शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

👉 शिष्य संजीवनी (भाग 6)

सबसे पहले शिष्य अपनी महत्त्वाकांक्षा छोड़े

इसीलिए प्रत्येक सद्गुरु अपने शिष्य को पहला निर्देश यही देता है कि महात्त्वाकांक्षा को दूर करो। छोड़ दो यह ख्याल कि तुम्हें किसी के जैसा होना है। सद्गुरु कहते हैं कि तुम्हें तो सिर्फ एक ही ख्याल होना चाहिए कि तुम्हें परमात्मा ने क्या बनाया है, उसे जानना है। प्रत्येक मनुष्य ईश्वर का सनातन अंश है- इस सत्य को अनुभव करना है। इसके लिए किसी और की फोटो कापी बनने की कोई जरूरत नहीं है। आत्मतत्त्व तो सदा ही अपने अन्दर मौजूद है। इसको बस जान लेना है।

आत्मतत्त्व की अनुभूति के लिए अपने आप को स्वयं के सच्चे स्वरूप को अनुभव करने के लिए कुछ जोड़ना नहीं है। सिर्फ कुछ घटाना है। जो कुसंस्कारों का, दुष्प्रवृत्तियों का कचरा इकट्ठा कर लिया है, उसे गलना भर है। हीरा मौजूद है, कचरे के ढेर में, बस कचरा हटाकर हीरा पहचान लेना है। इसके लिए न तो किसी की नकल करने की जरूरत है और नहीं किसी महत्वाकांक्षा की जरूरत है।

महत्त्वाकांक्षा से सिर्फ तुलना दुःख, ईर्ष्या और हिंसा ही जन्म लेते हैं। जितनी ज्यादा महत्त्वाकांक्षाजिसमें है, वह उतना ही दुःखी और अशान्त रहता है। जर्मन दार्शनिक स्लेगल ने यहाँ तक कह डाला है कि महत्त्वाकांक्षा भयावह बीमारी है। मनुष्य जाति और मानवीय सभ्यता का जितना ज्यादा नुकसान इस बीमारी के कारण हुआ है, उतना किसी और कारण नहीं हुआ। स्लेगल के अनुसार मानव इस बीमारी से जितना जल्दी दूर जाय उतना ही श्रेयस्कर है। सत्य- साधना जिनके जीवन की साध्य है, उन्हें इस अभिशाप को किसी भी तरह अपने पास नहीं फटकने देना चाहिए।

जिनका जीवन महत्त्वाकांक्षा से कलंकित है, वे कभी भी शिष्य नहीं हो सकते। जिनकी जिन्दगीमहत्त्वाकांक्षा से अभिशप्त है, उन्हें कभी भी सद्गुरु की शरण नहीं मिल सकती। इसलिए शिष्यत्व की साधना करने वालों के लिए महान् गुरु भक्तों का यही निर्देश है कि छोड़े महत्त्वाकांक्षा। छोड़े तुलना की प्रवृत्ति। बस एक ही बात की फिक्र करें कि अपने आपको किस विधि से सम्पूर्णतया सद्गुरु को सौपें? यदि हमारा जीवन महत्त्वाकांक्षा से रहित है तो कृपालु सद्गुरु इसमें से भगवत् सत्ता को प्रकट कर देंगे। आत्मतत्त्व दिव्यता से जीवन अपने आप ही महक उठेगा। स्वयं ही समस्त दिव्यताएँ अस्तित्व में साकार हो सकेंगी। बस आवश्यकता शिष्य संजीवनी के प्रथम सूत्र को आत्मसात् करने की है। इस प्रथम सूत्र पर मनन ज्यों- ज्यों प्रगाढ़ होगा, त्यों- त्यों हमारी चेतना द्वितीय सूत्र के लिए तैयार हो जायेगी।

क्रमशः जारी
- डॉ. प्रणव पण्डया
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गुरुवार, 18 फ़रवरी 2016

👉 शिष्य संजीवनी (भाग 5)


सबसे पहले शिष्य अपनी महत्त्वाकांक्षा छोड़े

जो इस महासाधना के लिए तैयार है, उनके लिए शिष्य संजीवनी का प्रथम सूत्र है- महात्त्वाकांक्षाको दूर करो। क्योंकि शिष्यों के लिए महात्त्वाकांक्षा पहला अभिशाप है। जो कोई अपने साधना पथ पर आगे बढ़ रहा है, उसे यह मोहित करके पथ से विचलित कर देती है। सत्कर्मों एवं पुण्यों को समाप्त करने का यह सबसे सरल साधन है। बुद्धिमान, परम समर्थ एवं महातपस्वी लोग भी इसके जाल मेंफंस कर बराबर अपनी उच्चतम सम्भावनाओं से स्खलित होते रहते हैं। महात्त्वाकांक्षा कितनी भी सम्मोहक व आकर्षक क्यों न हो, पर इसके फल चखते समय मुँह में राख और धूल बन जाते हैं। मृत्यु और विछोह की ही भाँति इससे भी यही सीख मिलती है कि स्वार्थ के लिए अहं के विस्तार के लिए कार्य करने से परिणाम में केवल निराशा ही मिलती है। महत्त्वाकांक्षा प्रकारान्तर से साधना का महाविनाश ही है।

यह अनुभव उन सभी का है, जिन्होंने शिष्य की गहनतम व सफलतम साधना की है। महात्त्वाकांक्षाएवं शिष्यत्व का कोई मेल नहीं है। शिष्य बनने के लिए अपने को गलाना, जलाना और मिटाना पड़ता है, ताकि खाली हुआ जा सके। पात्र बना जा सके और इस पात्रता को सद्गुरु के अनुदानों से परिपूर्ण किया जा सके। महात्त्वाकांक्षा इस प्रक्रिया की एकदम विरोधी है। यह कुछ होने की वासना है। अपनी क्षुद्रताओं को पोषित करने का पागलपन है।

महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति सदा ही अपनी क्षुद्रताओं से घिरा रहता है। महात्त्वाकांक्षा में निहित सत्य का यदि मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करें तो यही तथ्य उजागर होता है कि जो जितना अधिक आत्महीनता से ग्रस्त है, वह उतना ही इसके पाश में जकड़ जाता है। ऐसा व्यक्ति हमेशा ही दूसरे के धन, पद, स्वास्थ्य, वैभव को देखकर ललचाता रहता है। उसे हर क्षण यही लगता रहता है कि इसके जैसा बन जाऊँ, उसके जैसा बन जाऊँ। यह भटकन उसे सदा ही आत्मविमुख बनाये रखती है। इस मनोदशा में अपनी सम्भावनाओं को जानने, खोजने, इन्हें साकार करने की सुधि ही नहीं आती।

क्रमशः जारी
- डॉ. प्रणव पण्डया
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बुधवार, 17 फ़रवरी 2016

👉 शिष्य संजीवनी (भाग 4)

सबसे पहले शिष्य अपनी महत्त्वाकांक्षा छोड़े

शिष्य संजीवनी शिष्यों के लिए प्राणदायिनी औषधि है। इसका प्रत्येक सूत्र केवल उनके लिए है, जिनके हृदय में शिष्य होने की सच्ची चाहत है। जो सद्गुरु के प्रति सर्वस्व समर्पण में अपनी पहचान खोजना चाहते हैं। ध्यान रहे शिष्य का अर्थ है, जो सीखने के लिए राजी है, जो झुकने को तैयार है। जिसके लिए ज्ञान, अहंकार से कहीं ज्यादा मूल्यवान है। जो इस भावदशा में जीता है कि मैं शिष्यत्व की साधना के लिए सब कुछ खोने के लिए तैयार हूँ। मैं अपने आप को भी देने के लिए तैयार हूँ। शिष्यत्व का अर्थ है- एक गहन विनम्रता। शिष्य वही है- जो अपने को झुकाकर, स्वयं के हृदय को पात्र बना लेता है।

आप और हम कितने भी प्यासे क्यों न हों, पर बहती हुई जलधारा कभी भी छलांग लगा कर हमारे हाथों में नहीं आयेगी। इसका मतलब यह नहीं है कि जलधारा हम पर नाराज है। उल्टे वह तो हर क्षण प्रत्येक की प्यास बुझाने के लिए तत्पर है। लेकिन इसके लिए न केवल हमें झुकना होगा, बल्कि झुककर अञ्जलि बनाकर नदी का स्पर्श करना होगा। फिर तो अपने आप ही बहती जलधारा हमारे हाथों में आ जायेगी। तो ये शिष्य संजीवनी के सूत्र उनके लिए हैं, जो झुकने के लिए तैयार हैं। केवल प्यास पर्याप्त नहीं है। इसके लिए अञ्जलि बनाकर झुकना भी पड़ेगा।

जिनके मन अन्तःकरण में केवल एक ही भाव अंकुरित, पल्लवित, पुष्पित होता है कि सद्गुरु के चरणों में मैं मिट जाऊँ तो कोई हर्ज नहीं है, लेकिन जीवन का रहस्य मुझे समझ आ जाये। जो सोचते हैं कि मैं अपने सद्गुरु के चरणों की धूलि भले ही बन जाऊँ, पर उनकी कृपा से यह जान लूँ कि जिन्दगी का असल स्वाद क्या है, अर्थ क्या है? प्रयोजन क्या है? मैं क्यों हूँ और किसलिए हूँ? बस ऐसे ही सजल भाव श्रद्धा वाले शिष्यों के लिए शिष्य संजीवनी की यह सूत्र कथा है। इनमें से प्रत्येक सूत्रनवागत शिष्यों के लिए शिष्य परम्परा की महानतम विभूतियों की ओर से निर्देश वाक्य है। इसे सम्पूर्ण रूप से मानना ही शिष्यत्व साधना की गहनता में प्रवेश करना है।

क्रमशः जारी
- डॉ. प्रणव पण्डया
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मंगलवार, 16 फ़रवरी 2016

👉 शिष्य संजीवनी (भाग 3)


अनुभव के अक्षर

महान् शिष्यों के साधनामय जीवन का सार यह कथन बड़ा ही रहस्यमय एवं अतिशय प्रभावी है। इसमें पहली बात बड़ी स्पष्ट है कि कोरी भावुकता, बात- बात में आँसू बहाना गुरु भक्ति का परिचय नहीं है। शिष्यत्व की साधना के लिए पहली जरूरत समर्पित दृढ़ता की है। दृढ़ता से भरी अश्रुविहीन आँखें ही गुरुचेतना को निहार सकती हैं। जहाँ तक कानों की बात है- सो वे गुरु निन्दा और विषय चर्चा के लिए बहरे हों ताकि वे सद्गुरु की परावाणी सुन सकें। और यदि हम यह चाहते हैं कि हमारे स्वर सद्गुरु को स्पर्श करें- तो हमारी वाणी का किसी और को चोट पहुँचाने की प्रवृत्ति से मुक्त होना आवश्यक है। ऊपर कही गयी इन तीनों बातों का मेल बड़ा दुर्लभ है। क्योंकि जब समर्पित भक्ति जगती है, तो उसमें कहीं से, चुपके से कट्टरता, संकीर्णता आकर जहर घोल देती है। और हम अपने विरोधियों के लिए विद्रोही बन जाते हैं।

परन्तु शिष्यत्व की साधना करने के लिए यह पूर्णतया वर्जित है। उनका अन्तःकरण तो गुरु- प्रेम से इस कदर परिपूर्ण होना चाहिए कि उसमें तनिक से भी द्वेष और तनिक सी भी कड़वाहट की कोई गुंजाइश ही न रहे। हमारी भक्ति इतनी अधिक प्रगाढ़ हो कि शिष्यत्व की साधना के लिए बढ़ने वाला हमारा प्रत्येक कदम हमारे अपने हृदय के रक्त से यानि की प्रगाढ़ भावनाओं से धुला हुआ- परम पवित्र हो। यदि हम यह कर सकते हैं तो ही हम शिष्यत्व की साधना के अधिकारी हैं। और ये शिष्य संजीवनी के परम गोपनीय सूत्र हमारे लिए हैं। इन योग्यताओं के साथ ही हम इस राह पर आगे बढ़ सकते हैं। क्योंकि यह राह हठी, उन्मादियों एवं अहंकारियों के लिए नहीं है। साधना का परम रहस्य मार्ग केवल शिष्यों के लिए है। जिनमें समर्पित संकल्प और संकल्पित समर्पण कूट- कूटकर भरा है।

गुरु पूर्णिमा के परम दुर्लभ क्षणों में इस पुस्तक के प्रकाशन के अवसर पर प्रत्येक शिष्य टटोलें अपने आप को, करें स्वयं का आत्मावलोकन, करें सच्ची समीक्षा स्वयं अपने आपकी। क्या आप तैयार हैं शिष्य बनने के लिए? क्या आपके पास है वह साहस और हौसला जो शिष्यत्व की साधना की कठिन राह पर आपको चला सके? यदि हाँ- तो शिष्य संजीवनी हम सभी के साधना पथ पर अपना उजाला बिखेरने के लिए आप के हाथों में है। इसके सभी अक्षर अनुभव के अक्षर हैं। जिन्हें मैंने परम पूज्य गुरुदेव के प्रत्यक्ष एवं परोक्ष सान्निध्य में रहकर अर्जित किया है।

क्रमशः जारी
- डॉ. प्रणव पण्डया
गुरु पूर्णिमा, 7 जुलाई 2009
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सोमवार, 15 फ़रवरी 2016

👉 शिष्य संजीवनी (भाग 2)



अनुभव के अक्षर

इन प्रश्रों से मेरी अन्तर्भावनाओं को स्फुरणा मिली है कि शिष्यत्व की कठिन साधना के परम रहस्यमय एवं सदा से गोपनीय रखे गए कुछ विशेष सूत्रों को साधकों के सामने प्रकट किया जाय। जो इनकी साधना करेंगे उन पर देश- काल के सभी बन्धनों से परे सद्गुरु की परम चेतना अजस्र अनुदान बरसाती रहेगी। यह बात केवल वैचारिक उक्ति भर नहीं है। यह महासत्य है, जो युग- युग के, भारतभूमि एवं अन्यान्य देशों के समर्पित शिष्यों की शिष्यत्व साधना का सार है। ध्यान रहे कि ये सूत्र उन्हीं के हैं और जो व्याख्या है वह परम पूज्य गुरुदेव की अन्तःप्रेरणा से प्रकट हुई है। इस सब में यदि किसी का सच्चा स्वत्व है, तो वह गुरु- शिष्य की महान परम्परा का है। महान् गुरुओं की करूणा और समर्पित शिष्यों की साधना के निष्कर्ष हैं- ये सूत्र और उनकी क्रमिक व्याख्या। शिष्यों के लिए संजीवनी औषधि की भाँति होने के कारण- इस पुस्तक का नाम भी ‘शिष्य संजीवनी’ है।

यदि आप शिष्य हैं- अथवा होने की चाहत रखते हैं- तो यह शिष्य- संजीवनी औषधि आपके लिए है। प्रतिदिन इस पर मनन- चिन्तन करना, इन्हें क्रियान्वित करना आपका परम कर्त्तव्य है। ध्यान रहे यदि आपके अन्तःकरण में गुरु- प्रेम की दीवानगी हिलोरे मार रही है- तो यह साधना पथ आपके लिए है। यह साधना केवल उनके लिए है जिन्हें अपने प्यारे गुरुवर के बिना रहा नहीं जाता। जो अपने अस्तित्त्व को सद्गुरु की चेतना में समर्पित- विसर्जित और विलीन कर देना चाहते हैं। शिष्य संजीवनी की यह महाऔषधि उनके लिए है- जो श्रेष्ठ शिष्यों की अग्रिम कतार में खड़ा होना चाहते हैं। जो बार- बार अनेक बार, अनगिनत बार अपने गुरुवर द्वारा ली जाने वाली कठोरतम परीक्षा में खरे उतरना चाहते हैं। जिनकी एक मात्र चाहत है कि जिएँगे तो गुरुदेव के लिए और मरेंगे तो गुरुदेव के लिए। गुरुवर के लिए जीवन, गुरुवर के लिए मरण, जिनके जीवन का मकसद है। ऐसे शिष्यों के लिए जीवन औषधि है यह शिष्य संजीवनी।

ऐसे मरजीवड़े शिष्यों के लिए शिष्यत्व की कठिन साधना में उतरने के लिए कुछ विशेष बातें माननी जरूरी हैं। गुरु भक्त शिष्यों की महान् परम्परा उनसे कहती है- इससे पहले तुम्हारे नेत्र देख सकें, उन्हें आँसू बहाने की क्षमता से मुक्त हो जाना चाहिए। इसके पहले तुम्हारे कान सुन सकें, उन्हें बहरे हो जाना चाहिए। और इसके पहले तुम सद्गुरुओं की उपस्थिति में बोल सको, तुम्हारी वाणी को चोट पहुँचाने की वृत्ति से मुक्त हो जाना चाहिए। इसके पहले तुम्हारी आत्मा सद्गुरुओं के समक्ष खड़ी हो सके, उसके पाँवों को हृदय के रक्त से धो लेना चाहिए।

 क्रमशः जारी
- डॉ. प्रणव पण्डया
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👉 शिष्य संजीवनी (भाग 1)


अनुभव के अक्षर

प्रत्येक साधक की सर्वमान्य सोच यही रहती है कि यदि किसी तरह सद्गुरु कृपा हो जाय तो फिर जीवन में कुछ और करना शेष नहीं रह जाता है। यह सोच अपने  सारभूत अंशों में सही भी है। सद्गुरु कृपा है ही कुछ ऐसी- इसकी महिमा अनन्त-अपार और अपरिमित है। परन्तु इस कृपा के साथ एक विशिष्ट अनुबन्ध भी जुड़ा हुआ है। यह अनुबन्ध है शिष्यत्व की साधना का। जिसने शिष्यत्व की महाकठिन साधना की है, जो अपने गुरु की प्रत्येक कसौटी पर खरा उतरा है- वही उनकी कृपा का अधिकारी है। शिष्यत्व का चुम्बकत्व ही सद्गुरु के अनुदानों को अपनी ओर आकॢषत करता है। जिसका शिष्यत्व खरा नहीं है- उसके लिए सद्गुरु के वरदान भी नहीं हैं।

गुरुदेव का संग-सुपास-सान्निध्य मिल जाना, जिस किसी तरह से उनकी निकटता पा लेना, सच्चे शिष्य होने की पहचान नहीं है। हालांकि इसमें कोई सन्देह नहीं है कि ऐसा हो पाना पिछले जन्मों के किसी विशिष्ट पुण्य बल से ही होता है। परन्तु कई बार ऐसा भी होता है जो गुरु के पास रहे, जिन्हें उनकी अति निकटता मिली, वे भी अपने अस्तित्त्व को सद्गुरु की परम चेतना में विसॢजत नहीं कर पाते। और कई बार ऐसा हो भी जाता है। पास रहना या दूर रहना, सद्गुरु के देह रहने पर उनसे जुड़ना या उनके देहातीत होने पर उनके प्रेम में पड़ना कोई विशेष अर्थ नहीं रखते हैं। अर्थवत्ता केवल शिष्यत्व की है। यह जहाँ है, जिधर भी है, जिस काल में है, वहीं गुरुवर के अनुदान-वरदान बरसते चले जाएँगे।
 शिष्यत्व की साधना कहाँ से और कैसे प्रारम्भ करें? यह सवाल प्रत्येक गुरु अनुरागी के मन में रह-रहकर स्पन्दित होता है। प्रत्येक शिष्य की चाहत होती है कि हम सच्चे शिष्य कैसे बनें? शिष्यत्व की कठिन साधना करके गुरु प्रेम के सर्वोत्तम अधिकारी कैसे बनें?

क्रमशः जारी
- डॉ. प्रणव पण्डया
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मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016

 चिंतन का महत्त्व और स्वरूप (भाग 1)

 चिंतन उसे कहते हैं जिसमें कि भूतकाल के लिये विचार किया जाता है। भूतकाल हमारा किस तरीके से व्यतीत हुआ, इसके बारे में समीक्षा करिये। अपनी समीक्षा नहीं कर पाते आप। दूसरों की समीक्षा करना जानते हैं। पड़ोसी की समीक्षा कर सकते हैं, बीबी के दोष निकाल सकते हैं, बच्चों की नुक्ताचीनी कर सकते हैं, सारी दुनिया की गलती बता सकते हैं, भगवान् की गलती बता देंगे और हरेक की गलती बता देंगे। कोई भी ऐसा बचा हुआ नहीं है, जिसकी आप गलती बताते न हों। लेकिन अपनी गलती; अपनी गलती का आप विचार ही नहीं करते। अपनी गलतियों का हम विचार करना शुरू करें और अपनी चाल की समीक्षा लेना शुरू करें और अपने आपका हम पर्यवेक्षण शुरू करें तो ढेरों की ढेरों चीजें ऐसी हमको मालूम पड़ेंगी, जो हमको नहीं करनी चाहिए थी और ढेरों की ढेरों ऐसी चीजें मालूम पड़ेगी आपको, जो इस समय हमने जिन कामों को, जिन बातों को अपनाया हुआ है, उनको नहीं अपनाना चाहिए था।

मन की बनावट कुछ ऐसी विलक्षण है, अपना सो अच्छा, अपना सो अच्छा, बस। यही बात बनी रहती है। अपना स्वभाव भी अच्छा, अपनी आदतें भी अच्छी, अपना विचार भी अच्छा, अपना चिंतन भी अच्छा, सब अपना अच्छा, बाहर वालों का गलत। आध्यात्मिक उन्नति में इसके बराबर अड़चन डालने वाला और दूसरा कोई व्यवधान है ही नहीं। इसीलिये आप पहला काम वहाँ से शुरू कीजिए कि आत्म समीक्षा।

एकान्त में चिंतन के लिये जब आप बैठें तो आप यह समझें कि हम अकेले हैं और कोई हमारा साथी या सहकारी है नहीं। साथी अपने स्थान पर, सहकारी अपने स्थान पर, कुटुम्बी अपने स्थान पर, पैसा अपने स्थान पर, व्यापार अपने स्थान पर, खेती- बाड़ी अपने स्थान पर; इन सबको अपने- अपने स्थानों पर रहने दीजिए। आप तो सिर्फ ये विचार किया कीजिए, हम पिछले दिनों क्या भूल करते रहे? रास्ता भटक तो नहीं गये, भूल तो नहीं गये, इसीलिये जन्म मिला था क्या? जिस काम के लिये जन्म मिला था, वही किया क्या? पेट के लिये जितनी जरूरत थी, उससे ज्यादा कमाते रहे, क्या? कुटुम्ब की जितनी जिम्मेदारियाँ पूरी करनी चाहिए थी, उसको पूरा करने  के स्थान पर अनावश्यक संख्या में लोड बढ़ाते रहे क्या? और जिन लोगों को जिस चीज की जरूरत नहीं थी, उनको प्रसन्न करने के लिये उपहार रूप में लादते रहे क्या? क्यों? वजह क्या है? ये सब गलतियाँ हैं।

क्रमशः जारी
(युगऋषि, वेदमूर्ति, तपोनिष्ठ पं. श्री आचार्य श्रीराम शर्मा द्वारा दिए गये उद्बोधन का लिपिबद्ध स्वरूप)
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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 April 2026

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