उपासना-क्रम यदि जिन्दा रहेगा, तो एक ही चीज मिलेगी और वह है देवत्व के गुण। देवत्व के गुण अगर आएँ तब आप जितनी सफलताएँ चाहते हैं, उससे हजारों-लाखों गुनी सफलताएँ आपके पास आ जाएँगी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Story of Kalidas

🔴 Kalidas was a big zero in terms of mental ability and was unattractive physically too. Once he was cutting the very branch he was sitting on.

🔵 Seeing him in this position, the pundits (priests) from the palace thought him to be the right candidate for marrying him off to Vidyotama, who had insulted them. They projected Kalidas as a silent wise person and made him participate in a debate with her over the scriptures. Cunningly they somehow explained his reactions as replies to all her questions in such a manner that she accepted him as husband.

🔴 But on the very first day, truth came out and she threw him out of the house. The sentences she spoke while pushing him out of the house, hurt Kalidas deep within. With great determination he started acquiring knowledge. In the end, that fool with his efforts became the great poet Kalidas and got reunited with Vidyotama.

🌹 From Pragya Puran

👉 आत्मचिंतन के क्षण 7 Oct 2017

🔵 जो स्वास्थ्य की रक्षा के लिए जागरूक नहीं है, उसे देर या सबेर बीमारियाँ आ दबोचेगी। जो काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद,मत्सर सरीखे मानसिक शत्रुओं की गतिविधियों की तरफ से आँखें बन्द किये रहता है, वह कुविचारों और कुकर्मों के गर्त में गिरे बिना नहीं रहेगा। जो दुनिया के छल, प्रपंच, झूठ, ठगी, लूट, अन्याय, स्वार्थपरता, शैतानी आदि की ओर से सावधान नहीं रहता, उसे उल्लु बनाने वाले, ठगने वाले, सताने वाले अनेकों पैदा हो जाते हैं। जो जागरूक नहीं है, उसे दुनियाँ के शैतानी तत्त्व बुरी तरह नोंच खाते हैं।

🔴 जागृत तन्द्रा के तीन दर्जे हैं।
१. लापरवाही २. आलस्य ३. प्रमाद। ये तीनों ही क्रमशः अधिक भयंकर एवं घातक हैं। हम सबको इनसे  बचना चाहिए। इसलिए गायत्री मंत्र हमें सावधान व जागृत रहने का संदेश देता है।

🔵 ‘‘वृद्ध जटायु रावण को परास्त करने में समर्थ न था,तो भी उसने अनीति होते देख कर चुप बैठना उचित न समझा, भिड़ गया। इसमें उसे प्राण त्यागने पड़े पर हारने पर भी वह विजयी से भी अधिक श्रेयाधिकारी बन गया।’’

🔴 वृक्ष धूप, शीत सहते रहते हैं, पर दूसरो को छाया, लकडी और फल-फूल बिना किसी प्रतिफल की आशा के मनुष्यो से लेकर पशु पक्षियों तक को बाँटते रहते हैं। क्या तुम इतना भी नहीं कर सकते बुद्धिमानी की निशानी उपलब्ध साधन और समय का श्रेष्ठतम उपयोग करना है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 जीवन की सफलता का रहस्य (अन्तिम भाग)

🔴 दूसरी बात यह है कि हम लोगों की यह एक विचित्र आदत-सी पड़ गयी है कि जो भी दुष्परिणाम हमको भोगने हैं, जो भी कठिनाईयाँ आपत्तियाँ हमारे सामने आती हैं, उनके लिये हम अपने को दोषी न समझ कर दूसरों के सर दोष मढ़ दिया करते हैं। हमारा यह दृढ़ विश्वास होता है कि इसका कारण हमारे दुष्कृत्य नहीं है। दूसरों को हम दोष देते समय न जाने क्या क्या कह डालते हैं, “अन्धा अपनी नेत्रविहीनता की ओर ध्यान न देकर काने को दोष देता है, कैसी विडम्बना है। संसार बुरा है, नारकीय है, भले लोगों के रहने की यह जगह नहीं है, यही हम लोग मुसीबत के समय कहा करते हैं।

🔵 यदि संसार ही बुरा होता और हम अच्छे होते तो भला हमारा जन्म ही यहाँ क्यों होता? यदि थोड़ा सा भी आप विचार करो तो तुरन्त विदित हो जायगा कि यदि आप स्वयं स्वार्थी न होते तो स्वार्थियों की दुनिया में आपका वास असम्भव था। किसी हरिश्चन्द्र के सामने झूठ बोलने का साहस कोई नहीं कर सकता हमें तो जो कुछ भी मिलता है वह हमारे कर्मों के अनुसार। दूसरों को इसके लिये दोष देना व्यर्थ है। हम अच्छे हो और संसार जिसमें हम रहते हैं, बुरा हो यह हो नहीं नहीं सकता। इससे बढ़ कर असत्य कथन नहीं हो सकता।

🔴 अतः सबसे पहली बात यह है कि हमें दूसरों को किसी प्रकार भी दोषी नहीं ठहराना चाहिये। क्योंकि यदि हमारे कर्म वैसे न होते तो वह दुष्परिणाम हमको न भोगना पड़ता। इसलिये ऐसे समय आत्मनिरीक्षण करना चाहिये और अपने अन्दर जो दोष हों उनको दूर करना चाहिये।

🔵 ऐसा करने से, अनासक्त रहने से, निर्लिप्त रहने से ही हम सुधर सकते हैं। दूसरों की चिन्ता छोड़ कर हमें अपनी चिन्ता करनी चाहिये। संसार के प्राणी ही हमारा अभिप्राय यहाँ मनुष्य से है, संसार को बनाते हैं। यदि मनुष्य का सुधार हो जाये तो संसार में सुख प्राप्त कर सकता है, जीवन में सफल हो सकता है एवं अपने जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।

🌹 समाप्त
🌹 स्वामी विवेकानन्द
🌹 अखण्ड ज्योति- जुलाई 1950 पृष्ठ 6
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/July/v1.9

👉 आज का सद्चिंतन 7 Oct 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 7 Oct 2017



👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 April 2026

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