मंगलवार, 19 सितंबर 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 69)

🌹  ‘‘हम बदलेंगे-युग बदलेगा’’, ‘‘हम सुधरेंगे-युग सुधरेगा’’ इस तथ्य पर हमारा परिपूर्ण विश्वास है।  

🔴 युग निर्माण की योजना का श्री गणेश हमें अपने आप से आरंभ करना चाहिए। वर्तमान नारकीय परिस्थितियों को भावी सुख-शान्तिमयी स्वर्गीय वातावरण में बदलने के लिए चिंतन ही एकमात्र वह केन्द्र बिन्दु है, जिसके आधार पर व्यक्ति की दिशा, प्रतिभा, क्रिया, स्थिति एवं प्रगति पूर्णतया निर्भर है। चिंतन की उत्कृष्टता, निकृष्टता के आधार पर व्यक्ति, देव और असुर बनता है। स्वर्ग और नरक का सृजन पूर्णतया मनुष्य के अपने हाथ में है। अपने भाग्य और भविष्य का निर्माण हर कोई स्वयं ही करता है। उत्थान एवं पतन की कुँजी चिंतन की दिशा को ही माना गया है।
   
🔵 हमें अपनी परिस्थितियाँ यदि उत्कृष्ट स्तर की अभीष्ट हों तो इसके लिए एक अनिवार्य शर्त यह है कि अपने चिंतन की धारा निकृष्टता की दिशा में प्रवाहित होने से रोककर उसे उत्कृष्टता की ओर मोड़ दें। यह मोड़ ही हमारे स्तर, स्वरूप और परिस्थितियों को बदलने में समर्थ हो सकता है। चिंतन निकृष्ट स्तर का हो और हम महानता वरण कर सकें, यह संभव नहीं। संकीर्ण और स्वार्थी लोग अनीति से कुछ पैसे भले ही इकट्ठे कर लें, पर उन विभूतियों से सर्वथा वंचित ही बने रहेंगे, जो व्यक्तित्व को प्रखर और परिस्थितियों को सुख-शांति से भरी संतोषजनक बना सकती है।
 
🔴 समाज व्यक्तियों के समूह का नाम है। व्यक्ति जैसे होंगे समाज वैसा ही बन जाएगा। लोग जैसे होंगे वैसा ही समाज एवं राष्ट्र बनेगा। दीन दुर्बल स्तर की जनता कभी समर्थ और स्वस्थ राष्ट्र का निर्माण नहीं कर सकती। धर्म, शासन, व्यवसाय, उद्योग, चिकित्सा, शिक्षा, कला आदि सभी क्षेत्रों का नेतृत्व जनता के ही आदमी करते हैं। जन-मानस का उत्तर गिरा हुआ हो तो ऊँचे, अच्छे, समर्थ और सजीव व्यक्तित्व नेतृत्व के लिए कहाँ से आएँगे?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.98

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.18

👉 सर्वपितृ अमावस्या

🔵 पितृ-पक्ष का हिन्दू-धर्म और हिन्दू-संस्कृति में बड़ा महत्व है। जो पितरों के नाम पर श्राद्ध और पिण्डदान नहीं करता, वह सनातन धर्मी हिन्दू माना नहीं जा सकता। हिन्दू-शास्त्रों के अनुसार मृत्यु होने पर मनुष्य का जीवात्मा चन्द्रलोक की तरफ जाता है और ऊंचा उठकर पितृ-लोक में पहुंचता है। इन मृतात्माओं को अपने नियत स्थान तक पहुंचने की शक्ति प्रदान करने के लिए पिण्डदान और श्राद्ध का विधान किया गया है। श्राद्ध पितरों के नाम पर ब्राह्मण-भोजन भी कराया जाता है। इसके पुण्य-फल से भी पितरों का संतुष्ट होना माना गया है। धर्म-शास्त्रों में यह भी कहा है कि जो मनुष्य श्राद्ध करता है वह पितरों के आशीर्वाद से आयु, पुत्र, यश, बल, वैभव, सुख और धन-धान्य को प्राप्त होता है। इसीलिये धर्म-प्राण हिन्दू आश्विन मास के कृष्ण पक्ष भर प्रतिदिन नियम पूर्वक स्नान करके पितरों का तर्पण करते हैं। जो दिन उनके पिता की मृत्यु का होता है, उस दिन अपनी शक्ति के अनुसार दान करके ब्राह्मण-भोजन कराते हैं।

🔴 एक समय इस देश में श्राद्ध-कर्म का इतना प्रचार था कि उसके ध्यान में लोग अपने तन-बदल की सुधि भूल जाते थे। उन्हें बाल बनवाने, तेल लगाने, पान खाने आदि का भी अवकाश न मिलता था। उसी बात के चिह्न स्वरूप आज प्रायः सभी हिन्दू, चाहे वे श्राद्ध करने वाले न भी हों, इन कार्यों से पृथक रहना धर्मानुकूल मानते हैं। वैसे जिन लोगों के पिता स्वर्गवासी हो गये हैं, वे अमावस्या तक और जिनकी माता स्वर्गवासी हो गई हैं, वे मातृ-नवमी तक न तो बाल बनवाते हैं और न तेल लगाते हैं।

🔵 पितरों का पिण्डदान करने का सबसे बड़ा स्थान गया माना जाता है और जनता में ऐसी मान्यता है कि गया में पितरों को पिण्डदान कर देने पर फिर प्रति वर्ष पिण्ड देने की आवश्यकता नहीं रहती। यह भी कहते हैं कि महाराज रामचन्द्रजी ने गया आकर फल्गू किनारे अपने मृत पिता महाराज दशरथ का पिण्डदान किया था। कुछ भी हो इस प्रथा से इतना प्रत्यक्ष जान पड़ता है कि हिन्दुओं की सभ्यता प्राचीन काल में काफी ऊंचे दर्जे तक पहुंच चुकी थी और जीवित माता-पिता की सेवा करना ही अपना परम धर्म नहीं मानते थे, वरन् उनके मरने पर भी उनकी स्मृति-रक्षा करना अपना परम कर्तव्य समझते थे और इसके लिए 15 दिन का समय अलग दिया था। हिन्दुओं की इस प्रथा की प्रशंसा अन्य लोगों ने भी की। हिन्दुस्तान के मुगल सम्राट शाहजहां ने, जब उसे उसके लड़के औरंगजेब को लिखा था कि ‘‘तुम से तो हिन्दू लोग ही बहुत अच्छे हैं जो मरने के बाद भी अपने पिता को जल और भोजन देते हैं तू तो अपने जीवित पिता को भी दाना-पानी के बिना तरसा रहा है।’’

🔴 इस विषय पर विशेष विचार करने से यही प्रतीत होता है कि पितृ-पक्ष का महत्व इस बात में नहीं है कि हम श्राद्ध-कर्म को कितनी धूम-धाम से मनाते हैं और कितने अधिक ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं, वरन् उसका वास्तविक महत्व यह है कि हम अपने पितामह आदि गुरुजनों की जीवितावस्था में ही कितनी सेवा-सुश्रूषा, आज्ञापालन करते हैं। चाहे अन्य लोग इसका कुछ भी अर्थ क्यों न लगावें, पर हम तो यही कहेंगे कि जो व्यक्ति अपने जीवित पिता-माता आदि की सेवा नहीं करते, उल्टा उनको दुख पहुंचाते हैं, या उनका अपमान करते हैं, बाद में उनका पिण्डदान और श्राद्ध करना कोरा ढोंग है और उसका कोई परिणाम नहीं। क्योंकि अगर हमारे श्राद्ध का फल पितरों तक सूक्ष्म रूप से पहुंचता भी है तो वह तभी संभव है जब हम सच्ची भावना और एकाग्र चित्त से उस कार्य को करें। पर जो लोग जन्म भर अपने पिता-माता को हर तरह से कष्ट पहुंचाते रहे, उनको भला-बुरा कहते रहे, वे फिर किस प्रकार श्रद्धा और हार्दिक भावना से श्राद्ध आदि कर्म कर सकते हैं?

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/pitaron_ko_shraddha_den_ve_shakti_denge/v1.91

👉 ज्ञान प्रधान धर्मशास्त्र

🔴 बड़े-बड़े धर्मवक्ता आपने देखे होंगे और उनके व्याख्यान सुने होंगे। सोचना चाहिए कि उनके शब्दों का अनुकरण उनका हृदय कहाँ तक करता है? वे अपने अन्तःकरण के भावों को यदि स्पष्टतया प्रकट करने लगें तो आप निश्चय समझिए कि उनमें से अधिकाँश लोगों को ‘नास्तिक’ कहना पड़ेगा। वे अपने बुद्धि को चाहे जितनी भगतिन बनावें, वह उनसे यही कहेगी कि “किसी पुस्तक में लिखा है या किसी महापुरुष ने कहा है इसलिये मैं उस पर बिना विचार किये विश्वास क्योंकर करूं? दूसरे भले ही अन्धश्रद्धा के अधीन हो जायँ, मैं कभी फँसने वाली नहीं।” इधर जाते हैं तो खाई और उधर जाते हैं तो अथाह समुद्र है। यदि धर्मोपदेशक या धर्मग्रन्थों का कहना मानो तो विवेचक बुद्धि बाधा डालती है और न मानो तो लोग उपहास करते हैं, ऐसी अवस्था में लोग उदासीनता की शरण लेते हैं।

🔵 जिन्हें आप धार्मिक कहते हैं, उनमें से अधिकाँश लोग उदासीन अथवा तटस्थ हैं और इसका कारण धर्म पर यथार्थ विचार न करना ही है। धर्म की उदासीनता यदि ऐसी बढ़ती ही जायगी और लोग धर्माचरण के लाभों से अनभिज्ञ ही बने रहेंगे तो धर्म की पुरानी इमारत भौतिक-शास्त्रों के एक ही अघात में हवाई किले की तरह नष्ट-भ्रष्ट हो जायगी। भौतिक शास्त्र जिस प्रकार विवेक बुद्धि की भट्टी से निकलकर अपनी सत्यता सिद्ध करते हैं उसी प्रकार धर्म शास्त्र को भी अपने सिद्धान्तों की सत्यता संसार के सामने सप्रमाण सिद्ध कर देनी चाहिये। ऐसा करने पर बुद्धि के तीव्र ताप से यदि धर्मतत्व गल-पच भी जायेंगे तो भी हमारी कोई हानि नहीं है। जिसे आज तक हम रत्न समझे हुये थे, वह पत्थर निकला। उसके नष्ट होने का हमें दुःख क्या? अन्ध-परम्परा से उसे सिर पर लादे रहना ही मूर्खता है।

🔴 मेरी समझ में ऐसे सन्दिग्ध पत्थरों की जहाँ तक शीघ्र हो, परीक्षा कर व्यवस्था से लगा देना ही अच्छा है। यदि धर्मतत्व सत्य होंगे तो वे भट्टी में कभी न जलेंगे, उलटे वे ही असत्य पदार्थ भस्म हो जायेंगे जिनके मिश्रण से सत्यधर्म में सन्देह होने लगा है। आग में तपाने से सोना मलीन नहीं किंतु अधिक उज्ज्वल हो जाता है। विवेक बुद्धि की भट्टी में सत्य धर्म को डालने से उसके नष्ट होने का कोई भय नहीं है किन्तु ऐसा करने से उसकी योग्यता और भी बढ़ जायगी तथा उसका उच्च स्थान सर्वदा बना रहेगा। पदार्थ विज्ञान और रसायन शास्त्रों की तरह धर्मशास्त्र भी प्रत्यक्ष प्रमाणों से सिद्ध करना चाहिये। यदि कर्मेन्द्रियों की अपेक्षा ज्ञानेन्द्रियों की योग्यता अधिक है तो जड़ (भौतिक) शास्त्रों पर ज्ञान-प्रधान धर्मशास्त्र की विजय क्योंकर न होगी? भौतिक शास्त्रों की सिद्धि तो इन्द्रियों के भरोसे है और धर्मशास्त्रों की सिद्धि अन्तरात्मा से सम्बन्ध रखती है, फिर क्या हमारा कर्त्तव्य नहीं है कि हम इसी आवश्यक और प्रधान शास्त्र की सिद्धि का पहले यत्न करें?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 श्री स्वामी विवेकानन्द जी
🌹 अखण्ड ज्योति- सितम्बर 1952 पृष्ठ 4
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1952/September/v1.4

👉 आज का सद्चिंतन 19 Sep 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 19 Sep 2017

सोमवार, 18 सितंबर 2017

👉 आज का सद्चिंतन 18 Sep 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 Sep 2017

 

👉 वैराग्य भावना से मनोविकारों का शमन ( अंतिम भाग)

🔴 अपने जीवन लक्ष्य की ओर आप कितना बढ़ सकें हैं? क्या आप अपने आपको पहचान सके हैं? नकारात्मक उत्तर मिलने से आपका जी दुःखी होगा। जिस प्रकार अब तक हजारों आदमी इस संसार में मर-खप गये, उसी प्रकार हमारा भी शरीर-साधन व्यर्थ गया, तो कहाँ रही इसमें अपनी बुद्धिमत्ता। आपकी सफलता इसी में सन्निहित है कि आप अनुचित और छोटी-छोटी वस्तुओं के प्रति मोह का भाव त्यागिये, ताकि आपकी शक्तियाँ आध्यात्मिक जीवन की ओर उन्मुख हो सकें।

🔵 मनुष्य के विनाश का सबसे प्रबल कारण है उसका अहंकार। मैं ही सब कुछ हूँ, मेरा विचार ही सबसे अच्छा है, मैं ही सबसे अधिक सुन्दर हूँ, मैं धनी हूँ, मैं पण्डित हूँ आदि अहंकारिक भावों के कारण संसार में कलह झंझट युद्ध और महायुद्ध की विभीषिकायें उठ खड़ी होती हैं। क्या यह अभिमान सार्थक हो सकता है? नहीं। रावण, दुर्योधन, कंस, हिरण्यकश्यप, नैपोलियन, सिकन्दर आदि अहंकारी पुरुषों ने आखिर क्या लाभ उठाया? उन्हें भी हाथ मलते ही इस संसार से विदा होना पड़ा, फिर आपकी क्या भला बिसात? आप से अधिक तो इसी धरती में ही अनेकों रूपवान, धनवान, शक्ति और सामर्थ्यवान् विद्यमान् हैं, फिर यह अहंकार आपका क्या प्रयोजन हल कर सकता है? आध्यात्मिक विकास की सबसे बड़ी बाधा मनुष्य के अहंकारपूर्ण विचार ही होते हैं। संसार की क्षणभंगुरता को हमेशा ध्यान में बनाये रखने से ही यह सम्भव है कि मनुष्य इस दुष्प्रवृत्ति से बचा रह सके।

🔴 इसी प्रकार मत्सर अर्थात् ईर्ष्या और डाह का भाव भी मनुष्य के अधःपतन का कारण होता है। मनुष्य की उन्नति, उसकी शक्ति और परिस्थितियों के अनुसार कम ज्यादा होती ही है। अपनी शक्तियों का विकास मानवोचित ढंग से करें, तो इससे किसी का अहित नहीं होता। पर जब दूसरों की समृद्धि देखकर लोग ईर्ष्या-द्वेष रखने लगते हैं, तो वहीं वैयक्तिक और सामूहिक आत्मिक पतन प्रारम्भ हो जाता है। मनुष्य का जीवन इसलिये नहीं मिला। हमें सेवा, सत्कार, प्रेम, दया, न्याय आदि के विकास के लिये साधन स्वरूप यह शरीर उपलब्ध होता है। इसे प्राप्त कर होड़ करें तो तो चारित्रिक श्रेष्ठता की, ताकि अपना जीवन उद्देश्य भी पूरा हो, लोगों को प्रसन्नता-मिले और सामाजिक जीवन में खुशहाली लाने में अपना भी कुछ उपयोग हो । यदि यह न कर सके तो मनुष्य शरीर और पशुओं के शरीर में अन्तर ही क्या रहा। विवेक से मन पराकाष्ठा को पहुँचता है और इसी अवस्था में वैराग्य द्वारा उसका सन्तुलन होता है। इसलिये षट-विकारों के शमन और आध्यात्मिक आस्था प्रबल करने के लिये वैराग्य पूर्ण भावनायें बड़ी उपयोगी सिद्ध होती हैं। वैराग्य से मनुष्य का जीवन उन्नत होता है और अनेकों आध्यात्मिक अनुभूतियाँ प्राप्त होती हैं।

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1965 पृष्ठ 3
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/February/v1.3

रविवार, 17 सितंबर 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 68)

🌹  मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है, इस विश्वास के आधार पर हमारी मान्यता है कि हम उत्कृष्ट बनेंगे और दूसरों को श्रेष्ठ बनाएँगे, तो युग अवश्य बदलेगा

🔴 लेखों और भाषणों का युग अब बीत गया। गाल बजाकर, लंबी-चौड़ी डींग हाँककर या बड़े-बड़े कागज काले करके संसार के सुधार की आशा करना व्यर्थ है। इन साधनों से थोड़ी मदद मिल सकती है, पर उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता। युग निर्माण जैसे महान् कार्य के लिए तो यह साधन सर्वथा अपर्याप्त और अपूर्ण हैं। इसका प्रधान साधन यही हो सकता है कि हम अपना मानसिक स्तर ऊँचा उठाएँ, चारित्रिक दृष्टि से अपेक्षाकृत उत्कृष्ट बनें। अपने आचरण से ही दूसरों को प्रभावशाली शिक्षा दी जा सकती है। गणित, भूगोल, इतिहास आदि की शिक्षा में कहने-सुनने की प्रक्रिया से काम चल सकता है, पर व्यक्ति निर्माण के लिए तो निखरे हुए व्यक्तित्वों की ही आवश्यकता पड़ेगी। उस आवश्यकता की पूर्ति के लिए सबसे पहले हमें स्वयं ही आगे आना पड़ेगा। हमारी उत्कृष्टता के साथ-साथ संसार की श्रेष्ठता अपने आप बढ़ने लगेगी। हम बदलेंगे, तो युग भी जरूर बदलेगा और हमारा युग निर्माण संकल्प भी अवश्य पूर्ण होगा।
  
🔵 आज वे ऋषि-मुनि नहीं रहे, जो अपने आदर्श चरित्र द्वारा लोक शिक्षण करके, जन साधारण के स्तर को ऊँचा उठाते थे। आज वे ब्राह्मण भी नहीं रहे, जो अपने अगाध ज्ञान, वंदनीय त्याग और प्रबल-पुरुषार्थ से जन-मानस की पतनोन्मुख पशु-प्रवृत्तियों को मोड़कर देवत्व की दिशा में पलट डालने का उत्तरदायित्व अपने कंधों पर उठाते थे। वृक्षों के अभाव में एरंड का पेड़ ही वृक्ष कहलाता है। इस विचारधारा से जुड़े विशाल देव परिवार के परिजन अपने छोटे-छोटे व्यक्तित्वों को ही आदर्शवाद की दिशा में अग्रसर करें, तो भी कुछ न कुछ प्रयोजन सिद्ध होगा, कम से कम एक अवरुद्ध द्वार तो खुलेगा ही। यदि हम मार्ग बनाने में अपनी छोटी-छोटी हस्तियों को लगा दें, तो कल आने वाले युग प्रवर्तकों की मंजिल आसान हो जाएगी। युग निर्माण सत्संकल्प का शंखनाद करते हुए छोटे-शक्तियों के जागरण की चेतना को यदि चारित्रिक संधान के लिए जम जाग्रत कर सकें, तो आज न सही तो कल, हमारा युग निर्माण संकल्प पूर्ण होकर रहेगा।
 
🔴 युग परिवर्तन की सुनिश्चितता पर विश्वास करना हवाई महल नहीं बल्कि तथ्यों पर आधारित एक सत्य है। परिस्थितियाँ कितनी ही विकट हों, जब सदाशयता सम्पन्न संकल्पशील व्यक्ति एक जुट होकर कार्य करते हैं तो स्थिति बदले बिना नहीं रहती। असुरता के आतंक से मुक्ति का पौराणिक आख्यान हो या जिनके शासन में सूर्य नहीं डूबता था, उनके चंगुल से मुक्त होने का स्वतंत्रता अभियान, नगण्य शक्ति से ही सही, पर संकल्पशील व्यक्तियों का समुदाय उसके लिए युग-शक्ति के अवतरण का माध्यम बन ही जाता है। युग निर्माण अभियान से परिचित व्यक्ति यह भली प्रकार समझने लगे हैं कि यह ईश्वर प्रेरित प्रक्रिया है। इस संकल्प को अपनाने वाला ईश्वरीय संकल्प का भागीदार कहला सकता है। अस्तु, उसकी सफलता पर पूरी आस्था रखकर उसको जीवन में चरितार्थ करने-कराने के लिए पूरी शक्ति झोंक देना, सबसे बड़ी समझदारी सिद्ध होगी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.96

👉 Third boon of Nachiketa

🔴 Yamraj got please by the sincerity of Nachiketa and gave him three boons. He asked to pacify his father’s anger, instead of asking to overcome the fear of death. He asked about the process of getting to heaven as the second boon. The third thing he asked was the real form of soul and the knowledge how to attain that. Since he had promised to give three boons, so he tried to elude him from this third boon on considering him unworthy for such knowledge and told him to ask anything else. But he had to know only the science of soul and the knowledge of state of soul after death. Having the freedom of choice, in spite of having options to get other happiness, liberation, rebirth etc. he preferred self-

🔵 knowledge and knowledge of the supreme. He mastered the Panchagni Sadhna and guided mankind successfully. Very few people are so lucky.

🌹 From Pragya Puran

👉 आत्मचिंतन के क्षण 17 Sep 2017

🔵 भूतकाल की अपूर्णताओं पर कुढ़ते रहने की अपेक्षा वर्तमान को पूर्ण कर भविष्य का निर्माण किया जा सकता है। भूतकाल की घटना तो मुर्दा हो गयी, उसकी कब्र खोदकर हड्डियाँ निकालने से क्या लाभ ? चेतन तत्व का आविष्कार करो जिससे तुम्हारा और संसार का निर्माण हो।

🔴 लौकिक जीवन में अपनी प्रतिभा का परिचय दिये बिना ही लोग पारलौकिक जीवन की कठिन परीक्षा में उत्तीर्ण होना चाहते है। यह तो स्कूल का बहिष्कार करके सीधे एम. ए. की उत्तीर्ण का आग्रह करने जैसी बात हुई। इस प्रकार व्यतिक्रम से ही आज लाखों साधु संन्यासी समाज के लिए भार बने हुए है। वे लक्ष्य की प्राप्ति क्या करेंगे, शान्ति और संतोष तक से वंचित रहते है। इधर की असफलता उन्हें उधर भी असफल ही रखती है के आधार पर बड़े बनने की कोशिश कर रहे हैं। काश, उन्हें कोई यह समझा देता कि यह बाल-क्रीड़ाऐं व्यर्थ हैं।

🔵 जो भी काम करो उसे आदर्श, स्वच्छ, उत्कृष्ट, पूरा, खरा, तथा शानदार करो। अपनी ईमानदारी और दिलचस्पी को पूरी तरह उसमें जोड़ दो, इस प्रकार किये हुए उत्कृष्ट कार्य ही तुम्हारे गौरव का सच्चा प्रतिष्ठान कर सकने में समर्थ होंगे। अधूरे, अस्त-व्यस्त फूहड़, निकम्मे, गन्दे, नकली, मिलावटी, झूठे और कच्चे काम, किसी भी मनुष्य का सबसे बड़ा तिरस्कार हो सकते है, यह बात वही जानेगा जिसे जीवन विद्या के तथ्यों का पता होगा।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 17 Sep 2017


👉 वैराग्य भावना से मनोविकारों का शमन (भाग 4)

🔴 क्रोध के प्रतिरोध में उत्पन्न वैराग्य भावनाओं से ईर्ष्या, दुश्चिन्ता और संघर्षपूर्ण विचार समाप्त होते हैं और प्रेम, दया तथा मैत्री भाव जागृत होते हैं। इन भावनाओं से क्रोध की उत्तेजना समाप्त हो जाती है।

🔵 धन की तृष्णा भी मनुष्य के जीवन में वैसी ही जड़ता उत्पन्न करती है, जैसी काम और क्रोध। पराया माल छीनने, हड़पने और चोरी कर लेने तथा दूसरों की कमाई का उचित पारिश्रमिक न देने की बात किसी भी प्रकार मानवीय नहीं कही जा सकती। इससे मनुष्य का घोर आन्तरिक पतन होता है। आप विचार कीजिये कि आप जब श्रम-पूर्वक धन कमाते हैं और उसका कुछ हिस्सा कहीं गिर जाता है या कोई उसे उठा ले जाता है, तो आपको कितना दुःख होता है। फिर इस धन से मनुष्य का जीवन लक्ष्य भी तो पूरा नहीं होता। क्या यह पाप की कमाई अपने बाल-बच्चों के लिये छोड़कर उन्हें भी आलसी और अकर्मण्य बनाना चाहते हैं?

🔴 जो धन आपकी लाश के साथ आपके साथ जाने वाला नहीं है, उसको आप अनाधिकार पूर्वक क्यों प्राप्त करना चाहते हैं? आप उससे बँधे क्यों जा रहे हैं? इस धन के लोभ में पड़कर आप अपनी आत्मा, अपने जीवन लक्ष्य की बात ही भूल जायेंगे, फिर ऐसे धन से लोभ कैसा? प्रीति कैसी? छोड़िये इसे। जो कुछ परिश्रम से कमाया है उतने में ही बड़ा आनन्द है। धन का बखेड़ा बढ़ाने की अपेक्षा निर्धन होना, आत्म-धन प्राप्त करना कहीं अधिक श्रेष्ठ व श्रेयस्कर है। हम कभी इस परम आदर्श से विचलित नहीं होंगे। इस प्रकार आप अधर्म की कमाई और अनावश्यक लोभ वृत्ति से निकल सकेंगे।

🔵 मनुष्य की सबसे अधिक दीन-हीन अवस्था उस समय दिखाई देती है, जब यह छोटी-छोटी बातों के लिये अनुचित आसक्ति या मोह भाव प्रदर्शित करता हैं। छोटी-सी चीज के टूट-फूट जाने से आप कितने परेशान हो उठते हैं। टूटे-फूटे बर्तन कपड़ों और अनेकों अनावश्यक वस्तुओं से आपका इतना अधिक लगाव आखिर क्यों हैं? संसार की सभी सम्पत्तियों में शरीर का महत्व ही सर्वाधिक है। इसी से उपभोग करते हैं। और स्वामित्व प्रकट करते हैं? इसका भी तो एक दिन विनाश हो जाता है। जिसके उपभोग और स्वामित्व के लिये आप यह मोह कर रहे हैं, जब उसी को नहीं रहना, तो क्या करेंगे आप इन नाचीज वस्तुओं का संग्रह करके। इनके टूट-फूट जाने, सड़ने गलने से आप इतना दुःखी क्यों हो जाते हैं? दुःख करना ही है तो सोचिये आपने अभी तक मानव सुलभ साधनों का आत्मविकास में कितना उपयोग किया?

🌹 क्रमशः जारी

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1965 पृष्ठ 3
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/February/v1.3

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 17 Sep 2017


शनिवार, 16 सितंबर 2017

👉 आज का सद्चिंतन 16 Sep 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 16 Sep 2017


👉 वैराग्य भावना से मनोविकारों का शमन (भाग 3)

🔴 आप जितना भावनात्मक गहराई तक उतर सकें उतरें। आप को यथार्थ ज्ञान मिलेगा, शक्ति मिलेगी और इस दूषित विकार के आघात से बड़ी आसानी के साथ बच जायेंगे। शरीर की नश्वरता और आत्म-ज्ञान की प्रबल जिज्ञासा का भाव जितनी शक्ति और-क्षमता के साथ आप उठायेंगे, उतना ही वैराग्य भाव उमड़ता हुआ चला आयेगा। मैं अपने जीवन को इन तुच्छ बातों में नहीं गंवाऊंगा, न जाने कब विनष्ट हो जाने वाले शरीर के प्रति मैं भला क्यों आसक्त होऊँ, मैं आत्मा हूँ, अपने मूल स्वरूप को जानना ही मेरा लक्ष्य है। इस प्रकार के अनेकों विचार आप तर्क और प्रमाण के साथ उठाते चले आइये, निश्चय ही आपकी कामुकता का आवेश आपको छोड़कर भाग जायेगा। आपके जी में “मातृवत् परदारेषु” का सुन्दर भाव उमड़ता हुआ चला जायेगा, आगे आन्तरिक दृष्टि से आनन्दित हो उठेंगे और जो विचार अभी थोड़ी देर पहले आपको आक्रान्त कर रहा था, वह न जाने कहाँ विलुप्त हो जायेगा।

🔵 वासना का प्रभाव मनुष्य के जीवन में आँधी-तूफान की तरह होता है, इससे बचने के लिये सिनेमा, नाटक, अभद्र प्रदर्शनों से तो बचें ही, बुद्धि विवेक और सद्विचार भी ठीक रखें और इसे वैराग्य पूर्ण भावनाओं के द्वारा भी निवारण करें।

🔴 क्रोध की अवस्था भी ठीक ऐसी ही होती हैं। संसार में ऐसा कोई भी पाप नहीं जो क्रोधी व्यक्ति न कर सकता हो। क्रोध को पाप का मूल कहकर पुकारा जाता है। यह भी एक आवेश में आता है और अनेकों अनर्थ उत्पन्न करके ही समाप्त होता है। पीछे उन पर भारी दुःख तथा पश्चात्ताप होता है। इससे बचने के पूर्व-अभ्यास के रूप में प्रेम, स्नेह, आत्मीयता, सौजन्यता, सहिष्णुता और उदारता आदि भावों को विकसित करें तो ठीक है, किन्तु यदि फिर भी कदाचित ऐसा अवसर आ जाये तो आप पुनः वैराग्यपूर्ण भावनाओं का स्मरण कीजिये। आप विचार कीजिये, आप जिसे दण्ड देना चाहते हैं, जिस पर आपको क्रोध आ रहा है, वह यदि आप होते तो आप पर कैसी बीतती।

🔵 मान लीजिये आपने ही वह गलती कर डाली होती और कोई उसका दण्ड आपको दिया जा रहा होता तो आपके शरीर में कितनी पीड़ा छटपटाहट हो रही होती। यह भाव उठते ही आपके हृदय में करुणा का भाव उत्पन्न होगा। आप सोचेंगे कि दण्ड देना अनुचित है। दूसरों को पीड़ा न देना ही मानव धर्म है। आपका क्रोध पराभूत हो जायगा और आप उसके विषैले प्रभाव से बच जायेंगे। कोई भी प्रतिशोध-जनक प्रतिक्रिया उठने से बच जायेगी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1965 पृष्ठ 2
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/February/v1.2

शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

👉 बुद्धि का प्रयोग


🔵 एक बार एक छोटा बालक नदी पर स्नान करने चला गया। बदकिस्मती से वो गहरे पानी में चला गया और उसके पांव टिक नहीं पाए और वो बहने लगा। खुद को इस मुश्किल में पाकर वो मदद की गुहार लगाने लगा और बोला “बचाओ मैं डूब रहा हूँ।” संयोग से एक आदमी उधर से सड़क पर नदी के किनारे किनारे जा रहा था और उसने उस बालक को चिल्लाते सुना तो मदद के लिए दौड़ा चला आया।

🔴  बालक की जान संकट में देखकर उस व्यक्ति ने भी  उसे बचाने के लिए यत्न नहीं किया अपितु उसे फटकारने भी लगा कि मूर्ख तू गहरे पानी में उतरा ही क्यों था अब तू अपनी मूर्खता का दंड भोग अब  सहायता के लिए क्यों चिल्ला रहा है। तो बालक ने भय मिश्रित विनम्र भाव से कहा श्रीमान जी पहले मुझे बचा लीजिये उसके बाद आप चाहे जितना मुझे फटकार सकते है। लेकिन वह व्यक्ति उस बालक की अपेक्षा अधिक मूर्ख था उसने लगातार बालक को फटकारना जारी रखा और बालक उस तेज धार में बह गया।

🔵  ऐसा ही कुछ हमारे साथ हमारी निजी जिन्दगी में भी होता है अक्सर हम किसी दूसरे या हमारे अपनों को किसी काम के बिगड़ जाने पर दोषारोपण करते है जबकि उस समय वो व्यक्ति जो खुद अपराधबोध से ग्रस्त होता है उसे इस मुश्किल समय में हमारा साथ चाहिए होता है लेकिन हम भी इस कहानी के उस व्यक्ति की तरह साथ की जगह उसे वैचारिक रूप से प्रताड़ित करते है यही वजह है जिन्दगी में खुशिया संतुलन में नहीं होती।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 15 Sep 2017


👉 आज का सद्चिंतन 15 Sep 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 April 2026

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