बुधवार, 21 दिसंबर 2016
👉 सतयुग की वापसी (भाग 17) 22 Dec
🌹 समस्याओं की गहराई में उतरें
🔴 इन दिनों की सबसे बड़ी तात्कालिक समस्या यह है कि समाज परिकर में छाई विपन्नताओं से किस प्रकार छुटकारा पाया जाए और उज्ज्वल भविष्य की संरचना के लिए क्या किया जाए, जिससे निरापद और सुविकसित जीवन जी सकना सम्भव हो सके?
🔵 समाज विज्ञानियों द्वारा प्रस्तुत कठिनाइयों का कारण अभावग्रस्तता को मान लिया गया है। इसी मान्यता के आधार पर यह सोचा जा रहा है कि साधन-सुविधाओं वाली सम्पन्नता की अधिकाधिक वृद्धि की जाए, जिससे अभीष्ट सुख-साधन उपलब्ध होने पर प्रसन्नतापूर्वक रहा जा सके। मोटे तौर पर अशिक्षा, दरिद्रता एवं अस्वस्थता को प्रमुख कारणों में गिना जाता है और इनके निवारण के लिए कुछ नए नीति निर्धारण का औचित्य भी है, पर देखना यह है कि वस्तुस्थिति समझे बिना और वास्तविक व्यवधानों की तह तक पहुँचे बिना जो प्रबल प्रयत्न किए जा रहे हैं या किए जाने वाले हैं वे कारगर हो भी सकेंगे या नहीं?
🔴 दरिद्रता को ही लें। मनुष्य की शारीरिक, मानसिक समर्थता इतनी अधिक है कि उसके सहारे अपना ही नहीं, परिकर के अनेकों का भली प्रकार गुजारा किया जा सके और बचत को सामयिक आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकने वाले पुण्य परमार्थ में भी लगाया जा सके। प्रगतिशील जनों में से असंख्यों ऐसे हैं, जिनके पास न तो कोई पैतृक संपदा थी और न बाहर वालों की ही कोई कहने लायक सहायता मिली, फिर भी वे अपने मनोबल और पुरुषार्थ के आधार पर आगे बढ़ते और ऊँचे उठते चले गए, सफलता के उस उच्च शिखर पर जा पहुँचे जो जादुई जैसा लगता है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔴 इन दिनों की सबसे बड़ी तात्कालिक समस्या यह है कि समाज परिकर में छाई विपन्नताओं से किस प्रकार छुटकारा पाया जाए और उज्ज्वल भविष्य की संरचना के लिए क्या किया जाए, जिससे निरापद और सुविकसित जीवन जी सकना सम्भव हो सके?
🔵 समाज विज्ञानियों द्वारा प्रस्तुत कठिनाइयों का कारण अभावग्रस्तता को मान लिया गया है। इसी मान्यता के आधार पर यह सोचा जा रहा है कि साधन-सुविधाओं वाली सम्पन्नता की अधिकाधिक वृद्धि की जाए, जिससे अभीष्ट सुख-साधन उपलब्ध होने पर प्रसन्नतापूर्वक रहा जा सके। मोटे तौर पर अशिक्षा, दरिद्रता एवं अस्वस्थता को प्रमुख कारणों में गिना जाता है और इनके निवारण के लिए कुछ नए नीति निर्धारण का औचित्य भी है, पर देखना यह है कि वस्तुस्थिति समझे बिना और वास्तविक व्यवधानों की तह तक पहुँचे बिना जो प्रबल प्रयत्न किए जा रहे हैं या किए जाने वाले हैं वे कारगर हो भी सकेंगे या नहीं?
🔴 दरिद्रता को ही लें। मनुष्य की शारीरिक, मानसिक समर्थता इतनी अधिक है कि उसके सहारे अपना ही नहीं, परिकर के अनेकों का भली प्रकार गुजारा किया जा सके और बचत को सामयिक आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकने वाले पुण्य परमार्थ में भी लगाया जा सके। प्रगतिशील जनों में से असंख्यों ऐसे हैं, जिनके पास न तो कोई पैतृक संपदा थी और न बाहर वालों की ही कोई कहने लायक सहायता मिली, फिर भी वे अपने मनोबल और पुरुषार्थ के आधार पर आगे बढ़ते और ऊँचे उठते चले गए, सफलता के उस उच्च शिखर पर जा पहुँचे जो जादुई जैसा लगता है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (अन्तिम भाग) 22 Dec
🌹 गम्भीर न रहें, प्रसन्न रहना सीखें
🔵 एक शाम पंडित मोतीलाल नेहरू अपने पुत्र जवाहर लाल के साथ गांधीजी से मिलने साबरमती आश्रम पहुंचे। झोंपड़ी में मिट्टी का दीप जल रहा था और दरवाजे के बाहर लाठी रखी हुई थी। हवा जवाहरलाल से कुछ मजाक करने पर तुली थी, उसने झोंके से दीपक बुझा दिया। अंधेरे में जवाहरलाल लाठी से जा टकराये, उनके घुटने को चोट लगी—वैसे ही जवाहरलाल गर्म मिजाज थे, इस चोट ने उनमें झल्लाहट भर दी। वे गांधी जी से पूछ बैठे—‘बापू आप मुंह से अहिंसा की दुहाई देते हैं और लाठी हाथ में लेकर चलते हैं, आप ऐसा क्यों करते हैं?’ गांधीजी ने हंसकर कहा—‘तुम जैसे शैतान लड़कों को ठीक करने के लिये।’
🔴 गांधीजी दूसरे गोल मेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए इंग्लैंड गये। वहां के लोग नहीं माने, उन्हें बालरूम डांस दिखने ले गये। वहां सब अपने-अपने जोड़ों के साथ नाचने लगे। एक अंग्रेज ने उनसे कहा—‘आप भी अपना पार्टनर चुन लीजिए।’
🔵 गांधीजी ने अपनी लाठी दिखाकर कहा—‘मेरे साथ मेरा पार्टनर है।’ यह सुनकर सबको हंसी आ गई।
🔴 एक दिन की बात है। सेठ जमनालाल बजाज ने गांधीजी से कहा—‘बापू! यह तो मुझे ज्ञात है कि आपका मुझ पर अपार स्नेह है किन्तु मैं चाहता हूं कि आप मुझे देवीदास की तरह ही अपना पुत्र बना लें।’
🔵 उनका अभिप्राय गोद लेने से था। यह जानकर गांधीजी ने लम्बे-चौड़े बजाज जी की ओर देखकर कहा—‘कहते हो सो तो ठीक है। बाप बेटे को गोद लेता है, पर यहां तो स्थिति उल्टी है। बेटा बाप को गोद लेने जैसा दीखता है।’
🔴 विनोद प्रियता की प्रवृत्ति को जरा हम भी अपना स्वभाव का अंग बनाकर देखें, विषाद कभी हमारे निकट आ ही नहीं सकता।
🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔵 एक शाम पंडित मोतीलाल नेहरू अपने पुत्र जवाहर लाल के साथ गांधीजी से मिलने साबरमती आश्रम पहुंचे। झोंपड़ी में मिट्टी का दीप जल रहा था और दरवाजे के बाहर लाठी रखी हुई थी। हवा जवाहरलाल से कुछ मजाक करने पर तुली थी, उसने झोंके से दीपक बुझा दिया। अंधेरे में जवाहरलाल लाठी से जा टकराये, उनके घुटने को चोट लगी—वैसे ही जवाहरलाल गर्म मिजाज थे, इस चोट ने उनमें झल्लाहट भर दी। वे गांधी जी से पूछ बैठे—‘बापू आप मुंह से अहिंसा की दुहाई देते हैं और लाठी हाथ में लेकर चलते हैं, आप ऐसा क्यों करते हैं?’ गांधीजी ने हंसकर कहा—‘तुम जैसे शैतान लड़कों को ठीक करने के लिये।’
🔴 गांधीजी दूसरे गोल मेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए इंग्लैंड गये। वहां के लोग नहीं माने, उन्हें बालरूम डांस दिखने ले गये। वहां सब अपने-अपने जोड़ों के साथ नाचने लगे। एक अंग्रेज ने उनसे कहा—‘आप भी अपना पार्टनर चुन लीजिए।’
🔵 गांधीजी ने अपनी लाठी दिखाकर कहा—‘मेरे साथ मेरा पार्टनर है।’ यह सुनकर सबको हंसी आ गई।
🔴 एक दिन की बात है। सेठ जमनालाल बजाज ने गांधीजी से कहा—‘बापू! यह तो मुझे ज्ञात है कि आपका मुझ पर अपार स्नेह है किन्तु मैं चाहता हूं कि आप मुझे देवीदास की तरह ही अपना पुत्र बना लें।’
🔵 उनका अभिप्राय गोद लेने से था। यह जानकर गांधीजी ने लम्बे-चौड़े बजाज जी की ओर देखकर कहा—‘कहते हो सो तो ठीक है। बाप बेटे को गोद लेता है, पर यहां तो स्थिति उल्टी है। बेटा बाप को गोद लेने जैसा दीखता है।’
🔴 विनोद प्रियता की प्रवृत्ति को जरा हम भी अपना स्वभाव का अंग बनाकर देखें, विषाद कभी हमारे निकट आ ही नहीं सकता।
🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 गृहस्थ-योग (भाग 41) 22 Dec
🌹 परिवार की चतुर्विधि पूजा
🔵 पौधे को विकसित होने के लिए अच्छी जमीन और पानी की जरूरत है, पर साथ ही हवा भी चाहिए। इसी प्रकार जीवन विकास के लिए भोजन, शिक्षा तथा मनोरंजन से वंचित रहते हैं वे एक बड़ा अन्याय करते हैं। नीतिकारों का वचन है कि ‘जो संगीत, साहित्य तथा कला से विहीन है वह बिना सींग पूंछ का पशु है, इस कथन का तात्पर्य मनोरंजन रहित, शुष्क, नीरस जीवन की भर्त्सना करना है। निश्चय ही मनोरंजन एक आवश्यक भोजन है जिसके बिना जीवन मुरझाने लगता है। कुरुचि पूर्ण, दूषित, अश्लील, मनोरंजन से बचना ठीक है। सादा और सात्विक मनोरंजनों को तलाश करना चाहिए।
🔴 संगीत, गायन, वाद्य, भ्रमण, सम्मिलन, सहभोज, उत्सव, मेला, प्रतियोगिता, चित्र कला, व्याख्यान, देशाटन, प्रदर्शनी सजावट, अद्भुत और ऐतिहासिक वस्तुओं का निरीक्षण, खेल, यात्रा, आदि अनेक मार्गों से यथा अवसर मनोरंजन के छोटे मोटे साधन प्राप्त किये जा सकते हैं। घर के पुरुषों को तो ऐसे अवसर मिलते रहते हैं पर स्त्रियों और बालकों को इससे वंचित रहना पड़ता है। यह उचित नहीं, उन्हें भी यथाशक्त ऐसे अवसर देने चाहिए। छोटे बालकों के लिए खिलौने जुटाते रहना चाहिए। मनोविनोद के कार्य में यदि थोड़ा पैसा खर्च होता हो तो उसमें कंजूसी न करनी चाहिए क्योंकि इस मार्ग में जो उचित खर्च होता है वह फिजूल खर्ची नहीं वरन् जीवन की एक वास्तविक आवश्यकता की पूर्ति है।
🔵 चौथी बात भविष्य निर्माण की है। आज की जरूरत किसी प्रकार पूरी हो जाय, केवल मात्रा इतने से सन्तुष्ट न हो जाना चाहिए वरन् यह देखना चाहिये कि हर व्यक्ति का भविष्य उन्नत, सुखमय, समृद्ध, प्रकाशवान एवं उज्ज्वल कैसे हो सकता है? प्राणी के जन्म धारण का उद्देश्य किसी प्रकार दिन काटते रहना नहीं वरन् यह है कि वह अपनी स्थिति को ऊंचा उठावे, आगे बढ़े और अधिक साधन सम्पन्न होता हुआ नीर-विकसित हो। ऊंचा, ऊंचा और अधिक ऊंचा जीवन बने, इसके लिए सदैव सोचते और प्रयत्न करते रहने की आवश्यकता है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌿🌞 🌿🌞 🌿🌞
🔵 पौधे को विकसित होने के लिए अच्छी जमीन और पानी की जरूरत है, पर साथ ही हवा भी चाहिए। इसी प्रकार जीवन विकास के लिए भोजन, शिक्षा तथा मनोरंजन से वंचित रहते हैं वे एक बड़ा अन्याय करते हैं। नीतिकारों का वचन है कि ‘जो संगीत, साहित्य तथा कला से विहीन है वह बिना सींग पूंछ का पशु है, इस कथन का तात्पर्य मनोरंजन रहित, शुष्क, नीरस जीवन की भर्त्सना करना है। निश्चय ही मनोरंजन एक आवश्यक भोजन है जिसके बिना जीवन मुरझाने लगता है। कुरुचि पूर्ण, दूषित, अश्लील, मनोरंजन से बचना ठीक है। सादा और सात्विक मनोरंजनों को तलाश करना चाहिए।
🔴 संगीत, गायन, वाद्य, भ्रमण, सम्मिलन, सहभोज, उत्सव, मेला, प्रतियोगिता, चित्र कला, व्याख्यान, देशाटन, प्रदर्शनी सजावट, अद्भुत और ऐतिहासिक वस्तुओं का निरीक्षण, खेल, यात्रा, आदि अनेक मार्गों से यथा अवसर मनोरंजन के छोटे मोटे साधन प्राप्त किये जा सकते हैं। घर के पुरुषों को तो ऐसे अवसर मिलते रहते हैं पर स्त्रियों और बालकों को इससे वंचित रहना पड़ता है। यह उचित नहीं, उन्हें भी यथाशक्त ऐसे अवसर देने चाहिए। छोटे बालकों के लिए खिलौने जुटाते रहना चाहिए। मनोविनोद के कार्य में यदि थोड़ा पैसा खर्च होता हो तो उसमें कंजूसी न करनी चाहिए क्योंकि इस मार्ग में जो उचित खर्च होता है वह फिजूल खर्ची नहीं वरन् जीवन की एक वास्तविक आवश्यकता की पूर्ति है।
🔵 चौथी बात भविष्य निर्माण की है। आज की जरूरत किसी प्रकार पूरी हो जाय, केवल मात्रा इतने से सन्तुष्ट न हो जाना चाहिए वरन् यह देखना चाहिये कि हर व्यक्ति का भविष्य उन्नत, सुखमय, समृद्ध, प्रकाशवान एवं उज्ज्वल कैसे हो सकता है? प्राणी के जन्म धारण का उद्देश्य किसी प्रकार दिन काटते रहना नहीं वरन् यह है कि वह अपनी स्थिति को ऊंचा उठावे, आगे बढ़े और अधिक साधन सम्पन्न होता हुआ नीर-विकसित हो। ऊंचा, ऊंचा और अधिक ऊंचा जीवन बने, इसके लिए सदैव सोचते और प्रयत्न करते रहने की आवश्यकता है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌿🌞 🌿🌞 🌿🌞
👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 54)
🌹 कला और उसका सदुपयोग
🔴 78. सार्वजनिक उपयोग के उपकरण— अपनी समिति के पास कुछ ऐसे उपकरण रखे रहें जिन्हें लोग अक्सर दूसरों से मांग कर काम चलाया करते हैं। विवाह शादियों में काम आने वाले बड़े बर्तन, जलपात्र, फर्श, बिछौने, नसैनी, लालटेनें, सजावट का सामान, कुएं में गिरे हुए डोल रस्सी निकालने के कांटे, आटे की सेंमई बनाने की मशीनें जैसी छोटी-मोटी चीजें एकत्रित रखी जांय और उन्हें मरम्मत खर्च लेकर लोगों को देते रहा जाय तो उससे भी सहानुभूति एवं सद्भावना बढ़ती है।
🔵 79. जीव-दया के सत्कर्म— पशु-पक्षियों और जीव-जन्तुओं के प्रति करुणा उत्पन्न करने वाली प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। पशु-पक्षी भी अपने ही भाई-भतीजे हैं, उनका मांस खाने-खून पीने की आदत छुड़ानी चाहिए। उससे आध्यात्मिक सद्गुण नष्ट होते हैं, नृशंसता पनपती है। चमड़ा भी आजकल जीवित काटे हुए पशुओं का ही आ रहा है। उसका उपयोग करने से भी पशु-वध में वृद्धि होती है। हमें चमड़े के स्थान पर कपड़ा या रबड़ के जूते पहन कर काम चलाना चाहिए और दूसरी चमड़े की बनी वस्तुएं भी प्रयोग नहीं करनी चाहिए। मृगछालाएं भी आजकल हत्या किये हुए पशुओं की ही मिलती हैं, इसलिए पूजा में उनका प्रयोग नहीं करना चाहिए। जो रेशम कीड़ों को जिन्दा उबाल कर निकाला जाता है वह भी प्रयोग न किया जाय।
🔴 सामर्थ्य से अधिक काम लिया जाना, अधिक भार लादा जाना, बुरी तरह पीटना, घायल बीमारों से काम लेना, फूंका प्रथा के अनुसार दूध निकालना आदि अनेक प्रकार से पशुओं के साथ बरती जाने वाली नृशंसता का त्याग करना चाहिए।
🔵 गौ पालन, गौदुग्ध को प्राथमिकता देना जैसे धर्म कृत्यों की तरफ ध्यान देना चाहिए, जिससे स्वास्थ्य, समृद्धि और सद्भावना की अभिवृद्धि का मार्ग प्रशस्त हो सके।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔴 78. सार्वजनिक उपयोग के उपकरण— अपनी समिति के पास कुछ ऐसे उपकरण रखे रहें जिन्हें लोग अक्सर दूसरों से मांग कर काम चलाया करते हैं। विवाह शादियों में काम आने वाले बड़े बर्तन, जलपात्र, फर्श, बिछौने, नसैनी, लालटेनें, सजावट का सामान, कुएं में गिरे हुए डोल रस्सी निकालने के कांटे, आटे की सेंमई बनाने की मशीनें जैसी छोटी-मोटी चीजें एकत्रित रखी जांय और उन्हें मरम्मत खर्च लेकर लोगों को देते रहा जाय तो उससे भी सहानुभूति एवं सद्भावना बढ़ती है।
🔵 79. जीव-दया के सत्कर्म— पशु-पक्षियों और जीव-जन्तुओं के प्रति करुणा उत्पन्न करने वाली प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। पशु-पक्षी भी अपने ही भाई-भतीजे हैं, उनका मांस खाने-खून पीने की आदत छुड़ानी चाहिए। उससे आध्यात्मिक सद्गुण नष्ट होते हैं, नृशंसता पनपती है। चमड़ा भी आजकल जीवित काटे हुए पशुओं का ही आ रहा है। उसका उपयोग करने से भी पशु-वध में वृद्धि होती है। हमें चमड़े के स्थान पर कपड़ा या रबड़ के जूते पहन कर काम चलाना चाहिए और दूसरी चमड़े की बनी वस्तुएं भी प्रयोग नहीं करनी चाहिए। मृगछालाएं भी आजकल हत्या किये हुए पशुओं की ही मिलती हैं, इसलिए पूजा में उनका प्रयोग नहीं करना चाहिए। जो रेशम कीड़ों को जिन्दा उबाल कर निकाला जाता है वह भी प्रयोग न किया जाय।
🔴 सामर्थ्य से अधिक काम लिया जाना, अधिक भार लादा जाना, बुरी तरह पीटना, घायल बीमारों से काम लेना, फूंका प्रथा के अनुसार दूध निकालना आदि अनेक प्रकार से पशुओं के साथ बरती जाने वाली नृशंसता का त्याग करना चाहिए।
🔵 गौ पालन, गौदुग्ध को प्राथमिकता देना जैसे धर्म कृत्यों की तरफ ध्यान देना चाहिए, जिससे स्वास्थ्य, समृद्धि और सद्भावना की अभिवृद्धि का मार्ग प्रशस्त हो सके।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 गहना कर्मणोगति: (भाग 22)
🌹 अपनी दुनियाँ के स्वयं निर्माता
🔵 दुनियाँ वाले बहुत खराब हैं, पर उसमें खराबी से कहीं ज्यादा अच्छाई मौजूद है। हमें उस अच्छाई पर ही अपनी दृष्टि रखनी चाहिए, अच्छाई से ही आनन्द लेना चाहिए और अच्छाई को ही आगे बढ़ाना चाहिए। दिन में हम जगते हैं, प्रकाश में काम करते हैं, उजाले में रहना पसंद करते हैं। जब रात का अंधेरा सामने आता है, तो आँखें बंद करके सो जाते हैं, जिन्हें रात में भी काम करना है, वे दीपक जला लेते हैं। हमारी यह उजाले में काम करने, अंधेरे में सो जाने की प्रवृत्ति यह सिखाती है कि संसार के साथ किस तरह व्यवहार करना चाहिए। किसी आदमी में क्या सद्गुण है, उसे खोज निकालिए और उन्हीं से सम्पर्क रखिए, उन्हीं में आनंद लीजिए, उन्हें ही प्रोसाहित कीजिए, जो दोष हों उन्हें भी देखिए तो सही, पर उनमें उलझिए मत। रात की तरह आँख बंद कर लीजिए।
🔴 महर्षि दत्तात्रेय की कथा जानने वालों को विदित होगा कि जब तक वे दुनियाँ के काले और सफेद दोनों पहलुओं का समन्वय करते रहे, तब तक बड़े चिंतित और दुःखी रहे। जब उन्होंने कालेपन से दृष्टि हटा ली और सफेदी पर ध्यान दिया, तो उन्हें सभी जीव आदनीय, उपदेश देने वाले और पवित्र दिखाई पड़े, उन्होंने चौबीस गुरु बनाए, जिनमें कुत्ता, बिल्ली, सियार, मकड़ी, मक्खी, चील, कौए जैसे जीव भी थे। उन्हें प्रतीत हुआ कि कोई भी प्राणी घृणित नहीं। सबके अंदर महान् आत्मा है और वे महानता के लिए आगे बढ़ रहे हैं, जब हम अपनी दृष्टि को गुण ग्राहक बना लेते हैं तो दुनियाँ का सारा तख्ता पलट जाता है, दोष के स्थान पर गुण, बुराई के स्थान पर भलाई, दुःख के स्थान पर सुख आ बैठता है। बहुत बुरी दुनियाँ, बहुत अच्छी बन जाती है।
🔵 तिल की ओट ताड़ छिपा हुआ है। भूल-भुलैया के खेल में चोर दरवाजा जरा सी गलती के कारण छू जाता है। बाजीगर एक पोली लकड़ी रखता है, उसमें एक तरफ डोरा पीला होता है दूसरी तरफ नीला। इस छेद में से डोरा खींचता है, तो पीला निकलता है और उधर से खींचने पर वह नीला हो जाता है। लोग अचंभा करते हैं कि डोरा किस तरह रंग बदलता है, पर उस लकड़ी के पोले भाग में डोरे का एक भाग उलझा रहने के कारण यह अदल-बदल होती रहती है। संसार किसी को बुरा दीखता है, किसी को भला, इसका कारण हमारी दृष्टि की भीतरी उलझन है। इस उलझन का रहस्य भरा सुलझाव यह है कि आप अपना दृष्टिकोण बदल डालिए। अपने पुराने कल्पना जंजालों को तोड़-फोड़ कर फेंक दीजिए। तरह-तरह के उलझनों भरे जाल जो मस्तिष्क में बुन गए हैं, उन्हें उखाड़ कर एक कोने में मत डाल दीजिए। अपना तीसरा नेत्र, ज्ञान नेत्र खोलकर पुरानी दुनियाँ को नष्ट कर डालिए। वर्तमान कलियुग को प्रलय के गर्त में गिर पड़ने दीजिए और अपना सतयुग अपने मानस लोक में स्वयं रच डालिए।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/gah/aapni.2
🔵 दुनियाँ वाले बहुत खराब हैं, पर उसमें खराबी से कहीं ज्यादा अच्छाई मौजूद है। हमें उस अच्छाई पर ही अपनी दृष्टि रखनी चाहिए, अच्छाई से ही आनन्द लेना चाहिए और अच्छाई को ही आगे बढ़ाना चाहिए। दिन में हम जगते हैं, प्रकाश में काम करते हैं, उजाले में रहना पसंद करते हैं। जब रात का अंधेरा सामने आता है, तो आँखें बंद करके सो जाते हैं, जिन्हें रात में भी काम करना है, वे दीपक जला लेते हैं। हमारी यह उजाले में काम करने, अंधेरे में सो जाने की प्रवृत्ति यह सिखाती है कि संसार के साथ किस तरह व्यवहार करना चाहिए। किसी आदमी में क्या सद्गुण है, उसे खोज निकालिए और उन्हीं से सम्पर्क रखिए, उन्हीं में आनंद लीजिए, उन्हें ही प्रोसाहित कीजिए, जो दोष हों उन्हें भी देखिए तो सही, पर उनमें उलझिए मत। रात की तरह आँख बंद कर लीजिए।
🔴 महर्षि दत्तात्रेय की कथा जानने वालों को विदित होगा कि जब तक वे दुनियाँ के काले और सफेद दोनों पहलुओं का समन्वय करते रहे, तब तक बड़े चिंतित और दुःखी रहे। जब उन्होंने कालेपन से दृष्टि हटा ली और सफेदी पर ध्यान दिया, तो उन्हें सभी जीव आदनीय, उपदेश देने वाले और पवित्र दिखाई पड़े, उन्होंने चौबीस गुरु बनाए, जिनमें कुत्ता, बिल्ली, सियार, मकड़ी, मक्खी, चील, कौए जैसे जीव भी थे। उन्हें प्रतीत हुआ कि कोई भी प्राणी घृणित नहीं। सबके अंदर महान् आत्मा है और वे महानता के लिए आगे बढ़ रहे हैं, जब हम अपनी दृष्टि को गुण ग्राहक बना लेते हैं तो दुनियाँ का सारा तख्ता पलट जाता है, दोष के स्थान पर गुण, बुराई के स्थान पर भलाई, दुःख के स्थान पर सुख आ बैठता है। बहुत बुरी दुनियाँ, बहुत अच्छी बन जाती है।
🔵 तिल की ओट ताड़ छिपा हुआ है। भूल-भुलैया के खेल में चोर दरवाजा जरा सी गलती के कारण छू जाता है। बाजीगर एक पोली लकड़ी रखता है, उसमें एक तरफ डोरा पीला होता है दूसरी तरफ नीला। इस छेद में से डोरा खींचता है, तो पीला निकलता है और उधर से खींचने पर वह नीला हो जाता है। लोग अचंभा करते हैं कि डोरा किस तरह रंग बदलता है, पर उस लकड़ी के पोले भाग में डोरे का एक भाग उलझा रहने के कारण यह अदल-बदल होती रहती है। संसार किसी को बुरा दीखता है, किसी को भला, इसका कारण हमारी दृष्टि की भीतरी उलझन है। इस उलझन का रहस्य भरा सुलझाव यह है कि आप अपना दृष्टिकोण बदल डालिए। अपने पुराने कल्पना जंजालों को तोड़-फोड़ कर फेंक दीजिए। तरह-तरह के उलझनों भरे जाल जो मस्तिष्क में बुन गए हैं, उन्हें उखाड़ कर एक कोने में मत डाल दीजिए। अपना तीसरा नेत्र, ज्ञान नेत्र खोलकर पुरानी दुनियाँ को नष्ट कर डालिए। वर्तमान कलियुग को प्रलय के गर्त में गिर पड़ने दीजिए और अपना सतयुग अपने मानस लोक में स्वयं रच डालिए।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 "हमारी वसीयत और विरासत" (भाग 3)
🌞 इस जीवन यात्रा के गम्भीरता पूर्वक पर्यवेक्षण की आवश्यकता
🔴 प्रत्यक्ष घटनाओं की दृष्टि से कुछ प्रकाशित किये जा रहे प्रसंगों को छोड़कर हमारे जीवन क्रम में बहुत विचित्रताएँ एवं विविधताएँ नहीं हैं। कौतुक-कौतूहल व्यक्त करने वाली उछल-कूद एवं जादू चमत्कारों की भी उसमें गुंजायश नहीं है। एक सुव्यवस्थित और सुनियोजित ढर्रे पर निष्ठापूर्वक समय कटता रहा है। इसलिए विचित्रताएँ ढूँढ़ने वालों को उसमें निराशा भी लग सकती है, पर जो घटनाओं के पीछे काम करने वाले तथ्यों और रहस्यों में रुचि लेंगे, उन्हें इतने से भी अध्यात्म सनातन, के परम्परागत प्रवाह का परिचय मिल जाएगा और वे समझ सकेंगे कि सफलता, असफलता का कारण क्या है? क्रियाकाण्ड को सब कुछ मान बैठना और व्यक्तित्व के परिष्कार की, पात्रता की प्राप्ति पर ध्यान न देना यही एक कारण है जिसके चलते उपासना क्षेत्र में निराशा छाई और अध्यात्म को उपहासास्पद बनने, बदनाम होने का लाँछन लगा। हमारे क्रिया-कृत्य सामान्य हैं, पर उसके पीछे पृष्ठभूमि का समावेश है, जो ब्रह्म-तेजस् को उभारती और उसे कुछ महत्त्वपूर्ण कर सकने की समर्थता तक ले जाती है।
🔵 जीवनचर्या के घटना परक विस्तार से कौतूहल बढ़ने के अतिरिक्त कुछ लाभ है नहीं। काम की बात है इन क्रियाओं के साथ जुड़ी हुई अन्तर्दृष्टि और उस आन्तरिक तत्परता का समावेश, जो छोटे से बीज खाद-पानी की आवश्यकता पूरी करते हुए विशाल वृक्ष बनाने में समर्थ होती रही। वस्तुतः साधक का व्यक्तित्व ही साधना क्रम में प्राण फूँकता है, अन्यथा मात्र क्रियाकृत्य खिलवाड़ बनकर रह जाते हैं।
🔴 तुलसी का राम, सूर का हरे कृष्ण, चैतन्य का संकीर्तन, मीरा का गायन, रामकृष्ण का पूजन मात्र क्रिया-कृत्यों के कारण सफल नहीं हुआ था। ऐसा औड़म-बौड़म तो दूसरे असंख्य करते रहते हैं, पर उनके पल्ले विडम्बना के अतिरिक्त और कुछ नहीं पड़ता, वाल्मीकि ने जीवन बदला तो, उल्टा नाम जपते ही मूर्धन्य हो गए। अजामिल, अंगुलिमाल, गणिका, आम्रपाली मात्र कुछ अक्षर दुहराना ही नहीं सीखे थे, उनने अपनी जीवनचर्या को भी अध्यात्म आदर्शों के अनुरूप ढाला।
🔵 आज कुछ ऐसी विडम्बना चल पड़ी है कि लोग कुछ अक्षर दुहराने और क्रिया-कृत्य करने, स्तवन, उपहार प्रस्तुत करने भर से अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। चिंतन, चरित्र और व्यवहार को उस आदर्शवादिता के ढाँचे में ढालने का प्रयत्न नहीं करते, जो आत्मिक प्रगति के लिए अनिवार्य रूप में आवश्यक है। अपनी साधना पद्धति में इस भूल का समावेश न होने देने का आरम्भ से ही ध्यान रखा गया। अस्तु, वह यथार्थवादी भी है और सर्व साधारण के लिए उपयोगी भी। इस दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर ही जीवन चर्या को पढ़ा जाए।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/is
🔴 प्रत्यक्ष घटनाओं की दृष्टि से कुछ प्रकाशित किये जा रहे प्रसंगों को छोड़कर हमारे जीवन क्रम में बहुत विचित्रताएँ एवं विविधताएँ नहीं हैं। कौतुक-कौतूहल व्यक्त करने वाली उछल-कूद एवं जादू चमत्कारों की भी उसमें गुंजायश नहीं है। एक सुव्यवस्थित और सुनियोजित ढर्रे पर निष्ठापूर्वक समय कटता रहा है। इसलिए विचित्रताएँ ढूँढ़ने वालों को उसमें निराशा भी लग सकती है, पर जो घटनाओं के पीछे काम करने वाले तथ्यों और रहस्यों में रुचि लेंगे, उन्हें इतने से भी अध्यात्म सनातन, के परम्परागत प्रवाह का परिचय मिल जाएगा और वे समझ सकेंगे कि सफलता, असफलता का कारण क्या है? क्रियाकाण्ड को सब कुछ मान बैठना और व्यक्तित्व के परिष्कार की, पात्रता की प्राप्ति पर ध्यान न देना यही एक कारण है जिसके चलते उपासना क्षेत्र में निराशा छाई और अध्यात्म को उपहासास्पद बनने, बदनाम होने का लाँछन लगा। हमारे क्रिया-कृत्य सामान्य हैं, पर उसके पीछे पृष्ठभूमि का समावेश है, जो ब्रह्म-तेजस् को उभारती और उसे कुछ महत्त्वपूर्ण कर सकने की समर्थता तक ले जाती है।
🔵 जीवनचर्या के घटना परक विस्तार से कौतूहल बढ़ने के अतिरिक्त कुछ लाभ है नहीं। काम की बात है इन क्रियाओं के साथ जुड़ी हुई अन्तर्दृष्टि और उस आन्तरिक तत्परता का समावेश, जो छोटे से बीज खाद-पानी की आवश्यकता पूरी करते हुए विशाल वृक्ष बनाने में समर्थ होती रही। वस्तुतः साधक का व्यक्तित्व ही साधना क्रम में प्राण फूँकता है, अन्यथा मात्र क्रियाकृत्य खिलवाड़ बनकर रह जाते हैं।
🔴 तुलसी का राम, सूर का हरे कृष्ण, चैतन्य का संकीर्तन, मीरा का गायन, रामकृष्ण का पूजन मात्र क्रिया-कृत्यों के कारण सफल नहीं हुआ था। ऐसा औड़म-बौड़म तो दूसरे असंख्य करते रहते हैं, पर उनके पल्ले विडम्बना के अतिरिक्त और कुछ नहीं पड़ता, वाल्मीकि ने जीवन बदला तो, उल्टा नाम जपते ही मूर्धन्य हो गए। अजामिल, अंगुलिमाल, गणिका, आम्रपाली मात्र कुछ अक्षर दुहराना ही नहीं सीखे थे, उनने अपनी जीवनचर्या को भी अध्यात्म आदर्शों के अनुरूप ढाला।
🔵 आज कुछ ऐसी विडम्बना चल पड़ी है कि लोग कुछ अक्षर दुहराने और क्रिया-कृत्य करने, स्तवन, उपहार प्रस्तुत करने भर से अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। चिंतन, चरित्र और व्यवहार को उस आदर्शवादिता के ढाँचे में ढालने का प्रयत्न नहीं करते, जो आत्मिक प्रगति के लिए अनिवार्य रूप में आवश्यक है। अपनी साधना पद्धति में इस भूल का समावेश न होने देने का आरम्भ से ही ध्यान रखा गया। अस्तु, वह यथार्थवादी भी है और सर्व साधारण के लिए उपयोगी भी। इस दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर ही जीवन चर्या को पढ़ा जाए।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 3)
🌞 हमारा अज्ञातवास और तप-साधना का उद्देश्य
🔴 तप की शक्ति अपार है। जो कुछ अधिक से अधिक शक्ति सम्पन्न तत्व इस विश्व में है, उसका मूल ‘तप’ में ही सन्निहित है। सूर्य तपता है इसलिये ही वह समस्त विश्व को जीवन प्रदान करने लायक प्राण भण्डार का अधिपति है। ग्रीष्म की ऊष्मा से जब वायु मण्डल भली प्रकार तप लेता है तो मंगलमयी वर्षा होती है। सोना तपता है तो खरा, तेजस्वी और मूल्यवान बनता है। जितनी भी धातुएं हैं वे सभी खान से निकलते समय दूषित, मिश्रित व दुर्बल होती हैं पर जब उन्हें कई बार भट्टियों में तपाया, पिघलाया और गलाया जाता है तो वे शुद्ध एवं मूल्यवान बन जाती हैं। कच्ची मिट्टी के बने हुए कमजोर खिलौने और बर्तन जरा से आघात में टूट सकते हैं। तपाये और पकाये जाने पर मजबूत एवं रक्त वर्ण हो जाते हैं। कच्ची ईंटें भट्टे में पकने पर पत्थर जैसी कड़ी हो जाती है। मामूली से कच्चे कंकड़ पकने पर चूना बनते हैं और उनके द्वारा बने हुये विशाल प्रासाद दीर्घ काल तक बने खड़े रहते हैं।
🔵 मामूली सा अभ्रक जब सौ, बार अग्नि में तपाया जाता है तो चन्द्रोदय रस बन जाता है। अनेकों बार अग्नि संस्कार होने से ही धातुओं की मूल्यवान भस्म रसायनें बन जाती हैं और उनसे अशक्ति एवं कष्ट साध्य रोगों में ग्रस्त रोगी पुनर्जीवन प्राप्त करते हैं। साधारण अन्न और दाल-शाक जो कच्चे रूप में न तो सुपाच्य होते हैं और न स्वादिष्ट। वे ही अग्नि संस्कार से पकाये जाने पर सुरुचि पूर्ण व्यंजनों का रूप धारण कर लेते हैं। धोबी की भट्टी में चढ़ने पर मैले-कुचैले कपड़े निर्मल एवं स्वच्छ बन जाते हैं। पेट की जठराग्नि द्वारा पचाया हुआ अन्न ही रक्त अस्थि का रूप धारण कर हमारे शरीर का भाग बनता है। यदि यह अग्नि संस्कार की, तप की प्रक्रिया बन्द हो जाय तो निश्चित रूप से विकास का सारा क्रम ही बन्द हो जायगा।
🔴 प्रकृति तपती है इसीलिए सृष्टि की सारी संचालन व्यवस्था चल रही है। जीव तपता है उसी से उसके अन्तराल में छिपे हुए पुरुषार्थ, पराक्रम, साहस, उत्साह, उल्लास, ज्ञान, विज्ञान प्रकृति रत्नों की श्रृंखला प्रस्फुटित होती है। माता अपने अण्ड एवं गर्भ को अपनी उदरस्थ ऊष्मा से पका कर शिशु को प्रसव करती है। जिन जीवों ने मूर्च्छित स्थिति से ऊंचे उठने की खाने सोने से कुछ अधिक करने की आकांक्षा की है; उन्हें तप करना पड़ा है। संसार में अनेकों पुरुषार्थ, पराक्रमी एवं इतिहास के पृष्ठों पर अपनी छाप छोड़ने वाले महापुरुष जो हैं, उन्हें किसी न किसी रूप में अपने-अपने ढंग का तप करना पड़ा है। कृषक, विद्यार्थी, श्रमिक, वैज्ञानिक, शासक, विद्वान, उद्योगी, कारीगर आदि सभी महत्वपूर्ण कार्य भूमिकाओं का सम्पादन करने वाले व्यक्ति वे ही बन सके हैं जिन्होंने कठोर श्रम, अध्यवसाय एवं तपश्चर्या की नीति को अपनाया है। यदि इन लोगों ने आलस्य, प्रमाद अकर्मण्यता, शिथिलता एवं विलासिता की नीति अपनाई होती तो वे कदापि उस स्थान पर न पहुंच पाते जो उन्होंने कष्ट सहिष्णु एवं पुरुषार्थी बनकर उपलब्ध किया है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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🔴 तप की शक्ति अपार है। जो कुछ अधिक से अधिक शक्ति सम्पन्न तत्व इस विश्व में है, उसका मूल ‘तप’ में ही सन्निहित है। सूर्य तपता है इसलिये ही वह समस्त विश्व को जीवन प्रदान करने लायक प्राण भण्डार का अधिपति है। ग्रीष्म की ऊष्मा से जब वायु मण्डल भली प्रकार तप लेता है तो मंगलमयी वर्षा होती है। सोना तपता है तो खरा, तेजस्वी और मूल्यवान बनता है। जितनी भी धातुएं हैं वे सभी खान से निकलते समय दूषित, मिश्रित व दुर्बल होती हैं पर जब उन्हें कई बार भट्टियों में तपाया, पिघलाया और गलाया जाता है तो वे शुद्ध एवं मूल्यवान बन जाती हैं। कच्ची मिट्टी के बने हुए कमजोर खिलौने और बर्तन जरा से आघात में टूट सकते हैं। तपाये और पकाये जाने पर मजबूत एवं रक्त वर्ण हो जाते हैं। कच्ची ईंटें भट्टे में पकने पर पत्थर जैसी कड़ी हो जाती है। मामूली से कच्चे कंकड़ पकने पर चूना बनते हैं और उनके द्वारा बने हुये विशाल प्रासाद दीर्घ काल तक बने खड़े रहते हैं।
🔵 मामूली सा अभ्रक जब सौ, बार अग्नि में तपाया जाता है तो चन्द्रोदय रस बन जाता है। अनेकों बार अग्नि संस्कार होने से ही धातुओं की मूल्यवान भस्म रसायनें बन जाती हैं और उनसे अशक्ति एवं कष्ट साध्य रोगों में ग्रस्त रोगी पुनर्जीवन प्राप्त करते हैं। साधारण अन्न और दाल-शाक जो कच्चे रूप में न तो सुपाच्य होते हैं और न स्वादिष्ट। वे ही अग्नि संस्कार से पकाये जाने पर सुरुचि पूर्ण व्यंजनों का रूप धारण कर लेते हैं। धोबी की भट्टी में चढ़ने पर मैले-कुचैले कपड़े निर्मल एवं स्वच्छ बन जाते हैं। पेट की जठराग्नि द्वारा पचाया हुआ अन्न ही रक्त अस्थि का रूप धारण कर हमारे शरीर का भाग बनता है। यदि यह अग्नि संस्कार की, तप की प्रक्रिया बन्द हो जाय तो निश्चित रूप से विकास का सारा क्रम ही बन्द हो जायगा।
🔴 प्रकृति तपती है इसीलिए सृष्टि की सारी संचालन व्यवस्था चल रही है। जीव तपता है उसी से उसके अन्तराल में छिपे हुए पुरुषार्थ, पराक्रम, साहस, उत्साह, उल्लास, ज्ञान, विज्ञान प्रकृति रत्नों की श्रृंखला प्रस्फुटित होती है। माता अपने अण्ड एवं गर्भ को अपनी उदरस्थ ऊष्मा से पका कर शिशु को प्रसव करती है। जिन जीवों ने मूर्च्छित स्थिति से ऊंचे उठने की खाने सोने से कुछ अधिक करने की आकांक्षा की है; उन्हें तप करना पड़ा है। संसार में अनेकों पुरुषार्थ, पराक्रमी एवं इतिहास के पृष्ठों पर अपनी छाप छोड़ने वाले महापुरुष जो हैं, उन्हें किसी न किसी रूप में अपने-अपने ढंग का तप करना पड़ा है। कृषक, विद्यार्थी, श्रमिक, वैज्ञानिक, शासक, विद्वान, उद्योगी, कारीगर आदि सभी महत्वपूर्ण कार्य भूमिकाओं का सम्पादन करने वाले व्यक्ति वे ही बन सके हैं जिन्होंने कठोर श्रम, अध्यवसाय एवं तपश्चर्या की नीति को अपनाया है। यदि इन लोगों ने आलस्य, प्रमाद अकर्मण्यता, शिथिलता एवं विलासिता की नीति अपनाई होती तो वे कदापि उस स्थान पर न पहुंच पाते जो उन्होंने कष्ट सहिष्णु एवं पुरुषार्थी बनकर उपलब्ध किया है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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मंगलवार, 20 दिसंबर 2016
👉 सतयुग की वापसी (भाग 16) 21 Dec
🌹 संवेदना का सरोवर सूखने न दें
🔴 प्रस्तुत समस्याएँ अगणित हैं। उलझनों, संकटों, विग्रहों का कोई अन्त नहीं। यह सब कहाँ से उत्पन्न होते हैं और क्यों कर निपट सकते हैं? इसकी विवेचना करने पर इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि मात्र अपने आपे तक, गिने-चुने अपनों तक सीमित रहने वाला किन्हीं अन्यों की चिन्ता नहीं कर सकता और न उदार न्यायनिष्ठा का ही परिचय दे सकता है। ऐसी दशा में अनाचार के अतिरिक्त और कुछ बन ही न पड़ेगा और उसका प्रतिफल अनेकानेक विग्रहों के रूप में ही आकर रहेगा। यही दुष्प्रवृत्ति जब बहुसंख्यक लोगों द्वारा अपनाई जाती है, तो उसका परिणाम वातावरण को विक्षुब्ध किए बिना नहीं रहता।
🔵 संवेदना, आत्मीयता के रूप में विकसित होती है। तब मनुष्य दूसरों के दु:ख को अपना दु:ख, अन्यों के सुख को अपना सुख मानने लगता है। सहानुभूति के रहते ऐसा व्यवहार करना सम्भव नहीं होता है, जिनसे किसी के अधिकारों का अपहरण होता हो अथवा किसी को शोषण का शिकार बनना पड़ता हो। जब प्रचलन इसी प्रकार का रहेगा तो न दुर्व्यवहार ही बन पड़ेगा और न किन्हीं को अकारण त्रास सहना पड़ेगा।
🔴 आमतौर से अपना, अपनों का हितसाधन ही अभीष्ट रहता है। यदि यह आत्मभाव सुविस्तृत होता चला जाए, जनसमुदाय को अपने अंचल में लपेट ले, अन्य प्राणियों को भी अपने कुटुम्बी जैसा माने, अपने जैसा समझे; फिर वैसा ही सोचते रहते बन पड़ेगा, जिससे सुख-शान्ति का पथ प्रशस्त होता हो। मात्र आतुरता और निष्ठुरता ही ऐसी दुष्प्रवृत्ति है जो अनाचार के लिए उकसाती है और उसके फलस्वरूप अगणित संकटों का परिकर विनिर्मित करती है। यदि भाव-संवेदना जीवन्त और सक्रिय बनी रहे तो सृजन और सहयोग के आधार पर उत्थान और कल्याण का सुयोग सर्वत्र ही बन पड़ेगा।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔴 प्रस्तुत समस्याएँ अगणित हैं। उलझनों, संकटों, विग्रहों का कोई अन्त नहीं। यह सब कहाँ से उत्पन्न होते हैं और क्यों कर निपट सकते हैं? इसकी विवेचना करने पर इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि मात्र अपने आपे तक, गिने-चुने अपनों तक सीमित रहने वाला किन्हीं अन्यों की चिन्ता नहीं कर सकता और न उदार न्यायनिष्ठा का ही परिचय दे सकता है। ऐसी दशा में अनाचार के अतिरिक्त और कुछ बन ही न पड़ेगा और उसका प्रतिफल अनेकानेक विग्रहों के रूप में ही आकर रहेगा। यही दुष्प्रवृत्ति जब बहुसंख्यक लोगों द्वारा अपनाई जाती है, तो उसका परिणाम वातावरण को विक्षुब्ध किए बिना नहीं रहता।
🔵 संवेदना, आत्मीयता के रूप में विकसित होती है। तब मनुष्य दूसरों के दु:ख को अपना दु:ख, अन्यों के सुख को अपना सुख मानने लगता है। सहानुभूति के रहते ऐसा व्यवहार करना सम्भव नहीं होता है, जिनसे किसी के अधिकारों का अपहरण होता हो अथवा किसी को शोषण का शिकार बनना पड़ता हो। जब प्रचलन इसी प्रकार का रहेगा तो न दुर्व्यवहार ही बन पड़ेगा और न किन्हीं को अकारण त्रास सहना पड़ेगा।
🔴 आमतौर से अपना, अपनों का हितसाधन ही अभीष्ट रहता है। यदि यह आत्मभाव सुविस्तृत होता चला जाए, जनसमुदाय को अपने अंचल में लपेट ले, अन्य प्राणियों को भी अपने कुटुम्बी जैसा माने, अपने जैसा समझे; फिर वैसा ही सोचते रहते बन पड़ेगा, जिससे सुख-शान्ति का पथ प्रशस्त होता हो। मात्र आतुरता और निष्ठुरता ही ऐसी दुष्प्रवृत्ति है जो अनाचार के लिए उकसाती है और उसके फलस्वरूप अगणित संकटों का परिकर विनिर्मित करती है। यदि भाव-संवेदना जीवन्त और सक्रिय बनी रहे तो सृजन और सहयोग के आधार पर उत्थान और कल्याण का सुयोग सर्वत्र ही बन पड़ेगा।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 41) 20 Dec
🌹 गम्भीर न रहें, प्रसन्न रहना सीखें
🔵 महात्मा गांधी कहा करते थे—‘यदि कोई मुझसे विनोद प्रियता छीन ले तो मैं उसी दिन पागल हो जाऊंगा।’ मुस्कान तथा आह्लाद थकान की दवा है विनोद इनका जनक है। विनोद प्रियता अधिकांश महापुरुषों का गुण रही है। गांधीजी के जीवन का तो यह अनिवार्य पहलू था।
🔴 कलकत्ता में गांधीजी ने खादी प्रदर्शनी का उद्घाटन करते हुए कहा—‘आज जो भी खादी खरीदेगा उसका कैशमीमो मैं बनाऊंगा।’ देखते ही देखते खरीददारों की भीड़ एकत्रित हो गई। थोड़ी सी देर में ढाई हजार रुपये की खादी बिक गई।
🔵 आचार्य कृपलानी ने यह चमत्कार देखा तो मजाक में कह उठे—‘लेना-देना कुछ नहीं बनिये ने ढाई हजार रुपये मार लिये।’ गांधीजी कब पीछे रहने वाले थे, चट बोल पड़े—‘यह काम मेरे जैसे बनिये ही कर सकते हैं, प्रोफेसर नहीं।’
🔴 9 अगस्त सन् 1942, प्रातःकाल पुलिस कमिश्नर गांधीजी को गिरफ्तार करने पहुंचा, उन्हें ले जाते हुए पुलिस कमिश्नर ने पास खड़े घनश्यामदास बिड़ला से कहा—‘गांधीजी के लिए आधा सेर बकरी का दूध दिलवा दीजिये।’
🔵 बिड़लाजी ने बापू से पूछा—‘ये लोग आपकी बकरी का दूध मांगते हैं।’ उन्होंने हंसते हुए कहा—‘चार आने धरा लो और दूध दे दो।’
🔴 एक बार एक अंग्रेज पत्रकार ने गांधीजी से पूछा—‘आप देश के महान नेता होकर भी हमेशा रेल के तीसरे दर्जे में ही सफर क्यों करते हैं?’
🔵 बापू ने उसी क्षण उत्तर दिया—‘इसलिए कि रेल में कोई चौथा दरजा नहीं है।’ पत्रकार यह उत्तर सुनकर सकपका गया।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔵 महात्मा गांधी कहा करते थे—‘यदि कोई मुझसे विनोद प्रियता छीन ले तो मैं उसी दिन पागल हो जाऊंगा।’ मुस्कान तथा आह्लाद थकान की दवा है विनोद इनका जनक है। विनोद प्रियता अधिकांश महापुरुषों का गुण रही है। गांधीजी के जीवन का तो यह अनिवार्य पहलू था।
🔴 कलकत्ता में गांधीजी ने खादी प्रदर्शनी का उद्घाटन करते हुए कहा—‘आज जो भी खादी खरीदेगा उसका कैशमीमो मैं बनाऊंगा।’ देखते ही देखते खरीददारों की भीड़ एकत्रित हो गई। थोड़ी सी देर में ढाई हजार रुपये की खादी बिक गई।
🔵 आचार्य कृपलानी ने यह चमत्कार देखा तो मजाक में कह उठे—‘लेना-देना कुछ नहीं बनिये ने ढाई हजार रुपये मार लिये।’ गांधीजी कब पीछे रहने वाले थे, चट बोल पड़े—‘यह काम मेरे जैसे बनिये ही कर सकते हैं, प्रोफेसर नहीं।’
🔴 9 अगस्त सन् 1942, प्रातःकाल पुलिस कमिश्नर गांधीजी को गिरफ्तार करने पहुंचा, उन्हें ले जाते हुए पुलिस कमिश्नर ने पास खड़े घनश्यामदास बिड़ला से कहा—‘गांधीजी के लिए आधा सेर बकरी का दूध दिलवा दीजिये।’
🔵 बिड़लाजी ने बापू से पूछा—‘ये लोग आपकी बकरी का दूध मांगते हैं।’ उन्होंने हंसते हुए कहा—‘चार आने धरा लो और दूध दे दो।’
🔴 एक बार एक अंग्रेज पत्रकार ने गांधीजी से पूछा—‘आप देश के महान नेता होकर भी हमेशा रेल के तीसरे दर्जे में ही सफर क्यों करते हैं?’
🔵 बापू ने उसी क्षण उत्तर दिया—‘इसलिए कि रेल में कोई चौथा दरजा नहीं है।’ पत्रकार यह उत्तर सुनकर सकपका गया।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 गृहस्थ-योग (भाग 40) 21 Dec
🌹 परिवार की चतुर्विधि पूजा
🔵 शरीर की भूख बुझाने के लिये जैसे भोजन आवश्यक है उसी प्रकार मानसिक भूख को बुझाने के लिये शिक्षा आवश्यक है। घर के हर व्यक्ति को शिक्षित बनाना चाहिए। जो स्कूल जा सकते हों वे स्कूल में शिक्षा प्राप्त करें, जिनके लिये यह संभव न हो वे घर पर पढ़ें। बच्चे, जवान या बूढ़े कोई भी क्यों न हों सभी को पढ़ने की रुचि उत्पन्न करनी चाहिये और उसके लिये साधन तथा व्यवस्था का प्रबन्ध करना चाहिए। एक दो घंटे नियमित रूप से गृह पाठशाला चलती रहे। अक्षर ज्ञान हो जाने के उपरान्त ऐसी चुनी हुई पुस्तकें उन्हें देनी चाहिये जिससे शारीरिक, मानसिक, समाजिक, धार्मिक आदि विषयों का आवश्यक ज्ञान क्रमशः बढ़ता रहे।
🔴 जीवन विज्ञान की आवश्यक समस्याओं को वे समझें और उन पर बारीकी के साथ विचार करना सीखें तथा प्रामाणिक व्यक्तियों की उस विषय पर सम्मतियां पढ़ें। रामायण आदि धार्मिक पुस्तकें पढ़ना ठीक है, परन्तु केवल मात्र इतिहास, पुराणों तक ही सीमित न रहना चाहिये। जीवन संग्राम की प्रत्यक्ष समस्याओं को समझना और सुलझाना भी आवश्यक है। यह भी धर्म का ही अंग है। अक्षर ज्ञान शब्द-कोष, व्याकरण आदि द्वारा भाषा का ज्ञान बढ़ाना चाहिये, साथ-साथ आवश्यक विषयों पर सत्संग, विवाद, प्रश्नोत्तर, शंका-समाधान, प्रवचन आदि उपायों की जानकारी, बुद्धिमता, विचार-शक्ति की भी वृद्धि होनी चाहिये। शिक्षा एवं विद्या की वृद्धि का अवसर हर एक को आवश्यक रूप से उसी प्रकार मिलना चाहिये जैसे कि भोजन की व्यवस्था जरूरी होती है।
🔵 स्वास्थ्य और शिक्षा के बाद मनोरंजन का प्रश्न आता है। वह भी एक अनावश्यक प्रश्न है। यदि मनुष्यों को आनन्दित होने, उल्लसित होने, हंसने, प्रसन्न होने, खेलने, मनोविनोद करने का अवसर न मिले तो उसकी मनोभूमि बड़ी कर्कश, चिड़चिड़ी, असहिष्णु और निराशा मय बन जायेगी। जो सदा कोल्हू के बैल की तरह काम में जुते रहते हैं, कैदी की तरह एक नियत क्षेत्र में काम करते रहते हैं, भोजन, मजूरी और निद्रा यही तीन कार्यक्रम जिनके रहते हैं उनकी मानसिक चेतना की सरसता धीरे धीरे सूखती जाती है और वे भीतर बाहर से अनुदार, विरोधी, दोषारोपण करने वाले, अविश्वासी, डरपोक और कायर बन जाते हैं। ऐसे लोगों को दुनियां के प्रति सदा अविश्वास और असन्तोष रहता है। इन प्रवृत्तियों के कारण शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य नष्ट होने लगता है, आयु घटने लगती है और बुढ़ापा घेर लेता है।
🌹 *क्रमशः जारी*
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
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🔵 शरीर की भूख बुझाने के लिये जैसे भोजन आवश्यक है उसी प्रकार मानसिक भूख को बुझाने के लिये शिक्षा आवश्यक है। घर के हर व्यक्ति को शिक्षित बनाना चाहिए। जो स्कूल जा सकते हों वे स्कूल में शिक्षा प्राप्त करें, जिनके लिये यह संभव न हो वे घर पर पढ़ें। बच्चे, जवान या बूढ़े कोई भी क्यों न हों सभी को पढ़ने की रुचि उत्पन्न करनी चाहिये और उसके लिये साधन तथा व्यवस्था का प्रबन्ध करना चाहिए। एक दो घंटे नियमित रूप से गृह पाठशाला चलती रहे। अक्षर ज्ञान हो जाने के उपरान्त ऐसी चुनी हुई पुस्तकें उन्हें देनी चाहिये जिससे शारीरिक, मानसिक, समाजिक, धार्मिक आदि विषयों का आवश्यक ज्ञान क्रमशः बढ़ता रहे।
🔴 जीवन विज्ञान की आवश्यक समस्याओं को वे समझें और उन पर बारीकी के साथ विचार करना सीखें तथा प्रामाणिक व्यक्तियों की उस विषय पर सम्मतियां पढ़ें। रामायण आदि धार्मिक पुस्तकें पढ़ना ठीक है, परन्तु केवल मात्र इतिहास, पुराणों तक ही सीमित न रहना चाहिये। जीवन संग्राम की प्रत्यक्ष समस्याओं को समझना और सुलझाना भी आवश्यक है। यह भी धर्म का ही अंग है। अक्षर ज्ञान शब्द-कोष, व्याकरण आदि द्वारा भाषा का ज्ञान बढ़ाना चाहिये, साथ-साथ आवश्यक विषयों पर सत्संग, विवाद, प्रश्नोत्तर, शंका-समाधान, प्रवचन आदि उपायों की जानकारी, बुद्धिमता, विचार-शक्ति की भी वृद्धि होनी चाहिये। शिक्षा एवं विद्या की वृद्धि का अवसर हर एक को आवश्यक रूप से उसी प्रकार मिलना चाहिये जैसे कि भोजन की व्यवस्था जरूरी होती है।
🔵 स्वास्थ्य और शिक्षा के बाद मनोरंजन का प्रश्न आता है। वह भी एक अनावश्यक प्रश्न है। यदि मनुष्यों को आनन्दित होने, उल्लसित होने, हंसने, प्रसन्न होने, खेलने, मनोविनोद करने का अवसर न मिले तो उसकी मनोभूमि बड़ी कर्कश, चिड़चिड़ी, असहिष्णु और निराशा मय बन जायेगी। जो सदा कोल्हू के बैल की तरह काम में जुते रहते हैं, कैदी की तरह एक नियत क्षेत्र में काम करते रहते हैं, भोजन, मजूरी और निद्रा यही तीन कार्यक्रम जिनके रहते हैं उनकी मानसिक चेतना की सरसता धीरे धीरे सूखती जाती है और वे भीतर बाहर से अनुदार, विरोधी, दोषारोपण करने वाले, अविश्वासी, डरपोक और कायर बन जाते हैं। ऐसे लोगों को दुनियां के प्रति सदा अविश्वास और असन्तोष रहता है। इन प्रवृत्तियों के कारण शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य नष्ट होने लगता है, आयु घटने लगती है और बुढ़ापा घेर लेता है।
🌹 *क्रमशः जारी*
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
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👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 53)
🌹 कला और उसका सदुपयोग
🔴 दया, करुणा, सेवा, उदारता सहयोग परमार्थ न्याय, संयम और विवेक की भावनाओं का जन मानस में जगाया जाना संसार की सबसे बड़ी सेवा हो सकती है। निष्ठुरता, संकीर्णता और स्वार्थपरता ने ही इस विश्व को नरक बनाया है। यदि यहां स्वर्गीय वातावरण की स्थापना करनी हो तो उसका एक ही उपाय है कि मानवीय अन्तस्तल को निम्न स्तर का न रहने दिया जाय। उसकी प्रसुप्त सद्भावनाओं को जगाया जाय। भावनाशील व्यक्तियों को ही देवता कहा जाता है। जहां देवता स्वभाव के व्यक्ति रहते हैं, वहां ही स्वर्गीय शान्ति और समृद्धि रहती है।
सद्भावनाओं के जगाने वाले और इस दिशा में कुछ ठोस प्रेरणा देने वाले कार्यक्रम नीचे दिये हैं:—
🔵 77. सेवा कार्यों में अभिरुचि— व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से ऐसे सेवा कार्यों का कुछ न कुछ आयोजन होते रहना चाहिए, जिससे आवश्यकता वाले व्यक्तियों की कुछ सहायता होती रहे और दुखियों को सुख मिले। ईसाई मिशनों में हर जगह चिकित्सा कार्यों को स्थान रहता है। प्राचीन काल में बौद्ध विहारों में भी ऐसी व्यवस्था रहती थी। रामकृष्ण परमहंस मिशन ने भी ऐसे ही चिकित्सालय जगह-जगह बनाये हैं। हम लोग ‘‘तुलसी के अमृतोपम गुण’’ पुस्तक के आधार पर तुलसी के पत्तों में कुछ साधारण वस्तुएं मिला कर औषधियां बना सकते हैं और उनसे अन्य प्रकार की औषधियों की अपेक्षा कहीं अधिक रोगियों की सेवा कर सकते हैं। तुलसी के पौधे बोने और थोड़ा-सा खर्च करने से इस प्रकार की हानि रहित चिकित्सा का क्रम हर जगह चल सकता है। सूर्य चिकित्सा की विधि भी इस दृष्टि से बड़ी उपयोगी हो सकती है।
🔴 सेवा-समितियां जिस प्रकार मेलों का प्रबन्ध, महामारी, दुर्घटना आदि से ग्रस्त लोगों की सहायता या दूसरे प्रकार के सेवा कार्य करती हैं, वैसे ही जन-हित के कोई कार्य हमें भी करते रहने चाहिए ताकि सद्भावनाओं को जगाने में सहायता मिले। अपंग भिक्षुओं के लिए निर्वाह साधन बनाने के प्रबन्ध भी उपयोगी रहेंगे।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔴 दया, करुणा, सेवा, उदारता सहयोग परमार्थ न्याय, संयम और विवेक की भावनाओं का जन मानस में जगाया जाना संसार की सबसे बड़ी सेवा हो सकती है। निष्ठुरता, संकीर्णता और स्वार्थपरता ने ही इस विश्व को नरक बनाया है। यदि यहां स्वर्गीय वातावरण की स्थापना करनी हो तो उसका एक ही उपाय है कि मानवीय अन्तस्तल को निम्न स्तर का न रहने दिया जाय। उसकी प्रसुप्त सद्भावनाओं को जगाया जाय। भावनाशील व्यक्तियों को ही देवता कहा जाता है। जहां देवता स्वभाव के व्यक्ति रहते हैं, वहां ही स्वर्गीय शान्ति और समृद्धि रहती है।
सद्भावनाओं के जगाने वाले और इस दिशा में कुछ ठोस प्रेरणा देने वाले कार्यक्रम नीचे दिये हैं:—
🔵 77. सेवा कार्यों में अभिरुचि— व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से ऐसे सेवा कार्यों का कुछ न कुछ आयोजन होते रहना चाहिए, जिससे आवश्यकता वाले व्यक्तियों की कुछ सहायता होती रहे और दुखियों को सुख मिले। ईसाई मिशनों में हर जगह चिकित्सा कार्यों को स्थान रहता है। प्राचीन काल में बौद्ध विहारों में भी ऐसी व्यवस्था रहती थी। रामकृष्ण परमहंस मिशन ने भी ऐसे ही चिकित्सालय जगह-जगह बनाये हैं। हम लोग ‘‘तुलसी के अमृतोपम गुण’’ पुस्तक के आधार पर तुलसी के पत्तों में कुछ साधारण वस्तुएं मिला कर औषधियां बना सकते हैं और उनसे अन्य प्रकार की औषधियों की अपेक्षा कहीं अधिक रोगियों की सेवा कर सकते हैं। तुलसी के पौधे बोने और थोड़ा-सा खर्च करने से इस प्रकार की हानि रहित चिकित्सा का क्रम हर जगह चल सकता है। सूर्य चिकित्सा की विधि भी इस दृष्टि से बड़ी उपयोगी हो सकती है।
🔴 सेवा-समितियां जिस प्रकार मेलों का प्रबन्ध, महामारी, दुर्घटना आदि से ग्रस्त लोगों की सहायता या दूसरे प्रकार के सेवा कार्य करती हैं, वैसे ही जन-हित के कोई कार्य हमें भी करते रहने चाहिए ताकि सद्भावनाओं को जगाने में सहायता मिले। अपंग भिक्षुओं के लिए निर्वाह साधन बनाने के प्रबन्ध भी उपयोगी रहेंगे।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 गहना कर्मणोगति: (भाग 21)
🌹 अपनी दुनियाँ के स्वयं निर्माता
🔵 एक ही व्यक्ति कई लोगों को कई प्रकार का दिखाई पड़ता है। माता उसे स्नेह भाजन मानती है, पिता आज्ञाकारी पुत्र मानता है, गुरु सुयोग्य शिष्य समझता है, मित्र हँसोड़ साथी समझते हैं, स्त्री प्राणवल्लभ मानती है, पुत्र उसे पिता समझता है, शत्रु वध करने योग्य समझता है, दुकानदार ग्राहक समझता है, नौकर मालिक मानता है, घोड़ा सवार समझता है, पालतू सुग्गा उसे कैदी बनाने वाला जेलर दीखता है। खटमल, पिस्सू उसे स्वादिष्ट खून से भरा हुआ कोठा समझते हैं। यदि इन सभी सम्बन्धियों की माता, पिता, गुरु, मित्र, स्त्री, पुत्र, शत्रु, दुकानदार, नौकर, घोड़ा, सुग्गा, खटमल, पिस्सू आदि की उन मानसिक भावनाओं का चित्र आपको दिखाया जा सके तो आप देखेंगे कि उस एक ही व्यक्ति के सम्बन्ध में यह सब सम्बन्धी कैसी-कैसी विचित्र कल्पना किए हुए हैं, जो एक-दूसरे से बिल्कुल नहीं मिलतीं।
🔴 इनमें से एक भी कल्पना ऐसी नहीं है, जो उस व्यक्ति के ठीक-ठीक और पूरे स्वरूप को प्रकट करती हो। जिसे उससे जितना एवं जैसा काम पड़ता है, वह उसके सम्बन्ध में वैसी ही कल्पना कर लेता है। तमाशा तो यह है कि वह मनुष्य स्वयं भी अपने बारे में एक ऐसी कल्पना किए हुए है। मैं वेश्या हूँ, लखपति हूँ, वृद्ध हूँ, पुत्र रहित हूँ, कुरूप हूँ, गण्यमान्य हूँ, दुःखी हूँ, बुरे लोगों से घिरा हुआ हूँ, आदि नाना प्रकार की कल्पनाएँ कर लेता है और उस कल्पना लोक में जीवन भर विचरण करता रहता है। जैसे दूसरे लोग उसके बारे में अपने मतलब की कल्पना कर लेते हैं, वैसे ही मन भी अपने बारे में इंद्रियों की अनुभूति के आधार पर अपने सम्बन्ध में एक लँगड़ी-लूली कल्पना कर लेता है और उसी कल्पना में लोग नशेबाज की तरह उड़ते रहते हैं। ‘‘मैं क्या हूँ?’’ इस मर्म को यदि वह किसी दिन समझ पाए, तो जाने कि मैंने अपने बारे में कितनी गलत धारणा बना रखी थी।
🔵 लोग ऐसी ही अपनी-अपनी भावुकता पूर्ण मानसिक उड़ान के हवाई घोड़ों पर चढ़कर सच्चाई के बहुत ऊँचे आकाश में उड़ते रहते हैं और उसी नशे में कोई मन के लड्डू खाया करता है। कोई मन के चने चबाया करता है, कोई शराबी सामने वाली दीवार को गालियाँ देकर अपना सिर फोड़ रहा है और कोई कुत्ते के बाहुपाश में कशकर प्रियतमा को चुंबन-आलिंगन का मजा ले रहा है। हम लोग अज्ञान के नशे में सो रहे हैं। किसी को महलों के सपने आ रहे हैं, कोई भयंकर दुःस्वप्न देखकर भयभीत हो रहा है। किसी शेखचिल्ली की शादी हो रही है, कोई पगला अमीरी और बादशाही बघार रहा है। दुनियाँ के पागल खाने में तरह-तरह की खोपड़ियाँ डोल रही हैं। यह सभी मूर्तियाँ अपने ढंग की विचित्र हैं, सभी अपने को होशियार मान रहे हैं। आप कभी पागलखाने देखने गए हों और अधिक समय तक वहाँ बंद रहने वाले ‘‘बुद्धिमानों’’ की बातें सुनी हों, तो आसानी से दुनियाँदार लोगों के उन स्वप्नों की तुलना कर सकते हैं, जो कि वे दुनियाँ के बारे में सोते समय देखते रहते हैं।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/gah/aapni.2
🔵 एक ही व्यक्ति कई लोगों को कई प्रकार का दिखाई पड़ता है। माता उसे स्नेह भाजन मानती है, पिता आज्ञाकारी पुत्र मानता है, गुरु सुयोग्य शिष्य समझता है, मित्र हँसोड़ साथी समझते हैं, स्त्री प्राणवल्लभ मानती है, पुत्र उसे पिता समझता है, शत्रु वध करने योग्य समझता है, दुकानदार ग्राहक समझता है, नौकर मालिक मानता है, घोड़ा सवार समझता है, पालतू सुग्गा उसे कैदी बनाने वाला जेलर दीखता है। खटमल, पिस्सू उसे स्वादिष्ट खून से भरा हुआ कोठा समझते हैं। यदि इन सभी सम्बन्धियों की माता, पिता, गुरु, मित्र, स्त्री, पुत्र, शत्रु, दुकानदार, नौकर, घोड़ा, सुग्गा, खटमल, पिस्सू आदि की उन मानसिक भावनाओं का चित्र आपको दिखाया जा सके तो आप देखेंगे कि उस एक ही व्यक्ति के सम्बन्ध में यह सब सम्बन्धी कैसी-कैसी विचित्र कल्पना किए हुए हैं, जो एक-दूसरे से बिल्कुल नहीं मिलतीं।
🔴 इनमें से एक भी कल्पना ऐसी नहीं है, जो उस व्यक्ति के ठीक-ठीक और पूरे स्वरूप को प्रकट करती हो। जिसे उससे जितना एवं जैसा काम पड़ता है, वह उसके सम्बन्ध में वैसी ही कल्पना कर लेता है। तमाशा तो यह है कि वह मनुष्य स्वयं भी अपने बारे में एक ऐसी कल्पना किए हुए है। मैं वेश्या हूँ, लखपति हूँ, वृद्ध हूँ, पुत्र रहित हूँ, कुरूप हूँ, गण्यमान्य हूँ, दुःखी हूँ, बुरे लोगों से घिरा हुआ हूँ, आदि नाना प्रकार की कल्पनाएँ कर लेता है और उस कल्पना लोक में जीवन भर विचरण करता रहता है। जैसे दूसरे लोग उसके बारे में अपने मतलब की कल्पना कर लेते हैं, वैसे ही मन भी अपने बारे में इंद्रियों की अनुभूति के आधार पर अपने सम्बन्ध में एक लँगड़ी-लूली कल्पना कर लेता है और उसी कल्पना में लोग नशेबाज की तरह उड़ते रहते हैं। ‘‘मैं क्या हूँ?’’ इस मर्म को यदि वह किसी दिन समझ पाए, तो जाने कि मैंने अपने बारे में कितनी गलत धारणा बना रखी थी।
🔵 लोग ऐसी ही अपनी-अपनी भावुकता पूर्ण मानसिक उड़ान के हवाई घोड़ों पर चढ़कर सच्चाई के बहुत ऊँचे आकाश में उड़ते रहते हैं और उसी नशे में कोई मन के लड्डू खाया करता है। कोई मन के चने चबाया करता है, कोई शराबी सामने वाली दीवार को गालियाँ देकर अपना सिर फोड़ रहा है और कोई कुत्ते के बाहुपाश में कशकर प्रियतमा को चुंबन-आलिंगन का मजा ले रहा है। हम लोग अज्ञान के नशे में सो रहे हैं। किसी को महलों के सपने आ रहे हैं, कोई भयंकर दुःस्वप्न देखकर भयभीत हो रहा है। किसी शेखचिल्ली की शादी हो रही है, कोई पगला अमीरी और बादशाही बघार रहा है। दुनियाँ के पागल खाने में तरह-तरह की खोपड़ियाँ डोल रही हैं। यह सभी मूर्तियाँ अपने ढंग की विचित्र हैं, सभी अपने को होशियार मान रहे हैं। आप कभी पागलखाने देखने गए हों और अधिक समय तक वहाँ बंद रहने वाले ‘‘बुद्धिमानों’’ की बातें सुनी हों, तो आसानी से दुनियाँदार लोगों के उन स्वप्नों की तुलना कर सकते हैं, जो कि वे दुनियाँ के बारे में सोते समय देखते रहते हैं।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 "हमारी वसीयत और विरासत" (भाग 2)
🌞 इस जीवन यात्रा के गम्भीरता पूर्वक पर्यवेक्षण की आवश्यकता
🔴 हमारी जीवन गाथा सब जिज्ञासुओं के लिए एक प्रकाश स्तम्भ का काम कर सकती है। वह एक बुद्धिजीवी और यथार्थवादी द्वारा अपनाई गई कार्यपद्धति है। छद्म जैसा कुछ उसमें है नहीं, असफलता का लाँछन भी उन पर नहीं लगता। ऐसी दशा में जो गंभीरता से समझने का प्रयत्न करेगा कि सही लक्ष्य तक पहुँचने का सही मार्ग हो सकता था, शार्टकट के फेर में भ्रम जंजाल न अपनाए गए होते, तो निराशा, खीज़ और थकान हाथ न लगती, तब या तो मँहगा समझकर हाथ ही न डाला जाता, यदि पाना ही था, तो उसका मूल्य चुकाने का साहस पहले से ही सँजोया गया होता। ऐसा अवसर उन्हें मिला नहीं, इसी को दुर्भाग्य कह सकते हैं। यदि हमारा जीवन पढ़ा गया होता, उसके साथ-साथ आदि से अंत तक गुँथे हुए अध्यात्म तत्त्व-दर्शन और क्रिया-विधान को समझने का अवसर मिला होता, तो निश्चय ही प्रच्छन्न भ्रमग्रस्त लोगों की संख्या इतनी न रही होती, जितनी अब है।
🔵 एक और वर्ग है-विवेक दृष्टि वाले यथार्थवादियों का। वे ऋषि परम्परा पर विश्वास करते हैं और सच्चे मन से विश्वास करते हैं कि वे आत्मबल के धनी थे। उन विभूतियों से उनने अपना, दूसरों का और समस्त विश्व का भला किया था। भौतिक विज्ञान की तुलना में जो अध्यात्म विज्ञान को श्रेष्ठ मानते हैं, उनकी एक जिज्ञासा यह भी रहती है कि वास्तविक स्वरूप और विधान क्या है? कहने को तो हर कुंजड़ी अपने बेरों को मीठा बताती है, पर कथनी पर विश्वास न करने वालों द्वारा उपलब्धियों का जब लेखा-जोखा लिया जाता है, तब प्रतीत होता है कि कौन कितने पानी में है ?
🔴 सही क्रिया, सही लोगों द्वारा, सही प्रयोजनों के लिए अपनाए जाने पर उसका सत्परिणाम भी होना चाहिए। इस आधार पर जिन्हें ऋषि परम्परा के अध्यात्म का स्वरूप समझना हो, उन्हें निजी अनुसंधान करने की आवश्यकता नहीं है। वे हमारी जीवनचर्या को आदि से अंत तक पढ़ और परख सकते हैं। विगत साठ वर्षों में प्रत्येक वर्ष इसी प्रयोजन के लिए व्यतीत हुआ है। उसके परिणाम भी खुली पुस्तक की तरह सामने हैं। इन पर गंभीर दृष्टिपात करने पर यह अनुमान निकल सकता है कि सही परिणाम प्राप्त करने वालों ने सही मार्ग भी अवश्य अपनाया होगा। ऐसा अद्भुत मार्ग दूसरों के लिए भी अनुकरणीय हो सकता है। आत्म-विद्या और अध्यात्म विज्ञान की गरिमा से जो प्रभावित है, उसका पुनर्जीवन देखना चाहते हैं, प्रतिपादनों को परिणतियों की कसौटी पर कसना चाहते हैं, उन्हें निश्चय ही हमारी जीवनचर्या के पृष्ठों का पर्यवेक्षण, संतोषप्रद और समाधान कारक लगता है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/is
🔴 हमारी जीवन गाथा सब जिज्ञासुओं के लिए एक प्रकाश स्तम्भ का काम कर सकती है। वह एक बुद्धिजीवी और यथार्थवादी द्वारा अपनाई गई कार्यपद्धति है। छद्म जैसा कुछ उसमें है नहीं, असफलता का लाँछन भी उन पर नहीं लगता। ऐसी दशा में जो गंभीरता से समझने का प्रयत्न करेगा कि सही लक्ष्य तक पहुँचने का सही मार्ग हो सकता था, शार्टकट के फेर में भ्रम जंजाल न अपनाए गए होते, तो निराशा, खीज़ और थकान हाथ न लगती, तब या तो मँहगा समझकर हाथ ही न डाला जाता, यदि पाना ही था, तो उसका मूल्य चुकाने का साहस पहले से ही सँजोया गया होता। ऐसा अवसर उन्हें मिला नहीं, इसी को दुर्भाग्य कह सकते हैं। यदि हमारा जीवन पढ़ा गया होता, उसके साथ-साथ आदि से अंत तक गुँथे हुए अध्यात्म तत्त्व-दर्शन और क्रिया-विधान को समझने का अवसर मिला होता, तो निश्चय ही प्रच्छन्न भ्रमग्रस्त लोगों की संख्या इतनी न रही होती, जितनी अब है।
🔵 एक और वर्ग है-विवेक दृष्टि वाले यथार्थवादियों का। वे ऋषि परम्परा पर विश्वास करते हैं और सच्चे मन से विश्वास करते हैं कि वे आत्मबल के धनी थे। उन विभूतियों से उनने अपना, दूसरों का और समस्त विश्व का भला किया था। भौतिक विज्ञान की तुलना में जो अध्यात्म विज्ञान को श्रेष्ठ मानते हैं, उनकी एक जिज्ञासा यह भी रहती है कि वास्तविक स्वरूप और विधान क्या है? कहने को तो हर कुंजड़ी अपने बेरों को मीठा बताती है, पर कथनी पर विश्वास न करने वालों द्वारा उपलब्धियों का जब लेखा-जोखा लिया जाता है, तब प्रतीत होता है कि कौन कितने पानी में है ?
🔴 सही क्रिया, सही लोगों द्वारा, सही प्रयोजनों के लिए अपनाए जाने पर उसका सत्परिणाम भी होना चाहिए। इस आधार पर जिन्हें ऋषि परम्परा के अध्यात्म का स्वरूप समझना हो, उन्हें निजी अनुसंधान करने की आवश्यकता नहीं है। वे हमारी जीवनचर्या को आदि से अंत तक पढ़ और परख सकते हैं। विगत साठ वर्षों में प्रत्येक वर्ष इसी प्रयोजन के लिए व्यतीत हुआ है। उसके परिणाम भी खुली पुस्तक की तरह सामने हैं। इन पर गंभीर दृष्टिपात करने पर यह अनुमान निकल सकता है कि सही परिणाम प्राप्त करने वालों ने सही मार्ग भी अवश्य अपनाया होगा। ऐसा अद्भुत मार्ग दूसरों के लिए भी अनुकरणीय हो सकता है। आत्म-विद्या और अध्यात्म विज्ञान की गरिमा से जो प्रभावित है, उसका पुनर्जीवन देखना चाहते हैं, प्रतिपादनों को परिणतियों की कसौटी पर कसना चाहते हैं, उन्हें निश्चय ही हमारी जीवनचर्या के पृष्ठों का पर्यवेक्षण, संतोषप्रद और समाधान कारक लगता है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 2)
🌞 पुस्तक परिचय
🔴 उन दिनों '' साधक की डायरी के पृष्ठ '' '' सुनसान के सहचर'' आदि शीर्षकों से जो लेख '' अखण्ड- ज्योति '' पत्रिका में छपे, वे लोगों को बहुत रुचे। बात पुरानी हो गई पर अभी लोग उन्हें पढ़ने के लिए उत्सुक थे। सो इन लेखों को पुस्तकाकार में प्रकाशित कर देना उचित समझा गया। अस्तु यह पुस्तक प्रस्तुत है। घटनाक्रम अवश्य पुराना हो गया, पर उन दिनों जो अनुभूतियाँ उठतीं, वे शाश्वत है। उनकी उपयोगिता में समय के पीछे पड़ जाने के कारण कुछ अन्तर नहीं आया है। आशा की जानी चाहिए भावनाशील अन्तः करणों को वे अनुभूतियाँ अभी भी हमारी ही तरह स्पंदित कर सकेगी और पुस्तक की उपयोगिता एवं सार्थकता सिद्ध हो सकेगी।
🔵 एक विशेष लेख इसी संकलन में और है वह है- ''हिमालय के हृदय का विवेचन- विश्लेषण। '' बद्रीनारायण से लेकर गंगोत्री के बीच का लगभग ४०० मील परिधि का वह स्थान है, जो प्राय: सभी देवताओं और ऋषियों का तप केन्द्र रहा है। इसे ही धरती का स्वर्ग कहा जा सकता है। स्वर्ग कथाओं के जो घटनाक्रम एवं व्यक्ति चरित्र जुड़े हैं, उनकी यदि इतिहास- भूगोल से संगति मिलाई जाये तो वे धरती पर ही सिद्ध होते हैं और उस बात में बहुत वजन मालूम पड़ता है, जिसमें इन्द्र के शासन एवं आर्ष- सभ्यता की संस्कृति का उद्गम स्थान हिमालय का उपरोक्त स्थान बताया गया है। अब वहाँ बर्फ बहुत पड़ने लगी है। ऋतु परिस्थितियों की श्रृंखला में अब वह हिमालय का हृदय असली उत्तराखण्ड इस योग्य नहीं रहा कि वहाँ आज के दुर्बल शरीरों वाला व्यक्ति निवास- स्थान बना सके। इसलिए आधुनिक उत्तराखण्ड नीचे चला गया और हरिद्वार से लेकर बद्रीनारायण, गंगोत्री, गोमुख तक ही उसकी परिधि सीमित हो गयी है।
🔴 ''हिमालय के हृदय'' क्षेत्र में जहाँ प्राचीन स्वर्ग की विशेषता विद्यमान है वहाँ तपस्याओं से प्रभावित शक्तिशाली आध्यात्मिक क्षेत्र भी विद्यमान है। हमारे मार्गदर्शक वहाँ रहकर प्राचीनतम ऋषियों की इस तप संस्कारित भूमि से अनुपम शक्ति प्राप्त करते हैं। कुछ समय के लिए हमें भी उस स्थान पर का सौभाग्य मिला और वे दिव्य स्थान अपने भी देखने में आये। सो इनका जितना दर्शन हो सका, उसका वर्णन अखण्ड ज्योति में प्रस्तुत किया गया था। वह लेख भी अपने ढंग का अनोखा है। उससे संसार में एक ऐसे स्थान का पता चलता है, जिसे आत्म- शक्ति का ध्रुव कहा जा सकता है। धरती के उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुवों में विशेष शक्तियों हैं। अध्यात्म शक्ति का एक ध्रुव हमारी समझ में आया। जिसमें अत्यधिक महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ भरी पड़ी है। सूक्ष्म शक्तियों की दृष्टि से भी और शरीरधारी सिद्ध पुरुषों की दृष्टि से भी।
🔵 इस दिव्य केन्द्र की और लोगों का ध्यान बना रहे, इस दृष्टि से उसका परिचय तो रहना ही चाहिए, इस दृष्टि से उस जानकारी को मूल्यवान् ही कहा जा सकता है । ब्रह्मवर्चस, शान्तिकुंज, गायत्री नगर का निर्माण उत्तराखण्ड के द्वार में करने का उद्देश्य यही रहा है । जो लोग यहाँ आते हैं, उनने असीम शान्ति प्राप्ति की है । भविष्य में उसका महत्त्व असाधारण होने जा रहा है । उन सम्भावनाओं को व्यक्त तो नहीं किया जा रहा है । अगले दिनों उनसे लोग चमत्कृत हुए बिना न रहेंगे ।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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🔴 उन दिनों '' साधक की डायरी के पृष्ठ '' '' सुनसान के सहचर'' आदि शीर्षकों से जो लेख '' अखण्ड- ज्योति '' पत्रिका में छपे, वे लोगों को बहुत रुचे। बात पुरानी हो गई पर अभी लोग उन्हें पढ़ने के लिए उत्सुक थे। सो इन लेखों को पुस्तकाकार में प्रकाशित कर देना उचित समझा गया। अस्तु यह पुस्तक प्रस्तुत है। घटनाक्रम अवश्य पुराना हो गया, पर उन दिनों जो अनुभूतियाँ उठतीं, वे शाश्वत है। उनकी उपयोगिता में समय के पीछे पड़ जाने के कारण कुछ अन्तर नहीं आया है। आशा की जानी चाहिए भावनाशील अन्तः करणों को वे अनुभूतियाँ अभी भी हमारी ही तरह स्पंदित कर सकेगी और पुस्तक की उपयोगिता एवं सार्थकता सिद्ध हो सकेगी।
🔵 एक विशेष लेख इसी संकलन में और है वह है- ''हिमालय के हृदय का विवेचन- विश्लेषण। '' बद्रीनारायण से लेकर गंगोत्री के बीच का लगभग ४०० मील परिधि का वह स्थान है, जो प्राय: सभी देवताओं और ऋषियों का तप केन्द्र रहा है। इसे ही धरती का स्वर्ग कहा जा सकता है। स्वर्ग कथाओं के जो घटनाक्रम एवं व्यक्ति चरित्र जुड़े हैं, उनकी यदि इतिहास- भूगोल से संगति मिलाई जाये तो वे धरती पर ही सिद्ध होते हैं और उस बात में बहुत वजन मालूम पड़ता है, जिसमें इन्द्र के शासन एवं आर्ष- सभ्यता की संस्कृति का उद्गम स्थान हिमालय का उपरोक्त स्थान बताया गया है। अब वहाँ बर्फ बहुत पड़ने लगी है। ऋतु परिस्थितियों की श्रृंखला में अब वह हिमालय का हृदय असली उत्तराखण्ड इस योग्य नहीं रहा कि वहाँ आज के दुर्बल शरीरों वाला व्यक्ति निवास- स्थान बना सके। इसलिए आधुनिक उत्तराखण्ड नीचे चला गया और हरिद्वार से लेकर बद्रीनारायण, गंगोत्री, गोमुख तक ही उसकी परिधि सीमित हो गयी है।
🔴 ''हिमालय के हृदय'' क्षेत्र में जहाँ प्राचीन स्वर्ग की विशेषता विद्यमान है वहाँ तपस्याओं से प्रभावित शक्तिशाली आध्यात्मिक क्षेत्र भी विद्यमान है। हमारे मार्गदर्शक वहाँ रहकर प्राचीनतम ऋषियों की इस तप संस्कारित भूमि से अनुपम शक्ति प्राप्त करते हैं। कुछ समय के लिए हमें भी उस स्थान पर का सौभाग्य मिला और वे दिव्य स्थान अपने भी देखने में आये। सो इनका जितना दर्शन हो सका, उसका वर्णन अखण्ड ज्योति में प्रस्तुत किया गया था। वह लेख भी अपने ढंग का अनोखा है। उससे संसार में एक ऐसे स्थान का पता चलता है, जिसे आत्म- शक्ति का ध्रुव कहा जा सकता है। धरती के उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुवों में विशेष शक्तियों हैं। अध्यात्म शक्ति का एक ध्रुव हमारी समझ में आया। जिसमें अत्यधिक महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ भरी पड़ी है। सूक्ष्म शक्तियों की दृष्टि से भी और शरीरधारी सिद्ध पुरुषों की दृष्टि से भी।
🔵 इस दिव्य केन्द्र की और लोगों का ध्यान बना रहे, इस दृष्टि से उसका परिचय तो रहना ही चाहिए, इस दृष्टि से उस जानकारी को मूल्यवान् ही कहा जा सकता है । ब्रह्मवर्चस, शान्तिकुंज, गायत्री नगर का निर्माण उत्तराखण्ड के द्वार में करने का उद्देश्य यही रहा है । जो लोग यहाँ आते हैं, उनने असीम शान्ति प्राप्ति की है । भविष्य में उसका महत्त्व असाधारण होने जा रहा है । उन सम्भावनाओं को व्यक्त तो नहीं किया जा रहा है । अगले दिनों उनसे लोग चमत्कृत हुए बिना न रहेंगे ।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 40) 20 Dec
🌹 गम्भीर न रहें, प्रसन्न रहना सीखें
🔵 मनुष्य के पसीने में सम्पदायें भरी हुई हैं और पसीने की बूंदों के साथ सम्पदायें टपकती हैं। रुचिपूर्वक आज के कामों में संलग्न होने से बढ़कर तत्काल आनन्द प्राप्त करने का और कोई तरीका नहीं है।
🔴 जिन्हें जीवन से सचमुच प्यार है और वे उस उपलब्धि का बढ़ा-चढ़ा रसास्वादन करना चाहते हैं, उनके लिए जीवन विज्ञानियों का एक ही परामर्श है कि अपनी मस्ती किसी भी कीमत पर न बेची जाय अपनी स्वतन्त्रता में विवेक के अतिरिक्त और किसी को भी हस्तक्षेप न करने दिया जाय।
🔵 अनुकूल परिस्थितियां, लोगों की अनुकम्पायें, समृद्धि की संभावनाओं की आशा रखने में कोई हर्ज नहीं, पर हिम्मत एकाकी चल पड़ने की होनी चाहिए। हमारा सन्तोष और आनन्द इस बात पर केन्द्रित रहना चाहिए कि हमने भले काम किये, दायित्व निभायें और जो किया उसमें पूरा श्रम और मनोयोग लगाया। इस आधार पर हम हर घड़ी प्रमुदित रह सकते हैं भले ही परिणाम इच्छा के अनुरूप हों या प्रतिकूल।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 52)
🌹 कला और उसका सदुपयोग
🔴 75. नाटक और एकांकी— सामूहिक खुले लीला अभिनयों की भांति ही उनका सुधरा और अधिक सुन्दर रूप नाटक मण्डलियों के रूप में बनता है। रासलीलाओं का वर्तमान रूप वैसा ही है। बड़ी नाटक मण्डलियों की बात यहां नहीं की जा रही है। थोड़े से उपकरणों का रंगमंच बनाकर अनेक महापुरुषों के जीवनों की श्रेष्ठ घटनाओं, ऐतिहासिक तथ्यों तथा सामाजिक स्थिति का चित्रण करने वाले नाटकों की व्यवस्था करके उन्हें साधारण जनता के मनोरंजन का माध्यम बनाया जा सकता है। ऐसी मण्डलियां व्यवसायिक आधार पर गठित हो सकती हैं। जन स्थिति के अनुरूप खर्च वसूल करके उन्हें सस्ता और लोक प्रिय बनाया जा सकता है।
🔵 छोटे-मोटे आयोजनों में एकांकी अभिनय भी बड़े रोचक और मनोरंजक होते हैं। विद्यालयों में एकांकी अभिनय बड़े सफल होते हैं, उन्हें दूसरे आयोजनों पर भी प्रदर्शित किया जा सकता है। ऐसे एकांकी एवं नाटक लिखे और प्रदर्शित किए जाने चाहिए जो नैतिक एवं विचार क्रान्ति में आवश्यक योगदान दे सकें।
🔴 76. कला के वैज्ञानिक माध्यम— विज्ञान के माध्यम से कुछ कलात्मक माध्यमों का इतना विकास हो गया है कि उनका उपयोग तो जनता करती है पर निर्माण ऊंचे स्तर पर ही हो सकता है। ग्रामोफोन के रिकार्ड और सिनेमा फिल्में इसी प्रकार के दो माध्यम हैं, जिनने जनमानस पर भारी प्रभाव डाला है। ग्रामोफोन का प्रचलन तो रेडियो के विस्तार से घट गया है, पर उत्सवों के अवसरों पर लाउडस्पीकरों द्वारा रिकार्ड अभी भी बजाये जाते हैं और उन्हें लाखों व्यक्ति प्रतिदिन सुनते हैं। इसी प्रकार देश भर में हजारों सिनेमा-घर हैं, जिनमें लाखों फिल्में चल जाती हैं। इन्हें भी करोड़ों व्यक्ति हर साल देखते हैं और जैसे भी संस्कार उन दृश्यों में होते हैं उन्हें देखने वाले ग्रहण करते हैं। मानवीय मस्तिष्क को प्रभावित करने के लिए विज्ञान की यह दो बड़ी कलात्मक देन हैं। पर खेद इसी बात का है कि इनका दुरुपयोग ही अधिक होता है। यदि इनका सदुपयोग हो सका होता तो जन-जागृति एवं चरित्र-निर्माण में भारी योग मिला होता।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 April 2026
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