सोमवार, 26 दिसंबर 2016

👉 "हमारी वसीयत और विरासत" (भाग 7)

🌞 जीवन के सौभाग्य का सूर्योदय

🔴 शिष्य गुरुओं की खोज में रहते हैं। मनुहार करते हैं। कभी उनकी अनुकम्पा भेंट-दर्शन हो जाए, तो अपने को धन्य मानते हैं। उनसे कुछ प्राप्त करने की आकाँक्षा रखते हैं। फिर क्या कारण है कि मुझे अनायास ही ऐसे सिद्ध पुरुष का अनुग्रह प्राप्त हुआ? यह कोई छद्म तो नहीं है? अदृश्य में प्रकटीकरण की बात भूत-प्रेत से सम्बंधित सुनी जातीं हैं और उनसे भेंट होना किसी अशुभ अनिष्ट का निमित्त कारण माना जाता है। दर्शन होने के उपरान्त मन में यही संकल्प उठने लगे। संदेह उठा, किसी विपत्ति में फँसने जैसा कोई अशुभ तो पीछे नहीं पड़ा।

🔵 मेरे इस असमंजस को उन्होंने जाना। रुष्ट नहीं हुए। वरन् वस्तु स्थिति को जानने के उपरान्त किसी निष्कर्ष पर पहुँचने और बाद में कदम उठाने की बात उन्हें पसंद आई। यह बात उनकी प्रसन्न मुख-मुद्रा को देखने से स्पष्ट झलकती थी। कारण पूछने में समय नष्ट करने के स्थान पर उन्हें यह अच्छा लगा कि अपना परिचय, आने का कारण और मुझे पूर्व जन्म की स्मृति दिलाकर विशेष प्रयोजन निमित्त चुनने का हेतु स्वतः ही समझा दें। कोई घर आता है, तो उसका परिचय और आगमन का निमित्त कारण पूछने का लोक व्यवहार भी है। फिर कोई वजनदार आगंतुक जिसके घर आते हैं, उसका भी वजन तोलते हैं। अकारण हल्के और ओछे आदमी के यहाँ जा पहुँचना उनका महत्त्व भी घटाता है और किसी तर्क बुद्धि वाले के मन में ऐसा कुछ घटित होने के पीछे कोई कारण न होने की बात पर संदेह होता है और आश्चर्य भी।

🔴 पूजा की कोठरी में प्रकाश-पुंज उस मानव ने कहा-‘‘तुम्हारा सोचना सही है। देवात्माएँ जिनके साथ सम्बन्ध जोड़ती हैं, उन्हें परखती हैं। अपनी शक्ति और समय खर्च करने से पूर्व कुछ जाँच-पड़ताल भी करती हैं। जो भी चाहे उसके आगे प्रकट होने लगे और उसका इच्छित प्रयोजन पूरा करने लगें, ऐसा नहीं होता। पात्र-कुपात्र का अंतर किए बिना चाहे जिसके साथ सम्बन्ध जोड़ना किसी बुद्धिमान और सामर्थ्यवान के लिए कभी कहीं सम्भव नहीं होता। कई लोग ऐसा सोचते तो हैं कि किसी सम्पन्न महामानव के साथ सम्बन्ध जोड़ने में लाभ है, पर यह भूल जाते हैं कि दूसरा पक्ष अपनी सामर्थ्य किसी निरर्थक व्यक्ति के निमित्त क्यों गँवाएँगे?’’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 58)

🌹 राजनीति और सच्चरित्रता

🔴 आज की परिस्थितियों में शासन सत्ता की शक्ति बहुत अधिक है। इसलिये उत्तरदायित्व भी उसी पर अधिक है। राष्ट्रीय चरित्र के उत्थान और पतन में भी शासन-तंत्र अपनी नीतियों के कारण बहुत कुछ सहायक अथवा बाधक हो सकता है। नीचे कुछ ऐसे सुझाव प्रस्तुत किए जाते हैं जिनके आधार पर राजनीति के क्षेत्र से चरित्र निर्माण की दिशा में बहुत काम हो सकता है। हम लोग आज की प्रत्यक्ष राजनीति में भाग नहीं लेते पर एक मतदाता और राष्ट्र के उत्तरदायी नागरिक होने के नाते इतना कर्तव्य तो है ही कि शासन तंत्र में आवश्यक उत्कृष्टता लाने के लिए प्रयत्न करें।

🔵 जो लोग आज चुने हुए हैं उन तक यह विचार पहुंचाए जाएं और जो आगे चुने जाएं उन्हें इन विचारों की उपयोगिता समझाई जाय। चुने हुए लोगों का बहुमत तो इस दिशा में बहुत कुछ कर सकता है। अल्प मत के लोग भी बहुमत को प्रभावित तो कर ही सकते हैं। जन आन्दोलन के रूप में यह विचारधारा यदि सरकार तक पहुंचाई जाय तो उसे भी इस ओर ध्यान देने और आवश्यक सुधार करने का अवसर मिलेगा। हमें रचनात्मक प्रयत्न करने चाहिये और शासन में चरित्र-निर्माण के उपयुक्त वातावरण रहे इसके लिये प्रयत्न करते रहना ही चाहिए।

🔴 नीचे कुछ विचार प्रस्तुत हैं। इनके अतिरिक्त तथा विकल्प में भी अनेक विचार हो सकते हैं जिनके आधार पर राष्ट्र का चारित्रिक विकास हो सके। उनको भी सामने लाना चाहिए।

🔵 87. गीता के माध्यम से जनजागरण— जिस प्रकार भागवत् कथा सप्ताहों के धार्मिक अनुष्ठान होते हैं उसी प्रकार गीता कथा सप्ताहों के माध्यम से जन जागरण के आयोजन किये जायें। युग-निर्माण योजना के अन्तर्गत जिस आर्ष-विचारधारा का प्रतिपादन है वह गीता में समग्र रूप से विद्यमान हैं। मोह-ग्रस्त अर्जुन को जिस प्रकार भगवान कृष्ण ने गीता का सन्देश सुनाकर उसे कर्तव्य पथ पर संलग्न किया था उसी प्रकार प्रस्तुत भारत को जागृत करने के लिये जन-जीवन में गीता ज्ञान का प्रवेश कराया जाना चाहिए।

🔴 इस प्रकार गीता प्रवचनों के प्रशिक्षण के लिये एक विशेष योजना तैयार की गई है। गीता श्लोकों से संगति रखने वाली रामायण की चौपाइयों में इतिहास पुराणों की कथाओं का समावेश करके ऐसी पुस्तकें तैयार की गई हैं जिनके माध्यम से गीता की कथा को बाल, वृद्ध, नर, नारी, शिक्षित, अशिक्षित सभी के लिए आकर्षक, प्रबोधक एवं हृदयस्पर्शी बनाया जा सकता है। राधेश्याम तर्ज पर गीता का ऐसा पद्यानुवाद भी छापा गया है जिसे कीर्तन भजन की तरह गाया जा सकता है। आयोजनों में भाग लेने वाले व्यक्ति दो भागों में विभक्त होकर बारी-बारी इन पद्यानुवादों का सामूहिक पाठ करें तो वह गीता परायण बहुत ही आकर्षक बन सकता है। किस श्लोक के साथ किस युग-निर्माण सिद्धान्त का समावेश किया जाय और उसका प्रतिपादन किस प्रकार हो यह विधान इस गीता सप्ताह साहित्य में समाविष्ट कर दिया गया है। ऐसे प्रवचन कर्ताओं को व्यवहारिक शिक्षा देने के लिए मथुरा में एक एक महीने के शिक्षण शिविर भी होते हैं, जिनमें प्रशिक्षण प्राप्त कर गीता के माध्यम से जन-जागरण के लिये नई पीढ़ी के नये प्रवचनकर्त्ता—कथा-व्यास तैयार किये जा सकते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गृहस्थ-योग (भाग 45) 26 Dec

🌹 पारिवारिक स्वराज्य

🔵 यदि कोई गलती कर रहा हो तो एकान्त में उसे प्रेम पूर्वक उसकी ऊंच, नीच, लाभ, हानि समझनी चाहिए। सबके सामने कड़ा विरोध करना, अपमान करना, गाली बकना, मारना पीटना बहुत अनुचित है। इससे सुधार कम और बिगाड़ अधिक होता है। द्वेष दुर्भाव और घृणा की वृद्धि होती है, यह सब होना एक अच्छे परिवार के लिए लज्जाजनक है। समझाने से आदमी मान जाता है और अपमानित करने से वह क्रुद्ध होकर प्रतिशोध लेता एवं उपद्रव खड़े करता है।

🔴 दूसरों की आंख बचाकर अपने लिये अधिक लेना बुरा है। बाजार में चुपके से स्वादिष्ट पदार्थ चट कर आना, चुपके चुपके निजी कोष बनाना, अपने मनोरंजन, शौक या फैशन के लिए अधिक खर्च करना घर भर को ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, आत्मसंतोष और निन्दा के लिए आमंत्रित करना है। बाहर व्यवसाय क्षेत्र में काम करने के लिए यदि बढ़िया कपड़ों की आवश्यकता है तो सब लोगों को यह अनुभव करना चाहिए कि यह शौक या फैशन के लिए नहीं आवश्यकता के लिए किया गया है।

🔵 अधिक परिश्रम की क्षतिपूर्ति के लिए यदि कुछ विशेष खुराक की जरूरत है तो दूसरों को यह महसूस होने देना चाहिए कि यह चटोरेपन के लिए नहीं जीवन-रक्षा के लिये किया गया है। भावनाएं छिपती नहीं, चटोरापन या फैशनपरस्ती बात-बात में टपकती है, विशेष आवश्यकता की विशेष पूर्ति केवल विशेष अवसर पर ही रहती है शेष आचरण सबके साथ घुला−मिला और समान रहता है। जिसे जो विशेष सुविधा प्राप्त करनी हो वह प्रकट रूप से होनी चाहिये।

🌹 अगले अंक में समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 4) 26 Dec

🌹 स्नान और उसकी अनिवार्यता

🔴 गायत्री जप बिना स्नान किये भी हो सकता है या नहीं? इस प्रश्न के उत्तर में समझा जाना चाहिए कि प्रत्येक अध्यात्म प्रयोजन के लिए शास्त्रों में शरीर को स्नान से शुद्ध करके और धुले हुए कपड़े पहन कर बैठने का विधान है। अधिक कपड़े पहनने पर सभी कपड़े नित्य धुले हुए हों, यह व्यवस्था करना कठिन पड़ता है। इसलिए धोती-दुपट्टा पहन कर बैठने की परम्परा है। ठंड लगती हो तो बनियान आदि पहन सकते हैं। पर वे भी धुले ही होने चाहिए। यह पूर्ण विधान हुआ।

🔵 अब कठिनाई वश इस व्यवस्था में व्यवधान उत्पन्न होने पर क्या करना चाहिए? इसका उत्तर यह है कि शास्त्रकारों ने कठिनाई की स्थिति में लचीली नीति रखी है। ऐसे कड़े प्रतिबन्ध नहीं लगाये जिनके कारण स्नान एवं धुले वस्त्र की व्यवस्था न बन पड़ने पर जप जैसा पुनीत कार्य भी बन्द कर दिया जाय। इसमें तो दुहरी हानि हुई। नियम इसलिए बने थे कि उपासना काल में अधिकतम पवित्रता रखने का प्रयत्न किया जाय। यदि नियम इतना कड़ा हो जाय कि स्नानादि न बन पड़ने पर जप, साधना का पुण्य उपार्जन ही बन्द हो जाय तब तो बात उलटी हो गई। नियमों की कड़ाई ने ही साधना, उपासना कृत्य से वंचित करके कठिनाई का हल निकालने के स्थान पर, रही बची संभावना भी समाप्त कर दी। जो आधा-अधूरा लाभ मिल सकता था उसकी सम्भावना भी समाप्त हो गई।

🔴 शास्त्र-विधान यह है कि शरीर, वस्त्र, पात्र, उपकरण, पूजा सामग्री, देव प्रतिमा, आसन, स्नान आदि सभी को अधिकतम स्वच्छ बनाकर उपासना कृत्य करने पर जोर दिया जाय। इसमें आलस्य, प्रमाद को हटाने और स्वच्छता को उपासना का अंग मानने की बात कही गई है। फिर भी कारणवश ऐसी कठिनाइयां हो सकती हैं जिनमें साधक की मनःस्थिति और परिस्थिति पर ध्यान देते हुए विधान-प्रक्रिया को उस सीमा तक ढीला किया जाय, जितना किये बिना गाड़ी रुक जाने का खतरा हो। स्वच्छता की नीति पूरी तरह तो समाप्त नहीं करनी चाहिए, पर जहां तक अधिकाधिक सम्भव हो उतना करने-कराने की ढील देकर क्रम को किसी प्रकार गतिशील रखा जा सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

!! अखिल विश्व गायत्री परिवार का शहीद उधम सिंह को शत शत प्रणाम !!

 13 अप्रैल 1919 को घटित जलियांवाला बाग़ के दोषी जनरल डायर को उधम सिंह ने लन्दन में जाकर गोली मारी और निर्दोषों की मौत का बदला लिया। हँसते हँसते फांसी के तख्ते पर चढ़ कर शहीद उधम सिंह ने देश के लिए अपने प्राणों की कुर्बानी दी थी ।

अखिल विश्व गायत्री परिवार शहीद उधम सिंह को उनकी 117वीं जयंती (26 Dec) पर शत शत प्रणाम करता है।

रविवार, 25 दिसंबर 2016

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 26 Dec 2016


👉 आज का सद्चिंतन 26 Dec 2016


👉 सतयुग की वापसी (भाग 21) 26 Dec

🌹 समग्र समाधान—  मनुष्य में देवत्व के अवतरण से

🔴 पदार्थ-सम्पदा की उपयोगिता और महत्ता कितनी ही बढ़ी-चढ़ी क्यों न हो, पर यदि उसका दुरुपयोग चल पड़े तो अमृत भी विष बनकर रहता है। कलम बनाने के काम आने वाला चाकू किसी के प्राण हरण का निमित्त कारण भी बन सकता है। बलिष्ठता, सम्पदा, शिक्षा के सम्बन्ध में भी यही बात है। उनके सत्परिणाम तभी देखे जा सकते हैं, जब सदुपयोग कर सकने वाली सद्बुद्धि सक्रिय हो। यहाँ इतना और भी समझ लेना चाहिए कि नीतिनिष्ठा और समाजनिष्ठा का अवलम्बन लेना भी पर्याप्त नहीं है, उसमें भाव-संवेदनाओं का पावन प्रवाह ही भले-बुरे लगने वाले ज्वार-भाटे लाता रहा है।    

🔵 मस्तिष्क आमतौर से सभी के सही होते हैं। पागलों और सनकियों की संख्या तो सीमित ही होती है। फिर अच्छे खासे मस्तिष्क , आदर्शवादी उत्कृष्टता क्यों नहीं अपनाते? उन्हें अनर्थ ही क्यों सूझता रहता है? उनसे सुविधा, प्रसन्नता और प्रगति जैसा कुछ बन पड़ना तो दूर, उलटे संकटों, विपन्नताओं, विभीषिकाओं का ही सृजन होता रहा है। इस तथ्य का पता लगाने के लिए हमें भाव-संवेदनाओं की गहराई में उतरना होगा। यह तथ्य समझना होगा कि अन्त:करण में श्रद्धा, संवेदना की शीतलता, सरसता भरी रहने पर ही सदाशयता का वातावरण बनता है। मानसिकता तो उस चेरी की तरह है, जो अन्त:श्रद्धा रूपी रानी की सेवा में हर घड़ी हुक्म बजाने के लिए खड़ी रहती है।   

🔴 स्पष्ट है कि देवमानवों में से प्रत्येक को अपनी सुविधाओं, मनचली इच्छाओं पर अंकुश लगाना पड़ा है और उससे हुई बचत को उत्कृष्टताओं के समुच्चय समझे जाने वाले भगवान् के चरणों पर अर्पित करना पड़ा है। लोकमंगल के लिए, आत्म परिष्कार के लिए अपनी क्षमता का कण-कण समर्पित करना पड़ा है। इसी मूल्य को चुकाने पर किसी को दैवी अनुग्रह और उसके आधार पर विकसित होने वाला उच्चस्तरीय व्यक्तित्व उपलब्ध होता है। महानता इसी स्थिति को कहते हैं। इसी वरिष्ठता को चरितार्थ करने वाले देवमानव या देवदूत कहलाते हैं। उन्हीं के प्रबल पुरुषार्थों के आधार पर शालीनता का वातावरण बनता और समस्त संसार इसी आधार पर सुन्दर व समुन्नत बन पड़ता है।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 57)

🌹 कला और उसका सदुपयोग

🔴 85. संजीवन विद्या का विधिवत् प्रशिक्षण— संजीवन विद्या का एक केन्द्रीय विद्यालय बनाया जाना है, जिसमें जीवन की प्रत्येक समस्या पर गहन अध्ययन करने और उन्हें सुलझाने सम्बन्धी तथ्यों को जानने का अवसर मिले। अव्यवस्था, गृह कलह, आर्थिक तंगी, विरोधियों का आक्रमण, अस्त-व्यस्त दाम्पत्य जीवन, बालकों के भविष्य निर्माण की समस्या, आत्म-कल्याण पक्ष की बाधायें, गरीबी और असफलता, चिन्ता और उद्वेग, अयोग्यता एवं अशक्ति, प्रगति पथ के अवरोध आदि अनेकों कठिनाइयों के हल व्यक्तिगत परिस्थितियों के अनुरूप सुलझाने का प्रशिक्षण उस विद्यालय में रहे। स्वार्थ और परमार्थ का समन्वय करते हुए मनुष्य किस प्रकार लोक और परलोक में सुख शान्ति का अधिकारी बन सकता है यह पूरा शिक्षण मनोविज्ञान, समाज शास्त्र और लोक व्यवहार के सर्वांगपूर्ण आधार पर दिया जाय जिससे व्यक्तित्व के विकास में समुचित सहायता मिले।

🔵 ऐसे विद्यालय का अभाव बहुत खटकने वाला है। अनेकों प्रकार की शिक्षा संस्थाएं सर्वत्र मौजूद हैं पर जिन्दगी जीने की विद्या जहां सिखाई जाती हो ऐसा प्रबन्ध कहीं भी नहीं है। हमें यह कमी पूरी करनी है। अगले वर्ष से ऐसा केन्द्रीय प्रशिक्षण मथुरा में चलने लगेगा। उसका पाठ्यक्रम छह महीने का होगा। प्रयत्न यह होना चाहिये कि परिवार के सभी विचारशील लोग क्रमशः उनका लाभ उठाते चलें।

🔴 86. छोटे स्थानीय शिक्षण-सत्र—
जो लोग मथुरा नहीं पहुंच सकते और इतना लम्बा समय भी नहीं दे सकते उनके लिए एक महीना का छोटा शिक्षण-सत्र प्रत्येक केन्द्र पर चलता रहे ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए। शिक्षार्थी जीवन-विद्या की पाठ्य पुस्तिकाओं के आधार पर समस्याओं को सुलझाने का ज्ञान प्राप्त करें। इस प्रकार एक महीने में 30 ट्रैक्टों का अध्ययन हो सकता है, अन्तिम दिन समावर्तन होगा। शिक्षार्थियों के ज्ञान की परीक्षा भी हुआ करेगी। यह पाठ्यक्रम भी सस्ती ट्रैक्ट पुस्तिकायें लिखकर लगभग तैयार है। इसका प्रचलन अगले कुछ महीनों में ही प्रारम्भ होगा।
🔵 इन सत्रों के चलाने के लिये जगह-जगह व्यवस्था की जाय, जिससे युग-निर्माण के लिये आवश्यक संजीवन विद्या का ज्ञान व्यापक बन सके।🔴 सद्भावनाओं को बढ़ाने के लिए हर प्रकार के प्रयत्न होने चाहिए। कुछ कार्यक्रमों का विवरण ऊपर दिया गया है। ऐसे और भी अनेक कार्य हो सकते हैं जिन्हें परिस्थितियों के अनुरूप जन-मानस में सद्भावनाएं बढ़ाने की दृष्टि से उत्साहपूर्वक कार्यान्वित करते रहना चाहिये।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 "हमारी वसीयत और विरासत" (भाग 6)

🌞 जीवन के सौभाग्य का सूर्योदय

🔴 योग निद्रा कैसी होती है, इसका अनुभव मैंने जीवन में पहली बार किया। ऐसी स्थिति को ही जाग्रत समाधि भी कहते हैं। इस स्थिति में डुबकी लगाते ही एक-एक करके मुझे अपने पिछले कई जन्मों का दृश्य क्रमशः ऐसा दृष्टिगोचर होने लगा मानो वह कोई स्वप्न न होकर प्रत्यक्ष घटनाक्रम ही हो। कई जन्मों की कई फिल्में आँखों के सामने से गुजर गईं।

🔵 पहला जीवन - सन्त कबीर का, सपत्नीक काशी निवास। धर्मों के नाम पर चल रही विडम्बना का आजीवन उच्छेदन। सरल अध्यात्म का प्रतिपादन।

🔴 दूसरा जन्म- समर्थ रामदास के रूप में दक्षिण भारत में विच्छ्रंखलित राष्ट्र को शिवाजी के माध्यम से संगठित करना। स्वतन्त्रता हेतु वातावरण बनाना एवं स्थान-स्थान पर व्यायामशालाओं एवं सत्संग भवनों का निर्माण।

🔵 तीसरा जन्म - रामकृष्ण परमहंस, सपत्नी कलकत्ता निवास। इस बार पुनः गृहस्थ में रहकर विवेकानन्द जैसे अनेकों महापुरुष गढ़ना व उनके माध्यम से संस्कृति के नव-जागरण का कार्य सम्पन्न कराना।

🔴 आज याद आता है कि जिस सिद्ध पुरुष-अंशधर ने हमारी पंद्रह वर्ष की आयु में घर पधार कर पूजा की कोठरी में प्रकाश रूप में दर्शन दिया था, उनका दर्शन करते ही मन ही मन तत्काल अनेक प्रश्न सहसा उठ खड़े हुए थे। सद्गुरुओं की तलाश में आमतौर से जिज्ञासु गण मारे-मारे फिरते हैं। जिस-तिस से पूछते हैं। कोई कामना होती है, तो उसकी पूर्ति के वरदान माँगते हैं, पर अपने साथ जो घटित हो रहा था, वह उसके सर्वथा विपरीत था। महामना मालवीय जी से गायत्री मंत्र की दीक्षा पिताजी ने आठ वर्ष की आयु में ही दिलवा दी थी। उसी को प्राण दीक्षा बताया गया था। गुरु वरण होने की बात भी वहीं समाप्त हो गई थी और किसी गुरु प्राप्त होने की कभी कल्पना भी नहीं उठी। फिर अनायास ही वह लाभ कैसे मिला, जिसके सम्बन्ध में अनेक किंवदंतियाँ सुनकर हमें भी आश्चर्यचकित होना पड़ा है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 6)

🌞  हमारा अज्ञातवास और तप-साधना का उद्देश्य

🔵 तपस्वी ध्रुव ने खोया कुछ नहीं। यदि वे साधारण राजकुमार की तरह मौज शौक का जीवन यापन करता तो समस्त ब्रह्माण्ड का केन्द्र बिन्दु ध्रुवतारा बनने और अपनी कीर्ति को अमर बनाने का लाभ उसे प्राप्त न हो सका होता। उस जीवन में भी उसे जितना विशाल राज-पाट मिला उतना अपने पिता की अधिक से अधिक कृपा प्राप्त होने पर भी उसे उपलब्ध न हुआ होता। पृथ्वी पर बिखरे अन्न कणों को बीन कर अपना निर्वाह करने वाले कणाद ऋषि, वट वृक्ष के दूध पर गुजारा करने वाले बाल्मीकि ऋषि भौतिक विलासिता से वंचित रहे पर इसके बदले में जो कुछ पाया वह बड़ी से बड़ी सम्पदा से कम न था।

🔴 भगवान बुद्ध और भगवान महावीर ने अपने काल की लोक दुर्गति को मिटाने के लिए तपस्या को ही ब्रह्मास्त्र के रूप में योग्य किया। व्यापक हिंसा और असुरता के वातावरण को दया और हिंसा के रूप में परिवर्तित कर दिया। दुष्टता को हटाने के लिये यों अस्त्र-शस्त्रों का दण्ड-दमन का मार्ग सरल समझा जाता है पर वह भी सेना एवं आयुधों की सहायता से उनका नहीं हो सकता जितना तपोबल से। अत्याचारी शासकों का सभी पृथ्वी से उन्मूलन करने के लिए परशुरामजी का फरसा अभूत पूर्व अस्त्र सिद्ध हुआ। उसी से उन्होंने बड़ी-बड़े सेना सामन्तों से सुसज्जित राजाओं को परास्त करके 21 बार पृथ्वी को राजाओं से रहित कर दिया। अगस्त का कोप बेचारा समुद्र क्या सहन करता। उन्होंने तीन चुल्लुओं में सारे समुद्र को उदरस्थ कर लिया। देवता जब किसी प्रकार असुरों को परास्त न कर सके, लगातार हारते ही गये तो तपस्वी दधीचि की तेजस्वी हड्डियों का वज्र प्राप्त कर इन्द्र से देवताओं की नाव को पार लगाया।

🔵 प्राचीन काल में विद्या का अधिकारी वही माना जाता था जिसमें तितीक्षा एवं कष्ट सहिष्णुता की क्षमता होती थी, ऐसे ही लोगों के हाथ में पहुंच कर विद्या उसका समस्त संसार का लाभ करती थी। आज विलासी और लोभी प्रकृति के लोगों को ही विद्या सुलभ हो गई। फल स्वरूप वे उसका दुरुपयोग भी खूब कर रहे हैं। हम देखते हैं कि अशिक्षितों की अपेक्षा सुशिक्षित ही मानवता से अधिक दूर हैं और वे ही विभिन्न प्रकार की समस्यायें उत्पन्न करके संसार की सुख-शान्ति के लिए अभिशाप बने हुए हैं। प्राचीन काल में प्रत्येक अभिभावक अपने बालकों को तपस्वी मनोवृत्ति का बनाने के लिए उन्हें गुरुकुलों में भेजता था और गुरुकुलों के संचालक बहुत समय तक बालकों में कष्ट सहिष्णुता जागृत करते थे और जो इस प्रारम्भिक परीक्षा से सफल होते थे, उन्हें ही परीक्षाधिकारी मान कर विद्यादान करते थे। उद्दालक, आरुणि आदि अगणित छात्रों को कठोर परीक्षाओं में से गुजरना पड़ता था। इसका वृत्तान्त सभी को मालूम है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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शनिवार, 24 दिसंबर 2016

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 Dec 2016


👉 आज का सद्चिंतन 25 Dec 2016


👉 सतयुग की वापसी (भाग 20) 25 Dec

🌹 समस्याओं की गहराई में उतरें   

🔴 मुड़कर देखने पर प्रतीत होता है कि जब तथाकथित शिक्षा का, सम्पदा का, विज्ञान स्तर की चतुरता का इतना अधिक विकास नहीं हुआ था, तब मनुष्य अपेक्षाकृत अधिक स्वस्थ, सुखी, सन्तुष्ट और हिल-मिलकर मोद मनाने की स्थिति में था। बढ़ी हुई समृद्धि ने तो वह सब भी छीन लिया, जिसे मनुष्य ने लाखों वर्षों के अध्यवसाय के सहारे, सभ्यता और सुसंस्कारिता के उच्चस्तरीय संयोग से दूरदर्शिता के साथ अर्जित किया था।    

🔵 यहाँ सुविधा-साधनों को दुर्गति का कारण नहीं बताया जा रहा है, वरन् यह कहा जा रहा है कि यदि उनका सदुपयोग बन पड़ा होता, तो स्थिति उस समय की अपेक्षा कहीं अधिक अच्छी होती, जिस समय साधन कम थे। तब विकसित भावचेतना के आधार पर स्वल्प उपलब्धियों का भी श्रेष्ठतम उपयोग कर लिया जाता था और अपने साथ समूचे समुदाय को, वातावरण को, सच्चे अर्थों में समृद्ध-समुन्नत बनाए रहने में सफलता मिल जाती थी। ऐसे ही वातावरण को सतयुग कहा जाता रहा है।  

🔴 तथाकथित प्रगति का विशालकाय सरंजाम जुट जाने पर भी, भयानक स्तर की अवगति का वातावरण क्यों कर बन गया? इसका उत्तर यदि गम्भीरता से सोचा जाए तो तथ्य एक ही हाथ लगेगा कि बुद्धि भ्रम ने ही यह अनर्थ सँजोए हैं। फिर क्या बुद्धि को कोसा जाए? नहीं, उसका निर्धारण तो भाव-संवेदनाओं के आधार पर होता है। भावनाओं में नीरसता, निष्ठुरता जैसी निकृष्टताएँ घुल जाए तो फिर तेजाबी तालाब में जो कुछ गिरेगा, देखते-देखते अपनी स्वतन्त्र सत्ता को उसी में जला-घुला देगा।

🔵 उस क्षेत्र में विकृतियों का जखीरा जम जाना ही एकमात्र ऐसा कारण है, जिसके रहते समृद्धि और चतुरता का विकास-विस्तार होते हुए भी, उल्टी सर्वतोमुखी विपन्नता ही हाथ लग रही है। सुधार तलहटी का करना पड़ेगा। सड़ी कीचड़ के ऊपर तैरने वाला पानी भी अपेय होता है। दुर्भावनाओं के रहते दुर्बुद्धि ही पनपेगी और उसके आधार पर दुर्गति के अतिरिक्त और कुछ हाथ लगेगा नहीं।     

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 3) 25 Dec

🌹 गायत्री एक या अनेक

🔴 गायत्री एकमुखी, सावित्री पंचमुखी है। गायत्री आत्मिक और सावित्री भौतिकी है। एक को ऋद्धि और दूसरी को सिद्धि कहते हैं। रुपये के दोनों ओर दो आकृतियां होती हैं, पर इससे रुपया दो नहीं हो जाता। गायत्री और सावित्री एक ही तथ्य की दो प्रतिक्रियाएं हैं। जैसे आग में गर्मी और रोशनी दो वस्तुएं होती हैं, उसी प्रकार गायत्री-सावित्री के युग्म को परस्पर अविच्छिन्न समझना चाहिए।

🔵 त्रिकाल संध्या में ब्राह्मी-वैष्णवी-शांभवी की तीन आकृतियों की प्रतिष्ठापना की जाती है। अन्यान्य प्रयोजनों के लिए उसकी अन्य आकृतियां ध्यान एवं पूजन के लिए प्रयुक्त होती हैं। यह कलेवर भिन्नता ऐसी ही है जैसे एक ही व्यक्ति सैनिक, मिस्त्री, खिलाड़ी, तैराक, नट, दूल्हा आदि बनने के समय भिन्न-भिन्न बाह्य उपकरणों को धारण किये होता है, भिन्न मुद्राओं में देखा जाता है। उसी प्रकार एक ही महाशक्ति विभिन्न कार्यों में रहते समय विभिन्न स्वरूपों में दृष्टिगोचर होती है। यही बात गायत्री माता की विभिन्न आकृतियों के सम्बन्ध में समझी जानी चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गृहस्थ-योग (भाग 44) 25 Dec

🌹 पारिवारिक स्वराज्य

🔵 सास बहुओं में, ननद भौजाइयों में, देवरानी जिठानियों, में अक्सर छोटी-छोटी बातों पर लड़ाई हुआ करती है। स्त्री जाति को मानसिक विकास के अवसर प्रायः कम ही उपलब्ध होते हैं इसलिए उनकी उदारता संकुचित होती है। निस्संदेह पुरुष की अपेक्षा आत्म-त्याग और स्नेह की मात्रा स्त्रियों में बहुत अधिक होती है पर वह अपने बच्चे या पति में अत्यधिक लग जाने के कारण दूसरों के लिए कम बचती है।

🔴 समझा-बुझाकर, एक दूसरे के उदारता प्रकट करने का अवसर देकर, उन्हें यह अनुभव करना चाहिए कि परिवार के सब सदस्य बिलकुल निकटस्थ, बिलकुल सगे हैं। विरानेपन या परायेपन की दृष्टि से सोचने की दुर्भावना को हटाकर आत्मीयता की दृष्टि से सोचने योग्य उनकी मनोभूमि को तैयार करना चाहिये। बड़े बूढ़े यह आशा न करें कि हमारे साथ शिष्टाचार की अति बरती जानी चाहिये, उन्हें छोटों के प्रति क्षमा, उदारता, प्रेम और और सहानुभूति का व्यवहार करना चाहिये। दास, नौकर या गुलाम जैसा नहीं।

🔵 इसी प्रकार छोटों को बड़ों के प्रति आदर-भाव रखना चाहिये, घर के अन्य कामों की अपेक्षा पहिले आवश्यकता और इच्छाओं को पूरा करना चाहिये। घर का काम धंधा आमतौर से बंटा हुआ रहना चाहिये। बीमारी, कमजोरी, गर्भावस्था या अन्य किसी कठिनाई की दशा में दूसरों को उसका काम आपस में बांटकर उसे हलका कर देना चाहिये। नित्य पहनने के जेवरों को छोड़कर अन्य जेवर सम्मिलित रखे जा सकते हैं जिनका आवश्यकतानुसार सब उपयोग कर लें। आपको यदि पैसे की सुविधा हो तो सबके लिये अलग-अलग जेवर भी बन सकते हैं पर वे सब के पास करीब करीब समान होने चाहिये। नई शादी होकर आने वाली बहू के लिये अपेक्षाकृत कुछ अधिक चीजें होना स्वाभाविक है। विशेष अवस्था को छोड़कर साधारणतः सबका भोजन वस्त्र करीब करीब एक सा ही होना चाहिये। इस प्रकार स्त्रियों में एकता रह सकती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 गहना कर्मणोगति: (भाग 26) 24 Dec


🌹 अपनी दुनियाँ के स्वयं निर्माता

🔵 आप सरल मार्ग को अपनाइए, लड़ने, बड़बड़ाने और कुढ़ने की नीति छोड़कर दान, सुधार, स्नेह के मार्ग का अवलम्बन लीजिए। एक आचार्य का कहना है कि ‘‘प्रेम भरी बात, कठोर लात से बढ़कर है।’’ हर एक मनुष्य अपने अंदर कम या अधिक अंशों में सात्विकता को धारण किए रहता है। आप अपनी सात्विकता को स्पर्श करिए और उसकी सुप्तता में जागरण उत्पन्न कीजिए। जिस व्यक्ति में जितने सात्विक अंश हैं, उन्हें समझिए और उसी के अनुसार उन्हें बढ़ाने का प्रयत्न कीजिए। अंधेरे से मत लड़िए वरन् प्रकाश फैलाइए, अधर्म बढ़ता हुआ दीखता हो, तो निराश मत हूजिए वरन् धर्म प्रचार का प्रयत्न कीजिए। बुराई को मिटाने का यही एक तरीका है कि अच्छाई को बढ़ाया जाय। आप चाहते हैं कि इस बोतल से हवा निकल जाय, तो उसमें पानी भर दीजिए। बोतल में से हवा निकालना चाहें पर उसके स्थान पर कुछ भरें नहीं तो आपका प्रयत्न बेकार जाएगा। एक बार हवा को निकाल देंगे, दूसरी बार फिर भर जाएगी। गाड़ी जिस स्थान पर खड़ी हुई है, वहाँ खड़ी रहना पसंद नहीं करते, तो उसे खींच कर आगे बढ़ा दीजिए, आपकी इच्छा पूरी हो जाएगी। आप गाड़ी को हटाना चाहें, पर उसे आगे बढ़ाना पसंद न करें, इतना मात्र संतोष कर लें कि कुछ क्षण के लिए पहियों को ऊपर उठाए रहेंगे, उतनी देर तो स्थान खाली रहेगा, पर जैसे ही उसे छोड़ेंगे, वैसे ही वह जगह फिर घिर जाएगी।
 
🔴 संसार में जो दोष आपको दिखाई पड़ते हैं, उनको मिटाना चाहते हैं तो उनके विरोधी गुणों को फैला दीजिए। आप गंदगी बटोरने का काम क्यों पसंद करें? उसे दूसरों के लिए छोड़िए। आप तो इत्र छिड़कने के काम को ग्रहण कीजिए। समाज में मरे हुए पशुओं के चमड़े उधेड़ने की भी जरूरत है पर आप तो प्रोफेसर बनना पसंद कीजिए। ऐसी चिंता न कीजिए कि मैं चमड़ा न उधेडूँगा तो कौन उधेड़ेगा? विश्वास रखिए, प्रकृति के साम्राज्य में उस तरह के भी अनेक प्राणी मौजूद हैं। अपराधियों को दण्ड देने वाले स्वभावतः आवश्यकता से अधिक हैं। बालक किसी को छेड़ेगा तो उसके गाल पर चपत रखने वाले साथी मौजूद हैं, पर ऐसे साथी कहाँ मिलेंगे, जो उसे मुफ्त दूध पिलाएँ और कपड़े पहनाएँ। आप चपत रखने का काम दूसरों को करने दीजिए। लात का जवाब घूँसों से देने में प्रकृति बड़ी चतुर है। आप तो उस माता का पवित्र आसन ग्रहण कीजिए, जो बालक को अपनी छाती का रस निकाल कर पिलाती है और खुद ठंड में सिकुड़ कर बच्चे को शीत से बचाती है। आप को जो उच्च दार्शनिक ज्ञान प्राप्त हुआ है, इसे विद्वान, प्रोफेसर की भाँति पाठशाला के छोटे-छोटे छात्रों में बाँट दीजिए।

🔵 हो सकता है कि लोग आपको दुःख दें, आपका तिरस्कार करें, आपके महत्त्व को न समझें, आपको मूर्ख गिनें और विरोधी बनकर मार्ग में अकारण कठिनाइयाँ उपस्थित करें, पर इसकी तनिक भी चिंता मत कीजिए और जरा भी विचलित मत हूजिए, क्योंकि इनकी संख्या बिल्कुल नगण्य होगी। सौ आदमी आपके सत्प्रयत्न का लाभ उठाएँगे, तो दो-चार विरोधी भी होंगे। यह विरोध आपके लिए ईश्वरीय प्रसाद की तरह होगा, ताकि आत्मनिरीक्षण का, भूल सुधार का अवसर मिले और संघर्ष से जो शक्ति आती है, उसे प्राप्त करते हुए तेजी से आगे बढ़ते रहें।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 56)

🌹 कला और उसका सदुपयोग

🔴 83. धर्म-प्रचार की पद-यात्रा— घरेलू कार्यों से छुट्टी लेकर कुछ विचारशील लोग टोली बनाकर पद-यात्रा पर निकला करें। पूर्व निश्चित प्रोग्राम पर एक-एक दिन ठहरते हुए आगे बढ़ें। प्रातः जप, हवन, तीसरे पहर विचार-गोष्ठी और रात्रि को सामूहिक प्रवचनों का कार्यक्रम रहा करे। जिन जगहों में टोली को ठहरना हो, वहां पहले से ही आवश्यक तैयारी रहे, ऐसा प्रबन्ध कर लेना चाहिए। सन्त बिनोवा की भूदान जैसी पद-यात्राएं युग-निर्माण योजना के प्रसार के लिए भी समय-समय पर की जाती रहनी चाहिए।

🔵 प्रसन्नता की बात है कि इस वर्ष बहरायच जिसे में श्री गिरीश देव वर्मा के नेतृत्व में एक महीने की पद-यात्रा का कार्यक्रम संभ्रान्त एवं सुशिक्षित लोगों ने बनाया है। टोली की योजना तथा कार्य-पद्धति का विवरण पाठक अन्यत्र पढ़ेंगे।

🔴 84. आदर्श वाक्यों का लेखन— दीवारों पर आदर्श वाक्यों का लेखन एक सस्ता लोक शिक्षण है, गेरू में गोंद पकाकर दीवारों पर अच्छे अक्षरों में आदर्श शिक्षात्मक एवं प्रेरणाप्रद वाक्य लिखे जाएं तो उनसे पढ़ने वालों पर प्रभाव पढ़ता है। जिस जगह प्रेरणाप्रद विचार पढ़ने को मिलें तो उस स्थान के सम्बन्ध में स्वतः ही अच्छी भावना बनती है। जहां स्याही का ठीक प्रबन्ध न हो सके तो सूखे गेरू की डली से भी लिखते रहने का कार्यक्रम चलता रहा सकता है। कई व्यक्ति मिल कर अपने नगर की दीवारों पर इस प्रकार लिख डालने का कार्यक्रम बनालें तो जल्दी ही नगर की सारी दीवारें प्रेरणाप्रद बन सकती हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 "हमारी वसीयत और विरासत" (भाग 5)

🌞 जीवन के सौभाग्य का सूर्योदय

🔴 भगवान् की अनुकंपा ही कह सकते हैं कि जो अनायास ही हमारे ऊपर पंद्रह वर्ष की उम्र में बरसी और वैसा ही सुयोग बनता चला गया, जो हमारे लिए विधि द्वारा पूर्व से ही नियोजित था। हमारे बचपन में सोचे गए संकल्प को प्रयास के रूप में परिणत होने का सुयोग मिल गया।

🔵 पंद्रह वर्ष की आयु थी, प्रातः की उपासना चल रही थी। वसंत पर्व का दिन था। उस दिन ब्रह्म मुहूर्त में कोठरी में ही सामने प्रकाश-पुंज के दर्शन हुए। आँखें मलकर देखा कि कहीं कोई भ्रम तो नहीं है। प्रकाश प्रत्यक्ष था। सोचा, कोई भूत-प्रेत या देव-दानव का विग्रह तो नहीं है। ध्यान से देखने पर भी वैसा कुछ लगा नहीं। विस्मय भी हो रहा था और डर भी लग रहा था। स्तब्ध था।

🔴  प्रकाश के मध्य में ऐसे एक योगी का सूक्ष्म शरीर उभरा, सूक्ष्म इसलिए कि छवि तो दीख पड़ी, पर वह प्रकाश-पुंज के मध्य अधर में लटकी हुई थी। यह कौन है? आश्चर्य।

🔵 उस छवि ने बोलना आरम्भ किया व कहा-‘‘हम तुम्हारे साथ कई जन्मों से जुड़े हैं। मार्गदर्शन करते आ रहे हैं। अब तुम्हारा बचपन छूटते ही आवश्यक मार्गदर्शन करने आए हैं। सम्भवतः तुम्हें पूर्व जन्मों की स्मृति नहीं है, इसी से भय और आश्चर्य हो रहा है। पिछले जन्मों का विवरण देखो और अपना संदेह निवारण करो।’’ उनकी अनुकंपा हुई और योगनिद्रा जैसी झपकी आने लगी। बैठा रहा, पर स्थिति ऐसी हो गई मानों मैं निद्राग्रस्त हूँ। तंद्रा सी आने लगी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 5)

🌞  हमारा अज्ञातवास और तप-साधना का उद्देश्य

🔵 नई सृष्टि रच डालने वाले विश्वामित्र की, रघुवंशी राजाओं का अनेक पीढ़ियों तक मार्गदर्शन करने वाले वशिष्ठ की क्षमता तथा साधना इसी में ही अन्तर्हित थी। एक बार राजा विश्वामित्र जब वन में अपनी सेना को लेकर पहुंचे तो वशिष्ठजी ने कुछ सामान न होने पर भी सारी सेना का समुचित आतिथ्य कर दिखाया तो विश्वामित्र दंग रह गये। किसी प्रसंग को लेकर जब निहत्थे वशिष्ठ और विशाल सेना सम्पन्न विश्वामित्र में युद्ध ठन गया तो तपस्वी वशिष्ठ के सामने राजा विश्वामित्र को परास्त ही होना पड़ा। उन्होंने ‘‘धिग् बलं आश्रम बलं ब्रह्म तेजो बलं बलम् ।’’ की घोषणा करते हुए राजपाट छोड़ दिया और सबसे महत्व पूर्ण शक्ति की तपश्चर्या के लिए शेष जीवन समर्पित कर दिया।

🔴 अपने नरक गामी पूर्व पुरुषों का उद्धार करने तथा प्यासी पृथ्वी को जल पूर्ण करके जन-समाज का कल्याण करने के लिए गंगावतरण की आवश्यकता थी। इस महान उद्देश्य की पूर्ति लौकिक पुरुषार्थ से नहीं वरन् तपशक्ति से ही सम्भव थी। भागीरथ कठोर तप करने के लिये वन को गये और अपनी साधना से प्रभावित कर गंगा जी को भूलोक में लाने एवं शिवजी को उन्हें अपनी जटाओं में धारण करने के लिए तैयार कर लिया। यह कार्य साधारण प्रक्रिया से सम्पन्न न होते। तप ने ही उन्हें सम्भव बनाया।

🔵 च्यवन ऋषि इतना कठोर दीर्घ-कालीन तप कर रहे थे कि उनके सारे शरीर पर दीमक ने अपना घर बना लिया था और उनका शरीर एक मिट्टी के टीला जैसा बन गया था। राजकुमारी सुकन्या को दो छेदों में से दो चमकदार चीजें दीखीं और उनमें उसने कांटे चुभो दिए। यह चमकदार चीजें और कुछ नहीं च्यवन ऋषि की आंखें थीं। च्यवन ऋषि को इतनी कठोर तपस्या इसीलिए करनी पड़ी कि वे अपनी अन्तरात्मा में सन्निहित शक्ति केन्द्रों को जागृत करके परमात्मा के अक्षय शक्ति भण्डार में भागीदार मिलने की अपनी योग्यता सिद्ध कर सकें।

🔴 शुकदेव जी जन्म से साधन रत हो गये। उन्होंने मानव जीवन का एक मात्र सदुपयोग इसी में समझा कि इसका उपयोग आध्यात्मिक प्रयोजनों में करके नर-तनु जैसे सुर दुर्लभ सौभाग्य का सदुपयोग किया जाय। वे चकाचौंध पैदा करने वाले वासना एवं तृष्णा जन्य प्रलोभनों को दूर से नमस्कार करके ब्रह्मज्ञान की ब्रह्म तत्व की उपलब्धि में संलग्न हो गये।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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शुक्रवार, 23 दिसंबर 2016

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 Dec 2016


👉 आज का सद्चिंतन 24 Dec 2016


👉 सतयुग की वापसी (भाग 19) 24 Dec

🌹 समस्याओं की गहराई में उतरें   

🔴 समर्थता, व्यायामशालाओं में या टॉनिक बेचने वालों की दुकानों में नहीं पाई जा सकती। उसके लिए संयम, साधना और सुनियोजित दिनचर्या अपनाने से ही अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति हो सकती है। दूसरों का रक्त अपने शरीर में प्रवेश करा लेने पर भी उस उपलब्धि का अन्त थोड़े ही समय में हो जाता है। अपने निजी रक्त उत्पादन के सुव्यवस्थित हो जाने पर ही काम चलता है।   

🔵 अधिक उत्पादन, अधिक वितरण के लिए किए गए बाहरी प्रयास तब तक सफल न हो सकेंगे, जब तक कि मनुष्य का विश्वास ऊँचे स्तर तक उभारा न जाए। भूल यही होती रहती है कि मनुष्य को दीन, दुर्बल, असहाय, असमर्थ मान लिया जाता है और उसकी अनगढ़ आदतों को सुधारने की अपेक्षा, अधिक साधन उपलब्ध कराने की योजनाएँ बनती और चलती रहती हैं। लम्बा समय बीत जाने पर भी जब स्थिति यथावत् बनी रहती है, तब प्रतीत होता है कि कहीं कोई मौलिक भूल हो रही है।  

🔴 एक भ्रम यह भी जनसाधारण पर हावी हो गया है कि सम्पदा के आधार पर ही प्रगति हो सकती है। यह भ्रम इसलिए भी पनपता और बढ़ता गया है कि धनियों को ठाठ-बाट से रहते, गुलछर्रे उड़ाते देखकर यह अनुमान लगा लिया जाता है कि वह सुखी और समुन्नत भी हैं। पर लबादा उतारकर जब इस वर्ग को नंगा किया जाता है तो पता चलता है कि उसके भीतर एक अस्थिपंजर ही किसी प्रकार साँसें चला रहा है। प्रसन्नता के नाम पर उन्हें चिन्ताएँ ही खाए जा रही हैं। ईर्ष्या आशंका से लेकर अपने एवं अपनों के दुर्गुण-दुर्व्यसन स्थिति को पूरी तरह उलटकर रख दे रहे हैं। यह स्थिति उन्हें औसत नागरिक की तुलना में कहीं अधिक उद्विग्न, रुग्ण और चिन्तित बनाए रहती है। जीवन के आनन्द का बुरी तरह अपहरण कर लेती है।     

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 2) 24 Dec

🌹 गायत्री एक या अनेक

🔴 गायत्री के 24 अक्षरों में से प्रत्येक में एक-एक प्रेरणा और सामर्थ्य छिपी पड़ी है। उसे ध्यान में रखते हुए 24 महा-मातृकाओं का उल्लेख है। यह न तो एक दूसरे की प्रतिद्वन्द्वी हैं और न आद्यशक्ति की समग्र क्षमता के स्थानापन्न होने के उपयुक्त। हर अक्षर का तत्त्वदर्शन एवं साधना-क्षेत्र निरूपित करने के लिए 24 प्रतिमाओं का स्वरूप निर्धारित हुआ है। यह एक ही तत्त्व के भेद-उपभेदों को एक-एक करके समझाने और एक-एक चरण में दिव्य सामर्थ्यों का रहस्य, उद्घाटन करने की प्रक्रिया भी है।

🔵 नवदुर्गाओं की तरह गायत्री महाशक्ति के भी नौ विभाग हैं, उन्हें नव देवियां कहते हैं। इस विभाजन को अध्याय—प्रकरण के तुल्य माना जा सकता है। महामन्त्र के तीन चरणों में से प्रत्येक में तीन-तीन शब्द हैं। इस तरह यह शब्द परिवार सौर-परिवार के नौ शब्दों की तरह बन जाता है। यज्ञोपवीत के नौ धागे इसी विभाजन—वर्गीकरण का संकेत देते और विवेचना की सुविधा प्रस्तुत करते हैं। इस आधार पर गायत्री-तत्त्व-मंडल में नौ देवियों को मान्यता मिली है और उनकी प्रथक-प्रथक प्रतिमा बनाई गई हैं।

🔴 ब्रह्मतत्त्व एक व्यापक एवं निराकार है पर उनकी विभिन्न सामर्थ्यों की विवेचना करने की दृष्टि से देवताओं का स्वरूप एवं प्रयोजन निर्धारित किया गया है। गायत्री के नौ शब्दों की नौ देवियां—चौबीस अक्षरों की चौबीस मातृकाओं की प्रतिमाएं बनी हैं। यह एक ही महाशक्ति-सागर की छोटी-बड़ी लहरें हैं। इस भिन्नता में भी एकता का दर्शन है। अंग-अवयवों को मिलाकर काया बनती है। आद्यशक्ति की प्रेरणाओं, शिक्षाओं, सामर्थ्यों, सिद्धियों का निरूपण ही इन प्रतीक प्रतिमाओं के अन्तर्गत हुआ है। अतएव गायत्री एक ही है। प्रतिमाओं में भिन्नता होते हुए भी उसकी तात्त्विक एकता में अन्तर नहीं आता।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गृहस्थ-योग (भाग 43) 24 Dec

🌹 पारिवारिक स्वराज्य

🔵 ‘अनावश्यक संकोच’ पारिवारिक कलह की वृद्धि में सबसे प्रधान कारण हैं। बाहर के आदमियों से तो हम घुल घुल कर बात करते हैं, परन्तु घर वालों से सदा उदासीन रहते हैं, बहुत ही संक्षिप्त वार्तालाप करते हैं। बहुत कम परिवार ऐसे देखे जाते हैं, जिनमें घर के लोग एक दूसरे से अपने मन की बातें कह सकें। शिष्टाचार, बड़प्पन, लिहाज, लाज, पर्दा आदि का वास्तविक रूप नष्ट होकर उसका ऐसा विकृत स्वरूप बन गया है कि घर के सब लोग अपनी मनोभावनायें, आवश्यकताएं और अनुभूतियां एक दूसरे के सन्मुख रखते हुए झिझकते हैं।

🔴 इस गलती का परिणाम यह होता है कि एक दूसरे को ठीक तरह समझ नहीं पाते। किसी बात पर मतभेद हो तो उस भेद को अवज्ञा, अपमान या विरोध मान लिया जाता है ऐसा न होना चाहिये। किसी बात का निर्णय करना हो तो घर के सभी सलाह दे सकने के योग्य स्त्री पुरुषों की सलाह लेनी चाहिए। अपने अभाव प्रकट करने का हर एक को अवसर दिया जाय। जो काम करना हो उसे इस प्रकार अच्छी भूमिका के साथ, तर्क और उदाहरणों के साथ रखना चाहिए कि उस पर घर वालों की सहमति मिल जावे।

🔵  हर व्यक्ति यह अनुभव करे कि मेरे आदेश से ही यह कार्य हुआ। जिस प्रकार राज्य संचालन में प्रजा की सहमति आवश्यक है उसी प्रकार गृह व्यवस्था में परिजनों की सहमति रहने से शान्ति और सुव्यवस्था रहती है। राजनीतिक स्वराज्य से देश में अमनोअमान कायम रहता है। पारिवारिक स्वराज्य से परिवार में सुव्यवस्था रहती है। परिवार की प्रजा यह न समझे कि किसी की इच्छा जबरदस्ती हमारे ऊपर थोपी जा रही है वरन् उसे यह भान होना चाहिए कि सबसे लाभ और सब के हित के लिए विचार विनिमय और विवेक के साथ नीति निर्धारित की गई है तथा औचित्य एवं ईमानदारी को व्यवस्था संचालन में प्रधान स्थान दिया जा रहा है। इस सरल, स्वाभाविक और बिना किसी कठिनाई की नीति का जिस परिवार में पालन किया जाता है वहां सब प्रकार सुख-शान्ति बनी रहती है।।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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गुरुवार, 22 दिसंबर 2016

👉 आज का सद्चिंतन 23 Dec 2016


👉 सतयुग की वापसी (भाग 18) 23 Dec

🌹 समस्याओं की गहराई में उतरें   

🔴 वस्तुत: उन सफलताओं के पीछे एक रहस्य काम कर रहा होता है कि उनने अपनी उपलब्धियों का सुनियोजन किया और बिना भटके, नियत उपक्रम अपनाए रहे। जनसहयोग भी उन्हीं के पीछे लग लेता है, जिनमें सद्गुणों का, सत्प्रवृत्तियों का बाहुल्य होता है। इसी विधा का अनुकरण करने के लिए यदि तथाकथित दरिद्रों को भी सहमत किया जा सके, तो वे आलस्य-प्रमाद की, दीनता-हीनता की केंचुली उतारकर, अभीष्ट दिशा में अपने बलबूते ही इतना कुछ कर सकते हैं, जिसे सराहनीय और सन्तोषप्रद कहा जा सके।   

🔵 इसके विपरीत यदि बाहरी अनुदानों पर ही निर्भर रहा जाए तो जो मिलता रहेगा, वह फूटे घड़े में पानी भरते जाने की तरह व्यर्थ रहेगा और कुछ पल्ले पड़ेगा नहीं। दुर्व्यसनों के रहते, आसमान से बरसने वाली कुबेर की सम्पदा भी अनगढ़ व्यक्तियों के पास ठहर न सकेगी। अनुदानों का वांछित लाभ न मिल सकेगा।  

🔴 अशिक्षा का कारण यह नहीं है कि पुस्तकें, कापियाँ, कलमें मिलना बन्द हो गई हैं या इतनी निष्ठुरता भर गई है कि पूछने पर कुछ बता देने के लिए कोई तैयार नहीं होता, वरन् वास्तविक कारण यह है कि शिक्षा का महत्त्व ही अपनी समझ में नहीं आता और उसके लिए उत्साह ही नहीं उमगता। पिछड़े क्षेत्रों में खोले गए स्कूल प्राय: छात्रों के अभाव में खाली पड़े रहते हैं और नियुक्त अध्यापक रजिस्टरों में झूठी हाजिरी लगाकर, खाली हाथ वापस लौट जाते हैं। यदि उत्साह उमगे तो जेल में लोहे के तसले को पट्टी और कंकड़ को कलम बनाकर विद्वान् बन जाने वालों का उदाहरण हर किसी के लिए वैसा ही चमत्कार प्रस्तुत कर सकता है। उत्कण्ठा की मन:स्थिति रहते, सहायकों की सहायता की कमी भी रहने वाली नहीं हैं।     

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 1 ) 23 Dec


🔵 गायत्री-उपासना के सन्दर्भ में कई प्रकार की शंकायें उठती रहती हैं। इनका उपयुक्त समाधान न मिलने से, जिस-तिस द्वारा बताये गये भ्रान्त विचारों को ही स्वीकार करना पड़ता है। समय-समय पर प्रस्तुत की जाने वाली शंकाओं में से कुछ समाधान अगले पृष्ठों में प्रस्तुत है।


🌹 गायत्री एक या अनेक

🔴 गायत्री महामंत्र एक है। वेदमाता, भारतीय संस्कृति की जन्मदात्री, आद्यशक्ति के नाम से प्रख्यात गायत्री एक ही है। वही संध्यावन्दन में प्रयुक्त होती है। यज्ञोपवीत संस्कार के समय गुरुदीक्षा के रूप में भी उसी को दिया जाता है। इसलिए उसे गुरुमंत्र भी कहते हैं। अनुष्ठान-पुरश्चरण इसी आद्यशक्ति के होते हैं। यह ब्रह्मविद्या है—ऋतम्भरा प्रज्ञा है। सामान्य नित्य उपासना से लेकर विशिष्टतम साधनाएं इसी प्रख्यात गायत्री मंत्र के माध्यम से होती हैं। इसके स्थान पर या समानान्तर किसी और गायत्री को प्रतिद्वन्द्वी के रूप में खड़ा नहीं किया जा सकता है।

🔵 मध्यकालीन अराजकता के अन्धकार भरे दिनों में उपासना विज्ञान की उठक-पटक खूब हुई है और स्वेच्छाचार फैलाने में निरंकुशता बरती गई है। उन्हीं दिनों ब्राह्मण-क्षत्री-वैश्य वर्ग की अलग-अलग गायत्री गढ़ी गईं। उन्हीं दिनों देवी-देवताओं के नाम से अलग-अलग गायत्रियों का सृजन हुआ। गायत्री महामन्त्र की प्रमुखता और मान्यता का लाभ उठाने के लिए देव वादियों ने अपने प्रिय देवता के नाम पर गायत्री बनाई और फैलाई होंगी। इन्हीं का संग्रह करके किसी ने चौबीस देव-गायत्री बना दी प्रतीत होती हैं।

🔴 देव-मंत्र यदि गायत्री छन्द में बने हों तो हर्ज नहीं, पर उनमें से किसी को भी महामन्त्र गायत्री का प्रतिद्वन्द्वी या स्थानापन्न नहीं बनाया जाना चाहिए और न जाति-वंश के नाम पर उपासना क्षेत्र में फूट-फसाद खड़ा करना चाहिए। देवलोक में कामधेनु एक ही है और धरती पर भी गंगा की तरह गायत्री भी एक ही है। चौबीस अक्षर—आठ-आठ अक्षरों के तीन चरण—तीन व्याहृतियां—एक ओंकार इतना ही आद्य गायत्री का स्वरूप है। उसी को बिना जाति, लिंग आदि का भेद किये सर्वजनीन-सार्वभौम उपासना के रूप में प्रयुक्त करना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गृहस्थ-योग (भाग 42) 23 Dec

🌹 परिवार की चतुर्विधि पूजा

🔵 भीतर और बाहरी जीवन के दोनों पहलू निरन्तर विकसित होते रहें ऐसा कार्यक्रम सदा जारी रहना चाहिए। भविष्य में उन्नति कर सकने के लिए जिन साधनों की आवश्यकता है उन साधनों को जुटाने के लिये सदैव ध्यान रखना आवश्यक कर्तव्य है। अपनी शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और सामाजिक कठिनाई को हल करने योग्य शिक्षा, योग्यता और अनुभव संपादन किये बिना जीवन सुखमय नहीं बन सकता।

🔴 इसलिये पढ़ने लिखने की, कमाने की, स्वस्थ रहने की, बीमारी से बचे रहने की, बोलने-चलाने की, लेने देने की योग्यताएं एकत्रित करने के अवसर हर एक को मिलने चाहिए। अपने पैरों पर खड़े होकर अपनी योग्यता से अपना निर्वाह कर लेने की क्षमता संपादन करने का आरम्भ से ही ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि दुर्भाग्यवश ऐसे अवसर भी जीवन में आ सकते हैं जब नियत सम्पत्ति से या स्वजनों से हाथ धोना पड़े। ऐसे समय में वही मनुष्य विजयी होता है जिसने विपत्ति से लड़ने योग्य शास्त्रों से अपने को पहले से ही सुसज्जित कर रखा हो।

🔵 इन चारों बातों को घर के हर मनुष्य के ऊपर लागू करके देखना चाहिए कि इन आवश्यकताओं में से कौन सी बात किसे प्राप्त नहीं हो रही है। जो बात जिसे प्राप्त नहीं हो रही हो उसे प्राप्त कराने का यथा शक्ति अवश्य ही उद्योग करना चाहिये। यदि घर के दस आदमियों का जीवन किसी हद तक सुखी और समृद्ध बनाया जा सका तो समझिये कि विश्व कल्याण में, परमार्थ में, धर्म विस्तार में वृद्धि हुई और अपने को पुण्य फल मिला। यदि प्रथम प्रयास प्रत्यक्ष रूप से सफल न भी हो तो भी लाभ ही है क्योंकि अपनी सद्भावनायें सदा अपने मस्तिष्क में काम करती रहेंगी और वे शुभ संस्कारों के रूप में अन्तःक्षेत्र में अपनी जड़ जमा लेंगी। यह शुभ संस्कार चुपचाप पल्लवित होते रहते हैं और अपने लोक परलोक को नाना विधि से आनंदित एवं सुख समृद्धि युक्त बनाते रहते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 55)

🌹 कला और उसका सदुपयोग

🔴 80. ईमानदार उपयोगी-स्टोर— ऐसे स्टोर चलाये जांय जहां शुद्ध खाद्य वस्तुएं उचित मूल्य पर मिल सकें। खाद्य पदार्थों की अशुद्धता अक्षम्य है। इससे जन स्वास्थ्य पर घातक प्रभाव पड़ता है। इस अभाव की पूर्ति कोई ईमानदार व्यक्ति कर सकें तो उससे उनकी अपनी आजीविका भी चले और जनता की आवश्यकता भी पूर्ण हो। आटा, दाल, चावल, तेल, घी, दूध, शहद, गुड़, मेवा, मसाले, औषधियां, चक्की, भाप से पकाने के बर्तन, व्यायाम साधन, साहित्य, पूजा उपकरण एवं अन्य आवश्यक जीवनोपयोगी वस्तुओं का उचित मूल्य पर अभाव पूर्ति करने वाले व्यापारी आज की स्थिति में समाज-सेवी ही कहे जा सकते हैं।

🔵 81. सम्मेलन और गोष्ठियां— सद्भावनाओं को जागृत करने वाला लोक-शिक्षण भी व्यापक रूप से आरम्भ किया जाना चाहिए। इसके लिए समय-समय पर छोटे बड़े सम्मेलन, विचार गोष्ठियां, सत्संग एवं सामूहिक आयोजन करते रहना चाहिए। एकत्रित जन-समूह को विचार देने में सुविधा रहती है और उत्साह भी बढ़ता है। गायत्री यज्ञों के छोटे-छोटे आयोजन भी इस दृष्टि से उपयोगी रहते हैं। बहुत बड़ी सभाओं की भीड़-भाड़ की अपेक्षा विचारशील लोगों के छोटे सम्मेलन अधिक उपयोगी रहते हैं। उनमें ही कुछ ठोस कार्य की आशा की जा सकती है।

🔴 82. नवरात्रि में शिक्षण शिविर— समय-समय पर सद्भावना शिक्षा शिविर होते रहें, इस दृष्टि से आश्विन और चैत्र की नवरात्रियां सर्वोत्तम रहती हैं। उस समय नौ-नौ दिन के शिविर हर जगह किये जाया करें। प्रातःकाल जप, हवन, अनुष्ठान का आयोजन रहे। तीसरे पहर विचार गोष्ठी और भजन कीर्तन एवं रात्रि को सार्वजनिक प्रवचनों का कार्यक्रम रहा करे। अन्तिम दिन जुलूस, प्रभात-फेरी एवं बड़े सामूहिक यज्ञ के साथ पूर्णाहुति, प्रसाद वितरण आदि का कार्यक्रम रहा करे। प्रसाद में सच्चा सत्साहित्य भी वितरण किया जाया करे। बलिदान में बुराइयां छुड़ाई जाया करें। नारी प्रतिष्ठा की दृष्टि से अन्त में कन्या-भोज किया जाया करे। भाषणों और प्रवचनों की आवश्यकता युग-निर्माण की विचारधारा को प्रस्तुत कर सकने वाले कोई भी कुशल वक्ता आसानी से पूरी कर सकते हैं। वर्ष में नौ-नौ दिन के दो नवरात्रि आयोजन शिक्षण शिविरों के रूप में चलते रहें तो इससे उपासना और भावना के दोनों ही महान् लाभों से जन-साधारण को लाभान्वित किया जा सकता है। पर्व और त्यौहारों पर भी इन्हें विकसित बनाने के लिए ऐसे ही आयोजन किये जाते रहने चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गहना कर्मणोगति: (भाग 23)

🌹 अपनी दुनियाँ के स्वयं निर्माता
🔵 आप दुनियाँ के अंधेरे को तमोगुण को देखना बंद करके प्रकाश को सतोगुण को देखिए। फिर देखिए कि यह दुनियाँ जो नरक सी दिखलाई पड़ती थी, एक दिन बाद स्वर्ग बन जाती है। कल आपको अपना पुत्र अवज्ञाकारी लगता था, स्त्री कर्कश प्रतीत होती थी, भाई जान लेने की फिक्र में थे, मित्र कपटी थे, वे अपनी दृष्टि बदलने के साथ ही बिल्कुल बदल जाएँगे। कारण यह है कि जितना विरोध दिखाई पड़ता है, वास्तव में उसका सौवाँ हिस्सा ही मतभेद होता है, शेष तो कल्पना का रंग दे देकर बढ़ाया जाता है। पुत्र ने सरल स्वभाव से या किसी अन्य कारण से आपका कहना नहीं माना। आपने समझ लिया कि यह मेरा अपमान कर रहा है। अपमान  का विचार आते ही क्रोध आया, क्रोध के साथ अपने सुप्त मनोविकार जागे और उनके जागरण के साथ एक भयंकर तामसी मानसिक चित्र बन गया। जैसे मन में भय उत्पन्न होते ही झाड़ी में से एक बड़े-बड़े दाँतों वाला, लाल आँखों वाला, काला भुसंड भूत उपज पड़ता है, वैसे ही क्रोध के कारण जगे हुए मनोविकारों का आसुरी मानसिक चित्र पुत्र की देह में से झाड़ी के भूत की तरह निकल पड़ता है। बेचारा पुत्र यह चाहता भी न था कि मैं जानबूझ कर अवज्ञा कर रहा हूँ, यह कोई पाप है या इससे पिताजी नाराज होंगे, पर परिणाम ऐसा हुआ जिसकी कोई आशा न थी।
 
🔴 पिता जी आग-बबूला हो गए, घृणा करने लगे, दण्ड देने पर उतारू हो गए और अपने दुर्भाग्य पर आँसू बहाने लगे। न कुछ का इतना बवण्डर बन गया। पुत्र सोचता है कि मैं सर्वथा निर्दोष हूँ, खेलने जाने की धुन में पिता को पानी का गिलास देना भूल गया था या उपेक्षा कर गया था, इतनी सी बात पर इतना क्रोध करना, लांछन लगाना, दण्ड देना कितना अनुचित है। इस अनुचितता के विचार के साथ ही पुत्र को क्रोध आता है, वह भी उसी प्रकार के अपने मनोविकारों को उकसाकर पिता के सरल हृदय में दुष्टता, मूर्खता, क्रूरता, शत्रुता और न जाने कितने-कितने दुर्गुण आरोपित करता है और वह भी एक वैसा ही भूत उपजा लेता है। दोनों में कटुता बढ़ती है। वे भूत आपस में लड़ते हैं और तिल का ताड़ बना देते हैं। कल्पना का भूत रत्ती भर दोष को, बढ़ाते-बढ़ाते पर्वत के समान बना देता है और वे एक-दूसरे के घोर शत्रु, जान के ग्राहक बन जाते हैं।

🔵  हमारे अनुभव में ऐसे अनेकों प्रसंग आए हैं, जब हमें दो विरोधियों में समझौता कराना पड़ा है, दो शत्रुओं को मित्र बनाना पड़ा है। दोनों में विरोध किस प्रकार आरम्भ हुआ इसका गंभीर अनुसंधान करने पर पता चला कि वास्तविक कारण बहुत ही स्वल्प था, पीछे दोनों पक्ष अपनी-अपनी कल्पनाएँ बढ़ाते गए और बात का बतंगड़ बन गया। यदि एक-दूसरे को समझने की कोशिश करें, दोनों अपने-अपने भाव एक-दूसरे पर प्रकट कर दें और एक-दूसरे की इच्छा, स्वभाव, मनोभूमि का उदारता से अध्ययन करें, तो जितने आपसी तनाव और झगड़े दिखाई पड़ते हैं, उनका निन्यानवे प्रतिशत भाग कम हो जाय और सौ भाग से एक भाग ही रह जाए। क्लेश-कलह के वास्तविक-कारण इतने कम हैं कि उनका स्थान आटे में नमक के बराबर स्वाद परिवर्तन जितना ही रह जाता है। मिर्च बहुत कड़ुई है और उसका खाना सहन नहीं होता, पर स्वल्प मात्रा में तो रुचिकर है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 "हमारी वसीयत और विरासत" (भाग 4)

🌞 जीवन के सौभाग्य का सूर्योदय

🔴 हमारे जीवन का पचहत्तरवाँ वर्ष पूरा हो चुका। इस लम्बी अवधि में मात्र एक काम करने का मन हुआ और उसी को करने में जुट गए। वह प्रयोजन था ‘‘साधना से सिद्धि’’ का अन्वेषण-पर्यवेक्षण। इसके लिए यही उपयुक्त लगा कि जिस प्रकार अनेक वैज्ञानिकों ने पूरी-पूरी जिंदगियाँ लगाकर अन्वेषण कार्य किया और उसके द्वारा समूची मानव जाति की महती सेवा सम्भव हो सकी, ठीक उसी प्रकार यह देखा जाना चाहिए कि पुरातन काल से चली आ रही ‘‘साधना से सिद्धि’’ की प्रक्रिया का सिद्धांत सही है या गलत? इसका परीक्षण दूसरों के ऊपर न करके अपने ऊपर किया जाए।

🔵 यह विचारणा दस वर्ष की उम्र से उठी एवं पंद्रह वर्ष की आयु तक निरंतर विचार क्षेत्र में चलती रही। इसी बीच अन्यान्य घटनाक्रमों का परिचय देना हो, तो इतना ही बताया जा सकता है कि हमारे पिताजी अपने सहपाठी महामना मालवीय जी के पास हमारा उपनयन संस्कार कराके लाए। उसी को ‘‘गायत्री दीक्षा’’ कहा गया। ग्राम के स्कूल में प्राइमरी पाठशाला तक की पढ़ाई की। पिताजी ने ही लघु कौमुदी सिद्धांत के आधार पर संस्कृत व्याकरण पढ़ा दिया। वे श्रीमद्भागवत् की कथाएँ कहने राजा-महाराजाओं के यहाँ जाया करते थे। मुझे भी साथ ले जाते। इस प्रकार भागवत् का आद्योपान्त वृत्तांत याद हो गया।

🔴 इसी बीच विवाह भी हो गया। पत्नी अनुशासन प्रिय, परिश्रमी, सेवाभावी और हमारे निर्धारणों में सहयोगिनी थी। बस समझना चाहिए कि पंद्रह वर्ष समाप्त हुए।

🔵 संध्या वंदन हमारा नियमित क्रम था। मालवीय जी ने गायत्री मंत्र की विधिवत् दीक्षा दी थी और कहा था कि ‘‘यह ब्राह्मण की कामधेनु है। इसे बिना नागा किए जपते रहना। पाँच माला अनिवार्य, अधिक जितनी हो जाएँ, उतनी उत्तम।’’ उसी आदेश को मैंने गाँठ बाँध लिया और उसी क्रम को अनवरत चलाता रहा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 4)

🌞  हमारा अज्ञातवास और तप-साधना का उद्देश्य

🔴 सभी पुरुषार्थों में आध्यात्मिक पुरुषार्थ का मूल्य और महत्व अधिक है ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार कि सामान्य सम्पत्ति की अपेक्षा आध्यात्मिक शक्ति सम्पदा की महत्ता अधिक है। धन, बुद्धि, बल आदि के आधार पर अनेकों व्यक्ति उन्नतिशील, सुखी एवं सम्मानित बनते हैं पर उन सबसे अनेकों गुना महत्व वे लोग प्राप्त करते हैं जिन्होंने आध्यात्मिक बल का संग्रह किया है। पीतल और सोने में कांच और रत्न में जो अन्तर है वही अन्तर सांसारिक सम्पत्ति एवं आध्यात्मिक सम्पदा के बीच में भी है। इस संसार में धनी, सेठ, अमीर, उमराव, गुणी, विज्ञान, कलावन्त बहुत हैं पर उनकी तुलना उन महात्माओं के साथ नहीं हो सकती जिनने अपने आध्यात्मिक पुरुषार्थ के द्वारा अपना ही नहीं सारे संसार का हित साधना किया। प्राचीनकाल में सभी समझदार लोग अपने बच्चों को कष्ट सहिष्णु अध्यवसायी, तितीक्षाशील एवं तपस्वी बनाने के लिये छोटी आयु में ही गुरुकुलों में भर्ती करते थे ताकि आगे चलकर वे कठोर जीवन यापन करके अभ्यस्त होकर महापुरुषों की महानता के अधिकारी बन सकें।

🔵 संसार में जब कभी कोई महान कार्य सम्पन्न हुए हैं तो उनके पीछे तपश्चर्या की शक्ति अवश्य रही है। हमारा देश देवताओं और नररत्नों का देश रहा है। यह भारतभूमि स्वर्गादपि गरीयसी कहलाती रही है, ज्ञान, पराक्रम और सम्पदा की दृष्टि से यह राष्ट्र सदा से विश्व का मुकुटमणि रहा है। उन्नति के इस उच्च शिखर पर पहुंचने का कारण यहां के निवासियों की प्रचण्ड तप निष्ठा ही रही है, आलसी और विलासी, स्वार्थी और लोभी लोगों को यहां सदा से घृणित एवं निष्कृष्ट श्रेणी का जीव माना जाता रहा है। तप शक्ति की महत्ता को यहां के निवासियों ने पहचाना, तत्वत कार्य किया और उसके उपार्जन में पूरी तत्परता दिखाई तभी यह संभव हो सका कि भारत को जगद्गुरु, चक्रवर्ती शासक एवं सम्पदाओं के स्वामी होने का इतना ऊंचा गौरव प्राप्त हुआ।

🔴 पिछले इतिहास पर दृष्टि डालने से यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत बहुमुखी विकास तपश्चर्या पर आधारित एवं अवलंबित रहा है। सृष्टि के उत्पन्न कर्ता प्रजापति ब्रह्माजी के सृष्टि निर्माण के पूर्व विष्णु की नाभि से उत्पन्न कमल पुष्प पर अवस्थित होकर सौ वर्षों तक गायत्री उपासना के आधार पर तप किया तभी उन्हें सृष्टि निर्माण एवं ज्ञान विज्ञान के उत्पादन की शक्ति उपलब्ध हुई। मानव धर्म के आविष्कर्ता भगवान मनु ने अपनी रानी शतरूपा के साथ प्रचण्ड तप करने के पश्चात् ही अपना महत्व पूर्ण उत्तरदायित्व पूर्ण किया था, भगवान शंकर स्वयं तप रूप हैं। उनका प्रधान कार्यक्रम सदा से तप साधना ही रहा। शेष जी तप के बल पर ही इस पृथ्वी को अपने शीश पर धारण किए हुए हैं। सप्त ऋषियों ने इसी मार्ग पर दीर्घ काल तक चलते रह कर वह सिद्धि प्राप्त की जिससे सदा उनका नाम अजर अमर रहेगा। देवताओं के गुरु बृहस्पति और असुरों के गुरु शुक्राचार्य अपने-अपने शिष्यों के कल्याण मार्ग दर्शन और सफलता की साधना अपनी तप शक्ति के आधार पर ही करते रहे हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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बुधवार, 21 दिसंबर 2016

👉 आज का सद्चिंतन 22 Dec 2016


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 22 Dec 2016






👉 सतयुग की वापसी (भाग 17) 22 Dec

🌹 समस्याओं की गहराई में उतरें   

🔴 इन दिनों की सबसे बड़ी तात्कालिक समस्या यह है कि समाज परिकर में छाई विपन्नताओं से किस प्रकार छुटकारा पाया जाए और उज्ज्वल भविष्य की संरचना के लिए क्या किया जाए, जिससे निरापद और सुविकसित जीवन जी सकना सम्भव हो सके?   

🔵 समाज विज्ञानियों द्वारा प्रस्तुत कठिनाइयों का कारण अभावग्रस्तता को मान लिया गया है। इसी मान्यता के आधार पर यह सोचा जा रहा है कि साधन-सुविधाओं वाली सम्पन्नता की अधिकाधिक वृद्धि की जाए, जिससे अभीष्ट सुख-साधन उपलब्ध होने पर प्रसन्नतापूर्वक रहा जा सके। मोटे तौर पर अशिक्षा, दरिद्रता एवं अस्वस्थता को प्रमुख कारणों में गिना जाता है और इनके निवारण के लिए कुछ नए नीति निर्धारण का औचित्य भी है, पर देखना यह है कि वस्तुस्थिति समझे बिना और वास्तविक व्यवधानों की तह तक पहुँचे बिना जो प्रबल प्रयत्न किए जा रहे हैं या किए जाने वाले हैं वे कारगर हो भी सकेंगे या नहीं? 

🔴 दरिद्रता को ही लें। मनुष्य की शारीरिक, मानसिक समर्थता इतनी अधिक है कि उसके सहारे अपना ही नहीं, परिकर के अनेकों का भली प्रकार गुजारा किया जा सके और बचत को सामयिक आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकने वाले पुण्य परमार्थ में भी लगाया जा सके। प्रगतिशील जनों में से असंख्यों ऐसे हैं, जिनके पास न तो कोई पैतृक संपदा थी और न बाहर वालों की ही कोई कहने लायक सहायता मिली, फिर भी वे अपने मनोबल और पुरुषार्थ के आधार पर आगे बढ़ते और ऊँचे उठते चले गए, सफलता के उस उच्च शिखर पर जा पहुँचे जो जादुई जैसा लगता है।    

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (अन्तिम भाग) 22 Dec

🌹 गम्भीर न रहें, प्रसन्न रहना सीखें

🔵 एक शाम पंडित मोतीलाल नेहरू अपने पुत्र जवाहर लाल के साथ गांधीजी से मिलने साबरमती आश्रम पहुंचे। झोंपड़ी में मिट्टी का दीप जल रहा था और दरवाजे के बाहर लाठी रखी हुई थी। हवा जवाहरलाल से कुछ मजाक करने पर तुली थी, उसने झोंके से दीपक बुझा दिया। अंधेरे में जवाहरलाल लाठी से जा टकराये, उनके घुटने को चोट लगी—वैसे ही जवाहरलाल गर्म मिजाज थे, इस चोट ने उनमें झल्लाहट भर दी। वे गांधी जी से पूछ बैठे—‘बापू आप मुंह से अहिंसा की दुहाई देते हैं और लाठी हाथ में लेकर चलते हैं, आप ऐसा क्यों करते हैं?’ गांधीजी ने हंसकर कहा—‘तुम जैसे शैतान लड़कों को ठीक करने के लिये।’

🔴 गांधीजी दूसरे गोल मेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए इंग्लैंड गये। वहां के लोग नहीं माने, उन्हें बालरूम डांस दिखने ले गये। वहां सब अपने-अपने जोड़ों के साथ नाचने लगे। एक अंग्रेज ने उनसे कहा—‘आप भी अपना पार्टनर चुन लीजिए।’

🔵 गांधीजी ने अपनी लाठी दिखाकर कहा—‘मेरे साथ मेरा पार्टनर है।’ यह सुनकर सबको हंसी आ गई।

🔴 एक दिन की बात है। सेठ जमनालाल बजाज ने गांधीजी से कहा—‘बापू! यह तो मुझे ज्ञात है कि आपका मुझ पर अपार स्नेह है किन्तु मैं चाहता हूं कि आप मुझे देवीदास की तरह ही अपना पुत्र बना लें।’

🔵 उनका अभिप्राय गोद लेने से था। यह जानकर गांधीजी ने लम्बे-चौड़े बजाज जी की ओर देखकर कहा—‘कहते हो सो तो ठीक है। बाप बेटे को गोद लेता है, पर यहां तो स्थिति उल्टी है। बेटा बाप को गोद लेने जैसा दीखता है।’

🔴 विनोद प्रियता की प्रवृत्ति को जरा हम भी अपना स्वभाव का अंग बनाकर देखें, विषाद कभी हमारे निकट आ ही नहीं सकता।

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गृहस्थ-योग (भाग 41) 22 Dec

🌹 परिवार की चतुर्विधि पूजा

🔵 पौधे को विकसित होने के लिए अच्छी जमीन और पानी की जरूरत है, पर साथ ही हवा भी चाहिए। इसी प्रकार जीवन विकास के लिए भोजन, शिक्षा तथा मनोरंजन से वंचित रहते हैं वे एक बड़ा अन्याय करते हैं। नीतिकारों का वचन है कि ‘जो संगीत, साहित्य तथा कला से विहीन है वह बिना सींग पूंछ का पशु है, इस कथन का तात्पर्य मनोरंजन रहित, शुष्क, नीरस जीवन की भर्त्सना करना है। निश्चय ही मनोरंजन एक आवश्यक भोजन है जिसके बिना जीवन मुरझाने लगता है। कुरुचि पूर्ण, दूषित, अश्लील, मनोरंजन से बचना ठीक है। सादा और सात्विक मनोरंजनों को तलाश करना चाहिए।

🔴 संगीत, गायन, वाद्य, भ्रमण, सम्मिलन, सहभोज, उत्सव, मेला, प्रतियोगिता, चित्र कला, व्याख्यान, देशाटन, प्रदर्शनी सजावट, अद्भुत और ऐतिहासिक वस्तुओं का निरीक्षण, खेल, यात्रा, आदि अनेक मार्गों से यथा अवसर मनोरंजन के छोटे मोटे साधन प्राप्त किये जा सकते हैं। घर के पुरुषों को तो ऐसे अवसर मिलते रहते हैं पर स्त्रियों और बालकों को इससे वंचित रहना पड़ता है। यह उचित नहीं, उन्हें भी यथाशक्त ऐसे अवसर देने चाहिए। छोटे बालकों के लिए खिलौने जुटाते रहना चाहिए। मनोविनोद के कार्य में यदि थोड़ा पैसा खर्च होता हो तो उसमें कंजूसी न करनी चाहिए क्योंकि इस मार्ग में जो उचित खर्च होता है वह फिजूल खर्ची नहीं वरन् जीवन की एक वास्तविक आवश्यकता की पूर्ति है।

🔵 चौथी बात भविष्य निर्माण की है। आज की जरूरत किसी प्रकार पूरी हो जाय, केवल मात्रा इतने से सन्तुष्ट न हो जाना चाहिए वरन् यह देखना चाहिये कि हर व्यक्ति का भविष्य उन्नत, सुखमय, समृद्ध, प्रकाशवान एवं उज्ज्वल कैसे हो सकता है? प्राणी के जन्म धारण का उद्देश्य किसी प्रकार दिन काटते रहना नहीं वरन् यह है कि वह अपनी स्थिति को ऊंचा उठावे, आगे बढ़े और अधिक साधन सम्पन्न होता हुआ नीर-विकसित हो। ऊंचा, ऊंचा और अधिक ऊंचा जीवन बने, इसके लिए सदैव सोचते और प्रयत्न करते रहने की आवश्यकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 54)

🌹 कला और उसका सदुपयोग

🔴 78. सार्वजनिक उपयोग के उपकरण— अपनी समिति के पास कुछ ऐसे उपकरण रखे रहें जिन्हें लोग अक्सर दूसरों से मांग कर काम चलाया करते हैं। विवाह शादियों में काम आने वाले बड़े बर्तन, जलपात्र, फर्श, बिछौने, नसैनी, लालटेनें, सजावट का सामान, कुएं में गिरे हुए डोल रस्सी निकालने के कांटे, आटे की सेंमई बनाने की मशीनें जैसी छोटी-मोटी चीजें एकत्रित रखी जांय और उन्हें मरम्मत खर्च लेकर लोगों को देते रहा जाय तो उससे भी सहानुभूति एवं सद्भावना बढ़ती है।

🔵 79. जीव-दया के सत्कर्म— पशु-पक्षियों और जीव-जन्तुओं के प्रति करुणा उत्पन्न करने वाली प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। पशु-पक्षी भी अपने ही भाई-भतीजे हैं, उनका मांस खाने-खून पीने की आदत छुड़ानी चाहिए। उससे आध्यात्मिक सद्गुण नष्ट होते हैं, नृशंसता पनपती है। चमड़ा भी आजकल जीवित काटे हुए पशुओं का ही आ रहा है। उसका उपयोग करने से भी पशु-वध में वृद्धि होती है। हमें चमड़े के स्थान पर कपड़ा या रबड़ के जूते पहन कर काम चलाना चाहिए और दूसरी चमड़े की बनी वस्तुएं भी प्रयोग नहीं करनी चाहिए। मृगछालाएं भी आजकल हत्या किये हुए पशुओं की ही मिलती हैं, इसलिए पूजा में उनका प्रयोग नहीं करना चाहिए। जो रेशम कीड़ों को जिन्दा उबाल कर निकाला जाता है वह भी प्रयोग न किया जाय।

🔴 सामर्थ्य से अधिक काम लिया जाना, अधिक भार लादा जाना, बुरी तरह पीटना, घायल बीमारों से काम लेना, फूंका प्रथा के अनुसार दूध निकालना आदि अनेक प्रकार से पशुओं के साथ बरती जाने वाली नृशंसता का त्याग करना चाहिए।

🔵 गौ पालन, गौदुग्ध को प्राथमिकता देना जैसे धर्म कृत्यों की तरफ ध्यान देना चाहिए, जिससे स्वास्थ्य, समृद्धि और सद्भावना की अभिवृद्धि का मार्ग प्रशस्त हो सके।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गहना कर्मणोगति: (भाग 22)

🌹 अपनी दुनियाँ के स्वयं निर्माता
🔵 दुनियाँ वाले बहुत खराब हैं, पर उसमें खराबी से कहीं ज्यादा अच्छाई मौजूद है। हमें उस अच्छाई पर ही अपनी दृष्टि रखनी चाहिए, अच्छाई से ही आनन्द लेना चाहिए और अच्छाई को ही आगे बढ़ाना चाहिए। दिन में हम जगते हैं, प्रकाश में काम करते हैं, उजाले में रहना पसंद करते हैं। जब रात का अंधेरा सामने आता है, तो आँखें बंद करके सो जाते हैं, जिन्हें रात में भी काम करना है, वे दीपक जला लेते हैं। हमारी यह उजाले में काम करने, अंधेरे में सो जाने की प्रवृत्ति यह सिखाती है कि संसार के साथ किस तरह व्यवहार करना चाहिए। किसी आदमी में क्या सद्गुण है, उसे खोज निकालिए और उन्हीं से सम्पर्क रखिए, उन्हीं में आनंद लीजिए, उन्हें ही प्रोसाहित कीजिए, जो दोष हों उन्हें भी देखिए तो सही, पर उनमें उलझिए मत। रात की तरह आँख बंद कर लीजिए।
 
🔴 महर्षि दत्तात्रेय की कथा जानने वालों को विदित होगा कि जब तक वे दुनियाँ के काले और सफेद दोनों पहलुओं का समन्वय करते रहे, तब तक बड़े चिंतित और दुःखी रहे। जब उन्होंने कालेपन से दृष्टि हटा ली और सफेदी पर ध्यान दिया, तो उन्हें सभी जीव आदनीय, उपदेश देने वाले और पवित्र दिखाई पड़े, उन्होंने चौबीस गुरु बनाए, जिनमें कुत्ता, बिल्ली, सियार, मकड़ी, मक्खी, चील, कौए जैसे जीव भी थे। उन्हें प्रतीत हुआ कि कोई भी प्राणी घृणित नहीं। सबके अंदर महान् आत्मा है और वे महानता के लिए आगे बढ़ रहे हैं, जब हम अपनी दृष्टि को गुण ग्राहक बना लेते हैं तो दुनियाँ का सारा तख्ता पलट जाता है, दोष के स्थान पर गुण, बुराई के स्थान पर भलाई, दुःख के स्थान पर सुख आ बैठता है। बहुत बुरी दुनियाँ, बहुत अच्छी बन जाती है।

🔵 तिल की ओट ताड़ छिपा हुआ है। भूल-भुलैया के खेल में चोर दरवाजा जरा सी गलती के कारण छू जाता है। बाजीगर एक पोली लकड़ी रखता है, उसमें एक तरफ डोरा पीला होता है दूसरी तरफ नीला। इस छेद में से डोरा खींचता है, तो पीला निकलता है और उधर से खींचने पर वह नीला हो जाता है। लोग अचंभा करते हैं कि डोरा किस तरह रंग बदलता है, पर उस लकड़ी के पोले भाग में डोरे का एक भाग उलझा रहने के कारण यह अदल-बदल होती रहती है। संसार किसी को बुरा दीखता है, किसी को भला, इसका कारण हमारी दृष्टि की भीतरी उलझन है। इस उलझन का रहस्य भरा सुलझाव यह है कि आप अपना दृष्टिकोण बदल डालिए। अपने पुराने कल्पना जंजालों को तोड़-फोड़ कर फेंक दीजिए। तरह-तरह के उलझनों भरे जाल जो मस्तिष्क में बुन गए हैं, उन्हें उखाड़ कर एक कोने में मत डाल दीजिए। अपना तीसरा नेत्र, ज्ञान नेत्र खोलकर पुरानी दुनियाँ को नष्ट कर डालिए। वर्तमान कलियुग को प्रलय के गर्त में गिर पड़ने दीजिए और अपना सतयुग अपने मानस लोक में स्वयं रच डालिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 "हमारी वसीयत और विरासत" (भाग 3)

🌞 इस जीवन यात्रा के गम्भीरता पूर्वक पर्यवेक्षण की आवश्यकता

🔴 प्रत्यक्ष घटनाओं की दृष्टि से कुछ प्रकाशित किये जा रहे प्रसंगों को छोड़कर हमारे जीवन क्रम में बहुत विचित्रताएँ एवं विविधताएँ नहीं हैं। कौतुक-कौतूहल व्यक्त करने वाली उछल-कूद एवं जादू चमत्कारों की भी उसमें गुंजायश नहीं है। एक सुव्यवस्थित और सुनियोजित ढर्रे पर निष्ठापूर्वक समय कटता रहा है। इसलिए विचित्रताएँ ढूँढ़ने वालों को उसमें निराशा भी लग सकती है, पर जो घटनाओं के पीछे काम करने वाले तथ्यों और रहस्यों में रुचि लेंगे, उन्हें इतने से भी अध्यात्म सनातन, के परम्परागत प्रवाह का परिचय मिल जाएगा और वे समझ सकेंगे कि सफलता, असफलता का कारण क्या है? क्रियाकाण्ड को सब कुछ मान बैठना और व्यक्तित्व के परिष्कार की, पात्रता की प्राप्ति पर ध्यान न देना यही एक कारण है जिसके चलते उपासना क्षेत्र में निराशा छाई और अध्यात्म को उपहासास्पद बनने, बदनाम होने का लाँछन लगा। हमारे क्रिया-कृत्य सामान्य हैं, पर उसके पीछे पृष्ठभूमि का समावेश है, जो ब्रह्म-तेजस् को उभारती और उसे कुछ महत्त्वपूर्ण कर सकने की समर्थता तक ले जाती है।

🔵 जीवनचर्या के घटना परक विस्तार से कौतूहल बढ़ने के अतिरिक्त कुछ लाभ है नहीं। काम की बात है इन क्रियाओं के साथ जुड़ी हुई अन्तर्दृष्टि और उस आन्तरिक तत्परता का समावेश, जो छोटे से बीज खाद-पानी की आवश्यकता पूरी करते हुए विशाल वृक्ष बनाने में समर्थ होती रही। वस्तुतः साधक का व्यक्तित्व ही साधना क्रम में प्राण फूँकता है, अन्यथा मात्र क्रियाकृत्य खिलवाड़ बनकर रह जाते हैं।

🔴 तुलसी का राम, सूर का हरे कृष्ण, चैतन्य का संकीर्तन, मीरा का गायन, रामकृष्ण का पूजन मात्र क्रिया-कृत्यों के कारण सफल नहीं हुआ था। ऐसा औड़म-बौड़म तो दूसरे असंख्य करते रहते हैं, पर उनके पल्ले विडम्बना के अतिरिक्त और कुछ नहीं पड़ता, वाल्मीकि ने जीवन बदला तो, उल्टा नाम जपते ही मूर्धन्य हो गए। अजामिल, अंगुलिमाल, गणिका, आम्रपाली मात्र कुछ अक्षर दुहराना ही नहीं सीखे थे, उनने अपनी जीवनचर्या को भी अध्यात्म आदर्शों के अनुरूप ढाला।

🔵 आज कुछ ऐसी विडम्बना चल पड़ी है कि लोग कुछ अक्षर दुहराने और क्रिया-कृत्य करने, स्तवन, उपहार प्रस्तुत करने भर से अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। चिंतन, चरित्र और व्यवहार को उस आदर्शवादिता के ढाँचे में ढालने का प्रयत्न नहीं करते, जो आत्मिक प्रगति के लिए अनिवार्य रूप में आवश्यक है। अपनी साधना पद्धति में इस भूल का समावेश न होने देने का आरम्भ से ही ध्यान रखा गया। अस्तु, वह यथार्थवादी भी है और सर्व साधारण के लिए उपयोगी भी। इस दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर ही जीवन चर्या को पढ़ा जाए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 3)

🌞  हमारा अज्ञातवास और तप-साधना का उद्देश्य

🔴 तप की शक्ति अपार है। जो कुछ अधिक से अधिक शक्ति सम्पन्न तत्व इस विश्व में है, उसका मूल ‘तप’ में ही सन्निहित है। सूर्य तपता है इसलिये ही वह समस्त विश्व को जीवन प्रदान करने लायक प्राण भण्डार का अधिपति है। ग्रीष्म की ऊष्मा से जब वायु मण्डल भली प्रकार तप लेता है तो मंगलमयी वर्षा होती है। सोना तपता है तो खरा, तेजस्वी और मूल्यवान बनता है। जितनी भी धातुएं हैं वे सभी खान से निकलते समय दूषित, मिश्रित व दुर्बल होती हैं पर जब उन्हें कई बार भट्टियों में तपाया, पिघलाया और गलाया जाता है तो वे शुद्ध एवं मूल्यवान बन जाती हैं। कच्ची मिट्टी के बने हुए कमजोर खिलौने और बर्तन जरा से आघात में टूट सकते हैं। तपाये और पकाये जाने पर मजबूत एवं रक्त वर्ण हो जाते हैं। कच्ची ईंटें भट्टे में पकने पर पत्थर जैसी कड़ी हो जाती है। मामूली से कच्चे कंकड़ पकने पर चूना बनते हैं और उनके द्वारा बने हुये विशाल प्रासाद दीर्घ काल तक बने खड़े रहते हैं।

🔵 मामूली सा अभ्रक जब सौ, बार अग्नि में तपाया जाता है तो चन्द्रोदय रस बन जाता है। अनेकों बार अग्नि संस्कार होने से ही धातुओं की मूल्यवान भस्म रसायनें बन जाती हैं और उनसे अशक्ति एवं कष्ट साध्य रोगों में ग्रस्त रोगी पुनर्जीवन प्राप्त करते हैं। साधारण अन्न और दाल-शाक जो कच्चे रूप में न तो सुपाच्य होते हैं और न स्वादिष्ट। वे ही अग्नि संस्कार से पकाये जाने पर सुरुचि पूर्ण व्यंजनों का रूप धारण कर लेते हैं। धोबी की भट्टी में चढ़ने पर मैले-कुचैले कपड़े निर्मल एवं स्वच्छ बन जाते हैं। पेट की जठराग्नि द्वारा पचाया हुआ अन्न ही रक्त अस्थि का रूप धारण कर हमारे शरीर का भाग बनता है। यदि यह अग्नि संस्कार की, तप की प्रक्रिया बन्द हो जाय तो निश्चित रूप से विकास का सारा क्रम ही बन्द हो जायगा।

🔴 प्रकृति तपती है इसीलिए सृष्टि की सारी संचालन व्यवस्था चल रही है। जीव तपता है उसी से उसके अन्तराल में छिपे हुए पुरुषार्थ, पराक्रम, साहस, उत्साह, उल्लास, ज्ञान, विज्ञान प्रकृति रत्नों की श्रृंखला प्रस्फुटित होती है। माता अपने अण्ड एवं गर्भ को अपनी उदरस्थ ऊष्मा से पका कर शिशु को प्रसव करती है। जिन जीवों ने मूर्च्छित स्थिति से ऊंचे उठने की खाने सोने से कुछ अधिक करने की आकांक्षा की है; उन्हें तप करना पड़ा है। संसार में अनेकों पुरुषार्थ, पराक्रमी एवं इतिहास के पृष्ठों पर अपनी छाप छोड़ने वाले महापुरुष जो हैं, उन्हें किसी न किसी रूप में अपने-अपने ढंग का तप करना पड़ा है। कृषक, विद्यार्थी, श्रमिक, वैज्ञानिक, शासक, विद्वान, उद्योगी, कारीगर आदि सभी महत्वपूर्ण कार्य भूमिकाओं का सम्पादन करने वाले व्यक्ति वे ही बन सके हैं जिन्होंने कठोर श्रम, अध्यवसाय एवं तपश्चर्या की नीति को अपनाया है। यदि इन लोगों ने आलस्य, प्रमाद अकर्मण्यता, शिथिलता एवं विलासिता की नीति अपनाई होती तो वे कदापि उस स्थान पर न पहुंच पाते जो उन्होंने कष्ट सहिष्णु एवं पुरुषार्थी बनकर उपलब्ध किया है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 April 2026

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