बुधवार, 7 अक्टूबर 2020
👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ४५)
मंगलवार, 6 अक्टूबर 2020
👉 कर्म करो तभी मिलेगा
👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ४४)
👉 Prepare Yourself to Receive God's Grace
The tub got the point and accepted his mistake. Telling this story to his disciples a monk said, "Just like rains, God's grace is showering down everywhere. We must prepare ourselves to receive it by performing Upasana. Worship is not begging for alms, it is about preparing oneself to receive the grace of God.
📖 From Pragya Puran
सोमवार, 5 अक्टूबर 2020
👉 एक अच्छा मनुष्य बनाइएगा
👉 A TRUE PRAYER
“Oh Lord! Bless us with strength, courage and wisdom so that we could meet adversities as opportunities to refine our qualities and strengthen our potentials. The roadblocks of obstacles and challenges of the path should serve as harbingers of a brighter tomorrow.” –– Such would be an ideal prayer to elevate the level of our optimism and enthusiasm and would protect us from becoming disheartened, weak or cowardly.
We have to become intrepid warriors of Light and not perplexed fugitives in the battlefield of life. Prayer is less about asking for things we are attached to than it is about our relinquishing our attachments – thus taking us beyond fear. When we pray, we don’t change the world; we change ourselves. We move away from BEGGING to LETTING – “IN THIS MOMENT I AM HERE, OH DIVINE MASTER, USE ME. LET THY WILL BE DONE THROUGH ME.”
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
👉 समाज−सुधार का आधार
👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ४३)
शनिवार, 3 अक्टूबर 2020
👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ४२)
प्रभु प्रेम से मिलेगा—वैराग्य का चरम
इस बारे में गुरुदेव प्रायः नारद मोह की कथा सुनाया करते थे। देवर्षि नारद पहले महान् ज्ञानी योग साधक थे। उनकी योग साधना अति प्रखर थी। विवेक उनमें पूर्णतया प्रज्वलित था। अपनी साधना की प्रचण्ड अविरामता में उन्होंने हिमालय में समाधि लगा ली। उनकी योग साधना का तेज ऐसा बढ़ा की देव शक्तियाँ परेशान हो गयी। देवलोक वासियों ने उन्हें डिगाने के लिए भाँति-भाँति के मायाजाल रचे। एक के बाद एक नए तरीके अपनाए, पर कोई कामयाबी न मिली। अन्तिम अस्त्र के रूप में उन्होंने कामदेव को सम्पूर्ण सेना के साथ भेजा। काम की सारी कलाएँ, अप्सराओं की सारी नृत्यलीलाएँ देवर्षि नारद के वैराग्य के सामने पराजित हो गयी। अन्ततः उन सबने देवर्षि से क्षमा याचना की और वापस अपने लोक चले गए।
काम को पराजित करने वाले नारद को अपने महान् वैराग्य का गर्व हो गया। अपनी काम विजय की कथा उन्होंने शिव, ब्रह्मा एवं विष्णु को सुना डाली। सर्वेश्वर ने उनके गर्वहरण के लिए लीला रची। जिन नारद के वैराग्य का प्रभाव कुछ ऐसा था कि - ‘काम कला कछु मुनिहि न व्यापी। निज भय डरेउ मनोभव पापी॥’ अर्थात् काम की कोई भी कला मुनिवर को नहीं व्यापी और वह कामदेव अपने पाप से डर गया। वही नारद कुछ ऐसे हो गए कि- ‘जप तप कुछु न होई तेहि काला। हे विधि मिलहि कवन विधि बाला॥’ अर्थात् उनसे उस समय कुछ भी जप-तप नहीं बन पड़ा। बस वे यही सोचने लगे कि हे विधाता किस तरह मेरा विवाह इस कन्या से हो जाय।
यह कथा सुनाते हुए गुरुदेव ने कहा था—सब कुछ होने पर भी जब तक अहं का भगवान् में समर्पण, विसर्जन, विलय नहीं होता, तब तक कभी वैराग्य सिद्ध नहीं होता। भक्तिमार्ग में पहले ही कदम पर अहं का बलिदान करना पड़ता है। इसीलिए भक्त को अपने आप ही सिद्ध वैराग्य मिल जाता है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भक्ति की महिमा की अरण्यकाण्ड में बड़ी ही सुन्दर चर्चा की है। नारद की जिज्ञासा के उत्तर में भगवान् कहते हैं-
जनहि मोर बल निज बल ताही।
दुह का काम क्रोध रिपु आही॥
यह विचारि पंडित मोहि भजहीं।
पायहु ज्ञान भगति नहि तजहीं॥
भक्त को मेरा बल (भगवान् का बल) रहता है और ज्ञानी को अपने बल (स्व विवेक) का सहारा रहता है। काम क्रोध दोनों के ही शत्रु हैं। यह सोचकर विद्वज्जन मेरी भक्ति करते हैं। ज्ञान मिलने पर भी इसका त्याग नहीं करते। गुरुदेव कहते थे कि भक्त में वैराग्य की परम भावदशा प्रकट होती है। उसके लिए विराग (वैराग्य) आराध्य के प्रति वि+राग यानि कि विशिष्ट राग बन जाता है। श्रीरामकृष्ण देव इस प्रसंग पर कहा करते थे कि एक बार उनके प्रति प्रेम जग जाय, तो फिर रम्भा-तिलोत्तमा जैसी रूपसी अप्सराएँ चिता भस्म जैसी त्याज्य लगने लगती हैं। भगवद्गीता में श्री कृष्ण ने भी यही सत्य कहा है-
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।
रसोवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निर्वतते॥—गीता-२/५९
यानि कि विषय भोग तो उसके भी छूट जाते हैं, जो इन्द्रिय से विषयों को नहीं ग्रहण कर रहा है, पर रस तो प्रभु दर्शन के बाद ही छूटता है। यह परं दृष्ट्वा स्थिति ही पर वैराग्य है, जो प्रभु भक्ति से सहज प्राप्त है। इस वैराग्य में ही समाधान की समाधि है।
.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ७५
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2020
👉 त्याग का रहस्य: -
👉 आत्म−नियंत्रण की आवश्यकता
👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ४१)
बुधवार, 30 सितंबर 2020
👉 कर्म और व्यवहार
👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ४०)
👉 अपनी गुत्थी आप सुलझावें
👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ३९)
मंगलवार, 29 सितंबर 2020
👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ३८)
जो साधक किसी तरह अपनी साधना में दीर्घकाल और निरन्तरता को बनाए रखते हैं, उनमें भावभरी श्रद्धा एवं अडिग निष्ठा की कमी रह जाती है। बार-बार मन में सन्देह एवं चित्त में व्यग्रता पनपती रहती है। पता नहीं, यह साधना सही है भी या नहीं। पता नहीं, साधना का पथ दिखाने वाले गुरु ठीक भी हैं या नहीं। पता नहीं, मुझे मंजिल मिलेगी भी या नहीं। इस तरह से डगमगाती श्रद्धा और चंचल निष्ठा, साधक और उसकी साधना को कहीं भी नहीं पहुँचने देती। वह प्रत्यक्ष में क्रिया तो करता रहता है, पर भाव और विचारों की कमजोरी के कारण उसकी साधना सदा प्राणहीन और बलहीन बनी रहती है।
साधना के अभ्यास में बल और प्राण कैसे आएँ? इसका उत्तर स्वयं परम पूज्य गुरुदेव का अपना जीवन है। चौबीस वर्षों का दीर्घकाल, उसमें सदा बनी रहने वाली तप की निरन्तरता, सद्गुरु और गायत्री मंत्र पर गहन भाव श्रद्धा एवं अविचल अडिग निष्ठा ने ही उन्हें महासाधक और महायोगी होने का गौरव दिलाया। गुरुदेव अपनी चर्चा में कहते थे कि मेरे लिए गायत्री महामंत्र, गायत्री माता और अपनी मार्गदर्शक सत्ता में कभी कोई अन्तर नहीं रहा। गायत्री महामंत्र के २४ अक्षर ही मेरे जीवन सर्वस्व थे और हैं। अपनी अविराम साधना में पल-पल इनमें मैंने अपने प्राण अर्पित किए हैं। यही है आदर्श मानदण्ड—साधना के अभ्यास का। बिना थके, बिना रुके, समर्पित भावनाओं के साथ साधना का अभ्यास करते जाना चाहिए।
गायत्री महामंत्र की साधना के सम्बन्ध में गुरुदेव की एक बात और मनन योग्य है। वह कहते थे- गायत्री साधना के चमत्कार अनुभव करने हैं, तो मन को इधर-उधर मत भटकाओ, अधिक नहीं तो अनुष्ठान के नियमों का पालन करते हुए २४-२४ हजार के अनुष्ठान करते रहो। समर्पित भाव श्रद्धा के साथ की गई निरन्तर, निष्ठापूर्वक और लम्बे समय की साधना के परिणाम में गायत्री महामंत्र तुम्हें सब कुछ दे देगा। इस साधना में भाव श्रद्धा कैसी हो इस बारे में गोस्वामी जी महाराज के वचन है-
पुलक गात हिय सिय रघुबीरु।
जीह नाम जप लोचन नीरू॥
भावना से पुलकित शरीर, हृदय में आराध्य की छवि, जिह्वा से मंत्र जप, और नयनों में भाव बिन्दु। महातपस्वी भरत की साधना के प्रसंग में कही गयी चौपाई गायत्री साधकों के लिए जीवन मंत्र बन सकती है।
.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ६९
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
👉 Though Inconvenient, ‘Change’ is Inevitable
The foetus manages happily in the dark cell of mother’s womb, but when it is fully developed, nature pushes it out of its cozy chamber, separates it from the mother’s umbilical cord and forces it to come out in free atmosphere. In the process of progress, this change is essential and unavoidable. The time of birth is painful and inconvenient to everyone. Mother, nurse, members of the family and friends – all have to abandon their normal routine and get ready to help in whatever way they can in the process of birth. Ultimately the result of this exercise is pleasant to all.
During the present momentous transition period of change of an era, the process of elimination of the Evil and establishment of the Good in human hearts is bound to appear painful for the rigidly orthodox. Other sections of the society may also feel it inconvenient to adopt new ways of life befitting a new era. But there is no other alternative than to adopt the discipline of ushering in of the new enlightened world order that has been ordained by Nature. Once we accept this Truth and are not resistant to change, we will find that change is seed of spiritual growth for all humanity. We will discover that the very change we were fleeing from had held the good we had prayed for.
📖 From Akhand Jyoti
सोमवार, 28 सितंबर 2020
👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ३७)
इस सच्चाई के बावजूद अनेकों को अभ्यास से शिकायतें भी हैं। उनका कहना है कि इतने सालों से अभ्यास कर रहे हैं, पर मेरे जीवन में वैसा कुछ भी नहीं हुआ, जिसकी उम्मीद थी। सालों-साल साधना करने के बावजूद, सालों तक गायत्री जपने के बावजूद जिन्दगी में कोई चमत्कारी परिवर्तन नहीं हुए। तब क्या; अभ्यास की महिमा गलत है अथवा फिर साधना की विधि में कोई दोष है?
इस जिज्ञासा के समाधान में महर्षि पतंजलि कहते हैं कि न तो अभ्यास की महत्ता में कोई सन्देह है और न ही गायत्री महामंत्र की साधना या कोई योग विधि में कोई दोष है। बात सिर्फ इतनी सी है कि अभ्यास ठीक तरह से किया नहीं गया। अभ्यास किस तरह से किया जाय इसकी चर्चा महर्षि अपने अगले सूत्र में करते हैं-
स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढ़भूमिः॥ १/१४॥
शब्दार्थ-तु= परन्तु, सः= वह (अभ्यास), दीर्घकालनैरन्तर्य- सत्कारासेवितः= बहुत काल तक निरन्तर (निरन्तर) और आदरपूर्वक (श्रद्धा-निष्ठा के साथ) सांगोपांग सेवन किया जाने पर, दृढ़भूमि=दृढ़ अवस्था वाला होता है। यानि कि- बिना किसी व्यवधान के श्रद्धा-भरी निष्ठा के साथ लगातार लम्बे समय तक इसे जारी रखने पर वह दृढ़ अवस्था वाला हो जाता है।
महर्षि पतंजलि के अनुसार अभ्यास की सफलता के लिए चार चीजों का होना जरूरी है, इनमें पहली है-लम्बा समय, दूसरी है-निरन्तरता, तीसरी है-भाव भरी श्रद्धा और चौथी है-दृढ़ निष्ठा। साधना अभ्यास में यदि ये चार तत्त्व जुड़े हों, तो अभ्यास चमत्कारी परिणाम उत्पन्न किए बिना नहीं रहता। जिन्हें अपने अभ्यास के परिणाम से शिकायत है, उन्हें महर्षि के इस कथन के प्रकाश में आत्मावलोकन व आत्मसमीक्षा करनी चाहिए। वे अवश्य ही यह पाएँगे कि उनके जीवन में कहीं न कहीं किसी तत्त्व की कमी है।
अक्सर देखा जाता है कि लोग शुरुआत तो बड़े उत्साह के साथ करते हैं, बड़ी उमंग-उल्लास से अपनी साधना का प्रारम्भ करते हैं, बाद में महीने-दो-महीने, साल दो साल या ज्यादा से ज्यादा पाँच-छः साल में इसे छोड़ बैठते हैं। जो लोग दीर्घकाल तक साधना जारी भी रखते हैं, उनमें प्रायः निरन्तरता का अभाव होता है। होता यह है कि एक महीने मन लगाकर साधना की, बाद में सब कुछ छूट गया। फिर एकाएक मन में उत्साह उमड़ा और दुबारा शुरू हो गया। पर इस बार दो-तीन महीने में थक कर रुक गए। यही सिलसिला जीवन पर्यन्त चलता रहता है। रुक-रुक कर चलना, थक-थक कर रुकना, इस तरह से साधना अभ्यास कभी भी सफल नहीं होता है। साधना की अविराम गति में लय का संगीत होना चाहिए।
.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ६८
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
शनिवार, 26 सितंबर 2020
👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ३६)
अभ्यास दृढ़ से दृढ़तर और दृढ़तम कैसे हो? यह समझने से पूर्व यह हृृदयंगम कर लेना चाहिये कि यह यह योग कथा केवल उन्हीं के लिए है, जिनकी आत्मचेतना में योग साधना के प्रति श्रद्घा है, विश्वास है, तड़प है, त्वरा है, तृषा है। महर्षि पतंजलि एवं परम पूज्य गुरुदेव का संवाद सिर्फ उन्हीं से है, जो इस संवाद में अपनी भागीदारी चाहते हैं। दोनों महर्षियों ने अपना खजाना खोल रखा है, पर कोई कोरा बुद्घिवादी इसे छू भी नहीं सकता, उसे साधक बनना ही होगा। अन्यथा गोस्वामी तुलसी बाबा के शब्दों में उसकी स्थिति कुछ ऐसी होगी-
करि न जाइ सर मज्जन पाना।
फिर आवइ समेत अभिमाना।
जो बहोरि कोउ पूछन आवा।
सर निन्दा करि ताहि बुझावा॥
अर्थात्- इस योग कथा के सरोवर में उनसे स्नान और जलपान तो किया नहीं जाता; वह इसके पास जा करके भी खाली हाथ अभिमान सहित लौट जाते हैं। यदि उनसे कोई पूछता है कि यह योग कथा कैसी है, तो वे इसकी अनेक तरह से निन्दा करके उसे समझाते है।
गोस्वामी जी महाराज आगे कहते हैं-
सकल विघ्न व्यापहिं नहि तेही।
राम सुकृपाँ बिलोकहि जेही॥
जो साधक हैं, जिन पर भगवान् की कृपा है, उन्हें कोई विघ्न नहीं सताते हैं। उन्हें इस योग कथा को समझने में किसी तरह की कोई परेशानी नहीं होगी। उनकी जाग्रत् आत्मचेतना योग के रहस्यों को बड़ी ही आसानी से ग्रहण कर लेगी।
.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ६७
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
शुक्रवार, 25 सितंबर 2020
👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ३५)
इस तरह केन्द्र में स्थित होने के लिए क्या करें? तो इसके जवाब में परम पूज्य गुरुदेव कहा करते थे कि जप, ध्यान, प्राणायाम आदि योगाभ्यास की सारी प्रक्रियाएँ इसीलिए हैं। योग की सभी प्रक्रियाओं का एक ही मतलब है कि आपको अपना परिचय करा दे। आपको अपने में स्थित कर दे। हालाँकि कभी-कभी यह देखा जाता है कि काफी सालों से जप करने वाले, ध्यान का अभ्यास करने वाले लोगों में भी कोई गुणात्मक मौलिक परिवर्तन नहीं आ पाता। इसकी वजह प्रक्रियाओं का दोष नहीं, बल्कि उसके अभ्यास में खामियाँ हैं। ध्यान रहे योग-प्रक्रियाएँ मात्र क्रियात्मक नहीं हैं, उनमें गहरी विचारणा एवं उच्च भावनाएँ भी समावेशित हैं।
भगवद्गीता में इसके बारे में कहा गया है-
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह॥—गीता-१७/२८
अर्थात्- हे पार्थ! अश्रद्धा से किया गया हवन, दिया गया दान, तपा गया तप और भी जो कुछ आध्यात्मिक क्रिया की गई है, वह सब कुछ असद् है, उसका न कोई परिणाम आध्यात्मिक जीवन में है और नहीं इस लौकिक जीवन में। इसलिए योगाभ्यास की कोइ भी प्रक्रिया हो, उसमें गहरी श्रद्धा और पवित्र विचारणा का समोवश निहायत जरूरी है।
इस सम्बन्ध में वृन्दावन के सन्त स्वामी अखण्डानन्द महाराज का संस्मरण बड़ा ही प्रेरक है। ध्यान रहे कि ये सन्त परम पूज्य गुरुदेव पर गहरी श्रद्धा करते थे। इनकी एक पुस्तक है पावन संस्मरण। इसमें उन्होंने लिखा है कि एक दिन वे ब्रह्ममुहूर्त में बैठकर माला जप रहे थे। उनकी कोशिश यही थी कि ज्यादा से ज्यादा मालाएँ जप ली जाएँ। इस बीच परमहंस जगन्नाथपुरी जी उधर से गुजरे। उन्हें जन सामान्य लोग नेपाली बाबा के नाम से जानते थे। इनका जप देखकर वह बोल पड़े- भला कहीं ऐसे जप किया जाता है? उनके वचनों से इनकी आँख खुली। नमस्कार करने पर परमहंस जी ने इन्हें गले लगाया और बोले- मंत्र साक्षात् भगवान् है, अपने ईष्ट की शब्दमूर्ति है। मंत्र चाहे कोई भी हो, उसे जपने में शीघ्रता नहीं करनी चाहिए। सत्कार के साथ, धीर गम्भीर भाव के साथ मन्त्र का उच्चारण करना चाहिए। प्रत्येक शब्द का गहराई से उच्चारण करें। इस तरह एक अक्षर से दूसरे अक्षर तक पहुँचने में कुछ समय लगे। इससे मन में संकल्प नहीं होगा। जब मन खाली होगा, तो उसमें अपने ईष्ट का प्रकाश होगा।
गायत्री महामंत्र को योग साधक अपनी योग साधना का सर्वस्व मानकर अभ्यास करें। मन ही मन प्रत्येक अक्षर का स्पष्ट उच्चारण, साथ ही यह प्रगाढ़ भाव कि इन चौबीस अक्षरों में स्वयं आदि शक्ति जगन्माता अपनी चौबीस शक्तियों के साथ समायी हैं। यह मंत्र स्वयं ही परमा शक्ति है, साथ ही साधक को सब कुछ देने में समर्थ है। जप करते समय ही नहीं, जप करने के बाद रह-रहकर साधक के मन में माता का स्मरण होते रहना चाहिए। ध्यान रहे जप के साथ मौन-एकान्त एवं अधिक से अधिक ब्रह्मचर्य साधक के अभ्यास को दृढ़ करते हैं।
.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ६५
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
गुरुवार, 24 सितंबर 2020
👉 हमारा व्यवहार ही हमें श्रेष्ठ बनाता है
क्या आजकल की इस भागदौड़ भरी ज़िंदगी में आप इस बात पर एक दम से यकीन कर सकते हैं कि हमारा व्यवहार या हमारा कोई छोटा सा काम कभी हमारी जान बचा सकता है।
एक व्यक्ति एक बर्फ की फैक्ट्री में काम करता था। एक दिन रोजाना की तरह शाम को वह घर जाने की तयारी में था। तभी फैक्ट्री में एक तकनीकी समस्या उत्पन्न हो गयी और वह उसे दूर करने में जुट गया। जब तक वह कार्य पूरा करता, तब तक अत्यधिक देर हो गयी। लाईटें बुझा दी गईं, दरवाजे सील हो गये और वह उसी प्लांट में बंद हो गया। बिना हवा व प्रकाश के पूरी रात बर्फ की फैक्ट्री में फंसे रहने के कारण उसकी मौत होना लगभग तय था।
लगभग आधा घण्टे का समय बीत गया। तभी उसने किसी को दरवाजा खोलते देखा। क्या यह एक चमत्कार था? उसने देखा कि दरवाजे पर सिक्योरिटी गार्ड टार्च लिए खड़ा है। उसने उसे बाहर निकलने में मदद की।
बाहर निकल कर उस व्यक्ति ने सिक्योरिटी से पूछा “आपको कैसे पता चला कि मै फैक्ट्री के अंदर हूँ?”
गार्ड ने उत्तर दिया – “सर, इस प्लांट में 100 लोग कार्य करते हैँ पर सिर्फ एक आप ही हैँ जो मुझे सुबह आने पर हैलो व शाम को जाते समय बाय कहते हैँ। आज सुबह आप ड्यूटी पर आये थे पर शाम को आप बाहर नहीं गए। इससे मुझे शंका हुई और मैं देखने चला आया।”
वह व्यक्ति नहीं जानता था कि उसका किसी को छोटा सा सम्मान देना कभी उसका जीवन बचाएगा। उसने प्रसन्न मन से उसका धन्यवाद किया और अपने घर चला गया।
तो मित्रों, जब भी आप किसी से मिले, गर्मजोशी से मिले और प्यारी से मुस्कान के साथ उसका सम्मान करे। कभी भी किसी से घमंड या अभिमान से बात न करें। चाहे कोई आपसे उम्र या पद में छोटा हो या बड़ा सबसे एक समान व्यवहार करे। सबका सम्मान करें। आपका ये व्यवहार लोगो कि नज़रो में आपको सबसे अलग बना देगा और लोग हर परिस्तिथि में आपके साथ रहेंगे।
👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ३४)
अन्तर्यात्रा का विज्ञान जीवन के हर झूठ से जूझ रहे योग साधकों के लिए पथ प्रदीप है। योग साधना की डगर कब किस ओर मुड़ती है, इसके प्रकाश में साफ-साफ समझा जा सकता है। साधकों की राह में आने वाले प्रश्न-कंटकों को हटाने-बीनने की पूरी व्यवस्था इसके उजाले में सम्भव है। इसकी किरणें साधकों के अन्तर्मन के अँधियारे की घुटन और घबराहट को हटाती है। इससे साधकों में अपनी साधना के लिए हिम्मत और हौसला बढ़ता है।
चेतना के धरातल पर देखें, तो यह पुस्तक ऐसे हिम्मती साधकों एवं महान् गुरुओं के बीच निरन्तर चलने वाला रहस्यमय वार्तालाप है। महर्षि पतंजलि एवं परम पूज्य गुरुदेव स्वयं इस योग कथा के माध्यम से अगणित साधकों की भावनाओं को सुनते हैं और उन्हें अपनी योग अनुभूतियों के अमृत रस का भागीदार बनाते हैं। इस योग कथा के शब्द तो बस उनकी विचार तरंगों के माध्यम भर हैं। इससे अधिक और कुछ भी नहीं।
जब साधक के सामने सवाल आता है कि आखिर यह अभ्यास क्या है और इसे करें कैसे? तो महर्षि समाधान करते हुए अगला सूत्र कहते हैं-
तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः॥ १/१३॥
शब्दार्थ- तत्र= उन दोनों (अभ्यास और वैराग्य) में से, स्थितौ= चित्त की स्थिति में, यत्नः= यत्न करना, अभ्यासः= अभ्यास है। यानि कि इन दोनों में, चित्त की स्थिति में (स्वयं में दृढ़ता से) प्रतिष्ठित होने का प्रयास करना अभ्यास है। अभ्यास की सामान्य महिमा से तो हममें से प्रायः सभी परिचित हैं। छोटे बच्चों और गाँव के किसानों से लेकर विशिष्टों, वरिष्ठों एवं विशेषज्ञों तक इसकी महिमा का गुणगान करते हैं। ग्रामीण जीवन में अभ्यास के बारे में एक कहावत अक्सर सुनी जाती है- करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान। रसरी आवत जात है सिल पर परत निसान॥ अर्थात् अभ्यास करते-करते एकदम जड़मति भी सविज्ञ-सुजान हो जाते हैं। कुछ उसी तरह से जैसे निरन्तर रस्सी की रगड़ से पाषाण पर भी निशान पड़ जाते हैं। मनुष्य की सारी क्षमताएँ उसके अभ्यास का ही फल है। यहाँ-तक कि पशु-पक्षी भी अभ्यास के बलबूते ऐसे-ऐसे करतब दिखाने लगते हैं, जिन्हें देखकर दाँतों तले उँगली दबाने का मन करता है।
बाहरी जीवन में, लौकिक जीवन में अभ्यास के ढेरों चमत्कार हम रोज देखते हैं। खुद की निजी जिन्दगी में भी अभ्यास के अनेकों अनुभवों को हमने जब-तब अनुभव किया है। परन्तु यह अभ्यास आन्तरिक जीवन में, आध्यात्मिक जीवन में किस तरह किया जाय, यह बात समझना अभी बाकी है। आध्यात्मिक जीवन में- आन्तरिक प्रयास। एक ऐसी होशपूर्ण कोशिश, जिसका मतलब है कि इससे पहले हम बाहर बढ़ें, हमें भीतर बढ़ना चाहिए। पहले हमें अपने केन्द्र में स्थित होने का प्रयास करना चाहिए। पहले हम अपने केन्द्र में स्थित होकर विचार करें और फिर कुछ दूसरा निर्णय करें। यह इतनी बड़ी रूपान्तरकारी घटना है कि एक बार जब हम अपने भीतर केन्द्रित हो जाते हैं, तो सारी बात ही अलग दिखाई पड़ने लगती है, सारा का सारा परिदृश्य ही बदल जाता है।
.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ६४
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
👉 Think! Who are you?
SHIVOHUM (I am akin to Lord Shiva): Shiva means auspicious. Essentially I am a blessed person; so how can there be any place for evil in my thoughts, feelings or actions? If any inappropriate trait has stuck to me due to bad company/surroundings, it is foreign to my essential nature and I resolve to rid myself of this dross.
SACHCHIDANANDOHUM (My intrinsic Nature is – Truth – Consciousness - Bliss): Why should I be affected by falsehood? Why should I chase a mirage? I am innate bliss; why should I vainly seek happiness in the transient world?
AYMATMA BRAHMA (Thy soul is a Spark of Brahma (Divine)): As the ocean is water so also is a drop. Every ray of the Sun has the qualities of its Radiator. Howsoever small the Soul confined by the ego may seem it has the capacity of uniting with its origin – Brahma. Both tap and tank are capable of giving water. So why should I remain caged in the false sense of identity with the ego and feel miserable; why not become Omnipresent?
TATVAMASI (You are That): You inherit the attributes of the Supreme Soul and the whole creation is your embodiment.
We are sparks of the Eternal and Imperishable spirit and our souls are here on their upward path to immortality. The essence of our Being is the Supreme Spirit (Parmatma – Brahma) – the source of the creative cosmic play; and we are here to awaken to the Reality of true identity.
बुधवार, 23 सितंबर 2020
👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ३३)
मन के पार जाना, मन की वृत्तियों के चक्रव्यूह से उबरना है, तो उपाय दो ही है- अभ्यास और वैराग्य। जिस योग साधक के जीवन में ये दोनों तत्त्व हैं, उसकी सफलता निश्चित है। इनमें से एक का अभाव योग साधक को असफल बनाये बिना नहीं रहता। यदि अभ्यास है, पर वैराग्य नहीं है, तो जो भी साधना की जाती है, जो भी योग-ऊर्जा अवतरित होती है, वह सबकी सब विभिन्न इच्छाओं और आसक्तियों के छिद्रों से बह जाती है। साधक सदा खाली का खाली बना रहता है। इसी तरह केवल वैराग्य है, अभ्यास में दृढ़ता नहीं है, तो केवल आलस्य का अँधेरा ही जिन्दगी में घिरा रहता है। ऊर्जा, शक्ति, चैतन्यता की किरणें कहीं भी दिखाई नहीं देती। यही कारण है कि महर्षि दोनों की समन्वित आवश्यकता बताते हैं।
अभ्यास और वैराग्य को समन्वित रूप से अपनाने में साधना जीवन की सभी समस्याओं का एक साथ समाधान हो जाता है। प्रायः प्रायः सभी साधकों की साधनागत समस्याएँ एवं परेशानियाँ एक ही बिन्दु के इर्द-गिर्द घूमती रहती है - मन नहीं लगता, मन एक जगह में टिकता नहीं है। धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में अर्जुन ने विश्वम्भर कृष्ण से भी यही समस्या कही थी- ‘चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढ़म्’ - हे कृष्ण! यह मन बड़ा की चंचल है, बड़े ही प्रमथन स्वभाववाला और बहुत ही बलवान् है। अर्थात् मन की चंचलता ही इतनी बढ़ी-चढ़ी है कि किसी भी तरह काबू में ही नहीं आती। महारथी अर्जुन के इस सवाल को सुनकर भगवान् कृष्ण ने कहा-
‘असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥’ - गीता-६/३५
हे कुन्तीपुत्र महाबाहु अर्जुन! तुम्हारे इस कथन में कोई संशय नहीं है। इस मन की चंचलता किसी भी तरह से वश में आने वाली नहीं है। परन्तु अभ्यास और वैराग्य से इसे बड़ी आसानी से वश में किया जा सकता है। इसके बाद जगद्गुरु कृष्ण अर्जुन को चेताते हुए एक सूत्र और भी कहते हैं-
‘असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः॥’ - गीता-६/३६
अर्थात्- जिसके वश में मन नहीं है, ऐसे असंयत साधक के द्वारा योग में सफलता पाना अतिकठिन है, असम्भव है। जबकि जिन्होंने अपने मन को वश में कर लिया है, ऐसे साधक बड़ी आसानी से योग में सफल हो जाते हैं।
इस प्रकरण में प्रकारान्तर से भगवान् कृष्ण अभ्यास और वैराग्य की साधक के जीवन में अनिवार्य आवश्यकता बताते हैं। इन दोनों तत्त्वों को साधक का परिचय, पर्याय और पहचान भी कहा जा सकता है। यानि कि यदि कोई योग साधक है, तो उसके जीवन में साधनात्मक अभ्यास और वैराग्य होगा ही। इन दोनों के अभाव में साधक और उसकी साधना दोनों ही झूठे हैं।
.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ६१
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 April 2026
Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें। ➨ YouTube: https://yugrishi-erp....
























