शनिवार, 21 जनवरी 2017
👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 15) 22 Jan
🌹 त्रिविध भवबन्धन एवं उनसे मुक्ति
🔴 अधिक कमाया जा सकता है, पर उसमें से निजी निर्वाह में सीमित व्यय करके शेष बचत को गिरों को उठाने, उठों को उछालने और सत्प्रवृत्तियों के संवर्द्धन में लगाया जाना चाहिये। राजा जनक जैसे उदाहरणों की कमी नहीं। मितव्ययी अनेक दुर्व्यसनों और अनाचारों से बचता है। ऐसी हविश उसे सताती नहीं जिसके लिये अनाचार पर उतारू होना पड़े। साधु-ब्राह्मणों की यही परम्परा रही है। सज्जनों की शालीनता भी उसी आधार पर फलती-फूलती रही है। जीवन साधना के उस प्रथम अवरोध ‘लोभ’ को नियन्त्रित कराने वाला दृष्टिकोण हर जीवन साधना के साधक को अपनाना ही चाहिये।
🔵 मोह वस्तुओं से भी होता है और व्यक्तियों से भी। छोटे दायरे में आत्मीयता सीमाबद्ध करना ही मोह है। उसके रहते हृदय की विशालता चरितार्थ ही नहीं होती। अपना शरीर और परिवार ही सब कुछ दिखाई पड़ता है। उन्हीं के लिये मरने-खपने के कुचक्र में फँसे रहना पड़ता है। ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के दो आत्मवादी सिद्धान्त हैं। इनमें से एक को भी ‘मोहग्रस्त’ कार्यान्वित नहीं कर सकता। इसलिये अपने में सबको और सबमें अपने को देखने की दृष्टि विकसित करना जीवन साधना के लिये आवश्यक माना गया है।
🔴 परिवार छोटे से छोटा रखा जाय। पूर्ववर्ती अभिभावकों, बड़ों और आश्रितों के ऋणों को चुकाने की ही व्यवस्था नहीं बन पाती तो नये अतिथियों को क्यों न्यौत बुलाया जाय? समय की विषमता को देखते हुए अनावश्यक बच्चे उत्पन्न कर परिवार का भार बढ़ाना परले सिरे की भूल है। समान विचारों का साथी-सहयोगी मिले तो विवाह करने में हर्ज नहीं, पर वह एक दूसरे की सहायता सेवा करते हुए प्रगतिपथ पर अग्रसर होने के लिये ही किया जाना चाहिये। जिन्हें सन्तान की बहुत ललक हो, वे निर्धनों के बच्चे पालने के लिये ले सकते हैं। परिवार को स्वावलम्बी और सुसंस्कारी बनाना पर्याप्त है। औलाद के लिये विपुल सम्पदा उत्तराधिकार में छोड़ मरने की भूल किसी को नहीं करनी चाहिये। मुफ्त का माल किसी को भी हजम नहीं होता। वह दुर्बुद्धि और दुर्गुण ही उत्पन्न करता है। सन्तान पर यह भार लदेगा तो उसका अपकार ही होगा।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 बोले हुए शब्द वापस नहीं आते
🔴 एक बार एक किसान ने अपने पडोसी को भला बुरा कह दिया, पर जब बाद में उसे अपनी गलती का एहसास हुआ तो वह एक संत के पास गया. उसने संत से अपने शब्द वापस लेने का उपाय पूछा।
🔵 संत ने किसान से कहा, तुम खूब सारे पंख इकठ्ठा कर लो, और उन्हें शहर के बीचो-बीच जाकर रख दो किसान ने ऐसा ही किया और फिर संत के पास पहुंच गया।
🔴 तब संत ने कहा, अब जाओ और उन पंखों को इकठ्ठा कर के वापस ले आओ।
🔵 किसान वापस गया पर तब तक सारे पंख हवा से इधर-उधर उड़ चुके थे. और किसान खाली हाथ संत के पास पहुंचा. तब संत ने उससे कहा कि ठीक ऐसा ही तुम्हारे द्वारा कहे गए शब्दों के साथ होता है, तुम आसानी से इन्हें अपने मुख से निकाल तो सकते हो पर चाह कर भी वापस नहीं ले सकते।
🔴 कुछ कड़वा बोलने से पहले ये याद रखें कि भला-बुरा कहने के बाद कुछ भी कर के अपने शब्द वापस नहीं लिए जा सकते. हाँ, आप उस व्यक्ति से जाकर क्षमा ज़रूर मांग सकते हैं, और मांगनी भी चाहिए, पर मानवीय स्वभाव कुछ ऐसा होता है की कुछ भी कर लीजिये इंसान कहीं ना कहीं दुखी हो ही जाता है।
🔵 मित्रों जब आप किसी को बुरा कहते हैं तो वह उसे कष्ट पहुंचाने के लिए होता है पर बाद में वो आप ही को अधिक कष्ट देता है. खुद को कष्ट देने से क्या लाभ, इससे अच्छा तो है की चुप रहा जाए।
🔵 संत ने किसान से कहा, तुम खूब सारे पंख इकठ्ठा कर लो, और उन्हें शहर के बीचो-बीच जाकर रख दो किसान ने ऐसा ही किया और फिर संत के पास पहुंच गया।
🔴 तब संत ने कहा, अब जाओ और उन पंखों को इकठ्ठा कर के वापस ले आओ।
🔵 किसान वापस गया पर तब तक सारे पंख हवा से इधर-उधर उड़ चुके थे. और किसान खाली हाथ संत के पास पहुंचा. तब संत ने उससे कहा कि ठीक ऐसा ही तुम्हारे द्वारा कहे गए शब्दों के साथ होता है, तुम आसानी से इन्हें अपने मुख से निकाल तो सकते हो पर चाह कर भी वापस नहीं ले सकते।
🔴 कुछ कड़वा बोलने से पहले ये याद रखें कि भला-बुरा कहने के बाद कुछ भी कर के अपने शब्द वापस नहीं लिए जा सकते. हाँ, आप उस व्यक्ति से जाकर क्षमा ज़रूर मांग सकते हैं, और मांगनी भी चाहिए, पर मानवीय स्वभाव कुछ ऐसा होता है की कुछ भी कर लीजिये इंसान कहीं ना कहीं दुखी हो ही जाता है।
🔵 मित्रों जब आप किसी को बुरा कहते हैं तो वह उसे कष्ट पहुंचाने के लिए होता है पर बाद में वो आप ही को अधिक कष्ट देता है. खुद को कष्ट देने से क्या लाभ, इससे अच्छा तो है की चुप रहा जाए।
👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 31) 22 Jan
🌹 अखण्ड जप करें—अखण्ड यज्ञ नहीं
🔴 वस्तुतः तांत्रिक ‘मख’ रात्रि के सुनसान वातावरण में श्मशान, खण्डहर जैसे वीभत्स स्थानों में करने की विधि-व्यवस्था है। यज्ञ वैदिक होते हैं और ‘मख’ तांत्रिक। मख कृत्यों में अभक्ष और अस्पर्श्य जैसे पदार्थ भी होमे जाते हैं। उनका दृश्य कुरुचिपूर्ण होता है। इसलिए उन्हें अविज्ञात, एकान्त एवं निस्तब्ध वातावरण में सम्पन्न किया जाता है। निशाचरी कृत्य तमोगुणी प्रधान एवं अनैतिक होते हैं। उन्हें गुह्य ही रखा जाता है। प्रकट होने पर विरोध-विग्रह का ही डर रहता है। हिंसा-अहिंसा का भी उसमें ध्यान नहीं रखा जाता है। अतएव होलिका दहन, चिता प्रज्वलन जैसे मख-कृत्यों को छोड़कर रात्रि के समय देव-यज्ञ नहीं किये जाते। प्रचलन फैल जाने के कारण विवाह संस्कार ही इसका अपवाद है। यों उनमें भी गोधुलि बेला का मुहूर्त उत्तम माना गया है।
🔵 अखण्ड-जप रखना ही पर्याप्त है। अखण्ड यज्ञ का अत्युत्साह न दिखाया जाय। घृतदीप और अगरबत्ती जलाते रहने से हवन की संक्षिप्त प्रक्रिया पूरी होती रह सकती है। अखण्ड जप के साथ ही चौबीस घण्टे घृतदीप जलाने और धूपबत्ती प्रज्वलित करने की व्यवस्था बना दी जाय तो प्रकारान्तर से ही अखण्ड यज्ञ की विधि भी भाव दृष्टि से पूरी हो सकती है। यज्ञ दिन में ही किये जायें।
🔴 अखण्ड जप की एक पद्धति 24 घण्टा जप की है। दूसरी सूर्योदय से सूर्यास्त तक जप जारी रखने की भी है। उसे भी अखण्ड संज्ञा दी जानी चाहिए। सविता की उपस्थिति में वाचिक और व्यवस्थित जप ही यदि अभीष्ट हों तो 24 घण्टे के स्थान पर सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक भी सामूहिक जप किया जा सकता है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 25) 22 Jan
🌹 उत्साह एवं सक्रियता चिरयौवन के मूल आधार
🔵 प्रगति की आकांक्षा किसे नहीं होती? प्रत्येक व्यक्ति अपनी स्थिति से असन्तुष्ट रहता है और उससे आगे बढ़कर उन्नत स्थिति को प्राप्त करना चाहता है। बहुत से इसके लिए प्रयास भी करते हैं और अनेकों सफल भी होते हैं। कारण संकल्प का अभाव, प्रयत्नों में प्रखरता की कमी और तत्परता का न होना। बहुत से व्यक्ति युवावस्था में बड़े जोश-खरोश के साथ अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करते हैं, किन्तु थोड़े से प्रयत्न करने के बाद ही निराश हो जाते हैं। बहुतों की स्थिति ऐसी होती है, प्रयत्न और संघर्ष करते-करते युवावस्था बीत जाती है और वे अपने आपको वृद्ध समझकर हार थककर बैठ जाते।
🔴 वृद्धावस्था क्या सचमुच जीवन की सन्ध्या बेला है? इस प्रश्न का उत्तर उनके लिए ‘‘हां’’ में ही होता है किन्तु वास्तव में ऐसा है नहीं। बहुत से व्यक्तियों ने जिसे वृद्धावस्था कहते हैं। इस उम्र तक सामान्य जीवन बिताया और उसके बाद उनमें प्रगति के लिए ऐसी उदात्त आकांक्षा उत्पन्न हुई कि उसके बाद अपने प्रखर प्रयत्नों से उन्नति के उच्च शिखर पर पहुंचे। संस्कृत के प्रसिद्ध विद्वान श्रीपाद दामोदर सातवलेकर 60 वर्ष की आयु तक एक पाठशाला में ड्रॉइंग पढ़ाते थे। रिटायर होने के बाद उन्होंने संस्कृत सीखी और संस्कृत भाषा के क्षेत्र में इतना काम किया कि देखने वाले दंग रह गये। वेदों का शुद्ध पाठ तैयार करने से लेकर भारतीय संस्कृति का प्रगतिशील स्वरूप प्रतिपादित करने तक के क्षेत्र में उन्होंने इतनी सफलता अर्जित की कि आज भी जहां संस्कृत के सम्बन्ध में कहीं कोई मतभेद उठता है तो उसके समाधान और निराकरण के लिए सातवलेकर के ग्रन्थों को ही आधार माना जाता है।
🔵 महात्मा गांधी ने 45 वर्ष की अवस्था तक सामान्य जीवन जिया और इसके बाद वे एक क्रान्तिकारी सन्त के स्वरूप में उभरकर सामने आये। दादा भाई नौरोजी ने 50 वर्ष की आयु में अपना राजनैतिक जीवन आरम्भ किया तथा 60 वर्ष की आयु में पहली बार बम्बई कौंशिल के सदस्य चुने गये। 61 वर्ष की अवस्था में वे कांग्रेस के सभापति बने। गोपालकृष्ण गोखले ने 40 वर्ष की आयु में ‘भारत सेवक समाज’ की स्थापना की थी। लोकमान्य तिलक ने यद्यपि 33 वर्ष की आयु में अपना राजनैतिक जीवन आरम्भ किया था किन्तु उनकी गतिविधियां 1905 में ही अधिक सक्रिय हुई तब उनकी आयु 50 वर्ष थी। उसी समय उन्होंने गरम दल की स्थापना की थी।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 आप अपने आपको पहचान लीजिये (भाग 3)
🔴 अच्छा हनुमान् जी की बात मालूम है आपको कि नहीं मालूम हनुमान् जी को रामचंद्र जी ने कहा कि हमारे साथ- साथ चलो हमारा कुछ काम करो हनुमान् जी को फायदा हुआ कि नुकसान हुआ। क्या हुआ रामचंद्र जी की सीता जी से क्या रिश्ता रामचंद्र जी से क्या रिश्ता और उनके साथ जाने में जहाँ नौकरी का सवाल नहीं और सारी जिंदगी भर जब वह सयाने हो गये थे बड़े हो गये थे ब्याह होने दिया न शादी होने दी न अच्छे कपड़े पहनने दिये और रामचंद्र जी उनको ले गये। नुकसान किया कि नफा किया। नुकसान किया।
🔵 किसी से पूछा रीछ बंदरों से क्यों भाई कहाँ जा रहे हो वहाँ जा रहे हैं रामचंद्र जी के यहाँ जा रहे हैं क्यों। क्या बात है रामचंद्र जी के यहाँ रामचंद्र जी स्त्री धर्मपत्नी को चोरी हो गई है और उनको हम तलाश करेंगे रावण से लड़ेंगे। अरे मरेगा क्या बेवकूफ किसने पट्टी पढ़ा दी है मालूम यह पड़ता है कि नुकसान की बात बताई जा रही है लेकिन क्या वास्तव में नुकसान की बात थी नहीं नुकसान की बात नहीं थी अगर नुकसान की बात रही होती तो हनुमान् जी ने समुद्र को छलांग कैसे लिया और पहाड़ उखाड़कर के कैसे ले आये और रामचंद्र जी को और लक्ष्मण जी को कंधे पर रखकर कैसे फिरे। लंका जलाने में समर्थ कैसे हुए।
🔴 नुकसान था नुकसान नहीं था हनुमान् जी बहुत बड़े हो गये नहीं तो बंदर होते बंदर देखे हैं न आपने मदारियों के यहाँ नाचते रहते हैं बंदर आ जाते हैं तो कहते हैं मारो बंदर को भगाओ बंदर को। बंदर रह जाते लेकिन दूर की बात उनको दिखाई पड़ी कि नई इसमें मेरा लाभ है रामचंद्र जी के कहने में। उन्होंने देखा रामचंद्र जी वजनदार आदमी हैं। समझदार आदमी है। विश्वामित्र जी के बारे मे यही सोचा गया कि विश्वामित्र समझदार आदमी हैं बेअकल नहीं है बेवकूफ नहीं है हमारे बच्चों को ले जा रहे हैं तो मारने के लिए नहीं ले जा रहे हैं किसी बड़े काम के लिए ले जा रहे हैं। इस तरीके से ले गये लेकिन उस समय उनको नुकसान मालूम पड़ा था। बहुतों को मालूम पड़ा होगा।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 79)
🌹 आदर्श विवाहों के लिए 24 सूत्री योजना
🔴 7—दहेज लोभ के लिए नहीं दक्षिणा के रूप में:- मांगलिक कार्यों में पूजा सामग्री के रूप में दक्षिणा का भी स्थान है। वर-पूजन के रूप में एक रुपया या ग्यारह रुपया, विशेष मांगलिक अवसरों पर दिया जा सकता है। अधिक से अधिक यह राशि 101 रु. हो सकती है।
🔵 विवाह में तीन ऐसे अवसर रह सकते हैं। पक्की, दरवाजे पर स्वागत, विदाई। इन तीन रस्मों में नकदी 300 रु. से अधिक न दी जानी चाहिए। यह विशुद्ध रूप से पूजा दक्षिणा मानी जाय, कोई लेन-देन ठहराव या लाभ, लोभ की दृष्टि से न गिने। इससे अधिक लेन-देन या ठहरौनी को अवांछनीय माना जाय। वर्तमान कानूनों के अनुसार वह एक अपराध तो है ही। उसमें जेलखाने जाने और कड़ा दंड भुगतने की व्यवस्था तो है ही। कानून के भय से नहीं, नैतिकता एवं मानवता के कर्तव्यों का ध्यान रखकर भी इस दहेज प्रथा को उन्मूलन करने के लिए प्राण-पण से प्रयत्न किया जाय जिसने हिन्दू जाति को आर्थिक दृष्टि से खोखला, नैतिक दृष्टि से बेईमान, मानसिक दृष्टि से चिन्तातुर एवं असहाय बना रखा है। इस सामाजिक पाप से कलंकित सवर्ण हिन्दुओं के मुख को धोने का प्रयत्न हमें विशेष भावनापूर्वक करना चाहिए।
🔴 लड़के के अभिभावक या लड़का धन या वस्तुओं की कोई मांग न करें।
🔵 8—वर पक्ष जेवर न चढ़ावें:- कीमती जेवर और कपड़े चढ़ाने की समस्या लड़के वालों के लिए उतनी ही विकट है जितनी लड़की वालों के लिए दहेज देने की। यह दोनों प्रथायें एक दूसरे के साथ घनिष्ठ रूप में जुड़ी हुई हैं। इसलिए दोनों को एक ही बार समाप्त करना होगा।
🔴 लड़की वाले यह आशा करते हैं कि लड़के की ओर से कीमती जेवर, कपड़े कन्या के लिए आवें। इसमें जो खर्च पड़ता है उसे लड़के वाला दहेज के रूप में वसूल करता है। लड़के की शिक्षा आदि में वह भी इतना खर्च कर चुका होता है कि इन दिखावे मात्र की बेकार चीजों में धन लुटाने के लिए उसके पास भी बचा नहीं होता। कन्या वालों को अपनी ही तरह लड़के वालों की भी कठिनाई समझनी चाहिए और उन्हें जेवर, कपड़े में धन खर्च करने की चिन्ता से मुक्त कर देना चाहिए।
🔵 विवाह में वर पक्ष की ओर से लड़की के लिए एक सोने की अंगूठी, पैरों के लिए चांदी के तोड़िए यह दो जेवर ही चढ़ाये जांय और एक सूती, एक रेशमी जोड़ी कपड़े हों। जो कुछ लड़की के लिए लाया गया है उसका दिखावा जरा भी न हो।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 30)
🌞 दिए गए कार्यक्रमों का प्राण-पण से निर्वाह
🔴 स्वतन्त्रता संग्राम की कई बार जेलयात्रा, २४ महापुरश्चरणों का व्रत धारण, इसके साथ ही मेहतरानी की सेवा-साधना यह तीन परीक्षाएँ, मुझे छोटी उम्र में ही पास करनी पड़ीं। आन्तरिक दुर्बलताएँ और संबद्ध परिजनों के दुहरे मोर्चे पर एक साथ लड़ा। उस आत्म-विजय का ही परिणाम है कि आत्मबल संग्रह से अधिक लाभ से लाभान्वित होने का अवसर मिला। उन घटनाक्रमों से हमारा आपा बलिष्ठ होता चला गया एवं वे सभी कार्यक्रम हमारे द्वारा बखूबी निभते चले गए, जिनका हमें संकल्प दिलाया गया था। महापुरश्चरणों की शृंखला नियमित रूप से चलती रही। जिस दिन गुरुदेव के आदेश से उस साधना का शुभारम्भ किया था, उसी दिन घृत दीप की अखण्ड ज्योति भी स्थापित की। उसकी जिम्मेदारी हमारी धर्मपत्नी ने सँभाली, जिन्हें हम भी माता जी के नाम से पुकारते हैं। छोटे बच्चे की तरह उस पर हर घड़ी ध्यान रखे जाने की आवश्यकता पड़ती थी। अन्यथा वह बच्चे की तरह मचल सकता था, बुझ सकता था। वह अखण्ड दीपक इतने लम्बे समय से बिना किसी व्यवधान के अब तक नियमित जलता रहा है। इसके प्रकाश में बैठकर जब भी साधना करते हैं, तो मनःक्षेत्र में अनायास ही दिव्य भावनाएँ उठती रहती हैं। कभी किसी उलझन को सुलझाना अपनी सामान्य बुद्धि के लिए सम्भव नहीं होता, तो इस अखण्ड ज्योति की प्रकाश किरण अनायास ही उस उलझन को सुलझा देती है।
🔵 नित्य ६६ माला का जप, गायत्री माता के चित्र प्रतीक का धूप, नैवेद्य, अक्षत, पुष्प, जल से पूजन। जप के साथ-साथ प्रातःकाल के उदीयमान सविता का ध्यान। अंत में सूर्यार्घ्यदान। इतनी छोटी सी विधि व्यवस्था अपनाई गई। उसके साथ बीज-मंत्र का सम्पुट आदि का कोई तांत्रिक विधि-विधान जोड़ा नहीं गया, किंतु श्रद्धा अटूट रही। सामने विद्यमान गायत्री माता के चित्र के प्रति असीम श्रद्धा उमड़ती रही। लगता रहा कि वे साक्षात सामने बैठी हैं। कभी-कभी उनके आँचल में मुँह छिपाकर प्रेमाश्रु बहाने के लिए मन उमड़ता। ऐसा नहीं हुआ कि मन न लगा हो। कहीं अन्यत्र भागा हो। तन्मयता निरंतर प्रगाढ़ स्तर की बनी रही। समय पूरा हो जाता, तो अलग अलार्म बजता। अन्यथा उठने को जी ही नहीं करता। उपासना क्रम में कभी एक दिन भी विघ्न न आया।
🔴 यही बात अध्ययन के सम्बन्ध में रही। उसके लिए अतिरिक्त समय न निकालना पड़ा। काँग्रेस कार्यों के लिए प्रायः काफी-काफी दूर चलना पड़ा। जब परामर्श या कार्यक्रम का समय आता, तब पढ़ना बंद हो जाता, जहाँ चलना आरम्भ हुआ, वहीं पढ़ना भी आरम्भ हो गया। पुस्तक साइज के चालीस पन्ने प्रति घण्टे पढ़ने की स्पीड रही। कम से कम दो घण्टे नित्य पढ़ने के लिए मिल जाते। कभी-कभी ज्यादा भी। इस प्रकार दो घण्टे में ८० पृष्ठ। महीने में २४०० पृष्ठ। साल भर में २८००० पृष्ठ। साठ वर्ष की कुछ अवधि में साढ़े अट्ठारह लाख पृष्ठ हमने मात्र अपनी अभिरुचि के पढ़े हैं। लगभग तीन हजार पृष्ठ नित्य विहंगम रूप से पढ़ लेने की बात भी हमारे लिए स्नान भोजन की तरह आसान व सहज रही है। यह क्रम प्रायः ६० वर्ष से अधिक समय से चलता आ रहा है और इतने दिन में अनगिनत पृष्ठ उन पुस्तकों के पढ़ डाले जो हमारे लिए आवश्यक विषयों से सम्बन्धित थे। महापुरश्चरणों की समाप्ति के बाद समय अधिक मिलने लगा। तब हमने भारत के विभिन्न पुस्तकालयों में जाकर ग्रंथों-पाण्डुलिपियों का अध्ययन किया। वह हमारे लिए अमूल्य निधि बन गई।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 30)
🌞 हिमालय में प्रवेश
गर्जन-तर्जन करती भेरों घाटी
🔵 सोचता हूं कि सोरों आदि स्थानों में जहां मीलों की चौड़ाई गंगा की है वहां जलधारा धीमे-धीमे बहती रहती है वहां प्रवाह में न प्रचण्डता होती है और न तीव्रता। पर इस छोटी घाटी के तंग दायरे में होकर गुजरने के कारण जल धारा इतनी तीव्र गति से बही। मनुष्य का जीवन विभिन्न क्षेत्रों में बंटा रहता है बहु सुखी रहता है उसमें कुछ विशेषता पैदा नहीं हो पाती पर जब एक विशिष्ट लक्ष को ले कर कोई व्यक्ति उस सीमित क्षेत्र में ही अपनी सारी शक्तियों को केन्द्रित कर देता है तो उसके द्वारा आश्चर्य जनक उत्साह वर्धक परिणाम उत्पन्न होते देखे जाते हैं। मनुष्य यदि अपने कार्य क्षेत्र को बहुत फैलाने, अनेक और अधूरे काम करने की अपेक्षा अपने लिये एक विशेष कार्य क्षेत्र चुन ले तो क्या वह भी इस तंग घाटी में गुजरते समय उछलती गंगा की तरह आगे बढ़ सकता है? उन्नति नहीं कर सकता?
🔴 जलधारा के बीच पड़े हुए शिला खण्ड पानी से टकराने के लिए विवश कर रहे थे। इसी संघर्ष में गर्जन-तर्जन हो रहा था और छोटे रुई के गुब्बारों के बने पहाड़ की तरह ऊपर उठ रहे थे। सोचता हूं यदि कठिनाइयां जीवन में न हो तो व्यक्ति की विशेषताएं बिना प्रकट हुए ही रह जायं। टकराने से शक्ति उत्पन्न होने का सिद्धान्त एक सुनिश्चित तथ्य है। आराम का शौक-मौज का जीवन विलासी जीवन निर्जीवों से कुछ ही ऊंचा माना जा सकता है।
🔵 कष्ट सहिष्णुता, तितीक्षा, तपश्चर्या एवं प्रतिरोधों से बिना खिन्नता मन में लाये वीरोचित भाव से लिपटने का साहस यदि मनुष्य अपने भीतर एकत्रित करले तो उसकी कीर्ति भी उस आज के स्थान की भांति गर्जन-तर्जन करती हुई दिग्दिगंत में व्याप्त हो सकती है, उसका विशेषतायुक्त व्यक्तित्व छींटों के उड़ते हुए फुवार की तरह से ही दिखाई दें सकता है। गंगा डरती नहीं, न शिकायत करती है, वह तंगी में होकर गुजरती है, मार्ग रोकने वाले रोड़ों से घबराती नहीं वरन् उनसे टकराती हुई अपना रास्ता बनाती है। काश हमारी अन्तःचेतना भी ऐसे ही प्रबल वेग से परिपूर्ण हुई होती तो व्यक्तित्व के निखरने का कितना अमूल्य अवसर हाथ लगता।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
शुक्रवार, 20 जनवरी 2017
👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 14) 21 Jan
🌹 त्रिविध भवबन्धन एवं उनसे मुक्ति
🔴 अध्यात्म विज्ञान के साधकों को अपने दृष्टिकोण में मौलिक परिवर्तन करना पड़ता है। उन्हें सोचना होता है कि मानव जीवन की बहुमूल्य धरोहर का इस प्रकार उपयोग करना है, जिससे शरीर का निर्वाह लोक व्यवहार भी चलता रहे, पर साथ ही आत्मिक अपूर्णता को पूरी करने का चरम लक्ष्य भी प्राप्त हो सके। ईश्वर के दरबार में पहुँचकर सीना तानकर यह कहा जा सके कि जो अमानत जिस प्रयोजन के लिये सौंपी गई थी, उसे उसी हेतु सही रूप में प्रयुक्त किया गया।
🔵 इस मार्ग में सबसे बड़ी रुकावटें तीन हैं। इन्हीं को रावण, कुम्भकरण, मेघनाथ कहा गया है। यह दैवी भागवत के महिषासुर, मधुकैटभ, रक्तबीज हैं। ये प्राय: साथ लगे रहते हैं और पीछा नहीं छोड़ते। इन्हीं के कारण मनुष्य पतन और पराभव के गर्त में जा गिरता है। पशु, प्रेत और पिशाच की जिन्दगी जीता है। नर-वानर और नर-पामर के रूप में इन्हीं के चंगुल में फँसे हुए लोगों को देखा जाता है। ये तीन हैं-लोभ मोह एवं अहंकार। वासना, तृष्णा और कुत्सा इन्हीं के कारण उत्पन्न होती है।
🔴 लोक विजय के लिये सादा जीवन उच्च विचार का सिद्धान्त अपनाना पड़ता है। औसत नागरिक स्तर के निर्वाह में सन्तोष करना पड़ता है। ईमानदारी और परिश्रम की कमाई पर निर्भर रहना पड़ता है। लालची के लिये अनीति अपनाये बिना तृष्णा की पूर्ति कर सकना किसी भी प्रकार सम्भव नहीं होता। जो व्यक्ति विलास में अधिक खर्च करता है, वह प्रकारान्तर से दूसरों को उतना ही अभावग्रस्त रहने के लिये मजबूर करता है। इसीलिये शास्त्रकारों ने परिग्रह को पाप बताया है। विलासी, संग्रही, अपव्ययी की भी ऐसी निन्दा की गई है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔴 अध्यात्म विज्ञान के साधकों को अपने दृष्टिकोण में मौलिक परिवर्तन करना पड़ता है। उन्हें सोचना होता है कि मानव जीवन की बहुमूल्य धरोहर का इस प्रकार उपयोग करना है, जिससे शरीर का निर्वाह लोक व्यवहार भी चलता रहे, पर साथ ही आत्मिक अपूर्णता को पूरी करने का चरम लक्ष्य भी प्राप्त हो सके। ईश्वर के दरबार में पहुँचकर सीना तानकर यह कहा जा सके कि जो अमानत जिस प्रयोजन के लिये सौंपी गई थी, उसे उसी हेतु सही रूप में प्रयुक्त किया गया।
🔵 इस मार्ग में सबसे बड़ी रुकावटें तीन हैं। इन्हीं को रावण, कुम्भकरण, मेघनाथ कहा गया है। यह दैवी भागवत के महिषासुर, मधुकैटभ, रक्तबीज हैं। ये प्राय: साथ लगे रहते हैं और पीछा नहीं छोड़ते। इन्हीं के कारण मनुष्य पतन और पराभव के गर्त में जा गिरता है। पशु, प्रेत और पिशाच की जिन्दगी जीता है। नर-वानर और नर-पामर के रूप में इन्हीं के चंगुल में फँसे हुए लोगों को देखा जाता है। ये तीन हैं-लोभ मोह एवं अहंकार। वासना, तृष्णा और कुत्सा इन्हीं के कारण उत्पन्न होती है।
🔴 लोक विजय के लिये सादा जीवन उच्च विचार का सिद्धान्त अपनाना पड़ता है। औसत नागरिक स्तर के निर्वाह में सन्तोष करना पड़ता है। ईमानदारी और परिश्रम की कमाई पर निर्भर रहना पड़ता है। लालची के लिये अनीति अपनाये बिना तृष्णा की पूर्ति कर सकना किसी भी प्रकार सम्भव नहीं होता। जो व्यक्ति विलास में अधिक खर्च करता है, वह प्रकारान्तर से दूसरों को उतना ही अभावग्रस्त रहने के लिये मजबूर करता है। इसीलिये शास्त्रकारों ने परिग्रह को पाप बताया है। विलासी, संग्रही, अपव्ययी की भी ऐसी निन्दा की गई है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 जिज्ञासु के लक्षण-श्रद्धा और नम्रता
🔴 एक बार राजा जातश्रुति के राजमहल की छत पर हंस आकर बैठे और आपस में बात करने लगे। एक हंस ने कहा जिसके राजमहल पर हम बैठे है, वह बड़ा धर्मात्मा और दानी है। इसकी कीर्ति दूर-दूर तक फैली हुई है। इस पर दूसरे हंस ने कहा- गाड़ीवान रैक्य की तुलना में यह न तो ज्ञानी है और न दानी।
🔵 इस वार्ता को जातश्रुति सुन रहे थे। उन्हें गाड़ीवान रैक्य से भेंट करने की इच्छा हुई। उनने चारों दिशाओं में दूत भेजे। पर वे निराश होकर लौटे। उनने कहा-राजन् हमने सभी नगर, मन्दिर, मठ ढूँढ़ डाले पर वे कही नहीं मिले। तब राजा ने विचार किया ब्रह्मज्ञानी पुरुषों का विषयी लोगों के बीच रहना कैसे हो सकता है। अवश्य ही वे कही साधना के उपयुक्त एकान्त स्थान में होंगे वही उन्हें तलाश कराना चाहिए।
🔵 अब की बार दूत फिर भेजे गये तो वे एक निर्जन प्रदेश में अपनी गाड़ी के नीचे बैठे मिल गये। यही उनका घर था। राजा उनके पास बहुत धन, आभूषण, गाऐं, रथ आदि लेकर पहुँचा। उसका विचार था कि रैक्य इस वैभव को देखकर प्रसन्न होंगे और मुझे ब्रह्मज्ञान का उपदेश देंगे। पर परिणाम वैसा नहीं हुआ। रैक्य ने कहा-अरे शूद्र! यह धन वैभव तू मेरे लिए व्यर्थ ही लाया है। इन्हें अपने पास ही रख।” ऋषि को क्रुद्ध देखकर राजा निराश वापिस लौट आया और सोचता रहा कि किस वस्तु से उन्हें प्रसन्न करूँ। सोचते-सोचते उसे सूझा कि विनय और श्रद्धा से ही सत्पुरूष प्रसन्न होते है। तब वह हाथ में समिधाएं लेकर, राजसी ठाठ-बाठ छोड़कर एक विनीत जिज्ञासु के रूप में उनके पास पहुँचा। रैक्य ने राजा में जिज्ञासु के लक्षण देखे तो वे गदगद हो उठे। उनने जातश्रुति को हृदय से लगा लिया और प्रेम पूर्वक ब्रह्म विद्या का उपदेश दिया।
🌹 अखण्ड ज्योति जून 1961 पृष्ठ 25
🔵 इस वार्ता को जातश्रुति सुन रहे थे। उन्हें गाड़ीवान रैक्य से भेंट करने की इच्छा हुई। उनने चारों दिशाओं में दूत भेजे। पर वे निराश होकर लौटे। उनने कहा-राजन् हमने सभी नगर, मन्दिर, मठ ढूँढ़ डाले पर वे कही नहीं मिले। तब राजा ने विचार किया ब्रह्मज्ञानी पुरुषों का विषयी लोगों के बीच रहना कैसे हो सकता है। अवश्य ही वे कही साधना के उपयुक्त एकान्त स्थान में होंगे वही उन्हें तलाश कराना चाहिए।
🔵 अब की बार दूत फिर भेजे गये तो वे एक निर्जन प्रदेश में अपनी गाड़ी के नीचे बैठे मिल गये। यही उनका घर था। राजा उनके पास बहुत धन, आभूषण, गाऐं, रथ आदि लेकर पहुँचा। उसका विचार था कि रैक्य इस वैभव को देखकर प्रसन्न होंगे और मुझे ब्रह्मज्ञान का उपदेश देंगे। पर परिणाम वैसा नहीं हुआ। रैक्य ने कहा-अरे शूद्र! यह धन वैभव तू मेरे लिए व्यर्थ ही लाया है। इन्हें अपने पास ही रख।” ऋषि को क्रुद्ध देखकर राजा निराश वापिस लौट आया और सोचता रहा कि किस वस्तु से उन्हें प्रसन्न करूँ। सोचते-सोचते उसे सूझा कि विनय और श्रद्धा से ही सत्पुरूष प्रसन्न होते है। तब वह हाथ में समिधाएं लेकर, राजसी ठाठ-बाठ छोड़कर एक विनीत जिज्ञासु के रूप में उनके पास पहुँचा। रैक्य ने राजा में जिज्ञासु के लक्षण देखे तो वे गदगद हो उठे। उनने जातश्रुति को हृदय से लगा लिया और प्रेम पूर्वक ब्रह्म विद्या का उपदेश दिया।
🌹 अखण्ड ज्योति जून 1961 पृष्ठ 25
👉 अपने चरित्र का निर्माण करो
🔵 जिसे तुम अच्छा मानते हो, यदि तुम उसे अपने आचरण में नहीं लाते तो यह तुम्हारी कायरता है। हो सकता है कि भय तुम्हें ऐसा नहीं करने देता हो, लेकिन इससे तुम्हारा न तो चरित्र ऊंचा उठेगा और न तुम्हें गौरव मिलेगा। मन में उठने वाले अच्छे विचारों को दबाकर तुम बार बार जो आत्म हत्या कर रहे हो आखिर उससे तुमने किस लाभ का अन्दाजा लगाया है?
🔴 शान्ति और तृप्ति, आचारवान व्यक्ति को ही प्राप्ति होती हैं। जो मन में है वही वाणी और कर्म में होने पर जैसी शान्ति मिलती है उसका एक अंश भी मन वाणी और कर्म में अन्तर रखने वाले व्यक्ति को प्राप्त नहीं होता। बल्कि ऐसा व्यक्ति घुट-घुट कर मरता है और दिन रात अशान्ति के ही चक्कर में पड़ा रहता है।
🔵 घुट-घुट कर लाख वर्ष जीने की अपेक्षा उस एक दिन का जीना अधिक श्रेयस्कर है जिसमें शान्ति है, तृप्ति है। परन्तु भय का भूत मनुष्य को न जिन्दा ही रहने देता है और न मरने ही देता है। भय की उत्पत्ति का कारण आशक्ति है, मोह है। शरीर का मोह, धन का मोह आदमी को कहीं का नहीं रहने देता, शरीर का चाहे जितना मोह करो उसे किसी न किसी दिन मिट्टी में मिलना ही है, अमर हो ही नहीं सकता तब फिर उसे आत्मोन्नति के साधन के लिए उपयोग में न लाकर जो लोग उसका भार ढोकर चलते रहना पसन्द करते हैं, पसन्द करते ही नहीं बल्कि चलते रहते हैं वे आत्मा को अन्धेरे की ओर ही गिराते हैं। धन और शरीर ये जीवन के लक्ष्य नहीं हैं, जीवन का लक्ष्य तो है आत्मा की उन्नति, आत्मा की प्राप्ति। इसलिए शरीर और धन का जो लोग इसके लिए उपयोग नहीं करते वे प्राप्त साधनों का दुरुपयोग न करके अपने भावी जीवन में किसी महान संकट के लिए निमन्त्रण देते हैं।
🌹 अगले अंक में समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति 1948 सितम्बर पृष्ठ 3
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1948/September.3
🔴 शान्ति और तृप्ति, आचारवान व्यक्ति को ही प्राप्ति होती हैं। जो मन में है वही वाणी और कर्म में होने पर जैसी शान्ति मिलती है उसका एक अंश भी मन वाणी और कर्म में अन्तर रखने वाले व्यक्ति को प्राप्त नहीं होता। बल्कि ऐसा व्यक्ति घुट-घुट कर मरता है और दिन रात अशान्ति के ही चक्कर में पड़ा रहता है।
🔵 घुट-घुट कर लाख वर्ष जीने की अपेक्षा उस एक दिन का जीना अधिक श्रेयस्कर है जिसमें शान्ति है, तृप्ति है। परन्तु भय का भूत मनुष्य को न जिन्दा ही रहने देता है और न मरने ही देता है। भय की उत्पत्ति का कारण आशक्ति है, मोह है। शरीर का मोह, धन का मोह आदमी को कहीं का नहीं रहने देता, शरीर का चाहे जितना मोह करो उसे किसी न किसी दिन मिट्टी में मिलना ही है, अमर हो ही नहीं सकता तब फिर उसे आत्मोन्नति के साधन के लिए उपयोग में न लाकर जो लोग उसका भार ढोकर चलते रहना पसन्द करते हैं, पसन्द करते ही नहीं बल्कि चलते रहते हैं वे आत्मा को अन्धेरे की ओर ही गिराते हैं। धन और शरीर ये जीवन के लक्ष्य नहीं हैं, जीवन का लक्ष्य तो है आत्मा की उन्नति, आत्मा की प्राप्ति। इसलिए शरीर और धन का जो लोग इसके लिए उपयोग नहीं करते वे प्राप्त साधनों का दुरुपयोग न करके अपने भावी जीवन में किसी महान संकट के लिए निमन्त्रण देते हैं।
🌹 अगले अंक में समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति 1948 सितम्बर पृष्ठ 3
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1948/September.3
👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 30) 21 Jan
🌹 अखण्ड जप करें—अखण्ड यज्ञ नहीं
🔴 गायत्री जयन्ती, गुरु पूर्णिमा, बसन्त पंचमी आदि पर्वों पर अखण्ड गायत्री जप रखा जाता है। जिस समय से आरम्भ करते हैं उसी समय पर समाप्ति भी होती है। 24 घण्टे में प्रायः आधा समय दिन का और आधा रात्रि का होता है। दिन में मन्त्र उच्चारण सहित और रात्रि में मानसिक जप करने की परम्परा है। अखण्ड जप में एक ही विधि रखी जाती है। दिन में एक प्रकार और रात्रि में दूसरी प्रकार नहीं करते। इसलिए पूरा अखण्ड जप मानसिक ही होना उपयुक्त रहता है। इसमें एकरसता बनी रहती है। यों जहां कहीं दिन और रात्रि के अन्तर को ध्यान में रखते हुए वाचिक और मानसिक जप की भिन्नता रखी जा सके वहां वैसा भी हो सकता है। सरलता मानसिक जप में ही रहती है।
🔵 यज्ञ अखण्ड करने का विधान नहीं है। वह नियत समय में ही समाप्त होना चाहिए। यज्ञ का उपयुक्त समय दिन है। दिन में कीड़े-मकोड़े अग्नि में न जा पहुंचें, इसका ध्यान रखा जा सकता है। रात्रि में कृत्रिम प्रकाश उत्पन्न कर लेने पर भी ऐसी स्थिति नहीं बन पड़ती कि छोटे कीड़ों को पूरी तरह देख सकना या रोक सकना सम्भव हो सके। सर्व विदित है कि पतंगों से लेकर छोटे कृमि-कीटक दिन की अपेक्षा रात्रि में ही अपनी गति-विधियां अधिक विस्तृत करते हैं। इसलिए रात्रि में हिंसा की सम्भावना अधिक रहने, सतर्कता कम बन पड़ने की स्थिति को ध्यान में रखते हुए सूर्य की उपस्थिति में ही यज्ञ-कर्म करने की परम्परा है। ऐसे समय में रात्रि के समय भी यज्ञ जारी रखने का औचित्य नहीं है।
🔴 विवाह-शादियां प्रायः रात्रि के समय होने का ही प्रचलन है। उस समय अग्निहोत्र होता है, पर वह अपवाद है। यों विवाह विधि भी शास्त्र परम्परा के अनुसार दिन में ही होनी चाहिए और उसका अग्निहोत्र भाग भी दिन में ही निपटना चाहिए। पर लोगों ने सुविधा का ध्यान रखते हुए रात्रि को फुरसत में विवाह की धूमधाम करने का रास्ता निकाल लिया है। दिन में करने से दिन के अन्य कामों का हर्ज होता है। ऐसे ही कारणों से विवाह जैसे अवसरों पर अपवाद रूप से रात्रि में ही हवन होते हैं।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 24) 21 Jan
🌹 आत्मविश्वास क्या नहीं कर सकता?
🔵 दूसरे दिन सेना ने कूच कर दिया, सेना का नेतृत्व युद्ध अनुभवों से सर्वथा अपरिचित फकीर कर रहा था। थोड़ी ही दूर वे चले होंगे कि फकीर ने रुकने का संकेत किया, इस नये सेनापति के आदेश पर सेना रुक गई। सेनापति चाहे जो निर्णय ले, सभी सैनिक उसका अनुकरण करने पर मजबूर थे। युद्ध क्षेत्र अभी दूर था। बीच में अकारण रुककर समय बर्बाद करने का कोई औचित्य नजर नहीं आ रहा था। सैनिक असमंजस में पड़ गये। इसी बीच सामने के मन्दिर की ओर इशारा करते हुए कहा— ‘‘युद्ध से पूर्व इस मन्दिर के देवता से पूछ लेते हैं कि जीत होगी या हार। यदि देवता जीत के लिए कह देते हैं तो फिर किसी का डर नहीं। दुश्मन की सेना कितनी ही विकट क्यों न हो जीत निश्चित ही हमारी होगी। यदि नहीं तो फिर चलने से क्या लाभ!’’
🔴 सैनिकों ने कहा कि आप तो एकान्त में देवता से पूछेंगे। देवता क्या उत्तर देते हैं यह हमें कैसे पता चलेगा?’’ ‘‘नहीं! अकेले में नहीं पूछूंगा। तुम सबके सामने ही देवता के सामने मैं प्रश्न करूंगा।’’ यह कहते हुए फकीर ने झोली से एक चमकता हुआ सिक्का निकाला और बताया कि अगर यह सिक्का चित्त गिरता है तो जीत हमारी ही होगी, यदि पट गिरेगा तो हम वापिस लौट जायेंगे। फकीर ने सिक्का ऊपर उछाला— सिक्के के गिरने के साथ ही उनके भाग्य का निर्णय होना था। सब विस्फारित नेत्रों से एक टक सिक्के को देख रहे थे। सिक्के के गिरते ही सबकी आंखें चमक गयीं। सिक्का चित्त गिरा था—जीत सुनिश्चित थी फकीर ने सबको उत्साहित करते हुए कहा— ‘‘अब डरने की कोई बात नहीं, देवता का आश्वासन हमें मिल गया है।’’
🔵 दोनों पक्षों की भयंकर लड़ाई के बाद जीत जापान के पक्ष में हुई। युद्धोपरान्त सैनिकों ने मन्दिर के पास पहुंचकर कहा कि देवता को धन्यवाद दे दें जिसने हमें जिताया, फकीर ने कहा देवता को धन्यवाद देने की आवश्यकता नहीं बल्कि अपने आपको धन्यवाद दो। तुम स्वयं ही अपनी जीत के आधार हो।’
🔴 ‘‘जीत का देवता से कोई सम्बन्ध नहीं।’’ यह कहते हुए फकीर ने सिक्का पुनः झोली से निकालकर सैनिकों के हाथ पर रख दिया। सैनिकों के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब उन्होंने देखा कि सिक्के के दोनों और चित्त के निशान थे। यह और कुछ नहीं सैनिकों के सोये आत्मविश्वास को जगाने की एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया भर थी जो अन्ततः जीत का कारण बनी।
🔵 संसार की महत्वपूर्ण सफलताओं का इतिहास आत्मविश्वास की गौरव गाथा से भरा पड़ा है। उत्कर्ष व्यक्ति का करना हो— समाज का अथवा राष्ट्र का, सर्वप्रथम आवश्यकता है अपने अन्दर सोये आत्मविश्वास रूपी देवता को जगाया जाये। अनुदान-वरदान सहज ही बरसते चले आयेंगे।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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🔵 दूसरे दिन सेना ने कूच कर दिया, सेना का नेतृत्व युद्ध अनुभवों से सर्वथा अपरिचित फकीर कर रहा था। थोड़ी ही दूर वे चले होंगे कि फकीर ने रुकने का संकेत किया, इस नये सेनापति के आदेश पर सेना रुक गई। सेनापति चाहे जो निर्णय ले, सभी सैनिक उसका अनुकरण करने पर मजबूर थे। युद्ध क्षेत्र अभी दूर था। बीच में अकारण रुककर समय बर्बाद करने का कोई औचित्य नजर नहीं आ रहा था। सैनिक असमंजस में पड़ गये। इसी बीच सामने के मन्दिर की ओर इशारा करते हुए कहा— ‘‘युद्ध से पूर्व इस मन्दिर के देवता से पूछ लेते हैं कि जीत होगी या हार। यदि देवता जीत के लिए कह देते हैं तो फिर किसी का डर नहीं। दुश्मन की सेना कितनी ही विकट क्यों न हो जीत निश्चित ही हमारी होगी। यदि नहीं तो फिर चलने से क्या लाभ!’’
🔴 सैनिकों ने कहा कि आप तो एकान्त में देवता से पूछेंगे। देवता क्या उत्तर देते हैं यह हमें कैसे पता चलेगा?’’ ‘‘नहीं! अकेले में नहीं पूछूंगा। तुम सबके सामने ही देवता के सामने मैं प्रश्न करूंगा।’’ यह कहते हुए फकीर ने झोली से एक चमकता हुआ सिक्का निकाला और बताया कि अगर यह सिक्का चित्त गिरता है तो जीत हमारी ही होगी, यदि पट गिरेगा तो हम वापिस लौट जायेंगे। फकीर ने सिक्का ऊपर उछाला— सिक्के के गिरने के साथ ही उनके भाग्य का निर्णय होना था। सब विस्फारित नेत्रों से एक टक सिक्के को देख रहे थे। सिक्के के गिरते ही सबकी आंखें चमक गयीं। सिक्का चित्त गिरा था—जीत सुनिश्चित थी फकीर ने सबको उत्साहित करते हुए कहा— ‘‘अब डरने की कोई बात नहीं, देवता का आश्वासन हमें मिल गया है।’’
🔵 दोनों पक्षों की भयंकर लड़ाई के बाद जीत जापान के पक्ष में हुई। युद्धोपरान्त सैनिकों ने मन्दिर के पास पहुंचकर कहा कि देवता को धन्यवाद दे दें जिसने हमें जिताया, फकीर ने कहा देवता को धन्यवाद देने की आवश्यकता नहीं बल्कि अपने आपको धन्यवाद दो। तुम स्वयं ही अपनी जीत के आधार हो।’
🔴 ‘‘जीत का देवता से कोई सम्बन्ध नहीं।’’ यह कहते हुए फकीर ने सिक्का पुनः झोली से निकालकर सैनिकों के हाथ पर रख दिया। सैनिकों के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब उन्होंने देखा कि सिक्के के दोनों और चित्त के निशान थे। यह और कुछ नहीं सैनिकों के सोये आत्मविश्वास को जगाने की एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया भर थी जो अन्ततः जीत का कारण बनी।
🔵 संसार की महत्वपूर्ण सफलताओं का इतिहास आत्मविश्वास की गौरव गाथा से भरा पड़ा है। उत्कर्ष व्यक्ति का करना हो— समाज का अथवा राष्ट्र का, सर्वप्रथम आवश्यकता है अपने अन्दर सोये आत्मविश्वास रूपी देवता को जगाया जाये। अनुदान-वरदान सहज ही बरसते चले आयेंगे।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 आप अपने आपको पहचान लीजिये (भाग 2)
🔴 इसी प्रकार से ढेरों की ढेरों बातें ऐसी होती है जिसमें गलती होती है विश्वामित्र आये और कहने लगे अपने दोनों बच्चों को हमारे सुपुर्द कर दीजिये हमको यज्ञ की रक्षा के लिये इनकी जरूरत है सारे घर में कुहराम मच गया मंत्रियों ने विरोध किया नौकरों ने विरोध किया हर एक ने विरोध किया अरे जरा- जरा से बच्चे हो इनको कहाँ ले जाते हो राक्षसों से लड़ाने ले जा रहे हो अरे यह राक्षसों से लड़ेंगे क्या। अरे यह तो मारे जायेंगे बेचारे अरे यह कैसा विश्वामित्र आ गया और कैसे इनके गुरु हैं सब लोगों ने एकदम शुरू से आखिरी तक निंदा की। लेकिन वास्तव में वह नफे की बात थी।
🔵 विश्वामित्र आये थे उस समय तो नहीं बताया था उन्होंने लेकिन पीछे बताया कि हमने तुम्हें बला विद्या और अतिबला विद्या दोनों को सिखाने के लिये हम लाये हैं गायत्री और सावित्री का रहस्य सिखाने के लिए लाये हैं इससे आपको दोनों फायदे होंगे। रामचंद्र जी को ढेरों के ढेरों फायदे हुए शंकर जी का धनुष बहुत भारी था उसको कोई उठा तक नहीं सकता था कितने राजा लगे थे लेकिन उठाने में समर्थ नहीं हो सके लेकिन रामचंद्र जी ने उठाया और उठाया ही नहीं तोड़कर फेंक दिया। और सीता जी से ब्याह हो गया। सीता जी से ब्याह करने के लिए रावण से लेकर कितने राजा महाराजा बैठे हुए थे सबके पल्ले नहीं पड़ी लेकिन रामचंद्र जी के पल्ले पड़ गई।
🔴 रावण जो न जाने कितने को तंग कर रहा था जिसकी सोने की लंका थी उस सारी की सारी को रामचंद्र जी ने तोड़ मरोड़कर फेंक दिया। और रामराज्य की स्थापना करने में समर्थ हो गये, कितने फायदे हुए। फायदा करना आये थे कि नुकसान करने आये थे। बताइये आप। मेरे ख्याल से अगर आपको दूर को देखना नहीं आता है तुरन्त का देखना आता है तो आप भी उन्हीं नौकरों की तरह से कहेंगे जो दशरथ जी के यहाँ नौकरी करते थे और उन सबने कहा था भेजना ठीक नहीं है रानियों ने मना किया था बच्चों को भेजना ठीक नहीं है। लेकिन वो तो नहीं माने और ले गये और ले गये तो नफा हुआ नुकसान नहीं हुआ। रामचंद्र जी की बात मालूम है न आपको मालूम है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/lectures_gurudev/31
🔵 विश्वामित्र आये थे उस समय तो नहीं बताया था उन्होंने लेकिन पीछे बताया कि हमने तुम्हें बला विद्या और अतिबला विद्या दोनों को सिखाने के लिये हम लाये हैं गायत्री और सावित्री का रहस्य सिखाने के लिए लाये हैं इससे आपको दोनों फायदे होंगे। रामचंद्र जी को ढेरों के ढेरों फायदे हुए शंकर जी का धनुष बहुत भारी था उसको कोई उठा तक नहीं सकता था कितने राजा लगे थे लेकिन उठाने में समर्थ नहीं हो सके लेकिन रामचंद्र जी ने उठाया और उठाया ही नहीं तोड़कर फेंक दिया। और सीता जी से ब्याह हो गया। सीता जी से ब्याह करने के लिए रावण से लेकर कितने राजा महाराजा बैठे हुए थे सबके पल्ले नहीं पड़ी लेकिन रामचंद्र जी के पल्ले पड़ गई।
🔴 रावण जो न जाने कितने को तंग कर रहा था जिसकी सोने की लंका थी उस सारी की सारी को रामचंद्र जी ने तोड़ मरोड़कर फेंक दिया। और रामराज्य की स्थापना करने में समर्थ हो गये, कितने फायदे हुए। फायदा करना आये थे कि नुकसान करने आये थे। बताइये आप। मेरे ख्याल से अगर आपको दूर को देखना नहीं आता है तुरन्त का देखना आता है तो आप भी उन्हीं नौकरों की तरह से कहेंगे जो दशरथ जी के यहाँ नौकरी करते थे और उन सबने कहा था भेजना ठीक नहीं है रानियों ने मना किया था बच्चों को भेजना ठीक नहीं है। लेकिन वो तो नहीं माने और ले गये और ले गये तो नफा हुआ नुकसान नहीं हुआ। रामचंद्र जी की बात मालूम है न आपको मालूम है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/lectures_gurudev/31
👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 78)
🌹 आदर्श विवाहों के लिए 24 सूत्री योजना
🔴 4— उपजातियों को बहुत महत्व न दिया जाय:- प्राचीन काल में चार वर्ण थे। प्रत्येक वर्ण के अन्तर्गत गोत्र बचाकर विवाह होते रहें। उपजातियों के कारण विवाह सम्बन्धी प्रतिबन्ध शिथिल किये जांय।
🔵 5— विधवा या विधुरों से लिए समान सुविधा-असुविधा:- पुरुष और स्त्री के अधिकारों और कर्तव्यों में बहुत कुछ समानता है। इसलिए विधवा और विधुरों को भी समान सुविधा-असुविधा उपलब्ध हों।
🔴 साथी के मरने के बाद शेष जीवन एकाकी व्यतीत करना दोनों के लिए प्रशंसनीय है। पर यदि वे पुनः विवाह करना चाहें तो उन्हें समान रूप से सुविधा रहे। विधुरों के लिए यही उचित है कि वे विधवा से विवाह करें। विधवाओं का विवाह उतना ही अच्छा या बुरा माना जाय जितना विधुरों का।
🔵 6—आर्थिक आदान प्रदान न हो:- न तो कन्या के मूल्य के रूप में लड़की वाले वर पक्ष से कुछ धन मांगें और न लड़के वाले वर की कीमत लड़की वाले से पाने की आशा करें।
🔴 आदिवासियों, वन्य-जातियों, पिछड़े लोगों और पहाड़ी लोगों में वह रिवाज है कि वे लड़की का मूल्य लड़के से वसूल करते हैं। ऊंचे वर्ण वालों में ऐसा तभी होता है जब बूढ़े या अयोग्य लड़के को कोई लोभी बाप अपनी कन्या देता है, पर पिछड़े लोगों में कन्या का मूल्य लेना आम रिवाज है। इसी प्रकार सर्वत्र लोगों में लड़के की कीमत लड़की वालों से दहेज के रूप में तय की जाती है और उसमें कमी रह जाय तो अवांछनीय उपायों से उसे वसूल किया जाता है।
🔵 यह दोनों ही रिवाज समान रूप से घृणित और गर्हित हैं। इन्हें अनैतिक एवं मानवीय आदर्शों के विपरीत भी कहा जा सकता है। इन दोनों ही जंगली रिवाजों को सभ्य समाज में पूर्णतया बहिष्कृत किया जाना चाहिए। विवाह जैसे दो आत्माओं के एकीकरण संस्कार को आर्थिक सौदे-बाजी से सर्वथा दूर रखा जाय।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔴 4— उपजातियों को बहुत महत्व न दिया जाय:- प्राचीन काल में चार वर्ण थे। प्रत्येक वर्ण के अन्तर्गत गोत्र बचाकर विवाह होते रहें। उपजातियों के कारण विवाह सम्बन्धी प्रतिबन्ध शिथिल किये जांय।
🔵 5— विधवा या विधुरों से लिए समान सुविधा-असुविधा:- पुरुष और स्त्री के अधिकारों और कर्तव्यों में बहुत कुछ समानता है। इसलिए विधवा और विधुरों को भी समान सुविधा-असुविधा उपलब्ध हों।
🔴 साथी के मरने के बाद शेष जीवन एकाकी व्यतीत करना दोनों के लिए प्रशंसनीय है। पर यदि वे पुनः विवाह करना चाहें तो उन्हें समान रूप से सुविधा रहे। विधुरों के लिए यही उचित है कि वे विधवा से विवाह करें। विधवाओं का विवाह उतना ही अच्छा या बुरा माना जाय जितना विधुरों का।
🔵 6—आर्थिक आदान प्रदान न हो:- न तो कन्या के मूल्य के रूप में लड़की वाले वर पक्ष से कुछ धन मांगें और न लड़के वाले वर की कीमत लड़की वाले से पाने की आशा करें।
🔴 आदिवासियों, वन्य-जातियों, पिछड़े लोगों और पहाड़ी लोगों में वह रिवाज है कि वे लड़की का मूल्य लड़के से वसूल करते हैं। ऊंचे वर्ण वालों में ऐसा तभी होता है जब बूढ़े या अयोग्य लड़के को कोई लोभी बाप अपनी कन्या देता है, पर पिछड़े लोगों में कन्या का मूल्य लेना आम रिवाज है। इसी प्रकार सर्वत्र लोगों में लड़के की कीमत लड़की वालों से दहेज के रूप में तय की जाती है और उसमें कमी रह जाय तो अवांछनीय उपायों से उसे वसूल किया जाता है।
🔵 यह दोनों ही रिवाज समान रूप से घृणित और गर्हित हैं। इन्हें अनैतिक एवं मानवीय आदर्शों के विपरीत भी कहा जा सकता है। इन दोनों ही जंगली रिवाजों को सभ्य समाज में पूर्णतया बहिष्कृत किया जाना चाहिए। विवाह जैसे दो आत्माओं के एकीकरण संस्कार को आर्थिक सौदे-बाजी से सर्वथा दूर रखा जाय।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 29)
🌞 दिए गए कार्यक्रमों का प्राण-पण से निर्वाह
🔴 इस संदर्भ में प्रह्लाद का फिल्म चित्र आँखों के आगे तैरने लगा। वह समाप्त न होने पाया था कि ध्रुव की कहानी मस्तिष्क में तैरने लगी। इसका अंत न होने पाया कि पार्वती का निश्चय उछलकर आगे आ गया। इस आरम्भ के उपरान्त महामानवों की, वीर बलिदानियों की, संत सुधारक और शहीदों की अगणित गाथाएँ सामने तैरने लगीं। उनमें से किसी के भी घर-परिवार वालों ने, मित्र-सम्बन्धियों ने समर्थन नहीं किया था। वे अपने एकाकी आत्मबल के सहारे कर्तव्य की पुकार पर आरूढ़ हुए और दृढ़ रहे। फिर यह सोचना व्यर्थ है कि इस समय अपने इर्द-गिर्द के लोग क्या करते और क्या कहते हैं? उनकी बात सुनने से आदर्श नहीं निभेंगे। आदर्श निभाने हैं, तो अपने मन की ललक, लिप्साओं से जूझना पड़ेगा। इतना ही नहीं इर्द-गिर्द जुड़े हुए उन लोगों की भी उपेक्षा करनी पड़ेगी, जो मात्र पेट-प्रजनन के कुचक्र में ही घूमते और घुमाते रहे हैं।
🔵 निर्णय आत्मा के पक्ष में गया। मैं अनेक विरोध और प्रतिबंधों को तोड़ता, लुक-छिपकर निर्दिष्ट स्थान पर पहुँचा और सत्याग्रही की भूमिका निभाता हुआ जेल गया। जो भय का काल्पनिक आतंक बनाया गया था, उसमें से एक भी चरितार्थ नहीं हुआ।
🔴 छुटपन की एक घटना इन दोनों प्रयोजनों में और भी साहस देती रही। गाँव में एक बुढ़िया मेहतरानी घावों से पीड़ित थी। दस्त भी हो रहे थे। घावों में कीड़े पड़ गए थे। बेतरह चिल्लाती थी, पर कोई छूत के कारण उसके घर में नहीं घुसता था। मैंने एक चिकित्सक से उपचार पूछा। दवाओं का एकाकी प्रबन्ध किया, उसके घर नियमित रूप से जाने लगा। चिकित्सा के लिए भी परिचर्या के लिए भी, भोजन व्यवस्था के लिए भी। यह सारे काम मैंने अपने जिम्मे ले लिए। मेहतरानी के घर में घुसना, उसके मल-मूत्र से सने कपड़े धोना आज से ६५ वर्ष पूर्व गुनाह था। जाति बहिष्कार कर दिया गया। घर वालों तक ने प्रवेश न करने दिया। चबूतरे पर पड़ा रहता और जो कुछ घर वाले दे जाते, उसी को खाकर गुजारा करता। इतने पर भी मेहतरानी की सेवा नहीं छोड़ी। यह पंद्रह दिन चली और वह अच्छी हो गई। वह जब तक जीवित रही, मुझे भगवान् कहती रही। उन दिनों १३ वर्ष की आयु में भी अकेला था। सारा घर और सारा गाँव एक ओर। लड़ता रहा, हारा नहीं। अब तो उम्र कई वर्ष और अधिक बड़ी हो गई थी। अब क्यों हारता?
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/diye.2
🔴 इस संदर्भ में प्रह्लाद का फिल्म चित्र आँखों के आगे तैरने लगा। वह समाप्त न होने पाया था कि ध्रुव की कहानी मस्तिष्क में तैरने लगी। इसका अंत न होने पाया कि पार्वती का निश्चय उछलकर आगे आ गया। इस आरम्भ के उपरान्त महामानवों की, वीर बलिदानियों की, संत सुधारक और शहीदों की अगणित गाथाएँ सामने तैरने लगीं। उनमें से किसी के भी घर-परिवार वालों ने, मित्र-सम्बन्धियों ने समर्थन नहीं किया था। वे अपने एकाकी आत्मबल के सहारे कर्तव्य की पुकार पर आरूढ़ हुए और दृढ़ रहे। फिर यह सोचना व्यर्थ है कि इस समय अपने इर्द-गिर्द के लोग क्या करते और क्या कहते हैं? उनकी बात सुनने से आदर्श नहीं निभेंगे। आदर्श निभाने हैं, तो अपने मन की ललक, लिप्साओं से जूझना पड़ेगा। इतना ही नहीं इर्द-गिर्द जुड़े हुए उन लोगों की भी उपेक्षा करनी पड़ेगी, जो मात्र पेट-प्रजनन के कुचक्र में ही घूमते और घुमाते रहे हैं।
🔵 निर्णय आत्मा के पक्ष में गया। मैं अनेक विरोध और प्रतिबंधों को तोड़ता, लुक-छिपकर निर्दिष्ट स्थान पर पहुँचा और सत्याग्रही की भूमिका निभाता हुआ जेल गया। जो भय का काल्पनिक आतंक बनाया गया था, उसमें से एक भी चरितार्थ नहीं हुआ।
🔴 छुटपन की एक घटना इन दोनों प्रयोजनों में और भी साहस देती रही। गाँव में एक बुढ़िया मेहतरानी घावों से पीड़ित थी। दस्त भी हो रहे थे। घावों में कीड़े पड़ गए थे। बेतरह चिल्लाती थी, पर कोई छूत के कारण उसके घर में नहीं घुसता था। मैंने एक चिकित्सक से उपचार पूछा। दवाओं का एकाकी प्रबन्ध किया, उसके घर नियमित रूप से जाने लगा। चिकित्सा के लिए भी परिचर्या के लिए भी, भोजन व्यवस्था के लिए भी। यह सारे काम मैंने अपने जिम्मे ले लिए। मेहतरानी के घर में घुसना, उसके मल-मूत्र से सने कपड़े धोना आज से ६५ वर्ष पूर्व गुनाह था। जाति बहिष्कार कर दिया गया। घर वालों तक ने प्रवेश न करने दिया। चबूतरे पर पड़ा रहता और जो कुछ घर वाले दे जाते, उसी को खाकर गुजारा करता। इतने पर भी मेहतरानी की सेवा नहीं छोड़ी। यह पंद्रह दिन चली और वह अच्छी हो गई। वह जब तक जीवित रही, मुझे भगवान् कहती रही। उन दिनों १३ वर्ष की आयु में भी अकेला था। सारा घर और सारा गाँव एक ओर। लड़ता रहा, हारा नहीं। अब तो उम्र कई वर्ष और अधिक बड़ी हो गई थी। अब क्यों हारता?
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 April 2026
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