शुक्रवार, 22 दिसंबर 2017

👉 अविवेकी प्रगतिशीलता

🔷 कस्बे में दो पडौसी थे, सोचविहारी और जडसुधारी, दोनो के घर एक दिवार से जुडे हुए,दोनो के घर के आगे बडा सा दालान। दोनो के बीच सम्वाद प्राय: काम आवश्यक संक्षिप्त सा होता था। बाकी बातें वे मन ही मन में सोच लिया करते थे।जाडे के दिन थे, आज रात उनकी अलाव तापने की इच्छा थी, दोनो ने लकडहारे से जलावन लकडी मंगा रखी थी।

🔶 देर शाम ठंडी के बढते ही दोनों ने अपने अपने यहाँ अलाव जलाने की तैयारियाँ शुरू की। सोचविहारी लकडीयां चुननें लगे, लकडियां चुनने में सोचविहारी को ज्यादा समय लगाते देख जडसुधारी ने पुछा- इतना समय क्यों लगा रहे है। सोचविहारी नें कहा- लकडियां गीली भी है और सूखी भी, मैं सूखी ढूंढ रहा हूँ। जडसुधारी बोले-गीली हो या सूखी जलाना ही तो है, सूखी के साथ गीली भी जल जायेगी। सोचविहारी नें संक्षिप्त में समझाने का प्रयास किया- सूखी जरा आराम से जल जाती है।

🔷 जडसुधारी नें तो अपने यहां, आनन फ़ानन में एक-मुस्त लकडियां लाई और नीचे सूखी घास का गुच्छा रखकर चिनगारी देते सोचने लगा- कैसे कैसे रूढ होते है, गीली लकडी में जान थोडे ही है जो छांटने बैठा है, सोचना क्या जब जलाने बैठे तो क्या गीली और क्या सूखी?लकडी बस लकडी ही तो है।

🔶 उधर सोचविहारी सूखी लकडी को चेताते सोचने लगा- अब इसे सारे कारण कम शब्दों में कैसे समझाउं गीली और सूखी साथ जलेगी तो ताप भी सही न देगी, भले कटी लकडी निर्जीव हो पर उसपर कीट आदि के आश्रय की सम्भावना है, मात्र थोडे परिश्रम के आलष्य में क्यों उन्हें जलाएं। और गीली जलेगी कम और धुंआ अधिक देगी। कैसे समझाएं, और समझाने गये तो समझ नाम से ही बिदक जायेगा। वह स्वयं को थोडे ही कम समझदार समझता है?

🔷 दोनो के अलाव चेत चुके थे। सोचविहारी मध्यम उज्ज्वल अग्नी में आराम से अलाव तापने लगे, उधर जडसुधारी जी अग्नी में फूंके मार मार कर हांफ़ रहे थे, जरा सी आग लग रही थी पर बेतहासा धुंआ उठ रहा था। तापना तो दूर धुंए में बैठना दूभर था।

🔶 जडसुधारी के अलाव का धुंआ, आनन्द से ताप रहे सोचविहारी के घर तक पहूंच रहा था और उन्हें भी परेशान विचलित किये दे रहा था। सोचविहारी चिल्लाए- मै न कहता था सूखी जलाओ…

🔷 जडसुधारी को लगा कि यह सोचविहारी हावी होने का प्रयास कर रहे है। वे भी गुर्राए- समझते नहीं, सदियों की जमी ठंड है,गर्म होने में समय लगता है। सब्र और श्रम होना चाहिए। सब कुछ चुट्कियों में नहीं हो जाता। आग होगी तो धुंआ भी होगा। देखना देर सबेर अलाव अवश्य जलेगा। कहकर जडसुधारी, धुंए और सोचविहारी के प्रश्नों से दूर रज़ाई में जा दुबके।

👉  प्रतीक:

🔷 सोचविहारी: परंपरा संस्कृति और विकास सुधार को सोच समझकर संतुलित कर चलने वाला व्यक्तित्व।

🔶 जडसुधारी: रूढि विकृति और संस्कृति को एक भाव नष्ट कर प्रगतिशील बनने वाला व्यक्तित्व।

🔷 अलाव: सभ्यता,विकास।

🔶 गीली लकडी: रूढियां, अंधविश्वास।

🔷 सूखी लकडी: सुसंस्कृति, आस्थाएं।

🔶 धुंआ : अपसंस्कृति का अंधकार

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 23 Dec 2017


👉 आज का सद्चिंतन 23 Dec 2017

👉 सत्य की किरण

🔶 सत्य की किरण भी पर्याप्त है। ग्रन्थों के अम्बार अपनी लाख कोशिशों के बावजूद जो नहीं कर पाते, सत्य की एक झलक आसानी से वह कर दिखाती है। अंधेरे में उजाला करने के लिए प्रकाश के ऊपर लिखे गए बड़े-बड़े ग्रन्थ किसी काम के नहीं, एक मिट्टी का छोटा सा दीया जलाना ही काफी है।

🔷 स्वामी विवेकानन्द की वार्त्ताओं और व्याख्यानों में एक अपढ़ बूढ़ा निरन्तर देखा जाता था। देखने वालों को हैरानी हुई। उनमें से कइयों ने सोचा कि भला एक अनपढ़ गरीब वृद्ध व्यक्ति स्वामी जी की गम्भीर वेदान्त चर्चा को भला क्या समझता होगा। एक ने आखिर में उससे पूछ ही लिया- बाबा, तुम्हारी समझ में कुछ आता भी है या फिर यूं ही अपना समय बर्बाद करते रहते हो?

🔶 उस गरीब वृद्ध व्यक्ति ने जो भी उत्तर दिया, वह अद्भुत था। उसने कहा- जो बातें मुझे नहीं समझ में आतीं, अब उनके बारे में मैं क्या बताऊँ। लेकिन एक बात मैं बखूबी समझ गया हूँ और पता नहीं दूसरे लोग उसे समझे भी हैं अथवा नहीं। फिर मैं तो अनपढ़-गंवार हूँ, बूढ़ा भी हूँ, मुझे बहुत सारी बातों से प्रयोजन भी क्या? मेरे लिए तो बस वह एक ही बात काफी है। और उस बात ने मेरा सारा जीवन ही बदल दिया है। अब न तो मुझे भय डराता है और न चिन्ताएँ सताती हैं। न तो अतीत की कोई कसक है, न वर्तमान की कोई परेशानी और न ही भविष्य की कोई चिन्ता बची है। बस आनन्द ही आनन्द है।

🔷 लोगों की जिज्ञासा बढ़ी- आखिर वह बात है क्या? उस वृद्ध व्यक्ति ने बताया, वह बात है कि मैं भी प्रभु से दूर नहीं हूँ। एक दरिद्र अज्ञानी बूढ़े से भी प्रभु दूर नहीं हैं। प्रभु निकट हैं- निकट ही नहीं स्वयं में हैं- इतने निकट कि हम दोनों बस एक ही हैं। यह छोटा सा सत्य मेरी नजर में आ गया है। और अब मैं नहीं समझता कि इससे भी बड़ा कोई सच हो सकता है।

🔶 सच भी यही है, जीवन बहुत तथ्य जानने से नहीं, बल्कि सत्य की एक छोटी सी अनुभूति से ही बदल जाता है। जो बहुत जानने में लगे रहते हैं, वे प्रायः सत्य की उस छोटी सी चिनगारी को गवाँ बैठते हैं, जो प्रकाश और परिवर्तन लाती है। और जिससे जीवन में बोध के नए आयाम खुलते हैं।

✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 102

👉 दुःखों का कारण और निवारण (अन्तिम भाग)

🔷 ‘‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयः, सर्वे भडारिक पश्यन्तु या कश्चिद्दुःख भाग्वेत्’’—का ऋषि सिद्धान्त लेकर चलने वालों को संसार में किसी प्रकार दुःख शेष नहीं रह जाता। इस सार्वभौमिक भाव से मनुष्य की स्वार्थपूर्ण संकीर्णता विस्तृत एवं व्यापक हो जाती है। वह अपने को पीछे रख कर दूसरों के हित के लिए सोचता है, दूसरों के लाभ के लिए काम करता है और दूसरों के कल्याण के लिए जीता है। हृदय में जब अपनत्व का स्थान सर्वत्व ले लेता है तो मनुष्य की अनुभूतियां भी उसकी नहीं रह जातीं। वह दूसरे के दुःख से दुःखी और दूसरे के सुख से सुखी होने लगता है। ऐसी दशा में परदुःख से कातर मनुष्य को उस कष्ट उस क्लेश में भी एक आध्यात्मिक सुख आध्यात्मिक सन्तोष मिला करता है। अपने को समष्टि में मिला देने पर तो दुःख का सर्वथा अभाव ही हो जाता है।

🔶 तथापि बहुत से लोगों यह प्रक्रिया कठिन तथा दुरूह दिखलाई दे सकती है। उनकी मनोभूमि इस योग्य न होना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। ऐसा हो सकता है। अस्तु मध्यम मनोभूमि वाले व्यक्तियों को मध्यम मार्ग का अवलम्बन ले ही लेना चाहिये। वह मध्यम मार्ग इस प्रकार का हो सकता है। अपनी स्थिति, शक्ति और अधिकार सीमा में रहकर वांछाएं की जायें। उन्हें पूरा करने का प्रयत्न किया जाये। फिर भी यदि उनमें से कोई अपूर्ण रह जायें तो इसे संसार की एक साधारण प्रक्रिया मानकर सन्तोष किया जाये। अनुकूल एवं प्रतिकूल दोनों अवस्थाओं में तटस्थ रहकर अपना कर्तव्य किया जाए और किसी वस्तु अथवा व्यक्ति के प्रति आसक्ति रखकर कोई अपेक्षा न की जाये। दुःख से बचने का यह मध्यम उपाय ऐसा नहीं है जो साधारण मनोभूमि वालों के लिए कठिन हो।

🔷 सामान्य मध्यम अथवा उच्च जो भी उपाय किया जा सके दुःख से बचने के लिए करना ही चाहिए—क्योंकि दुःखी रहना शैतान का काम है, मनुष्य का नहीं। हमारे लिये मानवोचित रीति-नीति अपनाकर ही चलना बुद्धिमानी भी है और कल्याणकारी भी।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अगस्त 1971 पृष्ठ 15
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1971/August/v1.15

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.4

👉 Amrit Chintan 23 Dec

🔶 There is always a purest and sacred most conciouness in every human body . This can also be called pure soul or a divine light or even God. This always guide one on the righteous path. This toven of divine light is always availably for every one. Unless one suppress is by his constant evil actions. This light is also known as ‘Ritambhara Pragya’.

🔷 Our aim and duties in this life can only be evaluated correctly when we know. What am I? Why we have come in this world and what for? We should always keep in our mind this question and work hard and sincerely to get answer for action believe on self is the key to get the solution your brave character and continuous efforts with a strong will one day surely you will attain the goal of life.

🔶 Good actions and service to downtrodden is that which shapes your future for realization of soul one has to free himself from the sins of his life and earn virtues. We should plan our way of life that what good or service we can do to others. Without serving the humanity and adopting ideality of life, realization is not possible.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 उच्चस्तरीय अध्यात्म साधना के तीन चरण (भाग 6)

🔶 बादलों को ईश्वर के उद्यान में उगे हुए सुरभित पुष्प माना जाय और उन्हें माली तरह सींचा, सँभाला जाय। अपनी संपदा, बुढ़ापे की लकड़ी वंश चलाने वाले उत्तराधिकारी, मात्र प्रियपात्र यदि उन्हें माना समझा जायेगा तो वे ही बालक बंधन रूप सिद्ध होंगे और लोक-परलोक में विविध विधि दुर्गति का करण बनेंगे। दृष्टिकोण का अंतर रहने के कारण एक व्यक्ति के लिए शिशु पोषण, परिवार पालन अपार उद्वेग उत्पन्न करेगा जब कि परिष्कृत चिंतन शैली से की गई परिवार सेवा-गृहस्थयोग साधना बन जाती है। पिता-माता भाई-बहिन आदि का भरा-पूरा कुटुंब किसी भावनाशील व्यक्ति के लिए अपने सद्गुणों के विकास के लिए विनिर्मित प्रयोगशाला ही सिद्ध होता है।
                  
🔷 इन थोड़े से व्यक्तियों की सुव्यवस्था बनाना एक छोटे राज्य का सुशासन चलाने के समान है। नेतृत्व, सुसंचालन, सुव्यवस्था की दिशा में किसने कितनी योग्यता प्राप्त की उसकी परीक्षा पारिवारिक जीवन में बरती गई रीति-नीति से होती है। जो उसमें उत्तीर्ण होते हैं उन्हें भगवान अधिक बड़े क्षेत्र का-अधिक महत्त्वपूर्ण उत्तरदायित्व सौंपते हैं। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए परिवार के लिए उपार्जन एवं सुविधा व्यवस्था में लगने वाला अधिकांश समय तथा मनोयोग नियोजित किया जाय तो घर ही तपोवन बन सकता है ऐसे लोगों को तपोवन में घर बनाने की आवश्यकता नहीं है।
    
🔶 शरीर को भगवान का मंदिर-भगवान के प्रयोजनों में काम आने वाला वाहन माना जाय और उसे स्वस्थ सुव्यवस्थित बनाने वाले क्रिया-कलाप अपनाये जाये तो शरीर यात्रा के लिए किया गया पुरुषार्थ प्रकाराँतर से ईश्वर की सेवा, पूजा स्तर का ही रहेगा। उपार्जन में यदि ईमानदारी, उचित लाभ, जनता की आवश्यकता पूर्ति, परिवार व्यवस्था के लिए श्रम एवं साधना के रूप में किया जाय तो वही व्यापार, नौकरी, कृषि, शिल्प, वृद्धि, श्रम आदि एक प्रकार से कर्मयोग का क्रिया-कृत्य ही माना जाएगा शरीर को यदि वासना, प्रदर्शन, अहंकार, अनाचार के लिए अनीति और उच्छृंखलता पूर्वक सजाया पोषा और बलिष्ठ कारक स्वार्थपरता की श्रेणी में गिना जाएगा भोजन यदि भगवान का प्रसाद, शरीर इंजन का ईंधन, क्षुधा रोग की औषधि की तरह किया जा रहा है तो वह परमार्थ है किंतु यदि चटोरेपन की लालसा से अनुपयुक्त आहार किया जा रहा है तो वही सामान्य दीखने वाली प्रक्रिया पाप परिणाम प्रस्तुत करेगी।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1973 पृष्ठ 6
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1973/January/v1.6

गुरुवार, 21 दिसंबर 2017

👉 दो प्रेम पारखी

🔶 बहुत प्राचीन काल की बात है। इस मथुरा नगरी में वासवदत्ता नामक एक वेश्या रहती थी। उसका रूप वैभव किसी महारानी से कम न था। देश-देशों के राजा उसके दरवाजे पर खाक छानने आते थे। जिस पर वह मुस्कुरा देती वही अपने को धन्य समझने लगता। ऐसी थी वह उर्वशी की अवतार वासवदत्ता।

🔷 एक दिन वह सोने-चाँदी से झिलमिलाते हुए रथ में बैठ कर नगर की सैर करने निकली। उसका वैभव कोई साधारण सा थोड़े ही था। जिस बाजार में उसकी दासी भी निकल जाती वह इत्रों की सुगंध से महक जाते। जब उसका झिलमिलाता हुआ रथ निकलता तो नगर निवासी अपना-अपना काम छोड़ कर सड़क के किनारे उसकी शोभा देखने खड़े हो जाते। उस दिन वह सैर को निकली थी। दर्शकों की भारी भीड़ सड़क के किनारे पंक्तिबद्ध होकर खड़ी थी। सब के मुख पर उसी के रूप वैभव की चर्चा थी।

🔶 नगर के एक पुराने खंडहर मुहल्ले की एक टूटी झोंपड़ी में एक युवक रहता था। नाम था उसका उपगुप्त। उसने गेरुए कपड़े नहीं पहने, फिर भी वह संन्यासी था। भिक्षा उसने नहीं माँगी, फिर भी आकाशी वृत्ति पर उसका भोजन निर्भर था। प्रेत की तरह घूमता, यक्ष की तरह गाता, बैताल की तरह कार्य करता और जनक की तरह कर्म योग की साधना करता। जन्म भूमि तो उसकी कहीं दूर देश थी, पर अब रहता यहीं था। बहुत कम लोग उसके बारे में कुछ जानते थे, पर इतना सब जानते थे कि यह आदर्शवादी युवक निर्मल चरित्र का है, ईश्वर भक्ति में लीन रहना और प्रेम का प्रचार करना इसका कार्य-क्रम है।

🔷 उस दिन उपगुप्त अपनी झोंपड़ी के दरवाजे पर बैठा हुआ तन्मय होकर कुछ गा रहा था। आत्म-विभोर होकर वह कुछ ऐसा कूक रहा था कि सुनने वालों के दिल हिलने लगे। मधुर स्वर के साथ मिली हुई आत्मानुभूति पुष्प के पराग की तरह फैलकर दूर-दूर तक के लोगों को मस्त बनाये दे रही थी।

🔶 वासवदत्ता की सवारी सन्ध्या होते-होते उस खंडहर मुहल्ले में पहुँची। गोधूलि वेला में उस दरिद्र उपनगर की झोंपड़ियों में दीपक टिमटिमाने लगे थे। वेश्या उन्हें उपेक्षा भाव से देखती जा रही थी कि उसके कानों में संगीत की वह मधुर लहरें जा पहुँची। वह कला की पारखी थी। इतना उच्च कोटि का गायन आज तक उसने न सुना था। उसकी आँखें वह स्थान तलाश करने लगीं। जहाँ से यह ध्वनि आ रही थी। सवारी धीरे 2 आगे बढ़ रही थी। स्वर क्रमशः निकट आ रहा था। आगे चलकर उसने देखा कि फूस की एक जीर्ण-शीर्ण झोंपड़ी का सुन्दर युवक आत्म विभोर होकर गा रहा है। वेश्या रथ में से उतर पड़ी, उसने निकट जाकर देखा कि देवताओं जैसे सुन्दर स्वरूप वाला एक भिक्षुक फटे चिथड़े पहने मिट्टी की चबूतरी पर बैठा है और बेसुध होकर गा रहा है। वेश्या ने कुछ कहना चाहा पर देखा कि यहाँ सुनने वाला कौन है। वह उलटे पाँवों वापिस लौट आई।

🔷 वासवदत्ता अपने शयन कक्ष में पड़ी हुई थी। बहुत रात बीत चुकी, पर नींद उसकी आँखों के पास न झाँकी। भिखारी का स्वर और स्वरूप उसके मन में बस गया था। इधर से उधर करवटें बदल रही थी पर चैन कहाँ? अब तक वह बड़े-बड़े कहलाने वाले अनेकों को उंगलियों पर नचा चुकी थी, पर आज जीवन में पहली बार उसने जाना कि ‘जी की जलन क्या होती है’। क्षण बीत रहे थे, उसका मन काबू से बाहर हो रहा था। युवक के चरणों पर अपने को समर्पण करने के लिए उसके सामने तड़फने लगे।

🔶 रात के दो बज चुके थे। वेश्या चुपचाप दासी को लेकर घर से बाहर निकल पड़ी। गली कूचों को पार करती हुई वह खंडहर मुहल्ले की उसी टूटी झोंपड़ी में पहुँची। युवक चटाई का फटा टुकड़ा बिछाये हुए जमीन पर सोया हुआ था। दासी ने धीरे से उसे जगाया और कहा- इस नगर की वैभवशालिनी अप्सरा वासवदत्ता आपके दर्शनों के लिये आई हैं।

🔷 उपगुप्त ने आँखें मलीं और चटाई पर बैठा हो गया। वासवदत्ता का ऐश्वर्य वह सुन चुका था। मुझ दरिद्र के यहाँ वह वैभवशालिनी आई है? क्यों आई है? मुझ से क्या प्रयोजन? एक बारगी अनेक प्रश्नों का ताँता उसके सामने उपस्थित हो गया? उसके मन में अविश्वास की भावना आई। कहीं स्वप्न तो नहीं देख रहा हूं? उपगुप्त बार-बार आँखें मल कर सामने खड़ी दो मूर्तियों को देखने लगा।

🔶 वासवदत्ता ने कहा प्यारे, सन्देह मत करो। बड़े-बड़े राजा-महाराजा जिसके चरणों पर लोटते हैं, वही वासवदत्ता आपको अपना हृदय समर्पण करने आई है। मेरा सारा वैभव आप के लिए समर्पित है। मैं आपकी दासी बनना चाहती हूँ। मेरे टूटे हुए दिल को जोड़ कर कृत-कृत्य कर दीजिए।

🔷 युवक को मानो साँप सूँघ गया हो, वह सन्न रह गया। उसने कहा--माता! तुम यह क्या कह रही हो। तुम्हारे मुख से यह कैसे शब्द निकल रहे हैं। मेरी आँखें स्त्री जाति को माता के ही रूप में देख सकती हैं। आपका पाप प्रस्ताव मुझे स्वीकार नहीं हो सकता।

🔶 वेश्या बोलने में बड़ी पटु थी। नाना प्रकार के तर्क और प्रलोभनों से उपगुप्त को प्रस्ताव स्वीकार कर लेने को समझाने लगी, परन्तु युवक टस से मस भी न हुआ। उसका जीवन एक साधना थी, उसमें इधर-उधर हिलने के लिए कोई गुँजाइश न थी। कोई प्रलोभन उसे डिगा न सका। वेश्या खिन्न होती हुई लौट आई।

🔷 एक अरसा बीत गया। वेश्या के शरीर में कोढ़ फूट गया। उसके अंग गल-गल कर गिरने लगे। अतुलित वैभव कुछ ही समय में न जाने कहाँ पलायन कर गया। उस पर मरने वालों में से कोई उधर आँख उठा कर भी नहीं देखता। यह दुरवस्था अधिक बढ़ी। उपचार के अभाव में उसके अंग सड़ने लगे। घावों में से कीड़े झरना आरम्भ हो गया।

🔶 ऐसी अवस्था में कौन उसके पास जाता; परन्तु उपगुप्त था, जो उसकी सेवा कर रहा था। दुर्गन्ध के मारे वहाँ जाने में नाक फटती थी, पर वह प्रसन्नता पूर्वक उसके घाव बाँधता, कपड़े धोता, मल-मूत्र उठाता। सगी माता की तरह उसने वेश्या की एकनिष्ठ सेवा की।

🔷 आज बीमारी बहुत बढ़ गई थी। वासवदत्ता मृत्यु के मुख में जा रही थी। उपगुप्त बैठा पंखा झल रहा था। रोगिणी ने अधखुले नेत्रों से उपगुप्त की ओर देखा और कहा—पुत्र! तेरा स्वर और संगीत मैंने जैसा परखा था, आज वैसा ही देख लिया। उपगुप्त ने उसके चरणों की धूलि मस्तक पर चढ़ाते हुए कहा—माता! तेरा सौंदर्य जैसा मैंने समझा था, आज तेरा पुत्र-भाव पाकर वैसा ही पा लिया।

🔶 उपगुप्त और वासवदत्ता आज इस लोक में नहीं हैं, पर मथुरा के निवासी जानते हैं कि वे दोनों सच्चे पारखी थे।

📖 अखण्ड ज्योति मई 1942

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 22 Dec 2017

👉 आज का सद्चिंतन 22 Dec 2017


👉 परिधि से केन्द्र की ओर

🔶 देह परिधि है और आत्मा अपने अस्तित्व का केन्द्र। परिधि से केन्द्र की ओर यात्रा करने से ही आध्यात्मिक विकास सुनिश्चित होता है। जो इस सच से अनजान हैं, वे सारे जीवन परिधि पर ही टिके रहते हैं। ऐसे आत्म विमुख लोगों के लिए देह और उससे जुड़े वैभव-भोग ही जीवन का सब कुछ बन जाते हैं। सांसारिक पद-प्रतिष्ठा के भ्रम एवं झूठे मान-यश के अंधेरों की चाहत ही उनकी चेतना को हर पल घेरे रहती है।

🔷 लेकिन ज्यों ही आत्मचेतना परिधि से केन्द्र की ओर मुड़ती है आध्यात्मिक-अन्तर्यात्रा प्रारम्भ हो जाती है। आत्मजिज्ञासा की पहली प्रकाश किरण का उजियारा जीवन में प्रवेश कर जाता है। परन्तु परिधि से केन्द्र की ओर इस यात्रा की शुरुआत कैसे हो? गिरीशचन्द्र घोष ने अपने सद्गुरु श्री रामकृष्ण देव से एक समय यही सवाल पूछा था।

🔶 उत्तर में परमहंस देव ने मुस्कराते हुए गिरीश बाबू को बड़ी ही ममता से छू लिया। परमहंस देव के इस अलौकिक स्पर्श से गिरीश बाबू रोमांचित हो उठे। वह कुछ बोल पाते, इससे पहले श्री रामकृष्ण देव ने उनसे कहा- ध्यान के समय, निद्रा की गोद में जाते समय मन ही मन मेरे इस स्पर्श को बड़ी ही प्रगाढ़ता से अनुभव करना और सोचना तेरी चेतना, तेरा समूचा अस्तित्व मुझमें, मेरी चेतना में विलीन हो रहा है।

🔷 बात छोटी सी है, परन्तु अभ्यास करने वाले के लिए इसके परिणाम बहुत बड़े हैं, क्योंकि मन ही मन सद्गुरु के स्पर्श की प्रगाढ़ रूप से होने वाली अनुभूति में देह से प्राण, प्राण से मन और मन से आत्मा की ओर अन्तर्चेतना गतिशील हो जाती है। इस अनोखे अभ्यास से सम्पन्न होने वाली अन्तर्यात्रा ने ही श्रीयुत गिरीशचन्द्र घोष को महात्मा बना दिया।

🔶 बाद के दिनों में वह अपने अनुभवों को अपने गुरुभाइयों से बताते हुए कहा करते- सर्वोत्तम ध्यान है- सद्गुरु के कृपापूर्ण स्पर्श का ध्यान। उनके स्पर्श के समय हुए अनुभव का ध्यान। इससे सहज ही अन्तर्चेतना देह की परिधि से अपने अस्तित्व के केन्द्र आत्मा की ओर बढ़ चलती है। और इसकी तीव्रता के अनुपात में ही आत्मशक्तियों का अलौकिक जागरण स्वयमेव होने लगता है।

✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 99

👉 दुःखों का कारण और निवारण (भाग 4)

🔷 दुःख का आधार अपनी अनुभूति विशेष को न मान कर किन्हीं बाह्य परिस्थितियों को मानना अज्ञान है। इस अज्ञान को दूर किए बिना यदि कोई चाहे कि दुःख से छुटकारा हो जाये तो यह सम्भव न होगा। अनुकूल परिस्थितियों में हर्षातिरेक के वशीभूत हो जाना और प्रतिकूलताओं में रोने-झींकने का स्वभाव स्वयं एक अज्ञान है। इससे मनुष्य का मस्तिष्क असन्तुलित सा हो जाता है। वह यथार्थ से हटकर अधिकतर भ्रम में ही भटकता और ठोकरें खाता रहता है। उसके ठीक-ठीक समझने और मूल्यांकन करने की क्षमता नष्ट हो जाती है। वह किसी बात में ठीक-ठीक यह नहीं समझ पाता कि जिन बातों में मैं दुःख मना रहा हूं वह दुःख के योग्य हैं भी या नहीं। असन्तुलित स्थिति में मनुष्य गलत-गलत सोचता और वैसा ही व्यवहार करता है, जिससे दुःख का उत्पन्न होना स्वाभाविक ही है।

🔶 दुःख के कारणों में आसक्ति भी एक बड़ा कारण है। यहां पर आसक्ति का एक मोटा-सा अर्थ यह लिया जा सकता है—अत्यधिक अपनेपन का लगाव। जिन बातों में अत्यधिक लगाव होता है, उनको सर्वथा अपने अनुकूल रखने की कामना रहती है किन्तु किसी भी वस्तु या व्यक्ति को हर स्थिति में सर्वथा अपने अनुकूल रख सकना संभव नहीं होता। वे अपनी गति में कभी किसी समय भी विपरीत दशा में घूम सकती हैं। ऐसी दशा में उनके प्रति अत्यधिक अपनत्व के कारण दुख की अनुभूति से बचा नहीं जा सकता। यदि वस्तुओं और व्यक्तियों का स्वतंत्र अस्तित्व स्वीकार किया जा सके और उन्हें सर्वथा अपने अनुकूल देखने की इच्छा का त्याग किया जा सके तो कोई कारण नहीं कि व्यर्थ में अनुभव होने वाले बहुत से दुःखों का सामना करना पड़े।

🔷 ऐसे लोग जो संसार नाटक के तट परिवर्तन से जल्दी प्रभावित नहीं होते दुःखों के आक्रमण से बचे रहते हैं। कामनाओं की पूर्ति के समय उल्लसित हो उठने और आपूर्ति के समय मलीन मन हो जाने का यदि अपना स्वभाव बदला जा सके तो दुःखों के बहुत से कारण आप से आप ही नष्ट हो जायें। यदि संसार में उदार गम्भीर और यथार्थ जीवन लेकर चला जा सके और आसक्ति के साथ अत्यधिक संवेदना को संक्षेप किया जा सके तो हमारी मनोभूमि निश्चय ही इतनी दृढ़, परिपक्व हो सकती है कि उस पर सुख-दुःख की कोई प्रतिक्रिया ही न हो।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अगस्त 1971 पृष्ठ 15

👉 Amrit Chintan 22 Dec

🔶 As long as there is prevalances of nasty traditions and group of social bad habits people no one can have peace in life. The individual social growning or prosperity will not get any stability. Every one’s happy life depends on the condition of society, he lives in that is why for our own happiness also we depend  on the good social atmosphere. Every one should try to work to create a civic society of good people around him.

🔷 Sadhana is to develop right way of thinking to develop ideality. He should also solve his probles at his level. This will give him a self Stand. If you grow on others help, this will make you crippled. It is no way good to depend on others for help at all stages of life. In absence of self  dependence one looses his self-respect in society.

🔶 It is subtle part of human body that holds the moral and desciplenary codes his wisdom. Honesty, responsibility and courage develop in that the direction. Can never be self-control but simultaneously he will look into that others interest or independace is not hurt.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 उच्चस्तरीय अध्यात्म साधना के तीन चरण (भाग 5)

🔶 भाव साधना का तीसरा चरण है- चिंतन। चिंतन अर्थात् शारीरिक गतिविधियों का आदर्शवादिता का और मानसिक हलचलों का उत्कृष्टता के आधार पर सुसंतुलित निर्धारण। इसके लिए प्रातःकाल उठते ही “हर दिन नया जनम-हर रात नई मौत” का तथ्य सामने रखकर आज की -समय परक और भाव परक दिनचर्या निर्धारित करनी चाहिए। एक ही दिन के लिए यह जनम है। आज ही रात की मृत्यु, निद्रा की गोदी में जाना है इसलिए ईश्वर प्रदत्त समय संपदा और भाव वैभव का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने के लिए-जीवन लाभ देने के लिए साहस पूर्वक तत्पर होना चाहिए। किसी भी व्यवधान को इस निर्धारण में बाधक नहीं होने देना चाहिए।
                  
🔷 प्रातःकाल से लेकर सोने के समय तक की समयचर्या निर्धारित करनी चाहिए। नित्य कर्म, विश्राम, उपार्जन से लेकर परमार्थ प्रयोजनों तक के लिए उचित रीति से समय विभाजन किया जाय। उपार्जन के और परिवार पोषण के उत्तरदायित्व अभी जिनके कंधों पर पर हैं उन्हें भी आठ घंटा कमाने के लिए, छः घंटा सोने के लिए, चार घंटा नित्य नैमित्तिक कर्मों के लिए लगाकर साँसारिक प्रयोजनों के लिए अधिकतम 20 घंटे ही खर्च करने चाहिए। शेष 4 घंटे जीवनोद्देश्य की पूर्ति में लगाने चाहिए।
    
🔶 हर क्रिया के साथ एक विचारणा अनिवार्य रूप से जुड़ी रहती है। क्या कार्य, किस लाभ प्रयोजन के लिए किया जा रहा है, उसमें रुचि या उत्साह किसलिए है, इसका कुछ न कुछ कारण आकर्षण होना ही चाहिए। मनोगत आकांक्षा और शरीरगत क्रिया दोनों के सम्मिश्रण से समग्र कर्म बनता है, उसी के आधार पर संस्कार बनते हैं पाप पुण्य का निर्धारण होता है और कर्मफल की प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है। भाव रहित क्रिया तो मात्र उछल कूद भर होती है। हमें अपने पर क्रिया-कलाप के साथ उच्च आदर्शों से भरी-पूरी भावना नियोजित रखनी चाहिए, पत्नी को अपने संरक्षण में रखी गई ईश्वर की पुत्री समझा जाना चाहिए और वह पिता के घर से जिस स्थिति में आई थी उसकी अपेक्षा अधिक स्वस्थ, सुयोग्य, सुविकसित, प्रसन्न, प्रफुल्लित बनाने का प्रयास निरंतर करते रहने की बात सोचनी चाहिए। यदि उसके प्रति कर्तव्य, स्नेह, सौजन्य बरसाया जाता रहा तो वह पत्नी भौतिक सुविधा और आत्मिक प्रगति की दोनों ही दृष्टि से बड़ी सुखद, श्रेयस्कर सिद्ध होगी।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1973 पृष्ठ 5
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1973/January/v1.5

👉 दुःखों का कारण और निवारण (भाग 3)

🔷 दुःख के कुछ मनोवैज्ञानिक कारण भी हैं। उनमें से एक संवेदनशीलता भी है। यों तो सामान्य रूप में संवेदनशीलता एक गुण है। किन्तु जब यह औचित्य की सीमा से परे निकल जाती है तब दुर्गुण बन जाती है जिसका परिणाम दुःख ही होता है। अति संवेदनशील व्यक्ति का हृदय भावुकता के कारण बड़ा निर्बल हो जाता है। वह यथार्थ दुःख तो दूर काल्पनिक दुःखों से भी व्यग्र एवं व्याकुल होता रहता है। इस क्षण-क्षण बदलते रहने वाले संसार का एक साधारण-सा थपेड़ा ही उन्हें व्याकुल कर देने के लिए बहुत होता है। क्षण-क्षण परिवर्तित और बनने बिगड़ने वाले पदार्थ, परिस्थितियों और संयोगों के प्रभाव से सुरक्षित रह सकना उनके वश की बात नहीं होती। उन्हें संसार की एक नगण्य सी परिस्थिति झकझोर कर रख देती है और वे क्षुब्ध होकर दुःख अनुभव करने लगते हैं।

🔶 इस प्रकार के संवेदनशील व्यक्ति भावुकता के कारण अपनी ही एक काल्पनिक दुनिया बनाए और उसमें ही विचरण करते रहते हैं। विशेषता यह होती है कि उनकी वह काल्पनिक दुनिया इस यथार्थ संसार से सर्वथा भिन्न होती है। होना भी चाहिए यदि उनका संसार इस संसार से भिन्न न हो तो उसके बनाने का प्रयोजन ही क्या रह जाता है? इस भिन्नता के कारण इस यथार्थ संसार और उनकी काल्पनिक दुनिया में टकराव पैदा होता रहता है। कमजोर एवं निराधार होने से उनकी दुनिया टूटती है, जिसके शोक में वे दुःखी और व्यग्र होते रहते हैं। यदि मनुष्य भावुकता का परित्याग कर, यथार्थ के कठोर धरातल पर ही रहे, उसी के अनुसार व्यवहार करे, हर तरह की आने वाली परिस्थिति को संसार का स्वाभाविक क्रम समझकर खुशी-खुशी स्वागत करने को तत्पर रहे तो वह बहुत कुछ दुःख के आक्रमण से अपनी रक्षा कर सकता है।

🔷 अज्ञान को तो सारे दुःखों का मूल ही माना गया है। मनुष्य को अधिकांश दुःख तो उसके अज्ञान के कारण ही होते हैं। सुख-दुःखों के विषय में यदि मनुष्य का अज्ञान दूर हो जाये तो वह एक बड़ी सीमा तक दुःखों से छुटकारा पा सकता है। सुख-दुःख का अपना कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं है। उनका अनुभव भ्रम अथवा अज्ञान के कारण ही होता है। यदि मनुष्य एक बार यह समझ सके और विश्वास कर सके कि सुख-दुःखों का सम्बन्ध किन्हीं बाह्य परिस्थितियों से नहीं है, यह मनुष्य की अपनी अनुभूति विशेष के ही परिणाम होते हैं तो शायद वह उनसे उतना प्रभावित न हो जितना कि होता रहता है। मनुष्य की मान्यता, कल्पना, अनुभूति विशेष और उसकी अपनी मानसिक अवस्था से ही सुख-दुःख का जन्म होता है। यदि इन अवस्थाओं में अनुकूल परिवर्तन लाया जा सके तो दुःख से छूटने की सम्भावना कोई काल्पनिक बात नहीं है। यदि मनुष्य के दुःखों का सम्बन्ध बाह्य परिस्थितियों से होता तो उनका प्रभाव सब पर एक समान ही पड़ना चाहिए! किन्तु ऐसा होता नहीं है। जिन एक तरह की परिस्थितियों में कोई एक दुःख और शोक का अनुभव करता है, उन्हीं परिस्थितियों में दूसरा हर्षित और प्रसन्न होता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अगस्त 1971 पृष्ठ 14
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1971/August/v1.14

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.4

👉 Amrit Chintan

🔶 Your utmost devotion for the ideality in life can only be achieved by constant practice of self control on vices and weakness of life. God worship is a practice to develop high emotions. Towards all the living unit. Of the world.  Human intellect or any limit of knowledge can not discriminate so precisely between right and wrong at all level. A devotee develop the right vistion of life for which he has come. 

🔷 Our normal  good action is routine life is not enough to wipe off the deep impression on ‘chitt’. Gone they can only be nullified by spiritual practice of penance and austerity. These practices dilute the reactions and also awaken the potential divine centers in human body. Finally these practices also lead to the final aim of life. That is God realization.

🔶 By sitting and worshipping God is to express own faults and Sins and commiting not to repeat them and not pleasing God by flower or food. The aim of God worship is to rectify our bad habits and ill-actions in the future life. The people do follow ritual actions and does not follow the philosophy behind.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 उच्चस्तरीय अध्यात्म साधना के तीन चरण (भाग 4)

🔶 मृत्यु को, आयुष्य की क्षण भंगुरता को, विषयों की मृग मरीचिका को , कुछ भी साथ न जाने वाले वैभव की निरर्थकता को यदि मनुष्य गंभीरतापूर्वक समझे तो उसकी आँखें खुले कि क्या करना चाहिए था और क्या किया जा रहा है? किधर चलना चाहिए था और किधर चला जा रहा हैं। जीवन और मृत्यु दोनों एक दूसरे के साथ इस प्रकार जुड़े हुए हैं कि किसी के कभी भी नीचे ऊपर होने में तनिक भी आश्चर्य नहीं किया जाना चाहिए। यह वस्तुस्थिति समझ में आये तो हर व्यक्ति अपने बहुमूल्य क्षणों का ठीक प्रकार उपयोग करना सीखे, और उन निरर्थक बाल-क्रीड़ाओं में न उलझे जिनमें आमतौर से लोग अपने को घुलाये भुलाये रहते हैं। मृत्यु की विस्मृति ही वह कारण है जिसने नर जनम के श्रेष्ठतम सदुपयोग के प्रति उदासीनता उत्पन्न कर रखी है।
                  
🔷 मनन का दूसरा अर्थ है- आत्मबोध। अपना वास्तविक स्वरूप, जीवन का उद्देश्य, शरीर और आत्मा का संबंध , श्रेय और प्रेय में से एक का चुनाव-अपनी गतिविधियों और रीति-नीतियों का सुनियोजित निर्धारण जैसे अनेक महत्त्वपूर्ण निर्णय इसी केंद्र पर टिके हुए हैं कि आत्मबोध हुआ या नहीं यह चेतना जब तक जगेगी नहीं तब तक लोभ और मोह की लिप्सा प्रचंड ही बनी रहेगी, तृष्णा और वासना की प्रबलता उभरी ही रहेगी, माया पाश के भव-बंधनों छुटकारा मिलेगा ही नहीं, फलतः व्यथा वेदनाओं में झुलसते रहने की दुर्गति से छुटकारा भी नहीं मिलेगा। यदि आत्मबोध का लाभ न मिल सका तो समझना चाहिए कि मानव जीवन उद्देश्य और आनंद हाथ से चला गया।
     
🔶 भजन अर्थात् ईश्वरीय सत्ता के साथ आत्म सत्ता का समीकरण-परस्पर विलय समन्वय की अनुभूति। मनन अर्थात् आत्मबोध। शरीर और आत्मा के स्वार्थों और संबंधों का पृथक्करण जीवन-लक्ष्य के प्रति आस्था और रीति-नीति का साहस पूर्वक निर्धारण। दोनों की साधना विधियाँ सरल है। एक ही समय या पृथक-पृथक सुविधा के समय और शांत एकांत स्थान में, सुसंतुलित चित्त से यह दोनों ध्यान, चिंतन, किये जा सकते हैं। भावनाओं की जितनी गहराई इनमें लगेगी उतनी ही अंतर्ज्योति प्रखर होती चली जायेगी और आत्मा के साथ परमात्मा का प्रणय परिणाम होने पर जिन दिव्य संपदाओं की उपलब्धि होनी चाहिए वे सहज ही करतल गत होती चली जायेगी।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1973 पृष्ठ 4
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1973/January/v1.4

👉 आज का सद्चिंतन 21 Dec 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 21 Dec 2017

मंगलवार, 19 दिसंबर 2017

👉 बहता पानी और चलते विचार

🔷 एक दिन ऋषिवर शिष्य को एक खेत पर लेकर गये जहाँ एक किसान बहती हुई नहर से पानी को रास्ता बनाकर खेत तक ले जा रहा था और ऋषिवर ने वो दृश्य शिष्य को बड़ी गहराई से दिखाया और फिर कहा!

🔶 ऋषिवर - वत्स इस बहते हुये पानी को यदि सही दिशा मिल जायें तो ये पानी खेत तक जाकर वहाँ की फसल को निहाल कर देगी और यदि आप इस पानी को सही दिशा न दोगे तो पानी तो अपना रास्ता स्वयं बनाकर इधरउधर व्यर्थता मे चला जायेगा और खेत की सारी फसल बर्बाद हो जायेगी!

🔷 शिष्य - जी गुरुदेव!

🔶 आगे ऋषिवर ने कहा - वत्स जिस तरह से बहते हुये पानी को सही दिशा देना जरूरी है उसी तरह से चलते हुये विचारों को सही दिशा देना बहुत जरूरी है और विचार कभी नही रुक सकते है वो निरन्तर चलते रहेंगे! विचारों को दिशा देना आपके अपने हाथ मे है तुम चाहो तो उन्हे आध्यात्मिक राह दे दो और तुम चाहो तो उन्हे भोगीयो की राह दे दो! विचार और मन का बहुत गहरा सम्बन्ध है मन वही जायेगा जहाँ उसे विचार लेके जायेंगे इसलिये हमेशा पवित्र और आध्यात्मिक विचारों से ओतप्रोत रहो ताकि मन ईष्ट मे लगे इस मन को येनकेन प्रकारेण ईष्ट के श्री चरणों मे लगाओ साधना, सत्संग, भजन, कथा, स्वाध्याय और भी जिस भी तरीके से ये ईष्ट मे रमे उसे ईष्ट मे रमाओ क्योंकि यदि तुमने विचारों को सही दिशा प्रदान न की तो विचार और फिर मन गलत दिशा मे चला जायेगा!

🔷 पहले विचार आयेगा फिर कर्म शुरू होगा फ़िर आगे की राह बनेगी और फिर सफलता असफलता मिलेगी! विचारों से ही पराया भी अपना हो जाता है और विचारों से ही अपने भी पराये हो जाते है! हॆ वत्स ये कभी न भुलना की विचार एक महाशक्ति है सकारात्मक विचारधारा एक वरदान है और नकारात्मक विचारधारा एक महाअभिशाप है! समान विचारों से ही रिश्तें युगों युगों तक रहते है और ऐसा कहते है की नही कहते है की भाई मेरे और उसके विचार एक दुसरे से नही मिलते है इसलिये हम दोनो के रास्ते अलगअलग है इसलिये अपने विचारों को अध्यात्मिक राह की और मोड़ देना क्योंकि जब विचारों को सही राह मिल जायेगी तो मन भी सही जगह लग जायेगा और ईष्ट और गुरू चरण के अतिरिक्त इस मन को कही पर भी शान्ति न मिलेगी।

🔶 इसलिये वत्स अपना तन, अपना मन और अपना धन बस अच्छे विचारों मे लगा देना क्योंकि सच्ची सफलता और आत्मशान्ति हमेशा अच्छे विचारों से आती है, और अच्छे विचार के लिये निरन्तर अच्छे लोगों के सम्पर्क मे रहना क्योंकि निरन्तर अच्छे लोगों के सम्पर्क मे रहने से जीवन मे अच्छे विचार ज़रूर आते है!

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 20 Dec 2017


👉 आज का सद्चिंतन 20 Dec 2017


👉 दुःखों का कारण और निवारण (भाग 2)

🔷 दुःख का एक स्थूल-सा कारण है वांछा का विरोध। जो हम चाहते हैं उसको न पा सकने पर जो क्षोभ अथवा निराशा होती है वही दुःख रूप में अनुभव होती है। मनुष्य को समझना चाहिए कि किसी की सभी वांछाएं कभी पूरी नहीं होतीं। वांछाएं वे ही पूरी होती हैं जो उचित और उपयुक्त होती हैं। किन्तु अज्ञानी व्यक्ति इसका विचार न कर अपनी वांछाएं बढ़ाते चले जाते हैं, और चाहते हैं कि वे सब बिना विरोध के पूरी होती रहें। ऐसे आदमी यह नहीं सोच पाते कि इस संसार में और दूसरे लोग भी हैं। उनकी भी अपनी कुछ वांछाएं होती हैं, जिनकी पूर्ति का अधिकार उन्हें भी है। यदि किसी एक की ही सारी वांछाएं पूरी होती रहें तो क्या दूसरे लोग अपनी वांछा पूर्ति के अधिकार से वंचित न रह जायेंगे? किसी एक की सारी वांछाएं पूरी होती रहें यह सम्भव नहीं।

🔶 किन्तु स्वार्थी मनुष्य जिनको केवल अपनेपन का ही ध्यान रहता है इस न्याय पर ध्यान नहीं दे पाते। उन्हें अपना स्वार्थ, अपना हित और अपना लाभ ही दीखता रहता है। दूसरों के हित-अहित, हानि-लाभ से जैसे कोई मतलब ही नहीं रखते। ऐसे संकीर्णमना व्यक्तियों का दुःखी रहना स्वाभाविक ही है। वे स्वार्थ पूर्ण वांछाएं करते ही रहेंगे वे असफल और अपूर्ण होती रहेंगी, उनके मन में क्षोभ और निराशा उत्पन्न होगी और जिसके फलस्वरूप वे दुःख अनुभव ही करते रहेंगे। इस क्रम में न बाधा आ सकती है और न व्यवधान।

🔷 ऐसे संकीर्ण, स्वार्थ, लिप्सु और हीन-भावना वाले किसी भी व्यक्ति से मिलकर, फिर चाहे वह अमीर हो या गरीब, सम्पन्न हो अथवा अभावग्रस्त, पढ़ा हो अथवा अनपढ़, स्त्री हो या पुरुष मालूम किया जा सकता है कि क्या वह अपने में जरा भी सुखी है? निश्चय ही वह दुःखी ही निकलेगा। विश्वासपूर्वक पूछने पर वह बतलायेगा कि वह बहुत दुःखी है, सारा संसार उसे दुःख क्लेशों से परिपूर्ण विदित होता है। निश्चय ही ऐसे लोगों के दुःख का कारण उनकी हीन और स्वार्थपूर्ण भावनायें ही होती हैं। दुःख दुर्भावनाओं के कारण होता है। दुर्भावना रखने वाला शैतान ही तो माना गया है, इसलिये महात्मा फ्रांसिस ने कहा है—‘दुःखी रहना शैतान का काम है।’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अगस्त 1971 पृष्ठ 14
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1971/August/v1.14

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.4

👉 Buddha Derives Inspiration from a Bug

🔶 Buddha had not yet obtained self-realization. He was engaged in intense penance. His mind was restless. A thought crossed his mind, "Despite trying very hard, I have failed to attain the objective of self realization. Instead of wasting away all this time in penance, I should have enjoyed my princely life in the palace." 

🔷 All of a sudden he saw a tiny bug trying to climb up a nearby tree. The bug tried again and again but would fall off. Still it would not give up. It tried ten times but failed. On the eleventh attempt it successfully climbed up the tree. It appeared as if this scene was enacted just for the guidance of Buddha. The self-belief in him woke up, and he continued his penance with great conviction and ultimately attained his objective of self realization. He then applied his wisdom for guiding the society on the virtuous path.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 उच्चस्तरीय अध्यात्म साधना के तीन चरण (भाग 3)

🔶 इस संयोग की वेला में आनन्दानुभूति उठानी चाहिए। माता पुत्र का -प्रेमी प्रेयसी का मिलन जितना सुखद होता है उससे भी अधिक तृप्तिदायक यह आत्म परमात्म मिलन है। इस मिलन की प्रतिक्रिया को भी अनुभूति में उतारना चाहिए। शरीर और मन परमेश्वर को समर्पित किया गया ओर उसे स्वीकार कर लिया। इसके बाद यही होना चाहिए कि अपना काय कलेवर पूर्णतया परमेश्वर की इच्छानुसार गतिशील रहे। अपनी कोई इच्छा में अपनी इच्छा मिलनी जाय। परमेश्वर जिसमें प्रसन्न हो वो सोचना और वही करना सच्चे भजन परायण भक्त के लिए उचित है। बदला पाने के लिए-किया गया भजन तो वेश्यावृत्ति है।
                  
🔷 कहा जा चुका है कि भावनात्मक साधनाओं के लिए संध्या वंदन की तरह ब्रह्ममुहूर्त का बंधन नहीं है। उसे सुविधानुसार नित्य उपासन के साथ या आगे पीछे किया जा सकता है। यही बात मनन साधना पर लागू होती है। वातावरण शांत और स्थान एकांत होना चाहिए। आँखें बंद करे आराम कुर्सी पर पड़े हुए यह सोचना चाहिए कि -”शरीर मृत अवस्था में पड़ा है और प्राण उसमें से निकल कर किसी ऊँचे स्थान पर हंस पक्षी की तरह जा बैठा। अब पड़ी हुई लाश के अंग-प्रत्यंगों को पोस्टमार्टम के समय उघाड़े गये अवयवों की तरह उलटना-पलटना चाहिए और समझना चाहिए कि कपड़ों से भरी हुई पेटी की तरह ही यह काया अपने सामयिक उपयोग के लिए मिली थी। इसी प्रकार मस्तिष्क को एक छोटे डिब्बे की तरह खोलकर देखना चाहिए कि उसमें मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के चार आभूषण, उपकरण औजार सुसज्जित रखे थे।”
     
🔶 इस ध्यान को जितनी गहराई से जितनी देर किया जा सके उतना संभव हो करना चाहिए और इस निष्कर्ष पर पहुँचना चाहिए कि प्राण-हंस की आत्म सत्ता सर्वथा स्वतंत्र है। शरीर की वस्त्र पेटी और मस्तिष्क की उपकरण पिटारी, जीवन रथ के दो अश्व वाहनों की तरह थी। काल कलेवर लक्ष्य पूर्ति के लिए आत्म-कल्याण के लक्ष्य को तिलाञ्जलि नहीं दी जानी चाहिए।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1973 पृष्ठ 4
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1973/January/v1.4

👉 हमारी वसीयत और विरासत (अन्तिम भाग )

🌹  आत्मीय जनों से अनुरोध एवं उन्हें आश्वासन

🔷 बच्चे बड़ों से कुछ चाहते हैं, सो ठीक है, पर बड़े बदले में कुछ न चाहते हों ऐसी बात भी नहीं। नियत स्थान पर मल-मूत्र त्यागने, शिष्टाचार समझने, हँसने-हँसाने, वस्तुएँ न बिखरने देने, पढ़ने जाने जैसी अपेक्षाएँ वे भी करते हैं। जितना सम्भव है, उतना तो उन्हें भी करना चाहिए। हमारी अपेक्षाएँ भी ऐसी ही हैं। गोवर्धन उठाने वाले ने अपने अनगढ़ ग्वाल बालों के सहारे ही गोवर्धन उठाकर दिखाया था। हनुमान की बात किसी ने नहीं सुनी तो अपने सहचर रीछ-वानरों को ही समेट लाए। नव-निर्माण के कन्धे पर लदे उत्तरदायित्व को वहन करने में हम अकेले ही समर्थ नहीं हो सकते थे। यह मिल-जुलकर सम्पन्न हो सकने वाला कार्य था। सो समझदारों में से कोई हाथ न लगा तो अपने इसी बाल-परिवार को लेकर जुट पड़े और जो कुछ, जितना-कुछ सम्भव हो सका करते रहे। अब तक की प्रगति का यही सार संक्षेप है।

🔶 बात अगले दिनों की आती है। हमें अपने बच्चों के लिए क्या करना चाहिए। इस कर्तव्य उत्तरदायित्व का सदा ध्यान रहा है और जब तक चेतना का अस्तित्व है, उसका स्मरण दिलाने योग्य बात एक ही है कि हमारी आकाँक्षा और आवश्यकता को भुला न दिया जाए। समय विकट है। इसमें प्रत्येक परिजन का समयदान और अंशदान हमें चाहिए। जितना मिलता रहा है, उससे भी अधिक मात्रा में, क्योंकि जो करना है, उसके लिए तत्काल कदम उठाने हैं। सो भी बड़े कामों के लिए बड़े-बड़े लोग चाहिए, बड़े साधन भी। हमारे परिवार का हर व्यक्ति बड़ा है। छोटेपन का तो उसने मुखौटा भर पहन रखा है। उतारने भर की देर है कि उसका असली चेहरा दृष्टिगोचर होगा। भेड़ों के समूह में पले सिंह शावक की कथा अपने प्रज्ञा परिजनों में से प्रत्येक के ऊपर लागू होती है या हो सकती है।

🔷 हमें हमारे मार्गदर्शक ने एक पल में क्षुद्रता झटक कर महानता का परिधान पहना दिया था। इस काया कल्प में मात्र इतना ही हुआ था कि लोभ, मोह की कीचड़ से उबरना पड़ा। जिस-तिस के सत्परामर्शों आग्रहों की उपेक्षा करनी पड़ी और आत्मा-परमात्मा के संयुक्त निर्णय को शिरोधार्य करने का साहस जुटाना पड़ा है। एकाकी चलने का आत्मविश्वास जागा और आदर्शों को भगवान् मानकर कदम बढ़े। इसके बाद एकाकी नहीं रहना पड़ा और न साधनहीन, उपेक्षित स्थिति का कभी आभास हुआ। सत्य का अवलम्बन अपनाने भर की देर थी कि असत्य का कुहासा अनायास ही हटता चला गया।

🔶 हमारा परिजनों से यही अनुरोध है कि हमारी जीवनचर्या को घटना क्रम की दृष्टि से नहीं वरन् पर्यवेक्षक की दृष्टि से पढ़ा जाना चाहिए कि उसमें दैवी अनुग्रह के अवतरण होने से ‘‘साधना से सिद्धि’’ वाला प्रसंग जुड़ा या नहीं। इसी प्रकार यह भी दृष्टव्य है कि दूसरों के अवलंबन योग्य आध्यात्मिकता का प्रस्तुतीकरण करते हुए हमारे कदम ऋषि परम्परा अपनाने के लिए बढ़े या नहीं? जिसे जितनी यथार्थता मिले वह उतनी ही मात्रा में यह अनुमान लगाए कि अध्यात्म विज्ञान का वास्तविक स्वरूप यही है। आंतरिक पवित्रता और बहिरंग की प्रखरता में जो जितना आदर्शवादी समन्वय कर सकेगा, वह उन विभूतियों से लाभान्वित होगा जो अध्यात्म तत्त्वज्ञान एवं क्रिया-विज्ञान के साथ जोड़ी और बताई गई है।




🔷 अपने अनन्य आत्मीय प्रज्ञा परिजनों में से प्रत्येक के नाम हमारी यही वसीयत और विरासत हैं कि हमारे जीवन से कुछ सीखें। कदमों की यथार्थता खोजें, सफलता जाँचें और जिससे जितना बन पड़े अनुकरण का, अनुगमन का प्रयास करें। यह नफे का सौदा है, घाटे का नहीं।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.196

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.23

सोमवार, 18 दिसंबर 2017

👉 आदेश की विचित्र पालना, एक उलझन मे एक सुलझन मे

🔷 एक बार एक महात्मा जी के दरबार मे एक राहगीर आया और उसने पुछा की हॆ महात्मन सद्गुरु की आज्ञा का पालन कैसे करना चाहिये?

🔶 महात्मा जी ने कहा की बहुत समय पहले की बात है की दो राज्य बिल्कुल पास पास मे थे एक राज्य बहुत बड़ा और एक राज्य छोटा था! बड़े राज्य के पास अच्छीखासी सेना थी और छोटे राज्य के पास ठीक ठाक सेना थी!

🔷 बड़े राज्य के राजा विजय प्रताप के मन मे पाप आया की क्यों न इस छोटे राज्य को अपने राज्य मे शामिल कर लिया जायें और उसने छोटे राज्य पर आक्रमण करने की तैयारी शुरू कर दी इधर छोटे राज्य के राजा धर्मराज अपने गुरुवर के पास गये!

🔶 और उधर विजयप्रताप को उनके गुरू ने समझाया की बेटा युध्द से पहले एक बार अपना दूत वहाँ भेजकर धर्मराज जी को समझा दो की वो आत्मसमर्पण कर दे तो बड़ी जनहानी रुक जायेगी और बिना युध्द के आपका काम हो जायेगा और एक बात का ध्यान रखना की वहाँ उसे भेजना जो आपके लिये सबसे अहम हो और वहाँ की पलपल की जानकारी आपको दे सके!

🔷 राजा ने सोचा मेरे लिये सबसे अहम तो मैं ही हुं और विजयप्रताप स्वयं भेश बदलकर गये! राजा धर्मराज और राजा विजयप्रताप एक ऊँची पहाडी पर माँ काली के मन्दिर मे मिले राजा विजयप्रताप ने अपना प्रस्ताव रखा तो राजा धर्मराज ने कहा हॆ देव पहले आप मेरी एक बात सुनिये फिर आप कहोगे तो मैं आपका प्रस्ताव मान लूँगा और राजा धर्मराज जी ने ताली बजाई एक सैनिक आया धर्मराज जी ने कहा जाओ उस पहाडी से नीचे कुद जाओ सैनिक भागकर गया और पहाडी से नीचे जा कुदा फिर धर्मराज ने ताली बजाई एक सैनिक आया और राजा ने वही कहा और सैनिक पहाडी से नीचे जा कुदा हॆ वत्स इस तरह धर्मराज जी ने तीन बार ताली बजाई सैनिक आये और इस तरह सैनिक बिना कुछ कहे पहाडी से जा कुदे!

🔶 विजयप्रताप ने कहा अरे ये कैसा पागलपन तो धर्मराज जी ने कहा हॆ मित्र जब तक ऐसे स्वामी भक्त योद्धा हमारे पास है तब तक हम कभी हार स्वीकार नही कर सकते और राजा विजयप्रताप तत्काल उठे अपने राज्य पहुँचे और उन्होंने भी वैसे ही किया पर कोई भी पहाडी से न कुदा सब तर्क-कुतर्क करने लगे फिर राजा तत्काल धर्मराज जी के पास पहुँचे और उन्होंने धर्मराज जी के आगे अपना मस्तक झुका दिया!

🔷 राहगीर - ऐसे स्वामी-भक्त सैनिक बड़े ही आदरणीय और दुर्लभ है देव!

🔶 महात्मा - हाँ वत्स यही तो मैं आपसे कह रहा हुं की जब सद्गुरु कुछ कहे तो बिना कुछ बोले उसकी पालना कर लेना बड़े लाभ मे रहोगे! महात्मा जी ने आगे कहा की ये तीन सैनिक और कोई नही है ये तीन तन, मन और धन जब भी सद्गुरु कुछ कहे तो रणभूमि मे तन मन धन से कुद पड़ना और हॆ वत्स ये कभी न भुलना की सद्गुरु के समान कोई हितेषी नही है! और सद्गुरु और सच्चे सन्त से तर्क वितर्क कभी मत करना क्योंकि जो तर्क वितर्क मे उलझते है वो फिर उलझते ही चले जाते है और जो नही करते है वो सुलझ जाते है!

🔷 उलझन के लिये अपनी बुद्धि लगाओ और सुलझन के लिये सद्गुरु की बुद्धि से चलो अर्थात जो भी सद्गुरु कहे उसे तत्काल मान लो! और सद्गुरु वही है जो तुम्हारा तार हरि से जोड़कर हरि को आगे करके स्वयं पिछे हट जायें ऐसे सद्गुरु का आदेश परमधर्म है!

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 19 Dec 2017


👉 आज का सद्चिंतन 19 Dec 2017

👉 सत्य की चाह

🔷 सत्य की चाह है, तो चित्त को किसी ‘आग्रह’ से मत बाँधो। जहां आग्रह है, वहाँ सत्य नहीं आता। आग्रह और सत्य में गहरा विरोध है। मुक्त-जिज्ञासा सत्य की खोज के लिए पहली सीढ़ी है। जो व्यक्ति सत्य की अनुभूति से पहले ही अपने चित्त को किन्हीं सिद्धान्तों, मतवादों एवं आग्रहों से बोझिल कर लेते हैं, उनकी जिज्ञासा कुंठित और अवरुद्ध हो जाती है।

🔶 जिज्ञासा- खोज की गति और प्राण है। इसी के माध्यम से विवेक जाग्रत् होता है और चेतना ऊर्ध्व बनती है। लेकिन, जिज्ञासा आस्था से नहीं, आश्चर्य से पैदा होती है। आश्चर्य-स्वच्छ चित्त का लक्षण है। उसके सम्यक अनुगमन से सत्य के ऊपर पड़े हुए परदे क्रमशः गिरते जाते हैं और एक क्षण सत्य का दर्शन होता है।     

🔷 यहाँ यह बता देना जरूरी है कि आस्तिक और नास्तिक दोनों ही आस्थावान् होते हैं। हाँ इतना अवश्य है कि आस्तिक की आस्था विधेयात्मक होती है तो नास्तिक की आस्था निषेधात्मक या नकारात्मक। जबकि आश्चर्य चित्त की एक अलग ही अवस्था है। जहाँ अविश्वास नहीं है और न ही विश्वास है। वह तो इन दोनों से मुक्त खोज के लिए स्वतंत्र है। यहाँ किसी भी आग्रह या मत के लिए कोई स्थान नहीं है।

🔶 और भला वे सत्य की खोज कर भी कैसे सकते हैं? जो कि पहले से ही किन्हीं मतों से बँधे हैं। मतों अथवा आग्रहों के खूँटों से विश्वास या अविश्वास की जंजीरों को जो खोल देता है, उसी की ही नाव सत्य के महासागर में यात्रा करने में समर्थ हो पाती है।

🔷 सत्य के आगमन की अनिवार्य शर्त हैः चित्त की पूर्ण स्वच्छता, स्वतन्त्रता एवं स्थिरता। जिसका चित्त पूर्ण स्वच्छ नहीं है, जो किन्हीं सिद्धान्तों या आग्रहों से बँधे हैं अथवा जिनका चित्त अस्थिर या चंचल है, वे सत्य के महासूर्य के दर्शन से वंचित रह जाते हैं। इसलिए सत्य की चाह को पूरा करने के लिए चित्त को पूर्ण स्वच्छ, स्वतंत्र एवं स्थिर बनाना ही होगा।

✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 97

👉 दुःखों का कारण और निवारण (भाग 1)

🔷 सन्त फ्रांसिस का कथन है—‘दुःखी रहना शैतान का काम है।’ इस कथन का तात्पर्य इसके सिवाय और क्या हो सकता है कि दुःखी रहना मानवीय प्रवृत्ति नहीं है। यह एक निकृष्ट प्रवृत्ति है जो मनुष्य को शोभा नहीं देती। तथापि, अधिकतर लोग दुःखी ही दिखलाई पड़ते हैं।

🔶 अब प्रश्न यह उठता है कि जब दुःखी रहना मानवीय प्रवृत्ति नहीं है, तब आखिर मनुष्य दुःखी क्यों रहते हैं? क्या कोई ऐसी अदृश्य शक्ति है जो मनुष्य को उसकी प्रवृत्ति के विरुद्ध दुःखी रहने को विवश करती है?

🔷 इस विषय में एक नहीं अनेक ऐसे प्रश्न और शंकायें उठ सकती हैं, किन्तु वास्तविकता यह है कि कोई बाह्य कारण अथवा अदृश्य शक्ति मनुष्य को दुःखी नहीं रखती है, मनुष्य अपने स्वयं के अज्ञान और दुर्बलता के कारण, अकारण ही दुःखी रहता है। वैसे न सुख का और न दुःख का, अपना कोई स्वतन्त्र अस्तित्व है। ये मनुष्य की अपनी निर्बल अनुभूतियां ही हैं जो सुख-दुःख के रूप में आभासित होती हैं।

🔶 अदृश्य शक्ति को इस प्रसंग के बीच से निकाल ही दिया जाये, यही ठीक होगा। क्योंकि अदृश्य शक्ति तटस्थ और निरपेक्ष शक्ति होती है। वह चेतना प्रदान करने के सिवाय मनुष्य के जीवन में अधिक हस्तक्षेप नहीं करती। उसको इस प्रसंग में खींच लाने पर मानवीय धरातल पर सुख-दुःख और उसके कारणों का विवेचन कर सकना कठिन हो जायेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अगस्त 1971 पृष्ठ 10

👉 The Roar Of Self Reliance

🔶 “I am pure, immortal & unattached Atma.”  As soon as man accepts this great truth, he reaches immortality. He who respects his soul & takes his existance as excellent, pure, great& reliable, he becomes actually so. The yoga scriptures proclaim loudly that he who thinks himself as ‘Shiva’ is ‘Shiva’ & he who thinks himself as jiva is jiva. If you want to make yourself great, see your greatness, feel it & begin imbibing it in yourself speedily.

🔷 He who will entertain evil thoughts again & again regarding himself, will have thoughts of inferiority & pettiness and will undoubtedly become so after some time. The obvious result of entertaining such thoutghts, as I am mean, sinful, petty, a slave, incapable, unable, indolent, unfortunate, down-trodden & afflicted, is that our subconscious mind takes the same mould. Don’t take yourself as small. The immortal prince man cannot be mean in any way. All the powers of his Father are inherent in him. All that is necessary, is that he should feel his greatness & try to make his life great in every way. He who adopts this practice, soon realizes his greatness.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 उच्चस्तरीय अध्यात्म साधना के तीन चरण (भाग 2)

🔶 यही बात मन के संबंध में भी है समस्त संसार में शून्यता संव्याप्त है। प्रलय काल की तरह नीचे अथाह नील जल राशि और ऊपर नीले आकाश है। सर्वत्र परम शांति दायिनी नीलिमा एवं नीरवता संव्याप्त है। कहीं कोई व्यक्ति या पदार्थ नहीं। मन को आकर्षित करने वाली कहीं कोई स्थिति परिस्थिति शेष नहीं। उस परम शून्यता में बालक की तरह अपनी निर्मल चेतना कमल पत्र पर लेटी हुई तैर रही है। अपने पैर का अँगूठा अपने मुँह में लगा हुआ है और आत्मा स्वरस का पान कर रही है। प्रलय काल का ऐसा चित्र बाज़ार में बिकता भी है। मनःस्थिति को उसी स्तर का बनाने का प्रयत्न किया जाय ता शून्यता की मानसिक स्थिति बनती और बढ़ती चली जाती है। शारीरिक शिथिलता और मानसिक रिक्तता की - उपरोक्त स्थिति भजन साधना की उपयुक्त पूर्व भूमिका समझी जानी चाहिए।
                  
🔷 शिथिल शरीर एवं मनःस्थिति में ही भजन ठीक प्रकार हो सकता भाव परक ध्यानयोग का यही पूर्वार्ध। आपरेशन करते-इंजेक्शन लगाते समय हिलने-जुलने पर प्रतिबंध रहता है। एक का रक्त दूसरे के शरीर में प्रवेश करते समय दोनों व्यक्ति अपने हाथों को हिलाते डुलाते नहीं है। भजन को समय भी मानसिक संस्थान को इसी प्रकार शांत रहना चाहिए। भजन का उत्तरार्ध यह है कि उस सर्व शक्तिमान्- सर्व वैभववान्-सर्व उत्कृष्टताओं से संपन्न-सर्वाधिक प्रेमी परमेश्वर को अपनी सत्ता में प्रविष्ट होते हुए- घुलते हुए अनुभव किया जाय। ब्रह्माण्ड व्यापारी दिव्य प्रकाश को सागर में अपने आपको मछली की तरह निमग्न अनुभव किया जाय।
    
🔶 जिस प्रकार मिट्टी के ऊपर जल गिरने से दोनों के मिश्रण का एक नया रूप “कीचड़” बनता है वैसे ही भावना की जानी चाहिए कि परम प्रकाश अपने रोम-रोम में संव्याप्त हो रहा है। (1)शरीर के अंग प्रत्यंग में विष संयम एवं बलिष्ठता का रूप धारण कर रहा है। (2) मस्तिष्क में विवेक और प्रखर प्रतिभा-परख तेजस् बनकर बिखर रहा है। अंतरात्मा के हृदय संस्थान में वह देवत्व और आनंद रूप बना बैठा है। इस प्रकार स्थूल, सूक्ष्म और तीनों शरीरों में परमात्मा की परम ज्योति को ज्वलंत अग्नि की तरह समाविष्ट देखना अपने को उस आलोक से आलोकित अनुभव करना भजन साधना की प्रधान ध्यान विद्या है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1973 पृष्ठ 3
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://awgpskj.blogspot.in/2017/12/1_17.html

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 167)

🌹  आत्मीय जनों से अनुरोध एवं उन्हें आश्वासन

🔷 कहने को गायत्री परिवार, प्रज्ञा परिवार आदि नाम रखे गए हैं और उनकी सदस्यता का रजिस्टर तथा समयदान, अंशदान का अनुबंध भी है, पर वास्तविकता दूसरी ही है, जिसे हम सब भली-भाँति अनुभव भी करते हैं। वह है जन्म-जन्मांतरों से संग्रहीत आत्मीयता। जिसके पीछे जुड़ी हुई अनेकानेक गुदगुदी उत्पन्न करने वाली घटनाएँ हमें स्मरण हैं। परिजन उन्हें स्मरण न रख सके होंगे। फिर वे विश्वास करते हैं कि परस्पर आत्मीयता की कोई ऐसी मजबूत डोरी बँधी है, जो कई बार तो हिलाकर रख देती है। एक दूसरे के अधिक निकट आने, परस्पर कुछ अधिक कर गुजरने के लिए आतुर होते हैं। यह कल्पना नहीं वास्तविकता है जिसकी दोनों पक्षों को निरंतर अथवा समय-समय पर अनुभूति होती रहती है।

🔶  यही तीसरा वर्ग है- बालकों का। इनकी सहायता से मिशन का कुछ काम भी चला है, पर वह बात गौण है। प्रमुख प्रश्न एक ही है कि इन्हें हँसता-हँसाता, खिलता-खिलाता देखने का आनंद कैसे मिले? अब तक भेंट, परामर्श, सत्संग, सुविधा सान्निध्य से भी इस भाव संवेदना की तुष्टि होती थी, पर अब तो नियति ने वह सुविधा भी हाथ से छीन ली है। अब परस्पर भेंट मिलन का अध्याय ही समाप्त होता जा रहा था। इसमें समय की कमी या कोई व्यवस्था सम्बन्धी कठिनाई कारण नहीं है। बात इतनी भर है कि इससे सूक्ष्मीकरण में बाधा पड़ती है। चित्त भटकता है और जिस स्तर का अंतराल पर दबाव पड़ना चाहिए वह बिखर जाता है। फलतः उस लक्ष्य की पूर्ति में बाधा पड़ती है जिसके साथ समस्त मनुष्य समुदाय का भाग्य-भविष्य जुड़ा हुआ है। अपनी निज की मुक्ति, सिद्धि या स्वर्ग उत्कर्ष जैसा कारण रहा होता तो उसे आगे कभी के लिए टाला जा सकता था, पर समय तो ऐसा विकट है जो एक क्षण की भी छूट नहीं देता। ईमानदार सिपाही की तरह मोर्चा संभालने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं। इसलिए सूक्ष्मीकरण के संदर्भ में परिजनों को हमें अपनी साधना हेतु एकाकी छोड़ देना चाहिए।

🔷 बच्चों के, प्रज्ञा परिजनों के सम्बन्ध में चलते-चलाते हमारा इतना ही आश्वासन है कि यदि वे अपने भाव-सम्वेदना क्षेत्र को थोड़ा और परिष्कृत कर लें तो निकटता अब की अपेक्षा भी अधिक गहरी अनुभव करने लगेंगे। कारण कि हमारा सूक्ष्म शरीर सन् 2000 तक और भी अधिक प्रखर होकर जिएगा। जहाँ उसकी आवश्यकता होगी, बिना विलम्ब लगाए पहुँचेगा। कठिनाइयों में सहायता करने और बालकों को ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने की हमारी प्रकृति में राई-रत्ती भी अन्तर नहीं होने जा रहा है। वह लाभ पहले की अपेक्षा और भी अधिक मिलता रह सकता है।

🔶 हमारे गुरुदेव सूक्ष्म शरीर से हिमालय में रहते हैं। विगत ६१ वर्षों में हमने निरन्तर उसका सान्निध्य अनुभव किया है। यों आँखों से देखने की बात मात्र जीवन भर में तीन बार ही, तीन-तीन दिन के लिए सम्भव हुई है। भाव-सान्निध्य में श्रद्धा की उत्कृष्टता रहने से उसकी परिणति एकलव्य के द्रोणाचार्य, मीरा के कृष्ण, रामकृष्ण के काली-दर्शन जैसी होती है। हमें भी वे भविष्य में हमारी निकटता अपेक्षाकृत और भी अच्छी तरह अनुभव करते रहेंगे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.194

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.23

रविवार, 17 दिसंबर 2017

👉 बूढ़ा पिता


🔷 किसी गाँव में एक बूढ़ा व्यक्ति अपने बेटे और बहु के साथ रहता था। परिवार सुखी संपन्न था किसी तरह की कोई परेशानी नहीं थी । बूढ़ा बाप जो किसी समय अच्छा खासा नौजवान था आज बुढ़ापे से हार गया था, चलते समय लड़खड़ाता था लाठी की जरुरत पड़ने लगी, चेहरा झुर्रियों से भर चूका था बस अपना जीवन किसी तरह व्यतीत कर रहा था।

🔶 घर में एक चीज़ अच्छी थी कि शाम को खाना खाते समय पूरा परिवार एक साथ टेबल पर बैठ कर खाना खाता था। एक दिन ऐसे ही शाम को जब सारे लोग खाना खाने बैठे। बेटा ऑफिस से आया था भूख ज्यादा थी सो जल्दी से खाना खाने बैठ गया और साथ में बहु और एक बेटा भी खाने लगे। बूढ़े हाथ जैसे ही थाली उठाने को हुए थाली हाथ से छिटक गयी थोड़ी दाल टेबल पे गिर गयी। बहु बेटे ने घृणा द्रष्टि से पिता की ओर देखा और फिर से अपना खाने में लग गए।

🔷 बूढ़े पिता ने जैसे ही अपने हिलते हाथों से खाना खाना शुरू किया तो खाना कभी कपड़ों पे गिरता कभी जमीन पर। बहु चिढ़ते हुए कहा – हे राम कितनी गन्दी तरह से खाते हैं मन करता है इनकी थाली किसी अलग कोने में लगवा देते हैं, बेटे ने भी ऐसे सिर हिलाया जैसे पत्नी की बात से सहमत हो। बेटा यह सब मासूमियत से देख रहा था।

🔶 अगले दिन पिता की थाली उस टेबल से हटाकर एक कोने में लगवा दी गयी। पिता की डबडबाती आँखे सब कुछ देखते हुए भी कुछ बोल नहीं पा रहीं थी। बूढ़ा पिता रोज की तरह खाना खाने लगा, खाना कभी इधर गिरता कभी उधर । छोटा बच्चा अपना खाना छोड़कर लगातार अपने दादा की तरफ देख रहा था। माँ ने पूछा क्या हुआ बेटे तुम दादा जी की तरफ क्या देख रहे हो और खाना क्यों नहीं खा रहे। बच्चा बड़ी मासूमियत से बोला – माँ मैं सीख रहा हूँ कि वृद्धों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, जब मैं बड़ा हो जाऊँगा और आप लोग बूढ़े हो जाओगे तो मैं भी आपको इसी तरह कोने में खाना खिलाया करूँगा।

🔷 बच्चे के मुँह से ऐसा सुनते ही बेटे और बहु दोनों काँप उठे शायद बच्चे की बात उनके मन में बैठ गयी थी क्युकी बच्चा ने मासूमियत के साथ एक बहुत बढ़ा सबक दोनों लोगो को दिया था।
बेटे ने जल्दी से आगे बढ़कर पिता को उठाया और वापस टेबल पे खाने के लिए बिठाया और बहु भी भाग कर पानी का गिलास लेकर आई कि पिताजी को कोई तकलीफ ना हो।

🔶 तो मित्रों, माँ बाप इस दुनियाँ की सबसे बड़ी पूँजी हैं आप समाज में कितनी भी इज्जत कमा लें या कितना भी धन इकट्ठा कर लें लेकिन माँ बाप से बड़ा धन इस दुनिया में कोई नहीं है यही इस कहानी की शिक्षा है और मैं आशा करता हूँ मेरा इस कहानी को लिखना जरूर सार्थक होगा।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 Dec 2017


👉 आज का सद्चिंतन 18 Dec 2017


👉 World-Admixture Of Happiness & Misery

🔶 This world has been created with, Sat & Tam, good & bad and auspicious & inauspicious elements. Nobody is either wholly good or wholly bad. Good & bad tendencies arise & subside from time to time. Desirable & undesirable occasions come & go like sun & shade. The sign of wisdom is to think as to which of them should be remembered & which forgotten. If we go on remembering sorrows, scercities, failures and evils done by others, this will pervade with hellish miseries.

🔷 Dejection, disappointment & dissatisfaction will occupy our mind every moment. But if we change our viewpoint & remember loving events, successes, prosperous people & good done by others, it will appear that there may be some scarcity now, but compared to it, pleasant circumstances are more in number. More favourable circumstances are available than unfavorable ones.

🔶 Necessity for comforts is felt to make life happy & peaceful. An effort should be made to get them. It should also not be forgotten that whatever is available should be put to the best use. If we learn the proper use of available means & use everything frugally, make the best use of them. then whatever is available can increase our happiness manifold.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 उच्चस्तरीय अध्यात्म साधना के तीन चरण (भाग 1)

🔶 उच्च स्तरीय साधना के भव पक्ष के तीन चरण है। (1) भजन, (2) मनन, (3) चिंतन। इन तीनों को मिला देने से ही एक समय साधन प्रक्रिया का निर्माण होता है। अन्न, जल और वायु के तीनों अग मिलकर पूर्ण आहार बनता है। इनमें से एक भी कम पड़ जाय तो जीवन यात्रा न चल सकेगी। इसी प्रकार आत्मिक जीवन के लिए भजन, मनन और चिंतन का सूक्ष्म आहार प्रस्तुत करना पड़ता है। अंतःकरण की स्वस्थता, प्रखरता, परिपुष्टता एवं प्रगति इन तीन आधारों पर ही निर्भर है। गायत्री महामंत्र के तीन चरणों की सूक्ष्म प्रेरणा भी इसी त्रिवेणी को कहा जा सकता है।
                  
🔷 सर्वोच्च साधन स्तर अद्वैत स्थिति का है। इसमें प्रवेश किये बिना न तो मनोलय होता है और न ईश्वर प्राप्ति। जब तक ईश्वर से भिन्न अपनी अलग सत्ता बनी रहेगी जब तक अपना विलय परमेश्वर में न होगा तब तक अपूर्णता का प्रथमता का अंत न होगा। लययोग ही समाधि की-मुक्ति की-परम स्थिति तक पहुँचा सकता है।
    
🔶 उच्च स्तरीय ‘भजन’ के लिए शरीर को शिथिल और मन को उदासीन करना पड़ता है। ताकि न शरीर की माँस पेशियों पर कोई तनाव रहे और न मस्तिष्क में कोई आकर्षण उत्तेजना पैदा करे। यह स्थिति कुछ ही दिन के अभ्यास से उपलब्ध हो जाती है। किस  आराम कुर्सी, कोमल बिस्तर या दीवार, पेड़ आदि का सहारा लेकर शरीर को निद्रित एवं मृतक स्थिति जैसा शिथिल कर देना चाहिए। इसे शवासन एवं जैसा शिथिलीकरण मुद्रा कहते हैं। शारीरिक दृष्टि से यह पूर्ण विश्राम है। मानसिक दृष्टि से इसे ध्यान भूमिका कहा जाता है। उत्तेजित तनी हुई नाड़ियाँ एवं माँस पेशियाँ होने पर कभी किसी का ध्यान लग ही नहीं सकता। इसलिए पद्मासन, बद्धपद्मासन जैसे तनाव उत्पन्न करने वाले आसन और किसी प्रयोजन के लिए उपयोगी भले ही हों-ध्यान के लिए बाधक होते हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1973 पृष्ठ 3
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य 

शनिवार, 16 दिसंबर 2017

👉 होशियारी और समझदारी

🔶 होशियारी अच्छी है पर समझदारी उससे भी ज्यादा अच्छी है क्योंकि समझदारी उचित अनुचित का ध्यान रखती है!

🔷 एक नगर के बाहर एक गृहस्थ महात्मा जी रहते थे और उनके आश्रम मे दुर दुर से विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने को आते थे और महात्मा जी भी सभी को समान रुप से शिक्षा देते थे!

🔶 एक बार एक युवक उनके पास आया जो बहुत ही होशियार था और उसने कहा की मैं भी आपके आश्रम मे शिक्षा-दीक्षा लेना चाहता हुं तो महात्मा जी ने कहा की ठीक है! फिर वो उस युवक को लेकर दुर नगर गये और वहाँ से जब वापस लोट रहे थे तो महात्मा जी बार बार अपने थेले को देख रहे थे और युवक इस दृश्य को बराबर देख रहा था! और फिर एक नदी के किनारे महात्मा जी ने कहा वत्स रात्री मे अब हम यही पर विश्राम करते है सुबह ही यहाँ से आश्रम के लिये निकलेंगे और पुरी रात महात्मा जी उस थेले को बारबार देख रहे थे! वो युवक बारबार उन्हे देख रहा था!

🔷 महात्मा जी ने कहा की वत्स तुम यही बैठना और इस थैले को सम्भाल के रखना मैं नदी मे स्नान कर के आता हुं और पहले महात्मा जी स्नान करने को गये और फिर वो युवक गया फिर दोनो आश्रम पहुँचे और जब वहाँ पहुँचे और जब थैले को देखा तो महात्मा जी की आँखो से आँसु आने लगे जब उस युवक ने महात्मा जी से पुछा की हॆ देव इन आँसुओं का क्या कारण है और जब महात्मा जी ने कारण बताया तो वो युवक रोने लगा और वो युवक वहाँ से चला गया !

🔶 महात्मा जी के थैले मे एक सोने की ईंट थी जो एक राजा ने उन्हे परमार्थ हेतु दी थी और महात्मा जी सोच रहे थे की इस ईंट से आश्रम मे रहने वाले विद्यार्थियों के लिये कुछ अच्छे पक्के भवन का निर्माण करवा देंगे ताकि सर्दी गर्मी बरसात से उनकी रक्षा हो सके उनकी जिंदगियों का अच्छे से निर्माण हो सकेगा और गायों के लिये भी सालभर की चारे की व्यवस्था हो जायेगी और परमार्थ के अनेक कार्य सम्पुर्ण हो सकेंगे! और युवक ने सोचा की महात्मा जी का अभी भी सोने मे मोह है और महात्मा जी ठहरे गृहस्थी कही वो भटक न जायें और उसने सोने की ईंट को नदी के बहाव मे फेंक दिया और थैले मे एक पत्थर रख दिया और बड़ा खुश होने लगा की मैंने महात्मा जी को मोह से मुप्त कर दिया!

🔷 पर जब युवक ने सत्य कहा तो महात्मा जी ने कहा वत्स विवाह न करना बड़ी बात नही है बड़ी बात है विवाह करके नियम और संयम मे जीना और धन का त्याग करना बड़ी बात नही है बड़ी बात तो तब है की तुम्हारे पास धन है पर तुम्हारे मन मे उसके प्रति उदासीनता का भाव है उस धन के प्रति तुम्हारे मन मे कोई आसक्ति अथवा कोई मोह न हो!
मेरी चिन्ता का जो कारण था वो ये था की परमार्थ की जो जिम्मेदारी मुझे सोपी कही मॆरी लापरवाही से कोई अनहोनी न हो जायें और परमार्थ का कार्य कही रुक न जायें! उस सोने की ईंट के बारे मे मुझे भी पुछ सकते थे वत्स पर वत्स तुमने आवश्यकता से ज्यादा होशियारी दिखाई तुमने अपनी ही बुद्धी से सारे निर्णय अपने आप ही ले लिये होशियारी होना अच्छी बात है पर समझदारी होना ज्यादा जरूरी है!

🔶 फिर उस युवक ने कहा देव मैं बहुत बड़ा अपराधी हुं और जब तक पश्चात्ताप न कर लू तब तक मैं आपको अपना मुँह न दिखाउँगा और फिर कुछ समय बाद वो युवक वापिस लौटा और उसने महात्मा जी के सारे सपनो को साकार किया!

🔷 उसके पास जो कुछ भी था वो सबकुछ बेच आया और अपने अपराध का पश्चात्ताप किया!

🔶 इसलिये एक बात हमेशा ध्यान रखनी चाहिये की कभी कभी आवश्यकता से ज्यादा होशियारी दिखाने पर नुकसान उठाना पड़ सकता है होशियारी अच्छी है पर आवश्यकता से ज्यादा होशियारी दुखदायी हो जाती है!

🔷 इसलिये होशियारी के साथ साथ समझदारी भी बहुत जरूरी है क्योंकि होशियारी उचित अनुचित नही देखती है पर समझदारी उचित अनुचित देखकर आगे बढ़ती है!

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 17 Dec 2017


👉 आज का सद्चिंतन 17 Dec 2017


👉 सुख चाहिए किन्तु दुःख से डरिये मत (अन्तिम भाग)

🔶 अनेक बार अनुभव किया जा सकता है कि कभी-कभी जीवन में ऐसी परिस्थितियां आ जाती हैं जिनसे जीवन का हर क्षेत्र निराशा, कठिनाइयों तथा आपत्तियों से भरा दिखाई पड़ता है। हर समय वही अनुभव होता है कि अब जीवन में कोई सार नहीं रहा है, उसके अस्तित्व को हर प्रकार से खतरा पैदा हो गया है किन्तु किसी भी माध्यम से आशा का एक प्रकाश कण दीख जाने से परिस्थिति बिल्कुल बदल जाती है और वही निराश व्यक्ति एक बार फिर कमर कसकर जीवन संग्राम में योद्धा की तरह उतर पड़ता है व निश्चय विजय किया करता है। हानि के धक्के अथवा असफलता के क्षोभ से जब भी किसी व्यक्ति की मरने अथवा निराश, निकम्मे हो बैठने का समाचार सुनें तो समझ लें कि उसने अपनी भौतिक हानि के साथ अपनी आशा की भी हानि करली है अपने उत्साह का पल्ला छोड़ दिया है।
   
🔷 आशा तथा उत्साह कहीं से लाने अथवा आने वाली वस्तु नहीं है। यह दोनों तेज आपके अन्तःकरण में सदैव ही विद्यमान रहते हैं। हां आवश्यकता के समय उनको जगाना एवं पुकारना अवश्य पड़ता है। जीवन की कठिनाइयों तथा आपत्तियों से घबराकर अपने इन अन्तरंग मित्रों को भूल जाना अथवा इनका साथ छोड़ देना बहुत बड़ी भूल है। ऐसा करने का अर्थ है कि आप अपने दुर्दिनों को स्थायी बनाते हैं अपनी कठिनाइयों को पुष्ट तथा व्यापक बनाते हैं। किसी भी अन्धकार में, किसी भी प्रतिकूलता अथवा कठिनाई में अपने आशा उत्साह के सम्बन्ध को कभी मत छोड़ियेगा, कठिनाइयां आपका कुछ भी नहीं कर सकेंगी।

🔶 सुख की कामना करिये, किन्तु दुःख से डरिये नहीं। आशा और उत्साह के बल पर उन्हें जीतकर सुख के रूप में बदल डालिये। चिर प्रसन्न आशान्वित तथा उत्साहित रहिये। आपको सुख की याचना करने की आवश्यकता न होगी। वह स्वयं दरवान की ही तरह आपके जीवन की हर ड्यौढ़ी पर खड़ा आपका स्वागत करता हुआ मिलेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- दिसंबर 1966 पृष्ठ 23
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/July/v1.23

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.3

👉 Prosperous Crop Of Action (Karma)

🔶 Human life is a field, wherein actions are sown & their good or bad fruits are reaped. He who does good deeds, gets good fruit. A doer of bad deeds accumulates bad fruits. It is said. “He who sows mangoes, will eat mangoes, he who sows acacia, will get thorns.” Just as getting mangoes by sowing acacia is not possible in nature, similarly getting good by sowing the seeds of evils cannot even be imagined.
 
🔷 There is no other truth in human life than this. The fruit of good cannot be anything but peace, happiness & progress. Similarly, evil has never resulted in good, nor will it ever result in good in future. History bears witness to it.

🔶 No action is ever without cause. Similarly, no action is without its result. It is the fundamental rule from both subtle & gross viewpoints that destinies are never created by themselves but are written by the pen of individual’s own action. A good & bad destiny is always the result of one’s own actions.

🔷 It is only a delusion to thind that any individual, society or country has prospered through evil. Life keeps an account of every moment. Water will always remain water. If it flows through mu, it will not be bereft of bad smell. It cannot be potable even by creating a delusion of water. Similarly, Successes achieved through fraud ultimately lead to ignominy. Everlasting success is achieved only through good. This alone reforms man’s this as well as the other life. Fruits of actions are incontrovertible.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 April 2026

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