बुधवार, 8 मार्च 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 72)

🌹 हमारी जीवन साधना के अन्तरंग पक्ष-पहलू

🔴 पूजा उपासना के बिना आत्मिक प्रगति कैसे हो सकती है। यह जानने के साथ- साथ हमें यह भी जानना चाहिए कि स्वास्थ्य, अध्ययन, चिन्तन, मनन की, बौद्धिक विकास की प्रक्रिया सम्पन्न किये बिना केवल कलम कागज के आधार पर लेख नहीं लिखा जा सकता। न कविताएँ बनाई जा सकती हैं। आन्तरिक उत्कृष्टता बौद्धिक विकास की तरह है और पूजा अच्छी कलम की तरह। दोनों का समन्वय होने से ही बात बनती है। एक को हटा दिया जाय तो बात अधूरी रह जाती है। हमने यह ध्यान रखा कि साधना की गाड़ी एक पहिए पर न चल सकेगी, इसलिए दोनों पहियों की व्यवस्था ठीक तरह  जुटाई जाय।   

🔵 हमने उपासना कैसे कि इसमें कोई रहस्य नहीं है। गायत्री महाविज्ञान में जैसा लिखा है उसी क्रम से हमारा गायत्री मन्त्र का सामान्य उपासन क्रम चलता रहा है। हाँ! जितनी देर तक भजन करने बैठे हैं, उतनी देर तक यह भावना अवश्य करते रहे हैं ब्रह्म की परम तेजोमयी सत्ता माता गायत्री का दिव्य प्रकाश हमारे रोम- रोम में ओत- प्रोत हो रहा है और प्रचण्ड अग्नि में पड़कर लाल हुए लोहे की तरह हमारा भौंड़ा अस्तित्व उसी स्तर का उत्कृष्ट बन गया है जिस स्तर का कि हमारा इष्टदेव है। शरीर के अणु- परमाणुओं में गायत्री माता का वर्चस्व समा जाने से काया का हर अवयव ज्योर्तिमय हो उठा अग्नि से इन्द्रियों की लिप्सा जल कर भस्म हो गयी, आलस्य आदि दुर्गुण नष्ट हो गये। रोग- विकारों को उस अग्नि ने अपने में जला दिया। 

🔴 शरीर तो अपना है, पर उसके भीतर प्रचंड ब्रह्मवर्चस लहरा रहा है, व वाणी में केवल सरस्वती ही शेष है। असत्य, छल और स्वाद के वह असुर उस दिव्य मंदिर को छोड़कर पलायन कर गये। नेत्रों में गुण ग्राहकता और भगवान् का सौन्दर्य हर जड़- चेतन में देखने की क्षमता भर शेष है। छिद्रान्वेषण, कामुकता जैसे दोष आँखों में नहीं रहे। कान केवल जो मंगलमय हैं उसे सुनते हैं। बाकी कोलाहल मात्र है जो श्रवणेन्द्रिय के पर्दे से टकरा कर वापस लौट जाता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 7 मार्च 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 08 March 2017


👉 संजीवनी साधना से मिला जीवनदान

🔴 घटना अगस्त १९९७ की है। पटना जिले के ग्रामीण क्षेत्र के लगभग ६५ भाई बहनों के साथ शांतिकुञ्ज हरिद्वार ९ दिवसीय साधना सत्र में भाग लेने के लिए आया था। सत्र बहुत ही अच्छे तरीके से सम्पन्न हुआ। जब हम पटना वापस जा रहे थे तो मेरे पेट में हल्का दर्द महसूस हुआ। प्रातः घर पहुँचा। उसी दिन शाम को असहनीय दर्द होने लगा, जिसके कारण मैं बेहोश हो गया था। घर के लोग परेशान हो गए। पिताजी ने तुरन्त डॉक्टर को बुलवाया, लेकिन तब तक मुझे होश आ गया था। परीक्षण के उपरान्त पता चला कि हमें अपेन्डिसाइटिस है। डॉक्टर ने दवा दी। उस दवा से दर्द कुछ कम हुआ।

🔵 दूसरे दिन पटना के प्रख्यात सर्जन डॉ० बसन्त कुमार सिंह को उनके लक्ष्मी नर्सिंग होम, राजापुर में जाकर दिखाया। उन्होंने भी कहा कि अपेन्डिसाइटिस है। फिर मेरा अल्ट्रासाउण्ड कराया गया। रिपोर्ट देखकर ऑपरेशन की सलाह दी गई। इस दौरान पेट का दर्द समाप्त हो चुका था। केवल पेट में भारीपन अनुभव हो रहा था। लक्ष्मी नर्सिंग होम में मेरा ऑपरेशन हुआ था। जिस कमरे में मैं रह रहा था उसमें मैंने रैक पर प० पूज्य गुरुदेव, वंदनीया माताजी एवं गायत्री माँ के चित्र को लगा रखे थे।

🔴 मैं ऑपरेशन थियेटर में जाते समय गुरु जी एवं माताजी से अपने स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना करके गया था। ऑपरेशन के उपरान्त होश आने पर डॉ० साहब मुझसे मिलने आए। कमरे में प्रवेश करते ही उन्होंने कहा कि आप बड़े भाग्यशाली हैं; आपका अपेण्डिक्स दो दिन पहले फट गया था, लेकिन एक झिल्ली उसके जहरीले मवाद को आपके पेट में फैलने से रोके हुए थी। इस कारण आप बच गए।

🔵 मैंने गुरु देव के चित्र की ओर देखा। मुँह से निकला- सब इन्हीं का कमाल है। लगता है अभी और कुछ काम कराना चाहते हैं मुझसे। डॉक्टर ने जानना चाहा- कौन हैं ये? मैंने गुरु देव और गायत्री परिवार के बारे में संक्षेप में बताया। शान्तिकुञ्ज के संजीवनी साधना सत्र के विषय में भी बताया। मुझे ऐसा महसूस हो रहा था कि गुरु देव ने इसीलिए इस समय मुझसे संजीवनी साधना करवाई। यह बात भी मैंने डॉ० साहब को बताई। इसके बाद १० दिन अस्पताल में और रहना हुआ। इस दौरान वहाँ के सभी लोग आत्मीय बंधु हो गए। इस प्रकार मेरी इस बीमारी के जरिए डॉ० बसन्त कुमार सिंह जैसे परिजन गायत्री परिवार से जुड़े।

🌹 दिनकर सिंह चाँदपुर बेला,पटना (बिहार)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Wonderful/dal.1

👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (भाग 15)

🌹 प्रतिभा से बढ़कर और कोई समर्थता है नहीं    

🔴 भगवान ने सुदामा को अपनी द्वारिकापुरी, टूटी सुदामापुरी के स्थान पर स्थानान्तरित कर दी थी, पर इससे पहले यह विश्वास कर लिया था कि इस अनुदान को उस स्थान पर कारगर विश्वविद्यालय चलाने के लिए ही प्रयुक्त किया जाएगा। चाणक्य की शक्ति चन्द्रगुप्त को ही मिली थी और वह चक्रवर्ती कहलाया था।              

🔵 भवानी की अक्षय तलवार शिवाजी को मिली थी। अर्जुन को दिव्य गाण्डीव धनुष एवं बाण देने वालों ने अनुदान थमा देने से पहले यह भी जाँच लिया था कि उस समर्थता को किस काम में प्रयुक्त किया जाएगा? यदि बिना जाँच-पड़ताल के किसी को कुछ भी दे दिया जाए, तो भस्मासुर द्वारा शिवजी को जिस प्रकार हैरान किया गया था, वैसी ही हैरानी अन्यों को भी उठानी पड़ सकती है।    

🔴 भगवान ने काय-कलेवर तो आरम्भ से ही बिना मूल्य दे दिया है, पर उसके बाद का दूसरा वरदान है ‘‘परिष्कृत प्रतिभा’’। इसी के सहारे कोई महामानव स्तर का बड़प्पन उपलब्ध करता है। इतनी बहुमूल्य सम्पदा प्राप्त करने के लिए वैसा ही साहस एकत्रित करना पड़ेगा, जैसा कि लोकमंगल के लिए विवेकानन्द जैसों को अपनाना पड़ा था। इन दिनों परीक्षा भरी वेला है, जिसमें सिद्ध करना होगा कि जो कुछ दैवी-अनुग्रह विशेष रूप से उपलब्ध होगा, उसे उच्चस्तरीय प्रयोजन में ही प्रयुक्त किया जायेगा। कहना न होगा कि इन दिनों नवयुग के अवतरण का पथ-प्रशस्त करना ही वह बड़ा काम है, जिसके लिए कटिबद्ध होने पर ‘परिष्कृत प्रतिभा’ का बड़ी मात्रा में, अनुग्रह प्राप्त किया जा सकता है। उसे धारण करने पर ‘हीरे का हार’ पहनने वाले की तरह शोभायमान बना जा सकता है। 

🔵 ईश्वरीय व्यवस्था में यही निर्धारण है कि बोया जाए और उसके बाद काटा जाए। पहले काट लें, उसके बाद बोएँ, यही नहीं हो सकता। लोकसेवी उज्ज्वल छवि वाले लोग ही प्राय: वरिष्ठ, विश्वस्त गिने और उच्चस्तरीय प्रयोजनों के लिए प्रतिनिधि चुने जाते हैं।       

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 फूल एक सजीव सौंदर्य

🔴 दार्शनिक अरस्तु को फूलों से बड़ा प्रेम था। उन्हें जितना अवकाश का समय मिलता था, उस समय का संपूर्ण उपयोग फूलों को रोपने, उनकी क्यारियों में जल भरने, निकाई करने गोडाइ करने मे करते थे। उनकी छोटी-सी बगीची उसमें नाना प्रकार के हरे, नीले, पीले, लाल, गुलाबी फूल झूमते रहते थे। गर्मियों में भी पास से गुजरने वाले लोगों को हरियाली और सुगंध का लाभ मिलता था। दोनों वस्तुएँ ऐसी है, जिन्हें देखते ही आत्मा खिल उठती है, मन प्रफुल्लित हो उठता है।

🔵 एक दिन एक मित्र ने पूछा- "आपको फूलों से इतना प्रेम क्यों है" तो उन्होंने मुस्कराकर कहा- यों कि फूल परमात्मा का सौंदर्यबोध कराता है। फूलों को देखकर मानव सात्विक, सरल व सुरुचि भाव जाग्रत करता है। अंतःकरण की जो कोमल वृत्तियाँ हैं, फूलों के सान्निध्य और दर्शन से उनका विकास होता है। इसीलिए तो लोग देवालयों में जाकर फूल चढाते हैं कि उनकी कोमल भावनाएँ परमात्मा स्वीकार करे और स्नेह आशीर्वाद प्रदान करे।

🔴 बडे़ आदमियों, गुरुजनों से भेंट के समय विदाई और मिलन समारोहों में पुष्पहार पहनाना, गुलदस्ते भेंट करने के पीछे भी यही मनोविज्ञान है, उससे हम अपनों मे बडो़ के स्नेह का अधिकार प्राप्त करते है।

🔵 विदेशो में फुलबाड़ी लगाने में लोग बहुत रुचि प्रदर्शित करते हैं, बहुत धन खर्चते हैं और अच्छे-अच्छे फूलों की नस्लें, किस्में प्राप्त करने के लिये परिश्रम भी करते हैं। खेद है कि धार्मिक वृत्ति का देश होते हुए भी अब अपने देश में फूल लगाने की रुचि उतनी नहीं रही। प्रतिदिन उपासना, देव-प्रतिमाओं पर माल्यार्पण और पुष्पार्पण के लिए फूलों की आवश्यकता होती है, शुचिता, स्वच्छता आदि की तरह फूलों को उपासना का अविछिन्न अंग ही माना गया है, इस संबंध में पद्मपुराण के क्रियायोग के प्राय: ८९ और २८० वें अध्यायों में संपूर्ण रूप से फूलों की उपयोगिता का भी विवेचन हुआ है। लिखा है-

चैत्रे तु चम्पकेनैव जातिपुष्पेण वापुन:।
पूजनीय: प्रयत्नेन केशव: क्लेशनाशन:।।
वैसाखे तु सदा देवि ह्यर्चनीयो महाप्रभुः।
केतकी पत्रमादाय वृषस्थे च दिवाकरे।।

🔴 चैत्र में कमलपुष्प, जाति पुष्प, चंपा दौना, कटसरैया, वरुण पुष्प; बैसाख में केतकी, ज्येष्ठ मे यही पुष्प: आषाढ में कनेर (करवीर), कदंब तथा कमल पुष्पों से पूजा करनी चाहिए।

🔵 यह संदर्भ तत्कालीन लोगों में फूलों की अभिरुचि व्यक्त करते है। यद्यपि तब विविध पुष्पों की उपज माली करते थे। अब मालियों के पास न तो वैसे साधन- सुविधाएँ हैं और न रुचि इसलिए फूलों की आवश्यकता की पूर्ति हर गृहस्थ को स्वयं करनी चाहिए।

🔴 घरों के आस-पास काफी जमीन बेकार पडी रहती है उनकी क्यारियाँ बनाकर स्थायी और कुछ समय फूल देने वाले पौधे रोपे जा सकते हैं। जहाँ भूमि का अभाव है, वहाँ सजाकर रखे जा सकते हैं। थोडा भी समय देकर उनकी सिंचाई आदि की व्यवस्था की जा सके तो हर घर में आवश्यकता अनुरूप फूल उपजाए जा सकते है। कुछ लोग बडे पैमाने खेती भी कर सकते हैं।

🔵 उपासना की आवश्यकता की पूर्ति के साथ ही इस अभिरुचि से आस-पास के वातावरण में सौंदर्य का विकास होता है। फूलों से दृश्य मनोरम हो जाता है। जहाँ फूल होते हैं समझा जाता है कि यहाँ सुसंस्कृत और विचारवान् लोग निवास करते है। किसी भी दृष्टि से फूलों की अभिरुचि मनुष्य को प्रसन्नतादायक ही होती है। हमें एक नये सिरे से पुष्प उत्पादन का अभियान प्रारंभ करना चाहिए। स्वयं फूल उगाऐ उपासना के समय प्रयोग करें दूसरों को स्नेह के आदान-प्रदान के रूप दिया करें। बीज और पौधों का वितरण करके भी फूल अभियान को सफल बनाया जा सकता है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 69, 70

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 31)

🌹 विचारशील लोग दीर्घायु होते हैं
🔴 धन और स्वास्थ्य भी मानव-जीवन की सम्पत्तियां हैं— इसमें सन्देह नहीं। किन्तु चरित्र की तुलना में यह नगण्य हैं। चरित्र के  आधार पर धन और स्वास्थ्य तो पाये जा सकते हैं किन्तु धन और स्वास्थ्य के आधार पर चरित्र नहीं पाया जा सकता। यदि चरित्र सुरक्षित है, समाज में विश्वास बना है तो मनुष्य अपने परिश्रम और पुरुषार्थ के बल पर पुनः धन की प्राप्ति कर सकता है। चरित्र में यदि दृढ़ता है, सन्मार्ग का त्याग नहीं किया गया है तो उसके आधार पर संयम, नियम और आचार-विचार के द्वारा खोया हुआ स्वास्थ्य फिर वापस बुलाया जा सकता है। किन्तु यदि चारित्रिक विशेषता का ह्रास हो गया है तो इनमें से एक की भी क्षति पूर्ति नहीं की जा सकती। इसलिए चरित्र का महत्व धन और स्वास्थ्य दोनों से ऊपर है। इसीलिये विद्वान् विचारकों ने यह घोषणा की है, कि—‘‘धन चला गया तो कुछ नहीं गया। स्वास्थ्य चला गया, तो कुछ गया। किन्तु यदि चरित्र चला गया तो सब कुछ चला गया।’’

🔵 मनुष्य के चरित्र का निर्माण संस्कारों के आधार पर होता है। मनुष्य जिस प्रकार के संस्कार संचय करता रहता है, उसी प्रकार उसका चरित्र ढलता रहता है। अस्तु अपने चरित्र का निर्माण करने के लिए मनुष्य को अपने संस्कारों का निर्माण करना चाहिए। संस्कार, मनुष्य के उन विचारों के ही प्रौढ़ रूप होते हैं, जो दीर्घकाल तक रहने से मस्तिष्क में अपना स्थायी स्थान बना लेते हैं। यदि सद्विचारों को अपनाकर उनका ही चिन्तन और मनन किया जाता रहे तो मनुष्य के संस्कार शुभ और सुन्दर बनेंगे। इसके विपरीत यदि असद्विचारों को ग्रहण कर मस्तिष्क में बसाया और मनन किया जायेगा तो संस्कारों के रूप में कूड़ा-कर्कट ही इकट्ठा होता जायेगा।

🔴 विचारों का निवास चेतन मस्तिष्क और संस्कारों का निवास अवचेतन मस्तिष्क में रहता है। चेतन मस्तिष्क प्रत्यक्ष और अवचेतन मस्तिष्क अप्रत्यक्ष अथवा गुप्त होता है। यही कारण है कि कभी-कभी विचारों के विपरीत क्रिया हो जाया करती हैं। मनुष्य देखता है कि उसके विचार अच्छे और सदाशयी हैं, तब भी उसकी क्रियायें उसके विपरीत हो जाया करती हैं। इस रहस्य को न समझ सकने के कारण कभी-कभी वह बड़ा व्यग्र होने लगता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 9)

🌹 अनास्था की जननी-दुर्बुद्धि

🔵 इस संदर्भ में एक और भी बढ़ी मूर्खता जनसाधारण के मन में गहरी जड़ें जमाकर बैठ गई है कि ईश्वर में सिद्धांत-रहित किसी ऐसे भूत-प्रेत की कल्पना समाविष्ट कर ली गई जो निशिदिन उपहार बटोरते और नाक रगड़ते हुए भक्तजनों के पीछे रहता है; साथ ही पूजा-पाठ की छुट-पुट टण्ट-घण्ट कर देने भर से फूलकर कुप्पा हो जाता है और मनचाहे उपहार-वरदान बाँटकर हर किसी की मनोकामनाएँ पूरी करता है; भले ही वे कितनी ही अनावश्यक या अनुचित क्यों न हों। 

🔴 इसके अतिरिक्त इस परमेश्वर में एक और भी बुरी आदत है कि पूजा-पत्री में कोई छोटी-मोटी गलती हो जाए तो भी वह आगबबूला हो जाता है और कल तक जिसे भक्त मानता था, आज उसकी जान लेने तक को तैयार हो जाता है। राजी होने के लिये बढ़े-चढ़े उपहार माँगता है। अपना भक्त किसी दूसरे देवता की पूजा करने लगे तो उसकी भी अच्छी-खासी खबर लेता है।

🔵 यही है आज का सशक्त परमेश्वर जिसे जातियों, वर्गों, कबीलों और मत-मतांतरों वाले लोग अपने-अपने तरीके से खोजते और अपनी-अपनी मान्यता के अनुरूप नाम व रूप देेते हैं। इस कालभैरव से किसी का क्या भला होता है, इसे तो पूजने वाले ही जानें, पर एक बात निश्चित है कि इन स्वयंभू देवी-देवताओं के स्वयंभू एजेन्टों की पाँचों उँगलियाँ हर घड़ी घी में रहती हैं। वे मनोकामना पूरी कराने अथवा गरीबी दूर करने-कराने के बहाने हर स्थिति में अपनी एजेण्टी का धंधा बढ़ाते चलते रहे हैं।
   
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 दीक्षा और उसका स्वरूप (भाग 13)

🌹 द्विज का अर्थ - मर्म समझें

🔴 अपने हिन्दू समाज में जिन मनुष्यों के दो बार जन्म होते हैं। उन्हें द्विज कहते हैं। द्विज माने दुबारा जन्म लेने वाला। दुबारा जन्म क्या है? नर- पशु के जीवन से नर- नारायण के जीवन की भूमिका में प्रवेश करना। यही तो दूसरा जन्म है और ये दूसरा जन्म जिस दिन लिया जाता है, जिस दिन ये प्रतिज्ञाएँ ली जाती हैं, उस दिन एक समारोह मनाया जाता है, उत्सव मनाया जाता है, कर्मकाण्ड किया जाता है। उसी का नाम दीक्षा संस्कार है। जो आदमी इस तरह की प्रतिज्ञा के लिए तैयार नहीं होते हैं और वे कहते हैं कि ऊँचे जीवन और आदर्श जीवन से कोई मतलब नहीं रखते हैं, वे कहते हैं कि हम तो केवल पशुओं की तरह से जीवन जियेंगे।

🔵 हम पेट भरने के लिए जीयेंगे और संतान पैदा करने के लिए जीयेंगे, उनको अपने यहाँ शूद्र कहा गया और शूद्रों को बहिष्कृत माना गया है। इस तरीके से शूद्र वे नहीं हैं, जो किसी जन्म में, किसी कौम में पैदा होते हैं। शूद्र वे हैं, जिनके जीवन में जीवन का कोई लक्ष्य नहीं होता है और जिनका पशुओं की तरह पेट पालना और रोटी कमाना ही लक्ष्य है। वे सब के सब आदमी शूद्र हैं, दूसरे शब्दों में पशु कहें, तो भी कोई हर्ज नहीं है। उसको बहिष्कृत माने जाने की परम्परा उस जमाने में उसी तरह की थी। 

🔴 आज तो जन्म से शूद्र और जन्म से ही ब्राह्मण मानते हैं। जन्म से शूद्र वर्ण का कोई मतलब नहीं है। केवल मतलब ये है कि जो आदमी भौतिक जीवन जीते हैं और आत्मिक जीवन के प्रति जिनका कोई लगाव नहीं है, उन आदमियों का नाम नर- पशु अथवा शूद्र। शूद्र अपने यहाँ एक निंदा की बात थी, किसी जमाने में, कर्म के आधार पर जब शूद्र और ब्राह्मण बनते थे तब। आज जब जन्म के आधार पर शूद्र और ब्राह्मण मान लिया जाने लगा, तब कोई निंदा की बात नहीं रही और न ही कोई अपमान की बात रही।

🔵 अब तो सब गुड़- गोबर ही हो गया, लेकिन पुराने जमाने की बात अलग थी। मनुष्य शूद्रता की सीमा से निकल करके जिस दिन ये प्रतिज्ञा लेता है, व्रत लेता है कि मैं आज से मनुष्य होकर के जिऊँगा; उस दिन का समारोह? आत्मा और परमात्मा के साथ मिलने का विवाह जैसा समारोह होता है। उस दिन को मनुष्य जीवन में प्रवेश करने वाला नया जन्म कह लीजिए, उसे आत्मा का परमात्मा के साथ आध्यात्मिक विवाह कह लीजिए।    
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Diksha/c

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 70)

🌹 प्रवास का दूसरा चरण एवं कार्य क्षेत्र का निर्धारण

🔴  अब मथुरा जाने की तैयारी थी। एक बार दर्शन की दृष्टि से मथुरा देखा तो था पर वहाँ किसी से परिचय न था। चलकर पहुँचा गया और ‘‘अखण्ड ज्योति’’ प्रकाशन के लायक एक छोटा मकान किराए पर लेने का निश्चय किया।

🔵 मकानों की उन दिनों भी किल्लत थी। बहुत ढूँढ़ने के बाद भी आवश्यकता के अनुरूप नहीं मिल रहा था। ढूँढ़ते-ढूँढ़ते घीया मण्डी जा निकले। एक मकान खाली पड़ा था। मालकिन एक बुढ़िया थी। किराया पूछा, तो उसने पन्द्रह रुपए बताया और चाभी हाथ में थमा दी। भीतर घुसकर देखा तो उसमें छोटे-बड़े कुल पन्द्रह कमरे थे। था तो जीर्ण-शीर्ण पर एक रुपया कमरे के हिसाब से वह मँहगा किसी दृष्टि से न था। हमारे लिए काम चलाऊ भी था। पसन्द आ गया और एक महीने का किराया पेशगी पन्द्रह रुपया हाथ पर रख दिए। बुढ़िया बहुत प्रसन्न थी।

🔴 घर जाकर सभी सामान ले आए और पत्नी बच्चों समेत उसमें रहने लगे। सारे मुहल्ले में काना-फूसी होते सुनी। मानों हमारा वहाँ आना कोई आश्चर्य का विषय हो। पूछा तो लोगों ने बताया कि-‘‘यह भुतहा मकान है। इसमें जो भी आया, जान गँवाकर गया। कोई टिका नहीं। हमने तो कितनों को ही आते और धन-जन की भारी हानि उठाकर भागते हुए देखा। आप बाहर के नये आदमी हैं इसलिए धोखे में आ गए। अब बात आपके कान में डाल दी। यदि ऐसा न होता तो तीन मंजिला 15 कमरों का मकान वर्षों से क्यों खाली पड़ा रहता? आप समझ बूझकर भी उसमें रह रहे हैं। नुकसान उठायेंगे।’’

🔵 इतना सस्ता और इतना उपयोगी मकान अन्यत्र मिल नहीं रहा था। हमने तो उसी में रहने का निश्चय किया। भुतहा होने की बात सच थी। रात भर छत के ऊपर धमा-चौकड़ी रहती। ठठाने की, रोने की, लड़ने की आवाजें आतीं। उस मकान में बिजली तो थी नहीं लालटेन जलाकर ऊपर गए, तो कुछ स्त्री, पुरुष आकृतियाँ आगे कुछ पीछे भागते दीखे, पर साक्षात भेंट नहीं हुई। न उन्होंने हमें कोई नुकसान पहुँचाया। ऐसा घटनाक्रम कोई दस दिन तक लगातार चलता रहा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 71)

🌹 हमारी जीवन साधना के अन्तरंग पक्ष-पहलू

🔴 मातृवत् परदारेषु और परद्रव्येषु लोष्टवत् की दो सीढ़ियाँ चढ़ना भी अपने को कठिन पड़ता, यदि जीवन का स्वरूप, प्रयोजन और उपयोग ठीक तरह से समझाने और जो श्रेयस्कर है उसी पर चलने की हिम्मत और बहादुरी नहीं होती। जो शरीर को ही अपना स्वरूप मान बैठा और तृष्णा- वासना के लिए आतुर रहा उसे आत्मिक प्रगति से वंचित रहना पड़ा है। पूजा, उपासना के छिटपुट कर्मकाण्डों के बल पर प्रगति की नाव किनारे नहीं लगी है। हमें २४ वर्ष तक निरंतर गायत्री पुरश्चरणों में निरत रह कर उपासना का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय पूरा करना पड़ा। उस पर कर्मकाण्ड की सफलता का पूरा लाभ तभी संभव हो सका जब अत्यधिक प्रगति की भावनात्मक प्रक्रिया को, जीवन- साधना को उससे जोड़े रखा। 

🔵 यदि दूसरों की तरह हम देवताओं को वश में करने या ठगने के लिए, उनसे मनोकामनाएँ पूरी करने के लिए तन्त्र- मन्त्र का कर्मकाण्ड रचते रहते- जीवन क्रम निर्वाह की आवश्यकता न समझते तो नि:संदेह हमारे हाथ कुछ नहीं पड़ता। हम अगणित भजनानन्दी और तन्त्र- मन्त्र के कर्मकाण्ड़ियों को जानते हैं, जो अपनी धुन में मुद्दतों से  लगे हैं। पूजा- पाठ हमसे ज्यादा लम्बा और चौड़ा है, पर बारीकी से जब उन्हें परखा तो छूँछ मात्र पाया, झूठी आत्म- प्रवंचना उनमें जरूर पायी, जिसके आधार पर यह सोचते थे कि इस जन्म में न सही- मरने के बाद उन्हें स्वर्ग- सुख जरूर मिलेगा; पर हमारी परख और भविष्यवाणी यह है कि इनमें से एक को भी स्वर्ग आदि मिलने वाला नहीं, न उन्हें कोई सिद्ध चमत्कार हाथ लगने वाला है।

🔴 कर्मकाण्ड और पूजा- पाठ में प्राण तभी आते हैं जब साधक का जीवन क्रम उत्कृष्टता की दिशा में क्रमबद्ध रीति से अग्रसर हो रहा हो। उसका दृष्टिकोण सुधर रहा हो और क्रिया कलाप में उस रीति- नीति का समावेश हो जो आत्मवादी के साथ आवश्यक रूप से जुड़े रहते हैं। धूर्त, स्वार्थी, कंजूस और सदा बेटी, बेटों के लिए जीने वाले लोग यदि अपनी विचारणा और गतिविधियाँ परिष्कृत न करें, तो उन्हें तीर्थ, व्रत, उपवास, कथा, कीर्तन, स्नान, ध्यान आदि का कुछ लाभ मिल सकेगा, इसमें हमारी सहमति नहीं है। यह उपयोगी तो हैं, पर इसकी उपयोगिता इतनी है जितनी कि लेख लिखने के लिए कलम की। कलम के बिना लेख कैसे लिखा जा सकता है?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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सोमवार, 6 मार्च 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 07 March 2017


👉 दलदल से निकाल कर दिखाई थी राह

🔴 सन् १९७१ई. में मैंने गायत्री महामंत्र की दीक्षा तो ले ली, पर दीक्षा के समय परम पूज्य गुरुदेव के दर्शन नहीं हो सके। उन दिनों वे हिमालय प्रवास में थे। अगले साल हिमालय से वापस आने के बाद उनके दर्शन का सौभाग्य मिला।

🔵 दीक्षा के पाँच वर्षों बाद एक बार फिर शांतिकुंज पहुँचा, एक विशेष साधना सत्र में शामिल होने के लिए। सत्र शुरू होने के पहले जब मैं गुरुदेव को प्रणाम करने गया तो देखा कि पंक्ति में पहले से ही काफी लोग खड़े थे। मैं सोचने लगा कि ऐसी परिस्थिति में कुछ व्यक्तिगत बातें करना चाहूँ, तो कैसे करूँ।

🔴 जब मैं पूज्य गुरुदेव के सम्मुख पहुँचा तो मुझे एक नजर देखकर ही मेरी मनःस्थिति समझ गए। स्नेहिल स्वर में पूछा- अकेले में बात करना चाहते हो? मैंने सिर हिलाते हुए हामी भरी। उन्होंने कहा- तुम मुझसे अकेले में मिलकर जो कुछ कहना चाहते हो वह सब मैं सुन चुका हूँ। चिन्ता मत करो। तुम्हारा काम हो जायेगा। पर क्या तुम मेरा काम करोगे?

🔵 खुशी के मारे मैं कुछ बोल नहीं सका। मैंने उसी क्षण मन ही मन संकल्प लिया कि पूज्य गुरुदेव की आज्ञा का पालन जीवन भर करता रहूँगा। तभी से मिशन का काम कर रहा हूँ। बात सन् १९८१ ई. की है। सुपौल से लगभग ७- ८ कि.मी. की दूरी पर एक गाँव है- गोरामानसिंह। वहाँ के मुखिया ने गायत्री महायज्ञ के आयोजन का आग्रह किया था। मेरे घर पर जब महायज्ञ के लिए दिन, समय आदि तय हो रहा था, तो मैंने रास्ते के बारे में पूछा।

🔴 आसपास के गाँव में यज्ञ कराने मैं प्रायः साइकिल से जाया करता था, इसलिए यह भी जानना चाहा कि बीच में कोई नदी तो नहीं है। लेकिन उनका ध्यान इस तरफ लगा हुआ था कि यज्ञ में कैसे क्या तैयारियाँ करनी होंगी, इसलिए नदी की बात उनके ध्यान से उतर गई। मैं भी बातचीत के प्रवाह में नदी के बारे में दुबारा पूछना भूल गया और मुखिया जी कार्यक्रम तय करके वापस चले गए।

🔵 मैं निर्धारित तिथि के एक दिन पूर्व घर से चला। पर रास्ते में ही शाम हो गई। सूर्यास्त के बाद आवाजाही कुछ कम पड़ने लगी। शाम के कुछ और गहरा जाने के बाद रास्ता सुनसान पड़ गया। आगे की बस्ती में कच्ची सड़क के किनारे कुछ लोग खड़े- खड़े आपस में बातचीत कर रहे थे। उन्होंने मुझे रोककर पूछा- कहाँ तक जाना है पंडित जी? मैंने कहा- गोरामानसिंह।

🔴 गाँव का नाम सुनते ही उनमें से एक बोल पड़ा- पंडित जी, गोरामानसिंह तो यहाँ से बहुत दूर है। आगे का इलाका भी ठीक नहीं है। रास्ते में कहीं लूट- पाट, छीना- झपटी करने वालों से सामना हो जाए, तो क्या करेंगे? अच्छा यही होगा कि आप हमारे यहाँ ही रात्रि विश्राम कर लें। पर मुझे तो पूज्य गुरुदेव के काम से जाना था, उन सबको समझा बुझाकर, धन्यवाद देकर आगे बढ़ चला।

🔵 आगे चलकर एक गाँव मिला- रजवा। वहाँ पहुँचकर देखा सामने एक बड़ी- सी नदी है। नदी के किनारे पहुँचकर देखा एक नाव लगी है। मैंने इधर- उधर नजर दौड़ाई। दाहिनी ओर थोड़ी ही दूरी पर घुटने भर की धोती पहने एक ग्रामीण खड़ा था। मैंने पास जाकर पूछा- यह नाव किसकी है?

🔴 उसने कहा- नाव तो मेरी ही है। कहिए, क्या बात है?

🔵 मैं बोला- भैया, मुझे गोरामानसिंह जाना है। क्या आप मुझे नदी के उस पार पहुँचा देंगे? उसने लापरवाही से जवाब दिया- इतने कम पानी में नाव नहीं चल पाएगी, उतरकर पार होना पड़ेगा। मैं गुरुदेव का नाम लेकर साइकिल के साथ ही नदी में उतर गया। पानी कमर से कुछ ही ऊपर तक था, लेकिन फिर भी साइकिल आगे बढ़ाने के लिए काफी जोर लगाना पड़ रहा था।

🔴 अभी नदी का चौथाई हिस्सा ही पार कर सका था कि एक- एक कर मेरे दोनों पैर दलदल में जा धँसे। बाहर निकलने के लिए जितना ही जोर लगाता था, उतना ही अन्दर धँसता चला जा रहा था। जब जाँघ तक का हिस्सा कीचड़ में धँस गया तो मेरी हिम्मत जवाब देने लगी। भयाक्रान्त मन भी यह मान चुका था कि अब किसी भी पल मेरी जीवन लीला समाप्त हो सकती है।

🔵 व्यक्ति को अपने जीवन के अन्तिम क्षण में किस प्रकार की अनुभूति होती है, इसका आभास मुझे उन पलों में होने लग गया था। सारे शरीर में जैसे बिजली सी कौंध गई थी। पिछला पूरा जीवन एकबारगी आँखों के आगे नाच उठा। कितने सारे काम पड़े हैं- मेरे मर जाने के बाद उन छोटे- छोटे बच्चों का क्या होगा?

🔴 हताशा के इस दौर में पूज्य गुरुदेव की बात याद आयी। उन्होंने कहा था कि वे हमेशा हमारे आगे पीछे रहेंगे, विपत्तियों से हमारी रक्षा करेंगे। दूसरे पल मन में यह विचार उठा कि संत स्वभाव के हैं, इसलिए दिलासा दे दिया होगा। अब इतनी दूर वे बचाव के लिए कैसे आ सकते हैं?

🔵 कीचड़ अब कमर से ऊपर आ चुका था। तभी दो लोग दूर से आते दिखाई पड़े। उनमें से एक ने ऊँची आवाज में पूछा- सुनो भाई, क्या तुम किसी खतरे में पड़े हो? मैंने जोर- जोर से हाथ हिलाते हुए कहा- जी हाँ भाईसाहब! मैं भयानक दलदल में फँस गया हूँ। कृपा करके मुझे बचा लीजिए।

🔴 मेरी बात सुनकर वह अपने साथी को पीछे छोड़कर तेजी से दौड़ पड़ा। पास पहुँचकर उसने एक हाथ से लगभग पूरी तरह से डूब चुकी साइकिल थामी और दूसरे हाथ से मुझे एक ही झटके में कीचड़ से बाहर निकालकर किनारे की ओर बढ़ चला।

🔵 ऊपर से दुबले- पतले दिखने वाले उस आदमी की अन्दरूनी ताकत देखकर मैं मन ही मन उसकी प्रशंसा कर रहा था। किनारे पर पहुँचकर मैंने उसे हृदय से धन्यवाद दिया। थोड़ी देर बाद मेरे सहज होने पर उसने पूछा- कहाँ से आए हैं...कहाँ जाना है...क्या काम है...?

🔴 मैंने उसे बताया कि मुझे गोरामानसिंह के मुखिया जी के यहाँ यज्ञ कराने जाना है। उसने कहा- चलिए, मैं आपको वहाँ तक छोड़ देता हूँ।

🔵 वह अपने मित्र के साथ आगे- आगे चल रहा था। उनके पीछे- पीछे चलते हुए मैंने जिज्ञासावश जब उनका परिचय पूछा तो मेरी जीवन रक्षा करने वाले ने अपना और अपने गाँव का नाम बताकर कहा कि उसका गाँव गोरामानसिंह के पास ही है। रास्ते भर इधर- उधर की बातें करते हुए आखिरकार हम लोग गोरामानसिंह पहुँच गए। एक बड़े से मकान के पास पहुँचकर वे दोनों रुके और उँगली से इशारा करते हुए कहा, यही मुखिया जी का घर है। अब आप हमें आज्ञा दीजिए। कृतज्ञता के भाव से भरकर मैंने हाथ जोड़ते हुए कहा- आपका यह उपकार मैं कभी नहीं भूलूँगा। आप दोनों कल के यज्ञ में आएँगे, तो मुझे बड़ी प्रसन्नता होगी। उन्होंने सहमति सूचक मुद्रा में गर्दन हिलायी और आगे बढ़ चले।

🔴 मैं मुखिया जी के घर की ओर बढ़ा। मुखिया जी अपने दालान पर बैठे मेरी ही राह देख रहे थे। मुझे देखते ही उन्होंने उठकर मेरा स्वागत करते हुए कहा- मैं शाम से ही आपकी राह देख रहा था। रास्ते में कहीं कोई दिक्कत तो नहीं हुई? उनका इतना पूछना भर था कि मैं बोल पड़ा- मैं तो आज मरते- मरते बचा हूँ मुखिया जी।

🔵 मुखिया जी ने अचकचाकर पूछा- क्यों क्या हुआ? मैंने भयानक दलदल से उबरने का अपना सारा वृत्तान्त एक ही साँस में कह सुनाया। मुझे बचाने वाले उस व्यक्ति का तथा उसके गाँव का नाम सुनकर मुखिया जी चौंक पड़े।

🔴 उन्होंने कहा- यहाँ न तो इस नाम का कोई गाँव ही है और न आसपास के गाँव में ऐसा कोई आदमी। मुखिया जी को इस बात पर भी घोर आश्चर्य हो रहा था कि उस व्यक्ति से मेरी सारी बातचीत हिन्दी में होती रही। जब मुखिया जी ने मुझे यह बताया कि आसपास के किसी भी गाँव में एक भी व्यक्ति खड़ी बोली का जानकार नहीं है, तो मेरे भी आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा।

🔵 सोचने की मुद्रा में मेरी आँखें बन्द हो गईं। मुझे लगा कि सामने परम पूज्य गुरुदेव खड़े हैं। मन्द- मन्द मुस्कराते हुए कह रहे हैं- तुम जहाँ भी जाते हो मैं तुम्हारे आगे- पीछे मौजूद रहता हूँ। आगे से अनजान राहों पर कुसमय में मत चला करना। भाव लोक में विचरण करते हुए गुरुदेव की इस प्यार भरी झिड़की से मेरी आँखें नम होती चली गईं।

🌹 चन्द्र किशोर सिंह आरा बगीचा, मुंगेर (बिहार)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Wonderful/dal.1

👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (भाग 14)

🌹 प्रतिभा से बढ़कर और कोई समर्थता है नहीं  

🔴 हनुमान, सुग्रीव के सुरक्षा कर्मचारी थे। भयभीत सुग्रीव के लिए दो वन आगन्तुकों का भेद लेने के लिए वे वेष बदलकर राम-लक्ष्मण के पास गए थे और सिर नवाकर विनम्रतापूर्वक पूछ-ताछ कर रहे थे। पर बाद में स्थिति बदली, सीता की खोज के लिए राम को हनुमान की जरूरत पड़ी। अनुरोध उन्होंने स्वीकारा तो बदले में इतनी सामर्थ्य के धनी बन गए, जो उनकी मौलिक विशेषताओं में सम्मिलित नहीं थी। समुद्र छलांगने, लङ्का को जलाने, पर्वत उखाड़कर लाने जैसे असाधारण काम थे, जो उन्होंने अतिरिक्त शक्ति प्राप्त करके सम्पन्न किये।             

🔵 ईश्वर के लिए आड़े समय में काम आने वाले को भी ऐसे ही उपहार-अनुदान मिलते हैं। विभीषण को लङ्का का सम्राट् बनने का सुयोग मिला। सुग्रीव ने अपना खोया राज्य पाया। भगवान के काम के लिए देवपुत्र माँगने वाली कुन्ती को उत्कृष्ट स्तर के पुत्र रत्न देने में उन्होंने आना-कानी नहीं की। भक्ति का प्रचार करने वाले नारद देवर्षि कहलाए। सूर-तुलसी ने ईश्वर के काम के लिए प्रतिज्ञारत होकर ऐसी प्रतिभा पाई, जिसके सहारे वे अनन्त कीर्ति पा सकने के अधिकारी बने।   

🔴 इन दिनों स्रष्टा ने ही विश्व-कल्याण के लिए, नवसृजन के लिए कर्मवीरों को पुकारा है। जो उस हेतु हाथ बढ़ाएँगे, वे खाली क्यों रहेंगे? भगीरथ, गाँधी, बुद्ध आदि को जो समर्थता मिली, वह इसलिए मिली कि परमार्थ प्रयोजन के काम आए।

🔵 इस दुनियाँ में ऐसी भी सुविधा है कि जब-तब बहुत-सी उपयोगी वस्तुएँ बिना मूल्य भी मिल जाती हैं। हवा, पानी, छाया, खुशबू आदि हम बिना मूल्य ही पाते हैं; पर जौहरी या हलवाई की दुकान पर सुसज्जित रखी हुई वस्तुएँ उठाकर चल देने का कोई नियम नहीं है। उनका मूल्य चुकाना पड़ता है। गाय को घास न खिलाई जाए, तो दूध प्राप्त करते रहना कठिन है।       

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पति की नाव पत्नी ने खेई

🔵 श्री जगदीश चंद्र बसु कलकत्ता यूनिवर्सिटी में विज्ञान के अध्यापक नियुक्त किए गए। अभी तक ऐसा सम्मान किसी भी भारतीय को उपलब्ध नहीं हुआ था। इसलिए श्री जगदीशचंद्र बसु को भारतीय बडा भाग्यशाली मानते थे।

🔴 कुछ दिन पीछे पदोन्नति का समय आया। श्री बसु को पदोन्नत कर दिया गया, पर अब वे जिस पद पर पहुँचे, उस पर पहले से काम कर रहे अंग्रेज पदाधिकारी की अपेक्षा उन्हें वेतन कम दिया गया। जहाँ अन्य संबंधियों ने उन्हें इस बात की उपेक्षा करने की सलाह दी वहीं श्री जगदीश चंद्र बसु ने इसे अपने स्वाभिमान पर आघात माना और तब तक वेतन लेने से इनकार कर दिया जब तक कि उनका स्वयं का वेतन अंग्रेज पदाधिकारी के बराबर नहीं कर दिया जाता। इस तरह का सत्याग्रह करते हुये भी अध्यापन कार्य नहीं छोड़ा। आजीविका का स्रोत बंद हो जाने के कारण घर-खर्च की तंगी आ गई। उनकी धर्म पत्नी ने ऐसे गाढ़े समय पति के स्वाभिमान को चोट न आने देने व उनको किसी प्रकार कष्ट न होने देने में पूर्ण तत्परता बरती।

🔵 उन दिनो में हुगली नदी पर पुल नहीं बना था। कालेज जाने के मार्ग में हुगली पडती थी, उसे पार करने में आठ आने देने पडते थे। इस तरह के कई अनावश्यक खर्च जिन्हें उनकी धर्म पत्नी ने बचा लिया, पर इस खर्च को रोक सकना कठिन था।

🔴 कोई उपाय नहीं सूझ रहा था, तब श्रीमती अवला वसु ने अपने एक मांगलिक आभूषण को बाजार में बेचकर एक छोटी नाव खरीद ली। उस दिन से वह स्वयं नदी तक उनके साथ जाती। नाव में बैठकर पार पहुँचा आती और वापसी घर अपना काम-काज करती। सांयकाल फिर ठीक समय वे नाव लेकर पहुंच जाती और श्री बसु को उसमें बैठाकर साथ लेकर आती। सरकार को इस बात का पता चला तो उसने यह लिखते हुए-"जिसकी ऐसी निष्ठावान् पत्नी हो उसका वेतन नहीं रोका जा सकता।" उनका वेतन अंग्रेज पदाधिकारी के बराबर कर दिया और अपनी पराजय मान ली।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 67, 68

👉 वास्तविक अध्यात्म क्या है?

🔴 किसी भी व्यक्ति की आत्मिक प्रगति कितनी हुई, इसका निर्धारण उसके कथन-पठन-श्रवण-भजन की बहिरंग क्रिया-प्रक्रिया के आधार पर नहीं किया जा सकता। इन उपचारों को कोई भी विद्याव्यसनी या कौतुकी भी करता रह सकता है। व्यक्तित्व की गरिमा का मूल्यांकन करने के लिए दो प्रकार की जाँच करनी पड़ती है। एक है व्यक्तिगत ललक लिप्साओं में, महत्त्वकांक्षाओं में कटौती। इसी को संयम-साधना या तपश्चर्या कहते हैं। दूसरी है न्यूनतम में निर्वाह के उपरान्त बची हुई श्रम, क्षमता, बुद्धि, सम्पदा और साधन-सामग्री को सत्प्रवृत्ति, संवर्धन के लिए नियोजित करने की ललक-लगन व निष्ठा भरी तत्परता। अन्तःकरण के स्तर को उदात्त बनाने में इससे कम में काम चल ही नहीं सकता। इतना बन पड़े तो फिर अन्य उपचारों की आवश्यकता शोभा-सज्जा जितनी भर रह जाती है।

🔵 अध्यात्म एक उच्चस्तरीय पुरुषार्थ है, मात्र उपचार नहीं, जिसमें क्रिया-कृत्यों के आधार पर समय क्षेप करने पर, कर्मकाण्ड आदि करने पर कुछ उपलब्धियाँ हस्तगत होती बतायी जाती हैं। ये कर्मकाण्ड तो एक प्रकार के मनोवैज्ञानिक दबाव है, जिनके कारण दृष्टिकोण बदलने, आदतें सुधारने के आधार पर चेतना को अधिकाधिक परिष्कृत बनने का अवसर मिलता है। जो लोग पूजा पत्री की लकीर भर पीटते रहते हैं, वे भीतर से निराशा एवं मन में नास्तिकता ही संजोये रहते हैं। कुछ कहने योग्य हाथ नहीं लगता एवं व्यक्तित्व के परिमापन के रूप में दृष्टिगोचर होने लगता है कि वस्तुतः अध्यात्म इनके जीवन में उतरा नहीं।

🔴 यह समझा जाना चाहिए कि वास्तविक अध्यात्म जब आन्तरिक सफलताओं का पथ प्रशस्त करता है, तो साधक को सम्पन्न नहीं, सुसंस्कृत बनाता है। सम्पत्तिपरक वैभव का भार घटता है और उच्चस्तरीय पराक्रम उभरता है। इतिहास साक्षी है कि आत्मचेतना के विकास ने किसी को सम्पन्न नहीं बनाया वरन् समृद्धि को आदर्शों के लिए समर्पित करने एवं स्वयं हल्का-फुल्का रहने के लिए बाधित किया है।

🔵 महामानवों ने सदा से ही गरीबी का स्वेच्छा से वरण किया है और सञ्चित वैभव का उदारतापूर्वक उस प्रयोजन के निमित्त समर्पण किया है। वास्तविक अध्यात्म यही है जो महत्वाकांक्षाओं की लिप्साओं की कटौती करना सिखाता है, जिससे लोक मंगल की भगवद् उपासना करने के लिए अपना सब कुछ नियोजित हो सके। यह मर्म समझ में आ जाने पर यथार्थता की सम्पदा पा लेने पर, आत्मिक प्रगति के पथ पर चल पड़ने में किसी को संशय नहीं करना चाहिए।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 21

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 30)

🌹 विचारशील लोग दीर्घायु होते हैं

🔴 चरित्र मनुष्य की सर्वोपरि सम्पत्ति है। विचारकों का कहना है—‘‘धन चला गया, कुछ नहीं गया। स्वास्थ्य चला गया, कुछ चला गया। किन्तु यदि चरित्र चला गया तो सब कुछ चला गया।’’ विचारकों का यह कथन शतप्रतिशत भाव से अक्षरशः सत्य है। गया हुआ धन वापस आ जाता है। नित्य प्रति संसार में लोग धनी से निर्धन और निर्धन से धनवान् होते रहते हैं। धूप-छांव जैसी धन अथवा अधन की इस स्थिति का जरा भी महत्व नहीं है।

🔵 इसी प्रकार रोगों व्याधियों और चिन्ताओं के प्रभाव में लोगों का स्वास्थ्य बिगड़ता और तदनुकूल उपायों द्वारा बनता रहता है। नित्य प्रति अस्वास्थ्य के बाद लोग स्वस्थ होते देखे जा सकते हैं। किन्तु गया हुआ चरित्र दुबारा वापस नहीं मिलता। ऐसी बात नहीं कि गिरे हुए चरित्र के लोग अपना परिष्कार नहीं कर सकते। दुष्चरित्र व्यक्ति भी सदाचार, सद्विचार और सत्संग द्वारा चरित्रवान बन सकता है। तथापि वह अपना वह असंदिग्ध विश्वास नहीं पा पाता, चरित्रहीनता के कारण जिसे वह खो चुका है।

🔴 समाज जिसके ऊपर विश्वास नहीं करता, लोग जिसे सन्देह और शंका की दृष्टि से देखते हों, चरित्रवान् होने पर भी उसके चरित्र का कोई मूल्य, महत्त्व नहीं है। वह अपनी निज की दृष्टि में भले ही चरित्रवान् बना रहे। यथार्थ में चरित्रवान् वही है, जो अपने समाज, अपनी आत्मा और अपने परमात्मा की दृष्टि में समान रूप से असंदिग्ध और सन्देह रहित हो। इस प्रकार की मान्य और निःशंक चरित्रमत्ता ही वह आध्यात्मिक स्थिति है, जिसके आधार पर सम्मान, सुख, सफलता और आत्मशान्ति का लाभ होता है। मनुष्य को अपनी चारित्रिक महानता की अवश्य रक्षा करनी चाहिए। यदि चरित्र चला गया तो मानो मानव-जीवन का सब कुछ चला गया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 8)


🌹 अनास्था की जननी-दुर्बुद्धि


🔵 कहना न होगा कि सशक्तों की समीपता-सान्निध्यता मनुष्य के लिये सदा लाभदायक ही होती है। सुगंध जलाते ही दुकान पर सजी चीजों में से अनेकानेक महकने लगती हैं। चंदन के समीप उगे झाड़- झंखाड़ भी प्राय: वैसी ही सुगंध वाले बन जाते हैं। पारस को छूने से लोहे से सोना बनने वाली उक्ति बहुचर्चित है। कल्पवृक्ष के नीचे बैठने वालों का मनोरथ पूरा होने की बात सुनी जाती है। अमृत की कुछ बूँदें मुँह में चले जाने पर मुरदे जी उठते हैं।  

🔴 भृंग अपने संकल्प के प्रभाव से छोटे कीड़े को अपने साँचे में ढाल लेता है। हरियाली के समीपता में रहने वाले टिड्डे और साँप हरे रंग के हो जाते हैं। सीप में स्वाति की बूँदें गिरने पर मोती बनने और बाँस के ढेरों में बंसलोचन उत्पन्न होने की मान्यता प्रसिद्ध है। इनमें से कितनी बात सही और कितनी गलत हैं, इस विवेचना की तो यहाँ आवश्यकता नहीं, पर इतना निश्चित है कि सज्जनों के महामानवों के सान्निध्य में रहने वाले अधिकांश लोग प्रतापी जैसी विशेषताओं में से बहुत कुछ अपना लेते हैं।

🔵 राजदरबारी शिष्टाचार का पालन अच्छी तरह कर सकते हैं। अत: हर कोई बड़ों का सान्निध्य चाहता हैं, किंतु आश्चर्य की बात यह है कि सर्वशक्तिमान् साथी के साथ जुड़ने में हमारे प्रयत्न उतने भी नहीं होते, जितने कि स्वजन-कुटुंबियों के साथ आत्मीयता प्रदर्शित करने में होते हैं। यदि ऐसा बन सकना संभव होता तो हम जड़-से न रहे होते और इस स्थिति में पड़े न रहते, जिसमें कि किसी प्रकार खाते-पीते इन दिनों समय गुजार रहे हैं।           

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 दीक्षा और उसका स्वरूप (भाग 12)

🌹 निर्मल-उदात्त जीवन की ओर

🔴 ये जो दो कदम हैं- आत्मा की उन्नति के और मनुष्य जीवन को सफल बनाने के, जिनको मैंने अभी- अभी आपको निर्मल जीवन जीना कहा, उदार जीवन जीना कहा- वह साधना है। साधना निश्चित होती है। उपासना एक छोटा- सा अंग है। जो पूजा की कोठरी में दस- बीस मिनट बैठकर की जा सकती है, लेकिन उपासना तो बीज हुआ। बीज तो थोड़ी देर ही बोया जाता है, पर खेती तो साल भर की जाती है। जो पूजा- पाठ दस- पाँच मिनट किया गया है, उस पूजा- पाठ को सारे जीवन भर चौबीस घंटे अपने जीवन को निर्मल बनाने और परिष्कृत बनाने में खर्च किया जाना चाहिए। यही तो उपासना है, यही तो साधना है।

🔴  इस तरह का साधनात्मक जीवन जीने की प्रतिज्ञा जिस दिन ली जाती है। वह दिन ही दीक्षा दिवस होता है। जब मनुष्य अपने उद्देश्य के बारे में खबरदार हो जाता है, सावधान हो जाता है और ये ख्याल करता कि मैं दूसरे लोगों के तरीके से दुनिया के आकर्षणों में, प्रलोभनों में और भ्रमों में फँसने वाला नहीं हूँ,  मैं ऊँचा जीवन जिऊँगा, ऊँचा जीवन जीने के लिए गतिविधियाँ बनाऊँगा, कार्यक्रम बनाऊँगा, योजना बनाऊँगा, जिस दिन वह आदमी संकल्प करता है, समझना चाहिए कि उस दिन उसकी दीक्षा हो गई। उस दिन वह भगवान् से जुड़ गया और अपने उद्देश्यों के साथ में जुड़ गया और महानता के साथ जुड़ गया और जीवन की सफलता की मंजिल प्रारम्भ हो गयी। इस तरह का श्रेष्ठ जीवन और इस तरह का व्रत जिस दिन लिया गया है, समझना चाहिए कि उसी दिन आदमी का नया जन्म हो गया। ये नया जन्म है।    
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 69)

🌹 प्रवास का दूसरा चरण एवं कार्य क्षेत्र का निर्धारण

🔴 जो आदेश हो रहा है, उसमें किसी प्रकार की त्रुटि नहीं रहने दी जायेगी। यह मैंने प्रथम मिलन की तरह उन्हें आश्वासन दे दिया, पर एक ही संदेह रहा कि इतने विशालकाय कार्य के लिए जो धन शक्ति और जन शक्ति की आवश्यकता पड़ेगी, उसकी पूर्ति कहाँ से होगी?

🔵 मन को पढ़ रहे गुरुदेव हँस पड़े। ‘‘इन साधनों के लिए चिंता की आवश्यकता नहीं है। जो तुम्हारे पास है, उसे बोना आरम्भ करो। इसकी फसल सौ गुनी होकर पक जाएगी और जो काम सौंपे गए हैं, उन सभी के पूरा हो जाने का सुयोग बन जाएगा।’’ क्या हमारे पास है, उसे कैसे, कहाँ बोया-जाना है और उसकी फसल कब, किस प्रकार पकेगी, यह जानकारी भी उनने दी।

🔴 जो उन्होंने कहा-उसकी हर बात गाँठ बाँध ली। भूलने का तो प्रश्न ही नहीं था। भूला तब जाता है, जब उपेक्षा होती है। सेनापति का आदेश सैनिक कहाँ भूलता है? हमारे लिए भी अवज्ञा एवं उपेक्षा करने का कोई प्रश्न नहीं।

🔵 वार्ता समाप्त हो गई। इस बार छः महीने ही हिमालय रुकने का आदेश हुआ। जहाँ रुकना था, वहाँ की सारी व्यवस्था बना दी गई। गुरुदेव के वीरभद्र ने हमें गोमुख पहुँचा दिया। वहाँ से हम निर्देशित स्थान पर जा पहुँचे और छः महीने पूरे कर लिए। लौटकर घर आए थे तो स्वास्थ्य पहले से भी अच्छा था। प्रसन्नता और गम्भीरता बढ़ गई थी, जो प्रतिभा के रूप में चेहरे के इर्द-गिर्द छाई हुई थी। लौटने पर जिनने भी देखा, उन सभी ने कहा-‘‘लगता है, हिमालय में कहीं बड़ी सुख-सुविधा का स्थान है। तुम वहीं जाते हो और स्वास्थ्य सम्वर्धन करके लौटते हो।’’ हमने हँसने के अतिरिक्त और कोई उत्तर नहीं दिया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 70)

🌹 हमारी जीवन साधना के अन्तरंग पक्ष-पहलू

🔴 अपनी कसौटी पर अपने आपको कसने के बाद यही कहा जा सकता है कि कम परिश्रम, कम जोखिम और कम जिम्मेदारी लेकर हम शरीर, मन की दृष्टि से अधिक सुखी रहे और सम्मान भी कम नहीं पाया, पागल प्रशंसा न करें इसमें हमें एतराज नहीं- पर अपने आप से हमें कोई शिकायत नहीं- आत्मा से लेकर परमात्मा तक सज्जनों से लेकर दूरदर्शियों तक अपनी क्रिया पद्धति प्रशंसनीय मानी गयी। जोखिम भी कम  और नफा भी ज्यादा।

🔵 खर्चीली, तृष्णाग्रस्त, बनावटी, भारभूत जिन्दगी पाप और पतन के पहियों वाली गाड़ी पर ढोई जा सकती है। अपना सबकुछ हल्का रहा, बिस्तर बगल में दबाया और चल दिये। न थकान, न चिन्ता, हमारा व्यक्तिगत अनुभव यही है कि आदर्शवादी जीवन सरल है। उसमें प्रकाश, सन्तोष, उल्लास सबकुछ है। दुष्ट लोग आक्रमण करके कुछ हानि पहुँचा दें, तो यह जोखिम पापी और घृणित जीवन में भी कम कहाँ है? सन्त और सेवाभावियों को जब इतना त्रास सहना पड़ता है, तो प्रतिस्पर्धा, ईर्ष्या- व्देष और प्रतिशोध के कारण भौतिक जीवन में और भी अधिक खतरा रहता है। कत्ल, खून, डकैती, आक्रमण की जो रोमांचकारी घटनाएँ जो आये दिन सुनने को मिलती रहती हैं उनमें भौतिक जीवन जीने वाले ही अधिक मरते- खपते देखे जाते हैं। इतने व्यक्ति अगर स्वेच्छापूर्वक अपने प्राण और धन गँवाने को मजबूर हो जाते, तो उन्हें देवता माना जाता और इतिहास धन्य हो जाता।

🔴 ईसा, सुकरात, गाँधी जैसे सन्त या उस वर्ग के लोग थोड़ी संख्या में ही मरे हैं। उससे हजार गुने अधिक की तो पतन्मुखी क्षेत्र में ही हत्याएँ होती रहती हैं। दान से गरीब हुए भामाशाह तो उँगलियों पर गिने जाने वाले ही मिलेंगे पर ठगी, विश्वासघात, व्यसन, व्यभिचार, आक्रमण, मुकदमा, बीमारी, बेवकूफी के शिकार होने वाले आये दिन अमीर के फकीर बनते लाखों व्यक्ति रोज ही देखे जाते हैं। आत्मिक क्षेत्र में घाटा, आक्रमण, मुकदमा, कम है, भौतिक में अधिक। इस तथ्य को अगर ठीक तरह से समझा गया होता, तो लोग आदर्शवादी जीवन से घबराने और भौतिक लिप्सा में औंधे मुँह गिरने की बेवकूफी न करते।

🔵 हमारा व्यक्तिगत अनुभव यही है कि तृष्णा- वासना के प्रलोभन में व्यक्ति पाता कम खोता अधिक है। हमें जो खोना पड़ा वह नगण्य है, जो पाया वह इतना अधिक है कि जी बार- बार यही सोचता है कि हर व्यक्ति को आध्यात्मिक जीवन जीने को उत्कृष्ट और आदर्शवादी परम्परा अपनाने के लिए कहा जाय्, पर बात मुश्किल है। हमें अपने अनुभवों को साक्षी देकर उज्ज्वल जीवन जीने की गुहार मचाते मुद्दत हो गयी, पर कितनों ने उसे सुना और सुनने वालों में से कितनों ने उसे अपनाया?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books/sunsaan_ke_shachar/hamari_jivan_saadhna.3

रविवार, 5 मार्च 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 06 March 2017


👉 मुँह की खानी पड़ी नाचती हुई मौत को

🔴 घटना वर्ष १९९७ के दिसम्बर महीने की है। उस समय मैं घोड़ासहन सीमा शुल्क इकाई (निवारण) में निरीक्षक के पद पर तैनात था। घोड़ासहन तहसील भारत नेपाल सीमा पर मोतिहारी जिला में अवस्थित है। मैं मुजफ्फरपुर सीमा शुल्क निवारण प्रमण्डल से स्थानान्तरित होकर वर्ष १९९७ फरवरी माह में घोड़ासहन गया था। हम लोगों का कार्यकाल सीमा शुल्क (इंडो नेपाल बॉर्डर) पर पाँच साल का होता है। फिर हमारी सेवा केन्द्रीय उत्पाद शुल्क विभाग को लौटा दी जाती है।

🔵 सीमा शुल्क में मेरी सेवा का कार्यकाल १९९७ में समाप्त हो रहा था। वर्ष १९९८ में मुझे लौटकर केन्द्रीय उत्पाद शुल्क में आना था। विश्वस्त सूत्रों से मुझे ज्ञात हुआ कि मेरा स्थानान्तरण केन्द्रीय उत्पाद शुल्क, टाटानगर मुख्यालय में होने को है।

🔴 उस समय मेरा छोटा बेटा राँची में अपने तीन दोस्तों के साथ अशोक नगर में रहकर प्लस टू की पढ़ाई डी.ए.वी.जवाहर विद्या मंदिर, श्यामली में कर रहा था। उसका स्वास्थ्य थोड़ा खराब रहता था। इसलिए मैं चाहता था कि मेरा स्थानान्तरण राँची हो जाय, ताकि मेरा पुत्र मेरे साथ रहकर पढ़ाई कर सके। इस आशय का निवेदन करने मैं अपने विभागीय मुख्यालय पटना गया।

🔵 मैं शाम को पटना से बस पकड़कर सीतामढ़ी पहुँचा। बस के लेट हो जाने की वजह से घोड़ासहन जाने की ट्रेन छूट गई। दूसरी ट्रेन करीब बारह बजे रात में थी। मैं घोड़ासहन स्टेशन परिसर में ही ट्रेन की प्रतीक्षा कर रहा था। ट्रेन करीब २ बजे रात में आई। सीतामढ़ी से घोड़ासहन का सफर २ घंटे में पूरा हुआ।

🔴 तीन बजे के बाद मुझे झपकी आ गई और मैं बैठे- बैठे गहरी निद्रा में चला गया। घोड़ासहन स्टेशन आया। पूड़ी- सब्जी बेचने वालों और दूसरे लोगों के शोरगुल से मेरी नींद खुली। तब तक गाड़ी चल चुकी थी। मैं कच्ची नींद से जागने की वजह से थोड़ा असहज सा था।

🔵 मेरे पास एक पतला ब्रीफकेस था। मैं चलती ट्रेन से उतर गया। पर मुझे लगा कि यह तो घोड़ासहन नहीं है। लोगों ने गलत कह दिया है। मैं फिर ट्रेन पर चढ़ गया। पर लोग कहने लगे कि ये घोड़ासहन ही है। फिर मैं ट्रेन से दूसरी बार उतरने लगा। उतरने के क्रम में एक हाथ में ब्रीफकेस होने की वजह से संतुलन बिगड़ गया, जिससे सीढ़ीवाला रॉड मेरे हाथ से छूट गया और मैं नीचे गिर गया।

🔴 मैं चीखता हुआ पटरी पर तेजी से घूम रहे चक्के के पास जाने लगा। मुझे लगा कि अब या तो मेरी जीवन लीला समाप्त हो जाएगी अथवा मैं अपंग हो जाऊँगा। मैंने मन ही मन पूज्य गुरुदेव को याद किया और उनसे प्रार्थना करने लगा- हे गुरुदेव! मुझे बचा लीजिए।

🔵 अगले ही पल करुणावतार गुरुदेव ने करुणा दिखाई। मुझे लगा कि मेरी पीठ पर किसी पहलवान ने बहुत जोर का प्रहार किया और मैं विपरीत दिशा में उछलता चला गया। इस आकस्मिक प्रहार से मैं क्राउलिंग करता हुआ कम से कम २० फिट की दूरी पर जाकर गिरा। लेकिन मुझे कहीं कोई गहरी चोट नहीं लगी। लुढ़कना बन्द होने के बाद मैं अपने कपड़े झाड़ता हुआ उठ खड़ा हुआ और ब्रीफकेस उठाकर घर की ओर चल पड़ा।

🔴 उस समय मुझे यह पता नहीं चला कि मेरा घुटना एक पत्थर से टकरा गया है और उस घुटने से खून का रिसाव हो रहा है। जब मैं घर पहुँचा, तो मेरी पत्नी ने मुझे टोका कि यह खून कैसा है। सारी बातें सुनकर पत्नी की घबराहट कहीं बहुत अधिक न बढ़ जाए, यह सोचकर मैंने उन्हें सिर्फ इतना बताया कि अँधेरे में मैं एक पत्थर से टकरा गया था। ....और कोई विशेष बात नहीं है।

🔵 आज भी मुझे जब इस घटना की याद आती है, तो मैं सिहर उठता हूँ और गुरुवर की उस अनुकंपा के स्मरण से मेरा रोम- रोम पुलकित हो उठता है।

🌹 जटा शंकर झा राँची (झारखंड)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Wonderful/huai

👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (भाग 13)

🌹 प्रतिभा से बढ़कर और कोई समर्थता है नहीं    

🔴 सैनिकों को युद्ध मोर्चों पर पराक्रम दिखाने के लिए तैयार कराने के लिए, उन्हें भेजने वाला तन्त्र यह व्यवस्था भी करता है कि उन्हें आवश्यक सुविधाओं वाली साज-सज्जा मिल सके, अन्यथा वे अपनी ड्यूटी ठीक प्रकार पूरी करने में असमर्थ रहेंगे। नव सृजन के दुहरे मोर्चे पर इसी प्रकार की व्यवस्था, युग परिवर्तन का सरञ्जाम जुटाने वाली सत्ता ने भी कर रखी है।             

🔵 सफलता के उच्च लक्ष्य तक पहुँचने में कितनी ही बाधाएँ पड़ सकती हैं, उन्हें पार करने के लिए-वांछित प्रगति के लिए अनेक आवश्यकताएँ पूरी करनी होती हैं। समझना चाहिए कि इस सन्दर्भ में किसी अग्रगामी आदर्शवादी को निराश न होना पड़ेगा, क्योंकि उसकी पीठ पर सर्वशक्तिमान सत्ता का हाथ जो रहेगा?    

🔴 तेज हवा पीछे से चलती है, तो पैदल वालों से लेकर साइकिल आदि के सहारे लोग कम परिश्रम में आगे बढ़ते जाते हैं और मञ्जिल सरल हो जाती है। इसी प्रकार नव सृजन का लक्ष्य, कल्पना करने वालों को कठिन दीखता तो है, पर उस स्रष्टा को विदित है कि उनकी नव सृजनयोजना को पूरा करने के लिए, जो अपने प्राण हथेली पर रखकर अग्रगमन का साहस दिखा रहे हैं, उन्हें सफलता का लक्ष्य प्रदान करने के लिए क्या-क्या आवश्यकताएँ जुटानी और क्या जिम्मेदारी निभानी चाहिए?

🔵 माँगने वाले भिखमंगे दरवाजे-दरवाजे पर झोली पसारते, दाँत निपोरते, गिड़गिड़ाते और दुत्कारे जाते हैं। मनोकामनाएँ पूरी कराने वाले ईश्वर भक्ति का आडम्बर ओढ़कर इसी प्रकार निराश रहते हैं और उपेक्षा सहते हैं, पर जिन्हें ईश्वर का काम करना पड़ता है, उन्हें तो आदरपूर्वक बुलाया जाता है और अभीष्ट साधनों का उपहार भी दिया जाता है। इन दिनों गर्ज ईश्वर को पड़ी है। उसी का उद्यान समुन्नत करने के लिए कुशल माली चाहिए। उसी की दुनियाँ को समुन्नत, सुसंस्कृत, सुसम्पन्न बनाने के लिए कुशल कलाकारों और शूरवीर सैनिकों की आवश्यकता पड़ रही है। जो उसकी पुकार पर अपनी क्षमता को प्रस्तुत करेंगे, वे दैवी अनुग्रह से किसी प्रकार वंचित न रहेंगे, वरन् इतना कुछ प्राप्त करेंगे, जिसे पाकर वे निहाल बन सकें।      

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 निर्भीक-सहिष्णुता

🔵 निर्भीकता, सहनशीलता और समदर्शिता सच्चे संत के आवश्यक गुण माने गए हैं। जो किसी भय अथवा दबाव में आकर अपने पथ से विचलित हो उठे, अपने व्यक्तिगत अपमान अथवा कष्ट से उत्तेजित अथवा विक्षुब्ध हो उठे अथवा जो किसी लोभ-लालच, ऊँच-नीच, धनी-निर्धन, पद पदवी के कारण किसी के प्रति अंतर माने उसे सच्चा संत नहीं कहा जा सकता, सच्चा संत भगवान् के राज्य में निर्भय विचरता और व्यवहार करता है, सुख-दुःख, मान-अपमान को उसका कौतुक मानता और प्राणी मात्र में समान दृष्टिकोण रखता है। उसको न कहीं भय होता है, न दु:ख और न ऊँच-नीच।

🔴 सिक्खों के आदि गुरु नानक साहब में यह सभी गुण पूरी मात्रा में मौजूद थे और वे वास्तव में एक सच्चे संत थे। गुरु नानक गाँव के जमींदार दौलत खाँ के मोदीखाने में नौकर थे। जमींदार बड़ा सख्त और जलाली आदमी था, किंतु गुरु नानक न तो कभी उससे दबे न डरे। बल्कि एक बार जब उन्होंने तीन दिन की विचार समाधि के बाद अपना पूर्ण परीक्षण कर विश्वास कर लिया कि अब उन्होंने जन-सेवा के योग्य पूर्ण संतत्व प्राप्त कर लिया है तब वे दौलतखाँ को यह बतलाने गये कि अब नौकरी नहीं करेंगे, बल्कि शेष जीवन जन सेवा में लगाएँगे।

🔵 जमींदार ने उन्हें अपने बैठक खाने में बुलवाया गुरुनानक गये और बिना सलाम किए उसके बराबर आसन पर बैठ गये जमींदार की भौंहे तन गई बोला-नानक! मेरे मोदी होकर तुमने मुझे सलाम नहीं किया और आकर बराबर में बैठ गए। यह गुस्ताखी क्यों की ? नानक ने निर्भीकता से उत्तर दिया दौलतखान! आपका मोदी नानक तो मर गया है, अब उस नानक का जन्म हुआ है, जिसके हृदय में भगवान् की ज्योति उतर आई है, अब जिसके लिए दुनिया में सब बराबर हैं। जो सबको अपना प्यारा भाई समझता है। कहते-कहते नानक के मुख पर एक तेज चमकने लगा। जमींदार ने कुछ देखा और कुछ समझा, 'फिर भी कहा-अगर आप किसी में अंतर नहीं समझते और मुझे अपना भाई समझते हैं, तो मेरे साथ मस्जिद में नमाज पढने चलिए। नानक ने जरा संकोच नहीं किया और एक एकेश्वरवादी संत उसके साथ मस्जिद चला गया।

🔴 जिस समय नानक मक्का की यात्रा को गए, घटना उस समय की है। निर्द्वद्व संत दिन भर स्थान-स्थान पर सत्संग करते, मुसलमान धर्म का स्वरूप समझते और अपने धर्म का प्रचार करते फिरते रहे। एक रात में मस्ती के साथ एक मैदान में पड़कर सो रहे थे। संयोगवश उनके पैर काबा की ओर फैले हुए थे। उधर से कई मुसलमान निकले। वे बडे ही संकीर्ण विचार वाले थे। गुरुनानक को काबे की तरफ पैर किए लेटा देखा तो आपे से बाहर हो गए। पहले तो उन्होने उन्हें काफिर आदि कहकर बहुत गालियाँ दीं और तब भी जब उनकी नीद न टूटी तो लात-घूँसों से मरने लगे। नानक जागे और नम्रता से बोले- "भाई क्या गलती हो गई जो मुझ परदेशी को आप लोग मार रहे है ?

🔵 मुसलमान गाली देते हुए बोले- 'तुझे सूझता नहीं कि इधर कबा-खुदा का घर है और तू उधर ही पैर किये लेटा है।''

🔴 नानक ने कहा- 'उसे सब जगह और सब तरफ न मानकर किसी एक खास जगह में मानना, मनुष्य की अपनी बौद्धिक सकीर्णता है। अच्छा हो कि आप लोग भी उसे मेरी ही तरह सब जगह और सब तरफ मानें। इसी में खुदा की बडाई है और इसी में हमारी सबकी भलाई है।''

🔵 गुरु नानक की सहनशीलता, निर्भीकता और ईश्वरीय निष्ठा देखकर मुसलमानो का अज्ञान दूर हो गया। उन्होंने उन्हे सच्चा संत समझा और अपनी मूल की माफी माँगकर उनका आदर किया।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 65, 66

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 29)

🌹 विचारशील लोग दीर्घायु होते हैं
🔴 जो विचार देर तक मस्तिष्क में बना रहता है, वह अपना एक स्थायी स्थान बना लेता है। यही स्थायी विचार मनुष्य का संस्कार बन जाता है। संस्कारों का मानव-जीवन में बहुत महत्व है। सामान्य-विचार कार्यान्वित करने के लिए मनुष्य को स्वयं प्रयत्न करना पड़ता है, किन्तु सरकार उसको यन्त्रवत् संचालित कर देता है। शरीर-यन्त्र जिनके द्वारा सारी क्रियायें सम्पादित होती हैं, सामान्य विचारों के अधीन नहीं होता।

🔵 इसके विपरीत इस पर संस्कारों का पूर्ण आधिपत्य होता है। न चाहते हुए भी, शरीर-यन्त्र संस्कारों की प्रेरणा से हठात् सक्रिय हो उठता है और तदनुसार आचरण प्रतिपादित करता है। मानव जीवन में संस्कारों का बहुत महत्व है। इन्हें यदि मानव-जीवन का अधिष्ठाता और आचरण का प्रेरक कह दिया जाय तब भी असंगत न होगा।

🔴 केवल विचार मात्र ही मानव चरित्र के प्रकाशक प्रतीत नहीं होते। मनुष्य का चरित्र विचार और आचार दोनों से मिलकर बनता है। संसार में बहुत से ऐसे लोग पाये जा सकते हैं, जिनके विचार बड़े उदात्त महान् और आदर्श पूर्ण होते हैं, किन्तु उनकी क्रियायें उसके अनुरूप नहीं होती। विचार पवित्र हों और कर्म अपावन तो यह सच्चरित्रता नहीं होती।

🔵 इसी प्रकार बहुत से लोग ऊपर से बड़े ही सत्यवादी, आदर्शवादी और धर्म-कर्म वाले दीखते हैं, किन्तु उनके भीतर कलुषपूर्ण विचारधारा बहती रहती है। ऐसे व्यक्ति भी सच्चे चरित्र वाले नहीं माने जा सकते। सच्चा चरित्रवान् वही माना जायेगा और वास्तव में वही होता है जो विचार और आचार दोनों को समान रूप से उच्च और पुनीत रखकर चलता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 7)

🌹 अनास्था की जननी-दुर्बुद्धि

🔵 ऊँची सतह के बड़े तालाब में अधिक पानी होता है। पास में ही कोई कम पानी वाला गड्ढा हो तो दोनों की तुलना में असाधारण अंतर होगा। इतने पर भी यदि दोनों के बीच एक नाली बना दी जाए तो ऊँचे तालाब का पानी नीचे गड्ढे को भरना जल्दी आरंभ कर देगा और वह सिलसिला तब तक चलता रहेगा, जब तक कि दोनों जलाशय एक सतह पर नहीं आ जाते। नीचे वाले गड्ढे का पानी निश्चित रूप से ऊँचा उठेगा; भले ही इसमें ऊँचे वाले को कुछ घाटा ही क्यों न रहा हो।

🔴 ईश्वर-सान्निध्य के लिये किये गये प्रयास अंधविश्वास नहीं है। यदि उनका सही तरीका न समझ सके तो मृगतृष्णा में भटकने वाले हिरण की तरह भ्रमग्रस्तों जैसी धमाचौकड़ी मचाते रहेंगे। तब तो खिन्नता, विपन्नता और असफलताएँ ही हाथ लगेंगी। यदि रुके बिना धीरे-धीरे चलने वाली चींटी भी पर्वत शिखर पर जा पहुँचती है तो फिर कोई कारण नहीं कि ईश्वर-सान्निध्य का सही मार्ग विदित हो जाने पर उस प्रयोजन में आश्चर्यजनक सफलता न मिल सके।          

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌿🌞     🌿🌞     🌿🌞

👉 दीक्षा और उसका स्वरूप (भाग 11)

🌹 निर्मल-उदात्त जीवन की ओर

🔴 यह बिलकुल नामुमकिन बात है। उसके पीछे कोई दम नहीं है। इसके पीछे राई भर सच्चाई नहीं है। इतनी ही राई भर की सच्चाई उसके भीतर है कि आदमी पूजा पाठ करे और भगवान् का नाम ले, ताकि भगवान् का काम जिसको हम भूल गये, उसको हम याद करें, भगवान् के कामों के लिए कदम बढ़ायें। बस इतना ही पूजा- पाठ का मतलब है। अगर हम पूजा- पाठ ढेरों के ढेरों करते रहें और भगवान् की खुशामद करते रहें, भगवान् को जाल में फँसाने के लिए अपनी चालाकियाँ इस्तेमाल करते रहें और ये मानते रहें कि भगवान् ऐसा बेवकूफ आदमी है कि माला घुमाने के बाद में अपना नाम सुनने के बाद में अपनी खुशामद लेकर के और रिश्वत लेकर के हमारे मन चाहे प्रयोजन पूरा कर देगा और हमको भौतिक सम्पदाओं से परिपूर्ण कर देगा और हमको आत्मिक शान्ति दे देगा, तो यह बिलकुल ही नामुमकिन बात है।

🔴 भगवान् के स्वरूप को हम समझने में बिलकुल असमर्थ हैं। ये सिर्फ चालाकियाँ हैं। इसके पीछे जो छिपी हुई बात थी, उतनी ही बात छिपी हुई थी कि लोग यह समझ पायें कि भगवान् और जीव का कोई सम्बन्ध है। भगवान् की कोई इच्छा है। मनुष्य के जीवन के साथ में भगवान् की कुछ प्रेरणाएँ जुड़ी हुई हैं। उन बातों को याद कराने के लिए और उन बातों को स्मरण कराने के लिए ही सारा पूजा- पाठ का, सारे के सारे आध्यात्मिकता का खाँचा जान- बूझकर खड़ा किया गया है। आदमी अपने को कैसा भूला हुआ है?    

🔵 अपने आप को शरीर समझता है, आत्मा अपने आप को नहीं समझता। उसकी याद दिलाने के लिए ये सब कुछ है और इसमें कुछ दम नहीं है। अगर आदमी को यह (ईश्वरीय अनुशासनों का) ध्यान ही न हो, घटिया और कमीना जीवन जिये, खुराफात, पूजा- पाठ करके लम्बे- चौड़े ख्वाब देखे, तो उस आदमी को शेखचिल्ली के अलावा और कुछ नहीं कहा जा सकता।    

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 68)

🌹 प्रवास का दूसरा चरण एवं कार्य क्षेत्र का निर्धारण

🔴 नैतिक क्रान्ति-बौद्धिक क्रान्ति और सामाजिक क्रान्ति सम्पन्न की जानी है। इसके लिए उपयुक्त व्यक्तियों का संग्रह करना और जो करना है उससे सम्बन्धित विचारों को व्यक्त करना अभी से आवश्यक है। इसलिए तुम अपना घर-गाँव छोड़कर मथुरा जाने की तैयारी करो। वहाँ छोटा घर लेकर एक मासिक पत्रिका आरम्भ करो। साथ ही क्रान्तियों के सम्बन्ध में आवश्यक जानकारी देने का प्रकाशन भी। अभी तुम से इतना काम बन पड़ेगा। थोड़े ही दिन उपरांत तुम्हें दुर्वासा ऋषि की तपस्थली में मथुरा के समीप एक भव्य गायत्री मंदिर बनाना है। सह कर्मियों के आवागमन, निवास, ठहरने आदि के लिए। इसके उपरांत 24 महापुरश्चरण के पूरे हो जाने की पूर्णाहुति स्वरूप एक महायज्ञ करना है।

🔵 अनुष्ठानों की परम्परा जप के साथ यज्ञ करने की है। तुम्हारे 24 लक्ष के 24 अनुष्ठान पूरे हो जा रहे हैं। इसके लिए एक सहस्र कुण्डों की यज्ञशाला में एक हजार मांत्रिकों द्वारा 24 लाख आहुतियों का यज्ञ आयोजन किया जाना है। उसी अवसर पर ऐसा विशालकाय संगठन खड़ा हो जाएगा। जिसके द्वारा तत्काल धर्मतंत्र से जन जागृति का कार्य प्रारम्भ किया जा सके। यह अनुष्ठान की पूर्ति का प्रथम चरण है। लगभग 24 वर्षों में इस दायित्व की पूर्ति के उपरांत तुम्हें सप्त सरोवर हरिद्वार जाना है, जहाँ रहकर वह कार्य पूरा करना है, जिसके लिए ऋषियों की विस्मृत परम्पराओं को पुनर्जागृति करने हेतु तुमने स्वीकृति सूचक सम्मति दी थी।’’

🔴 मथुरा की कार्य शैली, आदि से अंत तक किस प्रकार सम्पन्न की जानी है, इसकी एक सुविस्तृत रूपरेखा उन्होंने आदि से अंत तक समझाई। इसी बीच आर्ष साहित्य के अनुवाद प्रकाशन, प्रचार की तथा गायत्री परिवार के संगठन और उसके सदस्यों को काम सौंपने की रूपरेखा उन्होंने बता दी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 69)

🌹 हमारी जीवन साधना के अन्तरंग पक्ष-पहलू

🔴 आमतौर से लोग रोते- कलपते, रोग- शोक से सिसकते- बिलखते किसी प्रकार जिन्दगी की लाश ढोते हैं। वस्तुत: इन्हीं को तपस्वी कहा जाना चाहिए। कष्ट, त्याग, उद्वेग यदि आत्मिक प्रगति के पथ पर चलते हुए सहा जाता, तो मनुष्य योगी, सिद्ध पुरुष, महामानव, देवता ही नहीं भगवान् भी बन सकता था। बेचारों ने पाया कुछ नहीं, खोया बहुत। वस्तुत: यही सच्चे परोपकारी, आत्मदानी और बलिदानी हैं, जिन्होने परिश्रम से लेकर पाप की गठरी ढोने तक का दुस्साहस कर डाला और जो कमाया था उसे साले- बहनोई, बेटे- भतीजों के लिए छोड़कर स्वयं खाली हाथ चल दिए। दूसरे के सुख के लिए स्वयं कष्ट सहने वाले वस्तुत: यही महात्मा, ज्ञानी, परमार्थी अपने को दीखते हैं। वे स्वयं अपने को मायाग्रस्त और पथभ्रष्ट कहते हैं तो कहते रहें

🔵 अपने इर्द- गिर्द घिरे असंख्यों मानव देहधारियों के अन्तरंग और बहिरंग जीवन की- उसकी प्रतिक्रिया परिणति को जब- हम देखते हैं,तो लगता है, इन सबसे सुख और सुविधा जनक जीवन हमीं ने जी लिया। हानि  अधिक से अधिक इतनी हुई कि हमें कम सुविधा और सम्पन्नता का जीवन जीना पड़ा। सम्मान कम रहा और गरीब जैसे दीखे, सम्पदा न होने के कारण दुनियाँ वालों ने हमें छोटा समझा और अवहेलना की। बस इससे अधिक घाटा किसी आत्मवादी को नहीं हो सकता, पर इस अभाव से अपना कुछ भी हर्ज नहीं हुआ, न कुछ काम रुका। दूसरे षड़ष व्यंजन खाते रहे, हमने जौ- चना खाकर काम चलाया। 

🔴 दूसरे जीभ के अत्याचार से पीड़ित होकर रुग्णता का कष्ट सहते रहे, हमारा सस्ता आहार ठीक तरह पचता रहा और निरोगिता बनाये रहा। घाटे में हम क्या रहे? जीभ का क्षणिक जायका खोकर हमने "किवाड़- पापड़" होने की उक्ति सार्थक होती देखी। जहाँ तक जायके का प्रश्न है, उस दृष्टि से तुलना करने पर विलासियों की तुलना में हमारी जौ की रोटी अधिक मजेदार थी। धन के प्रयास में लगे लोग बढ़िया कपड़े, बढ़िया घर, बढ़िया साज- सज्जा अपनाकर अपना अहंकार पूरा करने और लोगों पर रौब गाँठने की विडम्बना में लगे रहे। हम स्वल्प साधनों में उतना ठाठ तो जमा नहीं सके, पर सादगी ने जो आत्म- संतोष और आनन्द प्रदान किया उससे कम प्रसन्नता नहीं हुई, चाहे छिछोरे- बचकाने लोग मखौल उड़ाते रहे हों, पर वजनदार लोगों ने सादगी के पर्दे के पीछे झाँकती हुई महानता को सराहा और उसके आगे सिर झुकाया। नफे में कौन रहा, विडम्बना बनाने वाले या हम?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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शनिवार, 4 मार्च 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 05 March 2017


👉 जागृत हुई गाँव की सामूहिक शक्ति

🔴 यद्यपि मैंने कभी गुरुदेव के साक्षात् दर्शन नहीं किए और न ही दीक्षा ली। पर उनके साहित्य को पढ़कर क्रमशः उनके करीब आता चला गया। इन पुस्तकों के सहारे ही मैं वैज्ञानिक अध्यात्मवाद की गहराई में उतर सका और इस आध्यात्मिक यात्रा के क्रम में मैंने आचार्यश्री का वरण गुरु के रूप में कर लिया। उन्हें गुरु मान लेने के बाद से मुझे सूक्ष्म जगत से कई तरह के संकेत मिलने लगे। इन्हीं संकेतों के आधार पर आचार्यश्री की पुस्तकों को लेकर मैंने एक पुस्तकालय की स्थापना की, जिसमें आज अन्तर्राष्ट्रीय महत्त्व की पुस्तकें भी उपलब्ध हैं। पूज्य गुरुदेव ने स्वप्न में आकर मुझे लेखन कार्य के लिए प्रेरित किया। यह गुरुसत्ता की असीम अनुकम्पा का ही परिणाम है कि आज भी कृषि विज्ञान पर लिखी गयी मेरी पुस्तकों पर कृषि वैज्ञानिकों द्वारा शोध- कार्य किए जा रहे हैं। मेरे जीवन में पूज्य गुरुदेव के अनुदान की वर्षा इस प्रकार होती रही कि गाँव का एक साधारण- सा युवक होकर भी मैंने कई देशों की यात्रा सरकारी आमंत्रण पर की।

🔵 जीवन की छोटी- बड़ी अनेक विपत्तियों में मुझे पूज्य गुरुदेव का सहारा मिलता रहा। इन विपत्तियों के दौर में समाधान की ओर ले जाने वाले घटनाक्रम को देखकर यह बात साफ तौर से समझ में आ जाती थी कि यह समाधान किसी मानवीय प्रयासों से नहीं, अपितु सूक्ष्म चेतना के संरक्षण से मिला है।

🔴 इस तथ्य को मैंने पहली बार तब समझा, जब मेरे यहाँ डाका पड़ा। छोटी- मोटी चोरियाँ तो हमारे गाँव में हो जाया करती थीं लेकिन डकैती जैसे बड़ी वारदात से गाँव वाले उस वक्त तक परिचित नहीं हुए थे। जमींदार का परिवार होने के कारण डकैतों ने सबसे पहले मेरे ही घर पर हमला बोला। हट्टे- कट्टे शरीर वाले लगभग ४० डकैत, वह भी हथियारों से लैस। उन्हें देखते ही सभी के प्राण सूख गए। शिकार आदि के लिए शौकिया तौर पर पिताजी के पास एक बन्दूक थी, मगर अचानक हुए इस हमले के कारण पिताजी को बन्दूक तक पहुँचने का अवसर ही नहीं मिला। आते ही डकैतों ने उन्हें अपनी गिरफ्त में ले लिया। घर के सभी लोग बुरी तरह घबरा गए।

🔵 डकैतों ने हम सभी को पूरी तरह से आतंकित करने के लिए घर के लोगों को बेरहमी से पीटना शुरू कर दिया। मेरे अन्दर बार- बार इनका विरोध करने की प्रेरणा जाग रही थी, लेकिन मैं समझ नहीं पा रहा था कि मुझे क्या करना चाहिए। उन्हें छुड़ाने के लिए आगे बढ़ने का तो प्रश्र ही नहीं था। उनकी बन्दूक कभी भी आग उगल सकती थी। डकैतों के इतने बड़े गिरोह से अकेला मैं मुकाबला करूँ तो कैसे करूँ। मैंने गुरुदेव का स्मरण किया और उनसे प्रार्थना की- हे प्रभु बताएँ, इस विपत्ति में मैं अपने परिवार की रक्षा कैसे करूँ।

🔴 मुझे लगा कि पूज्य गुरुदेव एक ही वाक्य बार- बार दुहरा रहे हैं- छत पर जा, छत पर जा....। पहले तो तनी हुई बन्दूक के सामने से भागने की हिम्मत नहीं पड़ी, पर तीसरी बार यह निर्देश मिलने के बाद मैं दौड़कर छत पर पहुँच गया। मन ही मन गुरु- गुरु, गायत्री- गायत्री जपता जा रहा था। एक छत से दूसरी छत पर कूदता हुआ मैं कई मकान आगे तक जा पहुँचा और जोर- जोर से शोर मचाने लगा। एक- एक कर लोग इकट्ठे होने लगे। सबके हाथों में लाठी- भाले आदि विभिन्न प्रकार के हथियार थे। सभी शोर मचाते हुए मेरे घर की ओर दौड़ पड़े। गाँव वालों की भारी भीड़ को पास आता देखकर डकैतों के हौसले पस्त हो गए। उस समय तक वे जो धन- संपत्ति समेट सके थे, उसे लेकर भाग खड़े हुए। गाँव वालों की सामूहिक शक्ति को मिली इस भारी जीत से सभी खुश थे। धन सम्पत्ति की तो काफी क्षति हुई थी, कई लोग घायल भी हो गए थे, लेकिन जान किसी की नहीं गई। खतरों से खेलकर मैंने जिस प्रकार पूरे गाँव को इकट्ठा किया, सभी बड़े- बूढ़े लोग उसकी सराहना कर रहे थे, मेरी उपस्थित बुद्धि को सराह रहे थे। एक ने पूछा- तुम्हें डर नहीं लगा? मैंने सच- सच बता दिया कि पहले तो डर रहा था, मगर गुरु- गुरु जपते ही सारा डर गायब हो गया।

🔵 पिताजी ने कहा- तुमने तो अभी तक दीक्षा भी नहीं ली है, फिर गुरु- गुरु क्यों कर रहे थे? मैंने उन्हें बताया कि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य की किताबों से मुझे वैज्ञानिक अध्यात्मवाद का जो गहरा ज्ञान मिला है उसी के कारण मैंने मानसिक रूप से गुरु के रूप में आचार्यश्री का वरण कर लिया है।

🔴 इस घटना के दौरान मुझे जिस प्रकार की आन्तरिक अनुभूति हुई थी उसे देखते हुए मेरे मन में यह विश्वास पूरी तरह से जम चुका था कि उन्होंने भी मुझे अपना शिष्य स्वीकार कर लिया है। इसके बाद भी कई बार अलग- अलग रूपों में उनके दर्शन होते रहे- कभी स्वप्न में, कभी प्रत्यक्ष।

🌹 कृष्णमुरारी किसान शेखपुरा (बिहार)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
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👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (भाग 12)

🌹 प्रतिभा से बढ़कर और कोई समर्थता है नहीं  

🔴 उन्नति के अनेक क्षेत्र हैं, पर उनमें से अधिकांश में उठना प्रतिभा के सहारे ही होता है। धनाध्यक्षों में हेनरी फोर्ड, रॉक फेलर, अल्फ्रेड नोबुल, टाटा, बिड़ला आदि के नाम प्रख्यात हैं। इनमें से अधिकांश आरम्भिक दिनों में साधनरहित स्थिति में ही रहे हैं। पीछे उनके उठने में सूझ-बूझ ही प्रधान रूप से सहायक रही है। कठोर श्रमशीलता, एकाग्रता एवं लक्ष्य के प्रति सघन तत्परता ही सच्चे अर्थों में सहायक सिद्ध हुई है, अन्यथा किसी को यदि अनायास ही भाग्यवश या पैतृक सम्पत्ति के रूप में कुछ मिल जाए, तो यह विश्वास नहीं किया जा सकता कि उसे सुरक्षित रखा जा सकेगा या बढ़ने की दिशा में अग्रसर होने का अवसर मिल ही जाएगा।             

🔵 व्यक्ति की अपनी निजी विशिष्टताएँ हैं जो कठिनाइयों से उबरने, साधनों को जुटाने, मैत्री स्तर का सहयोगी बनाने में सहायता करती हैं। इन्हीं सब सद्गुणों का समुच्चय मिलकर ऐसा प्रभावशाली व्यक्तित्व विनिर्मित करता है, जिसे प्रतिभा कहा जा सके, जिसे जहाँ भी प्रयुक्त किया जाए, वहाँ अभ्युदय का-श्रेय-सुयोग का अवसर मिल सके।    

🔴 प्रतिभा के सम्पादन में, अभिवर्धन में जिसकी भी अभिरुचि बढ़ती रही है, जिसने अपने गुण, कर्म, स्वभाव को सुविकसित बनाने के लिए प्रयत्नरत रहने में अपनी विशिष्टता की सार्थकता समझा है, समझना चाहिए उसी को अपना भविष्य उज्ज्वल बनाने का अवसर मिला है। उसी को जन साधारण का स्नेह-सहयोग मिला है। संसार भर में जहाँ भी खरे स्तर की प्रगति दृष्टिगोचर हो, समझना चाहिए कि उसमें समुचित प्रतिभा का ही प्रमुख योगदान रहा है।     

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सबका आदर सच्ची सभ्यता

🔴 राष्ट्रपति का घोड़ा शान के साथ आगे-आगे चल रहा था। पीछे कुछ साथी थे और बाद में अंगरक्षक घुडसवार। यह कोई राजकीय यात्रा न थी। मन बहलाव के लिये निकले थे सब लोग।

🔵 सडक पर बढ़ते हुए राष्ट्रपति को एक हबशी मिला हबशी ने राष्टाध्यक्ष को पहचाना उसने अपनी टोपी उतारी और झुककर प्रणाम किया फिर राष्ट्रपति ने भी अपनी टोपी उतारी और सिर झुकाकर अभिवादन का उत्तर अभिवादन से दिया। हबशी का मुख प्रसन्नता से खिल उठा, खुशी-खुशी एक ओर निकलकर अपने घर चला गया।

🔴 कुछ नजदीकी मित्र और संबंधी थे, राष्ट्रपति का प्रत्युत्तर में झुककर प्रणाम करना उन्हें अच्छा न लगा। इतने बडे राष्ट्र का स्वामी एक मामूली हबशी को विनम्र अभिवादन करे, इसमे कुछ शान का घटियापन लगा बेचारे बोल कुछ न सकते थे। सबके सब पीछे-पीछे चलते और मनोविनोद करते गये।

🔵 शाम को घर लौटे अतिथियों सहित सब लोग भोजन पर बैठे तो एक मित्र ने दिन वाला प्रसंग छेड दिया और कहा कहाँ उनकी यह संभ्रात स्थिति कहाँ वह गुलाम हबशी-आपको उसे मस्तक झुकाकर अभिवादन नहीं करना चाहिए था। वह एक साधारण व्यक्ति था। इसलिये उसे विनम्र होना अनिवार्य था आपके लिये नहीं राष्ट्रपति हँसे और बोले-ठीक कहते हो भाई राष्ट्रपति तो बहुत बडा़ आदमी होता है लेकिन क्या उसे बेअदब भी होना चाहिए 'राष्ट्रपति तो मैं इसलिये हूँ कि मुझमें शासन सत्ता संभालने की योग्यता अनुभव की गई है, पर यदि अपना राष्ट्रपति पद और उस व्यक्ति का हबशी कहा जाना दोनों निकाल दें तो फिर हम दोनों एक ही सामान्य श्रेणी के मनुष्य रह जाते है प्रत्येक मनुष्य रह जाते हैं। प्रत्येक मनुष्य दूसरे मनुष्य का आदर करे। भाइयो यही तो सच्ची सभ्यता है। पद-प्रतिष्ठा और उच्च सम्मान पाने का यह तो अर्थ नहीं है कि लोग मानवीय कर्तव्यों की अवहेलना करने लगें। उसने जिस आत्मीयता और सम्मान के साथ प्रणाम किया था, वैसे मैं न करता तो यह मानवता का अपमान न होता ?

🔴 मित्रों को उनकी बात के आगे कोई दलील सूझ न पडी़ तो भी अपने पक्ष की पुष्टि ले लिए उन्होनें इस बार राष्ट्रपति के परिवार वालों का समर्थन पाने की कोशिश की। उन्होंने कहा कुछ हो आप जैसे विद्वान और प्रतिष्ठित व्यक्ति को वैसा नहीं करना चाहिए।

🔵 राष्ट्रपति की धर्मपत्नी भी वहीं उपस्थित थी। उन्होंने कहा जॉर्ज साहब ने जो कुछ भी किया। वह आदर्श ही नहीं, अनुकरणीय भी है मनुष्य-मत्रुष्य में परस्पर भेद-भाव न रहे इसके लिये यह आवश्यक है कि ऊँची या नीची परिस्थितियों में रहते हुए भी आत्म-समानता का ध्यान रखा जाए। एक दिन था जब हम लोग निर्धन थे, सामान्य श्रेणी में गिने जाते थे। आज इस स्थिति में हैं, इसका यह तो अर्थ नहीं कि हम मनुष्य नहीं रह गये। मनुष्य के नाते इन्होंने जो कुछ किया, वही सही था। एक अनपढ व्यक्ति ने झुककर प्रणाम किया यह उसकी सभ्यता थी और यदि पढ़े-लिखे होकर भी ये वैसा प्रत्युत्तर न देते तो इससे बडी असभ्यता प्रकट होती।'' यह सुनकर सब उनसे सहमत हो गये।

🔴 यह राष्ट्रपति अमेरिका के निर्माता जार्ज वाशिंगटन थे।

🔵 प्रत्येक मनुष्य अपनी अच्छी-बुरी स्थिति का अच्छा-बुरा परिणाम पाता है, इसको मापदंड मानकर सभ्यता नही छोडी जा सकती है। ऊँच-नीच का भेदभाव न रखकर हर मनुष्य को सम्मान देना ही सच्ची सभ्यता है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 63, 64

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 28)

🌹 विचारशील लोग दीर्घायु होते हैं

🔴 विचार का चरित्र से घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। जिसके विचार जिस स्तर के होंगे, उसका चरित्र भी उसी कोटि का होगा। जिसके विचार क्रोध प्रधान होंगे वह चरित्र से भी लड़ाकू और झगड़ालू होगा, जिसके विचार कामुक और स्त्रैण होंगे, उसका चरित्र वासनाओं और विषय-भोग की जीती जागती तस्वीर ही मिलेगी। विचारों के अनुरूप ही चरित्र का निर्माण होता है। यह प्रकृति का अटल नियम है। चरित्र मनुष्य की सबसे मूल्यवान् सम्पत्ति है। उससे ही सम्मान, प्रतिष्ठा, विश्वास और श्रद्धा की प्राप्ति होती है। वही मानसिक और शारीरिक शक्ति का मूल आधार है। चरित्र की उच्चता ही उच्च जीवन का मार्ग निर्धारित करती हैं और उस पर चल सकने की क्षमता दिया करती है।

🔵 निम्नाचरण के व्यक्ति समाज में नीची दृष्टि से ही देखे जाते हैं। उनकी गतिविधि अधिकतर समाज विरोधी ही रहती है। अनुशासन और मर्यादा जोकि वैयक्तिक से लेकर राष्ट्रीय जीवन की दृढ़ता की आधार-शिला है, निम्नाचरण व्यक्ति से कोई सम्बन्ध नहीं रखती है। आचरणहीन व्यक्ति और एक साधारण पशु के जीवन में कोई विशेष अन्तर नहीं होता। जिसने अपनी यह बहुमूल्य सम्पत्ति खो दी उसने मानो सब कुछ खो दिया। सब कुछ पा लेने पर भी चरित्र का अभाव मनुष्य को आजीवन दरिद्री ही बनाये रखता है।

🔴 मनुष्यों से भरी इस दुनियां में अधिकांश संख्या ऐसों की ही है, जिन्हें एक तरह से अर्ध मनुष्य ही कहा जा सकता है। वे कुछ ही प्रवृत्तियों और कार्यों में पशुओं से भिन्न होते हैं, अन्यथा ये एक प्रकार से मानव-पशु ही होते हैं। इसके विपरीत कुछ मनुष्य बड़े ही सभ्य, शिष्ट और शालीन होते हैं। उनकी दुनियां सुन्दर और कलाप्रिय होती है। इसके आगे भी एक श्रेणी चली गई है, जिनको महापुरुष, ऋषि-मुनि और देवता कह सकते हैं।

🔵 समान हाथ-पैर और मुंह, नाक, कान के होते हुए भी और एक ही वातावरण में रहते मनुष्यों में यह अन्तर क्यों दिखलाई देता है? इसका आधारभूत कारण विचार ही माने गये हैं। जिस मनुष्य के विचार जिस अनुपात में जितना अधिक विकसित होने लग जाते हैं उसका स्तर पशुता से श्रेष्ठता की ओर उठता चला जाता है। असुरत्व, पशुत्व, ऋषित्व अथवा देवत्व और कुछ नहीं, विचारों के ही स्तरों के नाम हैं। यह विचार-शक्ति ही है, जो मनुष्य को देवता अथवा राक्षस बना सकती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 6)

🌹 अनास्था की जननी-दुर्बुद्धि

🔵 इस भ्रांत धारणा की एक हानि यह है कि मनुष्य स्वेच्छाचारी व अनाचारी बनता है और अपनी राह पर तीर की नोंक वाले काँटे बोने में लगा रहता है। न चाहते हुए भी अंधकारमय परिस्थितियों को अपने समीप बुलाने के लिये निमंत्रण देने में बाध्य रहा है। अभावग्रस्तता, विषमता और विपन्नताएँ प्राय: इसीलिए दीख पड़ती हैं। यदि सोच ठीक रही होती और उसके प्रकाश में सीधे मार्ग पर चल सकना संभव हुआ होता तो यहाँ सब लोग मिल-जुलकर रहते, हँसती-हँसाती जिंदगी जीते, एक-दूसरे को ऊँचा उठाने और आगे बढ़ाने में सहयोग करते।

🔴 तब सीमित साधनों में भी लोग संतुष्ट रहते और अभीष्ट वातावरण बना हुआ होता-हर किसी को अदृश्य मार्ग का दृश्यमान अरुणोदय अनुभव करने का अवसर मिल रहा होता पर उस दुर्बुद्धि को क्या कहा जाए जिसने मनुष्य को मर्यादाओं, प्रतिबंधों और वर्जनाओं को तोड़ने के लिये उद्धृत स्वभाव वाला वनमानुष बनाकर रख दिया है।         

🔵 आश्चर्य इस बात का है कि मनुष्य को बंदर बनाने वाली दो भूलें एक साथ जन्मी हैं और उसने एक ही चक्कर में पूरी तरह चोट करने के बाद आगे बढ़ने का सिलसिला बनाया है। दूसरी भूल है अपने स्वरूप, कर्तव्य और उद्देश्य को भूलने की तथा अपने अति निकट रहने वाले उदार स्वभाव वाले परम सज्जन भगवान् से परिचय बनाने तक की इच्छा न करने की अन्यमनस्कता-अवमानना अपने से बड़ी शक्ति के साथ संबंध जोड़ने की महत्ता को छोटे बच्चे तक समझते हैं।

🔴 वे उसी की ओर खिसकते हैं, जिसके पास खिलौने, चाकलेट और अच्छे उपहारों का सामान होता है; जो प्यार से बुलाते और दुलारपूर्वक गोदी में चढ़ाते हैं। जब इतनी समझ छोटे बालकों तक में पाई जाती है तो आश्चर्य होता है कि मनुष्य भगवान् का घनिष्ठ बनने या उसे अपना घनिष्ठ बनाने में इतनी अधिक उपेक्षा क्यों बरतता है। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 दीक्षा और उसका स्वरूप (भाग 10)

🌹 निर्मल-उदात्त जीवन की ओर
🔴   निर्मल जीवन जीने का अर्थ अपने शारीरिक क्रियाकलापों को अच्छा बनाना और अपनी मनोभूमि को परिष्कृत करना है।  मन में विचारणाएँ ऊँचे किस्म की हों और शरीर हमारा काम करें, सिर्फ ऊँचे किस्म के काम करे। इन दो गतिविधियों को आप योगाभ्यास कहिये, साधना कहिये, आध्यात्मिक प्रयोजन कहिये। जो आदमी इस काम को कर लेता है, वह स्वयं सब प्रकार से शक्तिशाली हो जाता है और जो शक्तिशाली हो गया है, उस शक्तिशाली मनुष्य के लिए सम्भव है कि अपनी जो क्षमताएँ हैं, उन्हें केवल अपनी उन्नति के लिए सीमाबद्ध न रखें मनुष्यके अन्तरंग की उदारता जब तक विकसित न हुई, दया जब तक विकसित न हुई, करुणा जब तक विकसित न हुई, आत्मीयता विकसित न हुई, और अपने आप को विशाल भगवान् के रूप में परिणत कर देने की इच्छा उत्पन्न न हुई, तब तक आदमी केवल अपने आपको निर्मल बना करके भी अपूर्ण ही बना रहेगा।

🔴 मनुष्य को अपने आप को निर्मल और उदात्त बनाना चाहिए। यही तो आध्यात्मिकता की राह पर चलने वाले दो कदम हैं। कोई भी आदमी आध्यात्मिकता की राह पर चलना चाहता है, तो उसको दोनों ही कदम आगे बढ़ाना है। कोई मंजिल आपको पूरी करनी है, तो लेफ्ट- राइट, लेफ्ट- राइट चलते हुए ही तो मंजिल पार करेंगे और कोई तरीका दुनिया में नहीं है।   

🔵 अब मैं चाहता हूँ कि लोगों के दिमाग में से वहम निकाल दिये जाने चाहिए। लोगों के दिमाग पर न जाने किन लोगों ने वहम पैदा कर दिया है कि भगवान् का नाम लेने से और उसकी माला जपने से और बार- बार पुकारने से और मंदिर के दर्शन करने से, कथा सुनने से और पंचामृत, पंजीरी खा जाने से, स्तोत्र पाठ करने से मनुष्य की आत्मा को शान्ति मिल सकती है और वह अपनी आत्मिक प्रगति कर सकता है।    

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Diksha/b

👉 परलोक कहाँ है? (अंतिम भाग)

जो क्रोधी है उसे दूसरों की ओर से क्रोध पूर्ण व्यवहार अपने ऊपर होता हुआ दृष्टिगोचर होगा। जो अनुदार है उसके साथ में अन्य व्यक्तियों को अनुदारत...