मंगलवार, 31 मई 2016

👉 आत्मचिंतन के क्षण 31 May 2016


🔵 ईश्वर मनुष्य को एक साथ इकट्ठा जीवन न देकर क्षणों के रूप में देता है। एक नया क्षण देने के पूर्व वह पुराना क्षण वापस ले लेता है। अतएव मिले हुए प्रत्येक क्षण का ठीक-ठीक सदुपयोग करो, जिससे तुम्हें नित्य नये क्षण मिलते रहें।

🔴 सीखने की इच्छा रखने वाले के लिए पग-पग पर शिक्षक मौजूद हैं, पर आज सीखना कौन चाहता है? सभी तो अपनी अपूर्णता के अहंकार के मद में ऐंठे-ऐंठे से फिरते हैं। सीखने के लिए हृदय का द्वार खोल दिया जाय तो बहती हुई वायु की तरह शिक्षा, सच्ची शिक्षा स्वयमेव हमारे हृदय में प्रवेश करने लगे।

🔵 जीवन के आधार स्तम्भ सद्गुण है। अपने गुण, कर्म, स्वभाव को श्रेष्ठ बना लेना अपनी आदमों को श्रेष्ठ सज्जनों की तरह ढाल लेना वस्तुतः ऐसी बड़ी सफलता है, जिसकी तुना किसी भी अन्य सांसारिक लाभ से नहीं की जा सकती। इसलिए सबसे अधिक ध्यान हमें इस बात पर देना चाहिए कि हम गुणहीन ही न बने रहें। सद्गुणों की शक्ति और विशेषताओं से अपने को सुसज्जित करने का प्रयत्न करें।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

सोमवार, 30 मई 2016

👉 आत्मचिंतन के क्षण 30 May 2016


🔵 भविष्य की कल्पना करते समय शुभ और अशुभ दोनों ही विकल्प सामने हैं। यह अपनी ही इच्छा पर निर्भर है कि शुभ सोचा जाय अथवा अशुभ। शुभ को छोड़कर कोई व्यक्ति अशुभ कल्पनाएँ करता है, तो इसमें किसी और का दोष नहीं है। दोषी है तो वह स्वयं ही, इसलिए कि उसने शुभ चिंतन का विकल्प सामने रहते हुए भी अशुभ चिंतन को ही अपनाया।

🔴 निर्बलता कोई स्थिति नहीं है, बल्कि वह आलस्य और अकर्मण्यता की ही परिणति है। यही कारण है कि निर्बलता चाहे किसी भी प्रकार की क्यों न हो, शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक या आत्मिक मनुष्य किसी भी दृष्टि से निर्बल हो तो उसे संबंधित क्षेत्र में प्रत्येक प्रयत्न का विपरीत परिणाम भुगतना पड़ता है।

🔵 बेईमानी और चालाकी से अर्जित किये गये वैभव का रौब और दबदबा बालू की दीवार ही होता है। जो थोड़ी सी हवा बहने पर ढह जाता है तथा यह भी कि वह प्रतिष्ठा, दिखावा, छलावा मात्र होती है, क्योंकि स्वार्थ सिद्ध करने के उद्देश्य से कतिपय लोग उनके मुँह पर उनकी प्रशंसा अवश्य कर देते हैं, परन्तु हृदय में उनके भी आदर भाव नहीं होता।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 28 मई 2016

👉 आत्मचिंतन के क्षण 29 May 2016


🔵 दोष दिखाने वाले को अपना शुभ चिंतक मानकर उसका आभार मानने की अपेक्षा मनुष्य जब उलटे उस पर कु्रद्ध होता है, शत्रुता मानता और अपना अपमान अनुभव करता है, तो यह कहना चाहिए कि उसने सच्ची प्रगति की ओर चलने का अभी एक पैर उठाना भी नहीं सीखा।

🔴 ऐसे विश्वास और सिद्धान्तों को अपनाइये जिनसे लोक कल्याण की दशा में प्रगति होती हो। उन विश्वासों और सिद्धान्तों सको हृदय के भीतरी कोने में गहराई तक उतार लीजिए। इतनी दृढ़ता जमा लीजिए कि भ्रष्टाचार और प्रलोभन सामने उपस्थित होने पर भी आप उन पर दृढ़ रहें, परीक्षा देने एवं त्याग करने का अवसर आवे तब भी विचलित न हों। वे विश्वास श्रद्धास्प्द होने चाहिए, प्राणों से अधिक प्यारे होने चाहिए।

🔵 अपने को असमर्थ, अशक्त एवं असहाय मत समझिये। ऐसे विचारों का परित्याग कर दीजिए कि साधनों के अभाव में हम किस प्रकार आगे बढ़ सकेंगे। स्मरण रखिए, शक्ति का स्रोत साधन में नहीं, भावना में है। यदि आपकी आकाँक्षाएँ आगे बढ़ने के लिए व्यग्र हो रही हैं, उन्नति करने की तीव्र इच्छाएँ बलवती हो रही हैं, तो विश्वास रखिये साधन आपको प्राप्त होकर रहेंगे।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

परम पूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी


बहुत- से व्यक्ति थे जो पहले सिद्धान्तवाद की राह पर चले और भटक कर कहाँ से कहाँ पहुँचे? भस्मासुर का पुराना नाम बताऊँ आपको! मारीचि का पुराना नाम बताऊँ आपको। ये सभी योग्य तपस्वी थे। पहले जब उन्होंने उपासना- साधना शुरू की थी, तब अपने घर से तप करने के लिए हिमालय पर गए थे। तप और पूजा- उपासना के साथ- साथ में कड़े नियम और व्रतों का पालन किया था। तब वे बहुत मेधावी थे, लेकिन समय और परिस्थितियों के भटकाव में वे कहीं के मारे कहीं चले गए। भस्मासुर का क्या हो गया? जिसको प्रलोभन सताते हैं वे भटक जाते हैं और कहीं के मारे कहीं चले जाते हैं।

साधु- बाबाजी जिस दिन घर से निकलते हैं, उस दिन यह श्रद्धा लेकर निकलते हैं कि हमको संत बनना है, महात्मा बनना है, ऋषि बनना है, तपस्वी बनना है। लेकिन थोड़े  दिनों बाद वह जो उमंग होती है, वह ढीली पड़ जाती है और ढीली पड़ने के बाद में संसार के प्रलोभन उनको खींचते हैं। किसी की बहिन- बेटी की ओर देखते हैं, किसी से पैसा  लेते हैं। किसी को चेला- चेली बनाते हैं। किसी की हजामत बनाते हैं। फिर जाने क्या से क्या हो जाता है? पतन का मार्ग यहीं से आरम्भ होता है। ग्रेविटी- गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी की हर चीज को ऊपर से नीचे की ओर खींचती है।
 
संसार भी एक ग्रेविटी है। आप लोगों से सबसे मेरा यह कहना है कि आप ग्रैविटी से खिंचना मत। रोज सबेरे उठकर भगवान के नाम के साथ में यह विचार किया कीजिए कि हमने किन सिद्धान्तों के लिए समर्पण किया था? और पहला कदम जब उठाया था तो किन सिद्धान्तों के आधार पर उठाया था? उन सिद्धान्तों को रोज याद कर लिया कीजिए। रोज याद किया कीजिए कि हमारी उस श्रद्धा में और उस निष्ठा में, उस संकल्प और उस त्यागवृत्ति में कहीं फर्क तो नहीं आ गया। संसार में हमको खींच तो नहीं  लिया। कहीं हम कमीने लोगों की नकल तो नहीं करने लगे। आप यह मत करना। अब एक और नई बात शुरू करते हैं।
 
परम पूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी- 1 पृष्ठ- 4.76

शुक्रवार, 27 मई 2016

🌞 शिष्य संजीवनी (भाग 57) :-- 👉 अन्तरात्मा का सम्मान करना सीखें

🔵 एक सूफी दरवेश अमीरूल्लाह हुए हैं। यह बड़े पहुँचे हुए फकीर थे। इनके सान्निध्य में अनेकों को अपने मन की खोई हुई शान्ति वापस मिलती थी। दरवेश अमीरूल्लाह का हर पल, हर क्षण खुदा की इबादत में बीतता है। हिन्दू- मुसलमान, गरीब- अमीर सभी के अपने थे वह। गाँव के लोग उन्हें अमीर बाबा कहकर बुलाते थे। इन्हीं के गाँव में सांझ के समय एक युवक आया। उसके कपड़ों की हालत देखकर लगता था कि वह काफी दूर से चला आ रहा है। फकीर के पास पहुँचकर उसने साष्टांग प्रणाम किया। और उनका शिष्य होने की इच्छा प्रकट की।
    
🔴 दरवेश अमीर बाबा ने उसकी ओर बड़ी बेधक नजरों से देखा और बोले, यदि तुम शिष्य होना चाहते हो, तो पहले शिष्य की जिन्दगी का ढंग सीखो। यह क्या है बाबा? युवक के जिज्ञासा करने पर दरवेश अमीर बाबा ने कहा, बेटा! शिष्य अपनी अन्तरात्मा का सम्मान करना जानता है। वह इन्द्रिय लालसाओं के लिए, थोड़े से स्वार्थ के लिए या फिर अहंकार की झूठी शान के लिए अपना सौदा नहीं करता। वह ऐसी जिन्दगी जीता है जो खुदा के एक सच्चे व नेक बन्दे को जीनी चाहिए। बाबा की इन बातों को सुनते हुए उस युवक को लग रहा था कि दरवेश अपनी बातों का और खुलासा करें।
  
🔵 सो उनके मनोभावों को पढ़ते हुए दरवेश बाबा बोले, बेटा! दुनिया का आम इन्सान दुनिया के सामने झूठी, नकली जिन्दगी जीता है। वह भय के कारण, समाज के डर की वजह से समाज में अपने अच्छे होने का नाटक करता है। परन्तु समाज की ओट में, चोरी- छुपे अनेकों बुरे काम कर लेता है। अपने मन में बुरे ख्यालों व ख्वाबों में रस लेता है। परन्तु खुदा का नेक बन्दा कभी ऐसा नहीं करता। क्योंकि वह जानता है, खुदा सड़क और चौराहों में भी है और कमरों की बन्द दीवारों के भीतर भी। यहाँ तक कि अन्तर्मन के दायरों में भी उसकी उपस्थिति है। सो वह हर कहीं- हर जगह अपने कर्म, विचार व भावनाओं में पाक- साफ होकर जीता है। यही अन्तरात्मा का सम्मान करने का तरीका है। जो ऐसा करते हैं, वे अपने पीर- गुरु को सहज प्यार करते हैं। भगवान् की कृपा भी उन पर सदा बरसती रहती है। इस कृपा की और अधिक सघन अनुभूति कैसे हो। इस रहस्य को शिष्य संजीवनी के अगले सूत्र में बताया जाएगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 डॉ. प्रणव पण्डया
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Devo/antar

👉 क्षुद्र हम, क्षुद्रतम हमारी इच्छाएँ (भाग 11) 27 May 2016


👉 एक चूक का परिणाम कितना बड़ा 
🔴 मित्रो! हमारी इतनी बड़ी भूल जो कि इस चौराहे पर आकर हमको मालूम हुई। हमारी एक भूल- चूक हो गई। ऐसी ही एक भूल कलिंग देश के एक राजा ने की थी। कलिंग देश का एक राजा था। एक बार उसको जलपान के समय- नास्ते के समय मधुपर्क दिया गया अर्थात् दही और शहद दिया गया। दही और शहद को अच्छे तरीके से खाना चाहिए था, तमीज के साथ खाना चाहिये था लेकिन तमीज के साथ उसने शहद नहीं खाया। इधर- उधर देखता रहा, बात करता रहा और शहद खाता रहा। इस तरह शहद खाने से क्या हुआ? आधा शहद प्याले में गया, आधा खा चुका और आधा शहद जमीन पर फैल गया। इसके बाद कलिंग राजा चला गया।

🔵 कलिंग राजा जब चला गया तो थोड़ी देर में जो शहद वहाँ फैल गया था वहाँ मक्खियाँ आयीं और आकर के शहद खाने लगीं। वहाँ बहुत सी मक्खियाँ मँडरा रहीं थी। उसी समय एक छिपकली आयी और मक्खियों को खाने का अंदाज लगाने लगी। फिर एक और छिपकली आयी। जब कई छिपकलियाँ इकट्ठी होने लगीं, तो एक बिल्ली आई। बिल्ली ने कहा कि ये छिपकलियाँ बहुत गड़बड़ करती हैं चलो इन्हें खाना चाहिए। इनको खाने में मजा मिलेगा। बस, मक्खियों को खाने के लिए छिपकलियाँ तैयारी करने लगी थीं और छिपकलियों को खाने के लिए बिल्ली। बिल्ली जैसे ही उन्हें खाने के लिए आई वैसे ही कहीं से एक कुत्ता आ गया। उसने कहा कि यह बिल्ली बहुत अच्छी है। इसको मजा चखाना चाहिये। इसकी टाँग पकड़ लेनी चाहिए। बस, कुत्ता आया और उसने बिल्ली की टाँग पकड़ ली। कान पकड़ लिया और बिल्ली के बाल नोचने लगा। जब तक एक और कुत्ता आ गया और उस कुत्ते के ऊपर बिगड़ने लगा। कुत्ते से लड़ने लगा। बिल्ली तो भाग गई और कुत्तों में लड़ाई हो गयी।

👉 बात बढ़ती चली गयी
🔵 कुत्ते जब आपस में बहुत देर तक लड़ते रहे और घायल हो गये, तो उन कुत्तों के मालिक आये। उन्होंने आपस में कहा कि तुम्हारे कुत्ते ने हमारे कुत्ते को काटा। दूसरे ने कहा कि तुम्हारे कुत्ते ने हमारे कुत्ते को काटा। उन्होंने कहा कि तुम्हारा कुसूर है, तुमने अपने कुत्ते को बाँधकर के क्यों नहीं रखा? दूसरे ने भी यही कहा कि तुमने अपने कुत्ते को बाँधकर के क्यों नहीं रखा? दोनों में टेंशन होने लगी और आपस में मारपीट हो गई। झगड़ा हो गया? फिर क्या हुआ? वे ब्राह्मण और ठाकुर थे। ब्राह्मणों को पता चला कि हमारे ब्राह्मण की ठाकुरों ने पिटाई कर दी, तो उन्होंने कहा ब्राह्मणों की बहुत बेइज्जती हो गई, चलो ठाकुरों पर हमला करेंगे। उधर ठाकुरों ने कहा कि चलो, ब्राह्मणों को ठीक करेंगे। उधर ब्राह्मणों ने कहा कि ठाकुरों का मुकाबला करेंगे। जो होगा देखा जायेगा।

🔴 फिर दोनों में बहुत जोरदार लड़ाई हुई। मारपीट और दंगा हो गया। दंगा हो गया, तो मुहल्ले में जो चोर और डाकू थे, उन्होंने कहा कि दंगा हो रहा है। इस समय हमें बड़ा बलवा खड़ा कर देना चाहिए और जो भी माल लूट- पाट में मिले, उसे लेकर के भाग जाना चाहिए। बस दंगा होते ही बहुत सारे दंगाई आ गये और सारे शहर में दंगा मचाने लगे और लूटपाट करने लगे। उन्होंने कहा कि इन गाँव वालों के पास क्या रखा है? सारा खजाना तो राजा के पास है। चलो राजा के पास चलें और उसका सारे का सारा खजाना लूटकर ले आयें। बस दंगाइयों ने राजा के खजाने पर धावा बोल दिया और राजा के खजाने में जो माल रखा था, सब चुराकर ले गये। सोना, चाँदी, नगीना आदि सब गायब हो गये।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/guru3/shudrahumshurdtamhum.3

👉 आत्मचिंतन के क्षण 27 May 2016


🔵 भव बंधनों का अर्थ है- कुविचारों, कुसंस्कारों और कुकर्म से छुटकारा पाना। अपने दोषों की ओर से अनभिज्ञ रहने से बड़ा प्रमाद इस संसार में और कोई नहीं हो सकता। इसका मूल्य जीवन की असफलता का पश्चाताप करते हुए ही चुकाना पड़ता है।

🔴 ईश्वर को इस बात की इच्छा नहीं कि आप तिलक लगाते हैं या नहीं, पूजा-पत्री करते हैं या नहीं, भोग-आरती करते हैं या नहीं, क्योंकि उस सर्वशक्तिमान प्रभु का कुछ भी काम इन सबके बिना रुका हुआ नहीं है। वह इन बातों से प्रसन्न नहीं होता, उसकी प्रसन्नता तब प्रस्फुटित होती है जब अपने पुत्रों को पराक्रमी, पुरुषार्थी, उन्नतिशील, विजयी, महान् वैभव युक्त, विद्वान, गुणवान्, देखता है और अपनी रचना की सार्थकता अनुभव करता है।

🔵 किसी को यदि परोपकार द्वारा सुखी करते हैं और किसी को अपने क्रोध का लक्ष्य बनाते हैं, तो एक ओर का पुण्य दूसरे ओर के पाप से ऋण होकर शून्य रह जायेगा। गुण, कर्म, स्वभाव तीनों का सामंजस्य एवं अनुरूपता ही यह विशेषता है, जो जीवन जीने की कला में सहायक होती है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गायत्री उपासना सम्बन्धी शंकाएँ एवं उनका समाधान (अन्तिम भाग)



🔵 साधना से सम्पन्नता की सिद्धि या सफलता प्राप्त के शाश्वत सिद्धांत पर ये सभी बातें लागू होती हैं। छुटपुट कर्मकाण्डों की लकीर पीट लेने से अभीष्ट सफलता कहाँ मिलती है? उसके लिये श्रम साधना, मनोयोग, साधनों का दुरुपयोग आदि सभी आवश्यक हैं।

🔴 गायत्री के आकर्षक महात्म्य जो बताये जाते रहे हैं, वे किसी को मिलते हैं- किसी को नहीं। इसका एक ही कारण है- उपासना व साधना के मध्य अविच्छिन्न संबंध। दोनों परस्पर पूरक हैं। उपासना से तात्पर्य है- उत्कृष्टता की देवसत्ता के साथ तादात्म्य स्थापित करना, साधना का अर्थ है- अपने गुण, कर्म, स्वभाव में उत्कृष्टता का अनुपात अधिकाधिक मात्रा में बढ़ाना। यदि गायत्री तत्वज्ञान को सही रूप में समझा गया होगा तो साधक को निर्धारित उपासना कृत्य श्रद्धापूर्वक स्वीकार करना पड़ेगा, साथ ही आत्म-परिष्कार की जीवन साधना में भी उतनी ही तत्परता के साथ संलग्न होना पड़ेगा। दोनों का मिलन होते ही चमत्कार दृष्टिगोचर होने लगते हैं। भ्रष्ट जीवन के रहते दैवी अनुकम्पाएँ मिल सकना संभव नहीं। जो देवताओं को फुसलाकर अपना उल्लू साधना चाहते हैं पर चिन्तन और चरित्र में उत्कृष्टता का समावेश नहीं करते, ऐसे ही लोगों की उपासना प्रायः निष्फल रहती है। इसी प्रकार लोग विभिन्न शंकाएं उठाते देखे गये हैं और कुतर्क का जाल बुनकर भावना के क्षेत्र में कुहराम मचाते पाये गये हैं।

🔵 बिना किसी जाति, लिंग, देश और धर्म का अन्तर किये मानव मात्र को गायत्री उपासना करने और उससे लाभान्वित होने का पूरा-पूरा अधिकार है। इस सम्बन्ध में अधकचरे ज्ञान के आधार पर उठायी गई प्रतिगामी टिप्पणियों से अप्रभावित हो, जिन्हें भी आत्मिक प्रगति में तनिक भी रुचि हो, बिना किसी आशंका-असमंजस के श्रद्धापूर्वक गायत्री उपासना करते रहना चाहिये।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति जुलाई पृष्ठ 49
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1983/July.49

गुरुवार, 26 मई 2016

👉 गायत्री उपासना सम्बन्धी शंकाएँ एवं उनका समाधान (भाग 9)


🔵 स्वर्ग-नरक की चर्चा के बाद एक प्रसंग संकट मुक्ति का है, जिसके बारे में शंकाएँ उठाई जाती रही हैं कि यह कहाँ तक सही है। क्या जप करने से संकट समीप नहीं आते? इसे भी तत्व दर्शन के परिप्रेक्ष्य में सभी इन्द्रियाँ जागृत रख समझना होगा। महाप्रज्ञा के स्वरूप को समझने तथा शिक्षा को हृदयंगम करने पर आत्मशोधन और आत्मपरिष्कार के दो कदम संकल्प पूर्वक उठने लगते हैं। फलतः कुसंस्कारों एवं अवाँछनीयता से छुटकारा मिलता है। साथ ही उस उन्मूलन से खाली हुए स्थान को गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता से भरने का काम भी द्रुतगति से चल पड़ता है। यह परिवर्तन जिस क्रम से अग्रसर होता है, उसी अनुपात से संकटों से भी छुटकारा मिलता चला जाता है।

🔴 संकट वस्तुतः स्वाभाविक नहीं, स्व उपार्जित है। असंयम से रुग्णता, असंतुलन से विग्रह, अपव्यय से दारिद्रय, असभ्यता से तिरस्कार, अस्त-व्यस्तता से विपन्नता के घटाटोप खड़े होते हैं। अपनी अवाँछनीयताएँ- कुसंस्कारिताएं ही दुर्गति को- सुखद परिस्थितियों को न्यौत बुलाती हैं। मनःस्थिति बदले तो परिस्थिति बदलने में देर न लगे। आकस्मिक अपवाद तो कभी-कभी ही खड़े होते हैं। आमतौर से दृष्टिकोण, स्वभाव एवं व्यवहार में घुसा अनगढ़पन ही विभिन्न स्तर के संकटों के लिये उत्तरदायी होता है। इस तथ्य को समझने वाले बाहरी संकटों का साहस और सूझ-बूझ द्वारा मुकाबला करते हैं। साथ ही यह भी देखते हैं कि अपनी किन त्रुटियों के कारण अवाँछनीयता के साथ घनिष्ठता जुड़ी और वैसा परिणाम निकला। अपने को बदलने के लिये तत्पर व्यक्ति प्रतिकूलताओं में बदलने में भी प्रायः सफल होते हैं। गायत्री उपासना के उपयुक्त निर्धारण एवं अवलम्बन से आत्मपरिष्कार– पराक्रम का लक्ष्य पूरा होता है। फलतः संकटों के निवारण में भी संदेह नहीं रह जाता। गायत्री लाठी लेकर संकटों को मार भगाये और श्रद्धालु आँखें मूँदकर उस तमाशे को देखें, ऐसा नहीं होता।

🔵 इसी प्रकार एक शंका और प्रश्न के रूप में कुरेदी-उभारी जाती रही है- गायत्री की कृपा से सम्पन्नता और सफलता कैसे मिलती है? वस्तुतः इस प्रश्न में एक और कड़ी जुड़नी चाहिये- मध्यवर्ती कर्तव्य और परिवर्तन की। स्कूल में प्रवेश करने और ऊंचे अफसर बनने, डाक्टर की पदवी पाने में आरम्भ और अन्त की चर्चा मात्र है। इसके बीच मध्यान्तर भी है जिसमें मनोयोग पूर्वक लम्बे समय तक नियमित रूप से पढ़ना पुस्तकों की- फीस की, व्यवस्था करना आदि अनेकों बातें शामिल है। इस मध्यान्तर को विस्मृत कर दिया जाये और मात्र प्रवेश एवं पद दो ही बातें याद रहें तो कहा जायेगा कि यह शेख चिल्ली की कल्पना भर है। यदि मध्यान्तर का महत्व और उस अनिवार्यता का कार्यान्वयन भी ध्यान में हो तो कथन सर्वथा सत्य है। पहलवान बलिष्ठता की मनोकामना नहीं पूरी करता, न ही ‘पहलवान-पहलवान’ रटते रहने से कोई वैसा बन पाता है। उसके लिये व्यायामशाला में प्रवेश से लेकर नियमित व्यायाम, आहार-विहार, तेल मालिश आदि का उपक्रम भी ध्यान में रखना होता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति जुलाई पृष्ठ 49
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1983/July.49

बुधवार, 25 मई 2016

👉 गायत्री उपासना सम्बन्धी शंकाएँ एवं उनका समाधान (भाग 8)


🔵 गायत्री के बारे में एक चर्चा जो की जानी है- वह यह कि इसकी कृपा से- अर्चा- आराधना से स्वर्ग और मुक्ति मिलती है। शंकालु इस विषय पर काफी ऊहापोह करते देखे गए हैं। वस्तुतः स्वर्ग कोई स्थान विशेष नहीं है। न ही कोई ऐसा ग्रह-नक्षत्र है जहाँ स्वर्ग के नाम पर अलंकारिक रूप में वर्णित अनेकानेक प्रसंग बताए जाते रहे हैं। वस्तुतः इस सम्बन्ध में ऋषि चिन्तन सर्वथा भिन्न है। परिष्कृत दृष्टिकोण को ही स्वर्ग कहते हैं। चिन्तन में उदात्तता का समावेश होने पर सर्वत्र स्नेह, सौंदर्य, सहयोग और सद्भाव ही दृष्टिगोचर होता है। सुखद- दूसरों को ऊँचा उठाने- श्रेष्ठ देखने की ही कल्पनाएँ मन में उठती हैं। उज्ज्वल भविष्य का चिन्तन चलता तथा उपक्रम बनता है। इस उदात्त दृष्टिकोण का नाम स्वर्ग है। स्नेह, सहयोग और सन्तोष का उदय होते ही स्वर्ग दिखाई पड़ने लगता है।

🔴 नरक ध्वंस, द्वेष एवं पतन को कहते हैं। ये जहाँ कहीं भी रहेंगे, वहीं व्यक्ति अस्वस्थ, विक्षुब्ध रहेंगे और कुकृत्य करते रहेंगे। सर्वत्र नरक के रूप में अलंकारिक वर्णित भयावहता और कुरूपता ही दृष्टिगोचर होगी, फलतः संपर्क क्षेत्र विरोधी एवं वातावरण प्रतिकूल होता जाता है। यही नरक है और उससे उबर पाना स्वर्ग है। मुक्ति कहते हैं- भव बन्धनों से छुटकारा पाने को, इसी लोक में रहते हुए। भव बन्धन तीन हैं, जो मनुष्य को सतत् अपनी पकड़ में कसने का प्रयास करते रहते हैं। लालच, व्यामोह और अहंकार। लोभ, मोह और अहंता नाम से प्रख्यात इन तीन असुरों से जो जूझ लेता है, उनके रज्जु जंजाल से मुक्त होने का प्रयास करता है, वही जीवनमुक्त है जो पूर्ण मुक्ति की दिशा में गतिशील है। ये तीनों ही मनुष्य को क्षुद्र और दुष्ट प्रयोजनों में निरत रखते हैं और इतनी लिप्सा भड़काते हैं जिससे पुण्य परमार्थ के लिए समय निकाल सकना- साधन लगा सकना सम्भव ही न हो सके। अर्थ का सर्वथा सदैव अभाव लगता रहे और उसकी पूर्ति में इतनी व्यस्तता-व्यग्रता रहे कि सत्प्रयोजनों को करना तो दूर, वैसा सोचने तक का अवसर न मिले।

🔵 तीनों ही नितान्त अनावश्यक होते हुए भी अत्यधिक आकर्षक लगते हैं। इस भ्रान्ति एवं विकृति से छुटकारा पाने को ही मुक्ति कहते हैं। महाप्रज्ञा के आलोक में ही इन निविड़ भव बन्धनों से छुटकारा मिलता है। व्यक्ति स्वतन्त्र चिन्तन अपनाता, अपने निर्धारण आप करता है। प्रचलनों एवं परामर्शों से प्रभावित न होकर श्रेय पथ पर एकाकी चल पड़ता है। विवेक अवलम्बन जन्य इस स्थिति को ही मुक्ति कहते हैं, जो महाप्रज्ञा गायत्री का तत्वदर्शन समझकर उनके आश्रय में जाने वाले सच्चे साधक को अवश्य ही मिलती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति जुलाई पृष्ठ 48
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1983/July.48

👉 क्षमा, क्षांति


🔵 क्षमा आत्मा का नैसर्गिक गुण है. यह आत्मा का स्वभाव है. जब हम विकारों से ग्रस्त हो जाते है तो स्वभाव से विभाव में चले जाते है. यह विभाव क्रोध, भय, द्वेष, एवं घृणा के विकार रूप में प्रकट होते है. जब इन विकारों को परास्त किया जाता है तो हमारी आत्मा में क्षमा का शांत झरना बहने लगता है।

🔴 क्रोध से क्रोध ही प्रज्वल्लित होता है. क्षमा के स्वभाव को आवृत करने वाले क्रोध को, पहले जीतना आवश्यक है. अक्रोध से क्रोध जीता जाता है. क्योंकि क्रोध का अभाव ही क्षमा है. अतः क्रोध को धैर्य एवं विवेक से उपशांत करके, क्षमा के स्वधर्म को प्राप्त करना चाहिए. बडा व्यक्ति या बडे दिल वाला कौन कहलाता है? वह जो सहन करना जानता है, जो क्षमा करना जानता है. क्षांति जो आत्मा का प्रथम और प्रधान धर्म है. क्षमा के लिए ”क्षांति” शब्द अधिक उपयुक्त है. क्षांति शब्द में क्षमा सहित सहिष्णुता, धैर्य, और तितिक्षा अंतर्निहित है।

🔵 क्षमा में लेश मात्र भी कायरता नहीं है. सहिष्णुता, समता, सहनशीलता, मैत्रीभाव व उदारता जैसे सामर्थ्य युक्त गुण, पुरूषार्थ हीन या अधैर्यवान लोगों में उत्पन्न नहीं हो सकते. निश्चित ही इन गुणों को पाने में अक्षम लोग ही प्रायः क्षमा को कायरता बताने का प्रयास करते है. यह अधीरों का, कठिन पुरूषार्थ से बचने का उपक्रम होता है. जबकि क्षमा व्यक्तित्व में तेजस्विता उत्पन्न करता है. वस्तुतः आत्मा के मूल स्वभाव क्षमा पर छाये हुए क्रोध के आवरण को अनावृत करने के लिए, दृढ पुरूषार्थ, वीरता, निर्भयता, साहस, उदारता और दृढ मनोबल चाहिए, इसीलिए “क्षमा वीरस्य भूषणम्” कहा जाता है।

🔴 दान करने के लिए धन खर्चना पडता है, तप करने के लिए काया को कष्ट देना पडता है, ज्ञान पाने के लिए बुद्धि को कसना पडता है. किंतु क्षमा करने के लिए न धन-खर्च, न काय-कष्ट, न बुद्धि-श्रम लगता है. फिर भी क्षमा जैसे कठिन पुरूषार्थ युक्त गुण का आरोहण हो जाता है।

🔵 क्षमा ही दुखों से मुक्ति का द्वार है. क्षमा मन की कुंठित गांठों को खोलती है. और दया, सहिष्णुता, उदारता, संयम व संतोष की प्रवृतियों को विकसित करती है।

🔴 क्षमापना से निम्न गुणों की प्राप्ति होती है-

🌹 1. चित्त में आह्लाद– मन वचन काय के योग से किए गए अपराधों की क्षमा माँगने से मन और आत्मा का बोझ हल्का हो जाता है. क्योंकि क्षमायाचना करना उदात्त भाव है. क्षमायाचक अपराध बोध से मुक्त हो जाता है परिणाम स्वरूप उसका चित्त प्रफुल्ल हो जाता है।

🌞 2. मैत्रीभाव- क्षमापना में चित्त की निर्मलता ही आधारभूत है. क्षमायाचना से वैरभाव समाप्त होकर मैत्री भाव का उदय होता है. “आत्मवत् सर्वभूतेषु” का सद्भाव ही मैत्रीभाव की आधारभूमि है।

🌹 3. भावविशुद्धि– क्षमापना से विपरित भाव- क्रोध,वैर, कटुता, ईर्ष्या आदि समाप्त होते है और शुद्ध भाव सहिष्णुता, तितिक्षा, आत्मसंतोष, उदारता, करूणा, स्नेह, दया आदि उद्भूत होते है. क्रोध का वैकारिक विभाव हटते ही क्षमा का शुद्ध भाव अस्तित्व में आ जाता है।

🌿 4. निर्भयता– क्रोध, बैर, ईर्ष्या और प्रतिशोध में जीते हुए व्यक्ति भयग्रस्त ही रहता है. किंतु क्रोध निग्रह के बाद सहिष्णुता और क्षमाशीलता से व्यक्ति निर्भय हो जाता है. स्वयं तो अभय होता ही है साथ ही अपने सम्पर्क में आने वाले समस्त सत्व भूत प्राणियों और लोगों को अभय प्रदान करता है।

🌹 5. द्विपक्षीय शुभ आत्म परिणाम– क्रोध शमन और क्षमाभाव के संधान से द्विपक्षीय शुभ आत्मपरिणाम होते है. क्षमा से सामने वाला व्यक्ति भी निर्वेरता प्राप्त कर मैत्रीभाव का अनुभव करता है. प्रतिक्रिया में स्वयं भी क्षमा प्रदान कर हल्का महसुस करते हुए निर्भय महसुस करता है. क्षमायाचक साहसपूर्वक क्षमा करके अपने हृदय में निर्मलता, निश्चिंतता, निर्भयता और सहृदयता अनुभव करता है. अतः क्षमा करने वाले और प्राप्त करने वाले दोनो पक्षों को सौहार्द युक्त शांति का भाव स्थापित होता है।

🔴 क्षमाभाव मानवता के लिए वरदान है. जगत में शांति सौहार्द सहिष्णुता सहनशीलता और समता को प्रसारित करने का अमोघ उपाय है।

मंगलवार, 24 मई 2016

👉 आत्मचिंतन के क्षण 24 May 2016


🔵 आध्यात्म्कि जीवन अपनाने का अर्थ है-असत् से सत् की ओर जाना। प्रेम और न्याय का आदर करना। निकृष्ट जीवन से उत्कृष्ट जीवन की ओर बढ़ना। इस प्रकार का आध्यात्मिक जीवन अपनाये बिना मनुष्य वास्तविक सुख-शान्ति नहीं पा सकता।

🔴 काम को कल के लिए टालते रहना और आज का दिन आलस्य में बिताना एक बहुत बड़ी भूल है। कई बार तो वह कल कभी आती ही नहीं। रोज कल करने की आदत पड़ जाती है और कितने ही ऐसे महत्त्वपूर्ण कार्य उपेक्षा के गर्त में पड़े रह जाते हैं, जो यदि नियत समय पर आलस्य छोड़कर कर लिये जाते तो पूरे ही हो गये होते।

🔵 सत्य की उपेक्षा और प्रेम की अवहेलना करके छल-कपट और दम्भ के बल पर कोई कितना ही बड़ा क्यों न बन जाये, किन्तु उसका वह बड़प्पन एक विडम्बना के अतिरिक्त और कुछ भी न होगा।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गायत्री उपासना सम्बन्धी शंकाएँ एवं उनका समाधान (भाग 7)


🔵 इस मन्त्र समुच्चय के साथ जुड़े हुए अक्षरों में से प्रत्येक में अति महत्वपूर्ण तथ्यों का समावेश है। बीज में समूचे वृक्ष की सत्ता एवं सम्भावना सन्निहित रहती है। शुक्राणु में पैतृक विशेषताओं समेत एक समूचे मनुष्य की सत्ता का अस्तित्व समाया होता है। माइक्रो फिल्म के एक छोटे से फीते में विशालकाय ग्रन्थ की झाँकी देखी जा सकती है। ठीक इसी प्रकार गायत्री मन्त्र के चौबीस अक्षरों में ज्ञान और विज्ञान की दोनों धाराओं का समान रूप से समावेश है। अध्यात्म दर्शन की शाखा- प्रशाखाओं में बँटा समूचा विज्ञान इन अक्षरों में पढ़ा जा सकता है। यदि इस समग्र तत्वदर्शन को ध्यान में रखते हुए उपासना की जाती है तो चिन्तन और कर्म में स्वभावतः श्रेष्ठता का समावेश होना ही चाहिए। यदि मन्त्र जाप के पूर्व ही उसे ‘इफ’ और ‘बट’ की आशंकाओं के जाल में उलझा दिया गया तो सारा प्रयोजन ही गड़बड़ा जाता है।

🔴 विज्ञान की समस्त उपलब्धियाँ स्तुत्य हैं, पर यदि किसी एक बात ने वस्तुस्थिति को असमंजस में डाला है तो वह है “कुतर्क”। तर्क को तो वस्तुतः ऋषि माना गया है एवं तथ्यों, प्रमाणों के साथ उसकी आर्ष ग्रन्थों में अभ्यर्थना की गयी है। तर्क सम्मत प्रतिपादनों के साथ श्रद्धा का समुचित समावेश होने पर जब मनोयोगपूर्वक कोई कार्य किया जाता है तो आत्मिक प्रगति सुनिश्चित है। लेकिन असमंजस ग्रस्त मनःस्थिति में किया गया पुरुषार्थ तो किसी भी क्षेत्र प्रगति नहीं दिखा सकता। सम्भवतः जनसाधारण की इसी कठिनाई को ध्यान में रखते हुए तत्वदर्शी मनीषियों ने यह निर्देश किया था कि उपासना विधान के सम्बन्ध में एक विज्ञ मार्गदर्शक अवश्य होना चाहिए। 

🔵 अनुभव ज्ञान रहित मार्गदर्शक के स्थान पर आप्त निष्कर्षों के आधार पर निर्धारित अनुशासनों को ग्रहण कर लेना अधिक श्रेयस्कर है। मार्गदर्शक की खोज-बीन में जल्दी भी न की जाय और स्वयं का समुचित समाधान पहले कर लिया जाय, यही उचित है। हिन्दू धर्म में की गयी खींचतान और मध्यकालीन मनमानियों ने परस्पर विरोधी मतभेदों को अधिक जन्म दिया है। इन सबको सुन, समझकर उचित-अनुचित के चयन की बात यदि सोची जाएगी तो शंकाएँ इतनी अधिक होंगी कि उसका समाधान तो दूर, स्वयं को भ्रम जंजाल से निकालना भी भारी पड़ जाएगा। ऐसी स्थिति में विवेक यही कहता है कि किसी प्रकार का कोई दुराग्रह न रखकर श्रेष्ठता को स्वीकारा जाय और श्रद्धा को मान्यता देते हुए मनःस्थिति साफ रखी जाय।


🌹 क्रमशः जारी 
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
🌹 अखण्ड ज्योति जुलाई पृष्ठ 47

सोमवार, 23 मई 2016

👉 गायत्री उपासना सम्बन्धी शंकाएँ एवं उनका समाधान (भाग 6)

🔵 किसी भी कार्य को उपयुक्त विधि-विधान के साथ किया जाय, तो यह उत्तम ही है। इसमें शोभा भी है, सफलता की सम्भावनाएँ भी हैं। चूक से यदि अपेक्षित लाभ नहीं मिलता तो किसी प्रकार के विपरीत प्रतिफल की या उल्टा- अशुभ होने की कोई आशंका नहीं है। पूजा-उपासना कृत्यों पर, विशेषकर गायत्री उपासना पर भी यह बात लागू होती है। भगवान सदैव सत्कर्मों का सत्परिणाम देने वाली सन्तुलित विधि-व्यवस्था को ही कहा जाता रहा है। दुष्परिणाम तो दुष्कृतों के निकलते हैं। यदि उपासना में भी चिन्तन और कृत्य को भ्रष्ट और बाह्योपचार को प्रधानता दी जाती रही तो प्रतिफल उस चिन्तन की दुष्टता के ही मिलेंगे। उन्हें बाह्योपचारों से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। इन्हीं उपचारों में मुँह से जप लेना, जल्दी-जल्दी या उँघते-उँघते माला घुमा लेना, किसी तरह संख्या पूरी कर लेना, मात्र कृत्य तक ही सीमित रहना भी आता है। इतना अन्तर तो सभी को समझना चाहिए और तथ्यों को भली-भाँति हृदयंगम करना चाहिए। उपासना यदि लाभ न दे तो नुकसान भी कभी नहीं पहुँचाती।

🔴 गीता में भगवान ने कहा है-
“नेहाभिक्रम नाशोस्ति प्रत्ययवयो न विद्यते।
स्वल्प मप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो मयात्।”
(40, अध्याय 2 गीता)
अर्थात्- “इस मार्ग (भक्ति उपासना) पर कदम बढ़ाने वाले का भी पथ अवरुद्ध नहीं होता। उल्टा परिणाम भी नहीं निकलता। थोड़ा-सा प्रयत्न करने पर भी भय से त्राण ही मिलता है।”

🔵 वस्तुतः गायत्री के तीन पक्ष हैं। एक उपासनात्मक कर्मकाण्ड। दूसरा- धर्मधारणा का अनुशासन। तीसरा उत्कृष्टता का पक्षधर तत्व दर्शन। इन तीनों ही क्षेत्रों का अपना-अपना महत्व है। उपासनात्मक कर्मकाण्डों से शरीर और मनःक्षेत्र में सन्निहित दिव्य शक्तियों को उभारा जाता है। इस मन्त्र में सार्वभौम धर्म के सभी तथ्य विद्यमान हैं। इसे संसार का सबसे छोटा किन्तु समग्र धर्मशास्त्र कहा जा सकता है। गायत्री के शब्दों और अक्षरों में वे संकेत भरे पड़े हैं जो दृष्टिकोण और व्यवहार में उदार शालीनता का समावेश कर सकें।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति जुलाई पृष्ठ 47
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1983/July.47

🌞 शिष्य संजीवनी (भाग 56) :-- 👉 अन्तरात्मा का सम्मान करना सीखें

🔵 यह सूत्र पिछले सभी सूत्रों के मर्म को अपने में समेटे हुए है। जो कुछ भी पहले कहा गया उसका सार इसमें है। जो शिष्य होना चाहता है, उसके लिए पहली एवं अनिवार्य योग्यता है कि वह अन्तरात्मा का सम्मान करना सीखे। शब्द के रूप में ‘अन्तरात्मा’ का परिचय सभी को है। दिन में कई बार इसे कईयों के मुख से कहा जाता है। परन्तु इसके अर्थ एवं भाव से प्रायः सभी अनजान बने रहते हैं। कई बार तो जानबूझ कर इससे अनजान बनने की, इसे अनदेखा करने की कोशिश की जाती है। रोजमर्रा की जिन्दगी में यदि सबसे ज्यादा किसी की उपेक्षा होती है, तो अन्तरात्मा की। जबकि यही हम सबके जीवन का सार है। भगवान् सनातन एवं शाश्वत है। हमारे व्यक्तित्व का आधार है। जिन्दगी की सभी पवित्र शक्तियों का उद्गम स्रोत है।
    
🔴 इन्द्रिय लालसाओं को पूरा करने का लालच हमें अन्तरात्मा के सच से दूर रखता है। अहं को प्रतिष्ठित करने के फेर में हम इसे बार- बार ठुकराते हैं। मन के द्वन्द्व, सन्देह, ईर्ष्या आदि कुभाव हमें पल- पल इससे दूर करते हैं। अनगिनत अर्थहीन कामों के चक्रव्यूह में फँसकर अन्तरात्मा का अर्थ दम तोड़ देता है। इसके अर्थ को जानने के लिए, इसके स्वरों को सुनने के लिए हमें अपनी जीवन शैली बदलनी पड़ेगी। जो शिष्य होना चाहता है, जो इसकी डगर पर पहले से चल रहे हैं, उन सभी का यह अनिवार्य दायित्व है। उनके जीवन में कहीं कुछ भी अर्थहीन नहीं होना चाहिए। न तो अर्थहीन कर्म रहे और न अर्थहीन विचार और न ही अर्थहीन भावनाएँ।
  
🔵 जब हमारे कर्म, विचार व भाव कलुष की कालिमा से मुक्त होता है तो हमें अन्तरात्मा का स्पर्श मिलता है। अन्तर्हृदय की वाणी सुनायी देती है। यह प्रक्रिया हमारे मुरझाए जीवन में नयी चेतना भरती है। हमारे अंधेरेपन में नया प्रकाश उड़ेलती है। यह अनुभव बड़ा अनूठा है। हालांकि कई बार इस बारे में भी भ्रमों की सृष्टि हो जाती है। अनेकों लोग अपने मन की उधेड़बुन, उलझन एवं मानसिक कल्पनाओं को ही अन्तरात्मा की वाणी मान लेते हैं, यह गलत है। ऐसा होना सम्भव भी नहीं है। सच यही है कि जीवन का ढंग बदले बिना अन्तरात्मा का सम्मान किए बिना अन्तरात्मा की वाणी सुनायी नहीं देती।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 डॉ. प्रणव पण्डया
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Devo/antar

👉 क्षुद्र हम, क्षुद्रतम हमारी इच्छाएँ (भाग 10) 23 May 2016

👉 गलत मार्ग पर चलने की परिणति 
🔴 रामायण में भी यही बात आती है कि आदमी बहुत कमजोर होता है। आदमी का रूहानी बल, उसका चरित्र, उसकी महानता और आत्मा कमजोर हो जाये, तो आदमी बहुत कमजोर हो जाता है। रावण बहुत ही बलवान था। काल को उसने अपनी पाटी से बाँध रखा था। वह इतना जबरदस्त था कि उसने सब देवताओं को पकड़ लिया था। सोने की लंका बनाई। समुद्र पर काबू पाया, लेकिन एक समय रावण बहुत ही कमजोर हो गया और बहुत ही दुबला हो गया। बहुत ही कमजोर हो गया। कब? जब कि वह सीता जी का हरण करने को गया। सीताजी का हरण करने को बेचारे को बहुत ढोंग रचाने पड़े। भिखारी का रूप बनाना पड़ा। रावण भिखारी क्यों बना? रावण के दरवाजे पर तो अनेक भिखारी पड़े रहते थे। उसे क्यों बनना पड़ा और यह भी इधर- उधर देखकर के, कि कोई मुझे देख तो नहीं रहा? इस तरीके से रावण चला। रावण की दशा बहुत ही दयनीय थी। क्यों? क्योंकि उसने गलत रास्ते पर कदम रखने शुरू किये थे-

‘जाकें डर सुर असुर डेराहीं। निसि न नींद दिन अन्न न खाहीं।’
सो दससीस स्वान की नाईं। इत उत चितइ चला भड़िहाईं॥
इमि कुपंथ पग देत खगेसा। रह न तेज तन बुधि बल लेसा॥

अर्थात् व्यक्ति यदि गलत रास्ते पर कदम उठाना शुरू कर देता है, तो उसका तेज, बल और बुद्धि- सारे के सारे सद्गुण नष्ट हो जाते हैं- इनका सफाया हो जाता है।

👉 हम तो लुट गये 
🔵 मित्रो! हमारे जीवन की महानतम भूल यही है कि हमको जिस काम के लिए जीवन मिला था, ऐसा उज्ज्वल जीवन जीने के लिए मिला था, उसके बारे में हम बेखबर होते हुए चले गए। हमने वह सारी की सारी चीजें भुला दीं, जिसे भगवान् ने हमको जन्म के समय सौंपी थीं। हम छोटी- छोटी चीजों में उलझ गये और हमारे जीवन का जो महत्त्व और जो लाभ मिलना चाहिए था, वह न मिल सका। हम दुनिया में आकर के लुट गये, बरबाद हो गये। भगवान् के यहाँ से हम कितनी बड़ी दौलत लेकर के आये थे। अपरिमित शक्तियों के भण्डार बनकर के हम आये थे। हमारी आँखों में सूरज, चाँद थे। हमारे सारे शरीर में सारे के सारे देवताओं का निवास था। शक्ति की देवी का हमारे शरीर में निवास है। गणेश जी का निवास हमारे मस्तिष्क में है और सरस्वती का निवास हमारी जिह्वा पर है। हमारे हृदय में चार मुख वाले ब्रह्माजी, नाभि में शंकर भगवान्- इन सारे के सारे देवताओं का निवास हमारे शरीर में है। देवताओं के निवास से भरा हुआ ऐसा शरीर हमको मिला, लेकिन इस देवताओं से भरे हुए शरीर का जो लाभ हमको उठाना चाहिए था, जो फल उसका लेना चाहिए था, हम वह फल लेने से वंचित रह गए। हमारी यह छोटी सी भूल जीवन के उद्देश्य को भूला देने के सम्बन्ध में हुई।

👉 गलत सोच बैठी रही मन में
🔴 जीवन के उद्देश्य के बारे में हमको यही याद बनी रही, जो कि हमारे मुहल्ले वालों और पड़ोसियों ने कहा। उन्होंने कहा कि मनुष्य खाने- पीने के लिए पैदा हुआ है और मनुष्य कुछ चीजें इकट्ठी करने के लिए पैदा हुआ है। मनुष्य इंद्रियों के लाभ और इंद्रियों की सुविधाएँ इकट्ठी करने के लिए पैदा हुआ है और मनुष्य नाम और यश कमाने के लिए पैदा हुआ है। मनुष्य अपना बड़प्पन, अपना गौरव, अपना आतंक दूसरे लोगों के ऊपर जमाने के लिए पैदा हुआ है। मुहल्ले वालों ने हमसे यही कहा, पड़ोसियों ने हमसे यही कहा और रिश्तेदारों ने हमसे यही बात कही। यह बातें हमारे दिमाग के ऊपर हावी होती गयीं और पूरी तरह सवार हो गयीं। हमने उसी बात को सही मान लिया और सारी जिंदगी को उसी ढंग से खर्च करना शुरू कर दिया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/guru3/shudrahumshurdtamhum.3

👉 आत्मचिंतन के क्षण 23 May 2016


🔵 जो उन्नति की ओर बढ़ने का प्रयत्न नहीं करेगा, वह सपतन की ओर फिसलेगा। यह स्वाभाविक क्रम है। इस संसार में मनुष्य जीवन की दो ही गतिया हैं-उत्थान अथवा पतन।  तीसरी कोई भी माध्यमिक गति नहीं है। मनुष्य उन्नति की ओर न बढ़ेगा तो समय उसे पतन के गर्त में गिरा देगा।

🔴 हम अपने आपको प्यार करें, ताकि ईश्वर से प्यार कर सकने योग्य बन सकें। हम अपने कर्त्तव्यों का पालन करें, ताकि ईश्वर के निकट बैठ सकने की पात्रता प्राप्त कर सके। जिसने अपने अंतःकरण को प्यार से ओतप्रोत कर लिया, जिसके चिंतन और कर्तृत्व में प्यार बिखरा पड़ता है, ईश्वर का प्यार उसी को मिलेगा।

🔵 केवल राम-नाम लेने से आत्मिक उद्देश्य पूरे हो सकते हैं, इस भ्रान्त धारणा को मन में से हटा देना चाहिए। इतना सस्ता आत्म कल्याण का मार्ग नहीं हो सकता। पूजा उचित और आवश्यक है, पर उसकी सफलता एवं सार्थकता तभी संभव है, जब जीवनक्रम भी उत्कृष्ट स्तर का हो। अन्यथा तोता रटंत किसी का कुछ हित साधन नहीं कर सकती।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 ध्यान की साधना और मन की दौड़

 
🔵 एक व्यक्ति ने किसी साधु से कहा, “मेरी पत्नी धर्म-साधना-आराधना में बिलकुल ध्यान नहीं देती। यदि आप उसे थोड़ा बोध दें तो उसका मन भी धर्म-ध्यान में रत हो।”

🔴 साधु बोला, “ठीक है।””

🔵 अगले दिन प्रातः ही साधु उस व्यक्ति के घर गया। वह व्यक्ति वहाँ नजर नहीं आया तो  साफ सफाई में व्यस्त उसकी पत्नी से साधु ने उसके बारे में पूछा। पत्नी ने कहा, “वे जूते वाले की दुकान पर गए हैं।”

🔴 पति अन्दर के पूजाघर में माला फेरते हुए ध्यान कर रहा था। उसने पत्नी की बात सुनी। उससे यह झूठ सहा नहीं गया। त्वरित बाहर आकर बोला, “तुम झूठ क्यों बोल रही हो, मैं पूजाघर में था और तुम्हे पता भी था।””

🔵 साधु हैरान हो गया। पत्नी ने कहा- “आप जूते वाले की दुकान पर ही थे, आपका शरीर पूजाघर में, माला हाथ में किन्तु मन से जूते वाले के साथ बहस कर रहे थे।”

🔴 पति को होश आया। पत्नी ठीक कह रही थी। माला फेरते-फेरते वह सचमुच जूते वाले की दुकान पर ही चला गया था।  कल ही खरीदे जूते क्षति वाले थे, खराब खामी वाले जूते देने के लिए, जूते वाले को क्या क्या सुनाना है वही सोच रहा था। और उसी बात पर मन ही मन जूते वाले से बहस कर रहा था।

🔵 पत्नी जानती थी उनका ध्यान कितना मग्न रहता है। वस्तुतः रात को ही वह नये जूतों में खामी की शिकायत कर रहा था, मन अशान्त व असन्तुष्ट था। प्रातः सबसे पहले जूते बदलवा देने की बेसब्री उनके व्यवहार से ही प्रकट हो रही थी, जो उसकी पत्नी की नजर से नहीं छुप सकी थी।

🔴 साधु समझ गया, पत्नी की साधना गजब की थी और ध्यान के महत्व को उसने आत्मसात कर लिया था। निरीक्षण में भी एकाग्र ध्यान की आवश्यकता होती है। पति की त्रृटि इंगित कर उसे एक सार्थक सीख देने का प्रयास किया था।

🔵 धर्म-ध्यान का मात्र दिखावा निर्थक है, यथार्थ में तो मन को ध्यान में पिरोना होता है। असल में वही ध्यान साधना बनता है। यदि मन के घोड़े बेलगाम हो तब मात्र शरीर को एक खूँटे से बांधे रखने का भी क्या औचित्य?

रविवार, 22 मई 2016

👉 गायत्री उपासना सम्बन्धी शंकाएँ एवं उनका समाधान (भाग 5)


🔵 बहुपत्नी प्रथा चलते हुए यह आवश्यक हो गया कि इसकी प्रतिक्रिया से नारी को भी तनकर खड़े न होने देने के लिए धार्मिक मोर्चे पर मनोवैज्ञानिक दीवार खड़ी की जाय और उन्हें अपनी विवशता को भगवद् प्रदत्त या धर्मानुकूल मानने के लिए बाधित किया जाय। सती प्रथा- पर्दा प्रथा- जैसे प्रचलन नारी को अपनी विवशता- नियति प्रदत्त मानने के लिये स्वीकार करने हेतु कुचक्र भर थे। इसी सिलसिले में धार्मिक अधिकारों से उन शोषित वर्गों को वंचित करने की बात कही जाने लगी। शस्त्रों में भी जहाँ-तहाँ ये अनैतिक प्रतिपादन ठूँस दिये गए और भारतीय संस्कृति की मूलाधार को उलट देने वाले प्रतिपादन चल पड़े। धार्मिक कृत्यों से वंचित रखने की बात भी उसी सामन्ती अन्धकार युग का प्रचलन- आधुनिक संस्करण भर है। वस्तुतः नर-नारी के बीच शास्त्र परम्परा के अनुसार कहीं राई-रत्ती भर भी अन्तर नहीं है।

🔴 प्राचीन काल में वेद-ऋचाओं की दृष्टा प्रतिपादनकर्त्ता ऋषियों की तरह ऋषिकाएँ भी हुई हैं। गायत्री वेदमन्त्रों का सिरमौर है। स्त्री, शूद्रों को वंचित करने के सिलसिले में गायत्री का वेदमन्त्र होने के कारण प्रतिबन्ध लगाया जाता है, जिसका किसी तर्क, तथ्य, न्याय, औचित्य की कसौटी पर कसने वाला कोई भी विज्ञजन समर्थन नहीं कर सकता।

🔵 गायत्री नारी रूप है। माता से पुत्रियों को कैसे दूर किया जा सकता है। बेटे को दूध पिलायें और बेटी को कचरे में फेंक दें, ऐसे निष्ठुर तो मात्र पिशाच ही होते हैं। गायत्री माता का ऐसा पिशाचिनी स्वरूप नहीं हो सकता। नर को नारी के क्षेत्र में प्रवेश से रोकने का मर्यादा के नाते कोई तुक भी हो सकता है पर नारी-नारी के क्षेत्र में प्रवेश न कर सके इसका तो लोक व्यवहार की दृष्टि से भी कोई औचित्य नहीं है। इस शंका का सर्वथा निर्मूल कर नर और नारी समान रूप से इसकी उपासना करते रह सकते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति जून 1983 पृष्ठ 48
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1983/June.48

शनिवार, 21 मई 2016

🌞 शिष्य संजीवनी (भाग 55) :-- 👉 अन्तरात्मा का सम्मान करना सीखें

🔵 शिष्य संजीवनी के सूत्र शिष्यों को जीने का ढंग सिखाते हैं। जिन्दगी जीने का अपना यही अलग ढंग शिष्य को आम आदमी से अलग करता है, उसे विशेष बनाता है। आम इन्सान अपनी जिन्दगी को आधे- अधूरे ढंग से जीता है। उसके जीवन में एक बेहोशी छायी रहती है। अहंता की अकड़ हर वक्त उसे घेरे रहती है। लेकिन एक सच्चा शिष्य इस घेरे से हमेशा मुक्त रहता है। वह हर पल- हर क्षण सिखना चाहता है। सिखने के लिए वह झुकना जानता है। इस झुकने में उसकी अहंता कभी भी बाधक नहीं बनती। उसके जीवन में ऐसा इसलिए होता है- क्योंकि उसे अपनी अन्तरात्मा का सम्मान करने की कला मालूम है। जबकि औसत आदमी अपनी इन्द्रियों को तृप्त करने में, अहंता को सम्मानित करने में जुटा रहता है। अन्तरात्मा का सच तो उसे पता ही नहीं होता।
    
🔴 जबकि शिष्यत्व की समूची साधना अन्तरात्मा के बोध एवं इसके सम्मान पर टिकी हुई है। जो इस साधना के शिखर पर पहुँचे हैं, उन सभी का निष्कर्ष यही रहा है- अपनी अन्तरात्मा का पूर्ण रूप से सम्मान करना सीखो। क्योंकि तुम्हारे हृदय के द्वारा ही वह उजाला मिलता है, जो जीवन को आलोकित कर सकता है। और उसे तुम्हारी आँखों के सामने स्पष्ट करता है। ध्यान रहे, हमेशा ही अपने हृदय को समझने में भूल होती है। इसका कारण केवल इतना है कि हम हमेशा बाहर उलझे- फँसे रहते हैं। जब तक बाहरी उलझने कम नहीं होती, जब तक व्यक्तित्व के बन्धन ढीले नहीं होते, तब तक आत्मा का गहन रहस्य खुलना प्रारम्भ नहीं होता।
  
🔵 जब तक तुम उससे अलग एक ओर खड़े नहीं होते। तब तक वह अपने को तुम पर प्रकट नहीं करेगा। तभी तुम उसे समझ सकोगे और उसका पथ प्रदर्शन कर सकोगे, उससे पहले नहीं। तभी तुम उसकी समस्त शक्तियों का उपयोग कर सकोगे। और उन्हें किसी योग्य सेवा में लगा सकोगे। उससे पहले यह सम्भव नहीं है। जब तक तुम्हें स्वयं कुछ निश्चय नहीं हो जाता, तुम्हारे लिए दूसरों की सहायता करना असम्भव है। जब तुमको पहले कहे गए सभी सूत्रों का ज्ञान हो चुकेगा, और तुम अपनी शक्तियों को विकसित एवं अपनी इन्द्रियों को विषय- भोग की लालसाओं से मुक्त करोगे तभी अन्तरात्मा के परम ज्ञान मन्दिर में प्रवेश मिलेगा। और तभी तुम्हें ज्ञात होगा कि तुम्हारे भीतर एक स्रोत है। जहाँ से वह वाणी मुखरित होती है, जिसमें जीवन के सभी रहस्यार्थ छुपे हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 डॉ. प्रणव पण्डया
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Devo/antar

👉 क्षुद्र हम, क्षुद्रतम हमारी इच्छाएँ (भाग 9)


👉 वह तो तेरे पास रे
🔴 मित्रो! मैं आपको जगह बता दूँ, तो आप पहुँचेंगे? नहीं पहुँचेंगे। पहुँचना भी मत, अगर वहाँ पहुँच जायेंगे, तो भगवान् जी बहुत नाराज होंगे। जहाँ भगवान् जी रहते हैं, वह जगह मैं बताये देता हूँ। आप जब चाहें, उन्हें पा सकते हैं। आप जब चाहें, उनसे मिल सकते हैं और जब चाहें तो बात भी हो सकती है। भगवान् जी का द्वार खुला हुआ है, पर है ऐसा कि भगवान् दिखाई नहीं पड़ता वह जगह ऐसी है, जो आदमी की पकड़ में नहीं आती है और पता भी नहीं चलता है। आपको बताऊँ, कहाँ है वह जगह? अच्छा! आपको बताये देता हूँ, आप किसी से मत कहना, नहीं तो और लोग पहुँच जायेंगे। वह जगह है इन्सान का दिल- हृदय। इन्सान के हृदय में- दिल में भगवान् बैठा हुआ है। वह कहीं बाहर नहीं है। जब कभी भी किसी को भी भगवान् मिला है, अपने हृदय के भीतर मिला है। वह बाहर दुनिया में नहीं है वह। बाहर दुनिया में केवल प्रकृति है, पंचभूत हैं, जड़ पदार्थ हैं। बस, और कुछ नहीं। बाहर की दुनिया में शान्ति नहीं है। वस्तुओं में शान्ति नहीं है? वस्तुओं में कोई शान्ति नहीं है। पदार्थों में कोई शान्ति नहीं है।

👉 शान्ति वहाँ नहीं है
🔵 मित्रो! सुख- सुविधाओं में शान्ति है? नहीं, सुख- सुविधाओं में कोई शान्ति नहीं है। सुख- सुविधाओं में शान्ति रही होती, तो रावण ने शान्ति प्राप्त कर ली होती। क्यों? क्योंकि उसके पास बहुत सुविधाएँ थीं। उसके पास सोने के अम्बार लगे हुए थे और उसका मकान सोने का बना हुआ था। संतान? संतान के द्वारा अगर दुनिया में शान्ति मिली होती, तो रावण के एक लाख पूत और सवा लाख नाती अर्थात्, सवा दो लाख थे। सवा दो लाख संतान पाने के बाद में रावण जरूर सुखी हो गया होता। मित्रो! जिन चीजों के बारे में लोगों का यह सवाल है कि यह चीजें हमको मिल जायें, तो हम सुखी बन सकते हैं। वह वास्तव में ईमानदारी की बात है कि कोई सुख दे नहीं सकते। विद्या हमको मिल जाये, हम एम.ए. पास हो जायें, फर्स्ट डिवीजन में पास हो जायें, पी- एच.डी. हो जायें, नौकरी मिल जाये और हम बड़े विद्वान हो जायें, तो हम दुनिया में शान्ति पा सकते हैं? यह नामुमकिन है।

👉 विद्वान पर खोखला व्यक्ति
🔴 साथियो! रावण बहुत विद्वान था। ज्यादा पढ़ा हुआ था। उसके पास कोई कमी नहीं थी। कोई आदमी बलवान हो जाये, ताकतवर हो जाये, तो उसे शान्ति मिल जायेगी? सुविधा मिल जाये, तो चैन मिल जायेगा? नहीं, न शान्ति मिल सकती और न चैन मिल सकता है। रावण बहुत ताकतवर था, बहुत बलवान था और उसकी कलाइयों में बहुत बल था। वह बड़ा संपन्न था। उसके पास न विद्या की कमी थी, न पैसे की कमी थी, न ताकत की कमी थी, न पुरुषार्थ की कमी थी। किसी चीज की कमी नहीं थी। पर बेचारा शान्ति नहीं पा सका। और जब मरने का समय आया, तब उसके शरीर में हजारों छेद बने हुए विद्यमान थे। जब लक्ष्मण जी ने रामचंद्र जी से यह पूछा कि महाराज! आपने जब रावण को मारा था, तब आपने एक ही तीर चलाया था न? हाँ, हमने तो एक ही तीर चलाया था। तो रावण के शरीर में एक ही निशान होना चाहिए, एक ही घाव होना चाहिए, लेकिन उसकी जो लाश पड़ी हुई है, उसमें तो जहाँ तहाँ हजारों छेद हैं। यह कैसे हुआ? रावण को इतने तीर किसने मारे? इतने छेद किसने कर दिए? इतने सुराख इसमें कैसे हो गए? किस तरीके से इन सूराखों से खून बह रहा है। आपने तो एक ही तीर मारा था? हाँ, हमने एक ही तीर मारा था। तो ये हजारों तीर किस तरीके से लगे? रामचंद्र जी ने बताया कि ये जो हजारों छेद हैं, रावण के पाप हैं, रावण के गुनाह हैं। रावण की कमजोरियाँ, रावण का घटियापन एवं रावण का कमीनापन है, जिसने कि उसके सारे शरीर में छेद कर डाले और उसका सारे का सारा व्यक्तित्व खराब कर दिया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/guru3/shudrahumshurdtamhum.3

👉 आत्मचिंतन के क्षण 21 May 2016


🔵 मेरे कारण दूसरों का भला हुआ-यह सोचना मूर्खता है। हमारे बिना संसार का कोई काम अटका न रहेगा। हमारे पैदा होने से पहले संसार का सब काम ठीक ठीक चल रहा था और हमारे बाद भी वैसा चलता रहेगा। परमात्मा उतना गरीब नहीं है कि हमारी मदद के बिना सृष्टि का काम न चला सके।

🔴 हम प्रथकतावादी न बनें। व्यक्तिगत बड़प्पन के फेर में न पड़ें। अपनी अलग से प्रतिभा चमकाने का झंझट मोल न लें। समूह के अंग बनकर रहें। सबकी उन्नति में अपनी उन्नति देखें और सबके सुख में अपना सुख खोजें। यह मानकर चलें कि उपलब्ध प्रतिभा सम्पदा एवं गरिमा समाज का अनुदान है और उसका श्रेष्ठतम उपयोग समाज को सज्जनतापूर्वक लौटा देने में ही है।

🔵 गिरे हुओं को उठाना, पिछड़े हुओं को आगे बढ़ाना, भूले को राह बताना और जो अशान्त हो रहा है उसे शान्तिदायक स्थान पर पहुँचा देना यह वस्तुतः ईश्वर की सेवा ही है। जब हम दुःख और दरिद्र को देखकर व्यथित होते हें और मलीनता को स्वच्छता में बदलने के लिए बढ़ते हैं तो समझना चाहिए यह कृत्य ईश्वर के लिए-उसकी प्रसन्नता के लिए ही किये जा रहे हैं।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 बुद्ध पूर्णिमा के पावन अवसर पर सभी को शुभकामनाएं।


🔴 भगवान बुद्ध का जन्म, ज्ञान प्राप्ति और महापरिनिर्वाण ये तीनों एक ही दिन अर्थात वैशाख पूर्णिमा के दिन ही हुए थे। इसी दिन भगवान बुद्ध को बुद्धत्व की प्राप्ति हुई थी।

🌹 गौतम बुद्ध के सिद्धांत


🔵 सच्चा आत्मबोध प्राप्त कर लेने पर इनका नाम 'बुद्ध' पड़ गया और उन्होंने संसार में उसका प्रचार करके लोगों को कल्याणकारी धर्म की प्रेरणा देने की इच्छा की। इसलिए गया से चलकर वे काशीपुरी में चलें आए, जो उस समय भी विद्या और धर्म चर्चा का एक प्रमुख स्थान थी। यहाँ सारनाथ नामक स्थान में ठहरकर उन्होंने तपस्या करने वाले व्यक्तियों और अन्य जिज्ञासु लोगों को जो उपदेश दिया उसका वर्णन बोद्ध धर्म ग्रंथों में इस प्रकार मिलता है।

🔴 (१) जन्म दुःखदायी होता है। बुढा़पा दुःखदायी होता है। बीमारी दुःखदायी होती है। मृत्यु दुःखदायी होती है। वेदना, रोना, चित्त की उदासीनता तथा निराशा ये सब दुःखदायी हैं। बुरी चीजों का संबंध भी दुःख देता है। आदमी जो चाहता है उसका न मिलना भी दुःख देता है। संक्षेप में 'लग्न के पाँचों खंड' जन्म, बुढा़पा, रोग, मृत्यु और अभिलाषा की अपूर्णता दुःखदायक है।

 🔵 (२) हे साधुओं! पीडा़ का कारण इसी 'उदार सत्य' में निहित है। कामना- जिससे दुनिया में फिर जन्म होता है, जिसमें इधर- उधर थोडा़ आनंद मिल जाता है- जैसे भोग की कामना, दुनिया में रहने की कामना आदि भी अंत में दुःखदायी होती है।

🔴 (३) हे साधुओं! दुःख को दूर करने का उपाय यही है कि कामना को निरंतर संयमित और कम किया जाए। वास्तविक सुख तब तक नहीं मिल सकता, जब तक कि व्यक्ति कामना से स्वतंत्र न हो जाए अर्थात् अनासक्त भावना से संसार के सब कार्य न करने लगे।

🔵 (४) पीडा़ को दूर करने के आठ उदार सत्य ये हैं- सम्यक् विचार, सम्यक् उद्देश्य, सम्यक् भाषण, सम्यक् कार्य, सम्यक् जीविका, सम्यक् प्रयत्न, सम्यक् चित्त तथा सम्यक् एकाग्रता। सम्यक् का आशय यही है कि- वह बात देश, काल, पात्र के अनुकूल और कल्याणकारी हो।

👉 गायत्री उपासना सम्बन्धी शंकाएँ एवं उनका समाधान (भाग 4)


🔵 साकार उपासना में गायत्री को माता के रूप में प्रतिष्ठित किया जाता है। माता होते हुए भी उसका स्वरूप नवयौवना के रूप में दो कारणों से रखा गया है। एक तो इसलिए कि देवत्व को कभी वार्धक्य नहीं सताता। सतत् उसका यौवन रूपी उभार ही झलकता रहता है। सभी देवताओं की प्रतिमाओं में उन्हें युवा सुदर्शन रूप में ही दर्शाया जाता है। यही बात देवियों का चित्रण करते समय भी ध्यान में रखी जाती है और उन्हें किशोर निरूपित किया जाता है। दूसरा कारण यह है कि युवती के प्रति भी विकार भाव उत्पन्न न होने देने- मातृत्व की परिकल्पना परिपक्व करते चलने के लिये उठती आयु को इस अभ्यास के लिये सर्वोपयुक्त माना गया है। कमलासन पर विराजमान होने का अर्थ है- कोमल, सुगन्धित, उत्फुल्ल कमल पुष्प जैसे विशाल में उसका निवास होने की संगति बिठाना। यही है विभिन्न रूपों में उसकी उपासना का तात्विक दर्शन।

🔴 स्त्रियों को गायत्री का अधिकार है या नहीं, यह आशंका सभी उठाते देखे जाते हैं- धर्माचार्य भी तथा शोषक पुरुष समुदाय भी। वस्तुतः नर और नारी भगवान के दो नेत्र, दो हाथ, दो कान, दो पैर के समान मनुष्य जाति के दो वर्ग हैं। दोनों की स्थिति गाड़ी के दो पहियों की तरह मिल-जुलकर चलने और साथ-साथ सहयोग करने की है। दोनों कर्त्तव्य और अधिकार समान हैं। प्रजनन प्रयोजन को ध्यान में रखते हुए एक का कार्य क्षेत्र परिवार, दूसरे का उपार्जन- उत्तरदायित्व इस रूप में बँट गए हैं। इस पर भी वह कोई विभाजन रेखा नहीं है। सामाजिक, आर्थिक, साहित्य, राजनीति आदि में किसी भी वर्ग पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है। इसी प्रकार धर्म-अध्यात्म क्षेत्र में- साधना-उपासना के क्षेत्र में भी दोनों को स्वभावतः समान अधिकार प्राप्त हैं।

🔵 नर और नारी को- सवर्ण और असवर्ण को ऊंचा-नीचा मानना, एक को अधिकारी- दूसरे को अनधिकारी ठहराने का प्रचलन मध्यकालीन अन्धकार युग की देन है। उसमें समर्थों ने असमर्थों को पैरों तले रौंदने, उनसे मनमाने लाभ उठाने और विरोध की आवाज न उठा सकने के लिए जहाँ डण्डे का उपयोग किया, वहाँ पण्डिताऊ प्रतिपादन भी लालच या भय दिखाकर अपने समर्थन में प्राप्त कर लिये। शूद्रों को- स्त्रियों को नीचा या अनधिकारी ठहराने के पीछे मात्र एक ही दुरभि सन्धि है कि समर्थों को मनमाने लाभ मिलते रहें और किसी विरोध- प्रतिरोध का सामना न करना पड़े।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति जून 1983 पृष्ठ 47
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1983/June.47

शुक्रवार, 20 मई 2016

🌞 शिष्य संजीवनी (भाग 54) :--- 👉 समग्र जीवन का सम्मान करना सीखें

🔵 लेकिन जो जीवन साधना से वंचित हैं, उनकी तो स्थिति ही अलग है। इनका चित्त रुग्ण है, इनका देखने का ढंग पैथालॉजिकल है। ये अपने देखने का ढंग नहीं बदलना चाहते, बस परिस्थिति को बदलने के लिए उत्सुक रहते हैं। इनका रस जीवन की निन्दा में है। ऐसे में खुद के दोषों को समझना बड़ा मुश्किल होता है। यह जो निन्दकों का समूह है, यह अपने और औरों के जीवन को नुकसान तो भारी पहुँचा सकता है, पर परमात्मा की तरफ एक कदम बढ़ने में मदद नहीं कर सकता।
   
🔴 निन्दकों के समूह, गाँव और शहरों की भीड़ में ही नहीं, आश्रमों और मठों में भी होते हैं। बल्कि वहाँ ये थोड़े ज्यादा पहुँच जाते हैं। इनके सिर में अजीब- अजीब दर्द उठते रहते हैं। जैसे कि फलाँ आदमी ऐसा कर रहा है, ढिकाँ औरत ऐसा कर रही है और कुछ नहीं तो इन्हें अपने पड़ोसी की चिंता और चर्चा परेशान करती है। अब इन्हें कौन समझाये कि तुम्हें किसने ठेका दिया सबकी चिंता का? यहीं आश्रम में क्या तुम इसीलिए आये थे। अरे! तुम तो आये थे यहाँ अपने को बदलने को और यहाँ तुम फिक्र में पड़ जाते हो किसी दूसरे को बुरा ठहराने में। ऐसे लोग किसी और को नहीं अपने आप को धोखा देते हैं।
  
🔵 शिष्यत्व की डगर ऐसे वंचनाग्रस्त लोगों के लिए नहीं है। यह तो उनके लिए है, जो हृदय में सृजन की संवेदना सँजोये हैं। जरा देखें तो सही हम अपने चारों तरफ। संवेदनाओं से निर्मित हुआ है सब कुछ। जो हमारी बगल में बैठा है, उसमें भी संवेदना की धड़कन है और जो वृक्ष लगा हुआ है, उसकी भी जीवन धारा प्रवाहित हो रही है। धरती हो या आसमान हर कहीं एक ही जीवन विविध रूपों में प्रकट है। इस व्यापक सत्य को समझकर जो जीता है, वह शिष्यत्व की साधना करने में सक्षम है। इस साधना के नये रहस्य शिष्य संजीवनी के अगले सूत्र में उजागर होंगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 डॉ. प्रणव पण्डया
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Devo/time

👉 क्षुद्र हम, क्षुद्रतम हमारी इच्छाएँ (भाग 8) 20 May 2016


👉 देवर्षि से भेंट
🔴 मित्रो! भगवान् जी ऐसी एकांत जगह तलाश करने के लिए सिर खुजला रहे थे, जहाँ कोई पहुँच न सके। इतनी देर में वीणा बजाते हुए कहीं से नारद जी आ गये। उन्होंने कहा कि महाराज जी! आज आपको क्या हुआ? कोई जुकाम, बुखार हो गया है क्या? भगवान् जी ने कहा- ‘‘नहीं नारद जी! जुकाम- बुखार तो कुछ नहीं हुआ।’’ फिर क्या हुआ? कोई लड़ाई- झगड़ा हुआ? नहीं, कोई लड़ाई- झगड़ा नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि लड़ाई- झगड़ा भी नहीं हुआ, तो फिर किस्सा क्या है? आप दुःखी क्यों बैठे हुए हैं? भगवान् ने कहा कि हम लोगों के पास आये थे और उन्हें कल्याण का रास्ता बताना चाहते थे। उन्हें सुख और शान्ति का मार्ग बताना चाहते थे। उनको स्वर्ग और मुक्ति का आनन्द देना चाहते थे और उनको महामानव बनाना चाहते थे। हम उनको यह बताना चाहते थे कि इन्सान भगवान् का बेटा है और भगवान् के तरीके से उसको दुनिया में शान से रहना चाहिए। भगवान् के पास जो आनन्द है, उसका पूरा- पूरा लाभ उठाना चाहिए।

👉 सही स्थान की तलाश
🔵 भगवान् ने कहा ‘‘नारद जी! हम इनको यही सिखाने के लिए आये थे, लेकिन ये मनुष्य बड़े निकम्मे हैं और बड़े स्वार्थी हैं। ये केवल छोटी- छोटी चीजों के लिए ख्वाहिश करते हैं और बड़ी- बड़ी चीजों के लिए इनका मन नहीं है। मैं इनके पास नहीं रहूँगा। भाग जाऊँगा और इनसे दूर रहूँगा; लेकिन मैं अपने घर नहीं जाना चाहता। नारद जी! मैं ऐसी जगह तलाश करना चाहता हूँ, जहाँ मैं बना भी रहूँ, पृथ्वी पर भी रहूँ और मेरा मनुष्यों से सम्बन्ध भी बना रहे। लेकिन मैं दिखाई भी न पड़ूँ। ऐसी जगह मुझे चाहिए, जो दिखाई न पड़े, समुद्र में गया, तो वहाँ भी लोगों ने पकड़ लिया, यहाँ भी लोगों ने पकड़ लिया। पहाड़ पर गया, तो वहाँ भी लोगों ने पकड़ लिया और जमीन पर था, तो वहाँ भी मुझे पकड़ लिया। अब अगर तुम्हारे दिमाग में हो, तो ऐसी जगह बताओ- जहाँ मैं आराम से छिपा बैठा रहूँ और कोई आदमी चाहे, तो आसानी से वह मुझ तक पहुँच सके। ऐसा भी न हो जाये कि चाहने वाला कोई आदमी पहुँच भी न सके और ऐसा भी न हो कि लोग मुझे आसानी से पकड़ लें और तंग करने लगें। ऐसा स्थान बता दीजिए।’’

👉 आज तक वहीं पर हैं भगवान्
🔴 नारद जी ने कहा- ‘‘वाह! भगवन्! आपको इतना भी नहीं मालूम? इतनी बढ़िया जगह है, मैं अभी आपको बताता हूँ। भगवान् जी को नारद जी ने जगह बता दी और भगवान् जी उस दिन के बाद से आज तक उसी जगह पर विराजमान हैं। न वहाँ से हटे, न वहाँ से चले, बिलकुल वहीं बैठे रहते हैं। जमीन पर रहते हैं और वहाँ आसानी से आदमी पहुँच सकता है और जो भी चाहे प्राप्त कर सकता है। भगवान् से वार्तालाप कर सकता है और भगवान् के पास रहने का बहुत फायदा उठा सकता है। तब से लेकर अब तक भगवान् वहीं बैठे हुए हैं। आप पूछना चाहेंगे गुरु जी! हमें भी बता दीजिये। बता दूँ आपको? नहीं, आप किसी से कहना मत। कहेंगे तो नहीं किसी से? कह देंगे, तो नहीं बताऊँगा। कहना मत। नहीं तो सबको मालूम पड़ जायेगा। वे सब वहीं पहुँच जायेंगे और भगवान् जी बहुत नाराज होंगे। वे कहेंगे कि हमने तो अपने को छिपाकर ऐसी जगह रखा था, जहाँ नारद जी ने हमसे कहा था, उन्होंने कहा था कि कोई आदमी आप तक नहीं आएगा। लोग दुनिया में चक्कर काटते रहेंगे और कोई आप तक पहुँच ही नहीं सकेगा।’’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/guru3/shudrahumshurdtamhum.2

👉 गायत्री उपासना सम्बन्धी शंकाएँ एवं उनका समाधान (भाग 3)


🔵 तन्त्र विधान की कुछ विधियाँ गुप्त रखी गयी हैं। ताकि अनधिकारी लोग उसका दुरुपयोग करके हानिकार परिस्थितियाँ उत्पन्न न करने पाएँ। मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, स्तम्भन जैसे आक्रामक अभिचारों के विधि-विधान तथा तन्त्र को इसी दृष्टि से कीलित या गोपनीय रखा गया है। एक तरह से इन्हें सौम्य साधना का स्वरूप न मानकर इन पर ‘बैन’ लगा दिया गया है ताकि लोग भ्रान्तिवश इनमें भटकने न लगें। वैदिक प्रक्रियाओं में ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं। गायत्री वेदमन्त्र है। उसका नामकरण ही “गाने वाले का त्राण करने वाली” के रूप में हुआ है। फिर उसे मुँह से न बोलने, गुप्त रखने, चुप रहने, कान में कहने जैसा कथन सर्वथा उपहासास्पद है। ऐसा वे लोग कहते हैं जो तन्त्र और वेद में अंतर नहीं समझते। गायत्री मन्त्र का उच्चारण व्यापक विस्तृत होने से उसकी तरंगें वायु मण्डल में फैलती हैं और जहाँ तक वे पहुँचती हैं, वहाँ लाभदायक परिस्थितियाँ ही उत्पन्न करती हैं। उच्चारण न करने पर तो उस लाभ से सभी वंचित रहेंगे।

🔴 क्या गायत्री की उपासना रात्रि में की जा सकती है? इस विषय पर भी भाँति-भाँति के मत व्यक्त किये जाते हैं एवं जन-साधारण को भ्रान्ति के जंजाल में उलझा दिया जाता है। वस्तुतः गायत्री का दाता सूर्य है सूर्य की उपस्थिति में की गयी उपासना का लाभ अधिक माना गया है। किन्तु ऐसा कोई प्रतिबन्ध नहीं कि सविता देवता की अनुपस्थिति में- रात्रि होने के कारण उपासना की ही न जा सकेगी। ब्राह्ममुहूर्त को भी एक प्रकार से रात्रि ही कहा जा सकता है। उसमें तो सभी को जल्दी उठकर उपासना करने और सूर्योदय होने पर सूर्यार्घ देकर उसे समाप्त करने की साधारण विधिव्यवस्था है। वस्तुतः सूर्य न कभी अस्त होता है और न देवता शयन करते हैं। इसलिए रात्रि में उपासना करने में कोई हर्ज नहीं। किसी को बहुत ही सन्देह हो तो मौन, मानसिक जप तो बिना संकोच कर सकता है। मानसिक जप पर तो स्नान, स्थान जैसा भी प्रतिबन्ध नहीं है।

🔵 एक और अहम् प्रश्न है कि गायत्री के साकार एवं निराकार रूपों में से किस-किस प्रकार से उपासना प्रयोजन के लिये प्रयुक्त किया जाय? इसका समाधान मात्र यही है कि जिन्हें निराकार रुचता हो, वे सविता के ‘भर्गः’ स्वरूप का ध्यान करें। सूर्य का तेज- प्रकाशवान स्वरूप उसका प्रतीक है। प्रभातकालीन स्वर्णिम सूर्य को सविता की आकृति माना जाता है। यह मात्र आग का गोला नहीं है। वरन् अध्यात्म की भाषा में ब्रह्म भर्ग से युक्त एवं सचेतन है। उदीयमान सूर्य से तो मात्र उसकी संगति बिठाई जाती है। इसके लिए सूर्य के स्थान पर दीपक को, धूपबत्ती की अथवा गायत्री मन्त्र जिसकी किरणों के साथ जुड़ा हो ऐसे सूर्य चित्र को भी प्रयुक्त कर ध्यान नियोजित किया जा सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति जून 1983 पृष्ठ 46
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1983/June.47

गुरुवार, 19 मई 2016

🌞 शिष्य संजीवनी (भाग 55) :-- 👉 समग्र जीवन का सम्मान करना सीखें

🔵 इसी के साथ तुम्हें मानवीय हृदय में झाँकने की कला सीखनी होगी। हमेशा मानव हृदय से उफनती भाव संवेदनाओं की गंगोत्री में स्नान करने की कोशिश करो। तभी तुम जान पाओगे कि यह जगत् कैसा है और जीवन के रूप कितने विविध हैं। इसे जानने के लिए निष्पक्षता और तटस्थता अपनाओ। बुद्धि को साक्षी बने रहने दो। तभी तुम समझ पाओगे कि न कोई तुम्हारा शत्रु है और न कोई मित्र। सभी समान रूप से तुम्हारे शिक्षक हैं। तुम्हारा शत्रु, तुम्हारे लिए एक रहस्यमय प्रश्र की भाँति है, जिसे तुम्हें हल करना है। एक अनबूझ पहेली की भाँति है, जिसे बूझना है। भले ही इसे हल करने में, बूझने में युगों का समय लग जाये। क्योंकि मानव को समझना तो है ही। तुम्हारा मित्र तुम्हारा ही अंग बन जाता है, तुम्हारे ही विस्तार का एक अंश हो जाता है, जिसे समझना कठिन होता है।’
   
🔴 बड़ी मार्मिक बातें उजागर हुई हैं इस सूत्र में। अगर सार रूप में इस सूत्र को एक पंक्ति में परिभाषित करें तो यही कहना होगा कि जो साधना की डगर पर चलना चाहते हैं वे समग्र जीवन का सम्मान करना सीखें। इसके प्रत्येक हिस्से में महत्त्वपूर्ण संदेश है। हाँ, उसमें भी जिसे हम दुःख कहकर परिभाषित करते हैं और रो- पीटकर पूरे संसार को अपने सिर पर उठा लेते हैं। दरअरसल यदि सच्चाई जाने- परखें तो पता यही चलेगा कि जीवन में दुःख नहीं है। जीवन को देखने के ढंग में दुःख है। यह देखने का ढंग लेकर जो जहाँ भी जायेगा, वही दुःखी होता रहेगा। फिर चाहे वह जगह स्वर्ग ही क्यों न हो।
  
🔵 यही वजह है कि चमड़ा भिगोते जूता गाँठते हुए रैदास परम आनन्दित हो सकते हैं। चरखा कातते हुए कबीर इतने आनन्द विभोर होते हैं कि उनके जीवन में संगीत और काव्य फूटता है। और फिर मिट्टी के बर्तन बनाते- पकाते गोरा कुम्हार, उनके तो आनन्द की कोई सीमा ही नहीं। तो यह आनन्द और इसका स्रोत इनकी परिस्थिति में नहीं, इनकी मनःस्थिति में है। इनके दृष्टिकोण में है, जो कहीं भी आनन्द की सृष्टि करने में सक्षम है। इनके स्वर्गीय दृष्टिकोण में स्वर्ग के निर्माण की क्षमता है और ऐसा केवल इसलिए है, क्योंकि ये समग्र जीवन का सम्मान करना जानते हैं। जीवन का प्रत्येक अंश इनके लिए मूल्यवान् है। फिर भले ही वह कंटकाकीर्ण हो या सुकोमल पुष्पों से सजा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 डॉ. प्रणव पण्डया
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Devo/time

👉 क्षुद्र हम, क्षुद्रतम हमारी इच्छाएँ (भाग 7)


👉 समुद्र में पहुँचे भगवान्
🔴 इस बार भगवान् वहाँ से भागकर समुद्र में जा पहुँचे। और कहा कि देखें अब यहाँ मनुष्य कहाँ से आ जायेंगे? द्वारिका के पास बेट द्वारिका नाम की एक जगह है, बस भगवान् वहाँ जा पहुँचे। वह चारों ओर से समुद्र से घिरा हुआ पड़ा था। चारों ओर समुद्र था और बीच में एक टापू था। बस, भगवान् जी वहाँ बैठ गये और वहीं रहने लगे। उन्होंने कहा कि देखें अब हमारे पास मनुष्य कहाँ से आ जायेगा? अब वह हमको खामख्वाह तंग नहीं करेगा। एक बार उनका मन आया कि अपने घर चलना चाहिए लक्ष्मी जी के पास, पर यह अपना वीक प्वाइंट था, क्योंकि लक्ष्मी जी से यह कह करके आये थे कि हम मनुष्यों के पास रहेंगे। और लक्ष्मी जी ने कह दिया था कि आपको वहाँ नहीं जाना चाहिए। मनुष्य बड़े निकम्मे हो गये हैं और अपने ही धंधे में फँस गये हैं। वे अपने जीवन के लक्ष्य को भूल गये हैं। वे आपकी बात सुनेंगे नहीं। एक बार उन्होंने फिर सोचा कि चलो लक्ष्मी जी के पास चलें, मनुष्यों को छोड़ दें। फिर उन्होंने कहा कि भाई! यह तो बड़े शर्म की बात है और उनके सामने नाक नीची करने से क्या फायदा? यहीं रहना चाहिए। भगवान् जी बेट द्वारिका में रहने लगे।

👉 पशोपेश में भगवान्
🔵 मित्रो! लोगों को जब यह पता चला कि भगवान् जी द्वारिका में निवास करते हैं, तो उन्होंने नावें बना लीं, बोट बना लिए और भाग- भागकर वहीं जा पहुँचे। भगवान् ने कहा- ‘‘अब क्या करना चाहिए? पहाड़ पर वे छोड़ने वाले नहीं, जमीन पर वे छोड़ने वाले नहीं। समुद्र में भागकर आये तो भी इनसे पिण्ड नहीं छूटा। अब क्या करना चाहिए।’’ भगवान् जी बहुत दुःखी हो रहे थे, परेशान हो रहे थे और उनकी आँखों से बहुत आँसू आ रहे थे। उन्होंने कहा- ‘‘भाइयो! घर जाते हैं तो ठिकाना नहीं और इनके पास रहते हैं, तो ठिकाना नहीं। अब क्या करना चाहिए? अपनी कोई जगह बनानी चाहिए, जहाँ हम पृथ्वी पर भी बने रहें और लक्ष्मी जी के सामने बेइज्जती भी न हो। हम जमीन पर भी बने रहें और जो अच्छे मनुष्य हमको पाना चाहें, तो आसानी से पा भी सकें। ऐसी जगह भी न चुनी जाय कि कोई अच्छा मनुष्य चाहता हो कि हमको भगवान् मिल जायँ और हम उसे मिल न सकें। ऐसी जगह कहाँ तलाश करें।’’

👉 विवेक का हो जागरण, तो हो कल्याण
🔴 इससे पूर्व के अंक में आप पढ़ चुके हैं कि साहस और विवेक, पात्रता संवर्धन तथा आत्म चिन्तन, जिसने इन चार पर गंभीरता पूर्वक ध्यान दिया, उसका जीवन बदलता चला गया। जिसने इनकी उपेक्षा की, वह पिछड़ता चला गया। हम गहराई तक प्रवेश करें और ढूँढ़ें अनन्त शक्ति एवं शान्ति के स्रोत को। इस सम्बन्ध में परम पूज्य गुरुदेव ने एक रोचक कथानक सुनाया है जिसका आधा हिस्सा आप पढ़ चुके हैं। भगवान् ज्ञान बाँटने धरती पर आए पर मनोकामनाओं की लिस्ट लिए आदमी उनसे आशीर्वाद माँगने लगा। घबराए वे पहाड़ पर पहुँचे, मनुष्य वहाँ भी चला गया। क्षुद्र मनुष्य समुद्र में भी पहुँच गया, जब उसे पता चला कि अब भगवान् का डेरा वहाँ है। असमंजस में पड़े भगवान् को अब एक ही सहारा था। इस कथानक का व इस व्याख्यान का भी, अब उत्तरार्द्ध आगे पढ़ें।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/guru3/shudrahumshurdtamhum.2

👉 गायत्री उपासना सम्बन्धी शंकाएँ एवं उनका समाधान (भाग 2)


🔵 हर धर्म का एक प्रतीक बीज मन्त्र होता है। इस्लाम में कलमा, ईसाई में वपतिस्मा, जैन धर्म में नमोंकार मन्त्र आदि का प्रचलन है। भारतीय धर्म का आस्था केन्द्र- गायत्री को माना गया है। इसे इसके अर्थ की विशिष्टता- सन्निहित प्रेरणा के कारण विश्व आचार संहिता का प्राण तक माना जा सकता है। वेदों की सार्वभौम शिक्षा लगभग सभी धर्म सम्प्रदायों में भिन्न-भिन्न रूपों में प्रकट हुई है।

🔴 गायत्री रूपी बीज के तने, पल्लव ही वेद शास्त्रों के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं। इसी कारण उसे ‘वेदमाता’ कहा गया है। वेदमाता अर्थात् सद्ज्ञान की गंगोत्री। इसे देवमाता कहा गया है- अर्थात् जनमानस में देवत्व का अभिवर्धन करने वाली। विश्वमाता भी इसे कहते हैं अर्थात् “वसुधैव कुटुम्बकम्” के तत्व दर्शन तथा नीति-निर्धारण का पोषण करने वाली। ये विशेषण इसकी प्रमुखता के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।

🔵 एक अन्य चर्चा इस उपासना के सम्बन्ध में की जाती है कि गायत्री मन्त्र गुप्त है। इसका उच्चारण निषिद्ध है। यह प्रचार वर्ण के नाम पर स्वयं को ब्राह्मण कहने वाले धर्म मंच के दिग्गजों ने अधिक किया है। विशेषकर दक्षिण भारत में यह भ्रान्ति तो सर्वाधिक है। वस्तुतः गुप्त तो मात्र दुरभि सन्धियों को रखा जाता है। श्रेष्ठ निर्धारणों को खुले में कहने में कोई हर्ज नहीं।

🔴 गायत्री में सदाशयता की रचनात्मक स्थापनाएँ हैं। उन्हें जानने-समझने का सबको समान अधिकार है ऐसे पवित्र प्रेरणायुक्त उपदेश को उच्चारणपूर्वक कहने-सुनने में भला क्या हानि हो सकती है? पर्दे के पीछे व्यभिचार, अनाचार जैसे कुकर्म ही किये जाते हैं। षड्यन्त्रों में काना-फूसी होती है। किसी को पता न चलने देने की बात वहीं सोची जाती है जहाँ कोई कुचक्र रचा गया हो। सद्ज्ञान का तो उच्च स्वर से उच्चारण होना चाहिए। कीर्तन-आरती जैसे धर्म कृत्यों में वैसा होता भी है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति जून 1983 पृष्ठ 46
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1983/June.46

👉 आत्मचिंतन के क्षण 19 May 2016


🔵 ऐसा कोई नियम नहीं है कि आप सफलता की आशा रखे बिना, अभिलाषा किये बिना, उसके लिए दृढ़ प्रयत्न किये बिना ही सफलता प्राप्त कर सको। प्रत्येक ऊँची सफलता के लिए पहले मजबूत, दृढ़, आत्म श्रद्धा का होना अनिवार्य है। इसके बिना सफलता कभी मिल नहीं सकती। भगवान् के इस नियमबद्ध और श्रेष्ठ व्यवस्थायुक्त जगत् में देवयोग के लिए कोई स्थान नहीं है।

🔴 ऐसा विचार मत करो कि उसका भाग्य उसे जहाँ-तहाँ भटका रहा है और इस रहस्यमय भाग्य के सामने उसका क्या बस चल सकता है। उसको मन से निकाल देने का प्रयत्न करना चाहिए। किसी तरह के भाग्य से मनुष्य बड़ा है और बाहर की किसी भी शक्ति की अपेक्षा प्रचण्ड शक्ति उसके भीतर मौजूद है, इस बात को जब तक वह नहीं समझ लेगा, तब तक उसका कदापित कल्याण नहीं हो सकता।

🔵 दूसरों को सुधारने से पहले हमें अपने सुधार की बात सोचनी चाहिए। दूसरों की दुर्बलता के प्रति एकदम आगबबूला हो उठने से पहले हमें यह भी देखना उचित है कि अपने भीतर कितने दोष-दुर्गुण भरे पड़े हैं। बुराइयों सको दूर करना एक प्रशंसनीय प्रवृत्ति है। अच्छे काम का प्रयोग अपने से ही आरंभ करना चाहिए। हम सुधरें-हमारा दृष्टिकोण सुधरे तो दूसरों का सुधार होना कुछ भी कठिन नहीं।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 विनम्रता गुण


🔵 विनम्रता आपके आंतरिक प्रेम की शक्ति से आती है। दूसरों को सहयोग व सहायता का भाव ही आपको विनम्र बनाता है। यह कहना गलत है कि यदि आप विनम्र बनेंगे तो दूसरे आपका अनुचित लाभ उठाएँगे। जबकि यथार्थ स्वरूप में विनम्रता आपमें गज़ब का धैर्य पैदा करती है। आपमे सोचने समझने की क्षमता का विकास करती है। विनम्र व्यक्तित्व का एक प्रचंड आभामण्डल होता है। धूर्तो के मनोबल उस आभा से निस्तेज हो स्वयं परास्त हो जाते है। उल्टे जो विमम्र नहीं होते वे आसानी से धूर्तों के प्रभाव में आ जाते है क्योंकि धूर्त को तो अहंकारी का मात्र चापलूसी से अहं सहलाना भर होता है। बस चापलूसी से अहंकार प्रभावित हो जाता है। किन्तु जहाँ विनम्रता होती है वहाँ तो व्यक्ति को सत्य की अथाह शक्ति प्राप्त होती है। सत्य की शक्ति, मनोबल प्रदान करती है।

🔴 विनम्रता के प्रति पूर्ण समर्पण युक्त आस्था जरूरी है। मात्र दिखावे की ओढी हुई विनम्रता, अक्सर असफ़ल ही होती है। सोचा जाता है-‘पहले विन्रमता से निवेदन करूंगा यदि काम न हुआ तो भृकुटि टेढी करूंगा’ यह चतुरता विनम्रता के प्रति अनास्था है, छिपा हुआ अहं भी है। कार्य पूर्व ही अविश्वास व अहं का मिश्रण असफलता ही न्योतता है। सम्यक् विनम्र व्यक्ति, विनम्रता को झुकने के भावार्थ में नहीं लेता। सच्चाई उसका पथप्रदर्शन करती है। निश्छलता उसे दृढ व्यक्तित्व प्रदान करती है।

🔵 अहंकार सदैव आपसे दूसरों की आलोचना करवाता है। वह आपको आलोचना-प्रतिआलोचना के एक प्रतिशोध जाल में फंसाता है। अहंकार आपकी बुद्धि को कुंठित कर देता है। आपके जिम्मेदार व्यक्तित्व को संदेहयुक्त बना देता है। अहंकारी दूसरों की मुश्किलों के लिए उन्हें ही जिम्मेवार कहता है और उनकी गलतियों पर हंसता है। जबकि अपनी मुश्किलो के लिए सदैव दूसरों को जवाबदार ठहराता है। और लोगों से द्वेष रखता है।

🔴 विनम्रता हृदय को विशाल, स्वच्छ और ईमानदार बनाती है। यह आपको सहज सम्बंध स्थापित करने के योग्य बनाती है। विनम्रता न केवल दूसरों का दिल जीतने में कामयाब होती है अपितु आपको अपना ही दिल जीतने के योग्य बना देती है। जो आपके आत्म-गौरव और आत्म-बल में उर्ज़ा का अनवरत संचार करती है। आपकी भावनाओं के द्वन्द समाप्त हो जाते है। साथ ही व्याकुलता और कठिनाइयां स्वतः दूर होती चली जाती है। एक मात्र विनम्रता से ही सन्तुष्टि, प्रेम और सकारात्मकता आपके व्यक्तित्व के स्थायी गुण बन जाते है।

बुधवार, 18 मई 2016

खुद मुश्किल में रहते हुए 'लावारिस वॉर्ड' के मरीजों को खाना खिलाकर नई ज़िंदगी देते हैं गुरमीत सिंह

कहते है पैदा करने से बड़ा पालने वाला होता है। पालने वाला तब और बड़ा हो जाता है जब वो इस बात की चिंता नहीं करता कि सामने कौन है और हर किसी के लिए एक ही भाव से, उसी लगन से और तत्परता से दिन-रात लगा रहता हो। इसी की जीती जागती तस्वीर का नाम है सरदार गुरमीत सिंह।मूल रूप से पाकिस्तानीे परिवार की तीसरी पीढ़ी सरदार गुरमीत सिंह पटना शहर के भीड़भाड़ वाले इलाके चिरैयाटांड इलाके में कपडे की दुकान चलाते है। पिछले 25 साल से गुरमीत सिंह निरंतर बिना नागा शहर के विभिन्न इलाको में बेसहारा छोड़ दिए गए लोगो को खाना खिलाते और उनकी निस्वार्थ भाव सेवा करते चले आ रहे हैं।

सरदार गुरमीत सिंह की पहुंच हर उस शख्स तक है जो अपनों के सताये, बीमार, लाचार और आसक्त, खाने के लिए दाने दाने को मोहताज है। और तो और गुरमीत सिंह पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल के उस कुख्यात 'लावारिस वार्ड' में मरने को छोड़ दिए गए इंसान के लिए रोटी के निवाले के साथ मौजूद दिखाई देते हैं जहां आम आदमी एक मिनट ठहर नहीं सकता। गुरमीत सिंह इस वार्ड में न सिर्फ मरीजों को रोटी खिलाते हैं बल्कि उन्हें इंसान होने का अहसास भी दिलाते हैं।


असल में हमारी ज़िंदगी में भी एक अनजान मददगार ने महती भूमिका निभाई है। अनजान फ़रिश्ते ने हमारे परिजनों की उस वक्त मदद की जब गंभीर रूप से बीमार अपनी बहन के इलाज ख़ातिर मैं दर दर की ठोकरें खा रहा था। आर्थिक तंगी ने उस दौरान परिवार को जकड रखा था। मुझे लगता था पैसा न हो तो इंसान कितना लाचार और मजबूर हो जाता है। ऐसे में उस अनजान फ़रिश्ते ने न केवल मदद की बल्कि यू कहें कि हमारी बहन को जीवनदान दिया। और फिर दुनिया की इस भीड़ में सदा के लिए गुम हो गए।

वो दिन है और आज का दिन सरदार जी ने अपने जीवन को मानव सेवा को समर्पित कर दिया। आँधी आये या तूफ़ान, आग बरसे या पानी तमाम विपरीत स्थितियों में गुरमीत सिंह पीएमसीएच के लावारिस वार्ड के मरीजों को तो खाना खिलाने जरूर जाते हैं, उनकी सेवा करते हैं। मानवता की सेवा में लगे सरदार जी बिना किसी से आर्थिक योगदान लिए अपनी कमाई से अब तक 25 सालो में 100 लोगों को पूर्ण रूप से सकुशल कर उन्हें उनके परिजनों से मिला चुके है। 100 लोग तो महज़ एक संख्या मात्र है ज़ज़्बा तो असंख्य नंबरों से कहीं ऊपर है।



शुरूआती दौर में जब सरदार गुरजीत सिंह ने अपनी सीमित कमाई से अनाथों और लावारिस लोगों को खाना खिलाना शुरू किया तो आर्थिक तंगी की वजह से कई बार इस काम में मुश्किलें आईं। उस दौरान परिजनों ने भी विरोध किया पर लगन और अपनी धुन के पक्के इस व्यक्ति ने सारी मजबूरियों और विरोध को धता बताते हुए इस काम को अपनी दिनचर्या में शामिल रखा। कभी ऐसे भी हालात आये की घर में खाने को कुछ भी नहीं था फिर भी पैसों का यहाँ वहा से इंतज़ाम कर साग सब्जी खरीद कर लाये। घर में ही खाना बनवाया और लेकर अस्पताल के वार्ड में पहुंच कर सब को खाना खिलाया। इस वार्ड में अकसर ऐसे ही मरीज आते है जो खुद से खाना भी नहीं खा सकते। खाना खिलाने के बाद सरदार गुरमीत सिंह मरीजों के बिस्तर और कपडे भी साफ़ करते है। घंटो उनके साथ वक्त बिताते हैं। पर्व त्यौहार भी इन्हीं के साथ मनाते है। हालांकि गुरमीत सिंह का भरा पूरा परिवार है। परिवार में पांच बेटे हैं। जिस दिन बड़े लड़के की शादी थी। आनंद काज में सभी नाते रिश्तेदार दोस्त साथी खुशियाँ मना रहे थे। सरदारजी अस्पताल में अपने रोज के नित्य के फ़र्ज़ को अंजाम देने पहुंच गए। वार्ड में मौजूद मरीजों को खाना खिलाया, सब के साथ अपनी खुशिया बांटी, सब को मिठाई खिलाई। फिर शादी में शामिल होने के लिए घर वापस लौटे।

गुरमीत सिंह बताते हैं,

अगर कभी मैं व्यस्त होता हूं और अस्पताल जाने की स्थिति में नहीं रहता हूं तो मेरे बड़े बेटे हरदीप सिंह इस फ़र्ज़ को निभाते हैं। मेरी पूर्ण आस्था गुरु नानकदेन जी के उपदेशों में है। महाराज जी की सही शिक्षा भी मानव सेवा को बढ़ावा देती है। मेरे लिए तो परेशान मरीज को खाना खिलाना ही आस्था है। वही मेरा कर्म है।

आम आदमी के गुमनाम मसीहा किसी लावारिस की जानकारी मिलने पर वहां पहुंच जाते हैं और उसका इलाज करवाते हैं, उसकी सेवा करते हैं और स्वस्थ होने पर उसके घर तक पहुंचाते हैं।

सरदार गुरमीत सिंह उन तमाम लोगों के लिए प्रेरणास्रोत हैं जो समाज के लिए कुछ करना चाहते हैं। समाज सेवा के लिए सबसे ज़रूरी है दृढ इच्छा और नि:स्वार्थ भाव। परेशान हाल लोगों के चेहरे पर खुशी देखकर जो संतुष्टि गुरमीत सिंह को होती है वो वाकई जीवन की सबसे बड़ी खुशी है।

🌞 शिष्य संजीवनी (भाग 52) :-- 👉 समग्र जीवन का सम्मान करना सीखें

🔵 शिष्य संजीवनी के सूत्रों में शिष्य जीवन के अनगिन रहस्य पिरोये हैं। इसका प्रत्येक सूत्र शिष्य जीवन के एक नये रहस्य को उजागर करता है, उसकी समग्र व्याख्या प्रस्तुत करता है। जो इस व्याख्या को समझकर उसे अपने जीवन में अवतरित करने, आत्मसात् करने के लिए तत्पर है, वही शिष्यत्व के सुपात्र- सत्पात्र है। जो ऐसा नहीं कर सकते, वे हमेशा के लिए इसके स्वाद से वंचित रहते हैं। समझ की बात इसमें यह है कि इसके लिए बौद्धिक समझ भर पर्याप्त नहीं है। इसके लिए साधना का बल चाहिए। जीवन साधना का पुरुषार्थ जिनमें है, वही इस कठिन डगर पर चलने के लायक हैं। जो इस डगर पर चल रहे हैं, वे जानते हैं कि इस पर चलते हुए कितनी बार उनके पाँवों में छाले पड़े हैं। कितनी बार ये छाले गहरे घावों में बदले हैं और कितनी बार उन्हें इन घावों की रिसन से मर्मान्तक वेदना झेलनी पड़ी है।
   
🔴 लेकिन इसके बावजूद यह रोमाँचक यात्रा अतीव सुखप्रद है, क्योंकि इसकी अनुभूतियों का प्रत्येक पृष्ठ मानवीय चेतना के एक नये और अनजाने आयाम को उद्घाटित करता है। इसके नये अन्तर- प्रत्यन्तर खुलते हैं। परत- दर बोध की नूतन दृष्टि मिलती है। और इसमें सबसे बड़ी बात यह पता चलता है कि जीवन के प्रत्येक कण में सार है। इसके प्रत्येक क्षण में अर्थ है। फिर ये कण या क्षण मुश्किलों से भरे हुए ही क्यों न हों। भले ही इनके साथ जीने में विष बुझे बाणों की चुभन का अहसास हो रहा हो। जो इसमें सार- सत्य को ढूँढ लेते हैं, वही जीवन के मर्म को जान पाते हैं।
  
🔵 शिष्य संजीवनी के इस नये सूत्र का संदेश भी है। जो शिष्यत्व की डगर पर चले हैं, जिन्होंने इस साधना में अपने सम्पूर्ण जीवन की आहुति दी है, उन सबका कहना यही है- ‘समग्र जीवन का सम्मान करो, जो तुम्हें चारों ओर से घेरे हुए है। अपने आसपास के अनवरत बदलने वाले प्रवाहमान जीवन को गहराई से देखो, क्योंकि यह मानवीय संवेदनाओं का ही सघन रूप है और ज्यों- ज्यों तुम इसकी बुनावट को परखोगे- बनावट पर ध्यान दोगे, त्यों- त्यों तुम क्रमिक रूप से जीवन के विशालतम शब्द एवं व्यापकतम अर्थ को पढ़ और समझ सकने लायक होगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 डॉ. प्रणव पण्डया
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Devo/time

👉 क्षुद्र हम, क्षुद्रतम हमारी इच्छाएँ (भाग 6)

 
👉 पहाड़ पर प्रभु। वहाँ भी पहुँचा मानव
🔴 भगवान् जी को गुस्सा आया, तो उन्होंने विचार किया कि ऐसी जगह चलना चाहिए जहाँ कोई पहुँच न सके। सो वे पहाड़ के ऊपर चले गये। वे कैलाश पर्वत पर रहने लगे। लोगों ने कहा कि भगवान् जी को तलाश करना चाहिए और वहाँ चलना चाहिये और अपनी दिक्कतें बतानी चाहिए और वहीं से आशीर्वाद लाना चाहिए। भगवान् जी कैलाश पर्वत पर मानसरोवर के पास बैठे हुए थे। बस, लोगों ने रास्ता ढूँढ़ा। कौन सा रास्ता है? नैनीताल के पास से जाता है, अल्मोड़ा के पास से जाता है। तिब्बत तक का रास्ता ढूँढ़ते हुए पहाड़ों पर होते हुए कैलाश पर्वत तक वे जा पहुँचे। भगवान् ने कहा कि धक्के खाकर के मनुष्य मेरे पास आ गया, चलो अच्छा हुआ।

🔵 भगवान् ने कहा- ‘‘बच्चों! तुम्हारे पास सारी शक्तियाँ हैं और सारी सुविधाएँ है, जो मैंने तुम्हारे भीतर दबाकर रख दी हैं। तुमको उन्हें अपने भीतर तलाश करना चाहिए और तुमको अपना जीवन अच्छा बनाना चाहिए। जैसे ही तुम अपना जीवन अच्छा बनाओगे, सारी ऋद्धियाँ और सिद्धियाँ, सारे सुख और सारी सुविधाएँ अनायास ही आती हुई चली आयेंगी।’’ लोगों ने कहा कि महाराज जी! यह तो बड़े झगड़े का काम है और बहुत झंझट का काम है। हम अपने आपको कैसे सिद्ध करेंगे और कैसे मन को नियंत्रित करेंगे? और कैसे इन्द्रियों का निग्रह करेंगे? सेवा के लिए हम मन कहाँ से लायेंगे और ऐसे कैसे करेंगे? यह हमसे नहीं हो सकता और हम नहीं करेंगे। भगवान् ने कहा- ‘फिर क्या करोगे?’ हम तो महाराज जी! बस आपका आशीर्वाद माँगेंगे और अपना फायदा करायेंगे आपसे।

👉 क्षुद्र और क्षुद्रतम हम
🔴 भगवान् जी को फिर गुस्सा आया। उन्होंने कहा कि हम इसीलिए तो भाग करके यहाँ आये थे। हमने तुमको सारी विद्याएँ दे दीं, मजबूत कलाइयाँ दे दीं, अक्ल दे दी, सब काम कर दिया और इस लायक बना दिया कि अपने इस शरीर की जरूरतों को स्वयं पूरा कर लिया करो। और तुम हो कि शरीर की जरूरतों को भी पूरा कराने के लिए हमारे पास चले आते हो। यह बड़ी खराब बात है। हम तो तुम्हारी आत्मा को बढ़ायेंगे। लोगों ने कहा कि आत्मा को बढ़ाने की जरूरत नहीं है। हम तो आपसे अपने शरीर की चीजों को माँगेंगे। भगवान् जी को फिर नाराजगी हुई और वे फिर वहाँ से भाग खड़े हुए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/guru3/shudrahumshurdtamhum.2

👉 Awakening the Inner Strength

🔶 Human life is a turning point in the evolution of consciousness. One who loses this opportunity and does not attempt awakening his in...