गुरुवार, 15 मार्च 2018

👉 "फुट डालो और लूट खाओ"

🔷 कोई चालाक चोर था। वह बटमारी करता था। एक दिन अकेला ही गया। सामने से चार राहगीर आ रहे थे उसका मन उन्हें लूटने का हुआ पर था अकेला। चारों को कैसे लूटे? उसने “फूट डालो लूट खाओ” की नीति अपनाई।

🔶 पूछने पर मालूम हुआ कि चारों अलग-अलग वर्ण के हैं एक ब्राह्मण, एक क्षत्रिय, एक वैश्य, एक नाई। उस चोर ने अलग-अलग ढंग से बात करना शुरू किया।

🔷 चोर ने कहा ब्राह्मण हमारे पुरोहित क्षत्रिय हमारे भाई, वैश्य हमारे टेका नाई से क्या वास्ता? तीनों खड़े हो गये अकेला नाई लुटता रहा और इसके हाथ पैर बाँध कर अलग डाल दिया।

🔶 इस प्रकार लालजी को लूटा और बाँधा। इसके बाद क्षत्रिय को और अन्त में पण्डित जी की दुर्गति हुई। आपस में एकता न होने के कारण चारों राहगीर एक चोर से अपनी दुर्गति करा बैठे।

📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल,1993 पृष्ठ 22

http://literature.awgp.org/hindi/akhandjyoti/1993/April/v1.22

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 16 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 16 March 2018


👉 गीता के ये नौ सूत्र याद रखें, जीवन में कभी असफलता नहीं मिलेगी

👉 सूत्र नं० 4
🔷 श्लोक-
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यश: कर्म सर्व प्रकृतिजैर्गुणै:।।

🔶 अर्थ-
कोई भी मनुष्य क्षण भर भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। सभी प्राणी प्रकृति के अधीन हैं और प्रकृति अपने अनुसार हर प्राणी से कर्म करवाती है और उसके परिणाम भी देती है।

🔷 सूत्र –
 बुरे परिणामों के डर से अगर ये सोच लें कि हम कुछ नहीं करेंगे, तो ये हमारी मूर्खता है। खाली बैठे रहना भी एक तरह का कर्म ही है, जिसका परिणाम हमारी आर्थिक हानि, अपयश और समय की हानि के रुप में मिलता है। सारे जीव प्रकृति यानी परमात्मा के अधीन हैं, वो हमसे अपने अनुसार कर्म करवा ही लेगी। और उसका परिणाम भी मिलेगा ही। इसलिए कभी भी कर्म के प्रति उदासीन नहीं होना चाहिए, अपनी क्षमता और विवेक के आधार पर हमें निरंतर कर्म करते रहना चाहिए।

👉 क्षमताओं का सदुपयोग-प्रगति का राजमार्ग (अन्तिम भाग)

🔷 अभीष्ट प्रयोजन के लिए समय निकालें कैसे? मनोयोग जुड़े कैसे? श्रम संलग्नता बने कैसे? इन समस्याओं का समाधान एक ही है कि जिन ललक लिप्साओं में इतने दिनों अपनी क्षमताएँ संलग्न रही हैं, उन्हें वहाँ से विरत किया जाय। वैराग्य इसी का नाम है। जिस त्याग संन्यास की चर्चा अध्यात्म क्षेत्र में होती रहती है उसका तात्पर्य कर्तव्यों, उत्तरदायित्वों को छोड़ बैठना नहीं वरन् यह है कि अवांछनीय ललक लिप्साओं से अपने समय श्रम को बचाने छुड़ाने का प्रयास किया जाय ताकि उस बचत को सत्प्रयोजनों में लगाकर प्रगति के उच्च शिखर तक पहुँच सकना बन पड़े।

🔶 उत्थान और पतन के दो सर्वविदित राजमार्ग हैं। तृष्णा ग्रसित होकर वैभव, विलास और अहंता की परितृप्ति के प्रयास में संलग्न रहा जा सकता है। इसमें न समय बचने वाला है, न श्रम, न मनोयोग। इस भट्टी को जितना प्रज्वलित किया जायेगा, उतनी ही ऊँची लपटें उठेंगी और उतना ही अधिक ईंधन माँगेंगी। इस स्तर की लालसा यदि आतुरता स्तर तक जा पहुँचे तो फिर उनका समाधान दो ही उपायों से सूझता है, जिसमें एक है आत्महत्या और दूसरा ब्रह्महत्या। आत्महत्या का तात्पर्य है अपने स्तर और व्यक्तित्व को गिराकर हेय परिस्थितियों में प्रवेश करना और उनके साथ जुड़ी हुई नरक यंत्रणाओं को निरन्तर सहन करना। दूसरा मार्ग इससे भिन्न है, उसमें लिप्साओं पर नियंत्रण रखना होता है, ताकि सीमित समय, श्रम में उसकी पूर्ति हो सके और बची हुई क्षमता उच्चस्तरीय प्रयोजनों में लग सके।

🔷 क्षमता से तात्पर्य है-ईश्वर प्रदत्त समय सम्पदा का उच्चस्तरीय उद्देश्यों के लिए नियोजन। इसी आधार पर क्षमता बढ़ती है और महत्त्वपूर्ण उद्देश्यों की पूर्ति में समर्थ होती है। दुष्प्रयोजनों में समय और श्रम लगा रहे तो उसे क्षमता की सार्थकता नहीं, दुर्गति एवं विकृति ही कहा जायेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 God Suffered due to His Ruthless Devotee

🔷 A devotee used to take bath in the river Ganga every morning and take its water to offer in a nearby temple. This was his daily practice. One day, on his way to the temple, the devotee he saw a sick man suffering from high fever. The poor man had been lying there the whole night. Seeing the devotee passing by, the sick man pleaded for some water. The devotee sharply scolded him, "You idiot! How dare you ask for this holy water? I am taking it to the temple to offer it to God. There may be hundreds like you lying around sick, should I waste my time offering them water and ignore the God?" And he went ahead and offered the water in the temple as usual.

🔶 That night the devotee had a horrible dream. He saw that the God had become horribly sick. The devotee asked him about the cause of his sickness. And God said grimly," You did not help a suffering man. Ignoring the need of a sick person, you offered the water to me. This is the cause of my sickness." The devotee was alarmed and woke up in a shock. From the next day he dedicated his time to help the suffering regularly, since he had now understood the true form of worship.

📖 From Akhand Jyoti

👉 प्रायश्चित क्यों? कैसे? (भाग 5)

🔷 आप समझ गए न, उनकी इच्छा कब और कैसे पूरी हुई? आप यह बात नोट कीजिए, आपको पिछले वाले पापों से निजात पाने के लिए कुछ-न करना ही होगा। क्या करना चाहिए? इस ओर ध्यान दीजिए। भविष्य के निर्माण की ओर ध्यान दें, यह तो बहुत अच्छी बात है, पर भूतकाल को भुला मत दीजिए। आप यह विचार कीजिए कि आपने कितनी गलतियाँ की, उनकी एक बार लिस्ट बना लीजिए। गलतियाँ दो तरह की होती हैं—एक गलतियाँ वह, जो आपने दूसरों को नुकसान पहुँचाने के लिए की हैं और एक गलतियाँ वह, जो आपने अपनी उन्नति में रुकावट डाल करके आलस्य और प्रमाद के रूप में की हैं। इन दोनों गलतियों को आप नोट कर लीजिए और एक फेहरिस्त बना लीजिए।

🔶 आप नोट कर लेंगे और फेहरिस्त बन लेंगे, तो पता चलेगा कि कितना बड़ा जखीरा अपनी बुराइयों का, अपने ही सिर पर लाद के रखा है, इसको दूर करने के की कोशिश कीजिए। क्या कोशिश करें? यही तो एक विकल्प है। एक काम यह कीजिए कि अपना जी खोल करके अपने मन की गाँठ को हल्का कर लीजिए, जैसा कोई चीज खा जाते हैं, गन्दी चीज खा जाते हैं, तो उलटी कराई जाती है। आप मुँह के रास्ते उलटी कर दीजिए। आपने जो कुछ भी पाप-कर्म किये हैं, उन सबको एक बार जी खोल के कह दीजिए। किससे कहें? दूसरों के सामने तो मैं आपको सलाह नहीं दे सकता कि आप हर एक के सामने कहते फिरें, क्योंकि दूसरे आदमी इसका गलत फायदा उठाते हैं, नाजायज फायदा उठाते हैं।

🔷 हमको हजारों घटनाएँ याद हैं। स्त्रियों से उनके पतियों ने कसम खिलाकर उगलवा लिया कि उनसे क्या गलती हो गई, फिर जिन्दगी भर के लिए उनकी एसी फजीहत की कि वह बेचारी सोचती रहीं कि सच्चाई अगर हम न बताते, तो नफे में रहते। दुनिया बड़ी निकम्मी है, दुनिया बड़ी पाजी है। आप हर आदमी से अपनी कमजोरियाँ कहते फिरें, ऐसा तो मैं नहीं कहूँगा, लेकिन आपको मेरी एक सलाह है कि एक बार अपना जी खोलकर हमसे सब कुछ कह दीजिए। अपनी हर घटना को बता दीजिए, विस्तार से बता दीजिए, कहीं दुराव न हो, कहीं छुपाव न हो। आप क्या करेंगे? अरे भाई साहब! हमें क्या करना है? हर आदमी गलतियों से भरा पड़ा है।

🔶 आपकी गलतियों में मुझे जायका लेने का, मजा लेने का, दिल्लगीबाजी करने का और बकवास करने का हमारे पास कहाँ समय है? हमारे यहाँ तो केवल दुःखी-ही आते हैं। धोबी की दुकान है। हर आदमी मैला कपड़ा ले करके आता है और हम धोते रहते हैं। हमको न किसी से व्यंग्य करने की फुर्सत है, न मजाक करने की फुर्सत है, न घृणा करने की फुर्सत है, केवल धोबी के तरीके से लोगों के कपड़े धोने की फुर्सत है, इसलिए आपको अपने मन के पापों को एक बार ठीक कर लेना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 65)

👉 चेतना के रहस्यों का जानकार होता है सद्गुरु

🔷 इस सच्चाई को बताने वाली एक बड़ी मीठी कथा है। यह कथा कबीर दास जी और उनके शिष्य पद्मनाभ के बारे में है। ये पद्मनाभ कबीर दास जी के पास अध्यात्म के तत्त्व को जानने आए थे। उनकी सच्ची जिज्ञासा को देखकर कबीर ने उन्हें शिष्य के रूप में अपना लिया; पर पद्मनाभ का मन उनके पास नहीं लगता था। उनकी मानसिकता के ढाँचे में कबीर फिट नहीं बैठते थे। सो वह एक दिन फकीर शेखतकी के पास चले गए। ये शेखतकी सुप्रसिद्ध विद्वान थे। सभ्यजनों में उनका बड़ा रुतबा था। यहाँ तक कि हिन्दुस्तान का बादशाह सिकन्दर लोदी भी उनके यहाँ हाजरी बजाने आता था। इतना बड़ा मर्तबा (पद) किताबों और किताबी ज्ञान के अम्बार में पद्मनाभ ने खो दिया।
  
🔶 जब उन्होंने शेखतकी से साधना करने की इच्छा जताई तो उन्होंने उत्तर में एक मोटी सी किताब उन्हें थमा दी। इस किताब को पढ़कर पद्मनाभ अपनी साधना करने लगे। जैसा-जैसा किताब में लिखा था, वह वैसा ही करते। उसी तरह से प्राणायाम, उसी तरह से मुद्राएँ एवं उसी भाँति से वह योग की दूसरी क्रियाएँ साधने लगे। यह सब करते हुए उन्हें कई साल बीत गए। यहाँ तक कि उन्हें कबीर बाबा की सुधि भी न रही। तभी एक दिन उनकी योग साधना में एक व्यतिरेक हुआ और उनकी काया निश्चेष्ट हो गयी। कुछ इस तरह उनके साथ घटा, जैसे कि वे मर गए हों।
  
🔷 सभी ने उन्हें मृत मान लिया। फकीर शेखतकी उन्हें मरा हुआ मानकर गंगा में बहाने लगे। तभी अचानक कबीर दास जी उधर से गुजरे। लोगों ने उन्हें सारा वाकया बताया। सारी बातें जानकर वह मुस्कराए और पास खड़े लोगों से उन्होंने कहा कि पद्मनाभ का मृत शरीर मेरे पास  रख दो। पर इससे होगा क्या? शेखतकी ने प्रतिवाद करते हुए कहा- यह तो मर गया है। कबीर दास जी ने कहा- नहीं, यह मृत नहीं है। इस बेचारे ने प्राणवायु को ऊपर तो चढ़ा लिया पर उतार नहीं सका।
  
🔶 शव के पास आने पर कबीर बाबा ने उसके शरीर को सहलाते हुए मस्तिष्क की नसों को दबाया। उसकी प्राणवायु को ब्रह्मरन्ध्र से उतार कण्ठ में ले आए। इससे उसकी कुण्डलिनी क्रिया शुद्ध हो गयी। अब वह अँगड़ाई लेकर उठ गया। चारों ओर देखते हुए उसने पूछा कि मैं यहाँ कैसे आ गया? कबीर दास जी ने धीरे से उसके मस्तक को सहलाया। इस जादू भरे स्पर्श में पता नहीं क्या था कि उसे जीवन सत्य का बोध हो गया।
  
🔷 अब तो वह उनके पाँव पकड़ कर रोने लगा और बोला-बाबा मैंने आपका बड़ा अपमान किया, पर आपने मुझे उबार लिया। उसकी इन बातों पर कबीर बोले- बेटा! कोई गुरु अपने शिष्य से न तो कभी अपमानित होता है और न ही वह उसका त्याग करता है। बस उसे कालक्रम की प्रतीक्षा होती है। कबीर की इस रहस्यमयी वाणी ने शेखतकी की आँखें खोल दीं। उन्हें ज्ञात हुआ कि किताबों को पढ़ने वाला गुरु नहीं होता। गुरु तो वह है, जो चेतना के रहस्यों का जानकार है और उसमें अपने शिष्य को उबारने की क्षमता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 103

👉 परमात्मा पर्याप्त है

🔷 अनेकों तरह से अनेक सम्पत्तियों की खोज में बाहर भटका। ये मिलीं भी, लेकिन अन्त में उन्हें विपत्ति पाया। फिर स्वयं में, अपने ही अन्दर सम्पत्ति की खोज-बीन शुरू की। जो मिला वही परमात्मा था। तब अनुभव हुआ कि परमेश्वर को खो देना ही विपत्ति है और उसे पा लेना ही सम्पत्ति है।
  
🔶 पुरानी कथा है, किसी चारण ने एक सम्राट् की बहुत तारीफ की। उसकी स्तुति में अनेक सुन्दर गीत गाए। यह सब उसने कुछ पाने की लालसा से किया। उसकी प्रशंसा से सम्राट् हँसता रहा। फिर उसने स्तुति गान करने वाले उस चारण को सोने की बहुत सी मुहरें भेंट कीं। उस व्यक्ति ने जब इन मुहरों पर निगाह डाली, तो उसके अन्दर कुछ कौंध गया। एक चमक उसकी चेतना में बिखर गयी।
  
🔷 उसने आकाश की ओर कृतज्ञता भरी नजरों से देखा। लगा आकाश भी मौन स्वरों में उसके अन्तर भावों के साथ सहमति जता रहा है। अब उसने मुहरें फेंक दी और वह नाचने लगा। एक अनूठी कृतज्ञता उसके मुख पर छा गयी। उसका हाल कुछ का कुछ हो गया। उन मुहरों को देखकर उसमें न मालूम कैसी क्रान्ति हो गयी थी। अब वह चारण न रहा, सन्त हो गया। उसकी अन्तर्चेतना में कामना के बजाय प्रार्थना के स्वर गूंजने लगे।
  
🔶 बहुत वर्षों बाद किसी ने उससे पूछा, ऐसा क्या था उन मुहरों में? क्या वे जादुई थीं। वह हंसा और बोला, मुहरें नहीं, वह वाक्य जादुई था, जो उसमें लिखा था। कुछ पलों की आत्म निमग्नता के बाद उसने अपनी बात पूरी की, उस पर लिखा था ‘जीवन की सभी आवश्यकताओं के लिए परमात्मा पर्याप्त है।’
  
🔷 सच ही ‘परमात्मा पर्याप्त है।’ जो जानते हैं, वे सभी इस सच की गवाही देते हैं। यह जीवन की गहरी अनुभूति है, जिनके पास सब कुछ है, सारा ऐश्वर्य है, ईश्वर के बिना वे दरिद्र दिखाई देते हैं और ऐसे सम्पत्तिशाली भी मिले, जिनके पास कुछ भी नहीं, केवल परमात्मा है। तभी यह सूत्र प्रकट हुआ, जिन्हें सब पाना है, उन्हें सब छोड़ देना होगा। जो सब छोड़ने का साहस रखते हैं, वे स्वयं प्रभु को पा लेते हैं। उनके सामने यह सच अनायास ही उजागर हो जाता है, कि ‘परमात्मा पर्याप्त है।’

✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 104

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 15 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 15 March 2018


👉 संस्कारो पर नाज

बेटा अब खुद कमाने वाला हो गया था ... इसलिए बात-बात पर अपनी माँ से झगड़ पड़ता था ये वही माँ थी जो बेटे के लिए पति से भी लड़ जाती थी। मगर अब ...