मंगलवार, 29 जून 2021

👉 धर्मनिष्ठा आज की सर्वोपरि आवश्यकता (भाग १)

कटुता, भ्रान्ति, सन्देह, भय और संघर्षों से भरे आज के इस संसार का भविष्य अनिश्चित और अन्धकारमय ही दीख रहा है। विज्ञान ने जिन अस्त्रों का आविष्कार किया है वे पृथ्वी की-चिर संचित मानव-सभ्यता को बात की बात में नष्ट करने में समर्थ हैं। कच्चे धागे में बँधी लटकती तलवार की तरह कभी भी कोई विपत्ति आ सकती है और कोई भी पागल राजनेता अपनी एक छोटी सी सनक में इस सुन्दर धरती को ऐसी कुरूप और निरर्थक बना सकता है जिसमें मनुष्य क्या किसी भी प्राणी का जीवन असम्भव हो जाय।

इस सर्वनाशी विनाश से कम कष्टकारक वह स्थिति भी नहीं है जिसमें बौद्धिक अन्धकार, नैतिक बर्बरता की काली घटनायें तिल-तिल जलने और रोने, सिसकने की परिस्थितियों से सर्वत्र अशान्ति उत्पन्न किये हुए हैं। संसार एक अचेतन मूर्छना के गर्त में दिन-दिन गहरा उतरता जाता है। हमारा आध्यात्मिक, नैतिक और सामाजिक जीवन मानो ऐसी शून्यता की ओर चल रहा है जिसका न कोई लक्ष्य है न प्रयोजन। पथ भटके बनजारे की तरह हम चल तो तेजी से रहे हैं पर उसका कुछ परिणाम नहीं निकल रहा है। कई बार तो लगता है, प्रगति के नाम पर अगति की ओर पीछे लौट रहे हैं और उस आदिम युग की ओर उलट पड़े हैं जहाँ से कि सभ्यता का आरम्भ हुआ था।

कई व्यक्ति सोचते हैं कि इस व्यापक भ्रष्टाचार का अन्त बड़े युद्धों द्वारा होगा। आज जिन लोगों के हाथ में राजनैतिक, बौद्धिक तथा आर्थिक सत्ता है यदि वे अपने छोटे स्वार्थों के लिए समाज के विनाश की अपनी वर्तमान गतिविधियों को रोकते नहीं है और अपने प्रभाव तथा साधनों का दुरुपयोग करते ही चले जाते हैं तो उन्हें बलात् पदच्युत किया जाना चाहिए। इसके लिये चाहे सशस्त्र क्रान्ति या युद्ध ही क्यों न करना पड़े।

इस प्रकार सोचने वालों की बेचैनी और व्यथा तो समझ में आती है पर जिस उपाय से वे सुधार करना चाहते हैं वह संदिग्ध है। कल्पना करें कि आज के प्रभावशाली लोग-समाज बदलने के लिए अपने को बदलने की नीति अंगीकार नहीं करते और उन्हें युद्ध या शस्त्रों की सहायता से हटाया जाता है तो यही क्या गारण्टी है कि शस्त्रों से जिस सत्ता को हटाया गया है उसी को वे नये शस्त्रधारी न हथिया लेंगे। मध्य पूर्व और पाकिस्तान में सैनिक क्रान्तियों का सिलसिला चल रहा है। नये शासन से भी हर बार वैसी ही थोड़े हेर-फेर के साथ शिकायतें शुरू हो गई जैसी पहले वालों से थी। सत्ता और साधनों में कोई त्रुटि नहीं है, दोष उनके प्रयोगकर्त्ताओं का है। तो हमें ऐसे प्रयोगकर्त्ताओं का निर्माण करना चाहिए जो शक्ति का उपयोग स्वार्थ की परिधि से बाहर रखकर लोक मंगल के लिए प्रयुक्त कर सकने के लिए विश्वस्त एवं प्रामाणिक सिद्ध हो सकें।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1972 पृष्ठ 25

सोमवार, 28 जून 2021

👉 आखिरी प्रयास

किसी दूर गाँव में एक पुजारी रहते थे जो हमेशा धर्म कर्म के कामों में लगे रहते थे। एक दिन किसी काम से गांव के बाहर जा रहे थे तो अचानक उनकी नज़र एक बड़े से पत्थर पे पड़ी। तभी उनके मन में विचार आया कितना विशाल पत्थर है क्यूँ ना इस पत्थर से भगवान की एक मूर्ति बनाई जाये। यही सोचकर पुजारी ने वो पत्थर उठवा लिया।        

गाँव लौटते हुए पुजारी ने वो पत्थर के टुकड़ा एक मूर्तिकार को दे दिया जो बहुत ही प्रसिद्ध मूर्तिकार था। अब मूर्तिकार जल्दी ही अपने औजार लेकर पत्थर को काटने में जुट गया। जैसे ही मूर्तिकार ने पहला वार किया उसे एहसास हुआ की पत्थर बहुत ही कठोर है। मूर्तिकार ने एक बार फिर से पूरे जोश के साथ प्रहार किया लेकिन पत्थर टस से मस भी नहीं हुआ। अब तो मूर्तिकार का पसीना छूट गया वो लगातार हथौड़े से प्रहार करता रहा लेकिन पत्थर नहीं टुटा। उसने लगातार 99 प्रयास किये लेकिन पत्थर तोड़ने में नाकाम रहा।

अगले दिन जब पुजारी आये तो मूर्तिकार ने भगवान की मूर्ति बनाने से मना कर दिया और सारी बात बताई। पुजारी जी दुखी मन से पत्थर वापस उठाया और गाँव के ही एक छोटे मूर्तिकार को वो पत्थर मूर्ति बनाने के लिए दे दिया। अब मूर्तिकार ने अपने औजार उठाये और पत्थर काटने में जुट गया, जैसे ही उसने पहला हथोड़ा मारा पत्थर टूट गया क्यूंकि पत्थर पहले मूर्तिकार की चोटों से काफी कमजोर हो गया था। पुजारी यह देखकर बहुत खुश हुआ और देखते ही देखते मूर्तिकार ने भगवान शिव की बहुत सुन्दर मूर्ति बना डाली।

पुजारी जी मन ही मन पहले मूर्तिकार की दशा सोचकर मुस्कुराये कि उस मूर्तिकार ने 99 प्रहार किये और थक गया, काश उसने एक आखिरी प्रहार भी किया होता तो वो सफल हो गया होता।

मित्रों यही बात हर इंसान के दैनिक जीवन पे भी लागू होती है, बहुत सारे लोग जो ये शिकायत रखते हैं कि वो कठिन प्रयासों के बावजूद सफल नहीं हो पाते लेकिन सच यही है कि वो आखिरी प्रयास से पहले ही थक जाते हैं। लगातार कोशिशें करते रहिये क्या पता आपका अगला प्रयास ही वो आखिरी प्रयास हो जो आपका जीवन बदल दे।

👉 भक्तिगाथा (भाग ३६)

भगवान में अनुराग का नाम है भक्ति
    
विभावरी बीती-भगवान सूर्यदेव अपने स्वर्णिम रश्मिकरों से हिमालय के शुभ्र हिमशिखरों पर राशि-राशि स्वर्ण बरसाने लगे। बड़ा ही सुरम्य मोहक और मनोरम लग रहा था वह दृश्य, जब हिम पक्षी कलगान और ऋषिगण मंत्रगान से उनकी स्तुति कर रहे थे। सस्वर स्वरों में उच्चारित हो रहा था-
ॐ चित्रान्देवामुदगानीकञ्च क्षुर्मित्रस्यवरुणस्याग्नेः।
आप्राद्यावापृथ्वीऽअंतरिक्ष œ  सूर्यऽआत्मा जगस्तस्थुषश्च॥
    
-यह कैसा आश्चर्य है कि देवताओं के जीवनाधार, तेजसमूह तथा मित्र, वरुण और अग्नि के नेत्र स्वरूप सूर्य उदय को प्राप्त हुए हैं। स्थावर-जंगममय जगत् के आत्मस्वरूप इन सूर्यदेव ने पृथ्वी द्युलोक और अंतरिक्ष को अपने तेज से पूर्णतः व्याप्त कर रखा है। पक्षियों के कलगान के संगीत में पिरोया यह मंत्रगीत इतना सम्मोहक था कि वहाँ उपस्थित ऋषियों एवं देवों का समुदाय जड़ीभूत हो गया।
    
क्षण-पल की उर्मियों को अपने में समेटे कालधारा में सभी की चेतना में चैतन्य का पुनः नवोन्मेष हुआ। एक बार पुनः भक्ति की अंतःसलिला सभी के भावों को रससिक्त करने लगी। सभी को प्रतीक्षा थी देवर्षि के नये सूत्र के प्रकट होने की, क्योंकि पिछली कथाकड़ी में तो केवल इतना ही कहा गया था कि भक्ति के नाना मत हैं। ये मत क्या हैं, कौन से हैं? यह सच तो देवर्षि को ही प्रकट करना था और वह इस समय सम्भवतः अपने हृदय मंदिर में विद्यमान भगवान नारायण की झाँकी निहार रहे थे। उनके होठों पर मधुर मुस्कान थी और आँखों से अजस्र भाव सरिता प्रवाहित हो रही थी। प्रतीक्षारत तो सभी थे कि महर्षि के नेत्र खुलें और वह अपना नया सूत्र कहें।
    
ब्रह्मवेत्ता ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने ज्यों ही देवर्षि नारद के नेत्रों को उन्मीलित होते देखा, वे सहज ही पूछ बैठे- ‘‘हम सबको भी अपनी भावानुभूतियों का भागीदार बनायें देवर्षि!’’ उत्तर में नारद के होठों पर हल्का सा स्मित आया और कहने लगे-‘‘आप तो सर्वान्तर्यामी हैं ब्रह्मर्षि। भला आपसे क्या छुपा रह सकता है? मैं तो बस यूँ ही अपने आराध्य की पूजा कर रहा था। मेरे प्रभु भी मेरे मन में थे और पूजा सामग्री भी मन में थी-इतना ही नहीं पूजा की ये सभी क्रियाएँ भी अंतर्मन में ही सम्पन्न कर रहा था और जो आनन्द छलक रहा था-वह भी अंतर्मन में ही था। हाँ! उससे मेरा सम्पूर्ण अस्तित्व अवश्य अभी तक भक्ति में भीगा हुआ है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ७०

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ३६)

सुख का केन्द्र और स्रोत आत्मा

अध्यात्म विद्या का उद्देश्य मनुष्य के चिन्तन और कर्तव्य को अमर्यादित न होने देने—अवांछनीयता न अपनाने के लिए आवश्यक विवेक और साहस उत्पन्न करता है मनुष्य अपने अस्तित्व को, लक्ष्य को व्यवहार को सही तरह समझे। सही मार्ग को अपनाकर सही परिणाम उपलब्ध करते हुए, प्रगति के पथ पर निरन्तर आगे बढ़ता चले। अपूर्णता से पूर्णता में विकसित हो। यही मार्गदर्शक करता—इसका व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करना आत्मविद्या का मूल प्रयोजन है।

यह स्मरण रखा जाना चाहिए मानव का निर्माण जड़ एवं चेतन दोनों के युग्म से हुआ है। जब तक शरीर में चेतना है तब तक हमारी सभी इन्द्रियां क्रियाशील हैं और शरीर में हलचल है, लेकिन जिस क्षण चेतना या आत्मा शरीर से अलग हो जाती है। शरीर मिट्टी का ढेला मात्र ही रहता है। कोई स्पन्दन, कोई क्रिया, कोई सार्थकता नहीं रह पाती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि शरीर एवं आत्मा का संयोग जहां जीवात्मा में विराट् शक्ति का स्रोत है वहां आत्मा से रहित शरीर का कोई मूल्य नहीं। अपने जीवन का प्रत्येक क्षण हम अपने शरीर के सुख साधन जुटाने में खर्च करते हैं और इन्द्रियजन्य भोगों में मरते-खपते रहते हैं। लेकिन मृत्यु के समय तक भी हम अपनी वासनाओं, तृष्णाओं एवं लिप्साओं को तुष्ट नहीं कर पाते।

जीवन के समग्र उद्देश्य की पूर्ति के लिये यह आवश्यक है कि हम शरीर एवं आत्मा दोनों के समन्वित विकास, परिष्कार एवं तुष्टि-पुष्टि का दृष्टिकोण बनावें। एक को ही सिर्फ विकसित करें और एक को उपेक्षित करें—ऐसा दृष्टिकोण अपनाने से सच्चा आनन्द नहीं मिल सकता।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ५९
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

गुरुवार, 24 जून 2021

👉 गुरु कौन

बहुत समय पहले की बात है, किसी नगर में एक बेहद प्रभावशाली महंत रहते थे। उन के पास शिक्षा लेने हेतु दूर दूर से शिष्य आते थे।

एक दिन एक शिष्य ने महंत से सवाल किया, स्वामीजी आपके गुरु कौन है? आपने किस गुरु से शिक्षा प्राप्त की है? महंत शिष्य का सवाल सुन मुस्कुराए और बोले, मेरे हजारो गुरु हैं! यदि मै उनके नाम गिनाने बैठ जाऊ तो शायद महीनो लग जाए। लेकिन फिर भी मै अपने तीन गुरुओ के बारे मे तुम्हे जरुर बताऊंगा। मेरा पहला गुरु था एक चोर।

एक बार में रास्ता भटक गया था और जब दूर किसी गाव में पंहुचा तो बहुत देर हो गयी थी। सब दुकाने और घर बंद हो चुके थे। लेकिन आख़िरकार मुझे एक आदमी मिला जो एक दीवार में सेंध लगाने की कोशिश कर रहा था। मैने उससे पूछा कि मै कहा ठहर सकता हूं, तो वह बोला की आधी रात गए इस समय आपको कहीं कोई भी आसरा मिलना बहुत मुश्किल होंगा, लेकिन आप चाहे तो मेरे साथ आज कि रात ठहर सकते हो। मै एक चोर हु और अगर एक चोर के साथ रहने में आपको कोई परेशानी नहीं होंगी तो आप मेरे साथ रह सकते है। वह इतना प्यारा आदमी था कि मै उसके साथ एक रात कि जगह एक महीने तक रह गया! वह हर रात मुझे कहता कि मै अपने काम पर जाता हूं, आप आराम करो, प्रार्थना करो। जब वह काम से आता तो मै उससे पूछता की कुछ मिला तुम्हे? तो वह कहता की आज तो कुछ नहीं मिला पर अगर भगवान ने चाहा तो जल्द ही जरुर कुछ मिलेगा। वह कभी निराश और उदास नहीं होता था, और हमेशा मस्त रहता था। कुछ दिन बाद मैं उसको धन्यवाद करके वापस अपने घर आ गया। जब मुझे ध्यान करते हुए सालों-साल बीत गए थे और कुछ भी नहीं हो रहा था तो कई बार ऐसे क्षण आते थे कि मैं बिलकुल हताश और निराश होकर साधना छोड़ लेने की ठान लेता था। और तब अचानक मुझे उस चोर की याद आती जो रोज कहता था कि भगवान ने चाहा तो जल्द ही कुछ जरुर मिलेगा और इस तरह मैं हमेशा अपना ध्यान लगता और साधना में लीन रहता|मेरा दूसरा गुरु एक कुत्ता था।

एक बार बहुत गर्मी वाले दिन मै कही जा रहा था और मैं बहुत प्यासा था और पानी के तलाश में घूम रहा था कि सामने से एक कुत्ता दौड़ता हुआ आया। वह भी बहुत प्यासा था। पास ही एक नदी थी। उस कुत्ते ने आगे जाकर नदी में झांका तो उसे एक और कुत्ता पानी में नजर आया जो की उसकी अपनी ही परछाई थी। कुत्ता उसे देख बहुत डर गया। वह परछाई को देखकर भौकता और पीछे हट जाता, लेकिन बहुत प्यास लगने के कारण वह वापस पानी के पास लौट आता। अंततः, अपने डर के बावजूद वह नदी में कूद पड़ा और उसके कूदते ही वह परछाई भी गायब हो गई। उस कुत्ते के इस साहस को देख मुझे एक बहुत बड़ी सिख मिल गई। अपने डर के बावजूद व्यक्ति को छलांग लगा लेनी होती है। सफलता उसे ही मिलती है जो व्यक्ति डर का हिम्मत से साहस से मुकाबला करता है। मेरा तीसरा गुरु एक छोटा बच्चा है।

मै एक गांव से गुजर रहा था कि मैंने देखा एक छोटा बच्चा एक जलती हुई मोमबत्ती ले जा रहा था। वह पास के किसी मंदिर में मोमबत्ती रखने जा रहा था।

मजाक में ही मैंने उससे पूछा की क्या यह मोमबत्ती तुमने जलाई है? वह बोला, जी मैंने ही जलाई है। तो मैंने उससे कहा की एक क्षण था जब यह मोमबत्ती बुझी हुई थी और फिर एक क्षण आया जब यह मोमबत्ती जल गई। क्या तुम मुझे वह स्त्रोत दिखा सकते हो जहा से वह ज्योति आई?

वह बच्चा हँसा और मोमबत्ती को फूंख मारकर बुझाते हुए बोला, अब आपने ज्योति को जाते हुए देखा है। कहा गई वह? आप ही मुझे बताइए।
 
मेरा अहंकार चकनाचूर हो गया, मेरा ज्ञान जाता रहा। और उस क्षण मुझे अपनी ही मूढ़ता का एहसास हुआ। तब से मैंने कोरे ज्ञान से हाथ धो लिए। शिष्य होने का अर्थ क्या है? शिष्य होने का अर्थ है पुरे अस्तित्व के प्रति खुले होना। हर समय हर ओर से सीखने को तैयार रहना।कभी किसी कि बात का बूरा नहि मानना चाहिए, किसी भी इंसान कि कही हुइ बात को ठंडे दिमाग से एकांत में बैठकर सोचना चाहिए के उसने क्या-क्या कहा और क्यों कहा तब उसकी कही बातों से अपनी कि हुई गलतियों को समझे और अपनी कमियों को दूर करें।

जीवन का हर क्षण, हमें कुछ न कुछ सीखने का मौका देता है। हमें जीवन में हमेशा एक शिष्य बनकर अच्छी बातो को सीखते रहना चाहिए। यह जीवन हमें आये दिन किसी न किसी रूप में किसी गुरु से मिलाता रहता है, यह हम पर निर्भर करता है कि क्या हम उस महंत की तरह एक शिष्य बनकर उस गुरु से मिलने वाली शिक्षा को ग्रहण कर पा रहे हैं की नहीं।

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ३५)

सुख का केन्द्र और स्रोत आत्मा

तीन शरीरों को जीवात्मा धारण किये हुए है। तीनों की तीन रसानुभूतियां हैं। ऊपर दो की चर्चा हो चुकी। स्थूल शरीर की सरसता-इन्द्रिय समूह के साथ जुड़ी हुई है। आहार, निद्रा, भय, मैथुन जैसे सुख इन्द्रियों द्वारा ही मिलते हैं। सूक्ष्म शरीर का प्रतीक मन है। मन की सरसता मैत्री पर, जन सम्पर्क पर अवलम्बित है। परिवार मोह से लेकर समाज सम्बन्ध, नेतृत्व, सम्मिलन, उत्सव, आयोजन जैसे सम्पर्क परक अवसर मन को सुख देते हैं। घटित होने वाली घटनाओं को अपने ऊपर घटित होने की सूक्ष्म सम्वेदना उत्पन्न करके वह समाज की अनेक हलचलों से भी अपने को बांध लेता है और उन घटना क्रमों में खट्टी-मीठी अनुभूतियां उपलब्ध करता है। उपन्यास, सिनेमा, अखबार रेडियो आदि मन को इसी आधार पर आकर्षित करते और प्रिय लगते हैं।

तीसरा रसानुभूति उपकरण है—अन्तरात्मा उसका कार्य क्षेत्र ‘कारण शरीर’ है। उसमें उत्कृष्टता, उत्कर्ष, प्रगति, गौरव की प्रवृत्ति रहती है जो उच्च भावनाओं के माध्यम से चरितार्थ होती है। मनुष्य की श्रेष्ठता और सन्मार्गगामिता प्रखर होती रहे इसके लिए उसमें भी एक रसानुभूति विद्यमान है—उसका नाम है वर्चस्व, यश कामना, नेतृत्व, गौरव प्रदर्शन। उस आकांक्षा से प्रेरित होकर मनुष्य अगणित प्रकार की सफलतायें प्राप्त करता है ताकि वह स्वयं दूसरों की तुलना में अपने आपको श्रेष्ठ, पुरुषार्थी, पराक्रमी, बुद्धिमान अनुभव करके सुख प्राप्त करे और दूसरे लोग भी उसकी विशेषताओं, विभूतियों से प्रभावित होकर उसे यश, मान प्रदान करें।

संक्षेप में यह मनुष्य के तीन शरीरों की—तीन रसानुभूतियों की चर्चा हुई। हमारी अगणित योजनायें—इच्छा, आकांक्षायें गतिविधियां इन्हीं तीन मल प्रवृत्तियों के इर्द−गिर्द घूमती हैं। जो कुछ मनुष्य सोचता और करता है उसे तीन भोगों में विभक्त किया जा सकता है। भगवान ने यह तीन उपहार जीवन को सरसता से भरा पूरा रखने के लिये दिये हैं। साथ ही उनका अस्तित्व इसलिये भी है कि व्यक्ति निरन्तर सक्रिय बना रहे। इन सुखानुभूतियों को प्राप्त करने के लिये उसके तीनों शरीर निरन्तर जुटे रहें। आलस्य, अवसाद की उदासीनता, नीरसता की स्थिति सामने आकर खड़ी न हो जाय और जीवन को आनन्द रहित भार रूप न बना दे। सक्रियता के आधार पर चल रहे सृष्टि क्रम को अवरुद्ध न करदे। अन्तरात्मा, मन और इन्द्रिय समूह को यदि सही मार्ग पर चलने का अवसर मिलता रहे तो जीवन हर्षोल्लास के साथ व्यतीत हो सकता है।

भूल मनुष्य की तब आरम्भ होती है जब वह इन तीनों रसानुभूतियों को अमर्यादित होकर—अनावश्यक मात्रा में—अति शीघ्र, बिना उचित मूल्य चुकाये प्राप्त करने के लिये आकुल, आतुर हो उठता है और लूट-खसोट की मनोवृत्ति अपनाकर अवांछनीय गतिविधियां अपना लेता है। विग्रह इसी से उत्पन्न होता है। पाप का कारण यही उतावली है। जीवन में अव्यवस्था और अस्त-व्यस्तता इसी से उत्पन्न होती। पतन इसी भूल का परिणाम है अपराधी, दुष्ट और घृणित बनने का कारण उन उपलब्धियों के लिये अनुचित मार्ग को अपनाना ही है। उतावला व्यक्ति आतुरता में विवेक खो बैठता है और औचित्य को भूलकर बहुत जल्दी—अधिक मात्रा में उपरोक्त सुखों को पाने के लिए असन्तुष्ट होकर एक प्रकार से उच्छृंखल हो उठता है। यह अमर्यादित स्थिति उसके लिए विपत्ति बनकर सामने आती है। सरल स्वाभाविक रीति से जो शान्ति पूर्वक मिल रहा था—मिलता रह सकता था—वह भी हाथ से चला जाता है और शारीरिक रोग, मानसिक उद्वेग—सामाजिक तिरस्कार, आर्थिक अभाव आत्मिक अशान्ति के संकटों से घिरा हुआ जीवन नरक बन जाता है। अधिक के लिये उतावला मनुष्य सरसता स्वाभाविकता को भी खोकर उलटा शोक-संताप, कष्ट-क्लेश एवं अभाव, दारिद्र्य में फंस जाता है। आमतौर से मनुष्य यह भूल करते हैं। इसी भूल को माया, अज्ञान, अविद्या नामों से पुकारते हैं। यह भूल ही ईश्वर प्रदत्त पग-पग पर मिलती रहने वाली सरसता से वंचित करती है और इसी के कारण जीव ऊंचा उठने के स्थान पर नीचे गिरता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ५७
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग ३५)

भक्ति एक, लक्षण अनेक
    
सभी का आग्रह सनकादि को भी भाया। वे कहने लगे- ‘‘नारद का कथन सत्य है। इस क्रम में मुझे एक प्रसंग याद हो आया है। उस समय हम चारों सृष्टि पिता ब्रह्मा जी के पास थे। तभी वहाँ सौर्यायणी ऋषि पधारे। सृष्टि के जटिल कार्यों में सदा व्यस्त रहने वाले सृष्टि पिता ब्रह्मा सौर्यायणी ऋषि को देखकर हर्षित हो उठे। उन्होंने मुझसे कहा-वत्स ये ऋषि सौर्यायणी परमात्मा के परम भक्त हैं। भक्ति तत्त्व का जैसा रहस्य इन्होंने जाना है-वैसा शायद ही कभी किसी को अनुभव हुआ हो। स्वयं भगवान सदाशिव इनकी पराभक्ति की मुक्त कण्ठ से प्रशंसा करते हैं। तुम सब इनसे भक्तितत्त्व के निगूढ़ रहस्यों की चर्चा कर सकते हो।
    
सृष्टि पिता के इस तरह से कहने पर हम चारों ने सौर्यायणी ऋषि से आग्रहपूर्वक भक्तितत्त्व की जिज्ञासा की। हमारी जिज्ञासा के उत्तर में वह बड़े मधुर व विनीत स्वर में बोले-सभी शास्त्र एवं आचार्यगण भक्ति के स्वरूप के बारे में अगणित मत प्रकट करते हैं। पर यथार्थ में मनुष्य की भावनाएँ जिस भी तरह भावमय भगवान की ओर मुड़ें, उनमें समाहित हों वही भक्ति है, फिर वह चाहे पूजा से हो अथवा पाठ से। इसका माध्यम चाहे कथा बने अथवा संकीर्तन-सभी कुछ को भक्ति कहा जा सकता है। यही क्यों-प्रत्येक वह कर्म, भाव व विचार भक्ति है, जिसे भगवान को अर्पित किया गया है। इसके विपरीत अथवा विमुख जो भी है, वह श्रेष्ठ होने पर भी निकृष्ट है।
ऐसा कहते हुए उन्होंने अपने बचपन का प्रसंग सुनाया। इसे सुनाते हुए वे बोले-मेरा जन्म गरीब ब्राह्मण परिवार में हुआ था। पूर्व जन्मों के कर्मों का संजाल ऐसा था कि जन्म के कुछ ही समय के बाद माता-पिता एक दुर्घटना में मर गये। माता-पिता के न रहने पर जीवन अनगिनत आपत्तियों से घिर गया। जब पेट भरने को अन्न ही न था, तब भला कौन मुझे पढ़ाता-लिखाता। यूँ ही भटकते रहना ही मेरे जीवन का कर्म था। जो कोई कुछ देता, उसे ही भोजन के रूप में ग्रहण कर लेता। बड़े ही अपमान भरे, पीड़ादायक, संत्रास भरे दिन थे। मन सदा खिन्न, विच्छिन्न एवं विक्षोभ से भरा रहता था।
    
एक दिन दोपहर में जब भूख से विकल हुआ मैं भटक रहा था तो एक भक्तिमती गृहिणी उधर से गुजरी। उससे  मेरी यह दशा देखी न गयी। उसने मुझे स्नान आदि कराकर शुद्ध सात्विक भोजन कराया और साथ ही यह बताया कि बेटा! परमात्मा सभी जीवों के पिता हैं। उनकी कृपा सभी पर बरसती है। बस बात उनकी अनुभूति की है। इसके लिए मैं क्या करूँ  माँ? मैंने उस पवित्र नारी से पूछा। वह बोली-कुछ विशेष नहीं बेटा! बस प्रातः जागरण से लेकर रात्रि शयन तक तुम जो भी करते हो उसे प्रभु अर्पित कर दो और जितना बन सके उन्हें पुकारो। उस पवित्र नारी की बात मानकर मैंने यही करना प्रारम्भ किया।
    
समय बीतता गया और इसी के साथ प्रभु के नाम के प्रभाव से मेरे पिछले जन्मों के कर्मों का भार भी घटता गया। मुझे प्रातः से रात्रि तक केवल एक ही बात याद रहती कि मुझे सब कुछ भगवान के लिए करना है और उन्हीं को पुकारना है। भक्ति की यह विधि कुछ ऐसी चमत्कारी थी कि इसके प्रभाव से मुझे गुरु मिले, संतों का सान्निध्य मिला। भक्तवत्सल भगवान सदाशिव की कृपा मिली। सृष्टि पिता ब्रह्मा का स्नेह प्राप्त हुआ और तब मैंने ऋषियों से जाना कि भक्त की भावनाओं के अनुरूप, क्रिया की विधियों के अनुरूप, भक्ति के कई भेद भी हैं।
    
ऋषि सौर्यायणी की यह कथा सुनाकर सनकादि ऋषि बोले-यथार्थ तत्त्व तो भावनाओं के प्रभु अर्पण में है। रही बात भेद की सो यह देवर्षि नारद ही कहें।’’ परम पवित्र ऋषि सनक की वाणी को सुनकर सभी हर्षित हो गये। अब उन्हें प्रतीक्षा भक्ति के नवीन सूत्रोदय की थी जिसे सूर्योदय के बाद ही उच्चारित होना था।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ६७

मंगलवार, 22 जून 2021

👉 संघर्ष से बनती है जिंदगी बेहतर

हर किसी के जीवन में कभी ना कभी ऐसा समय आता है जब हम मुश्किलों में घिर जाते हैं और हमारे सामने अनेकों समस्यायें एक साथ आ जाती हैं। ऐसी स्थिति में ज्यादातर लोग घबरा जाते हैं और हमें खुद पर भरोसा नहीं रहता और हम अपना आत्मविश्वास खो देते हैं। और खुद प्रयास करने के बजाय दूसरों से उम्मीद लगाने लग जाते हैं जिससे हमें और ज्यादा नुकसान होता है तथा और ज्यादा तनाव होता है और हम नकारात्मकता के शिकार हो जाते हैं और संघर्ष करना छोड़ देते हैं।

एक आदमी हर रोज सुबह बगीचे में टहलने जाता था। एक बार उसने बगीचे में एक पेड़ की टहनी पर एक तितली का कोकून (छत्ता) देखा। अब वह रोजाना उसे देखने लगा। एक दिन उसने देखा कि उस कोकून में एक छोटा सा छेद हो गया है। उत्सुकतावश वह उसके पास जाकर बड़े ध्यान से उसे देखने लगा। थोड़ी देर बाद उसने देखा कि एक छोटी तितली उस छेद में से बाहर आने की कोशिश कर रही है लेकिन बहुत कोशिशो के बाद भी उसे बाहर निकलने में तकलीफ हो रही है। उस आदमी को उस पर दया आ गयी। उसने उस कोकून का छेद इतना बड़ा कर दिया कि तितली आसानी से बाहर निकल जाये | कुछ समय बाद तितली कोकून से बाहर आ गयी लेकिन उसका शरीर सूजा हुआ था और पंख भी सूखे पड़े थे। आदमी ने सोचा कि तितली अब उड़ेगी लेकिन सूजन के कारण तितली उड़ नहीं सकी और कुछ देर बाद मर गयी।

दरअसल भगवान ने ही तितली के कोकून से बाहर आने की प्रक्रिया को इतना कठिन बनाया है जिससे की संघर्ष करने के दौरान तितली के शरीर पर मौजूद तरल उसके पंखो तक पहुँच सके और उसके पंख मजबूत होकर उड़ने लायक बन सकें और तितली खुले आसमान में उडान भर सके। यह संघर्ष ही उस तितली को उसकी क्षमताओं का एहसास कराता है।

यही बात हम पर भी लागू होती है। मुश्किलें, समस्यायें हमें कमजोर करने के लिए नहीं बल्कि हमें हमारी क्षमताओं का एहसास कराकर अपने आप को बेहतर बनाने के लिए हैं अपने आप को मजबूत बनाने के लिए हैं।

इसलिए जब भी कभी आपके जीवन में मुश्किलें या समस्यायें आयें तो उनसे घबरायें नहीं बल्कि डट कर उनका सामना करें। संघर्ष करते रहें तथा नकारात्मक विचार त्याग कर सकारात्मकता के साथ प्रयास करते रहें। एक दिन आप अपने मुश्किल रूपी कोकून से बाहर आयेंगे और खुले आसमान में उडान भरेंगे अर्थात आप जीत जायेंगे।

आप सभी मुश्किलों, समस्यायों पर विजय पा लेंगे।

👉 भक्तिगाथा (भाग ३४)

भक्ति एक, लक्षण अनेक
    
मनन कब निदिध्यासन में बदला किसी को भी पता न चला। हिमालय के हिमाच्छादित शुभ्र शिखरों की छाँव में बैठा हुआ वह ऋषियों एवं देवों का समुदाय अनायास ही भावसमाधि में लीन हो गया। पल-क्षण की लहरें काल-सरिता में उठती-गिरती और विलीन होती रहीं। तभी वातावरण में अचानक ही ॐकार का दिव्य नाद ध्वनित होने लगा। धीरे-धीरे इस पवित्र नाद के स्पन्दन सघन होते गये, और इसी सघनता में कुछ ऐसा भावमय स्फोट हुआ कि वेदवाणी मुखर हो उठी। इसी के साथ वह दैवीय क्षेत्र एक अलौकिक आलोक से आलोकित हो गया। जब यह आलोकपुञ्ज कुछ मद्धम हुआ तो सभी ने देखा-चारों वेदों के सदृश्य भगवान ब्रह्मा जी के मानस पुत्र पधारे हैं।
    
सनक, सनन्दन, सनत् और सनातन की यह उपस्थिति सभी को आनन्द विभोर करने वाली थी। उनके आगमन के साथ सभी की चेतना भावसमाधि के भाव लोक से बाहर आयी। ब्रह्माजी के इन मानस पुत्रों को देखकर सभी के हृदय में श्रद्धा और सत्कार का ज्वार उमड़ आया। देवर्षि नारद अपने इन अग्रजों को देखकर भाव से जड़ीभूत हो गये। वह अचानक कुछ कह न सके, बस उनकी बरबस आँखों से आँसू छलक उठे। अनुरक्त हृदय, श्रद्धासिक्त अंतःकरण से उन्होंने इन चारों वेदमूर्तियों को प्रणाम किया। नारद को इस तरह से प्रणाम करते हुए देख अन्य सभी को चेत हुआ। सभी की भावनाएँ उनके श्रीचरणों में अर्पित होने के लिए आतुर होने लगीं। स्वयं सप्तर्षियों ने उनका अर्घ्य पाद्य आदि से सत्कार किया। सभी के सम्मिलित शील, सत्कार और सद्व्यवहार से पुलकित सनकादि ऋषियों ने सबको आशीर्वचन कहे।
    
वे बोले- ‘‘हे महर्षिजन! हे देवगण! आप सभी के रूप में समस्त सृष्टि का सत्त्व यहाँ पर सघनता से पुञ्जीभूत हुआ है। जहाँ शुद्ध सत्त्व है वहीं भावशुद्धि है और जहाँ भावशुद्धि है वहीं भक्ति है। जहाँ सघन और प्रगाढ़ भक्ति है वहाँ भावमय भगवान का सहज प्रत्यक्ष होता है। भक्ति का ऐसा पावन संगम समूची सृष्टि में बड़ा विरल है। यही कारण है कि हम सब भी यहाँ भक्ति सुरसरी में स्नान कर स्वयं को धन्य करने आ गये।’’ उनकी इस मधुर-मंजुल वाणी को सुनकर सप्तर्षियों ने कहा- ‘‘भगवन! हम सभी आपका सान्निध्य पाकर धन्य हैं। आप सभी को अपने पास देखकर हम सब यह अनुभव कर रहे हैं जैसे कि चारों वेद साकार स्वरूप होकर हमारे बीच पधारे हैं।’’
    
‘‘आप सभी का यह शील-विनय स्तुत्य है।’’ सनकऋषि ने वार्ता के सूत्र को नया आयाम देते हुए कहा- ‘‘लेकिन हम यहाँ भक्तिगाथा के श्रवण के लिए पधारे हैं।’’ इसलिए देवर्षि से मेरा आग्रह है कि वे अपना नया भक्तिसूत्र हमें सुनाएँ। उनके प्रति श्रद्धा से विनत देवर्षि ने कहा- ‘‘आपका आदेश मुझे शिरोधार्य है।’’ और फिर उन्होंने भक्ति के तारों को झंकृत करते हुए उच्चारित किया-
‘तल्लक्षणानि वाच्यन्ते नानामतमेदात्’॥ १५॥
अब नाना मतों के अनुसार उस भक्ति के लक्षण बताते हैं।
    
इस सूत्र को सभी ने चिंतन के लिए प्रेरित किया। ‘एक भक्ति के अनेक लक्षण’ यह बात अनूठी थी, पर देवर्षि की अनुभूति यही कह रही थी। थोड़ी देर वातावरण निःस्तब्ध रहा। फिर महर्षि क्रतु ने कहा- ‘‘देवर्षि इस सूत्र का रहस्य स्पष्ट करें।’’ उत्तर में ऋषि नारद ने कहा- ‘‘आज मेरा अनुरोध है कि सृष्टि के सभी रहस्यों में निष्णात मेरे अग्रज बन्धु सनकादि ऋषि इस सूत्र के रहस्यार्थ को बताएँ।’’ नारद का यह कथन सभी को प्रीतिकर लगा, क्योंकि आज सभी ब्रह्माजी के इन मानस पुत्रों के मुख से कुछ सुनना चाहते थे। देवर्षि नारद ने तो जैसे सभी की चाहत को स्वीकारोक्ति दे दी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ६६

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ३४)

सुख का केन्द्र और स्रोत आत्मा

आंख का साधारण काम है वस्तुओं को देखना ताकि हमारी जीवन यात्रा ठीक तरह चलती रह सके। पर आंखों में कितनी अद्भुत विशेषता भर दी है कि वह रूप, सौन्दर्य, कौतुक, कौतूहल जैसी रस भरी अनुभूतियां ग्रहण करके चित्त को प्रफुल्लित बनाती हैं। संसार में उत्पादन, परिपुष्टि, विनाश का क्रम नितान्त स्वाभाविक है। मध्यवर्ती स्थिति में हर चीज तरुण होती है और सुन्दर लगती है। क्या पुष्प क्या मनुष्य हर किसी को तीनों स्थितियों में होकर गुजरना पड़ता है। मध्यकाल सौन्दर्य लगता है। वस्तुतः यह तीनों ही स्थितियां अपने क्रम, अपने स्थान और अपने समय पर सुन्दर हैं। पर आंखों को सुन्दर-असुन्दर का भेद करके मध्य स्थिति को सुन्दर समझने की कुछ अद्भुत विशेषता मिली है।
फलस्वरूप जो कुछ उभरता हुआ विकसित, परिपुष्ट दीखता है सो सुन्दर लगता है। सुन्दर असुन्दर का तात्विक दृष्टि से यहां कुछ भी अस्तित्व नहीं है। पर हमारी अद्भुत आंखें ही हैं जो अपनी सौन्दर्यानुभूति वाली विशेषता के कारण हमारे दैनिक जीवन से सम्बन्धित समीपवर्ती वस्तुओं में से सौन्दर्य वाला भाग देखतीं, आनन्द अनुभव करतीं, उल्लसित और पुलकित होती हैं। चित्त को प्रसन्न करती हैं।

इसी प्रकार जननेन्द्रिय की प्रक्रिया है। प्रजनन मक्खी मच्छरों, कीट-पतंगों, बीज अंकुरों में भी चलता रहता है। यह सृष्टि का सरल स्वाभाविक क्रम है पर हमारी जननेन्द्रिय में कैसा अजीब उल्लास सराबोर कर दिया है कि संभोग के क्षण ही नहीं—उसकी कल्पना भी मन के कोने-कोने में सिहरन पुलकन, उमंग और आतुरता भर देती है। तत्वतः बात कुछ भी नहीं है। दो शरीरों के दो अवयवों का स्पर्श—इसमें क्या अनोखापन है? क्या अद्भुतता है? क्या उपलब्धि है? फिर स्पर्श का कुछ प्रभाव हो भी तो उसकी कल्पना से किस प्रकार, क्यों, किस लिये चित्त को बेचैन करने वाली ललक पैदा होनी चाहिये? बात कुछ भी नहीं है। मात्र जननेन्द्रिय की बनावट में एक अद्भुत प्रकार की सरसता का समावेश मात्र है जो हमें सामान्य स्वाभाविक दाम्पत्य-जीवन के वास्तविक या काल्पनिक प्रत्यक्ष और परोक्ष क्षेत्र में एक विचित्र प्रकार की रसानुभूति उत्पन्न करके—जीने भर के लिये प्रयुक्त हो सकने वाले जीवन को निरन्तर उमंगों से भरता रहता है।

ऊपर जीभ, आंख और जननेन्द्रिय की चर्चा हुई, कान और नाक के बारे में भी इसी प्रकार समझना चाहिए। यहां पान भाग वाला इन्द्रिय समूह अपने साथ रसानुभूति की विलक्षणता इसलिये धारण किये हुये हैं कि सरस, स्वाभाविक सामान्य जीवन क्रम ऐसे ही नीरस ढर्रे का जीने भर के लिये मिला हुआ प्रतीत न हो वरन् उसमें हर घड़ी उत्साह, उल्लास, रस, आनन्द बना रहे और उसे उपलब्ध करते रहने के लिये जीवन की उपयोगिता, सार्थकता और सरसता का भान होता रहे। इन्द्रिय समूह हमें इसी प्रयोजन के लिए उपलब्ध है। यदि उनका उचित, संयमित, विवेकपूर्ण, व्यवस्था पूर्वक उपयोग किया जा सके, तो हमारा भौतिक सांसारिक जीवन पग-पग पर सरसता, आनन्द उपलब्ध करता रह सकता है।

दूसरा उपकरण मन इसलिए मिला है कि संसार में जो कुछ चेतन है उसके साथ अपनी चेतना का स्पर्श करके और भी ऊंचे स्तर की आनन्दानुभूति प्राप्त करे। इन्द्रियां जड़ शरीर से सम्बन्धित हैं। जड़ पदार्थों को स्पर्श करके—उस संसर्ग का सुख लूटती हैं। जड़ का जड़ से स्पर्श भी कितना सुखद हो सकता है, इस विचित्रता का अनुभव हमें इन्द्रियों के माध्यम से होता है। चेतन का चेतन के साथ, जीवधारी का जीवधारी के साथ स्पर्श—सम्पर्क होने से मित्रता, ममता, मोह, स्नेह, सद्भाव, घनिष्ठता, दया, करुणा, मुदिता जैसी अनुभूतियां होती हैं। प्रतिकूल परिस्थितियों में द्वेष, घृणा जैसे भाव भी उत्पन्न होते हैं पर उनका अस्तित्व है इसीलिए कि मित्रता के वातावरण में सम्पर्क, संसर्ग का आनन्द बिखरता रहे, यदि अन्धकार न हो तो प्रकाश की विशेषता ही नष्ट हो जाय। वस्तुतः मन की बनावट दूसरों के सम्पर्क, सहयोग, स्नेह भावों के आदान-प्रदान का सुख प्राप्त करने में है। मेले-ठेलों में सभा सम्मेलनों में जाने की इच्छा इसीलिए उठती है उन जन संकुल स्थानों में व्यक्तियों की घनिष्ठता न सही समीपता का अदृश्य सुख तो अनायास मिलता ही है।

चूंकि इन्द्रिय सुख और जन सम्पर्क की घनिष्ठता में सहायक एक और नया माध्यम सभ्यता के विकास के साथ-साथ बनकर खड़ा हो गया है इसलिये अब प्रिय वह भी लगने लगा है—इस तीसरे मनुष्य कृत—आकर्षण तत्व का नाम है—धन में स्वभावतः कोई आकर्षण नहीं। इसमें इन्द्रिय समूह या मन को पुलकित करने वाली कोई सीधी क्षमता नहीं है। धातु के सिक्के या कागज के टुकड़े भला आदमी के लिए प्रत्यक्षतः क्यों आकर्षक हो सकते हैं। पर चूंकि वर्तमान समाज व्यवस्था के अनुसार धन के द्वारा इन्द्रिय सुख के साधन प्राप्त होते हैं। मैत्री भी सम्भव होती है। इसलिए धन भी प्रकारान्तर रूप से मन का प्रिय विषय बन गया। अस्तु धन की गणना भी सुखदायक माध्यमों से जोड़ ली गई है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ५४
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

शुक्रवार, 18 जून 2021

👉 !! जीभ का रस !!

एक बूढ़ा राहगीर थक कर कहीं टिकने का स्थान खोजने लगा। एक महिला ने उसे अपने बाड़े में ठहरने का स्थान बता दिया। बूढ़ा वहीं चैन से सो गया। सुबह उठने पर उसने आगे चलने से पूर्व सोचा कि यह अच्छी जगह है, यहीं पर खिचड़ी पका ली जाए और फिर उसे खाकर आगे का सफर किया जाए। बूढ़े ने वहीं पड़ी सूखी लकड़ियां इकठ्ठा कीं और ईंटों का चूल्हा बनाकर खिचड़ी पकाने लगा। बटलोई उसने उसी महिला से मांग ली।

बूढ़े राहगीर ने महिला का ध्यान बंटाते हुए कहा, 'एक बात कहूं.? बाड़े का दरवाजा कम चौड़ा है। अगर सामने वाली मोटी भैंस मर जाए तो फिर उसे उठाकर बाहर कैसे ले जाया जाएगा.?' महिला को इस व्यर्थ की कड़वी बात का बुरा तो लगा, पर वह यह सोचकर चुप रह गई कि बुजुर्ग है और फिर कुछ देर बाद जाने ही वाला है, इसके मुंह क्यों लगा जाए।

उधर चूल्हे पर चढ़ी खिचड़ी आधी ही पक पाई थी कि वह महिला किसी काम से बाड़े से होकर गुजरी। इस बार बूढ़ा फिर उससे बोला: 'तुम्हारे हाथों का चूड़ा बहुत कीमती लगता है। यदि तुम विधवा हो गईं तो इसे तोड़ना पड़ेगा। ऐसे तो बहुत नुकसान हो जाएगा.?'

इस बार महिला से सहा न गया। वह भागती हुई आई और उसने बुड्ढे के गमछे में अधपकी खिचड़ी उलट दी। चूल्हे की आग पर पानी डाल दिया। अपनी बटलोई छीन ली और बुड्ढे को धक्के देकर निकाल दिया।

तब बुड्ढे को अपनी भूल का एहसास हुआ। उसने माफी मांगी और आगे बढ़ गया। उसके गमछे से अधपकी खिचड़ी का पानी टपकता रहा और सारे कपड़े उससे खराब होते रहे। रास्ते में लोगों ने पूछा, 'यह सब क्या है.?' बूढ़े ने कहा, 'यह मेरी जीभ का रस टपका है, जिसने पहले तिरस्कार कराया और अब हंसी उड़वा रहा है।'

शिक्षा:-
तात्पर्य यह है के पहले तोलें फिर बोलें। चाहे कम बोलें मगर जितना भी बोलें, मधुर बोलें और सोच समझ कर बोलें।
 

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ३३)

सुख का केन्द्र और स्रोत आत्मा

वस्तुएं हमें इसलिये मिलती हैं कि उनका श्रेष्ठतम सदुपयोग करके उनसे स्व-पर कल्याण की व्यवस्था बनाई जाय। साधन जड़ जगत के अंग हैं और वे रंग रूप बदलते हुए इस जगत की शोभा बढ़ाते रहने के लिए हैं। उन्हें अपने गर्व-गौरव का, विलास वैभव का आधार बनाकर संग्रह करते चलें। अहंकार का पोषण, तृष्णा की तुष्टि अथवा विलासिता के अभिवर्धन में धन को—शारीरिक, मानसिक विभूतियों को नियोजित रखा जाय तो उत्कृष्ट जीवन जी सकने का द्वार अवरुद्ध ही बना रहेगा। संकीर्ण और स्वार्थी जिन्दगी ही जियी जा सकेगी और इस कुचक्र में यह सुर-दुर्लभ अक्सर निरर्थक ही चला जायेगा।

शरीर और मन को अपना आपा मान बैठना और उसकी वासनाओं, तृष्णाओं की पूर्ति में इतना निमग्न हो जाना कि आत्मा का स्वरूप और लक्ष्य पूरी तरह विस्मृत हो जाय, ये दूरदर्शितापूर्ण नहीं है। शारीरिक और मानसिक उपलब्धियों के लिये जितना श्रम किया जाता है और मनोयोग लगाया जाता है, जोखिम उठाया जाता है उतना ही विनियोग यदि आत्मोत्कर्ष के लिये—आत्मबल सम्पादन के लिये लगाया जा सके तो मनुष्य इसी जीवन में महामानव बन सकता है और उन विभूतियों को करतलगत कर सकता है जो देवदूतों में पाई जाती हैं। इतना उच्चकोटि का लाभ छोड़कर नगण्य-सी लिप्साओं में डूबे हुये न करने योग्य काम करना—उनके कटु-कर्म—परिपाक सहना, किसी विवेकवान के लिए उपयुक्त न होगा। किन्तु देखा जाता है कि अधिकांश व्यक्ति उचित छोड़कर अनुचित का, लाभ छोड़कर हानि का रास्ता अपनाते हैं इसे क्या कहा जाय? यह माया का खेल ही है। जिससे भ्रमित होकर मनुष्य जल में थल-थल में जल देखने की तरह हानि को लाभ और लाभ को हानि समझता है। अपने पैरों आप कुल्हाड़ी मारता है।

माया विमुग्ध होकर ही मनुष्य अपने उच्च स्तर से अपनी दुर्बलताओं के कारण अधः पतित होता है और दुःख क्लेश भरा नरक भोगता है अन्यथा मनुष्य को इस विश्व के साथ सम्पर्क बनाकर सुखानुभूति प्राप्त कराने वाले जो तीन उपकरण मिले हैं यदि उनका ठीक तरह उपयोग किया जा सके तो जीवन अति सुन्दर और मधुर बन सकता है। इन तीन उपकरणों के नाम हैं। (1) अन्तरात्मा (2) मन (3) इन्द्रिय समूह।

इन्द्रियों की बनावट ऐसी अद्भुत है कि दैनिक जीवन की सामान्य प्रक्रिया में ही उन्हें पग-पग पर असाधारण सरसता अनुभव होती है। पेट भरने के लिए भोजन करना स्वाभाविक है। भगवान की कैसी महिमा है कि उसने दैनिक जीवन की शरीर यात्रा भर की नितान्त स्वाभाविक प्रक्रिया को कितना सरस बना दिया है। उपयुक्त भोजन करते हुये जीव को कितना रस मिलता है और चित्त को उस अनुभूति से कैसे प्रसन्नता होती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ५३
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग ३३)

भक्त का जीवन निर्द्वंद्व व सहज होता है
    
उनकी चर्चा सुनकर मैं स्वयं उनसे मिलने गया। तेजपुञ्ज, तपोनिष्ठ परमभक्त आरण्यक मुनि। होंठों पर भगवती का नाम, हृदय में उन करुणामयी माता की छवि। रोम-रोम भगवती के प्रेम से पुलकित। बड़े निशिं्चत, निर्द्वन्द्व लगे मुनि आरण्यक। उनके मन में न तो किसी के प्रति कोई द्वेष था और न रोष। भय जैसे किसी तत्त्व का तो उनके अस्तित्त्व में कोई नामो-निशान भी न था। ऐसे अद्भुत उन मुनिवर को देखकर मैंने उनका अभिवादन किया। पर वह तो इतने विनम्र थे कि मुझे देखते ही मेरा परिचय पाकर वह मेरे पाँवों में गिर पड़े और कहने लगे, हे ब्रह्मर्षि! मैं तो बस अपनी माँ का नन्हा अबोध बालक हूँ। मेरा अहोभाग्य कि उन करुणामयी ने मुझे आपके दर्शन करा दिए।
    
आरण्यक मुनि के छोटे से कुटीर को मैंने ध्यान से देखा। वहाँ कुछ भी  सामान नहीं था। सम्भवतः कोई भी संग्रह उन मुनिवर को रुचिकर न था। वस्त्रों के नाम पर भी कौपीन के अतिरिक्त एक-आध लघु वस्त्र खण्ड ही थे। वस्तुस्थिति को परखकर मैंने उनसे आग्रह किया कि हे मुनिवर! आप यहाँ पर एकाकी हैं। वन में निशाचरी माया का आतंक है, क्यों न आप हमारे साथ सिद्धाश्रम चलें। वह स्थान सुरक्षित है और सब प्रकार से साधना के अनुकूल भी। आप वहाँ रहकर सुखपूर्वक साधना कर सकेंगे। किसी भी तरह का व्यवधान न होगा?
    
मेरी इन बातों के उत्तर में आरण्यक मुनि मुस्कराए और बोले- हे महान ब्रह्मर्षि! आप तो परम ज्ञानी हैं। कहीं सुखपूर्वक भी साधना की जाती है? सुख और साधना इन दोनों का कभी कोई मेल होता है क्या? रही बात निशाचर, राक्षस एवं दैत्यों की माया का-तो क्या वे सब भगवती महामाया से भी ज्यादा मायावी हैं। अरे जिनकी माया के छोटे से अंश से यह सृष्टि रची गयी है, जिनकी चेतना का एक कण पाकर सभी चेतन हैं। उन परम करुणामयी माँ का बालक भयभीत हो, यह लज्जा की बात है। फिर वह कहने लगे- ब्रह्मर्षि! मैंने जीवन में न तो तप अर्जित किया है, न ही विद्याएँ अन्वेषित की हैं, बस माँ का नाम लिया है। यही मेरा धन है और जीवन है। मैं किसी भी आतंक के भय से अथवा किसी सुविधा के लोभ से अपनी भक्ति एवं निष्ठा को कलंकित या कलुषित नहीं करना चाहता।
    
बड़ी तेजोद्दीप्त थी उन महान भक्त की वाणी। सौम्य होते हुए भी वे परम दुधर्ष थे। वह इस उन्नत अवस्था में भी आचारनिष्ठ थे। सभी नित्य-नैमित्तिक कार्यों को वह बड़ी श्रद्धा एवं आस्थापूर्वक करते थे। फिर भी जब कभी वह महीनों की भावसमाधि में खो जाते तो यह सभी आचार-नियम शिथिल पड़ जाते थे। शरीर रक्षा के लिए भोजन आदि का क्रम थोड़ा बहुत ही हो जाता है। उनसे जब मैंने यह जानना चाहा कि शरीर की रक्षा के लिए भोजन आदि की व्यवस्था कैसे निभती है? तो बरबस वह हँस पड़े और कहने लगे जो इस अखिल विश्व की व्यवस्थापिका है, वही मेरी भी उचित व्यवस्था कर देती है। उन परमभक्त की एक बात मुझे आज भी महामंत्र की तरह स्मरण है, उन्होंने कहा था कि जो दुर्दान्त दुष्टों, षड्यंत्रकारियों एवं शत्रुओं के बीच सम्पूर्णतया निशिं्चत होकर निर्द्वन्द्व भाव से अपना सहज जीवन जीता है, वही सच्चा भक्त है।’’ ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की यह अपूर्व वाणी सभी को भक्ति के परम गोपनीय मंत्रोच्चार की भाँति लगी और प्रायः सभी इस पर मनन करने लगे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ६४

मंगलवार, 15 जून 2021

👉 आपसी मतभेद से विनाश:-

एक बहेलिए ने एक ही तरह के पक्षियों के एक छोटे से झुंड़ को खूब मौज-मस्ती करते देखा तो उन्हें फंसाने की सोची. उसने पास के घने पेड़ के नीचे अपना जाल बिछा दिया. बहेलिया अनुभवी था, उसका अनुमान ठीक निकला. पक्षी पेड़ पर आए और फिर दाना चुगने पेड़ के नीचे उतरे. वे सब आपस में मित्र थे सो भोजन देख समूचा झुंड़ ही एक साथ उतरा. पक्षी ज्यादा तो नहीं थे पर जितने भी थे सब के सब बहेलिये के बिछाए जाल में फंस गए.

जाल में फंसे पक्षी आपस में राय बात करने लगे कि अब क्या किया जाए. क्या बचने की अभी कोई राह है?  उधर बहेलिया खुश हो गया कि पहली बार में ही कामयाबी मिल गयी. बहेलिया जाल उठाने को चला ही था कि आपस में बातचीत कर सभी पक्षी एकमत हुए. पक्षियों का झुंड़ जाल ले कर उड़ चला.
.
बहेलिया हैरान खड़ा रह गया. उसके हाथ में शिकार तो आया नहीं, उलटा जाल भी निकल गया. अचरज में पड़ा बहेलिया अपने जाल को देखता हुआ उन पक्षियों का पीछा करने लगा. आसमान में जाल समेत पक्षी उड़े जा रहे थे और हाथ में लाठी लिए बहेलिया उनके पीछे भागता चला जा रहा था. रास्ते में एक ऋषि का आश्रम था. उन्होंने यह माजरा देखा तो उन्हें हंसी आ गयी. ऋषि ने आवाज देकर बहेलिये को पुकारा. बहेलिया जाना तो न चाहता था पर ऋषि के बुलावे को कैसे टालता. उसने आसमान में अपना जाल लेकर भागते पक्षियों पर टकटकी लगाए रखी और ऋषि के पास पहुंचा. 

ऋषि ने कहा- तुम्हारा दौड़ना व्यर्थ है. पक्षी तो आसमान में हैं. वे उड़ते हुए जाने कहां पहुंचेंगे, कहां रूकेंगे. तुम्हारे हाथ न आयेंगे. बुद्धि से काम लो, यह बेकार की भाग-दौड़ छोड़ दो.

बहेलिया बोला- ऋषिवर अभी इन सभी पक्षियों में एकता है. क्या पता कब किस बात पर इनमें आपस में झगड़ा हो जाए. मैं उसी समय के इंतज़ार में इनके पीछे दौड़ रहा हूं. लड़-झगड़ कर जब ये जमीन पर आ जाएंगे तो मैं इन्हें पकड़ लूंगा.
.
यह कहते हुए बहेलिया ऋषि को प्रणाम कर फिर से आसमान में जाल समेत उड़ती चिड़ियों के पीछे दौड़ा. एक ही दिशा में उड़ते उड़ते कुछ पक्षी थकने लगे थे. कुछ पक्षी अभी और दूर तक उड़ सकते थे.

थके पक्षियों और मजबूत पक्षियों के बीच एक तरह की होड़ शुरू हो गई. कुछ देर पहले तक संकट में फंसे होने के कारण जो एकता थी वह संकट से आधा-अधूरा निकलते ही छिन्न-भिन्न होने लगी. थके पक्षी जाल को कहीं नजदीक ही उतारना चाहते थे तो दूसरों की राय थी कि अभी उड़ते हुए और दूर जाना चाहिए. थके पक्षियों में आपस में भी इस बात पर बहस होने लगी कि किस स्थान पर सुस्ताने के लिए उतरना चाहिए. जितने मुंह उतनी बात. सब अपनी पसंद के अनुसार आराम करने का सुरक्षित ठिकाना सुझा रहे थे. एक के बताए स्थान के लिए दूसरा राजी न होता. देखते ही देखते उनमें इसी बात पर आपस में ही तू-तू, मैं-मैं हो गई. एकता भंग हो चुकी थी. कोई किधर को उड़ने लगा कोई किधर को. थके कमजोर पक्षियों ने तो चाल ही धीमी कर दी. इन सबके चलते जाल अब और संभल न पाया. नीचे गिरने लगा. अब तो पक्षियों के पंख भी उसमें फंस गए.  दौड़ता बहेलिया यह देखकर और उत्साह से भागने लगा. जल्द ही वे जमीन पर गिरे.

बहेलिया अपने जाल और उसमें फंसे पक्षियों के पास पहुंच गया. सभी पक्षियों को सावधानी से निकाला और फिर उन्हें बेचने बाजार को चल पड़ा.
.
तुलसीदासजी कहते है- जहां सुमति तहां संपत्ति नाना, जहां कुमति तहां विपत्ति निधाना. यानी जहां एक जुटता है वहां कल्याण है. जहां फूट है वहां अंत निश्चित है. महाभारत के उद्योग पर्व की यह कथा बताती है कि आपसी मतभेद में किस तरह पूरे समाज का विनाश हो जाता है.

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ३२)

सुख का केन्द्र और स्रोत आत्मा

जिस प्रकार हर प्रभात को हम जगते हैं और हर रात को गहरी नींद में सोते हैं ठीक उसी प्रकार थोड़ी अधिक विस्तृत भूमिका में जनम और मरण की प्रक्रिया चलती रहती हैं। सूर्य हर दिन डूबता, उगता है। जीवन भी नियत अवधि में उत्पन्न और समाप्त होता रहता है। जिस तरह एक के बाद दूसरे दिन का लम्बा जीवनयापन चलता रहता है उसी प्रकार एक जन्म के बाद दूसरे जन्म की श्रृंखला चलती है। इसमें न कोई दुख की बात है न शोक की, न डर की। यह तथ्य यदि सामने प्रस्तुत रहे तो फिर जीवन की लम्बी श्रृंखला की योजना इस ध्यान में रखकर ही बनाई जानी चाहिये। यदि भावी जीवन को उज्ज्वल बनाने की सम्भावना सामने हो तो इसके लिये एक दिन के कष्ट, कठिनाई से व्यतीत करने की बात किसी को अखरती नहीं। ऐसी भूल भी कोई समझदार आदमी नहीं कर सकता कि एक दिन शौक-मौज मनाने के लिये कोई ऐसा अवांछनीय कार्य कर डाला जाय, जिसके लिए जीवन के शेष समस्त दिन विपत्ति में फंसकर व्यतीत करने पड़ें। मनुष्य-जीवन की भोजन व्यवस्था बनाते समय भी यदि यही रीति-नीति अपनाई जा सके तो समझना चाहिये कि अनन्त जीवनों की जुड़ी हुई श्रृंखला का स्वरूप समझ लिया गया। ऐसी दशा में न वस्तुओं से लोभ हो सकता है और न व्यक्तियों से मोह। तब केवल वस्तुओं के सदुपयोग और व्यक्तियों के प्रति कर्तव्यपालन का भाव ही मन में उठता रह सकता है।

एक जन्म को ही पूरा जीवन मान बैठने से मनुष्य आज ही जी भरकर शौक-मौज करने के लिये आतुर होता है और भविष्य को अन्धकारमय बनाता है। यदि अनन्त जीवन में एक-एक जन्म को एक दिन की तरह नगण्य महत्व का माना जाय तो फिर विद्यार्थी के विद्याध्ययन, पहलवान और कृषक की तरह अनवरत कष्ट साधन करने के लिए उत्साह बना रहेगा और उज्ज्वल भविष्य की आस में आज की कठिनाइयों को तुच्छ माना जायेगा। पर होता ऐसा कहां है? इसका कारण वर्तमान को ही सब कुछ मान बैठने का मायावादी अज्ञान ही है। इसी में फंसकर मनुष्य दुर्बुद्धि अपनाता और पापकर्म करता है यदि माया का पर्दा हट जाय तो फिर बाल-क्रीड़ाओं को छोड़ कर वयस्कों और बुद्धिमानों जैसी गति-विधियां अपनाने की ही प्रवृत्ति बनेगी।

हम सब सराय में ठहरे हुये मुसाफिरों की तरह ही दिन व्यतीत कर रहे हैं। जल प्रवाह में बहते हुये तिनकों की तरह ही इकट्ठे हो गये हैं। जब मिल ही गये तो सराय के नियमों का सड़क पर चलने के कानूनों का क्षेत्र के नागरिक कर्तव्यों का पालन करना ही पड़ेगा, इस दृष्टि के विकसित होने पर यह अज्ञान हट जाता है कि कोई हमारा है या हम किसी के हैं। सब ईश्वर के हैं—और ईश्वर ही सबका हितू है। प्रत्येक प्राणी अपनी कर्म रज्जु में बंधा अपनी धुरी पर घूम रहा है। समय का परिपाक बहुतों को परस्पर जुड़ता और बिछुड़ता रहता है। यह सत्य यदि समझ में आ जाय तो न किसी के मोह बन्धन में बंधा जाय, न बांधा जाय। आत्मीयता के विस्तार द्वारा सम्पन्न होने वाला प्रेम हर किसी पर परिपूर्ण मात्रा में बखेरा जाय, पर उसमें विवेक का समुचित पुट रहे। परिवारी लोगों के प्रति अत्यधिक आसक्ति, पक्षपात और मोह के कारण उन्हें अनुचित लाभ देने की जो प्रवृत्ति पाई जाती है उससे हर किसी का घोर अहित होता है। मुफ्त में अनावश्यक सहायता पाकर परिवार के लोग मुफ्तखोर बनते हैं और अपने श्रम-साधनों से जो लोक-मंगल सम्भव था उससे समाज को वंचित रहना पड़ता है और व्यक्ति परमार्थ का कल्याणकारी लाभ लेने से वंचित रह जाता है। यह माया बन्धनों का परिणाम ही है जिसने मोह जाल में जकड़ कर विश्व हित को श्रेय साधना से वंचित करके पूर्णता के लक्ष्य तक पहुंचने में भारी व्यवधान प्रस्तुत किया।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ५१
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग ३२)

भक्त का जीवन निर्द्वंद्व व सहज होता है
    
देवर्षि की बात सुनकर ऋषि क्रतु ने हामी भरी। महर्षि पुलह ने भी सहमति में अपना सिर हिलाया। तभी हिमालय के आँगन में कुछ हिमपक्षियों की कलरव ध्वनि गूँजी और वातावरण थोड़ा और मुखर हुआ। गायत्री के महासिद्ध ब्रह्मर्षि विश्वामित्र इस सम्पूर्ण अवधि में प्रायः मौन रहे थे, इन क्षणों में उन्होंने भी कुछ कहने की उत्सुकता दिखाई। परमज्ञानी ब्रह्मर्षि को बोलने के लिए उत्सुक देखकर सभी शान्त हो गये। सम्भवतः सब ब्रह्मर्षि को सुनने के लिए उत्सुक हो उठे थे। सभी की इस अपूर्व उत्सुकता को भाँपकर देवर्षि ने स्वयं कहा- ‘‘आप कुछ कहें ब्रह्मर्षि! हम सभी आपको सुनना चाहते हैं।
आप महान तपस्वी एवं अनेकों गुह्य विद्याओं के ज्ञाता हैं, आपके स्वर को सुनकर सभी अनुग्रहीत होंगे।’’
    
‘‘सो तो ठीक है देवर्षि!’’ यह महान् ऋषि विश्वामित्र का स्वर था। वह कह रहे थे कि- ‘‘सभी प्रकार के तप एवं विद्या से भक्ति श्रेष्ठ है। इससे बढ़कर अन्य कुछ भी नहीं। ऐसे ही एक परम भक्त आरण्यक मुनि के भक्तिमय जीवन का मैं साक्षी रहा हूँ। यदि आप सबकी सहमति हो तो मैं उनकी मधुर भक्तिगाथा की चर्चा करूँ।’’ ब्रह्मर्षि के इस आग्रह ने सभी को विभोर कर दिया। उनके इस कथन को सुनकर देवर्षि बोले- ‘‘आपको साधुवाद है ब्रह्मर्षि! हम सभी उन परम भागवत की गाथा सुनना चाहते हैं। आप अवश्य कहें, यह कथा प्रसंग सुनकर हम सभी धन्य होंगे।’’ देवर्षि की वाणी सभी को प्रीतिकर लगी और ब्रह्मर्षि विश्वामित्र अपनी अतीत की स्मृतियों में खो गये।
    
वह अतीत की इन यादों में भीगे हुए बोले- ‘‘उन दिनों मैं मिथिला के पास सिद्धाश्रम में तपोलीन था। अनेकों आध्यात्मिक आविष्कार मैंने इन्हीं दिनों किए थे। इसी समय मेरा आरण्यक मुनि से सम्पर्क हुआ। वह सिद्धाश्रम से थोड़ी ही दूर पर एक साधारण कुटी में निवास करते थे। मायावी राक्षसों-निशाचरों-दैत्यों की संघातक माया ने सभी ऋषियों-मुनियों, मनस्वियों व तपस्वियों को आक्रान्त कर रखा था। सभी भयाक्रान्त थे कि कब क्या हो जाय, कुछ पता नहीं। उन दिनों वन में कोई एकाकी रहने का साहस नहीं कर पा रहा था। सभी तपस्वी-यती समूह में रहना ही उचित समझते थे। अधिकतर जनों ने तो सिद्धाश्रम में आश्रय ले रखा था। इन्हीं में से किसी से मुझे पता चला कि मुनि आरण्यक निशाचरी माया के बीच एकाकी रह रहे हैं। उनके पास कोई भी अस्त्र-शस्त्र नहीं है, उनका न तो कोई रक्षक है न सहायक।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ६३

शुक्रवार, 11 जून 2021

👉 अपनी रोटी मिल बाँट कर खाओ

एक राजा था। उसका मंत्री बहुत बुद्धिमान था। एक बार राजा ने अपने मंत्री से प्रश्न किया – मंत्री जी! भेड़ों और कुत्तों की पैदा होने कि दर में तो कुत्ते भेड़ों से बहुत आगे हैं, लेकिन भेड़ों के झुंड के झुंड देखने में आते हैं और कुत्ते कहीं-कहीं एक आध ही नजर आते है। इसका क्या कारण हो सकता है?

मंत्री बोला – “महाराज! इस प्रश्न का उत्तर आपको कल सुबह मिल जायेगा।”  

राजा के सामने उसी दिन शाम को मंत्री ने एक कोठे में बिस कुत्ते बंद करवा दिये और उनके बीच रोटियों से भरी एक टोकरी रखवा दी।”

दूसरे कोठे में बीस भेड़े बंद करवा दी और चारे की एक टोकरी उनके बीच में रखवा दी। दोनों कोठों को बाहर से बंद करवाकर,वे दोनों लौट गये।

सुबह होने पर मंत्री राजा को साथ लेकर वहां आया। उसने पहले कुत्तों वाला कोठा खुलवाया। राजा को यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि बीसो कुत्ते आपस में लड़-लड़कर अपनी जान दे चुके हैं और रोटियों की टोकरी ज्यों की त्यों रखी है। कोई कुत्ता एक भी रोटी नहीं खा सका था।

इसके पश्चात मंत्री राजा के साथ भेड़ों वाले कोठे में पहुंचा। कोठा खोलने के पश्चात राजा ने देखा कि बीसो भेड़े एक दूसरे के गले पर मुंह रखकर बड़े ही आराम से सो रही थी और उनकी चारे की टोकरी एकदम खाली थी।

वास्तव में अपनी रोटी मिल बाँट कर ही खानी चाहिए और एकता में रहना चाहिए।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🌸हम बदलेंगे, युग बदलेगा।🌸

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ३१)

सुख का केन्द्र और स्रोत आत्मा

मल-मूत्र की गठरी के ऊपर प्रकृति ने एक आकर्षक खोल चढ़ाया हुआ है ताकि वह घृणित पिटारा सर्वत्र दुर्गन्ध बखेरता न फिरे। लोग इस आवरण पर मुग्ध हो जाते हैं, रूप, यौवन पर लट्टू होते हैं। सौन्दर्य की शाश्वत प्यास सुकोमल पुष्प से लेकर बाल सुलभ भोलेपन तक से सर्वत्र सहज ही तृप्ति की जा सकती पर विकारी दृष्टि के साथ जुड़ी हुई कामुक लिप्सा नर-नारियों को बेतरह उद्विग्न करती रहती है और उन्हें न चलने योग्य मार्ग पर चलाती है। मूत्र त्याग के घृणित अंगों की तनिक सी खुजली न जाने किससे क्या-क्या नहीं कर लेती। यदि मोहान्ध दृष्टि का पर्दा उठ सका होता तो शारीरिक रूप, यौवन की—यौन लिप्सा की मदोन्मत्ता का नशा सहज ही उतर जाता और पंचभूतों से बने जड़-कलेवर के पीछे आत्मा की ज्योति जगमगाती दीखती। कामुकता का स्थान पवित्र प्रेम भावनाओं ने ग्रहण कर लिया होता और नर-नारी के बीच के सम्बन्ध प्रकृति और पुरुष की तरह एक दूसरे के पूरक बनकर श्रेय साधन में संलग्न रहे होते। आज का नारकीय दाम्पत्य-जीवन तब स्वर्गीय सुषमा बखेर रहा होता। ऐसे उच्च आदर्शों को आधार मानकर बनाये गये गृहस्थ तब स्वर्ग की प्रतिमूर्ति बनकर धरती को आनन्द, उल्लास से भर रहे होते और नर-रत्नों की पीढ़ियां सृजी जातीं। यह पिशाचिनी माया ही है जिसने रूप, सौन्दर्य को परखने का दृष्टि दोष उत्पन्न करके आत्मतत्व को तिरस्कृत और चमड़ी की चमक को गौरव प्रदान किया है।

अपना स्वरूप, अपना लक्ष्य, अपना कर्त्तव्य यदि मनुष्य समय सका होता तो उसका चिन्तन और कर्तृत्व अत्यन्त उच्चकोटि का होता ऐसे नर को नारायण कहा जाता और उसके चरण जहां भी पड़ते वहां धरती धन्य हो जाती। पर अज्ञान के आवरण को क्या कहा जाय जिसने हमें नर-पशु के स्तर पर देखने और उसी प्रकार की रीति-नीति अपनाने के लिए निकृष्टता के गर्त में धकेल दिया है। माया का यही आवरण हमें नारकीय यातनाएं सहन करते हुए रोता, कलपता जीवन व्यतीत करने के लिए विवश करता है।

संसार को जैसा कि हम देखते, समझते हैं वह पूर्व प्रचलित भ्रान्त धारणाओं पर और मस्तिष्क सहित इन्द्रियों के ज्ञान पर आधारित है। यदि हम एक बार इन दोनों आधारों की अप्रामाणिकता और अक्षमता को स्वीकार करलें तथा नये सिरे से अपने सम्बन्ध में, सम्बन्धित व्यक्तियों तथा पदार्थों के सम्बन्ध में समस्त विश्व ब्रह्माण्ड के सम्बन्ध में नये तर्क पूर्ण वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विचार करना आरंभ करें तो तथ्य बिलकुल दूसरे ही स्तर के सामने आवेंगे और वही प्रतिपादन सोलहों आने सत्य सिद्ध होगा जिसे वेदान्त दर्शन में निर्धारित किया गया है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ४९
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग ३१)

भक्त का जीवन निर्द्वंद्व व सहज होता है

देवर्षि के वचन सभी की कर्ण सरिता से प्रवाहित होकर हृदय सागर में विलीन होते गये। अद्भुत रस था प्रभु पार्षद नारद की वाणी में। कुछ क्षण को तो लगा कि सभी को भावसमाधि हो गयी परन्तु तभी महर्षि क्रतु ने चेताया-‘‘देवर्षि! ऐसा भी तो हो सकता है कि अंतर्चेतना भक्ति में इतनी भीग जाय कि लोक एवं वेद सब कुछ स्वयं ही बिसर जाय।’’ ‘‘हाँ, सम्भव है ऐसा’’, ब्रह्मर्षि पुलह का स्वर था यह। वह कह रहे थे कि ‘‘भावुकता जब भाव-महाभाव में परिवर्तित होती हुई परिपक्व प्रेम में प्रतिष्ठित होती है तो सभी विधि-निषेध खोने लगते हैं। आत्मबोध इतना प्रगाढ़ होता है कि देहबोध विस्मृत होने लगता है। भक्त भगवन्मय होता है, ऐसे में कैसे निभे आचारविधान? किस तरह से किए जाएँ कठोर कर्म?’’
    
पुलह के इस प्रश्न पर देवर्षि नारद का मौन टूटा। उनके हृदय से भक्ति की झंकार उठी और अधरों से फूट पड़ी। उन्होंने कहा-
‘लोकोऽपिपितावदेव किन्तु
भोजनादि व्यापारस्त्वा-शरीरधारणावधि’॥ १४॥
‘लौकिक कर्मों को तब तक (ब्रह्मज्ञान रहने तक) विधिपूर्वक करना चाहिए, पर भोजनादि कार्य, जब तक शरीर रहेगा, होते रहेंगे।’
    
इस सूत्र के उच्चारण के साथ देवर्षि ने ऋषियों एवं देवों की दिव्यता को निहारा और कहने लगे- ‘‘यह सूत्र पूर्व सूत्र का ही उत्तर भाग है। दोनों को एकीकृत करके समझना चाहिए। सच यही है कि नियम एवं मर्यादाओं की अवहेलना नहीं की जानी चाहिए। इन्हें अपने आप मनमाने ढंग से छोड़ देने पर पतन की आशंका बढ़ जाती है, परन्तु भावों में भीगी चेतना जब भक्ति में प्रतिष्ठित हो जाती है, तब ये सभी बाहरी आचार-नियम सहज ही छूट जाते हैं। हाँ, जब तक शरीर रहता है, तब तक भोजन आदि कर्म होते रहेंगे, क्योंकि इनके बिना शरीर की रक्षा सम्भव नहीं है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ६२

बुधवार, 9 जून 2021

👉 समय का सदुपयोग

किसी गांव में एक व्यक्ति रहता था। वह बहुत ही भला था लेकिन उसमें एक दुर्गुण था वह हर काम को टाला करता था। वह मानता था कि जो कुछ होता है भाग्य से होता है।

एक दिन एक साधु उसके पास आया। उस व्यक्ति ने साधु की बहुत सेवा की। उसकी सेवा से खुश होकर साधु ने पारस पत्थर देते हुए कहा- मैं तुम्हारी सेवा से बहुत प्रसन्न हूं। इसलिय मैं तुम्हे यह पारस पत्थर दे रहा हूं। सात दिन बाद मै इसे तुम्हारे पास से ले जाऊंगा। इस बीच तुम जितना चाहो, उतना सोना बना लेना।

उस व्यक्ति को लोहा नही मिल रहा था। अपने घर में लोहा तलाश किया। थोड़ा सा लोहा मिला तो उसने उसी का सोना बनाकर बाजार में बेच दिया और कुछ सामान ले आया।

अगले दिन वह लोहा खरीदने के लिए बाजार गया, तो उस समय मंहगा मिल रहा था यह देख कर वह व्यक्ति घर लौट आया।

तीन दिन बाद वह फिर बाजार गया तो उसे पता चला कि इस बार और भी महंगा हो गया है। इसलिए वह लोहा बिना खरीदे ही वापस लौट गया।

उसने सोचा-एक दिन तो जरुर लोहा सस्ता होगा। जब सस्ता हो जाएगा तभी खरीदेंगे। यह सोचकर उसने लोहा खरीदा ही नहीं।

आठवे दिन साधु पारस लेने के लिए उसके पास आ गए। व्यक्ति ने कहा- मेरा तो सारा समय ऐसे ही निकल गया। अभी तो मैं कुछ भी सोना नहीं बना पाया। आप कृपया इस पत्थर को कुछ दिन और मेरे पास रहने दीजिए। लेकिन साधु राजी नहीं हुए।

साधु ने कहा-तुम्हारे जैसा आदमी जीवन में कुछ नहीं कर सकता। तुम्हारी जगह कोई और होता तो अब तक पता नहीं क्या-क्या कर चुका होता। जो आदमी समय का उपयोग करना नहीं जानता, वह हमेशा दु:खी रहता है। इतना कहते हुए साधु महाराज पत्थर लेकर चले गए।

शिक्षा:-
जो व्यक्ति काम को टालता रहता है, समय का सदुपयोग नहीं करता और केवल भाग्य भरोसे रहता है वह हमेशा दुःखी रहता है।

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ३०)

सुख का केन्द्र और स्रोत आत्मा

तत्वदर्शी ऋषियों ने अनन्त सुख-शान्ति की ओर अंगुलि निर्देश करते हुए कहा है—अन्वेषक प्रकाश को भीतर की ओर मोड़ दो।’ कालाईइल प्रभृति पाश्चात्य दार्शनिक भी यही कहते रहे हैं—‘टर्न द सर्च लाइट इन वार्डस्’।

वस्तुओं और व्यक्तियों में कोई आकर्षण नहीं है। अपनी आत्मीयता जिस किसी से भी जुड़ जाती है वही प्रिय लगने लगता है यह तथ्य कितनी स्पष्ट किन्तु कितना गुप्त है, लोग अमुक व्यक्ति या अमुक वस्तु को रुचिर मधुर मानते हैं और उसे पाने, लिपटाने के लिए आकुल-व्याकुल रहते हैं। प्राप्त होने पर वह आकुलता जैसे ही घटती है वैसे ही वह आकर्षण तिरोहित हो जाता है। किसी कारण यदि ममत्व हट या घट जाय तो वही वस्तु जो कल तक अत्यधिक प्रिय प्रतीत होती थी और जिसके बिना सब कुछ नीरस लगता था। बेकार और निकम्मी लगने लगेगी। वस्तु या व्यक्ति वही—किन्तु प्रियता में आश्चर्यजनक परिवर्तन बहुधा होता रहता है। इसका कारण एक मात्र यही है कि उधर से ममता का आकर्षण कम हो गया।

यह तथ्य यदि समझ लिया जाय तो ममता का आरोपण करके किसी भी वस्तु या व्यक्ति को कितने ही समय तक प्रिय पात्र बनाये रखा जा सकता है। यदि यह आरोपण क्षेत्र बड़ा बनाते चलें तो अपने प्रिय पात्रों की मात्रा एवं संख्या आश्चर्यजनक रीति से बढ़ती चली जायगी और जिधर भी दृष्टि डाली जाय उधर ही रुचिर मधुर बिखरा पड़ा दिखाई देगा और जीवन क्रम में आशाजनक आनन्द, उल्लास भर जायेगा। आत्मविद्या के इस रहस्य को जानकर भी लोक अनजान बने रहते हैं। आनन्द की खोज में—प्रिय पात्रों के पीछे मारे-मारे फिरते हैं। यदि इस माया मरीचिका को छोड़ दिया जाय, जिसे प्रिय पात्र बनाना हो उसी पर ममता बखेर दी जाय तो केवल वही व्यक्ति प्रियपात्र रह जायेंगे जिनकी घनिष्ठता, समीपता, मित्रता, वस्तुतः हितकर है।

बिछुड़ने, एवं खोने पर प्रायः दुख होता है। यदि समझ लिया जाय कि मिलन की तरह वियोग—जन्म की तरह मृत्यु भी अवश्यंभावी है तो उसके लिए पहले से ही तैयार रहा जा सकता है। सांस लेते समय भी यह विदित रहता है कि उसे कुछ ही क्षण पश्चात् छोड़ना पड़ेगा इसलिए श्वास-प्रश्वास की दोनों क्रियाएं समान प्रतीत होती हैं। न एक में दुख होता न दूसरी में सुख। एक का मरण दूसरे का जन्म है। मृत्यु के रुदन के साथ ही किसी घर का जन्मोत्सव बंधा हुआ है। व्यापार में एक को नफा तब होता है जब दूसरे को घाटा पड़ता है। धूप-छांह की तरह—दिन-रात की तरह—सर्दी-गर्मी की तरह यदि मिलन विछोह और हानि-लाभ कोपरस्पर एक दूसरे के साथ अविच्छिन्न रूप से मानकर चला जाय तो राग-द्वेष एवं हानि लाभ के सामान्य सृष्टि क्रम में न कुछ प्रिय लगे न अप्रिय। हमारा अज्ञान ही है जो अकारण हर्षोन्मत्त एवं शोक संतप्त आवेश के ज्वार भाटे में उछलता भटकता रहता है। यदि मायाबद्ध अशुभ चिन्तन से छुटकारा मिल जाय और सृष्टि के अनवरत जन्म, वृद्धि, विनाश के अनिवार्य क्रम को समझ लिया जाय तो मनुष्य शान्त, सन्तुलित, स्थिर, सन्तुष्ट एवं सुखी रह सकता है। ऐसी देवोपम मनोभूमि पल-पल में स्वर्गीय जीवन की सुखद संवेदनाएं सम्मुख प्रस्तुत किये रह सकता है। चिन्तन में समाया हुआ माया विकार ही है जो समुद्र तट पर बैठे अज्ञानी बालक के, ज्वार से प्रसन्न और भाटा से अप्रसन्न होने की तरह हमें उद्विग्न बनाये रहता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ४८
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग ३०)

भक्त के लिए अनिवार्य हैं मर्यादाएँ और संयम
    
इस समझदारी की बात को सभी समझदारों ने समझा। महर्षि अंगिरा जो अग्नि की भांति तेजस्वी एवं प्रखर थे, वे कहने लगे- ‘‘इस प्रसंग में ब्राह्मण भूरिश्रवा की कथा याद आ रही है। यदि आप सब अनुमति दें तो मैं सुनाऊँ।’’ ‘‘अवश्य!’’ महर्षि विश्वामित्र ने कहा। इसी के साथ सभी जनों के अनुमोदन एवं अनुमति की स्वर तरंग वातावरण में बिखर गयी, और इसी के साथ महर्षि अंगिरा बोले- ‘‘भूरिश्रवा अंग देश का रहने वाला था। उसका बचपन, कैशोर्य ऋषियों के आश्रम में गुजरा था। सन्ध्या, गायत्री, अग्निहोत्र उसके नित्य कर्म थे। गुरुकुल में उसने वेदों को पढ़ा था। महर्षि ऋचीक उसके आचार्य थे। महर्षि ऋचीक को उस युग का श्रेष्ठतम तत्त्वज्ञानी आचार्य माना जाता था। परन्तु परम ज्ञानी होने के साथ ब्रह्मर्षि ऋचीक का अन्तःहृदय भवानी की भक्ति से भरा था। उन्होंने अपने शिष्य को भी उस भक्तिमंत्र से दीक्षित किया परन्तु साथ ही अपने प्रिय शिष्य को चेताया भी- वत्स! हमेशा तप निरत रहना। उन्होंने कहा- वत्स! यह आध्यात्मिक जीवन का परम रहस्य है, तप अपनी डगर पर चलने वाले तपस्वी की सदा रक्षा करता है। आपदाएँ आन्तरिक एवं बाहरी, अपनी बीज अवस्था में तप में जल-भुन जाती हैंै। भटकाव के कारण प्रवृत्तियों में हों या परिस्थितियों में, तपस्वी के सामने कभी टिक नहीं पाते।
    
यही वह अन्तिम उपदेश था। इस उपदेश के साथ ही भूरिश्रवा ने गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया। उसकी धर्मपत्नी शुचिता सचमुच ही जगदम्बा का अंश थी। शील-सदाचार उसमें कूट-कूट कर भरे थे। वह अपने तपोनिरत पति के साथ प्रसन्न थी। परन्तु दैव का योग कहें या कुयोग, भूरिश्रवा कुसंग के फेरे में पड़ गए। उन्हें ऐसे मित्र मिल गए जो व्यसन में डूबे थे। इनके संग ने भूरिश्रवा को भी कुराह पर डाल दिया। उनके द्वारा की जाने वाली सन्ध्या, गायत्री एवं अग्निहोत्र सब छूटते गए। स्थिति यहाँ तक बिगड़ी कि अब तो उन्हें उदयकालीन सूर्य को अर्घ्यदान देना भी याद नहीं रहने लगा।
    
विदुषी पत्नी ने उन्हें महर्षि ऋचीक के कथन की याद दिलायी। उन्हें फिर से तपस्या के मार्ग पर लौट आने को कहा। कई बार हठपूर्वक, आग्रहपूर्वक उनसे सब नियम प्रारम्भ करवाए। परन्तु एक-दो सप्ताह में ही सब क्रम लड़खड़ा जाते। बात बन न सकी। उल्टे कुसंग के कुचक्र में फंसे भूरिश्रवा नगर की वारांगना  मंगला के पास जाने लगे। इस नए चक्रव्यूह में फँसकर घर का धन भी नष्ट हो गया। धन का नाश होते ही मंगला ने उन्हें अपने द्वार से तिरस्कृत करके भगा दिया। इतने दिनों में ब्राह्मण भूरिश्रवा अपनी गृहस्थी, धन, स्वास्थ्य, तेज सब कुछ गंवा चुके थे।

अब तो उनके पास अपने गुरुकुल की यादें भर शेष थीं। बस यदा-कदा अपने गुरुदेव महर्षि ऋचीक का स्मरण कर सिसक लेते। उनके इस भावपूर्ण सद्गुरु स्मरण ने तत्त्वदर्शी महर्षि ऋचीक की भावनाओं को छू लिया। वह अनायास ही एक दिन ब्राह्मण भूरिश्रवा के द्वार पर पहुँच गए। तेजहत भूरिश्रवा ने अपनी पत्नी शुचिता के साथ उनका स्वागत किया। भूरिश्रवा को अपने ऊपर लज्जा आ रही थी, कि परम तपस्वी-तेजस्वी गुरु का ऐसा भ्रष्ट शिष्य। परन्तु महर्षि तो अभी भी अपने अभागे शिष्य पर कृपालु थे।
    
उन्होंने कहा- वत्स! डरो मत, अभी भी चेत जाओ। तुम्हारे साथ जो भी हुआ वह सब तप एवं मर्यादा की अवहेलना का परिणाम है। परेशान न हो। जगदम्बा परम कृपालु हैं, वे अपनी भटकी एवं बहकी सन्तानों को भी प्यार करना जानती हैं। फिर उन्होंने भूरिश्रवा की पत्नी शुचिता की ओर देखा और उससे कहा, पुत्री मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि तुम्हारे गर्भ में माता का अंश है। गर्भकाल पूरा होने पर तुम पुत्री को जन्म दोगी। उसका नाम भवानी रखना। उसे माता का अंश व स्वरूप समझना। फिर भूरिश्रवा की ओर देखते हुए बोले- वत्स! माँ का नाम, उनकी भक्ति ही तुम्हारा कल्याण करेगी। फिर से एक बार अपनी श्रद्धा को समेटो और इस सत्य पर आस्था जमाओ कि मर्यादाएँ एवं संयम भक्त के लिए अनिवार्य हैं।
    
इस नूतन उपदेश के साथ परम ज्ञानी ऋचीक तो विदा हो गए। परन्तु भूरिश्रवा को सम्पूर्ण रूप से चेत आ गया। उसने सद्गुरु के वचनों का अक्षरशः पालन किया। बिखरी भावनाएँ फिर सिमटीं, माँ के नाम के प्रभाव से कलुष भी धुला। भक्ति पुनः प्रगाढ़ हुई। आन्तरिक सौन्दर्य पुनः संवारा और बाहर उसकी प्रतिच्छाया निखरी। भक्ति में मर्यादाओं के समावेश ने भूरिश्रवा के जीवन को पुनः रूपान्तरित कर दिया।’’ अपनी इस कथा को समाप्त करते हुए मह्मर्षि अंगिरा ने कहा- ‘‘मैं तो यहाँ तक कहता हूँ कि भक्त को तो विशेष रूप से मर्यादाओं को मानना चाहिए एवं उनका पालन करना चाहिए।’’ उनके इस कथन में देवर्षि ने अपना एक वाक्य जोड़ा, ‘‘क्योंकि इससे लोक शिक्षण भी होता है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ५९

मंगलवार, 8 जून 2021

👉 शरण

एक गरीब आदमी की झोपड़ी पर…रात को जोरों की वर्षा हो रही थी. सज्जन था, छोटी सी झोपड़ी थी . स्वयं और उसकी पत्नी, दोनों सोए थे. आधीरात किसी ने द्वार पर दस्तक दी।

उन सज्जन ने अपनी पत्नी से कहा - उठ! द्वार खोल दे. पत्नी द्वार के करीब सो रही थी . पत्नी ने कहा - इस आधी रात में जगह कहाँ है? कोई अगर शरण माँगेगा तो तुम मना न कर सकोगे?

वर्षा जोर की हो रही है. कोई शरण माँगने के लिए ही द्वार आया होगा न! जगह कहाँ है? उस सज्जन ने कहा - जगह? दो के सोने के लायक तो काफी है, तीन के बैठने के लायक काफी हो जाएगी.   तू दरवाजा खोल!

लेकिन द्वार आए आदमी को वापिस तो नहीं लौटाना है. दरवाजा खोला. कोई शरण ही माँग रहा था. भटक गया था और वर्षा मूसलाधार थी . वह अंदर आ गया . तीनों बैठकर गपशप करने लगे . सोने लायक तो जगह न थी .

थोड़ी देर बाद किसी और आदमी ने दस्तक दी. फिर फकीर ने अपनी पत्नी से कहा - खोल ! पत्नी ने कहा - अब करोगे क्या? जगह कहाँ है? अगर किसी ने शरण माँगी तो?

उस सज्जन ने कहा - अभी बैठने लायक जगह है फिर खड़े रहेंगे . मगर दरवाजा खोल! जरूर कोई मजबूर है . फिर दरवाजा खोला . वह अजनबी भी आ गया . अब वे खड़े होकर बातचीत करने लगे . इतना छोटा झोपड़ा ! और खड़े हुए चार लोग!

और तब अंततः एक कुत्ते ने आकर जोर से आवाज की . दरवाजे को हिलाया . फकीर ने कहा - दरवाजा खोलो . पत्नी ने दरवाजा खोलकर झाँका और कहा - अब तुम पागल हुए हो!

यह कुत्ता है . आदमी भी नहीं! सज्जन बोले - हमने पहले भी आदमियों के कारण दरवाजा नहीं खोला था, अपने हृदय के कारण खोला था!! हमारे लिए कुत्ते और आदमी में क्या फर्क?

हमने मदद के लिए दरवाजा खोला था . उसने भी आवाज दी है . उसने भी द्वार हिलाया है . उसने अपना काम पूरा कर दिया, अब हमें अपना काम करना है . दरवाजा खोलो!

उनकी पत्नी ने कहा - अब तो खड़े होने की भी जगह नहीं है! उसने कहा - अभी हम जरा आराम से खड़े हैं, फिर थोड़े सटकर खड़े होंगे . और एक बात याद रख ! यह कोई अमीर का महल नहीं है कि जिसमें जगह की कमी हो!

यह गरीब का झोपड़ा है, इसमें खूब जगह है!! जगह महलों में और झोपड़ों में नहीं होती, जगह दिलों में होती है!

अक्सर आप पाएँगे कि गरीब कभी कंजूस नहीं होता! उसका दिल बहुत बड़ा होता है!!

कंजूस होने योग्य उसके पास कुछ है ही नहीं . पकड़े तो पकड़े क्या? जैसे जैसे आदमी अमीर होता है, वैसे कंजूस होने लगता है, उसमें मोह बढ़ता है, लोभ बढ़ता है .

जरूरतमंद को अपनी क्षमता अनुसार शरण दीजिए . दिल बड़ा रखकर अपने दिल में औरों के लिए जगह जरूर रखिये .

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 27 March 2026

Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें। ➨ YouTube:  https://yugrishi-erp...