गुरुवार, 26 जनवरी 2017

👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 20) 27 Jan

🌹 सार्थक, सुलभ एव समग्र साधना

🔴 प्रज्ञायोग एक ऐसी ही विधा है। इसे बोलचाल की भाषा में जीवन साधना भी कहा जा सकता है। इसमें जप, ध्यान, प्राणायाम, संयम जैसे विधानों की व्यवस्था है। पर सब कुछ उतने तक ही सीमित नहीं है। उपासना में ध्यान धारणा स्तर के सभी कर्मकाण्ड आ जाते हैं। इसके साथ ही जीवन के हर क्षेत्र में मानवी गरिमा को उभारने और रुकावटें हटाने जैसे सभी पक्षों को जोड़कर रखा गया है। शरीरसंयम, समयसंयम, अर्थसंयम, विचारसंयम इस धारा के अलग न हो सकने वाले अंग हैं।               

🔵 दुर्गुणों के, कुसंस्कारों के निराकरण पर जहाँ जोर दिया गया है, वहाँ यह भी अनिवार्य माना गया है कि अब की अपेक्षा अगले दिनों अधिक विवेकवान, चरित्रवान और पुरुषार्थ परायण बनने के लिये चिन्तन तथा अभ्यास जारी रखा जाये। वास्तव में यह समग्रता ही जीवन साधना की विशेषता है। साधक को कर्तव्य क्षेत्र में धार्मिकता, मान्यता क्षेत्र में आत्मपरायणता और अध्यात्म क्षेत्र में दूरदर्शी विवेकशीलता उत्कृष्ट आदर्शवाद को अपनाने के लिये कहा जाता है। इन सर्वतोमुखी दिशाधाराओं में समुचित जागरूकता बरतने पर ही वह लाभ मिलता है, जिसे आत्म परिष्कार के नाम से जाना जाता है। यह हर किसी के लिये सरल, सम्भव और स्वाभाविक भी है। 

🔴 आत्मपरिष्कार के अन्य उपाय भी हो सकते हैं। पर जहाँ तक प्रज्ञा परिवार के प्रयोगों का सम्बन्ध है, वहाँ यह कहा जा सकता है कि वह अपेक्षाकृत अधिक सरल, तर्कसंगत और व्यवस्थित हैं। इस सन्दर्भ में अनेक अभ्यासरत अनुभवियों की साक्षी भी सम्मिलित है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मरम्मत करो !

🔴 एक साधक ने श्री रामकृष्णदेव से पूछा कि : “महाशय, मै इतना प्रभु नाम लेता हूँ, धर्म चर्चा करता हूँ, चिंतन-मनन करता हूँ, फिर भी समय-समय पर मेरे मन में कुभाव क्यों उठते है?”

🔵 श्री रामकृष्णदेव साधक को समझाते हुए बोले : “एक आदमी ने एक कुत्ता पाला था। वह रात-दिन उसी को लेकर मग्न रहता, कभी उसे गोद में लेता तो कभी उसके मुँह में मुँह लगाकर बैठा रहेता था।

🔴 उसके इस मूर्खतापूर्ण आचरण को देख एक दिन किसी जानकार व्यक्ति ने उसे यह समझाकर सावधान किया कि कुत्ते का इतना लाड-दुलार नहीं करना चाहिए, आखिर जानवर की ही जात ठहरी, न जाने किस दिन लाड करते समय काट खाए।

🔵 इस बात ने उस आदमी के मन में घर कर लिया। उसने उसी समय कुत्ते को गोद में से फेंक दिया और मन में प्रतिज्ञा कर ली कि अब कभी कुत्ते को गोद में नहीं लेगा। पर भला कुत्ता यह कैसे समझे! वह तो मालिक को देखते ही दौड़कर उसकी गोद पर चढ़ने लगता। आखिर मालिक को कुछ दिनों तक उसे पीट-पीट कर भगाना पड़ा तब कही उसकी यह आदत छूटी।

🔴 तुम लोग भी वास्तव मे ऐसे ही हो। जिस कुत्ते को तुम इतने दीर्घ – काल तक छाती से लगाते आये हो उससे अब अगर तुम छुटकारा पाना भी चाहो तो वह भला तुन्हें इतनी आसानी से कैसे छोड़ सकता है?

🔵 अब से तुम उसका लाड करना छोड़ दो और अगर वह तुम्हारी गोद में चढाने आए तो उसकी अच्छी तरह से मरम्मत करो। ऐसा करने से कुछ ही दिनों के अन्दर तुम उससे पूरी तरह छुटकारा पा जाओगे।”

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 36) 27 Jan

🌹 साधना का स्तर ऊंचा उठाएं

🔴 यों शुभ कार्य के लिए सभी दिन शुभ हैं। फिर भी किसी पर्व से यह साधना आरम्भ की जाय तो अधिक उत्तम है। बसन्त पंचमी, गुरुपूर्णिमा, गायत्री जयन्ती आदि पर्वों से अथवा तिथियों में पंचमी, एकादशी और पूर्णिमा या वारों में रविवार अथवा गुरुवार से अधिक उत्तम है। यों बुरा या निषिद्ध, कोई भी दिन नहीं है। सामान्य नियम यह है कि जब से आरम्भ किया जाय तभी एक वर्ष पूरा होने पर, समाप्त किया जाय। पर्व दिन कुछ आगे-पीछे हों तो उस अवसर पर भी पूर्णाहुति की जा सकती है और शेष जप संख्या को थोड़ी-बहुत घटा-बढ़ाकर सन्तुलन बिठाया जा सकता है।

🔵 वैसे पन्द्रह माला और 24 हजार के दो लघु अनुष्ठानों का नियम भी इस प्रकार बनाया गया है कि इस क्रम से उपासना करने में प्रायः 11 महीनों में ही यह संख्या पूरी हो जाती है। चांद वर्ष पूरे तीन सौ साठ दिन का होता भी नहीं है। तिथियों को घट-बढ़ प्रायः होती रहती है इसलिए पांच लाख की संख्या सरलता पूर्वक हो सकती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 30) 27 Jan

🌹 साहस का शिक्षण—संकटों की पाठशाला में
🔵 पैराशूट द्वारा रंगरूट को हिमाच्छादित प्रदेश में अज्ञात शिखर पर छोड़ दिया जाता है। साथ में भोजन पानी तथा अन्य आवश्यक साधन अत्यल्प मात्रा में उसके साथ होते हैं। सर्दी, गर्मी, तूफान, हिमपात तथा वन्य प्राणियों जैसे संकटों का उसे सामना करना पड़ता है। अल्प साधनों के सहारे उसे प्रस्तुत होने वाले हर संकट से जूझना पड़ता है। प्रमुख समस्या सामने आती है प्रकृति विपदाओं से अपनी सुरक्षा किस प्रकार की जाय, आहार की व्यवस्था कैसे जुटाई जाय? थोड़ी भी असतर्कता उसे मृत्यु के मुंह में धकेल सकती है। अस्तु उसे पूरी जागरूकता का परिचय देना पड़ता है।

🔴 प्रशिक्षण में कितने ही प्रकार के अभ्यास कराये जाते हैं। अल्प आहार में अधिक से अधिक दिन तक कैसे जीवित रहा जा सकता है, यह कष्ट साध्य अभ्यास हिमालय के विभिन्न क्षेत्रों में करना पड़ता है। जल के अभाव में कुछ दिनों तक जीवित रहने की क्षमता के विकास के लिए चालक को भीषण ताप क्रम वाले रेगिस्तान इलाकों में छोड़ दिया जाता है। थोड़ी सी पानी की मात्रा उसके साथ होती है। उसके सहारे उसे अधिक से अधिक दिनों तक मरु प्रदेशों में गुजारा करना पड़ता है। पैदल ही उसे तपते हुए सैकड़ों मील की दूरी तय करके सेना के पड़ाव तक पहुंचना पड़ता है।

🔵 बीहड़ जंगलों में उसे प्रशिक्षण काल में छोड़ दिया जाता है, यह परखने के लिए कि अविज्ञात क्षेत्रों से वह अपनी रक्षा करते हुए किस प्रकार निकल सकता है। थोड़े से खाद्यान्न और पानी के सहारे वह बीहड़ों में कई दिनों तक भटकता हुआ सुरक्षित स्थान पर पहुंचने के लिए मार्ग ढूंढ़ता है। उसे कितनी बार शेर, बाघ तथा जंगली हाथी जैसे हिंसक जीवों का सामना करना पड़ता है। वनों की बीहड़ता से निकलने के लिए उसे अपने मनोबल एवं साहस का पूरा-पूरा परिचय देना पड़ता है। हिमाच्छादित प्रदेश में रहने का अभ्यास और भी अधिक कष्ट साध्य है। शून्य डिग्री से भी नीचे तापक्रम में शरीर को रहने के लिए अभ्यस्त करना एक कठोर परीक्षा की अवधि होती है। शारीरिक एवं मानसिक क्षमता को निखारने एवं समर्थ बनाने वाली शिक्षण की इन प्रक्रियाओं से होकर गुजारने के बाद शिक्षार्थी को उत्तीर्ण घोषित किया जाता है। इस अवधि में उसकी मनोभूमि इतनी दृढ़ बन जाती है कि हर प्रकार के संकट चुनौतियों का सामना वह कर सके।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 आप अपने आपको पहचान लीजिये (भाग 8)


 👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 अगर आप इस खुमारी में जिस स्थिति में अभी है आप उसी स्थिति में बने रहेंगे हमेशा तो आप विश्वास रखिये आप एक ऐसा मौका गवा देंगे जैसा कि मौका फिर कभी नहीं आने वाला। फिर कभी नहीं आयेगा यह मौका। यह मौका आप मानकर चलिये एक अभूतपूर्व मौका है ऐसा मौका है जिसमें ५०० करोड़ आदमी का भाग्य बिगड़ सकता है या बन सकता है दो का दोराहा है। यदि हम सब मिलकर काम करे तो हम ५०० करोड़ आदमी का भाग्य बना भी सकते हैं। और हम लोग सब मिलकर लापरवाही करें और अपने अपने स्वार्थों में लगे रहें और अपने- अपने मतलब की बात सोचे तो ५०० करोड़ आदमी के साथ विश्वासघात भी कर सकते हैं। बड़ा एक इस तरह का मौका है जिसमें चौराहे पर खड़े है एक जीवन का चौराहा है एक मरण का चौराहा है। मरण का चौराहा कौन सा है आपको कितनी बार बता चुके हैं कितनी भविष्यवाणियाँ बता चुके हैं हमने आपको इस्लाम धर्म की भविष्यवाणियाँ बताई, चौदहवीं सदी वाली बात बताई, सेवन टाइम की ईसाइयों वाली बात बताई।

🔵   भविष्य पुराण की बात बताई और वैज्ञानिकों की बात बताई ज्योतिषों की बात बताई सबकी बात बता चुके हैं। कि यह बड़ा खराब समय है और वैसे भी दिखाई पड़ता है आपको ।। आपको दिखाई नहीं पड़ता जो अगर स्टार वार शुरू हो गया तो तो फिर आप समझिये मंगल और बृहस्पति के बीच में पृथ्वी से बड़ा एक गृह था वहाँ भी बड़ी विज्ञान की उन्नति हो गई थी और वहाँ विज्ञान की उन्नति को गलत इस्तेमाल किया और वह चूरा चूरा हो गये चूरा चूरा होकर वह गृह कही एक टुकड़ा कहीं जा पड़ा, एक टुकड़ा कहीं जा पड़ा एक कही चला गया एक कही चला उसका नामोनिशान खतम हो गया यह भी ऐसा मौका है कि यदि स्टार वार शुरू हो और परमाणु युद्ध शुरू हो तो हमारी और आपकी जिंदगी की बात तो अलग, हमारे आपके जमीन जायदाद खेत, मकान, दुकान, नौकरी की बात तो अलग हम जिस जमीन पर बैठे हुये हैं इसका नाम निशान का भी पता नहीं चलेगा यह ऐसा समय है।

🔴  क्यों साहब ऐसा समय नहीं ऐसा भी नहीं ऐसा भी समय है कि अगर लंका के रावण का राज्य बना रहे तो न कोई ऋषि बचेगा, न कोई मुनि बचेगा, न कोई जनता बचेगी सबको राक्षसों का वंश जो एक लख पूत सवा लख नाती यह सब मिलकर के सबको खा जायेंगे और सबका खेत छीन लेंगे सबका पैसा छीन लेंगे सबकी औरतें छीन लेंगे और हा−हाकार मचा देंगे। ऐसा भी समय है कि अगर आप थोड़ी सी हिम्मत दिखायें कम से कम इतनी दिखा दें जितनी की रीछ बंदरों ने दिखा दी थी। रीछ बंदर आपसे बेअकल थे कि आपसे बुद्धिमान थे। रीछ बंदरों ने देखा कि फिर ऐसा मौका फिर कभी नहीं आयेगा इसलिये इस मौके पर हमको अपने छोटे लाभों के बारे में विचार नहीं करना चाहिये बल्कि बड़े लाभों के बारे मे विचार करना चाहिये।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 84)

🌹 आदर्श विवाहों के लिए 24 सूत्री योजना

🔴 18. बारात की संख्या कम ने कम रहे:-- केवल अत्यन्त आवश्यक एवं निजी व्यक्ति ही बारात में जावें। इसमें कुटुम्बी, रिश्तेदारों या अत्यन्त आवश्यक व्यक्तियों के अतिरिक्त फालतू लोग न हों।

🔵 अक्सर बड़े आदमियों या उजले कपड़े वालों को बारात की शोभा बढ़ाने के लिए खुशामदें करके मिन्नत करके ले जाया जाता है। इसमें उनका अहसान होता है, अपना खर्चा पड़ता है और बेटी वाले की परेशानी बढ़ती है। इन सब असुविधाओं का ध्यान रखते हुये, इस अन्न संकट तथा महंगाई के जमाने में बारात की संख्या बढ़ाना सर्वथा अनुचित है। साधारणतया 20-20 आदमी की बारात पर्याप्त होगी। अधिकतम संख्या 51 तक हो सकती है।

🔴 19. बारात चढ़ाई सादगी के साथ:-- बारात चढ़ाने और उसकी शोभा बनाने में ढेरों निरर्थक पैसा बर्बाद होता है और उसका स्वरूप दम्भ, अहंकार एवं नकली अमीरी जैसा उपहासास्पद बन जाता है। इसे बदल कर सादगी एवं सौम्यता बरती जाय।

🔵 वर की सवारी घोड़े पर निकले जैसा कि बड़े शहरों में रिवाज है। बारात वर के पीछे पैदल शोभा यात्रा में चलें। गांव और कस्बों में भी यही तरीका उचित है। बारातियों के बैठने के लिये जो सवारियां ली गई हों, उनको इस शोभा यात्रा में न रखा जाय। बाजे में 10 से अधिक व्यक्ति न हों। आतिशबाजी, फूलटट्टी, कागज के घोड़े-हाथी, परियां, लड़की लड़के के ऊपर पैसों की बखेर जैसे बेकार खर्च बिलकुल भी न किये जांय। गोधूलि का विवाह रहने से बारात दिन में ही चढ़ेगी इसलिये रात में ही अच्छी लगने वाली इन बेकार चीजों की जरूरत भी न पड़ेगी। बारात के साथ रोशनी का प्रबन्ध भी न करना पड़ेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 35)

🌞 दिए गए कार्यक्रमों का प्राण-पण से निर्वाह

🔴 काँग्रेस अपनी गायत्री गंगोत्री की तरह जीवनधारा रही। जब स्वराज्य मिल गया, तो हमने उन्हीं कामों की ओर ध्यान दिया जिनसे स्वराज्य की समग्रता सम्पन्न हो सके। राजनेताओं को देश की राजनैतिक आर्थिक स्थिति सँभालनी चाहिए, पर नैतिक क्रांति, बौद्धिक क्रांति, और सामाजिक क्रांति उससे भी अधिक आवश्यक है, जिसे हमारे जैसे लोग ही सम्पन्न कर सकते हैं। यह धर्म-तंत्र का उत्तरदायित्व है।

🔵 अपने इस नए कार्यक्रम के लिए अपने सभी गुरुजनों से आदेश लिया और काँग्रेस का एक ही कार्यक्रम अपने जिम्मे रखा ‘‘खादी धारण।’’ इसके अतिरिक्त उसके सक्रिय कार्यक्रमों से उसी दिन पीछे हट गए जिस दिन स्वराज्य मिला। इसके पीछे बापू का आशीर्वाद था, दैवी सत्ता का हमें मिला निर्देश था। प्रायः २० वर्ष लगातार काम करते रहने पर जब मित्रों ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के नाते निर्वाह राशि लेने का फार्म भेजा, तो हमने हँसकर स्पष्ट मना कर दिया। हमें राजनीति में श्रीराम मत्त या मत्तजी के नाम से जाना जाता है। जो लोग जानते हैं उस समय के मूर्धन्य जो जीवित हैं उन्हें विदित है कि आचार्य जी (मत्त जी) काँग्रेस के आधार स्तंभ रहे हैं और कठिन से कठिन कामों में अग्रिम पंक्ति में खड़े रहे हैं, किन्तु जब श्रेय लेने का प्रश्न आया, उन्होंने स्पष्टतः स्वयं को पर्दे के पीछे रखा।

🔴 तीनों काम यथावत पूरी तत्परता और तन्मयता के साथ सम्पन्न किए और साथ ही गुरुदेव जब-जब हिमालय बुलाते रहे, तब-तब जाते रहे। बीच में दो आमंत्रणों में उनने छः-छः महीने ही रोका। कहा ‘‘काँग्रेस का कार्य स्वतंत्रता प्राप्ति की दृष्टि से इन दिनों आवश्यक है, सो इधर तुम्हारा रुकना छः-छः महीने ही पर्याप्त होगा। उन छः महीनों में हमसे क्या कराया गया एवं क्या कहा गया, यह सर्वसाधारण के लिए जानना जरूरी नहीं है। दृश्य जीवन के ही अगणित प्रसंग ऐसे हैं, जिन्हें हम अलौकिक एवं दैवी शक्ति की कृपा का प्रसाद मानते हैं, उसे याद करते हुए कृतकृत्य होते रहते हैं।’’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 35)

🌞  हिमालय में प्रवेश

बादलों तक जा पहुंचे

🔵 आज प्रातःकाल से ही वर्षा होती रही। यों तो पहाड़ों की चोटी पर फिरते हुए बादल रोज ही दीखते पर आज तो वे बहुत ही नीचे उतर आये थे। जिस घाटी को पार किया गया वह भी समुद्र तल से 10 हजार फुट की ऊंचाई पर थी। बादलों को अपने ऊपर आक्रमण करते, अपने को बादल चीर कर पार होते देखने का दृश्य मनोरंजक भी था और कौतूहल वर्धक भी। धुनी हुई रुई के बड़े पर्वत की तरह भाप से बने ये उड़ते हुए बादल निर्भय होकर अपने पास चले आते। घने कुहरे की तरह चारों ओर एक सफेद अंधेरा अपने चारों ओर फिर जाता। कपड़ों में नमी आ जाती और शरीर भी गीला हो जाता। जब वर्षा होती तो पास में ही दीखता कि किस प्रकार रुई का बादल गल कर पानी की बूंदों में परिणित होता जा रहा है।

🔴 अपने घर गांव में जब हम बादलों को देखा करते थे तब वे बहुत ऊंचे लगते थे, नानी कहा करती थी कि जहां बादल हैं वहीं देवताओं का लोक है। यह बादल देवताओं की सवारी हैं इन्हीं पर चढ़ कर वे इधर उधर घूमा करते हैं और जहां चाहते हैं पानी बरसाते हैं। बचपन में कल्पना किया करता था कि काश मुझे भी एक बादल चढ़ने को मिल जाता तो कैसा मजा आता, उस पर चढ़ कर चाहे जहां घूमने निकल जाता। उन दिनों मेरी दृष्टि में बादल की कीमत बहुत थी। हवाई जहाज से भी अनेक गुनी अधिक। जहाज चलाने को तो उसे खरीदना, चलाना, तेल जुटाना सभी कार्य बहुत ही कठिन थे पर बादल के बारे में तो कुछ करना ही न था, वैसे कि चाहे जहां चल दिये।

🔵 आज बचपन की कल्पनाओं के समन बादलों पर बैठ कर उड़े तो नहीं पर उन्हें अपने साथ उड़ते तथा चलते देखा तो प्रसन्नता बहुत हुई। हम इतने ऊंचे चढ़े कि बादल हमारे पांवों को छूने लगे। सोचता हूं बड़े कठिन लक्ष जो बहुत ऊंचे और दूर मालूम पड़ते हैं, मनुष्य इसी तरह प्राप्त कर लेता होगा, पर्वत चढ़ने की कोशिश की तो बादल की बराबर पहुंच गया। कर्त्तव्य कर्म का हिमालय भी इतना ही ऊंचा है। यदि हम उस पर चढ़ते ही चलें तो साधारण भूमिका से विचरण करने वाले शिश्नोदर परायण लोगों की अपेक्षा वैसे ही अधिक ऊंचे उठ सकते हैं जैसे कि निरन्तर चढ़ते-चढ़ते दस हजार फुट की ऊंचाई पर आ गये।

🔴 बादलों को छूना कठिन है। पर पर्वत के उच्च शिखर के तो वह समीप ही होता है। कर्त्तव्य परायणता की ऊंची मात्रा हमें बादलों जितना ऊंचा उठा सकती है और जिन बादलों तक पहुंचना कठिन लगता है वे स्वयं ही खिंचते हुए हमारे पास चले आते हैं। ऊंचा उठाने की प्रवृत्ति हमें बादलों तक पहुंचा देती है, उन्हें हमारे समीप तक स्वयं उड़कर आने के लिए विवश कर देती है। बादलों को छूते समय ऐसी-ऐसी भावनाएं उनसे उठती रहें। पर बेचारी भावनाएं अकेली क्या करें। सक्रियता का बाना उन्हें पहनने को न मिले तो वे एक मानस तरंग मात्र ही रह जाती हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

बुधवार, 25 जनवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 26 Jan 2017


👉 आज का सद्चिंतन 26 Jan 2017


👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 19) 26 Jan

🌹 सार्थक, सुलभ एव समग्र साधना  

🔴 चेतना की शक्ति संसार की सबसे बड़ी शक्ति है। मनुष्य ही, रेल, जहाज कारखाने आदि बनाता है। विज्ञान के नित नये आविष्कार करता है। यहाँ तक कि धर्म और दर्शन, आचार और विचार भी उसी के रचे हुए हैं। ईश्वर की साकार रूप में कल्पना तथा स्थापना करना भी उसी का बुद्धि-कौशल है। इस अनगढ़ धरातल को, सुविधाओं, सुन्दरताओं, उपलब्धियों से भरापूरा बनाना भी मनुष्य का ही काम है। यहाँ मनुष्य शब्द में किसी शरीर या वैभव को नहीं समझा जाना चाहिये। विशेषताएँ चेतना के साथ जुड़ी होती हैं। इसे भी प्रयत्न पूर्वक उठाया या गिराया जा सकता है। शरीर को बलिष्ठ या दुर्बल बना लेना प्राय: मनुष्य की अपनी, रीति-नीति पर निर्भर रहता है।                

🔵 सम्पन्न और विपन्न भी लोग अपनी हरकतों से ही बनते हैं। उठना और गिरना अपने हाथ की बात है। मनुष्य को अपने भाग्य का निर्माता आप कहा जाता है। यहाँ व्यक्ति का मतलब आत्मचेतना से ही समझा जाना चाहिये। वही प्रगतिशीलता का उद्गम है। इसी क्षेत्र में पतन-पराभव के विषैले बीजांकुर भी जमे होते हैं। सद्गुणी लोग अभावग्रस्त परिस्थितियों में भी सुख-शान्ति का वातावरण बना लेते हैं। अन्त: चेतना से समुन्नत होने पर समूचा वातावरण, सम्पर्क क्षेत्र सुख-शान्ति से भर जाता है। इसके विपरीत जिनका मानस दोष-दुर्गुणों से भरा हुआ है, वे अच्छी भली परिस्थितियों में भी दुर्गति और अवगति का कठोर दु:ख सहते हैं।  

🔴 वैभव अर्जित करने के अनेक तरीके सीखे और सिखाये जाते हैं। शरीर को निरोग रखने के लिये भी व्यायामशालाओं, स्वास्थ्य केन्द्रों से लेकर अस्पतालों तक की अनेक व्यवस्थायें देखी जाती हैं। औद्योगिक, वैज्ञानिक, शैक्षणिक, शासकीय प्रबन्ध भी अनेक हैं, पर ऐसी व्यवस्थायें कम ही कहीं दीख पड़ती है, जिनसे चेतना को परिष्कृत एवं विकसित करने के लिये सार्थक, समर्थ एवं बुद्धि-संगत सर्वोपयोगी आधार बन पड़ा हो।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 35) 26 Jan

🌹 साधना का स्तर ऊंचा उठाएं
🔴 अनुष्ठान समय विशेष पर नियत अवधि में पूरा करना पड़ता है। यों उसे कभी भी आरम्भ किया जा सकता है लेकिन अवधि का ध्यान तो रखना ही पड़ता है। उच्च स्तर के, बहुत ही ऊंची श्रेणी के साधक 24 लाख का महापुरश्चरण नित्य निरन्तर चलाते हैं पर यह पूरा समय साधना उपासना में लगा सकने वालों के लिए ही सम्भव है। सामान्य स्थिति में अपनी उपासना को अनुष्ठान स्तर का बनाना हो तो उसके लिए एक वर्षा में पांच लाख जप की संख्या पूर्ण करना सर्वश्रेष्ठ है। एक वर्ष में पूरा होने वाले इस उपासना अनुष्ठान को अभियान साधन कहते हैं।

🔵 इस साधना का विधि-विधान भी बहुत सरल है। 5 लाख की जप संख्या 15 माला प्रति दिन जप करने तथा चैत्र और आश्विन की दो नवरात्रियों में 24 हजार का लघु अनुष्ठान करने से पूरी हो जाती है। यों पन्द्रह माला प्रति दिन करने से भी 360 दिन में पांच लाख की संख्या पूरी हो जाती है किन्तु नवरात्रियों में लघु अनुष्ठान तो सभी उपासक करते हैं, सामान्य उपासना क्रम अपनाने वाले साधक भी प्रायः नवरात्रि अनुष्ठान करते हैं। अतएव अभियान साधना करने वाले साधकों को भी यह अनुष्ठान करना और भी आवश्यक है लाभप्रद है।

🔴 यह तो हुई संख्या पूरी करने की बात। अभियान साधना को अनुष्ठान स्तर की बनाने वाले नियम हैं गुरुवार के दिन संयम। संयम अर्थात् उपवास, मौन, ब्रह्मचर्य, तितिक्षा और उन सभी नियमों का पालन जो 24 हजार के, सवालक्ष के अथवा चौबीस लक्ष के, लघु-मध्यम तथा पूर्ण अनुष्ठान पुरश्चरण में करने पड़ते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 29) 26 Jan

🌹 साहस का शिक्षण—संकटों की पाठशाला में

🔵 प्राचीन काल की ऋषि परम्परा के शिक्षण में ऐसी व्यवस्था रहती थी कि मनोभूमि को सबल, काया को समर्थ और सुदृढ़ बनाने के लिए वे सारे प्रयोग किये जाय जो अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति में सहायक हों। गुरुकुलों में ऐसा ही शिक्षण चलता था। तप और तितिक्षा का कठोर अभ्यास शिक्षार्थी से कराया जाता था ताकि भावी जीवन में आने वाले किसी भी संकट-चुनौती का सामना करने में वह समर्थ हो सके। गुरुकुलों में प्रवेश लेने तथा प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले छात्रों को अनुकूलताओं में नहीं, प्रतिकूलताओं में जीना सिखाया जाता था। उस शिक्षण प्रक्रिया का परिणाम यह होता था कि विद्यालय से निकलने वाला छात्र हर दृष्टि से समर्थ और सक्षम होता था। जीवन में आने वाले अवरोध उन्हें विचलित नहीं कर पाते थे।

🔴 परिस्थितियां बदली और साथ में वह शिक्षण पद्धति भी। मनुष्य के चिन्तन में भारी हेर-फेर आया। यह मान्यता बनती चली गयी कि अनुकूलताओं में ही मनुष्य का सर्वांगीण विकास सम्भव है। फलतः आरम्भ से ही बालकों को अभिभावक हर प्रकार की सुविधाएं देने का प्रयास करते हैं। उन्हें तप तितीक्षामय जीवन का अभ्यास नहीं कराया जाता। यही कारण है कि जब कभी भी प्रतिकूलताएं प्रस्तुत होती हैं ऐसे बालक उनका सामना करने में असमर्थ सिद्ध होते हैं।

🔵 कुछ विद्यालय आज भी ऐसे हैं जो जीवट को प्रखर बनाने का व्यावहारिक प्रशिक्षण देते हैं। उदाहरणार्थ जंगल एण्ड स्नो सरवाइल स्कूल इंडियन एयर फोर्स’ की ओर से भेजे गये वायुयान चालकों को ऐसी ट्रेनिंग दी जाती है, जिससे वे हर तरह के संकटों का सामना करने में सक्षम हो सकें। हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित एक समाचार के अनुसार शिक्षण की प्रणाली अत्यन्त रोमांचक होती है। सामान्यतया विमान चालकों को हर तरह के क्षेत्र से होकर उड़ान भरनी होती है। हिमालय की ऊंचाई पर स्थित सघन वनों अथवा हिमाच्छादित प्रदेशों अथवा मरुस्थलों से होकर भी चालकों को गुजरना पड़ता है। यदि इन दुर्गम प्रदेशों में कोई दुर्घटना घटती है तो किन-किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। इसका शिक्षण एवं अभ्यास चालकों को कराया जाता है। इन स्थानों पर बिना किसी बाह्य सहायता के उसे किस तरह प्रतिकूलताओं से जूझते हुए बाहर निकलना चाहिये इसका प्रशिक्षण दिया जाता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 आप अपने आपको पहचान लीजिये (भाग 7)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 तुम भी जिस लायक हो जो तुम्हारी वास्तविक योग्यता है जन्म- जन्मान्तरों की संग्रह की हुई वह बड़ी योग्यता है। हमारे पास भी जन्म जन्मान्तरों की संग्रह की हुई योग्यता थी इसीलिये हमारे गुरु ने स्वयं हमारे घर आकर के कहा था कि भाई जिस काम में तेरे घर वाले लगाना चाहते हैं उस काम में लगना तेरे लिये ठीक नहीं है। हम जो कहते है वही काम कर। हमने वही काम किया हमने उनका कहना न माना होता घरवालों का कहना माना होता तो तो फिर अपने आपका ज्ञान ही नहीं होता। यह नहीं मालूम होता कि पूर्व जन्मों की कोई संचित संपदा कोई है क्या हमारे पास। उन्होंने दिखाया तो मालूम पड़ा कि हमारा पूर्व जन्मों का संकलन है और पूर्व जन्मों की कोई संपदा है हमारे पास। हम कोई सामर्थ्यवान व्यक्ति हैं और सामर्थ्यवान व्यक्ति हैं तो कोई बड़े काम कर सकते हैं और बड़े काम करने चाहिये।

🔵 आपसे भी मैं ठीक वही बात कह रहा हूँ। जो पुरानी घटना मेरे साथ बीती है उन्हीं बातों को मैं कह रहा हूँ और कोई नई बात नहीं कह रहा हूँ। मैं आपसे यह कह रहा हूँ कि यदि आप हमारा कहना माने तो आप नफे में रहेंगे जैसे कि हम नफे में रहे। जिस तरीके से पहले जन्मों के संस्कार हमारे पास जमा थे और उन संस्कारों की वजह से इस जन्म में सफलताओं पर सफलतायें मिलती चली गयी। आप भी यदि कदम उठायेंगे इसी राह पर तो आपको भी सफलता पर सफलता मिलती जायेगी इसी राह पर आपको यह नहीं कहना पड़ेगा कि हम घाटे में रहे और नुकसान में रहे आप बड़े सामर्थ्यवान है लेकिन सामर्थ्यवान होते हुए भी यह बड़े अचम्भे की बात है कि आप अपने आपको पहचान नहीं पा रहे हैं।

🔴 सोया हुआ आदमी होता है तो उसको नींद आ जाती है। नींद में पड़ा हुआ आदमी मरे हुए के समान हो जाता है चाहे गाली दो उसको, न उसको अपने शरीर का पता है, न कपड़ों का पता है, नंगा पड़ा है कि उघारा पड़ा है। घर में चोरी हो रही है क्या हो रहा है सोया हुआ है तो मालूम ही नहीं है आप सो गये मालूम पड़ते हैं इसलिये मुझे आपको जगाना है। जगाने के लिये मैं प्रार्थना करता हूँ आपसे कि आप अपने आपको जगा लीजिये सोयी हुई स्थिति में पड़े रहेंगे तो बड़ी खराब बात हो जायेगी आप खुमारी में पड़े रहेंगे तो सड़क में पड़े रहेंगे नाली में पड़े रहेंगे, नाक रगड़ते रहेंगे और आप शराबी कहलायेंगे और बस थोड़ी देर के लिये मजा तो आ जायेगा लेकिन फिर आप नुकसान में जायेंगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/lectures_gurudev/31.2

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 83)

🌹 आदर्श विवाहों के लिए 24 सूत्री योजना

🔴 15.वर कन्या भारतीय पोशाक में हों?:-- विवाह एक यज्ञ एवं धर्मानुष्ठान है। इसमें सम्मिलित होने के लिए वर-वधू को भारतीय वेष-भूषा में ही रहना चाहिये।

🔵 आजकल पढ़े-लिखे लड़के विवाह के समय भी ईसाई पोशाक धारण करके अपनी मानसिक गुलामी का परिचय देते हैं। यह अभागा भारत ही ऐसा है जहां के नवयुवक अपनी भाषा, अपनी संस्कृति तथा अपनी वेष-भूषा को तुच्छ समझकर ईसाई संस्कृति की नकल करने में गौरव समझते हैं। विवाह के समय भी वे पेन्ट, टाई जैसे ईसाई लिवास के लिए ही आग्रह करते हैं। उनकी मानसिक दासता विवाह जैसे धर्म कृत्य में तो इस भोंड़े ढंग से प्रदर्शित न हो तो ही अच्छा है। लड़का धोती कुर्ता पहने। ऊपर से जाकेट या बन्द गले का कोट पहना जा सकता है।

🔴 16.सार्वजनिक सत्कार्यों के लिए दान:-- विवाह के हर्षोत्सव में अपनी प्रसन्नता की अभिव्यक्ति लोकोपयोगी सार्वजनिक कार्यों के लिए मुक्तहस्त से दान देकर की जाय।

🔵 विवाहों में दोनों पक्षों को अपने-अपने बड़प्पन की बहुत चिन्ता रहती है। यह दिखाने की कोशिश की जाती रहती है कि हम कितने अमीर और उदार हैं। उसकी एक ठोस कसौटी यह है कि दोनों पक्ष अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार सार्वजनिक सत्कर्मों के लिये उदारता पूर्वक अधिक दान देकर अपने सच्चे बड़प्पन का परिचय दें।

🔴 17. प्रीतिभोज कन्या के स्वागत समारोह के रूप में हो:--
विवाह से एक दिन पहले लड़के के यहां प्रीतिभोज करने का रिवाज है। इसके स्थान पर बारात घर लौट आने पर नवागन्तुक वधू के स्वागत में एक छोटा सम्मान समारोह किया जाय।

🔵 विवाह से पूर्व किए गए प्रीतिभोज में जो लोग जाते हैं उनसे शिष्टाचारवश बारात में चलने के लिये कहना पड़ता है और मन में कम व्यक्ति ले जाने की इच्छा होते हुये भी बारात बढ़ जाती है। इसलिए उसे बारात लौटने पर किया जाय। वे वधू को आशीर्वाद देने आवें और उसे कुछ उपहार भी दें। इससे वधू का मान गौरव बढ़ेगा और उसे प्रसन्नता भी होगी। तब उसे बहुत बड़ा न करके संक्षिप्त या स्वल्पाहार तक सीमित करना भी सरल हो जायगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 34)

🌞 दिए गए कार्यक्रमों का प्राण-पण से निर्वाह
🔴 कांग्रेस की स्थापना की एक शताब्दी होने को चली है, जिसमें हमने काम किया, वह अलग थी। उसमें काम करने के हमारे अपने विलक्षण अनुभव रहे हैं। अनेक मूर्धन्य प्रतिभाओं से सम्पर्क साधने के अवसर अनायास ही आते रहे हैं। सदा विनम्र और अनुशासनरत स्वयं सेवक की अपनी हैसियत रखी। इसलिए मूर्धन्य नेताओं की सेवा में किसी विनम्र स्वयं सेवक की जरूरत पड़ती, तो हमें ही पेल दिया जाता रहा। आयु भी इसी योग्य थी। इसी संपर्क में हमने बड़ी से बड़ी विशेषताएँ सीखी। अवसर मिला तो उनके साथ भी रहने का सुयोग मिला, साबरमती आश्रम में गाँधी जी के साथ और पवनार आश्रम में विनोबा के साथ रहने का लाभ मिला है। दूसरे उनके समीप जाते हुए दर्शन मात्र करते हैं या रहकर लौट आते हैं जब कि हमने इन सम्पर्कों में बहुत कुछ पढ़ा और जाना है। इन सबकी स्मृतियों का उल्लेख करना तो यहाँ अप्रासंगिक होगा, पर कुछ घटनाएँ ऐसी हैं, जो हमारे लिए कल्पवृक्ष की तरह महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुईं।

🔵 सन् १९३३ की बात है। कलकत्ता में इंडियन नेशनल काँग्रेस का अधिवेशन था। उन दिनों काँग्रेस गैर कानूनी थी, जो भी जाते, पकड़े जाते, गोली काण्ड भी हुआ। जिन्हें महत्त्वपूर्ण समझा गया, उन्हें बर्दवान स्टेशन पर पकड़ लिया गया और ईस्ट इंडिया कंपनी के जमाने में बनी गोरों के लिए बनाई गई एक विशेष जेल (आसनसोल) में भेज दिया गया। इसमें हम भी आगरा जिले के अपने तीन साथियों के साथ पकड़े गए। यहाँ हमारे साथ में मदनमोहन मालवीय जी के अलावा गाँधीजी के सुपुत्र देवीदास गाँधी, श्री जवाहरलाल नेहरू की माता स्वरूप रानी नेहरू, रफी अहमद किदवई, चंद्रभान गुप्ता, कन्हैयालाल खादी वाला, जगन प्रसाद रावत आदि मूर्धन्य लोग थे। वहाँ जब तक हम लोग रहे, सायंकाल महामना मालवीय जी का नित्य भाषण होता था। मालवीय जी व माता स्वरूपरानी सबके साथ सगे बच्चों की तरह व्यवहार करते थे।

🔴  एक दिन उनने अपने व्याख्यान में इस बात पर बहुत जोर दिया कि हमें आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए हर मर्द से एक पैसा और हर स्त्री से एक मुट्ठी अनाज माँग कर लाना चाहिए, ताकि सभी यह समझें कि काँग्रेस हमारी है। हमारे पैसों से बनी है। सबको इसमें अपनापन लगेगा एवं एक मुट्ठी फंड ही इसका मूल आर्थिक आधार बन जाएगा। वह बात औरों के लिए महत्त्वपूर्ण न थी, पर हमने उसे गाँठ बाँध लिया। ऋषियों का आधार यही ‘‘भिक्षा’’ थी। उसी के सहारे वे बड़े-बड़े गुरुकुल और आरण्यक चलाते थे। हमें भविष्य में बहुत बड़े काम करने के लिए गुरुदेव ने संकेत दिए थे। उनके लिए पैसा कहाँ से आएगा, इसकी चिंता मन में बनी रहती थी। इस बार जेल से सूत्र हाथ लग गया। जेल से छूटने पर जब बड़े काम पूरे करने का उत्तरदायित्व कंधे पर आया तब उसी फार्मूले का उपयोग किया। ‘‘दस पैसा प्रतिदिन या एक मुट्ठी अनाज’’ अंशदान के रूप में यही तरीका अपनाया और अब तक लाखों नहीं, करोड़ों रुपया खर्च करा चुके हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/diye.4

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 34)

🌞  हिमालय में प्रवेश

पत्तीदार साग

🔵 सोचता हूं इस संसार में किसी वस्तु का महत्व तभी समझा जायगा जब उसकी उपयोगिता का पता हो। यह तीनों पत्तीदार साग मेरी दृष्टि में उपयोगी थे इसलिये वे महत्वपूर्ण भी जड़ें और स्वादिष्ट थीं। इन पहाड़ियों की इस उपयोगिता को न जाना था और न माना था इसलिए उनके समीप यह मुफ्त का साग मनों खड़ा था पर उससे वे लाभ नहीं उठा पा रहे थे। किसी वस्तु या बात की उपयोगिता जाने और अनुभव किये बिना मनुष्य न तो उसकी ओर आकर्षित होता है और न उसका उपयोग करता है। इसलिए किसी वस्तु का महत्व पूर्ण होने से भी बढ़कर है उसकी उपयोगिता को जानना और उनसे प्रभावित होना।

🔴 हमारे समीप भी कितने ही ऐसे तथ्य हैं जिनकी उपयोगिता समझ ली जाय तो उनसे आशाजनक लाभ हो सकता है। ब्रह्मचर्य, व्यायाम, ब्रह्म मुहूर्त में उठना, सन्ध्या वन्दन, समय का सदुपयोग, सात्विक आहार, नियमित दिनचर्या, व्यसनों से बचना, मधुर भाषण, शिष्टाचार आदि अनेकों तथ्य ऐसे हैं जिनका उपयोग हमारे लिए अतीव लाभदायक है और इनको व्यवहार में लाना कठिन भी नहीं है फिर भी हममें से कितने ही इनकी उपेक्षा करते हैं, व्यर्थ समझते हैं और हृदयंगम करने पर होने वाले लाभों से वंचित रह जाते हैं।

🔵 पहाड़ी लोग उपयोगिता न समझने के कारण ही अपने बिलकुल समीप प्रचुर मात्रा में खड़े पत्तीदार शाकों का लाभ नहीं उठा रहे थे। इसके लिए उनकी निन्दा करना व्यर्थ है। हमारे समीप भी तो आत्मकल्याण के लिए अगणित उपयोगी तथ्य बिखरे पड़े हैं पर हम ही कब उनको व्यवहार में लाते और लाभ उठाते हैं? मूर्खता में कोई किसी से पीछे भी क्यों रहे?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 24 जनवरी 2017

👉 सोशल मीडिया पर उल्लू बनने से ऐसे बचें (अंतिम भाग)

🔴 अफवाह फैलाने पर कानूनी सजा

झूठी अफवाह फैलाने पर आईपीसी 153 और 505 के तहत कानूनन सजा हो सकती है। हाल में स्व. जयललिता के अस्पताल में भर्ती होने के बाद वट्सऐप पर अफवाह फैलाने के लिए तमिलनाडु पुलिस ने 8 लोगों को सेक्शन 505 के तहत गिरफ्तार किया था। इसलिए कभी भी राजनीतिक/धार्मिक आदि मेसेज जब तक कन्फर्म ने कर लें, आगे न भेजें।

🔴 ब्रैंड राइवलरी का गेम

कॉर्पोरेट वर्ल्ड में लोग अपने ब्रैंड को बेहतर साबित करने या दूसरे को खराब जताने के लिए सोशल मीडिया का खूब इस्तेमाल करते हैं। जैसे कि मोबाइल फटने की अफवाह। एक ही फोन, अलग-अलग वक्त पर, अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग लोगों के जख्मों के साथ दिखता है। आप ही बताइए कि 3-4 लोगों के पास बिल्कुल एक ही तरह से टूटा हुआ फोन कैसे हो सकता है? यहां तक कि जख्मी भी लोग मोबाइल फटने से नहीं हुए होते हैं। वे फोटो किसी दंगे की होती हैं या फिर किसी और वजह से जले इंसानों की होती हैं।

🔴 कैसे बचें

- ऐसी फोटो को तवज्जो न दें। जहां तक फटने की बात है तो कोई भी फोन फट सकता है तो क्या मोबाइल इस्तेमाल करना बंद कर देंगे?

🔴 खबरों का खेल समझें
अक्सर लोग चैनलों और अखबारों के नाम पर झूठी खबरें खूब फैलाते रहते हैं। लोग टीवी पर चलती हुई न्यूज का मोबाइल से फोटो लेकर उस पर फोटोशॉप में जाकर कुछ भी लिख देते हैं। फिर वट्सऐप पर लोगों को भेजने लगते हैं या फिर फेसबुक पर पोस्ट कर देते हैं। इस तरह लाखों लोगों तक यह झूठ पहुंच जाता है।

🔴 कैसे बचें

गौर से देखेंगे तो इस तरह की फोटो में जो न्यूज़ दिख रही है, उसकी सफेदी, लोगो, नीचे छोटी ब्रेकिंग न्यूज़ वाली पट्टी और बैकग्राउंड के लाल रंग में भी हल्का-सा फर्क होता है। फॉन्ट भी अलग होता है। और सबसे बड़ी बात, अगर यह न्यूज़ इतनी बड़ी है तो किसी और मीडिया या गूगल पर क्यों नहीं?

🔴 डेटिंग ट्रैप

जैसा कि आपको पहले बताया, लोग फेसबुक आदि से लड़कियों की फोटो चुराकर डेटिंग प्रोफाइल बनाते हैं और फिर किसी लड़के के प्रोफाइल पर कुछ दिन नजर रखते हैं। फिर किसी लड़की का फोटो, कोई काल्पनिक नाम इस्तेमाल कर दोस्ती करते हैं। अंत में कोई सर्विस/वेबसाइट आदि जॉइन करने को कहते हैं या फिर किसी की मदद के नाम पर पैसा ठग लेते हैं।

🔴 कैसे बचें

डेटिंग साइट्स से दूर रहें या जब तक सामने वाले से असल में मिल न लें, दूर रहें।

🔴 लाइक्स का गेम

'लाइक' का मतलब है कि किसी फेसबुक पेज के 'लाइक' पर क्लिक करना। इससे उस पेज पर कुछ भी आएगा वह आपको दिखेगा। अब फिर यहां आपकी भावनाओं का फायदा उठाया जाता है। ऐसे पेज कुछ ऐसा नाम रखते हैं जो आपको पसंद हो जैसे 'मैं भारतीय सेना को सपोर्ट करता हूं'। अब जहां सेना का नाम आ जाता है, लोगों की सोचने की शक्ति कम पड़ जाती है और देशभक्ति की भावना बढ़ जाती है। ऐसे पेज 4-5 सैनिकों की फोटो पोस्ट करते हैं जिनमें ज्यादातर झूठे होते हैं। ये किसी फिल्म से या किसी दूसरे देश की सेना से लिए जाते हैं। फिर भगवान की फोटो आपकी दिलचस्पी बनाए रखने डाल दिए जाते हैं। इन सबके बीच में या तो कोई वेबसाइट का लिंक (जो नाम से न्यूज वाली लगती है) या किसी राजनैतिक नेता की तारीफ वाली पोस्ट होती हैं। ऐसी न्यूज जैसी वेबसाइट भी होती है, जिनके पेज पर चारों ओर विज्ञापन भरे मिलते हैं। ध्यान रखें कि भावनाओं में बहकर किसी भी अनजान फोटो या पेज को लाइक न करें।

🔴 सचाई कैसे देखें

- आपको अगर किसी मेसेज की सचाई जांचनी है, तो उसमें से चुनिंदा शब्द या फिर पूरा वाक्य गूगल में टाइप करें। न्यूज सही होती है तो अक्सर वहां मिल ही जाती है।
- फोटो में कुछ लिखा हो तो वही शब्द या जिस जगह/चीज के बारे में हो उसका नाम गूगल पर इमेजेज सेक्शन में जाकर ढूंढें।
- जरूरी नहीं कि न्यूज या इमेज गूगल के पहले पेज पर ही मिले। कभी-कभी थोड़ा आगे जाना पड़ता है।
- ज्यादातर सर्च में गूगल पर न्यूज/इमेज के सामने तारीख भी लिखी आती है, जिससे पता चलता है कि यह बिलकुल नई बात है या बरसों पुरानी।
- यहां खास बात यह है कि यह तारीख नहीं बदली जा सकती।

🔴 हर लिंक पर न करें क्लिक

कई लिंक आपको ऐसी वेबसाइट पर ले जाते हैं, जहां कोई स्क्रिप्ट आपके ब्राउज़र पर खतरे का मेसेज दिखाएगी। मोबाइल वाइब्रेट होने लगेगा और अगर आप डर कर दिए हुए बटन को दबाएंगे तो कोई ऐप डाउनलोड हो जाएगा जो सिर्फ विज्ञापन ही दिखाएगा। ब्राउज़र फोन को धीमा भी कर देगा इसीलिए किसी अनजान लिंक पर न क्लिक करें।

🔴 कहां कर सकते हैं शिकायत

अगर किसी ने आपकी फोटो का गलत इस्तेमाल किया है या आपके नाम से कोई गलत मेसेज लोगों को भेजा है तो आप सीबीआई की साइबर सेल में शिकायत कर सकते हैं।

Add: सीबीआई साइबर क्राइम सेल, सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस, साइबर क्राइम इन्वेस्टिगेशन सेल, सीबीआई, 5th फ्लोर, ब्लॉक 3, सीजीओ कॉम्प्लेक्स, लोधी रोड-3, लोधी रोड

फोन: 011- 436-2203, 439-2424

वेबसाइट: cbi.nic.in, ईमेल cbiccic@bol.net.in

इसके अलावा इकनॉमिक ऑफेंसेस विंग (EOW) के अंदर साइबर सेल में भी शिकायत कर सकते हैं।
अड्रेस: असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ पुलिस, साइबर क्राइम, पुलिस ट्रेनिंग स्कूल कॉम्प्लेक्स, मालवीय नगर
फोन: 011-26515229
ईमेल: acp-cybercell-dl@nic.in

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 Jan 2017


👉 आज का सद्चिंतन 25 Jan 2017


👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 18) 25 Jan

🌹 सार्थक, सुलभ एव समग्र साधना  

🔴 पदार्थ से शरीर और आत्मा का महत्त्व अधिक है। इसी प्रकार समृद्धि-सम्पन्नता का, प्रगति और योग्यता का, आत्मिक प्रखरता, प्रतिभा का स्तर भी क्रम से, एक से एक सीढ़ी ऊँचाई का समझा जा सकता है। आन्तरिक आस्थाएँ ही वे विभूतियाँ हैं, जो व्यक्ति के चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को परिष्कृत करती हैं। व्यक्तित्त्व को प्रखर, प्रामाणिक एवं प्रतिभावान् बनाती हैं। इसी आधार पर वे क्षमताएँ उभरती हैं, जो अनेकानेक सफलताओं की उद्गम स्रोत हैं।              

🔵 आत्मबल के आधार पर अन्य सभी बल हस्तगत किये जा सकते हैं। इसी के आधार पर उपलब्धियों का सदुपयोग बन पड़ता है। परिस्थितियों की प्रतिकूलता रहने पर भी उन्हें व्यक्तित्त्व की उत्कृष्टता के आधार पर अनुकूल बनाया जा सकता है। संसार के इतिहास में ऐसे अगणित व्यक्ति हुए हैं, जिनकी प्रारम्भिक परिस्थितियाँ गई-गुजरी थीं। निर्वाह के साधनों तक की कमी पड़ती थी, फिर प्रगति के सरंजाम जुट सकना और भी कठिन, लगभग असम्भव दीख पड़ता था। इतने पर भी वे व्यक्तित्त्व की प्रामाणिकता के आधार पर सभी के लिये विश्वस्त एवं आकर्षक बन गये। उनका चुम्बकत्व व्यक्तियों, साधनों और परिस्थितियों को अनुकूल बनाता चला गया और वे अपने पुरुषार्थ के साथ उस सद्भाव का तालमेल बिठाते हुए दिन-दिन ऊँचे उठते चले गये और अन्तत: सफलता के सर्वोच्च शिखर तक जा पहुँचने में समर्थ हुए। ऐसे अवसरों पर व्यक्तित्त्व की उत्कृष्टता को ही श्रेय दिया जाता है। इस उपलब्धि को ही आत्मबल का चमत्कार कहते हैं।  

🔴 इसके विपरीत ऐसे भी अनेकानेक प्रसंग सामने आते रहते हैं, जिसमें सभी अनुकूलताएँ रहने पर भी लोग अपनी दुर्बुद्धि के कारण दिन-दिन घटते और गिरते चले गये। पूर्वजों के कमाये धन को दुर्व्यसनों में उड़ा दिया। आलस्य और प्रमाद में ग्रसित रहकर अपनी क्षमताओं और सम्पदाओं को गलाते चले गये। कई अनाचार के मार्ग पर चल पड़े और दुर्गति भुगतने के लिये मजबूर हुए। इसमें उनके मानस की गुण, कर्म, स्वभाव की निकृष्टता ने अनेक सुविधाएँ रहते हुए भी उन्हें असुविधा भरी परिस्थितियों तक पहुँचा दिया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 34) 25 Jan

🌹 नित्य उपासना से अधिक लाभ

🔴 प्रति दिन प्रातः सायं नियमित रूप से गायत्री उपासना का विधान है। उस नियमितता में कोई व्यतिरेक नहीं आने देना चाहिए। तन्मयता और एकाग्रता तो उपासना को सर्वांगपूर्ण बनाने के लिए अनिवार्य है ही। पर इतने मात्र से ही आत्मकल्याण की आवश्यकता पूरी नहीं हो जाती है। स्वास्थ्य संरक्षण के लिए दिन में दो या तीन बार भोजन करते हैं। शरीर के पोषण और स्वास्थ्य संरक्षण के लिए यह आवश्यक है, पर इतने मात्र से यह उद्देश्य पूर्ण नहीं हो जाता। इसके साथ ही श्रमशील जीवन जीने, दिनचर्या में और भी कई नियमों का समावेश करना आवश्यक हो जाता है। यदि इन आवश्यक बातों का ध्यान न रखा गया तो कितना ही पोष्टिक भोजन किया जाय, उससे पोषण और स्वास्थ्य संरक्षण की आवश्यकता पूरी नहीं होती। गायत्री उपासना थोड़े समय तक की जाती है लेकिन उसका पूरा लाभ तभी मिलता है जब जीवन-पथ में उपासना के साथ-साथ साधना का भी समावेश किया जाय।

🔵 पहलवान लोग शारीरिक शक्ति का संवर्धन करने के लिए पौष्टिक भोजन तो करते ही हैं लेकिन उसका अधिकाधिक लाभ उठाने के लिए अधिकाधिक श्रम, व्यायाम, दण्ड, बैठक आदि भी करते हैं, तभी उसका समुचित लाभ मिलता है। जिन्हें गायत्री उपासना से अधिकाधिक लाभ उठाना है, उन्हें चाहिए कि वे उपासना के साथ साधनात्मक व्यायाम भी करें। यदि उपासना का स्तर अधिक ऊंचा कर दिया जाय, उसे साधना स्तर की बना दिया जाय तो उसका लाभ और भी अधिक मिलता है। साधना से आशय उपासना में निष्ठा का अधिकाधिक समावेश करना है। निष्ठा का समावेश संकल्प, दृढ़ता, अनुशासन और नियमितता के रूप में चरितार्थ होता है।

🔴 निष्ठा के समावेश से संकल्प बढ़ता है, संकल्प से मनोबल, आत्मिक बल ऊंचा उठता है। यह मनोबल, संकल्प, दृढ़ता, समन्वित-निष्ठा साधक को कठोर अनुशासन में रहने के लिए प्रेरित और बाध्य करती है। यह अनुशासन, नियमानुवर्ती ही तपश्चर्या कहलाती है। अनुष्ठान साधनाओं में इन्हीं बातों की विशेष रूप से आवश्यकता पड़ती है। और यदि नियमित साधना में भी इन विशेषताओं का समावेश कर लिया जाय तो वह सामान्य उपासना क्रम भी अनुष्ठान स्तर का बन जाता है। अस्तु गायत्री उपासना का अधिकाधिक लाभ उठाने के लिए उसमें नियम पालन, अनुशासन, निष्ठा, दृढ़ता और नियमितता का कड़ाई के साथ पालन करना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 28) 25 Jan

🌹 साहस का शिक्षण—संकटों की पाठशाला में

🔵 शरीर और मन की अनुकूलताएं रुचिकर लगती हैं। उन्हें जुटाने के लिए मनुष्य का समूचा पुरुषार्थ लगा रहता है। जीवन यापन के लिए आवश्यक सुविधायें जुटाई जायं, यह उचित है पर यह नहीं भूलना चाहिये कि चाहते हुए भी वह जरूरी नहीं कि सदा अभीष्ट प्रकार की परिस्थितियां बनी रहेंगी। कठिनाइयां प्रतिकूलताएं भी जीवन पथ पर प्रस्तुत होती हैं तथा मनुष्य के धैर्य एवं जीवट की परीक्षा लेती हैं। अनभ्यस्त शरीर और मन को ऐसे अवसरों पर अधिक परेशानी होती है। उपस्थित कठिनाइयों संकटों को वे व्यक्ति अभिशाप मानते हैं। जिन्होंने सतत अनुकूलताओं में ही रहना सीखा है।

🔴 प्रायः देखा यह जाता है संकटों के अवसर पर अनभ्यस्त अपना मन ही अधिक समस्या खड़ा करता है। आरम्भ से ही उसे हर तरह की परिस्थितियों में रहने के लिए प्रशिक्षित और अभ्यस्त किया गया होता तो उपस्थित होने वाली कठिनाइयां भी खेल-खिलवाड़ जैसी महसूस होतीं। पुरुषार्थ एवं जीवट को निखारने का उन्हें भी माध्यम माना जाता है तथा उतना ही उपयोगी उन्हें भी समझा जाता है जितना कि अनुकूल परिस्थितियों को।

🔵 पर बिरले होते हैं जो अनुकूल अथवा प्रतिकूल परिस्थितियों में एक जैसे निस्पृह बने रहते हैं और अपने मन को दोनों ही में सन्तुलित बनाये रखते हैं। अन्यथा अधिकांश की प्रसन्नता अप्रसन्नता परिस्थितियों पर अवलम्बित होती है। वे अभीष्ट तरह की सुख सुविधाएं उपलब्ध रहने पर मोद मनाते तथा उनके तिरोहित होते ही शोकातुर हो उठते हैं। थोड़े से व्यक्ति ऐसे भी होते हैं जो कठिनाइयों तथा संघर्षों को स्वयं आमन्त्रित करते हैं। सुविधाओं तथा ढर्रे का जीवन उन्हें नहीं रुचता। कठिनाइयों संकटों से जूझे बिना उन्हें चैन नहीं पड़ता। वे जानते हैं कि उनका सामना किये बिना आन्तरिक जीवट को उभरने और सुदृढ़ बनने का अवसर नहीं मिल सकता। ऐसे व्यक्ति शूरवीर साहसी मनस्वी बनते हैं। स्वयं धन्य होते और दूसरों का प्रेरणा प्रकाश देते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌿🌞     🌿🌞     🌿🌞

👉 आप अपने आपको पहचान लीजिये (भाग 6)

 👉 युग ऋषि की अमृतवाणी
🔴 और बड़े महत्त्वपूर्ण आदमी है और ऐसे महत्त्वपूर्ण और कीमती आदमी हैं कि आप अपने महत्त्व का और आप अपने कीमत का ठीक इस्तेमाल करने में समर्थ हो सकें तो आपके लिये भी मजा जाये और हमारे लिये भी मजा आ जाये। दोनों के दोनों ही धन्य हो जायें और दोनों के दोनों ही आज का हमारा यह प्रवचन है इसको सुनकर यह कहे कि इस आदमी ने बहुत ही नेक सलाह दी थी। और अगर हमने इस सलाह को न माना होता तो हम बहुत घाटे में रहे होते। आप हमारा कहना मानिए और हमारी सलाह पर चलिये। हम भी किसी की सलाह पर चले हैं घाटा हमने भी उठाया है। जोखिम हमने भी उठाया है। जोखिम उठाना कोई बहुत बुरी बात नहीं है।

🔵 हनुमान् जी ने भी जोखिम उठाया था कुन्ती ने भी जोखिम उठाया था। कुन्ती ने कहाँ से ढूँढ़े थे पाँच बच्चे सामान्य नहीं थे उनके पति के नहीं थे पाण्डु के नहीं थे। वह किसके थे एक सूर्य का बेटा था, एक इन्द्र का बेटा था, एक वरुण का बेटा था, एक वायु का बेटा था और छः देवताओं के ही सब बेटे थे। और उन्होंने सबको भगवान् के सुपुर्द कर दिया। ले जाओ अरे बड़ी पागल थी कुन्ती अपने घर रखती अपने बच्चों की कमाई खाती और अपने घर में मकान बनाती अपनी दुकान चलाती और अपनी खेती करती और सब बच्चों को नौकरी से लगा देती तो सब लड़के बहुत सारा कमाते और मजा आता जेवर पहनते लेकिन कुन्ती कुन्ती ने मुनासिब सलाह दी कि गैरमुनासिब सलाह दी बड़ी मुनासिब सलाह दी और मुनासिब सलाह का परिणाम यह हुआ कि अर्जुन धन्य हो गया युधिष्ठिर धर्मराज हो गया। और अगर श्रीकृष्ण जी के फेर में न आये होते महाभारत में न गये होते तो न वो युधिष्ठिर रहे होते और न धर्मराज रहे होते न पार्थ हुये होते और न वह भीम हुये होते साधारण से व्यक्ति रह जाते और सामान्य स्थिति में उनको जीवन यापन करना पड़ता। लेकिन उन्होंने उनका कहना मान लिया तो बहुत ही अच्छा हुआ। क्या कह रहे हम यो कह रहे कि इस समय आपकी बहुत आवश्यकता है।

🔴 आप अपने आपको पहचान लीजिये कि सामान्य आदमी नहीं है और असामान्य हैं और आप सामान्य काम के लिये पैदा नहीं हुये हैं असामान्य काम के लिये पैदा हुये हैं। आप नौकरी करने के लिए पैदा नहीं हुये है, आप पढ़ने के लिये पैदा नहीं हुये हैं हमने भी पढ़ा नहीं है हम स्कूल नहीं गये हैं। स्कूल के अलावा हम पढ़े हैं। और नौकरी की है नौकरी भी नहीं की है लेकिन हम नफे में रहे हैं नौकरी करते तो क्या मिल जाता और हम पड़कर के बी.ए हो जाते तो क्या मिल जाता। लेकिन हमने जो किया है जो हमको मिला है वह बहुत फायदे का मिला है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/lectures_gurudev/31.2

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 82)

🌹 आदर्श विवाहों के लिए 24 सूत्री योजना

🔴 13. पवित्र धर्मानुष्ठान का यज्ञीय वातावरण रहे:- मांस, मदिरा, रण्डी भाड़ नचकैये, अश्लील गीत, गन्दे मजाक, आदि के हेय असुर कृत्यों से इस धर्म संस्कार की पवित्रता नष्ट न होने दी जाय।

🔵 विवाह एक श्रेष्ठ यज्ञ है। उसमें देवताओं का आह्वान वेद पाठ एवं दो आत्माओं को जोड़ने वाला महान धर्मानुष्ठान सम्पन्न होता है। ऐसे शुभ समय में उपरोक्त बुराइयों के समावेश का कोई तुक नहीं। जहां इन बातों का रिवाज चल पड़ा है, वहां उसे बन्द किया जाय। गन्दे रिकार्ड भी लाउडस्पीकर में विवाह में न बजें।

🔴 14. विवाह संस्कार प्रभावशाली ढंग से हों:- विवाह मण्डप की बढ़िया सजावट, हवन की सुव्यवस्था दोनों पक्ष के नर-नारियों के बैठने योग्य समुचित स्थान, कोलाहल, धुंआ आदि से बचाव, विद्वान पण्डित जो विवाह विधान को व्याख्यापूर्वक समझा सके—इन सब बातों का प्रबन्ध विशेष ध्यान देकर किया जाय।

🔵 विवाह संस्कार जैसी दो आत्माओं के आत्म समर्पण की धर्म प्रक्रिया का अत्यन्त महत्व है। उसी के उपलक्ष्य में ही इतना सारा आडम्बर रचा जाता है। खेद है कि संस्कार कराने वाले पण्डितों के अनाड़ीपन तथा घर वालों की उपेक्षा के कारण संस्कार की विधि व्यवस्था भार रूप चिह्न पूजा मात्र रह जाती है जिससे हर कोई जल्दी से जल्दी पिंड छुड़ाना चाहता है। आदर्श विवाहों में यह रूप बदला जाना चाहिये, और सुयोग्य पण्डितों के द्वारा शास्त्रोक्त विधि विधान के साथ ऐसे सुन्दर ढंग से विवाह कराने का प्रबन्ध किया जाय जिसे देखने में सबका मन लगे। मन्त्र की व्याख्या भी ऐसे प्रभावशाली ढंग से हो कि वर-वधू ही नहीं उपस्थित समस्त नर-नारी भी अपने विवाहित जीवन का उद्देश्य और कर्तव्य समझ सकें। इसके लिए आवश्यक प्रबन्ध पहले से ही कर रक्खा जाय।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 33)

🌞 दिए गए कार्यक्रमों का प्राण-पण से निर्वाह

🔴 देश के लिए हमने क्या किया कितने कष्ट सहे, सौंपे गए कार्यों को कितनी खूबी से निभाया इसकी चर्चा यहाँ करना सर्वथा अप्रासंगिक होगा। उसे जानने की आवश्यकता प्रतीत होती हो तो परिजन-पाठक उत्तरप्रदेश सरकार के सूचना विभाग द्वारा प्रकाशित ‘‘आगरा सम्भाग के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी’’ पुस्तक पढ़ें। उसमें अनेक महत्त्वपूर्ण कार्यों के साथ हमारा उल्लेख हुआ है। ‘‘श्रीराम मत्त हमारा उन दिनों का प्रचलित नाम है। यहाँ तो केवल यह ध्यान में रखना है कि हमारे हित में मार्ग दर्शक ने किस हित का ख्याल मन में रखकर यह आदेश दिया।’’

🔵 इन दस वर्षों में जेलों में तथा जेल से बाहर अनेक प्रकृति के लोगों से मिलना हुआ। स्वतंत्रता संग्राम के समय में जन-जागृति चरम सीमा पर थी। शूरवीर, साहस के धनी, संकल्प बल वाले अनेकों ऐसे व्यक्ति सम्पर्क में आए, जिनसे हमने कुछ सीखा। जनसमुदाय को लाभान्वित करने और नैतिक क्रांति जैसे बड़े कार्य के लिए अपना प्रशंसक, समर्थक सहयोगी बनाने हेतु किन रीति-नीतियों को अपनाना चाहिए, यह मात्र दो वर्षों में ही सीखने को मिल गया। इसके लिए वैसी पूरी जिंदगी गुजार देने पर यह सुयोग उपलब्ध नहीं होता।

🔴 विचित्र प्रकार की विचित्र प्रकृतियों का अध्ययन करने का इतना अवसर मिला, जितना देश के अधिकाँश भाग का परिभ्रमण करने पर मिल पाता। हमारे मन में घर-गृहस्थी अपने-पराए का मोह छूट गया और उन विपन्न परिस्थितियों में भी इतनी प्रसन्नतापूर्वक जीवन जिया कि अपने आपे की मजबूती पर विश्वास होता चला गया। सबसे बड़ी बात यह कि हमारा स्वभाव स्वयं सेवक की तरह ढलता चला गया, जो अभी भी हमें इस चरमावस्था में पहुँचने पर भी विनम्र बनाए हुए है। हमारे असमंजस का समाधान उन दिनों गुजरे स्वतंत्रता संग्राम के प्रसंगों से हो गया कि क्यों हमसे अनुष्ठान दो भागों में कराया गया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/diye.3

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 33)

🌞  हिमालय में प्रवेश

पत्तीदार साग
🔴 साग भाजी का इधर शौक ही नहीं है। आलू छोड़कर और कोई सब्जी यहां नहीं मिलती। नीचे के दूर प्रदेशों से आने के और परिवहन के साधन न होने से आलू भी महंगा पड़ता है। चट्टी के दुकानदार एक रुपया सेर देते हैं। यों इधर छोटे-छोटे झरने हैं उनसे जहां-तहां थोड़ी-थोड़ी सिंचाई भी होती है किन्तु वहां भी शाक-भाजी होने का रिवाज नहीं है। रोज आलू खाते-खाते ऊब गया। सब्जी के बारे में वहां निवासियों तथा दुकानदारों से चर्चा की तो उन्होंने बताया कि जंगल में खड़ी हुई तरह-तरह की वनस्पतियों में से तीन पौधे ऐसे होते हैं जिनके पत्तों का साग बनाया जाता है (1) मारचा (2) लिंगड़ा (3) कोला।

🔵 एक पहाड़ी को पारिश्रमिक के पैसे दिये और इनमें से कोई एक प्रकार की पत्तियां लाने को भेजा। पौधे चट्टी के पीछे ही खड़े थे वह बात की बात में मारचा की पत्तियां दो-चार सेर तोड़ लाया। बनाने की तरकीब भी उसी से पूछी और उसी प्रकार उसे तैयार किया। बहुत स्वादिष्ट लगा। दूसरे दिन लिंगड़ा की और तीसरे दिन कोला की पत्तियां इसी प्रकार वहां के निवासियों से मंगवाई और बनाई खाईं। तीनों प्रकार की पत्तियां एक दूसरे से अधिक स्वादिष्ट लगीं। चित्त बहुत प्रसन्न हुआ। एक महीने हरी सब्जी नहीं मिली थी, इसे खाकर तृप्ति अनुभव की।

🔴 उधर के पहाड़ी निवासी रास्ते में तथा चट्टियों पर मिलते ही थे। उनसे जगह-जगह मैंने चर्चा की कि इतने स्वादिष्ट पत्तीदार साग जब आपके यहां पैदा होते हैं उन्हें काम में नहीं लेते? पत्तीदार साग तो स्वास्थ्य की दृष्टि से भी बहुत लाभ दायक होते हैं। उनमें से किसी ने न तो मेरी सलाह को स्वीकार किया और न उन सागों को स्वादिष्ट तथा लाभप्रद ही माना। उपेक्षा दिखाकर बात समाप्त करदी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 33) 24 Jan

🌹 जप-यज्ञ के समय के वस्त्र
🔴 ऐसे कपड़े जो शरीर पर चिपके रहते हैं—नित्य नहीं धुलते, उनको धार्मिक क्रिया-कृत्यों में धारण न किया जाय तो ही अच्छा है। मोजे हर हालत में उतार देने चाहिए, उनकी गन्दगी लगभग जूते के ही समतुल्य होती है।

🔵 जिन प्रदेशों में धोती कुर्ते का रिवाज नहीं है, बनाना भी कठिन है, वहां पाजामा के उपयोग की भी छूट मिल सकती है। पर वह भी धुला हुआ तो हो, यह ध्यान रखा जाय। जहां आसानी से धोती-कुर्ते का प्रबन्ध हो सकता है, वहां तो उसके लिए जोर दिया ही जाय। इस सन्दर्भ में आलस्य या उपेक्षा न बरतें। कंधे पर पीला दुपट्टा धर्मानुष्ठानों के लिए शास्त्रोक्त परिधान है। जहां तक सम्भव हो जप, साधना यज्ञ-प्रक्रिया आदि के अवसर पर कंधे पर पीला दुपट्टा रखा जाय। इसमें सांस्कृतिक एकता एवं भावनात्मक समस्वरता का समावेश है।

🔴 इसलिए यथासम्भव सभी धर्मकृत्यों में धोती, कुर्ता, पीला दुपट्टा धारण करने पर जोर दिया जाय। पर इसे इतना कड़ा प्रतिबन्ध माना जाय कि किसी श्रद्धालु को मात्र इसी कारण सम्मिलित होने से रोका जाय। अच्छा यह है कि सामूहिक आयोजनों में कुछ सैट इस प्रकार के रखे जायें जिन्हें वे लोग प्रयोग कर सकें जो इस प्रकार के वस्त्र घर से लेकर नहीं आये हैं। महिलाएं प्रायः साड़ियां ही पहनती हैं। वे धर्मकृत्यों में पीली रंगी रहें। शरीर पर धारण करने के वस्त्र चिपके रहने वाले नहीं ढीले होने चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 27) 24 Jan

🌹 उत्साह एवं सक्रियता चिरयौवन के मूल आधार

🔵 जॉर्ज बर्नार्ड शॉ 93 वर्ष की आयु तक इतना अधिक लिखते थे कि वे स्वयं 40 वर्ष की आयु में भी इतना नहीं लिख पाते थे। दार्शनिक वैनदित्तो क्रोचे 80 वर्ष की अवस्था में भी नियमित रूप से दस घण्टे काम करते थे। 85 वर्ष की आयु में उन्होंने दो महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं जिनकी चर्चा विश्व साहित्य में होती है। बट्रेण्ड रसेल को 78 वर्ष की आयु में उस कृति पर पुरस्कार मिला जो उन्होंने 77 वर्ष की अवस्था में पूरी की थी। माटिस मैटर लिंक का देहान्त 88 वर्ष की आयु में हुआ। जिन दिनों वे मरे, उसके कुछ दिन पूर्व ही उन्होंने अपनी अन्तिम पुस्तक पूरी की थी। इस पुस्तक का नाम था ‘द एवार्ट ऑफ से टू ऑल’ यह पुस्तक उनकी सर्वोत्कृष्ट रचना समझी जाती है।

🔴 ब्रिटेन के सुप्रसिद्ध अखबार ‘डेली एक्सप्रेस’ के संचालक लॉर्ड वीवनवर्क 80 वर्ष की अवस्था में भी दफ्तर में जमकर बैठते और काम करते थे। दार्शनिक काण्ट को 74 वर्ष की अवस्था में उनकी एक रचना के आधार पर दर्शन क्षेत्र में प्रतिष्ठा मिली। 60 वर्ष की आयु के बाद चार वर्षों में उन्होंने ‘एन्थ्रोपोलॉजी’, ‘मेटा फिजिक्स ऑफ ईथिक्स’ और ‘स्ट्राइफ ऑफ फैकल्टीज’ ये तीन पुस्तकें लिखी थीं, जिनने उन्हें दार्शनिक जगत में प्रतिष्ठित किया। टैनीसन ने अपना प्रख्यात ग्रन्थ ‘क्रासिंग द बार’ 83 वर्ष की आयु में पूरा किया। होब्स ने 88 वर्ष की आयु में ‘इलियड’ अनुवाद प्रकाशित कराया था। चित्रकार टीटान ने विश्व प्रसिद्ध कलाकृति ‘वैटल ऑफ लिमाटो’ 98 वर्ष की आयु में पूरी की।

🔵 इंग्लैण्ड का इतिहास जिनने पढ़ा है, वे ग्लैडस्टन के नाम से अवश्य ही परिचित होंगे। ग्लैडस्टन ने 40 वर्ष की आयु में ब्रिटेन की राजनीति में प्रवेश किया और 70 वर्ष की आयु में राज्य का उत्तरदायित्व सम्हाला। ऑक्सफोर्ड यूनवर्सिटी में ‘होमर’ पर उनने जो भाषण दिया वह अत्यन्त शोध पूर्ण माना जाता है। पर जब प्रधानमन्त्री बने तब उनकी आयु 79 वर्ष थी। 85 वर्ष की आयु में उन्होंने ‘ओडेमी ऑफ हाटस्’ नामक ग्रन्थ की रचना की। वृद्धावस्था में भी वे चैन से नहीं बैठे रहे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 आप अपने आपको पहचान लीजिये (भाग 5)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी
🔴 आज हम आपको इसी तरह की बात बताने को हैं जो आपको शायद यह मालूम पड़ेगी कि हमको नुकसान की बात बताई जा रही है। लेकिन आप यकीन रखिये कि हम नुकसान की बात नहीं बताई जा रही है। आपको नफे की बात बता रहे हैं आपको नफा ही नफा है नुकसान हो जाये तो हमारी जिम्मेदारी है आप हमारे ऊपर यकीन करते हों तो कर लीजिये कि हमारे फायदे के लिए कहा जा रहा है नुकसान के लिए नहीं कहा जा रहा है। क्या कह रहे हैं हम यूँ कह रहे है कि आपकी लम्बी वाली जिंदगी है ४० की होगी, ५० की होगी १०० की होगी जो भी हो यदि उसमें यदि एक साल आप हमारे लिये निकाल दें तो इसमें नुकसान हुआ न हाँ साहब नुकसान हुआ यदि हम १०० रुपया महीना कमाते तो १२०० रुपये का हमारा नुकसान हो गया।

🔵 और समय चला गया हमारी खेती में नुकसान हो गया हमारी दुकान में नुकसान हो गया हमारा फलाना नुकसान हो गया और आप सलाह लीजिये किसी से अपनी माँ से पूछिए, धर्मपत्नी से पूछिए, भाई से पूछिए, भतीजे से पूछिए, साले से पूछिए, बहनोई से पूछिए सब यह कहेंगे कि यह बेअकली का बात है और बेवकूफी की बात है। इसमें सिवाय नुकसान के क्या फायदा है तुम्हारा। तुम पागल हो गये हो क्या। ऐसे तो सैकड़ों बाबाजी फिरते हैं, सैकड़ों पंडित फिरते हैं। किसी ने लिख दिया, छाप दिया और उन्होंने कहा तुम चल दिये। नुकसान तुम्हारी समझ में नहीं आता। नुकसान की बात है कि फायदे की बताइये मैं आपको फायदे की बता रहा हूँ। क्या फायदे की बात बता रहे हैं। हम यह फायदे की बात बता रहे हैं कि आप सो रहे हैं और आपको नींद आ गई है आप खुमारी में है। यदि आप अपनी सही स्थिति को जान लें तो आपको बड़ा मजा आ जायेगा। आप कौन है जानते हैं। हमारा नाम राम गोपाल है, मोहन लाल है गुलाब चंद है, नहीं आप न राम गोपाल हैं न गुलाब चंद हैं।

🔴  आप वो है कि हमने बड़ी मेहनत से और बड़ी मसक्कत से आपको ढूँढ़कर इकट्ठा किया है जिन लोगों के पास पूर्व जन्मों के संस्कार जमा थे और जो इस योग्य थे उनको हमने बड़ी मुश्किल से ढूँढ़ा और बड़ी मुश्किल से जमा किया है। सारी जिंदगी में हमारी एक ही सफलता है कि हमने संस्कारवान व्यक्तियों को इकट्ठा कर लिया है दूसरे लोग संस्कार वान व्यक्ति इकट्ठे नहीं कर पाये। बहुत सी कमेटियाँ हैं, संस्थायें हैं, अमुक हैं, तमुक हैं व्यक्ति तो किसी और के पास भी होंगे ये तो मैं नहीं कहता कि औरों के पास कोई व्यक्ति नहीं हैं हमारे पास हैं और हमारे पास बहुत सही आदमी हैं और हमने ढूँढ़कर निकाले हैं। मेहनत की है पानी में डुबकी लगाई है और डुबकी लगाकर के मोतियों के तरीके से आपको हमने ढूँढ़कर निकाला है और आप समझते ही नहीं। आप तो अपने को किसान समझते हैं, दुकानदार समझते हैं शिक्षक समझते हैं, विद्यार्थी समझते हैं। नौकर समझते हैं न जाने क्या समझते हैं। हम आपको समझते हैं कि आप बड़े कीमती आदमी हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 81)

🌹 आदर्श विवाहों के लिए 24 सूत्री योजना

🔴 11. विवाह के लिए नियत पर्व:-- सालग सोधने के झंझट में यदि उपयुक्त समय पर विवाह न बनता हो तो शुभ देव-पर्वों पर उन्हें निस्संकोच कर लिया जाये।

🔵 कई बार अभिभावकों की सुविधा के विपरीत पण्डित लोग विवाह न बनने का अड़ंगा लगाकर एक बड़ी कठिनाई उत्पन्न कर देते हैं। यों मासिक होने पर ज्योतिष-शास्त्र के अनुसार सूर्य, गुरु, चन्द्र आदि के देखने की बिलकुल भी जरूरत नहीं है और उसका विवाह किसी भी शुभ दिन किया जा सकता है। फिर भी अनाड़ी पण्डित कुछ न कुछ अड़ंगे खड़े करते रहते हैं। ऐसी उलझनों से बचने के लिए देव पर्वों पर पहले भी बिना पण्डित से पूछे विवाह होते थे। (1) कार्तिक में देवोत्थान, (2) माघ में बसन्त-पंचमी, (3) बैसाख में अक्षय तृतीया, (4) आषाढ़ में शुक्ल-पक्ष की नवमी इन चार अवसरों पर अभी भी विवाह किए जाते हैं। अब इनके अतिरिक्त छह नए और बढ़ा दिए जांय (1) कार्तिकी (कार्तिक सुदी 15) (2) गीता जयन्ती (मार्गशीर्ष सुदी 11) (3) शिवरात्रि (फाल्गुन वदी 13) (4) राम नवमी (चैत्र सुदी 9) (5) हनुमान जयन्ती (चैत्र सुदी 15) (6) गायत्री जयन्ती गंगा दशहरा (ज्येष्ठ सुदी 10)।

🔴 12. विवाह का शुभ समय गोधूलि बेला:-- सायंकाल सूर्य अस्त होते समय विवाह संस्कार के लिए सर्वोत्तम समय माना जाय।

🔵 बहुत रात गए विवाह संस्कार होने में, (1) बारात रात में चढ़ती है और रोशनी सजावट का बेकार खर्च बढ़ता है, (2) भोजन कराने में अनावश्यक विलम्ब होता है, (3) सारी रात बेकार जगते जाती है। (4) संस्कार के धर्मानुष्ठान देखने एवं शिक्षाओं को सुनने कम लोग वहां बैठते हैं अधिकांश तो थके मांदे सो ही जाते हैं। (5) अधिक रात विवाह का यज्ञ करने से उसमें कीड़े-मकोड़े गिरने का डर रहता है। (6) वर कन्या अलसाये व उनींदे रहते हैं। इन सब अड़चनों को हटाने के लिए गोधूलि हर विवाह के लिए उपयुक्त मानी जाय। सूर्य अस्त होने से एक घण्टे पूर्व कार्य आरम्भ करके एक दो घण्टे रात गये तक सब कार्य समाप्त हो सकता है। और उस समय सब लोग उस आनन्द समारोह में उत्साहपूर्वक भाग लेने का लाभ उठा सकते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 32)

🌞 दिए गए कार्यक्रमों का प्राण-पण से निर्वाह

🔴 गुरुदेव का आदेश पालन करने के लिए हमने काँग्रेस के सत्याग्रह आंदोलन में भाग तो लिया, पर प्रारंभ में असमंजस ही बना रहा कि जब चौबीस वर्ष का एक संकल्प दिया गया था, तो ५ और १९ वर्ष के दो टुकड़ों में क्यों विभाजित किया। फिर आंदोलन में तो हजारों स्वयं सेवक संलग्न थे, तो एक की कमी बेशी से उसमें क्या बनता-बिगड़ता था?

🔵 हमारे असमंजस को साक्षात्कार के समय ही गुरुदेव ने ताड़ लिया था। जब बारी आई तो उनकी परावाणी से मार्गदर्शन मिला कि ‘‘युग धर्म की अपनी महत्ता है। उसे समय की पुकार समझ कर अन्य आवश्यक कार्यों को भी छोड़कर उसी प्रकार दौड़ पड़ना चाहिए जैसे अग्निकांड होने पर पानी लेकर दौड़ना पड़ता है और अन्य सभी आवश्यक काम छोड़ने पड़ते हैं।’’ आगे संदेश मिला कि ‘‘अगले दिनों तुम्हें जन सम्पर्क के अनेक काम करने हैं, उनके लिए विविध प्रकार के व्यक्तियों से सम्पर्क साधने और निपटने का दूसरा कोई अवसर नहीं आने वाला है। यह उस उद्देश्य की पूर्ति का एक चरण है, जिसमें भविष्य में बहुत सा श्रम व समय लगाना है। आरम्भिक दिनों में, जो पाठ पढ़े थे, पूर्वजन्मों में जिनका अभ्यास किया था, उनके रिहर्सल का अवसर भी मिल जाएगा। यह सभी कार्य निजी लाभ की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण नहीं है। समय की माँग तो इसी से पूरी होती है।’’

🔴 व्यवहारिक जीवन में तुम्हें चार पाठ पढ़ाए जाने हैं। १-समझदारी, २-ईमानदारी, ३-जिम्मेदारी, ४-बहादुरी। इनके सहारे ही व्यक्तित्व में खरापन आता है और प्रतिभा-पराक्रम विकसित होता है। हथियार भोथरे तो नहीं पड़ गए, कहीं पुराने पाठ विस्मृत तो नहीं हो गए, इसकी जाँच पड़ताल नए सिरे से हो जाएगी। इस दृष्टि से एवं भावी क्रिया पद्धति के सूत्रों को समझने के लिए तुम्हारा स्वतंत्रता संग्राम अनुष्ठान भी जरूरी है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 32)

🌞  हिमालय में प्रवेश

सीधे और टेड़े पेड़

🔵  दिन बीत गये। बेचारी जड़ें सब शाखाओं को खूब विकसित होने के लायक रस कहां से जुटा पातीं। प्रगति रुक गई, टहनियां छोटी और दुबली रह गईं। पेड़ का तना भी कमजोर रहा और ऊंचाई भी न बढ़ सकीं। अनेक भागों में विभक्त होने पर मजबूती तो रहती ही कहां से? बेचारे यह दादरा और पिनखू के पेड़ अपनी डालियां छितराये तो रहे लेकिन समझदार व्यक्तियों में उनका मूल्य कुछ जंचा नहीं। उन्हें कमजोर और बेकार माना गया अनेक दिशाओं में फैल कर जल्दी से किसी न किसी दिशा में सफलता प्राप्त करने की उतावली में अन्ततः कुछ बुद्धिमत्ता साबित न हुई।

🔵  देवदारु का एक निष्ठ पेड़ मन-ही-मन इन टेढ़े तिरछे पेड़ों की चाल चपलता पर मुस्कराता हो तो आश्चर्य ही क्या है? हमारी वह चंचलता जिसके कारण एक लक्ष पर चीड़ की तरह सीधा बढ़ सकना सम्भव न हो सका यदि विज्ञ व्यक्तियों की दृष्टि में हमारे ओछे रह जाने के कारण जंचती हो तो इसमें अनुचित ही क्या है?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

सोमवार, 23 जनवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 Jan 2017


👉 आज का सद्चिंतन 24 Jan 2017


👉 सोशल मीडिया पर उल्लू बनने से ऐसे बचें (भाग 2)


🔴 मनी ट्रैप

आपको वक्त-बेवक्त मेसेज आता है 'सस्ती दर पर लोन चाहिए'... 'क्या आप घर खरीदना चाहते हैं?'... 'क्या आपको इन्वेस्ट करना है?' आदि आदि। 'ट्राई करने में क्या जाता है, कौन-सा अपना पैसा जा रहा है' यह सोचकर लोग ऐसे मेसेज आगे बढ़ा देते हैं। आजकल हर किसी को वट्सऐप पर एक जैसे मेसेज कोई-न-कोई रिश्तेदार या दोस्त भेजता रहता है। सस्ता पाने के लालच में हम ऐसे मेसेज को बढ़ावा देते हैं। ऐसे ही कुछ मेसेज हैं:
- Amazon पर सिर्फ 1 रुपये में पेन ड्राइव
- Flipkart पर सिर्फ 1 रुपये में मोबाइल
- LED बल्ब फ्री में

- या कुछ भी जिसकी ज्यादा बातें हो रही हैं या टीवी/पेपर पर विज्ञापन आ रहे हैं।
दरअसल, ठग सिर्फ 150-200 रुपये में पॉप्युलर साइट के नाम से एक वेबसाइट का नाम (कुछ बदलाव के साथ) बुक करा लेते हैं। यह पेज बिलकुल Flipkart, Amazon या दूसरी पॉप्युलर वेबसाइट जैसा दिखता है। इस पर आपको जो बताया गया होता है, उसका फोटो होता है। फिर आपकी डिटेल्स मांगी जाती हैं। आप डिटेल्स शेयर करते हैं तो वह सारी जानकारी उनके डेटाबेस में जाती है। बस हो गया उनका काम! अब मुफ्त या बेहद सस्ता लेने के चक्कर में लग गया न आपको चूना और हो गई ठगों की चांदी। दरअसल, हर वॉट्सऐप ग्रुप में कम-से-कम 25 लोग होते हैं। आपने अगर 8 ग्रुप में मेसेज शेयर किया तो 200 लोगों के मन में लालच पैदा हुआ। 25 लोगों में से कम-से-कम 5 तो करेंगे, फिर वे और उनके 8 ग्रुप में तो सोचिए सिर्फ एक दिन में यह मेसेज लाखों लोगों तक पहुंच जाएगा। किसी बड़ी कंपनी को टेली-मार्केटिंग करनी होती है तो वह किसी बड़ी मोबाइल कंपनी से लाखों रुपये देकर हमारे नंबरों का डेटाबेस खरीदते हैं, पर यहां तो सिर्फ 150 रु लगाकर ये लोग बहुत कम में (करीब 2-4 लाख) में छोटी कंपनियों को बेच देते हैं। तो यह तो लॉटरी हो गई! 150-200 रुपये का टिकट और लाखों की कमाई, वह भी सिर्फ चंद दिनों में और बिना कोई मेहनत। फंस जाते हैं आप। इसके बाद कुछ-न-कुछ बेचने के लिए भर-भर के SMS और फोन कॉल आने लगते हैं। इसका असली फायदा किसी और को होता है और आप ठगे जाते हैं।

 
🔴 कैसे बचें


- वेबसाइट का नाम और उसकी स्पेलिंग ध्यान से देखें।
- यह भी गौर करें कि क्या उस मेसेज को 5-10 वट्सऐप ग्रुप्स में शेयर करने को कहा गया है?
दरअसल, हम सोचते हैं कि ऐमजॉन या फ्लिपकार्ट जैसी बड़ी कंपनी की तरफ से आया है तो घपला नहीं होगा। वेबसाइट के नाम और पेज पर कंपनी का नाम भी दिख रहा होता है। लेकिन नकली वेबसाइट का नाम लंबा और चिन्हों से बना होता है, कोई भी सिंपल और ऑरिजिनल (www.Amazon.com, www.flipkart.com आदि) नहीं होता। ऐसे मेसेज में आपका नाम, मोबाइल नंबर और अड्रेस की मांग की जाती है।
- ऐसे किसी भी मेसेज को आगे शेयर न करें, जहां जरूरत से ज्यादा सस्ता सामान मिलने का दावा किया जा रहा है।
- अगर किसी अनजान नंबर से ऐसा मेसेज आया हो तो उस नंबर को ब्लॉक कर दें।
- अगर आपका कोई जानकार ऐसे मेसेज शेयर करे तो उसे भी इससे परहेज करने को कहें।
- ऐसे किसी भी मेसेज में दिए URL पर क्लिक करने से बचें और मेसेज को दूसरों के साथ शेयर भी न करें।

- दूसरों को भी ऐसा करने से रोकें और बताएं कि यह फेक मेसेज है।

🔴 पॉलिटिकल ट्रैप

राजनीतिक मकसद के लिए सबसे ज्यादा झूठ बोला जाता है और सोशल मीडिया का भी इसमें जमकर इस्तेमाल हो रहा है। सोशल मीडिया के जरिए राजनीतिक झूठ फैलाने के कई फायदे और मकसद हैं जैसे कि पार्टी या नेता के लिए लोगों के दिल में इज्जत बढ़ाना, किसी दूसरे के खिलाफ नफरत बढ़ाना, किसी पार्टी के अजेंडे को आगे बढ़ाना आदि।
- कोई पॉलिसी या जनता के लिए कोई काम कभी किसी पूर्व मंत्री ने किया हो, उसे भी नया बता कर फैलाया जाता है। या तो उस पॉलिसी के बारे में लोगों को पता ही नहीं होता या फिर लोग उसके बारे में भूल जाते हैं और उस खबर को सही समझने लगते हैं।
- फोन नंबर 104 से आप जरूरत होने पर अपने घर या कहीं भी ब्लड बैंक से खून मंगा सकते हैं। यह नंबर चालू तो बरसों पहले हुआ था, लेकिन अब इसे प्रधानमंत्री मोदी की सौगात के रूप में फैलाया जा रहा है।
- फोन नंबर 1098 को यह कहकर पेश किया जा रहा है कि इस पर फोन करने पर लोग आपका बचा हुआ खाना उठाने आएंगे ताकि जरूरतमंदों के बीच बांटा जा सके। हकीकत यह है कि यह नंबर बरसों पहले एक एनजीओ ने चालू किया था। यह एनजीओ बच्चों की देखरेख करता है। यह नंबर इसलिए शेयर किया गया था कि कहीं कोई गुम हुआ बच्चा मिले तो एनजीओ को फोन करें। लेकिन अब बचे खाने के नाम पर इस नंबर पर इतने फोन आने लगे हैं कि एनजीओ को अपना असली काम करने में दिक्कतें आने लगी हैं।
- फोटो में कंप्यूटर से एडिटिंग करके चेहरा या कुछ और बदल देते हैं, जिससे उसका मतलब बदल जाता है। एक फोटो में प्रधानमंत्री मोदी को सोनिया गांधी और एक शेख के पैर छूते दिखाया गया था जबकि असल फोटो में वह अडवाणी जी के पैर छू रहे थे।
- एक और फोटो में महात्मा गांधी को बाबा साहेब आंबेडकर के पैर छूते दिखाया था जबकि वे दो अलग-अलग फोटो थे। एक आंबेडकर का फैमिली फोटो था, दूसरे में गांधी जी दांडी मार्च में जमीन पर से नमक उठा रहे थे। दोनों को मिक्स करके नया फोटो तैयार किया गया था।
- ट्विटर पर बहुत-से सिलेब्रिटी/नेता हैं जो अपनी मर्जी से कुछ भी लिखते हैं। लोग चाव से उन्हें पढ़ते हैं और जवाब देते हैं। अब यहां दो बातें होती हैं:
1. किसी सिलेब्रिटी या नेता का ट्वीट लेकर कंप्यूटर से उसे बदल कर झूठ फैलाने वाले लोग अपनी मर्जी से कुछ भी लिख देते हैं। यह देखने में असली लगता है, पर होता नहीं है।
2. लोग किसी एक शख्सियत के नाम से छोटे-मोटे बदलाव (कोई निशान या स्पेलिंग बदलकर) के साथ दूसरे हैंडल बना लेते हैं। फिर इनके स्क्रीनशॉट लेकर वट्सऐप या फेसबुक पर हजारों की संख्या में कुछ भी शेयर करते हैं जिससे लोगों पर प्रभाव पड़ता है।
- झूठ के बल पर दंगे भड़काने की कोशिश भी की जाती है। कुछ महीने पहले कश्मीर में काफी तनाव था। लोग परेशान थे पर सोशल मीडिया पर लोग दंगे भड़काने के लिए बरसों पुराने या दूसरे देशों के फोटो नई कह कर शेयर कर रहे थे। इन फोटो के जरिए आपकी देशभक्ति की भावनाओं का फायदा उठाने की कोशिश की जा रही थी। सब फोटो पर एक लाइन होती थी : 'बिका हुआ मीडिया आपको यह सचाई नहीं दिखाएगा। अगर आप सच्चे भारतीय हो तो हर ग्रुप में जरूर फॉरवर्ड करो।' ऐसा पहले भी कई बार हो चुका है।

 
🔴 कैसे बचें

 
- किसी भी फोटो या मेसेज पर आंख मूंदकर भरोसे करने से बचें। अगर आप गौर से देखेंगे और सोचेंगे तो कई तरह के झूठ खुद ही पकड़ लेंगे।
- किसी भी नंबर को आगे फॉरवर्ड करने से पहले एक बार खुद मिलाकर जांच लें।
- किसी के नाम से फैल रहे मेसेज की सचाई खुद भी इंटरनेट पर जाकर जरूर चेक कर लें।
- ट्विट को चेक करने के लिए सामने वाले का अकाउंट वेरिफाइड या है नहीं, यह जरूर चेक करें। वेरिफाइड अकाउंट के सामने एक नीले गोले में सफेद टिकमार्क होता है जिससे पता चलता है कि वह असली है। जिनके हैंडल पर ऐसा नहीं होता तो देखें कि उनके कितने फॉलोअर्स हैं और वह कैसा ट्वीट करते हैं? जैसे कि किसी हीरो के नाम (थोड़ी स्पेलिंग बदल कर) का हैंडल होगा, पर उसके सिर्फ 1000-2000 ही फॉलोअर्स होंगे और करीबन सारे ट्वीट राजनीति से भरे होंगे। साथ ही, फिल्म/अवॉर्ड फंक्शन आदि के बारे में कुछ खास नहीं होगा। ऐसे में मान लें कि वह फेक हैंडल है।


🌹 अगले अंक में समाप्त  

 
👉 सोशल मीडिया पर उल्लू बनने से ऐसे बचें (भाग 1) 

http://awgpskj.blogspot.in/2017/01/1_22.html

👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 17) 24 Jan

🌹 त्रिविध भवबन्धन एवं उनसे मुक्ति
🔴 लोभ, मोह और अहंकार के तीन भारी पत्थर जिन्होंने सिर पर लाद रखे हैं, उनके लिये जीवन साधना की लम्बी और ऊँची मंजिल पर चल सकना, चल पड़ना असम्भव हो जाता है। भले ही कोई कितना पूजा-पाठ क्यों न करता रहे! जिन्हें तथ्यान्वेषी बनना है, उन्हें इन तीन शत्रुओं से अपना पीछा छुड़ाना ही चाहिये।             

🔵 हलकी वस्तुएँ पानी पर तैरती हैं, किन्तु भारी होने पर वे डूब जाती हैं। जो लोभ, मोह और अहंकार रूपी भारी पत्थर अपनी पीठ पर लादे हुए हैं, उन्हें भवसागर में डूबना ही पड़ेगा। जिन्हें तरना, तैरना है, उन्हें इन तीनों भारों को उतारने का प्रयत्न करना चाहिये। 

🔴 अनेकानेक दोष-दुर्गुणों कषाय-कल्मषों का वर्गीकरण विभाजन करने पर उनकी संख्या हजारों हो सकती है, पर उनके मूल उद्गम यही तीन लोभ, मोह और अहंकार हैं। इन्हीं भव बन्धनों से मनुष्य के स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर जकड़े पड़े हैं। इनका उन्मूलन किये बिना आत्मा को उस स्वतन्त्रता का लाभ नहीं मिल सकता जिसे मोक्ष कहते हैं। इन तीनों पर कड़ी नजर रखी जाय। इन्हें अपना संयुक्त शत्रु माना जाये। इनसे पीछा छुड़ाने के लिये हर दिन नियमित रूप से प्रयास जारी रखा जाये। एकदम तो सब कुछ सही हो जाना कठिन है, पर उन्हें नित्यप्रति यथासम्भव घटाते-हटाते चलने की प्रक्रिया जारी रखने पर सुधार क्रम में सफलता मिलती ही चलती है और एक दिन ऐसा भी आता है, जब इनसे पूरी तरह छुटकारा पाकर बन्धन मुक्त हुआ जा सके।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा

🔴 नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा में कटक के एक संपन्न बंगाली परिवार में हुआ था। बोस के पिता का नाम 'जानकीनाथ बोस' और माँ का नाम 'प्रभावती' था। जानकीनाथ बोस कटक शहर के मशहूर वक़ील थे। प्रभावती और जानकीनाथ बोस की कुल मिलाकर 14 संतानें थी, जिसमें 6 बेटियाँ और 8 बेटे थे। सुभाष चंद्र उनकी नौवीं संतान और पाँचवें बेटे थे। अपने सभी भाइयों में से सुभाष को सबसे अधिक लगाव शरदचंद्र से था। नेताजी ने अपनी प्रारंभिक पढ़ाई कटक के रेवेंशॉव कॉलेजिएट स्कूल में हुई। तत्पश्चात् उनकी शिक्षा कलकत्ता के प्रेज़िडेंसी कॉलेज और स्कॉटिश चर्च कॉलेज से हुई, और बाद में भारतीय प्रशासनिक सेवा (इण्डियन सिविल सर्विस) की तैयारी के लिए उनके माता-पिता ने बोस को इंग्लैंड के केंब्रिज विश्वविद्यालय भेज दिया। अँग्रेज़ी शासन काल में भारतीयों के लिए सिविल सर्विस में जाना बहुत कठिन था किंतु उन्होंने सिविल सर्विस की परीक्षा में चौथा स्थान प्राप्त किया। 1921 में भारत में बढ़ती राजनीतिक गतिविधियों का समाचार पाकर बोस ने अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली और शीघ्र भारत लौट आए।
 
🔴 नेताजी' के नाम से प्रसिद्ध सुभाष चन्द्र ने सशक्त क्रान्ति द्वारा भारत को स्वतंत्र कराने के उद्देश्य से 21 अक्टूबर, 1943 को 'आज़ाद हिन्द सरकार' की स्थापना की तथा 'आज़ाद हिन्द फ़ौज' का गठन किया इस संगठन के प्रतीक चिह्न पर एक झंडे पर दहाड़ते हुए बाघ का चित्र बना होता था। नेताजी अपनी आजाद हिंद फौज के साथ 4 जुलाई 1944 को बर्मा पहुँचे। यहीं पर उन्होंने अपना प्रसिद्ध नारा, "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा" दिया।
🔵 18 अगस्त 1945 को टोक्यो (जापान) जाते समय ताइवान के पास नेताजी का एक हवाई दुर्घटना में निधन हुआ बताया जाता है, लेकिन उनका शव नहीं मिल पाया। नेताजी की मौत के कारणों पर आज भी विवाद बना हुआ है।
 
 
🔴 याद रखिये – सबसे बड़ा अपराध, अन्याय को सहना और गलत व्यक्ति के साथ समझौता करना हैं।

🔵 यह हमारा फर्ज हैं कि हम अपनी आजादी की कीमत अपने खून से चुकाएं। हमें अपने त्याग और बलिदान से जो आजादी मिले, उसकी रक्षा करनी की ताकत हमारे अन्दर होनी चाहिए।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 April 2026

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