मंगलवार, 8 जून 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग २९)

भक्त के लिए अनिवार्य हैं मर्यादाएँ और संयम

नमस्ते रुद्रमन्यवऽउतोतऽइषवे नमः॥
बाहुभ्यामुतते नमः॥ १॥
यातेरुद्रशिवातनूरघोराऽपापकाशिनी॥
तयानस्तन्वाशन्तमयागिरिशन्ताभिचाकशीहि॥ २॥

दुःख दूर करने वाले हे रूद्र! आपके क्रोध के लिए नमस्कार है, आपके बाणों के लिए नमस्कार है और आपकी दोनों भुजाओं के लिए नमस्कार है॥१॥ गिरिवर कैलाश पर रहकर संसार का कल्याण करने वाले हे रुद्र! आपका जो मंगलदायक, सौम्य, केवल पुण्यप्रकाशक शरीर है, उस अनन्त सुखप्रकाशक शरीर से हमारी ओर देखिए- हमारी रक्षा कीजिए॥२॥ इस वेदवाणी के मधुर मेघमन्द्र स्वरों से ऋषियों एवं देवों ने अपना शिवार्चन सम्पूर्ण करते हुए शिवरात्रि व्रत का पारायण किया।
    
सभी के मन में शिवभक्ति का मधुर गान गूंज रहा था। महर्षि पुलस्त्य ने इन भक्तिमय क्षणों में भक्ति की चर्चा छेड़ दी। वे बोले- ‘‘भक्ति का अर्थ सभी कालों में सार्थक है क्योंकि भावशुद्धि के बिना न तो विचार शुद्ध हो सकते हैं और न जीवन। भविष्य में जब भी मनुष्य की भावनाएँ भटकेंगी, बहकेंगी, उसका सारा जीवन भटकाव एवं बहकाव की डगर पर चल देगा।’’ महर्षि मरीचि उन्हीं के स्वरों में अपने स्वर को घोलते हुए बोले- ‘‘आप यथार्थ कह रहे हैं ऋषिश्रेष्ठ! भावनाओं को भी मर्यादा और संयम के तटबन्ध चाहिए। इनके अभाव में भावनाओं के पतन की आशंका बनी रहती है और यदि भावनाएँ पतित हुईं तो भला जीवन को पतन की डगर पर बढ़ने से कौन रोकेगा।’’ सभी ऋषिगण, सभी देव समुदाय इन दोनों महर्षियों की यह तत्त्वकथा सुन रहा था।
    
तभी नवसृष्टि का सन्देश देने वाले ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की दृष्टि देवर्षि की ओर गयी। वह भावों की गहरी समाधि में लीन थे। महर्षि की दृष्टि ने उन्हें प्रबोध दिया। वह किंचित सचेत हुए और मुस्कराते हुए कहने लगे- ‘‘हे ऋषिगण! मैं अब अपना अगला सूत्र सुनाता हूँ’’-
‘अन्यथा पातित्याशङ्क्या’॥१३॥
अन्यथा पतन की शंका बनी रहती है।
    
इस सूत्र का सत्य एवं मर्म यही है कि शास्त्र मर्यादाएँ एवं संयम के तटबन्ध में भावनाएँ सुरक्षित रहें अन्यथा पतन की आशंका बनी रहती है।

यह बात अनूठी थी परन्तु थोड़ी सी विचित्र एवं विलक्षण भी थी। पहली दृष्टि में कुछ ऐसा लगता था कि भक्ति की अलौकिकता पर मर्यादाओं के लौकिक बांध बांधे जा रहे हैं परन्तु चिन्तन की प्रगाढ़ता एवं गहनता में प्रवेश हो तो सच यही दिखाई देता है कि किसी को परमहंसत्व का स्वांग रचाने की जरूरत नहीं है। जब तक देह का बोध है तब तक मर्यादाएँ माननी ही चाहिए। हाँ! देहबोध ही न रह जाय, मन के द्वन्द्व ही न रहें, अस्तित्त्व ही भगवत्ता में विसर्जित हो जाए, तब की कथा अलग है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ५८

सोमवार, 7 जून 2021

👉 रिश्तों की अहमयित

"मैंने कोरोना को नहीं हराया"   

मैं एक प्रायवेट कम्पनी में बाबू हूँ। हमेशा की तरह मैं कम्पनी में काम कर रहा था।
मुझे हल्का बुखार आया,शाम तक सर्दी भी हो गई। पास ही के मेडिकल स्टोर से दवाइयां बुला कर खाई।
3-4 दिन थोड़ा ठीक रहा,एक दिन अचानक साँस लेने में दिक्कत हुई। ऑक्सीजन लेवल कम होने लगा। मेरी पत्नी तत्काल रिक्शा में लेकर मुझे अस्पताल पहुंची। सरकारी अस्पताल में पलंग फुल चल रहे थे, मैं देख रहा था मेरी पत्नी मेरे इलाज के लिये डॉक्टर के सामने गिड़गिड़ा रही थी। अपने परिवार को असहाय-सा बस देख ही पा रहा था। मेरी तकलीफ बढ़ती जा रही थी।

मेरी पत्नी मुझे हौंसला दिला रही थी, कह रही थी, कुछ नहीं होगा हिम्मत रखो। (यह वही औरत थी जिसे मैं हमेशा कहता था कि तुम बेवकूफ औरत हो, तुम्हें क्या पता दुनिया में क्या चल रहा है?)

उसने एक प्रायवेट अस्पताल में लड़ झगड़ कर मुझे भर्ती करवाया, फिर अपने भाई याने मेरे साले को फोन लगाकर सारी बातें बताई। उसकी उम्र होगी 20 साल करीबन (जो मेरी नजर में आवारा और निठल्ला था जिसे मेरे घर आने की परमीशन नहीं थी।)

वह अक्सर मेरी गैर हाजरी में ही मेरे घर आता-जाता था। अपने देवर को याने मेरे छोटे भाई को फोन लगा कर उसने बुलाया, जो मेरे साले की उम्र का ही था (जो बेरोजगार था और मैं उसे कहता था - "काम का ना काज का दुश्मन अनाज का")

दोनों घबराते  हुए अस्पताल पहुंचे। दोनों की आंखो में आंसू थे। दोनों कह रहे थे कि -
आप घबराना मत आपको हम कुछ नहीं होने देंगे। डॉक्टर साहब कह रहे थे कि हम 3-4 घन्टे ही ऑक्सीजन दे पायेंगे फिर आपको ही सिलेंडर की व्यवस्था करनी होगी।

मेरी पत्नी बोली- डॉक्टर साहब ये सब हम कहां से लायेंगे? तभी मेरा भाई और साला बोले- हम लायेंगे सिलेंडर आप इलाज शुरु कीजिए। दोनों वहां से रवाना हो गये। मुझ पर बेहोशी छाने लगी और जब होश आया तो मेरे पास ऑक्सीजन सिलेंडर रखा था। मैंने पत्नी से पूछा- ये कहां से आया? उसने कहा- तुम्हारा भाई और मेरा भाई दोनों लेकर आये हैं। मैंने पूछा- कहां से लाये?

उसने कहा- ये तो वो ही जाने?

अचानक मेरा ध्यान पत्नी की खाली कलाइयों पर गया। मैंने कहा - तुम्हारे कंगन कहां गये? (कितने साल से लड़ रही थी कंगन दिलवाओ कंगन दिलवाओ।अभी पिछ्ले महिने शादी की सालगिरह पर दिलवाये थे बोनस मिला था उससे।) वह बोली - आप चुपचाप सो जाइये कंगन यहीं हैं कहीं नहीं गये । मुझे उसने दवाइयां दी, मैं आराम करने लगा। नींद आ गई जैसे ही नींद खुली क्या देखता हूं- *मेरी पत्नी कई किलो वजनी सिलेंडर को उठा कर ले जा रही थी ।
(जो थोड़ा - सा भी वजनी सामान उठाना होता था मुझे आवाज देती थी।)

आज कैसे कई किलो वजनी सिलेंडर तीसरी मंजिल से नीचे ले जा रही थी और नीचे से भरा हुआ सिलेंडर ऊपर ला रही थी। मुझे गुस्सा आया मेरे साले और मेरे भाई पर , ये दोनों कहाँ मर गये? फिर सोचा आयेंगे तब फटकारुंगा। फिर पड़ोस के बैड पर भी एक सज्जन भर्ती थे उनसे बातें करने लगा - मैंने कहा कि अच्छा अस्पताल है नीचे सिलेंडर आसानी से मिल रहे हैं।

उन्होंने कहा - क्या खाक अच्छा अस्पताल है यहां से 40 किलोमीटर दूर बड़े शहर में 7-8 घन्टे लाइन में लगने के बाद बड़ी  मुश्किल से एक सिलेंडर मिल पा रहा है।आज ही अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी से 17 मौतें हुई हैं ।

मैं सुनकर घबरा गया, सोचने लगा कि शायद मेरा साला और भाई भी ऐसे ही सिलेंडर ला रहे होंगे। पहली बार दोनों के प्रति सम्मान का भाव जागा था। कुछ सोचता इससे पहले पत्नी बड़ा-सा खाने का टिफ़िन लेकर आती दिखी। पास आकर बोली - उठो खाना खा लो। उसने मुझे खाना दिया ।एक कौर खाते ही मैंने कहा - ये तो माँ ने बनाया है। उसने कहा - हां माँ ने ही बनाया है।

माँ कब आई गाँव से? उसने कहा - कल रात को ।अरे! वो कैसे आ गई अकेले तो वो कभी नहीं आई शहर ।

पत्नी बोली बस से उतर कर ऑटो वाले को घर का पता जो एक पर्चे मे लिखा था वह दिखा कर घर पहुंच गई ।

(मेरी माँ ने शायद बाबूजी के स्वर्गवास के बाद पहली बार ही अकेले सफर किया होगा । गाँव की जमीन मां बेचने नहीं दे रही थी तो मेरी माँ से मनमुटाव चल रहा था । कहती थी मेरे मरने के बाद जैसा लगे वैसा करना, जीतेजी तो नहीं बेचने दूंगी ।) पत्नी बोली -मुझे भी अभी मेरी मां ने बताया कि आपकी माँ रात को आ गई थी । वो ही अपने घर से खाना लेकर आई है । मैंने कहा- पर तुम्हारी मां को तो पैरों में तकलीफ है, उनसे चलते नहीं बनता है । (मेरे ससुर के स्वर्गवास के बाद बहुत कम ही घर से निकलती है।)

पत्नी बोली आप आराम से खाना खाइये।
 मैं खाना खाने लगा  कुछ देर बाद मेरे फटीचर दोस्त का फोन आया । बोला हमारे लायक कोई काम हो तो बताना (मैंने मन में सोचा जो मुझसे उधार ले रखे हैं 3000 वही वापस नहीं किया, काम क्या बताऊं तुझे ? फिर भी मैंने मन में कहा - ठीक है जरुरत होगी तो बता दूंगा।)
 मैंने मुंह बना कर फोन काट दिया 16 दिनों तक मेरी पत्नी सिलेंडर ढोती रही मेरा भाई और साला लाईन में लगकर सिलेंडर लाते रहे।

फिर हालत में सुधार हुआ और 18 वें दिन अस्पताल से छुट्टी हुई । मुझे खुद पर गर्व था कि मैंने कोरोना को हरा दिया। मैं फूला नहीं समा रहा था।

घर पहुंच कर असली कहानी पता चली कि, मेरे इलाज में बहुत सारा रुपया लगा है। कितना ये तो नहीं पता पर मेरी पत्नी के सारे जेवर जो उसने मुझसे लड़-लड़ कर बनवाये थे,बिक चुके थे।मेरे साले के गले की चेन बिक चुकी थी,जो मेरी पत्नी ने मुझसे साले की जनेऊ में 15 दिन रूठ कर जबरजस्ती दिलवाई थी।मेरा भाई जिस बाइक को अपनी जान से ज्यादा रखता था वो भी घर मे दिखाई नहीं दे रही थी। मेरी माँ जिस जमीन को जीतेजी नहीं बेचना चाहती थी मेरे स्वर्गीय बाबूजी की आखरी निशानी थी , वो भी मेरे इलाज मे बिक चुकी थी।
                                       
मेरी पत्नी से लड़ाई होने पर मैं गुस्से में कहता था कि जाओ अपनी माँ के घर चली जाओ वो मेरे ससुराल का घर भी गिरवी रखा जा चुका था।मेरे निठल्ले दोस्त ने जो मुझसे 3000 रुपये लिए थे, ब्याज सहित वापस कर दिये थे।  जिन्हें मैं किसी काम का नहीं समझता था,वे मेरे जीवन को बचाने के लिये पूरे बिक चुके थे। मैं अकेला रोये जा रहा था बाकि सब लोग खुश थे क्योंकि मुझे लग रहा था सब कुछ चला गया ,और उन्हें लग रहा कि मुझे बचा कर उन्होंने सब कुछ बचा लिया।

अब मुझे कोई भ्रम नहीं था कि मैंने कोरोना को हराया है क्योंकि कोरोना को तो मेरे अपनों ने, परिवार ने हराया था।

सब कुछ बिकने के बाद भी मुझे लग रहा था कि आज दुनिया में मुझसे अमीर कोई नहीं है।

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग २८)

सुख का केन्द्र और स्रोत आत्मा

मनुष्य की अपनी आत्मा ही सब कुछ है। आत्मा से रहित वह एक मिट्टी का पिण्ड मात्र ही है। शरीर से जब आत्मा का सम्बन्ध समाप्त हो जाता है तो वह मुर्दा हो जाता है। शीघ्र ही उसे बाहर करने और जलाने दफनाने का प्रबन्ध किया जाता है। संसार के सारे सम्बन्ध आत्मा द्वारा ही सम्बन्धित हैं। जब तक जिसमें आत्मभाव बना रहता है, उसमें प्रेम और सुख आदि की अनुभूति बनी रहती है और जब यह आत्मीयता समाप्त हो जाती है वही वस्तु या व्यक्ति अपने लिये कुछ भी नहीं रह जाता। किसी को अपना मित्र बड़ा प्रिय लगता है। उससे मिलने पर हार्दिक आनन्द की उपलब्धि होती है। न मिलने से बेचैनी होती है। किन्तु जब किन्हीं कारणोंवश उससे मैत्री भाव समाप्त हो जाता है अथवा आत्मीयता नहीं रहती तो वह मित्र अपने लिए, एक सामान्य व्यक्ति बन जाता है। उसके मिलने न मिलने में किसी प्रकार का हर्ष विषाद नहीं होता। बहुत बार तो उससे इतनी विमुखता हो जाती है कि मिलने अथवा दिखने पर अन्यथा अनुभव होता है। प्रेम, सुख और आनन्द की सारी अनुभूतियां आत्मा से ही सम्बन्धित होती हैं, किसी वस्तु, विषय, व्यक्ति अथवा पदार्थ से नहीं। सुख का संसार आत्मा में ही बसा हुआ है। उसे उसमें खोजना चाहिये। सांसारिक विषयों अथवा वस्तुओं में भटकते रहने से वही दशा और परिणाम सामने आयेगा, जो मरीचिका में भूल मृग के सामने आता है।

मनुष्य की अपनी विशेषता ही उसके लिये उपयोगिता तथा स्नेह सौजन्य उपार्जित करती है। विशेषता समाप्त होते ही मनुष्य का मूल्य भी समाप्त हो जाता है और तब वह न तो किसी के लिये आकर्षक रह जाता है और न प्रिय! इस बात को समझने के लिए सबसे अधिक निकट रहने वाले मां और बच्चे को ले लीजिये। माता से जब तक बच्चा दूध और जीवन रस पाता रहता है, उसके शरीर से अवयव की तरह चिपटा रहता है। उसे मां से असीम प्रेम होता है। जरा देर को भी वह मां से अलग नहीं हो सकता। मां उसे छोड़कर कहीं गई नहीं कि वह रोने लगता है। किन्तु जब इसी बालक को अपनी सुरक्षा तथा जीवन के लिये मां की गोद और दूध की आवश्यकता नहीं रहती अथवा रोग आदि के कारण मां की यह विशेषता समाप्त हो जाती है तो बच्चा उसकी जरा भी परवाह नहीं करता। वह अलग भी रहने लगता है और स्तन के स्थान पर शीशी से ही बहल जाता है। मनुष्य की विशेषतायें ही किसी के लिए स्नेह, सौजन्य अथवा प्रेम आदि की सुखदायक स्थितियां उत्पन्न करती हैं।

किन्तु मनुष्य की इस विशेषता का स्रोत क्या है। इसका स्रोत भी आत्मा के सिवाय और कुछ नहीं है। बताया जा चुका है कि आत्मा से असम्बन्धित मनुष्य शव से अधिक कुछ नहीं होता। जो शव है, मुर्दा है अथवा अचेतन या जड़ है, उनमें किसी प्रकार की प्रेमोत्पादक विशेषता के होने का प्रश्न ही नहीं उठता। मनुष्य के मन प्राण और शरीर तीनों का संचालन, नियन्त्रण तथा पोषण आत्मा की सूक्ष्म सत्ता द्वारा ही होता है। आत्मा और इन तीनों के बीच जरा-सा व्यवधान आते ही सारी व्यवस्था बिगड़ जाती है। सुन्दर, सुगठित और स्वस्थ शरीर की दुर्दशा हो जाती है। प्राणों का स्पन्दन तिरोहित होने लगता है और मन मतवाला होकर मनुष्य को उन्मत्त और पागल बना देता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ४४
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग २८)

शिवभक्त, परम बलिदानी दधीचि
    
तप-साधना, लौकिक-अलौकिक विद्याओं का अन्वेषण-अनुसंधान, अपने अंतेवासियों में इनका अध्ययन-अध्यापन यही इनका प्रमुख कार्य था। इसके अलावा वह गौतमी तट पर आश्रम बनाकर कुछ विशेष साधनाएँ सम्पन्न कर रहे थे। उस समय उनके पास कुछ विशेष अनुसंधानप्रिय छात्र ही थे। देवर्षि नारद अपनी स्मृतियों को ताजा करते हुए बोले-उस समय मैं गया था उन देवमानव के पास। अपनी अतिविशिष्ट साधना में लीन रहने के बावजूद वह मुझसे मिले। ओह! जितना सुरम्य-सुरभित उनकी आभा थी, उससे कहीं अधिक दिव्य वे स्वयं थे। देवमानव एवं अतिमानव होने के सभी लक्षण उनमें साकार थे।
    
तत्त्वचर्चा एवं भक्तिचर्चा करते हुए मैंने उनसे सहज पूछ लिया-हे महर्षि! आपकी साधना का साध्य क्या है? उत्तर में वह मुस्कराते हुए बोले-हे देवर्षि! मेरी साधना भी शिवभक्ति है और मेरा साध्य भी वही है। जब मैं समाधि में होता हूँ तो प्रतिपल-प्रतिक्षण मेरी भावचेतना का सरित प्रवाह उन भगवान भोलेनाथ की चेतना के महासागर में विलीन होता रहता है। उन कृपासिन्धु में मेरे अस्तित्व का बिन्दु विलीन-विलय होता रहता है और जब मैं जाग्रत होता हूँ तो समस्त प्राणियों में उन्हीं की अनुभूति करते हुए उनकी सेवा करता रहता हूँ। देवर्षि मेरा समस्त तप एवं सभी विद्याएँ लोकसेवा के लिए है। मेरे सभी कर्मों का सार मेरे आराध्य की सेवा है।
    
अपनी बातें कहते हुए उनका अस्तित्व भक्ति से भीग गया। वह बड़े विगलित स्वर में बोले- देवर्षि! मैंने अपने सम्पूर्ण जीवन में न तो धन कमाया है और न साधन जुटाये हैं। बस केवल तप किया एवं शिवभक्ति की है। यही मेरी लोकसेवा का माध्यम है। आपके जीवन की अंतिम चाहत क्या है ऋषिश्रेष्ठ?- मेरा यह प्रश्न सुनकर वह चिंतित हो उठे। उन्हें अपने अस्तित्व में कहीं कोई चाहत ढूँढे न मिली। उनका अस्तित्व तो शुभ्र-निरभ्र आकाश की भाँति हो गया था, जिसमें तप का पूर्ण चन्द्र प्रकाशित था। जिसमें अनगिन विद्याओं के तारकगण टके थे। चाहत और इच्छा की धुँध तो वहाँ थी ही नहीं।
    
फिर भी उन्होंने स्वयं को कुरेदा और बोल उठे-देवर्षि मैं चाहता हूँ कि मेरी चेतना ही नहीं मेरा शरीर भी लोकसेवा में लग जाये। उस दिन जैसे नियति स्वयं उनके मुख से बोल रही थी। उनके स्वयं के हृदय मंदिर में नित्य विद्यमान भगवान सदाशिव जैसे उन क्षणों में एवमस्तु कह रहे थे। कुछ वर्षों में ही उन महान् ऋषि का कथन साकार हो उठा। वृत्रासुर के आतंक से पीड़ित देवराज ने जब देवगणों के साथ जाकर उनसे उनकी अस्थियाँ माँगीं तो वे बोले- देवराज मैं धन्य हुआ। मेरी अस्थियाँ देवत्व के संवर्धन में लगेंगी। इनसे असुरता का विनाश होगा, इससे अधिक मेरे लिए और कोई सुयोग-सौभाग्य नहीं।
    
उन्होंने हँसते-हँसते अपने जीवन काल में अपनी अस्थियों का दान दे डाला। लोकसेवा के लिए इतना महान् बलिदान देने वाला धरती पर न कभी हुआ था और न होगा। बड़ी आसानी से उन्होंने योगबल से स्वयं की देह का त्याग कर दिया। उनकी अस्थियों से वज्र बना और असुरता का संहार हुआ। उनकी भावचेतना भगवान सदाशिव में विलीन हो गयी।’’ देवर्षि के मुख से यह भक्तिकथा सुनकर सभी ने हाथ जोड़कर भक्तश्रेष्ठ दधीचि एवं भगवान भोलेनाथ को प्रणाम किया और शिवरात्रि के अर्चन की तैयारियों में लग गये।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ५५

शनिवार, 5 जून 2021

👉 पर्यावरण बचाओ सब मिल


कलरव करते नभ में पक्षी, जीवन गान सुनाते हैं।
पर्यावरण बचाओ सब मिल, यह संकल्प जगाते हैं।।

हरी भरी है धरती प्यारी, मनमोहक उपवन उद्यान।
ताल तलैया सुन्दर झरने, नदियाँ बहती हैं अविराम।।
हरे भरे हैं खेत हमारे,गिरी कानन मन को भाते हैं।
पर्यावरण बचाओ सब मिल, यह संकल्प जगाते हैं।।

बच्चों का झूला है बरगद,डाली उसकी  मत काटो।
मधुर फलों से लदे वृक्ष जो, डाली उनकी मत छांटो।।
लगे हुए आंगन में तरु भी, पुरखों की कथा सुनाते हैं।
पर्यावरण बचाओ सब मिल, यह संकल्प जगाते हैं।।

नदियों में अपशिष्ट बहाकर, क्या विकसित बन पाएंगे।
मछली जल की रानी है, केवल गीतों में गाएंगे।।
तरणताल के दृश्य मनोहर, चित्रों में ही दिख पाते हैं।
पर्यावरण बचाओ सब मिल, यह संकल्प जगाते हैं।।

अल्हड मस्त हवाओं के, झोंकों से मस्ती आती है।
पशु पक्षी नर्तक बन जाते, जब घटा सुहानी छाती है।।
हवा शुद्ध करते हैं  वनतरु, मानव की उम्र बढ़ाते हैं।
पर्यावरण बचाओ सब मिल, यह संकल्प जगाते हैं।।

बासंती बयार बहनें दें, हरी भरी सुन्दर वसुधा हो।
मलयज की मंद समीर बहे, प्राणवायु संपन्न धरा हो।।
आभूषण हैं वृक्ष धरा के, धरती को यही सुहाते हैं।
पर्यावरण बचाओ सब मिल, यह संकल्प जगाते हैं।।

प्रदुषण रोकें,वृक्ष लगाएं, वन उपवन ना कटने देंगे।
हम धरती माँ की छाती से, न वन का आँचल हटने देंगे।।
नैसर्गिक जीवन अपनाकर, स्वास्थ्य सुलभ हम पाते है।
पर्यावरण बचाओ सब मिल, यह संकल्प जगाते हैं ।।

                                                              उमेश यादव

शुक्रवार, 4 जून 2021

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग २७)

सुख का केन्द्र और स्रोत आत्मा

पदार्थों का उपभोग इन्द्रियों द्वारा होता है। इन्द्रियों के सक्रिय और सजीव होने से ही किसी रस, सुख अथवा आनन्द की अनुभूति होती है। जब तक मनुष्य सक्षम अथवा युवा बना रहता है, उसकी इन्द्रियां सतेज बनी रहती हैं। पदार्थ और विषयों का आनन्द मिलता रहता है। पर जब मनुष्य वृद्ध अथवा अशक्त हो जाता है—उन्हीं पदार्थों में जिनमें पहले विभोर कर देने वाला आनन्द मिलता था, एकदम नीरस और स्वादहीन लगने लगते हैं। उनका सारा सुख न जाने कहां विलीन हो जाता है। वास्तविक बात यह है कि अशक्तता की दशा अथवा वृद्धावस्था में इन्द्रियां निर्बल तथा अनुभवशीलता से शून्य हो जाती हैं। उनमें किसी पदार्थ का रस लेने की शक्ति नहीं रहती। इन्द्रियों का शैथिल्य ही पदार्थों को नीरस, असुखद तथा निस्सार बना देता है।

वृद्धावस्था ही क्यों? बहुत बार यौवनावस्था में भी सुख की अनुभूतियां समाप्त हो जाती हैं। इन्द्रियों में कोई रोग लग जाने अथवा उनको चेतना हीन बना देने वाली कोई घटना घटित हो जाने पर भी उनकी रसानुभूति की शक्ति नष्ट हो जाती है। जैसे रसेन्द्रिय जिह्वा में छाले पड़ जायें तो मनुष्य कितने ही सुस्वाद पदार्थों का सेवन क्यों न करे, उसे उसमें किसी प्रकार का आनन्द न मिलेगा। पाचन क्रिया निर्बल हो जाय तो कोई भी पौष्टिक पदार्थ बेकार हो जायेगा। आंखें विकार युक्त हो जायें तो सुन्दर से सुन्दर दृश्य भी कोई आनन्द नहीं दें पाते। इस प्रकार देख सकते हैं कि सुख पदार्थ में नहीं बल्कि इन्द्रियों की अनुभूति शक्ति में है।

अब देखना यह है कि इन्द्रियों की शक्ति क्या है? बहुत बार ऐसे लोग देखने को मिलते हैं, जिनकी आंखें देखने में सुन्दर स्वच्छ तथा विकार-हीन होती हैं, लेकिन उन्हें दिखलाई नहीं पड़ता। परीक्षा करने पर पता चलता है कि आंखों का यन्त्र भी ठीक है। उनमें आने-जाने वाली नस-नाड़ियों की व्यवस्था भी ठीक है। तथापि दिखलाई नहीं देता। इसी प्रकार अन्य इन्द्रियां हाथ-पांव, नाक-कान आदि की भी दशा हो जाती है। सब तरफ से सब वस्तुयें ठीक होने पर भी इन्द्रिय निष्क्रिय अथवा निरनुभूति ही रहती है। इसका अर्थ यह हुआ कि रस की अनुभूति इन्द्रियों की स्थूल बनावट से नहीं होती। बल्कि इससे भिन्न कोई दूसरी वस्तु है, जो रस की अनुभूति कराती है। वह वस्तु क्या है? वह वस्तु है चेतना, जो सारे शरीर और मन प्राण में ओत-प्रोत रहकर मनुष्य की इन्द्रियों को रसानुभूति की शक्ति प्रदान करती है। इसी सब ओर से शरीर में ओत-प्रोत चेतना को आत्मा कहते हैं। आनन्द अथवा सुख का निवास आत्मा में ही है। उसी की शक्ति से उसकी अनुभूति होती है और वही जीव रूप में उसका अनुभव भी करती है। सुख न पदार्थों में है और न किसी अन्य वस्तु में। वह आत्मा में ही जीवात्मा द्वारा अनुभव किया जाता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ४३
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग २७)

शिवभक्त, परम बलिदानी दधीचि
    
भक्त शमीक की भक्ति की अनुभूति ने सभी के भावों को छू लिया। इस अनूठी छुअन से पुलकित ब्रह्मर्षि विश्वामित्र कहने लगे- ‘‘अस्तित्व में सत्त्व की संशुद्धि हो तो भक्ति प्रगाढ़ होती है और यदि भक्ति प्रगाढ़ हो तो अपने आप ही कर्म प्रखर एवं निष्काम होते हैं। सच्चा भक्त कर्मों से नहीं, बल्कि कामना से मुँह मोड़ता है। उसकी जीवनधारा शास्त्र मर्यादाओं के तटबन्धों को कभी भी नहीं तोड़ती। उसके कर्मों का संगीत अपने आप ही मर्यादाओं की ताल के साथ संयुग्मित रहता है।’’ ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की इस ओजस्वी वाणी को सभी ने सहज आत्मसात् किया। हिमवान के उस दिव्य आँगन में सहज ही नवचेतना के स्पन्दन सघन हो उठे। पास में बहते झरने के स्वर हिमालय के शिखरों में रहने वाले हिम पक्षियों के कलरव के साथ युगलगान करने लगे।
    
बड़े अद्भुत क्षण थे यह। तभी ऋषि मार्कण्डेय ने वहाँ विद्यमान ऋषियों एवं देवों से कहा- ‘‘आज शिवरात्रि है, भगवान सदाशिव की अर्चना का महोत्सव है आज।’’ ऋषि मार्कण्डेय के इस कथन से ऋषियों के अंतःकरण में भक्ति की हिलोर उमड़ उठी। देवगण देवाधिदेव के मानसिक स्मरण में विभोर हो उठे। ऋषि पुलस्त्य भक्तिविह्वल होकर कहने लगे- ‘‘जीवन वही धन्य है जो शिवभक्ति में लीन रहे। जिसका प्रत्येक कर्म उपासना बना रहे।’’ पुलस्त्य ऋषि के कथन पर ऋषि मार्कण्डेय बोल उठे- ‘‘शिवभक्त महर्षि दधीचि ऐसे ही महान् भक्त थे। उनका समूचा जीवन भक्ति की अद्भुत गाथा बना रहा।’’
    
देवर्षि नारद ऋषियों की इस भक्तिचर्चा को सुन रहे थे। ऐसा लग रहा था कि जैसे वे इस भक्तिगान को अपने किसी नये सूत्र में पिरो रहे हों। था भी यही। उन्होंने अपनी मधुर वाणी में भक्ति का नया सूत्र उच्चारित किया-
‘भवतु निश्चयदार्ढ्यादूर्ध्वं शास्त्ररक्षणम्’॥ १२॥
भक्त को निश्चयपूर्वक-दृढ़तापूर्वक शास्त्र मर्यादाओं की रक्षा करनी चाहिए।
    
इस सूत्र की व्याख्या करते हुए देवर्षि बोले- ‘‘जो मुक्त है, उसका सबसे बड़ा दायित्व है कि अपने जीवन से वह शास्त्रों को प्रमाणित करे। भक्त के जीवन का सच यही है कि वह शास्त्रों को खण्डित नहीं करता, बल्कि उन्हें पूर्णता देता है।’’
    
ऐसा कहते हुए देवर्षि नारद कुछ पलों के लिए रुके। उनकी स्मृतियों के कोष में कुछ प्राचीन बिम्ब उभरने लगे। उनकी चेतना किसी प्राचीन किन्तु भव्य गीत को गाने के लिए आकुल हो उठी। इस आकुलता में ऐसा न जाने क्या हुआ कि सदा विंहसने वाले देवर्षि के आँसू छलक उठे। इस दृश्य ने सभी को चकित और विह्वल कर दिया। ऋषि पुलस्त्य ने उनसे पूछा भी- ‘‘ऐसा क्या याद आ गया देवर्षि, जिसने आपको भावाकुल कर दिया?’’ इस प्रश्न के उत्तर में थोड़े पलों के लिए मौन रहकर देवर्षि बोले- ‘‘हे ऋषिश्रेष्ठ! असुरता के नाश के लिए अपने जीवन का सहज दान करने वाले महर्षि दधीचि के जीवन प्रसंगों ने मुझे भावाकुल कर दिया।’’

‘‘देवर्षि! महर्षि दधीचि की भक्ति कथा आप ही सुनायें, क्योंकि आप उनके जीवन के कई सत्यों के सहज साक्षी हैं’’- ऋषियों के इस समवेत कथन से देवर्षि की चेतना में एक आध्यात्मिक आलोड़न हुआ। वह कहने लगे कि ‘‘मैंने ऋषि दधीचि को दारुण तप करते हुए देखा है। उनकी जीवन साधना तो उनके यौवन काल में ही शिखर पर पहुँच गयी थी। आध्यात्मिक तत्त्वज्ञान तो उन्हें सहज प्राप्त था। भगवान सदाशिव उनके आराध्य थे। माता भवानी उन्हें अपनी संतान मानती थीं। सभी दिव्य शक्तियाँ, सिद्धियाँ, विभूतियाँ उनकी आज्ञा पाने के लिए लालायित रहती थीं। अनेकों अपरा और परा विद्याओं के वह प्रखर आचार्य थे। तप उनका सहज स्वभाव था। साध्य के सिद्ध हो जाने पर तप कम ही लोग करते हैं, और वह भी इतना दुष्कर और दारुण। पर महर्षि दधीचि का व्यक्तित्व ही अनेको असम्भव को सम्भव करने के लिए था।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ५४

गुरुवार, 3 जून 2021

👉 श्रधेयद्वय को स्वर्णिम विवाहदिवस की हार्दिक शुभकामनाएं



पुण्य  परमार्थ  मय  पूर्ण, जीवन  है  जिनका।
युग स्वयं ही लिखेगा,स्वर्णगाथा सृजन का।।

परिणय  से  नए  युग  की  शुरुआत  थी  तब।
अध्यात्म  में  नव  आयाम  की  बात  थी  तब।।
अभिनंदन  हुआ विज्ञान - धर्म के  मिलन का।
युग स्वयं ही लिखेगा,स्वर्ण गाथा सृजन का।।

माँ  भगवती   महाकाल   के  शैल  संतान  हैं।
माँ  सरस्वती   सत्य   के  प्रणव  पहचान  हैं।।
मिलन   है  प्रेम   का,  सत्य  न्याय  धर्म  का।
युग स्वयं ही लिखेगा,स्वर्णगाथा सृजन का।।

भक्ति  के  शिखर  शैल  श्रद्धा   के  अर्णव  हैं।
श्रद्देय  द्वय   हमारे   स्वयं   जीजी   प्रणव   हैं।।
स्वर्णिम  है   पल,  आप  दोनों  के  मिलन का।
युग स्वयं ही लिखेगा,स्वर्ण गाथा सृजन का।।

                                                -उमेश यादव

मंगलवार, 1 जून 2021

👉 गुरु दक्षिणा

एक बार एक शिष्य ने विनम्रतापूर्वक अपने गुरु जी से पूछा- ‘गुरु जी, कुछ लोग कहते हैं कि जीवन एक संघर्ष है, कुछ अन्य कहते हैं कि जीवन एक खेल है और कुछ जीवन को एक उत्सव की संज्ञा देते हैं। इनमें कौन सही है?’

गुरु जी ने तत्काल बड़े ही धैर्यपूर्वक उत्तर दिया- ‘पुत्र,जिन्हें गुरु नहीं मिला उनके लिए जीवन एक संघर्ष है; जिन्हें गुरु मिल गया उनका जीवन एक खेल है और जो लोग गुरु द्वारा बताये गए मार्ग पर चलने लगते हैं, मात्र वे ही जीवन को एक उत्सव का नाम देने का साहस जुटा पाते हैं।’

यह उत्तर सुनने के बाद भी शिष्य पूरी तरह से संतुष्ट न था। गुरु जी को इसका आभास हो गया।वे कहने लगे- ‘लो,तुम्हें इसी सन्दर्भ में एक कहानी सुनाता हूँ। ध्यान से सुनोगे तो स्वयं ही अपने प्रश्न का उत्तर पा सकोगे।’

उन्होंने जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी-

एक बार की बात है कि किसी गुरुकुल में तीन शिष्यों नें अपना अध्ययन सम्पूर्ण करने पर अपने गुरु जी से यह बताने के लिए विनती की कि उन्हें गुरुदाक्षिणा में, उनसे क्या चाहिए।गुरु जी पहले तो मंद-मंद मुस्कराये और फिर बड़े स्नेहपूर्वक कहने लगे- ‘मुझे तुमसे गुरुदक्षिणा में एक थैला भर के सूखी पत्तियां चाहिए, ला सकोगे?’

वे तीनों मन ही मन बहुत प्रसन्न हुए क्योंकि उन्हें लगा कि वे बड़ी आसानी से अपने गुरु जी की इच्छा पूरी कर सकेंगे। सूखी पत्तियाँ तो जंगल में सर्वत्र बिखरी ही रहती हैं| वे उत्साहपूर्वक एक ही स्वर में बोले- "जी गुरु जी, जैसी आपकी आज्ञा।’'
 
अब वे तीनों शिष्य चलते-चलते एक समीपस्थ जंगल में पहूंच चुके थे।लेकिन यह देखकर कि वहाँ पर तो सूखी पत्तियाँ केवल एक मुट्ठी भर ही थीं, उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। वे सोच में पड़ गये कि आखिर जंगल से कौन सूखी पत्तियां उठा कर ले गया होगा? इतने में ही उन्हें दूर से आता हुआ कोई किसान दिखाई दिया।वे उसके पास पहुँच कर, उससे विनम्रतापूर्वक याचना करने लगे कि वह उन्हें केवल एक थैला भर सूखी पत्तियां दे दे। अब उस किसान ने उनसे क्षमायाचना करते हुए, उन्हें यह बताया कि वह उनकी मदद नहीं कर सकता क्योंकि उसने सूखी पत्तियों का ईंधन के रूप में पहले ही उपयोग कर लिया था। अब, वे तीनों, पास में ही बसे एक गाँव की ओर इस आशा से बढ़ने लगे थे कि हो सकता है वहाँ उस गाँव में उनकी कोई सहायता कर सके। वहाँ पहूंच कर उन्होंने जब एक व्यापारी को देखा तो बड़ी उम्मीद से उससे एक थैला भर सूखी पत्तियां देने के लिए प्रार्थना करने लगे लेकिन उन्हें फिर से एकबार निराशा ही हाथ आई क्योंकि उस व्यापारी ने तो, पहले ही, कुछ पैसे कमाने के लिए सूखी पत्तियों के दोने बनाकर बेच दिए थे लेकिन उस व्यापारी ने उदारता दिखाते हुए उन्हें एक बूढी माँ का पता बताया जो सूखी पत्तियां एकत्रित किया करती थी। पर भाग्य ने यहाँ पर भी उनका साथ नहीं दिया क्योंकि वह बूढी माँ तो उन पत्तियों को अलग-अलग करके कई प्रकार की ओषधियाँ बनाया करती थी।।अब निराश होकर वे तीनों खाली हाथ ही गुरुकुल लौट गये।

गुरु जी ने उन्हें देखते ही स्नेह पूर्वक पूछा- ‘पुत्रो, ले आये गुरुदक्षिणा?’  

तीनों ने सर झुका लिया।

गुरू जी द्वारा दोबारा पूछे जाने पर उनमें से एक शिष्य कहने लगा-  ‘गुरुदेव, हम आपकी इच्छा पूरी नहीं कर पाये। हमने सोचा था कि सूखी पत्तियां तो जंगल में सर्वत्र बिखरी ही रहती होंगी लेकिन बड़े ही आश्चर्य की बात है कि लोग उनका भी कितनी तरह से उपयोग करते हैं।"   

गुरु जी फिर पहले ही की तरह मुस्कराते हुए प्रेमपूर्वक बोले- ‘निराश क्यों होते हो? प्रसन्न हो जाओ और यही ज्ञान कि सूखी पत्तियां भी व्यर्थ नहीं हुआ करतीं बल्कि उनके भी अनेक उपयोग हुआ करते हैं; मुझे गुरुदक्षिणा के रूप में दे दो।’

तीनों शिष्य गुरु जी को प्रणाम करके खुशी-खुशी अपने-अपने घर की ओर चले गये।
       
वह शिष्य जो गुरु जी की कहानी एकाग्रचित्त हो कर सुन रहा था, अचानक बड़े उत्साह से बोला- ‘गुरु जी,अब मुझे अच्छी तरह से ज्ञात हो गया है कि आप क्या कहना चाहते हैं।आप का संकेत, वस्तुतः इसी ओर है न कि जब सर्वत्र सुलभ सूखी पत्तियां भी निरर्थक या बेकार नहीं होती हैं तो फिर हम कैसे, किसी भी वस्तु या व्यक्ति को छोटा और महत्त्वहीन मान कर उसका तिरस्कार कर सकते हैं? चींटी से लेकर हाथी तक और सुई से लेकर तलवार तक-सभी का अपना-अपना महत्त्व होता है।’

गुरु जी भी तुरंत ही बोले- ‘हाँ, पुत्र, मेरे कहने का भी यही तात्पर्य है कि हम जब भी किसी से मिलें तो उसे यथायोग्य मान देने का भरसक प्रयास करें ताकि आपस में स्नेह, सद्भावना, सहानुभूति एवं सहिष्णुता का विस्तार होता रहे और हमारा जीवन संघर्ष के बजाय उत्सव बन सके। दूसरे, यदि जीवन को एक खेल ही माना जाए तो बेहतर यही होगा कि हम निर्विक्षेप, स्वस्थ एवं शांत प्रतियोगिता में ही भाग लें और अपने निष्पादन तथा निर्माण को ऊंचाई के शिखर पर ले जाने का अथक प्रयास करें।’

"यदि हम मन, वचन और कर्म- इन तीनों ही स्तरों पर इस कहानी का मूल्यांकन करें, तो भी यह कहानी खरी ही उतरेगी। सब के प्रति पूर्वाग्रह से मुक्त मन वाला व्यक्ति अपने वचनों से कभी भी किसी को आहत करने का दुःसाहस नहीं करता और उसकी यही ऊर्जा उसके पुरुषार्थ के मार्ग की समस्त बाधाओं को हर लेती है। वस्तुतः, हमारे जीवन का सबसे बड़ा ‘उत्सव’  पुरुषार्थ ही होता है-ऐसा विद्वानों का मत है।

अब शिष्य पूरी तरह से संतुष्ट था।

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग २६)

सुख का केन्द्र और स्रोत आत्मा

किसी की यह धारणा सर्वथा मिथ्या है कि सुख का निवास किन्हीं पदार्थों में है। यदि ऐसा रहा होता तो वे सारे पदार्थ जिन्हें सुखदायक माना जाता है, सबको समान रूप से सुखी और सन्तुष्ट रखते अथवा उन पदार्थों के मिल जाने पर मनुष्य सहज ही सुख सम्पन्न हो जाता किन्तु ऐसा देखा नहीं जाता। संसार में ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जिन्हें संसार के वे सारे पदार्थ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं, जिन्हें सुख का संराधक माना जाता है। किन्तु ऐसे सम्पन्न व्यक्ति भी असन्तोष, अशान्ति, अतृप्ति अथवा शोक सन्तापों से जलते देखे जाते हैं। उनके उपलब्ध पदार्थ उनका दुःख मिटाने में जरा भी सहायक नहीं हो पाते।

वास्तविक बात यह है कि संसार के सारे पदार्थ जड़ होते हैं। जड़ तो जड़ ही है। उसमें अपनी कोई क्षमता नहीं होती। न तो जड़ पदार्थ किसी को स्वयं सुख दें सकते हैं और न दुःख। क्योंकि उनमें न तो सुखद तत्व होते हैं और न दुःखद तत्व और न उनमें सक्रियता ही होती है, जिससे वे किसी को अपनी विशेषता से प्रभावित कर सकें। यह मनुष्य का अपना आत्म-तत्व ही होता है, जो उससे सम्बन्ध स्थापित करके उसे सुखद या दुःखद बना लेता है। आत्म तत्व की उन्मुखता ही किसी पदार्थ को किसी के लिये सुखद और किसी के लिये दुःखद बना देती है।

जिस समय मनुष्य का आत्म-तत्व सुखोन्मुख होकर पदार्थ से सम्बन्ध स्थापित करता है, वह सुखद बन जाता है और जब आत्मतत्व दुःखोन्मुख होकर सम्बन्ध स्थापित करता है, तब वही पदार्थ उसके लिये दुःखद बन जाता है। संसार के सारे पदार्थ जड़ हैं, वे अपनी ओर से न तो किसी को सुख दें सकते हैं और दुःख। यह मनुष्य का अपना आत्म-तत्व ही होता है, जो सम्बन्धित होकर उनको दुःखदायी अथवा सुखदायी बना देता है। यह धारणा कि सुख की उपलब्धि पदार्थों द्वारा होती है, सर्वथा मिथ्या और अज्ञानपूर्ण है।

किन्तु खेद है कि मनुष्य अज्ञानवश सुख-दुःख के इस रहस्य पर विश्वास नहीं करते और सत्य की खोज संसार के जड़ पदार्थों में किया करते हैं। पदार्थों को सुख का दाता मानकर उन्हें ही संचय करने में अपना बहुमूल्य जीवन बेकार में गंवा देते हैं। केवल इतना ही नहीं कि वे सुख आत्मा में नहीं करते बल्कि पदार्थों के चक्कर में फंसकर उनका संचय करने लिये अकरणीय कार्य तक किया करते हैं। झूंठ, फरेब, मक्कारी, भ्रष्टाचार, बेईमानी आदि के अपराध और पाप तक करने में तत्पर रहते हैं। सुख का निवास पदार्थों में नहीं आत्मा में है। उसे खोजने और पाने के लिये पदार्थों की ओर नहीं आत्मा की ओर उन्मुख होना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ४२
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग २६)

मर्यादाओं का रक्षक है भक्त

यमुना से थोड़ी ही दूर लेकिन उनकी कुटी के पास ही महर्षि शमीक का गुरुकुल था। उस युग में जबकि जाति-वंश, कुलीन-अकुलीन की विभाजक रेखाओं से समाज बँटा हुआ था, उस समय भी उनके गुरुकुल में ‘जाति वंश सब एक समान-मानव मात्र एक समान’ के अनुसार ही आचरण होता था। अध्ययन, अध्यापन, तप एवं भक्ति यही जीवन था महर्षि का। लोक मर्यादाओं एवं वेद आज्ञाओं का महर्षि निष्ठापूर्वक पालन करते थे।
    
त्रिकाल सन्ध्यावन्दन, गायत्री जप, नियमित यज्ञ, एकादशी आदि पर्वों पर व्रत करना महर्षि शमीक कभी नहीं भूलते थे। समय के साथ उनके शरीर को जरा अवस्था ने घेर लिया। महर्षि व्यास जब उनसे मिले थे, वह पर्याप्त वृद्ध हो चुके थे। उनके सिर के बाल पूरी तरह से श्वेत हो चुके थे। मुख पर यतिं्कचित झुर्रियाँ आ चुकी थीं, परन्तु उनके नेत्रों में अनोखी प्रदीप्ति थी और वाणी में मधुरता एवं ओज का अनूठा सम्मिश्रण था।

प्रातःकाल जिस समय भगवान वेदव्यास महर्षि शमीक से मिले थे। वह सन्ध्या, यज्ञ आदि नित्यकर्मों को समाप्त कर गो-सेवा कर रहे थे। आश्रम में रहने वाली गायों की सेवा कार्य में महर्षि शमीक स्वयं लगते थे। हालाँकि उनके साथ आश्रम के अंतेवासी भी कार्यरत होते थे, परन्तु आचार्य शमीक का उत्साह देखते ही बनता था। आश्रम में अध्ययन करने वाले ब्रह्मचारियों एवं अन्य आचार्यगणों के मना करने पर भी उस गुरुकुल के कुलपति आचार्य शमीक अन्य सभी छोटे-बड़़े कार्यों को स्वयं करते थे।
    
प्रातःबेला में वेदव्यास जब आचार्य शमीक के गुरुकुल पहुँचे तो कुलपति शमीक अपने सेवा कार्यों में लगे हुए थे। ज्यों ही उन्होंने ऋषि व्यास को देखा, े लगभग दौड़ते हुए ऋषि को साष्टांग प्रणाम किया। महर्षि व्यास ने उन्हें झटपट उठाकर छाती से लगा लिया। वह महर्षि व्यास का हाथ थामकर उन्हें पास ही के कदम्ब वृक्ष के पास ले गये। आश्रम के ब्रह्मचारियों ने वहाँ पहले से ही दमसिन बिछा रखे थे। दोनों महर्षि वहाँ बैठकर तत्त्वचर्चा करने लग गये। कुछ ही पलों में गुरुकुल के एक आचार्य दो ब्रह्मचारियों के साथ प्रातराश लेकर आ गये।
    
प्रातराश को वहीं पास में रखकर वह आचार्य, ब्रह्मचारियों के साथ हाथ जोड़कर खड़े हो गये। उन्हें इस तरह कुछ देर खड़े हुए देख महर्षि व्यास ने उनसे प्रश्न किया- ‘‘तुम्हें कुछ कहना है वत्स?’’ ‘‘हाँ भगवन्! यदि आप अनुमति दें तो।’’ आचार्य के साथ ही वे दोनों ब्रह्मचारी बोल पड़े। ‘‘कहो! वत्स कहो-क्या कहना है?’’ भगवान व्यास के अनुमति देने के बाद वे आचार्य अपने ब्रह्मचारियों के साथ कहने लगे- ‘‘भगवन्! हमारे कुलपति आचार्य शमीक अब दीर्घायु हो चुके हैं। अब हम सबके होते हुए क्या उन्हें इस तरह से आश्रम के छोटे-छोटे कार्यों को करते हुए थकना चाहिए। आप उन्हें समझाएँ कि वे स्वयं सेवाकार्य न करके यदि हम सबको अपना मार्गदर्शन दें तो ठीक होगा।’’
    
जब ये आश्रमवासी महर्षि व्यास से अपनी बात कह रहे थे तो ऋषि शमीक मन्द-मन्द मुस्करा रहे थे। इनके कथन की समाप्ति पर व्यास ने ऋषि शमीक के मुख की ओर देखा। उनकी आँखों में प्रश्न की रेखा थी। शमीक समझ गये और कहले लगे- ‘‘भगवन! आप तो शास्त्रों के रचनाकार हैं। लोक मान्यता एवं वेद वचन के मर्मज्ञ विद्वान हैं। क्या हम भगवद्भक्तों को लोक एवं वेद की अवज्ञा करनी चाहिए?’’ आचार्य शमीक के इस प्रश्न के उत्तर में भगवान व्यास ने उनसे एक नया प्रश्न किया- ‘‘आचार्य आप तो भक्ति की परम भावदशा को पा चुके हैं। आप सभी विधि-निषेध से परे हैं। ऐसे में भला आपको ये लघु मर्यादाएँ कहाँ बाँध सकती हैं?’’ महर्षि व्यास के प्रश्न के उत्तर में गम्भीर होते हुए आचार्य शमीक कहने लगे- ‘‘जब तक शरीर है तब तक मर्यादाओं का रक्षण अनिवार्य है और फिर भक्त को ऐसा कोई आचरण नहीं करना चाहिए, जिससे भगवान की पावन महिमा को ठेस पहुँचे।’’
    
अपनी स्मृतियों में सँजोयी इस कथा को कहते हुए व्यास जी ने कहा- ‘‘भक्त शमीक की कथा सचमुच ही इस सूत्र की जीवन्त व्याख्या है।’’ इस कथा को सुनकर सभी ने भगवान व्यास को साधुवाद दिया और बोले- ‘‘सचमुच ही शास्त्र का रक्षण भक्त का कर्त्तव्य है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ५३

सोमवार, 31 मई 2021

👉 'सफल जीवन'

एक बार एक शिष्य ने अपने गुरु से पूछा-
गुरुदेव ये 'सफल जीवन' क्या होता है?

गुरु शिष्य को पतंग उड़ाने ले गए।
शिष्य गुरु को ध्यान से पतंग उड़ाते देख रहा था.

थोड़ी देर बाद शिष्य बोला-

गुरुदेव.. ये धागे की वजह से पतंग अपनी आजादी से और ऊपर की ओर नहीं जा पा रही है, क्या हम इसे तोड़ दें? ये और ऊपर चली जाएगी।

गुरु ने धागा तोड़ दिया ..

पतंग थोड़ा सा और ऊपर गई और उसके बाद लहरा कर नीचे आयी और दूर अनजान जगह पर जा कर गिर गई...

तब गुरु ने शिष्य को जीवन का दर्शन समझाया...
बेटे..  'जिंदगी में हम जिस ऊंचाई पर हैं..
हमें अक्सर लगता की कुछ चीजें, जिनसे हम बंधे हैं वे हमें और ऊपर जाने से रोक रही हैं; जैसे :
-घर-
 -परिवार-
  -अनुशासन-
   -माता-पिता-
    -गुरू-और-
     -समाज-

और हम उनसे आजाद होना चाहते हैं...

वास्तव में यही वो धागे होते हैं - जो हमें उस ऊंचाई पर बना के रखते हैं..

इन धागों के बिना हम एक बार तो ऊपर जायेंगे परन्तु बाद में हमारा वो ही हश्र होगा, जो बिन धागे की पतंग का हुआ...'

अतः जीवन में यदि तुम ऊंचाइयों पर बने रहना चाहते हो तो, कभी भी इन धागों से रिश्ता मत तोड़ना.."

धागे और पतंग जैसे जुड़ाव के सफल संतुलन से मिली हुई ऊंचाई को ही 'सफल जीवन कहते हैं.."

घर पर ही रहकर अपना और अपने का ध्यान रखे सभी का जीवन मंगलमय हो।

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग २५)

👉 तत्वज्ञान क्या है

अब यहां पर ज्ञान का स्वरूप जानने से पूर्व यह जान लेना आवश्यक है कि आखिर दुःख की उत्पत्ति होती किन कारणों से? वैसे तो जीवात्मा अपने मूल रूप में आनन्दमय है। तब अवश्य ही कोई कारण ऐसा होना चाहिये जो उसके लिये दुःख की सृष्टि करता है। उसको भी योगवाशिष्ठ में इस प्रकार बताया गया है—
‘‘देह दुःख विदुर्व्याधि
माध्याख्यं मानसामयम् ।
मौर्ख्य मूले हते विद्या
तत्वज्ञाने परीक्षयः ।।’’
—शारीरिक दुःखों को व्याधि और मानसिक दुःखों को आधि कहते हैं। यह दोनों मुख्य अर्थात् अज्ञान से ही उत्पन्न होती हैं और ज्ञान से नष्ट होती हैं।

संसार के सारे दुःखों का एकमात्र हेतु अविद्या अथवा अज्ञान ही है। जिस प्रकार प्रकाश का अभाव अन्धकार है और अन्धकार का अभाव प्रकाश होता है, उसी प्रकार ज्ञान का अभाव अज्ञान और अज्ञान का ज्ञान होना स्वाभाविक ही है और जिस प्रकार ज्ञान का परिणाम सुख-शान्ति और आनन्द है उसी प्रकार अज्ञान का फल दुःख, अशान्ति और शोक-सन्ताप होना ही चाहिये।

यह युग-युग का अनुभूत तथा अन्वेषित सत्य है कि दुःखों की उत्पत्ति अज्ञान से ही होती है और संसार के सारे विद्वान, चिन्तक एवं मनीषी जन इस बात पर एकमत पाये जाते हैं। इस प्रकार सार्वभौमिक और सार्वजनिक रूप से प्रतिपादित तथ्य में संदेह की गुंजाइश रह ही नहीं जाती—इस प्रकार अपना-अपना मत देते हुये विद्वानों ने कहा है—चाणक्य ने लिखा—‘‘अज्ञान के समान मनुष्य का और कोई दूसरा शत्रु नहीं है।’’ विश्वविख्यात दार्शनिक प्लेटो ने कहा है—‘अज्ञानी रहने से जन्म न लेना ही अच्छा है, क्यों कि अज्ञान ही समस्त विपत्तियों का मूल है।’’ शेक्सपियर ने लिखा है—‘‘अज्ञान ही अन्धकार है।’’

जीवन की समस्त विकृतियों, अनुभव होने वाले दुःखों, उलझनों और अशान्ति आदि का मूल कारण मनुष्य का अपना अज्ञान ही होता है। यही मनुष्य का परम शत्रु है। अज्ञान के कारण ही मनुष्य भी अन्य जीव-जन्तुओं की तरह अनेक दृष्टियों से हीन अवस्था में ही पड़ा रहता है। ज्ञान के अभाव में जिनका विवेक मन्द ही बना रहता है उनके जीवन के अन्धकार में भटकते हुये तरह-तरह के त्रास आते रहते हैं। अज्ञान के कारण ही मनुष्य को वास्तविक कर्तव्यों की जानकारी नहीं हो पाती इसलिये वह गलत मार्गों पर भटक जाता है और अनुचित कर्म करता हुआ दुःख का भागी बनता है। इसलिये दुःखों से निवृत्ति पाने के लिये यदि उनका कारण अज्ञान को मिटा दिया जाये तो निश्चय ही मनुष्य सुख का वास्तविक अधिकारी बन सकता है।

अज्ञान का निवारण ज्ञान द्वारा ही हो सकता है। शती उसकी विपरीत वस्तु आग द्वारा ही दूर होता है। अन्धकार की परिसमाप्ति प्रकाश द्वारा ही सम्भव है। इसलिये ज्ञान प्राप्त का जो भी उपाय सम्भव हो उसे करते ही रहना चाहिये।

ज्ञान का सच्चा स्वरूप क्या है? केवल कतिपय जानकारियां ही ज्ञान नहीं माना जा सकता। सच्चा ज्ञान वह है जिसको पाकर मनुष्य आत्मा परमात्मा का साक्षात्कार कर सके। अपने साथ अपने इस संसार को पहचान सके। उसे सत् और असत् कर्मों की ठीक-ठीक जानकारी रहे और वह जिसकी प्रेरणा से असत् मार्ग को त्याग कर सन्मार्ग पर असंदिग्ध रूप से चल सके। कुछ शिक्षा और दो-चार शिल्पों को ही सीख लेना भर अथवा किन्हीं उलझनों को सुलझा लेने भर की बुद्धि ही ज्ञान नहीं है। ज्ञान वह है जिससे जीवन-मरण, बन्धन-मुक्ति, कर्म-अकर्म और सत्य-असत्य का न केवल निर्णय ही किया जा सके बल्कि गृहणीय को पकड़ा और अग्राह्य को छोड़ा जा सके, वह ज्ञान आध्यात्मिक ज्ञान ही है।
अज्ञान की स्थिति में कर्मों का क्रम बिगड़ जाता है। संसार में जितने भी सुख-दुःख आदि द्वन्द्व हैं वे सब कर्मों का फल होता है। अज्ञान द्वारा अपकर्म होना स्वाभाविक ही है और तब उनका दण्ड मनुष्य को भोगना ही पड़ता है। इतना ही क्यों सकाम भाव से किये सत्कर्म सुख के फल रूप में परिपक्व होते हैं और असत्य होने से कुछ ही समय में दुःख रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। इसलिये कर्म ही अधिकतर बन्धनों अथवा दुःख को मनुष्य पर आरोपित कराते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ३९
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग २५)

मर्यादाओं का रक्षक है भक्त

हिमालय के श्वेतशिखरों पर भगवान सूर्य अपनी सहस्र रश्मियों से स्वर्ण राशि उड़ेलने लगे थे। सूर्यदेव के इस अपूर्व अनुदान से हिमालय का यह सम्पूर्ण प्रान्त स्वर्णिम आभा से भर रहा था। थोड़ी दूर पर ही स्थित हिम झील का जल भी इस आभा को अपने में समेट रहा था। यहाँ पर उपस्थित ऋषियों एवं देवों के समुदाय ने अपने प्रातःकर्म पूरे कर लिये थे। अभी कुछ ही देर पहले उन्होंने भगवान भुवनभास्कर से सम्पूर्ण जगती के लिए ‘धियो यो नः प्रचोदयात्’ की याचना की थी। ‘‘निर्मल बुद्धि, निर्मल भावनाओं से जन्म पाती है’’- ब्रह्मर्षि विश्वामित्र महर्षि क्रतु से कह रहे थे। आज न जाने क्यों उन्हें अपना अतीत याद आ रहा था। ‘‘भावनाएँ दूषित हों तो बुद्धि एवं कर्म सभी दूषित हो जाते हैं।’’
    
ऐसा लग रहा था कि प्रह्लाद की पावन भगवद्भक्ति का मधुर गीत अभी भी उनके अंतःस्रोत से झर रहा था। ‘‘परम भगवद्भक्त होते हुए भी प्रह्लाद ने कितना सौम्य व सदाचारपूर्ण जीवन जिया था। सभी विधि-निषेधों से परे होते हुए भी उन्होंने सभी विधि-निषेधों को माना। लोक और वेद को उन्होंने अपने आचरण से महिमामण्डित किया।’’ ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की इस अंतर्वाणी को देवर्षि नारद अपने अंतःकरण में जैसे सुन रहे थे। वे किंचित हँसते हुए बोले-‘‘यदि ऋषि समुदाय की आज्ञा हो तो मैं अपना अगला सूत्र प्रस्तुत करूँ।’’ देवर्षि के इस वचन का ऋषि समुदाय एवं योगित्य वर्ग ने ‘अहोभाग्य’ कहकर स्वागत किया।
‘लोकेवेदेषु तदनुकूलाचरणं तद्विरोधिषूदासीनता॥ ११॥’
    
देवर्षि नारद की मधुर वाणी से यह कथा सूत्र प्रकट हुआ। इसे प्रकट करते हुए उन्होंने कहा- ‘‘भक्त लोक और वेद के अनुकूल आचरण करता है। इसके विरोधी आचरण के प्रति वह उदासीन रहता है।’’ देवर्षि की बात के सूत्र को पकड़ते हुए महर्षि देवल बोल पड़े- ‘‘लोक और वेद की मर्यादाओं की अवहेलना तो उद्धत अहं करता है। भक्त तो सर्वथा अहं शून्य और विनम्र होता है। उससे तो कभी किसी तरह से मर्यादाओं की अवहेलना होती ही नहीं।’’ ‘‘सत्य यही है’’- कहते हुए वेदज्ञान को सम्पादित करने वाले, पुराणों की रचना करने वाले महर्षि वेदव्यास को यमुना तीर पर कुटी बनाकर तपश्चर्या करने वाले भक्तवर शमीक की याद आ गयी। ऋषि शमीक हस्तिनापुर से थोड़ी दूर यमुना किनारे कुटिया बनाकर रहते थे। भगवान विष्णु के अनन्य भक्त थे-ऋषि शमीक। वे अपने आराध्य को कण-कण में देखने के अभ्यासी थे। सृष्टि का जड़ चेतन उनकी दृष्टि में उनके आराध्य का प्रतिरूप था।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ५२


शनिवार, 29 मई 2021

👉 ईश्वर से डर

एक दिन सुबह-सुबह दरवाजे की घंटी बजी। दरवाजा खोला तो देखा एक आकर्षक कद- काठी का व्यक्ति चेहरे पे प्यारी सी मुस्कान लिए खड़ा है।
मैंने कहा, "जी कहिए.."
तो उसने कहा,अच्छा जी, आप तो  रोज़ हमारी ही गुहार लगाते थे?
मैंने  कहामाफ कीजिये, भाई साहब! मैंने पहचाना नहीं आपको..."

तो वह कहने लगे, "भाई साहब, मैं वह हूँ, जिसने तुम्हें साहेब बनाया है... अरे ईश्वर हूँ.., ईश्वर.. तुम हमेशा कहते थे न कि नज़र में बसे हो पर नज़र नहीं आते... लो आ गया..! अब आज पूरे दिन तुम्हारे साथ ही रहूँगा।"

मैंने चिढ़ते हुए कहा,"ये क्या मज़ाक है?" "अरे मज़ाक नहीं है, सच है। सिर्फ़ तुम्हें ही नज़र आऊंगा। तुम्हारे सिवा कोई देख-सुन नही पाएगा मुझे। "कुछ कहता इसके पहले पीछे से माँ आ गयी.. "अकेला ख़ड़ा-खड़ा क्या कर रहा है यहाँ, चाय तैयार है, चल आजा अंदर.अब उनकी बातों पे थोड़ा बहुत यकीन होने लगा था, और मन में थोड़ा सा डर भी था.. मैं जाकर सोफे पर बैठा ही था कि बगल में वह आकर बैठ गए। चाय आते ही जैसे ही पहला घूँट पीया कि मैं गुस्से से चिल्लाया,अरे मॉं, ये हर रोज इतनी चीनी? "इतना कहते ही ध्यान आया कि अगर ये सचमुच में ईश्वर है तो इन्हें कतई पसंद नहीं आयेगा कि कोई अपनी माँ पर गुस्सा करे। अपने मन को शांत किया और समझा भी  दिया कि 'भई, तुम नज़र में हो आज... ज़रा ध्यान से!'

बस फिर मैं जहाँ-जहाँ... वह मेरे पीछे-पीछे पूरे घर में... थोड़ी देर बाद नहाने के लिये जैसे ही मैं बाथरूम की तरफ चला, तो उन्होंने भी कदम बढ़ा दिए..मैंने कहा, "प्रभु, यहाँ तो बख्श दो..."

खैर, नहाकर, तैयार होकर मैं पूजा घर में गया, यकीनन पहली बार तन्मयता से प्रभु वंदन किया, क्योंकि आज अपनी ईमानदारी जो साबित करनी थी.. फिर आफिस के लिए निकला, अपनी कार में बैठा, तो देखा बगल में  महाशय पहले से ही बैठे हुए हैं। सफ़र शुरू हुआ तभी एक फ़ोन आया, और फ़ोन उठाने ही वाला था कि ध्यान आया, 'तुम नज़र में हो।'

कार को साइड में रोका, फ़ोन पर बात की और बात करते-करते कहने ही वाला था कि 'इस काम के ऊपर के पैसे लगेंगे' ...पर ये  तो गलत था, : पाप था, तो प्रभु के सामने ही कैसे कहता तो एकाएक ही मुँह से निकल गया,"आप आ जाइये। आपका काम हो  जाएगा।"

फिर उस दिन आफिस में ना स्टॉफ पर गुस्सा किया, ना किसी कर्मचारी से बहस की 25-50 गालियाँ तो रोज़ अनावश्यक निकल ही जातीं थीं मुँह से, पर उस दिन सारी गालियाँ, 'कोई बात नहीं, इट्स ओके...'में तब्दील हो गयीं।

वह पहला दिन था जब क्रोध, घमंड, किसी की बुराई, लालच, अपशब्द, बेईमानी, झूंठ- ये सब मेरी दिनचर्या का हिस्सा नहीं बने।
शाम को ऑफिस से निकला, कार में बैठा, तो बगल में बैठे ईश्वर को बोल ही दिया...

"प्रभु सीट बेल्ट लगा लें, कुछ नियम तो आप भी निभाएं... उनके चेहरे पर संतोष भरी मुस्कान थी..."
घर पर रात्रि-भोजन जब परोसा गया तब शायद पहली बार मेरे मुख से निकला,
"प्रभु, पहले आप लीजिये।"

और उन्होंने भी मुस्कुराते हुए निवाला मुँह मे रखा। भोजन के बाद माँ बोली, "पहली बार खाने में कोई कमी नहीं निकाली आज तूने। क्या बात है ? सूरज पश्चिम से निकला है क्या, आज?"

मैंने कहा माँ आज सूर्योदय मन में हुआ है... रोज़ मैं महज खाना खाता था, आज प्रसाद ग्रहण किया है माँ, और प्रसाद में कोई कमी नहीं होती।"

थोड़ी देर टहलने के बाद अपने कमरे मे गया, शांत मन और शांत दिमाग  के साथ तकिये पर अपना सिर रखा तो ईश्वर ने प्यार से सिर पर हाथ फिराया और कहा,
"आज तुम्हें नींद के लिए किसी संगीत, किसी दवा और किसी किताब के सहारे की ज़रुरत नहीं है।"

गहरी नींद गालों पे थपकी से उठी
कब तक सोयेगा .., जाग जा अब।
माँ की आवाज़ थी... सपना था शायद... हाँ, सपना ही था पर नीँद से जगा गया... अब समझ में आ गया उसका इशारा...

"तुम मेरी नज़र में हो...।"
जिस दिन ये समझ गए कि "वो" देख रहा है, सब कुछ ठीक हो जाएगा। सपने में आया एक विचार भी आँखें खोल सकता है।

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग २४)

👉 दुखों का कारण

पूर्वोक्त लौकिक आनन्दों में यह विशेषताएं नहीं होतीं। उनकी प्राप्ति के लिये कारण और साधन की आवश्यकता होती है। वह किसी हेतु से उत्पन्न होता है और हेतु के मिट जाने पर नष्ट हो जाता है। इतना ही क्यों—यदि एक बार उसका आधार बना भी रहे तो भी उस आनन्द में जीर्णता, क्षीणता, प्राचीनता और अरुचिता आ जाती है। लौकिक आनन्दों की परि-समाप्ति दुःख में ही होती है। आज जो किसी कारण से प्रसन्न है, आनन्दित है वह कल किसी कारण से दुःखी होने लगता है। लौकिक आनन्द की कितनी ही मात्रा क्यों न मिलती जाय, तथापि और अधिक पाने की प्यास बनी रहती है। उससे न तृप्ति मिलती है और न सन्तोष। जिस अनुभूति में अतृप्ति, असन्तोष और तृष्णा बनी रहे वह आनन्द कैसा? लौकिक आनन्द के कितने ही सघन वातावरण में क्यों न बैठे हों एक छोटा-सा अप्रिय समाचार या छोटी-सी दुःखद बात उसे समूल नष्ट कर देती है। तब न किसी के मुख पर हंसी रह जाती है और न हृदय में पुलक! लौकिक आनन्द और मोक्षानन्द की परस्पर तुलना ही नहीं की जा सकती।

लौकिक आनन्दों में इस असफलता का कारण यह होता है कि वे असत्य एवं भ्रामक होते हैं। उनकी अनुभूति, प्रवंचना अथवा मृगतृष्णा के समान ही होती है। इस असत्यता का दोष ही लौकिक आनन्द को निकृष्ट एवं अग्राह्य बना देते हैं। आनन्द केवल आत्मिक आनन्द ही होता है। मोक्ष का आनन्द ही वास्तविक तथा अन्वेषणीय आनन्द है। लौकिक आनन्दों की अग्राह्यता का प्रतिपादन इसीलिये किया गया है कि जो व्यक्ति उसके झूंठे प्रवचनों में फंस जाता है, उन्हें पकड़ने, पाने के लिये दौड़ता रहता है, उनको स्थिर और स्थायी बनाने में लगता है, वह अपना सारा जीवन इसी मायाजाल में उलझकर खो देता है। भ्रम में पड़े रहने के कारण उसे वास्तविकता का ध्यान ही नहीं आता। लौकिक आनन्दों के फेर में पड़कर जिसे वास्तविक आनन्द का ध्यान ही न आयेगा वह उसको पाने के लिये प्रयत्नशील भी क्यों होगा। जिस हिरण को मरुमरीचिक जल भ्रम में भुला लेती है तन-मन से उसी को पकड़ने के पीछे पड़ा रहता है। अब पाया, अब पाया करता हुआ वह निःसार दुराशा का यन्त्र बना भटकता रहता है और इस प्रकार वास्तविक जल की खोज से वंचित हो जाता है। परिणाम यह होता है कि भटक-भटक कर प्यासा ही मर जाता है। जिस जीवन में वह पानी और परितृप्ति दोनों को पाकर कृतार्थ हो सकता था वह जीवन यों ही चला जाता है, नष्ट हो जाता है। यही हाल लौकिक आनन्दवादियों का होता है। जिस जीवन में वे मोक्ष और उसका वास्तविक सुख प्राप्त कर सकते हैं वे उसे माया-छाया और भ्रामक सुख की मरीचिका में नष्ट कर अपनी अनन्त हानि कर लेते हैं। इसीलिये लौकिक सुखों को प्रबलता के साथ अग्राह्य एवं गर्हित बताया गया है। वास्तविक आनन्द लौकिक लिप्साओं और सांसारिक भोग-विलासों में नहीं है वह मोक्ष और मोक्ष की स्थिति में है। उसी को पाने का प्रयत्न करना चाहिये, वही मानव जीवन का लक्ष्य है, उसी में शांति और तृप्ति मिलेगी।

इस प्रकार स्पष्ट है कि दुःख तो दुःख ही है सांसारिक सुख भी दुःख का एक स्वरूप है। इनकी निवृत्ति से ही सच्चे सुख की प्राप्ति सम्भव है। किन्तु इनकी निवृत्ति का उपाय क्या है? इसके लिये पुनः योगवाशिष्ठ में कहा गया है—
‘‘ज्ञानान्निर्दुःखतामेति
ज्ञानादज्ञान संक्षयः ।
ज्ञानादेव परासिद्धि
नन्दियस्याद्राम वस्तुतः ।।’’

—हे राम! ज्ञान से ही दुःख दूर होते हैं, ज्ञान से अज्ञान का निवारण होता है, ज्ञान से ही परम सिद्धि होती है और किसी उपाय से नहीं।
और भी आगे बताया गया है—
‘‘प्रज्ञा विज्ञात विज्ञेय
सम्यग् दर्शन माधयः ।
न दहन्ति वनं वर्षा
सिक्तमग्निशिखा इव ।’’
—जिसने जानने योग्य को जान लिया है और विवेक दृष्टि प्राप्त कर ली है, उस ज्ञानी को दुःख उसी प्रकार त्रासक नहीं होते जिस प्रकार वर्षा से भीगे जंगल को अग्नि शिखा नहीं जा पाती।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ३७
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग २४)

अन्य आश्रयों का त्याग ही है अनन्यता
    
भक्तों में अग्रणी प्रह्लाद। भावनाओं में परम अनन्यता की भावमयी मूर्ति प्रह्लाद। इन भक्तश्रेष्ठ के नाम में ही कुछ जादू था। सभी इनके स्मरण मात्र से भाव विह्वल हो गये। श्रवण की उत्सुकता जाग्रत हुई। हरिवाहन-विनितानन्दन गरुड़ कह रहे थे- ‘‘मैं भक्तश्रेष्ठ प्रह्लाद के भक्तिमय जीवन के कई पावन पलों का स्वयं साक्षी रहा हूँ। उन्होंने तो अपनी माँ के गर्भ में ही भक्ति का पाठ पढ़ा था। उस समय उनकी माता देवर्षि के सान्निध्य में रह रही थीं।’’
    
पक्षीराज गरुड़ के स्वरों ने देवर्षि की स्मृतियों को कुरेद दिया। उन्हें याद हो आये वे बीते दिन, जब वे अपनी भ्रमणकारी प्रवृत्ति के विपरीत एक स्थान पर स्थिर होकर रहे थे। प्रह्लाद की माता उनके आश्रम में प्रभु भक्ति में लीन रहती थीं। आश्रम के समीप का वह वनप्रान्त एक नवीन भावचेतना से पूरित हो गया था। अपनी माता के गर्भ में स्थित प्रह्लाद की चेतना चारों ओर एक दैवीभाव बिखेर रही थी। देवर्षि स्वयं उन्हें भक्ति के नवीन सूत्र सुनाया करते थे। उन्हीं दिनों उन्हें अनन्यता के उपदेश मिले थे।
    
अपनी स्मृतियों में विभोर देवर्षि को चेतन जब आया, जब गरुड़ जी के स्वर उनके कानों में पड़े। वह कह रहे थे कि ‘‘भक्त प्रह्लाद अपने गर्भकाल से ही असुरता के निशाने पर थे। उन्हें उस युग के सबसे महाशक्तिशाली जनों के कोप का भाजन बनना पड़ा। प्रह्लाद के पिता महाशक्तिशाली सम्राट हिरण्यकश्यपु एवं महान् तांत्रिक एवं यौगिक शक्तियों से सम्पन्न शुक्राचार्य। अपने युग की ये दो महान् शक्तियाँ प्रत्येक ढंग से प्रह्लाद का विनाश चाहती थीं। प्रह्लाद की मृत्यु ही इन दोनों का लक्ष्य थी। इनके पास अनेक साधन थे। अनेकों ढंग से ये हर दिन प्रह्लाद के विनाश की योजनाएँ रचते थे।
    
लेकिन प्रह्लाद को केवल नारायण के नाम का आश्रय था। नारायण के नाम और अपने नारायण की भक्ति के सिवा उन्होंने कभी किसी साधन या साधना के बारे में नहीं सोचा अन्यथा प्रतिभाशाली एवं असीम धैर्यवान् प्रह्लाद कभी भी किसी साधना में प्रवीण हो सकते थे। तंत्र एवं योग की सभी प्रक्रियाओं का ज्ञान उनके लिए सम्भव था। परन्तु इस अनूठे भक्त की अनन्य भक्ति तो केवल अपने भगवान के लिए थी। भगवान! भगवान!! और सिर्फ भगवान!!! अन्य कुछ भी नहीं।
    
सम्राट हिरण्यकश्यपु के प्रहार संघातक थे। कारागार की यातनाएँ, कभी पहाड़ से फिंकवाना तो कभी हाथी के नीचे कुचलवाने का आदेश देना, कभी उन्हें समुद्र में डुबा देने का आदेश। इतने पर भी जब उसे संतोष न हुआ तो अपनी वर प्राप्त बहन होलिका को प्रह्लाद को जला देने के लिए कहना। नित-नयी आपत्तियों को भक्त प्रह्लाद वरदान की तरह मानते थे। जब उन्हें होलिका ने जला देने का प्रयास किया तब इस घटना में होलिका की मृत्यु हो गयी। प्रह्लाद को उसकी मृत्यु पर सहज दुःख हुआ।
ऐसे में एक दिन उन्होंने देवर्षि से कहा था- ‘‘देवर्षि! मैं इतने लोगों के दुःख का कारण क्यों हूँ?’’ तब देवर्षि ने उनसे कहा- ‘‘पुत्र! तुम नहीं, उनकी प्रवृत्तियाँ उनके दुःखों का कारण हैं।’’ इसके बाद देवर्षि ने उनके मन को टटोलते हुए पूछा- ‘‘वत्स! क्या तुम्हें इन आपदाओं से कभी डर लगता है।’’ उत्तर में प्रह्लाद बड़े ही निश्छल भाव से हँसे और कहने लगे- ‘‘हे देवर्षि! मुझे तो आप ने ही यह पाठ पढ़ाया है कि भक्त के जीवन में आने वाली आपदाएँ, भक्त एवं भगवान दोनों की परीक्षा लेती हैं। भक्त की यह परीक्षा होती है कि उसकी प्रभुभक्ति कितनी प्रगाढ़ एवं अनन्य है और भगवान की परीक्षा कि वह अपने अनन्य भक्त की किस कुशलता से रक्षा करते हैं। साथ ही आपने यह भी बताया था कि भक्त से भले ही चूक हो जाये, परन्तु भगवान कभी भी नहीं चूकते। उनसे भक्त रक्षा में कभी प्रमाद नहीं होता।
    
और सचमुच ही भगवान नहीं चूके। उन्होंने अपने भक्त के लिए नृसिंह का रूप धरा। हिरण्यकश्यपु के घातक प्रहारों का उन्होंने संहार किया। भक्त प्रह्लाद की अनन्यता प्रभु भक्तों का अनुकरणीय आदर्श बनी।’’ गरुड़ के मुख से इस कथा को सुनकर महर्षियों के मुख पर प्रसन्नता के भाव छलके। उन्होंने हर्षित होकर कहा- ‘‘धन्य है भक्त प्रह्लाद, जिन्होंने भगवद्भक्ति की मर्यादाओं को परमोज्ज्वल रूप प्रदान दिया।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ५०

गुरुवार, 27 मई 2021

👉 दोषारोपण🌻🌻

एक आदमी रेगिस्तान से गुजरते वक़्त बुदबुदा रहा था,“कितनी बेकार जगह है ये,बिलकुल भी हरियाली नहीं है और हो भी कैसे सकती है यहाँ तो पानी का नामो-निशान भी नहीं है।

तपती रेत में वो जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा था उसका गुस्सा भी बढ़ता जा रहा था. अंत में वो आसमान की तरफ देख झल्लाते हुए बोला- क्यों भगवान आप यहाँ पानी क्यों नहीं देते? अगर यहाँ पानी होता तो कोई भी यहाँ पेड़-पौधे उगा सकता था और तब ये जगह भी कितनी खूबसूरत बन जाती!

ऐसा बोल कर वह आसमान की तरफ ही देखता रहा मानो वो भगवान के उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा हो!तभी एक चमत्कार होता है,नज़र झुकाते ही उसे सामने एक कुंवा नज़र आता है!

वह उस इलाके में बरसों से आ-जा रहा था पर आज तक उसे वहां कोई कुँवा नहीं दिखा था… वह आश्चर्य में पड़ गया और दौड़ कर कुंवे के पास गया। कुंवा लाबालब पानी से भरा था.  

उसने एक बार फिर आसमान की तरफ देखा और पानी के लिए धन्यवाद करने की बजाये बोला - “पानी तो ठीक है लेकिन इसे निकालने के लिए कोई उपाय भी तो होना चाहिए !!”

उसका ऐसा कहना था कि उसे कुँवें के बगल में पड़ी रस्सी और बाल्टी दिख गयी।एक बार फिर उसे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ! वह कुछ घबराहट के साथ आसमान की ओर देख कर बोला, “लेकिन मैं ये पानी ढोउंगा कैसे?”

तभी उसे महसूस होता है कि कोई उसे पीछे से छू रहा है,पलट कर देखा तो एक ऊंट उसके पीछे खड़ा था!अब वह आदमी अब एकदम घबड़ा जाता है, उसे लगता है कि कहीं वो रेगिस्तान में हरियाली लाने के काम में ना फंस जाए और इस बार वो आसमान की तरफ देखे बिना तेज क़दमों से आगे बढ़ने लगता है।

अभी उसने दो-चार कदम ही बढ़ाया था कि उड़ता हुआ पेपर का एक टुकड़ा उससे आकर चिपक जाता है।उस टुकड़े पर लिखा होता है –

मैंने तुम्हे पानी दिया,बाल्टी और रस्सी दी।पानी ढोने  का साधन भी दिया,अब तुम्हारे पास वो हर एक चीज है जो तुम्हे रेगिस्तान को हरा-भरा बनाने के लिए चाहिए। अब सब कुछ तुम्हारे हाथ में है ! आदमी एक क्षण के लिए ठहरा !! पर अगले ही पल वह आगे बढ़ गया और रेगिस्तान कभी भी हरा-भरा नहीं बन पाया।

मित्रों !! कई बार हम चीजों के अपने मन मुताबिक न होने पर दूसरों को दोष देते हैं। कभी हम परिस्थितियों को दोषी ठहराते हैं,कभी अपने बुजुर्गों को,कभी संगठन को तो कभी भगवान को।पर इस दोषारोपण के चक्कर में हम इस आवश्यक चीज को अनदेखा कर देते हैं कि - एक इंसान होने के नाते हममें वो शक्ति है कि हम अपने सभी सपनो को खुद साकार कर सकते हैं।

शुरुआत में भले लगे कि ऐसा कैसे संभव है पर जिस तरह इस कहानी में उस इंसान को रेगिस्तान हरा-भरा बनाने के सारे साधन मिल जाते हैं उसी तरह हमें भी प्रयत्न करने पर अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिए ज़रूरी सारे उपाय मिल सकते हैं.

👉 दोस्तॊ !! समस्या ये है कि ज्यादातर लोग इन उपायों के होने पर भी उस आदमी की तरह बस शिकायतें करना जानते है। अपनी मेहनत से अपनी दुनिया बदलना नहीं! तो चलिए,आज इस कहानी से सीख लेते हुए हम शिकायत करना छोडें और जिम्मेदारी लेकर अपनी दुनिया बदलना शुरू करें क्योंकि सचमुच सब कुछ तुम्हारे हाथ में है !!

🌸हम बदलेंगे, युग बदलेगा।🌸

👉 भक्तिगाथा (भाग २३)

अन्य आश्रयों का त्याग ही है अनन्यता

आँखों में छलकते भावबिन्दु, हृदयों में उफनती भावोर्मियाँ-सभी की अंतर्चेतना गहन भावसमाधि में डूबने लगी। कुछ पल के लिए ऐसा लगा जैसे कि कालचक्र थम गया हो। बाहरी जीवनधारा थमने की भले ही प्रतीति न हुई हो, पर सभी के अंतस्थ प्राण अवश्य ठिठक गये थे। देवर्षि नारद के द्वारा कहे गये सूत्र एवं महर्षि देवल की अनुभूति कथा का रस था ही कुछ ऐसा, कि सभी की अंतश्चेतना उसमें भीग गयी थी। सभी की यह अवस्था कितनी देर रही, कहा नहीं जा सकता। चेतना को चैतन्य तब प्राप्त हुआ, जब आकाश सामगान के मंत्रों की अनुगूँज से पूरित होने लगा। दरअसल साम के ये मधुर स्वर पक्षीराज गरुड़ के पंखों से झर रहे थे।
    
विनितानन्दन गरुड़, भगवान के वाहन गरुड़ और सबसे बढ़कर भगवान विष्णु के वाहन गरुड़, उनकी यह उपस्थिति सभी की चेतना में भक्ति का नया गीत बनकर उतर गयी। वैनतेय ने सभी ऋषियों को नमन किया। देवर्षि तो जैसे उनके प्राणप्रिय सखा ही थे। भगवान नारायण के इन पार्षदों का मिलन अवर्णनीय था। कुछ ऐसा जैसा कि भक्ति की दो धाराएँ मिलकर भावसमाधि की नव सृष्टि कर रही हों। हिमालय के इन हिम-धवल शिखरों ने भी इसे अनुभव किया। पहले ही हो चुके भक्तिमय वातावरण में नवपुलक भर गयी। अब तो बस देवर्षि के मुख से नवसूत्र उच्चारित होना था-
‘अन्याश्रयाणां त्यागोऽनन्यता॥ १०॥’
अन्य आश्रयों का त्याग ही अनन्यता है।
    
हृदय वीणा की झंकृति की एक समवेत गूँज उठी। इस मधुर झंकृति में भक्ति के अनुभव नवगीत कौन पिरोयेगा? सभी की दृष्टि पक्षीराज गरुड़ की ओर जाकर टिक गयी। सप्तऋषियों ने भी आग्रह किया- ‘‘हे हरिवाहन! आज आप ही इस सूत्र की व्याख्या करें। आप स्वयं प्रभु के श्रेष्ठ भक्त हैं। भक्तों के लिए भगवान की विकलता आपने स्वयं देखी है। भक्तों के हृदय की विह्वलता के भी आप साक्षी रहे हैं। आपके हृदय की अनुभव कथा भी भक्ति में भीगी है।’’ सप्तर्षियों के इस आग्रह पर गरुड़ का गात्र पुलकित हो उठा। उन्होंने विनम्र भाव से कहा- ‘‘हे ऋषिगण! आप सब त्रिलोकी के मार्गदर्शक हैं। भगवान स्वयं आपके हृदय प्रेरक हैं। आपके आदेश को स्वीकारते हुए आज मैं भक्त प्रह्लाद की भक्तिकथा सुनाऊँगा।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ४८

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग २३)

👉 दुखों का कारण

वस्तु स्थिति को न जानने के कारण ही विविध भांति के दुःख संताप उत्पन्न। महर्षि वशिष्ठ ने भगवान राम को दुखों का कारण अज्ञान बताते हुये उससे मुक्त होने का उपाय ज्ञान साधना ही बताया है।
योगवाशिष्ठ का वचन है—
‘‘आयधो व्याधयश्चैव
द्वय दुःखस्य कारणम् ।
तत्क्षयो मोक्ष उच्यते ।।’’
अर्थात्—आधि, व्याधि—अर्थात् मानसिक और शारीरिक यह दो ही प्रकार के दुःख इस संसार में हैं। इनकी निवृत्ति विद्या अर्थात् ज्ञान द्वारा ही होती है। इस दुःख निवृत्ति का नाम ही मोक्ष है।’’

इस प्रकार इस न्याय से विदित होता है कि यदि मनुष्य जीवन से दुःखों का तिरोधान हो जाय तो वह मोक्ष की स्थिति में अवस्थित हो जाये। दुःखों का अत्यन्त अभाव ही आनन्द भी है। अर्थात् मोक्ष और आनन्द एक दूसरे के पर्याय हैं। इस प्रकार यदि जीवन के दुःखों को नष्ट किया जा सके तो आनन्द वाची मोक्ष को प्राप्त किया जा सकता है। बहुत बार देखा जाता है कि लोग जीवन में अनेक बार आनन्द प्राप्त करते हैं। वे हंसते, बोलते खाते, खेलते, मनोरंजन करते, नृत्य-संगीत और काव्य-कलाओं का, आनन्द लेते, उत्सव-समारोह और पर्व मनाते, प्रेम पाते और प्रदान करते, गोष्ठी और सत्संगों में मोद-विनोद करते और न जाने इसी प्रकार से आमोद-प्रमोद पाते और प्रसन्न बना करते हैं—तो क्या उनकी इस स्थिति को मोक्ष कहा जा सकता है?

नहीं, मनुष्य की इस स्थिति को मोक्ष नहीं कहा जा सकता। मोक्ष का आनन्द स्थायी, स्थिर, अक्षय, समान अहैतुकं और निःशेष हुआ करता है। वह न कहीं से आता और न कहीं जाता है। न किसी कारण से उत्पन्न होता है और न किसी कारण से नष्ट होता है। वह आत्म-भूत और अहैतुकं होता है। वह सम्पूर्ण रूप में मिलता है सम्पूर्ण रूप में अनुभूत होता है सम्पूर्ण रूप में सदा-सर्वदा ही बना रहता है। वह सार्वदेशिक सर्वव्यापक, और सर्वस्व सहित ही होता है। मोक्ष का आनन्द पाने पर न तो कोई अंश शेष रह जाता है और न उसके आगे किसी प्रकार के आनन्द की इच्छा शेष रह जाती है। वह प्रकाम, पूर्ण और परमावधिक ही होता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ३५
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 April 2026

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