गुरुवार, 5 अप्रैल 2018

👉 छोटी सी गलती, इतनी बड़ी सजा?

🔶 एक बार की बात है। एक राजा था। स्वभाव से वह बहुत क्रूर इंसान था। जिससे नाराज हो जाता, उसके प्राण लेने में देर नहीं लगाता। राजा के एक विश्वासपात्र अनुभवी मंत्री से एक छोटी सी गलती हो गयी। गलती तो जरा सी थी, पर राजा आख‍िर राजा ठहरा। यही कारण था कि वह मंत्री की उस छोटी सी भी गलती को भी बर्दाश्त न कर सका। उसने क्रोधित होकर मंत्री को शिकारी कुत्तों के आगे फिंकवाने का हुक्म दे दिया।

🔷 राजमहल के नियम के अनुसार मंत्री को कुत्तों के आगे फेंकने से पहले उसकी अंति‍म इच्छा पूछी गयी। मंत्री हाथ जोड़कर बोला- “महाराज! मैंने आपका नमक खाया है।''

🔶 कहते हुए मंत्री ने एक लम्बी सी सांस ली और फिर अपनी बात आगे बढ़ाई, ''एक आज्ञाकारी सेवक के रूप में आपकी 10 सालों से सेवा करता आ रहा हूं।''

🔷 ''तुम सही कह रहे हो,'' राजा ने कोबरा नाग की तरह फुंफकारते हुए जवाब दिया, ''लेकिन यह याद दिला कर तुम इस सजा से नहीं बच सकते।''

🔶 ''नहीं महाराज, मैं सजा से बचना नहीं चाहता,'' मंत्री ने अपने हाथ पुन: जोड़ दिये, ''बस आपसे एक छोटा सा निवेदन है। अगर, मेरी स्वामीभक्ति को देखते हुए मुझे 10 दिनों की मोहलत जाती, तो आपका बड़ा एहसान होता। मैं अपने कुछ अधूरे कार्य...।”

🔷 कहते हुए मंत्री ने अपनी बात अधूरी छोड़ दी और राजा की ओर देखा। राजा ने दयालुता दिखाते हुए मंत्री की सजा दस दिनों के लिए मुल्तवी कर दी और दस दिनों के लिए दरबार भंग कर दिया।

🔶 दस दिनों के बाद राजा का दरबार पुन: लगा। सैनिकों ने मंत्री को राजा के सामने प्रस्तुत किया। राजा ने एक बार मंत्री की ओर देखा और फिर मंत्री को दरबार हाल के बगल में मौजूद खूंख्वार कुत्तों के बाड़े में फेंकने का इशारा कर दिया। सैनिकों ने राजा की आज्ञा का पालन किया। मंत्री को खूंख्वार जंगली कुत्तों के बाड़े में फेंक दिया गया।

🔷 परंतु यह क्या? कुत्ते मंत्री पर टूट पड़ने की बजाए अपनी पूँछ हिला-हिला कर उसके आगे-पीछे घूमने लगे। यह देखकर राजा भौंचक्का रह गया। वह दहाड़ते हुए बोलो, ''ये क्या हो रहा है? ये खूंख्वार कुत्ते इस तरह का व्यवहार क्याें कर रहे हैं?”

🔶 यह सुनकर मंत्री बोला, ''राजन! मैंने आपसे जो 10 दिनों की मोहलत मांगी थी, उसका एक-एक क्षण इन बेजुबानों की सेवा में लगाया है। मैं रोज इन कुत्तों को खिलाता-पिलाता था और इनकी सेवा करता था। यही कारण है कि ये कुत्ते खूंख्वार और जंगली होकर भी मेरी दस दिनों की सेवा नहीं भुला पा रहे हैं। परन्तु खेद है कि आप मेरी एक छोटी सी गल्ती पर मेरी 10 वर्षों की स्वामी भक्ति को भूल गए और मुझे मौत की सजा सुना दी!”

🔷 यह सुनकर राजा को भारी पश्चाताप हुआ। उसने तत्काल मंत्री को आज़ाद करने का हुक्म दिया और आगे से ऐसी गलती ना करने की सौगंध ली।

🔶 दोस्तों, वह राजा तो पश्चाताप करके अपनी भूल को सुधार गया। हमें भी उसी तरह क्षमाशील होना चाहिये।

🔷 हम भी प्रण करें कि हम भी किसी की हज़ार अच्छाइयों को उसकी एक बुराई के सामने छोटा नहीं होने देंगे और किसी की एक छोटी सी गलती के लिए उसे उस राजा की तरह इतनी बड़ी सजा नहीं देंगे!

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 6 April 2018


👉 आज का सद्चिंतन 6 April 2018


👉 From one to many: its desirable and its necessary

🔶 The need as well as the desire to multiply and to go from being one to being many is what created this world. The creator thought that there was no joy nor meaning in being alone and that the universe must grow and expand. This wish turned into a resolution which manifested into the creation. Man is born with this innate tradition of procreation. This is the fire that burns in his heart - to grow and to expand. This is what subtly and subconsciously propels us humans toward socializing with friends, seeking large gatherings such as fairs and festivals, living in communities, wanting to grow into a family, and wanting to lead. The plant life follows this tradition as well. The tendency to multiply has given plant life a chance to prosper. This divine tradition of procreation is what is behind physical yearning, reproduction, marriage, relationships, and familial love. There is no escaping this tradition.

🔷 Nature has tied us beings with this material attraction so we may always strive to grow and expand. This is why mothers have such grand and deep love. This is why we accept the commitment and bonding of marriage. We enjoy these bonds despite the additional complexity and despite the additional responsibilities. We enjoy them because they provide a medium for us to satisfy our deep rooted internal desire of going "from one to many".

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojana – The Vision, Structure and the Program – 66 (3.26)

👉 एक से अनेक बनने की इच्छा और आवश्यकता

🔶 एक से अनेक बनने की इच्छा और आवश्यकता ने ही इस संसार का सृजन किया । ब्रह्म ने सोचा एकाकी जीवन नीरस और निरर्थक है, उसे विकसित और विस्तृत होना चाहिए । इच्छा-संकल्प के रूप में बदली और उसने क्रिया बनकर सृष्टि का मूर्तरूप धारण कर लिया । ब्रह्म की इस वंश परम्परा को साथ लेकर ही जीव जन्मा है । एक ही आकांक्षा और ज्योति वह भी जलाये बैठा है - विकसित होना - विस्तार करना । यार-दोस्तों की मंडली, मेला-ठेला देखने की प्रवृति, बस्तियों में रहने की इच्छा, परिवार बनाने की आकांक्षा, नेता बनने की उमंग, आदि लगभग सभी क्रिया-कलापों के पीछे मूलभूत अन्त:प्रेरणा यही रहती है कि उसे एकाकी नहीं विस्तृत होकर रहना चाहिए । वृक्ष-वनस्पतियों तक में यही परम्परा है । एक से अनेक होने की वृति ने ही उन्हें फलने-फूलने का अवसर दिया है । काम-कौतुक, प्रजनन, दम्पत्ति, साहचर्य, परिवार प्रेम के पीछे वही ब्रह्म परम्परा सन्नहित है जिसने इस सृष्टि का सृजन कराया । उससे छुटकारा किसी को नहीं ।

🔷 प्रकृति ने विषयानन्द के आकर्षण से समस्त प्राणियों को इसलिये बॉंधा है कि वे विकास-विस्तार के लिए प्रयत्नशील रहें । माता के हृदय में वात्सल्य का सृजन इसीलिए हुआ है । दाम्पत्य जीवन में एक-दूसरे के बंधन में बँधना इसलिए स्वीकार किया जाता है -उसमें उल्लास इसलिए रहता है कि अनेक झंझटों और उत्तरदायित्वों के बढ़ते हुए भी एक से दो और दो से अधिक बनने की आन्तरिक अभिलाषा की पूर्ति होती है ।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (३.२६)

👉 महान कैसे बनें?

🔶 मित्रो ! तुम्हें ऐसे व्यक्तियों का प्रेमपात्र बनने का सदैव प्रयत्न करते रहना चाहिए जो कष्ट पडऩे पर तुम्हारी सहायता कर सकते हैं और बुराइयों से बचाने की एवं निराशा में आशा का संचार करने की क्षमता रख्रते हैं।
  
🔷 खुशामदी और चापलूसों से घिर जाना आसान है। मतलबी दोस्त तो पल भर में इक्कठे हो सकते हैं, पर ऐसे व्यक्तियों का मिलना कठिन है, जो कड़वी समालोचना कर सकें, जो खरी सलाह दे सकें,फटकार सकें और खतरों से सावधान कर सकें । राजा और साहूकारों की मित्रता मूल्यवान् समझी जाती है, पर सबसे उत्तम मित्रता उन धार्मिक पुरूषों की है, जिनकी आत्मा महान् है। जिसके पास पूँजी नहीं है, वह कैसा व्यापारी? जिसके पास सच्चे मित्र नहीं हैं, वह कैसा बुद्धिमान? उन्नति के साधनों में इस बात का बड़ा मूल्य है, कि मनुष्य को श्रेष्ठ मित्रों का सहयोग प्राप्त हो। बहुत से शत्रु उत्पन्न कर लेना मूर्खता है, पर उससे भी बढ़कर मूर्खता है, यह है कि भले व्यक्तियों की मित्रता को छोड़ दिया जाए।
  
🔶 निर्मल बुद्धि और श्रम में श्रद्धा, यही दो वस्तुएँ तो किसी मनुष्य को महान् बनाने वाली हैं। उत्तम गुणों को अपनाने से नीच व्यक्ति उच्च बन सकते हैं और दुर्गुणों के द्वारा बड़े व्यक्ति छोटे हो जाते हैं। निरंतर लगन, सावधानी, समय का सदुपयोग छोटे को बड़ा बना सकते हैं, हीन मनुष्यों को कुलीन बना सकते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Laxman's Self-Confidence

🔶 During the epic Ram-Ravana war, the demon Meghnath used a spiritual weapon called Shakti and Laxman fell down unconscious. Hanumanji had to arrange the Sanjeevni medication to revive him. The second time when he faced Meghnath in the battle, Laxman easily overpowered the demon and killed him. Why couldn't he achieve this feat in the first attempt?

🔷 The difference was that Laxman lacked self-confidence. When his elder brother Ram reminded him of his immense potential and limitless powers, the energy of self-confidence aroused in him and he was successful.

📖 From Pragya Puran

👉 जीवन-साधना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी (भाग 5)

🔶 हमारा जीवन अनगढ़ है; चौरासी लाख योनियाँ घूमने के बाद में न जाने कितने कुसंस्कार हमारे पास जमा हैं और वे कुसंस्कार अगर इसी तरीके से जमा रहे, तो दीवार के तरीके से खड़े रहेंगे और फिर हमको आगे नहीं बढ़ने देंगे और ये हथकड़ियों और बेड़ियों के तरीके से रास्ता रोक लेंगे; न हमको ऊँचा उठने देंगे, न आगे बढ़ने देंगे। इसलिए कुसंस्कारों के विरुद्ध जद्दोजहद करना—ये हमारा काम है। साधना इसी का नाम है। साधना करने से आपने देखा है न, कितनी घटिया-घटिया चीजें, मामूली चीजें, क्या-से बन जाती हैं! आदमी पेड़ों को काटता है, छाँटता है, कलम लगाता है। जंगली पेड़ और माली के बगीचे के लगाये हुए पेड़ उनको आपने देखा नहीं है क्या? कैसे बढ़िया-बढ़िया गुलाब के फूल आते हैं! रंग-बिरंगे फूल आते हैं।

🔷 ये माली के हाथ की करामात है। क्यों? उन्हीं गुलाबों को जो जंगल में रहते हैं, खुशबू भी नहीं आती, बहुत छोटे-छोटे फूल होते हैं, उन्हीं गुलाबों को ऐसा बना देता है। इसका नाम क्या है? इसका नाम कलम लगाना कहिये, सुसंस्कारिता कहिये अथवा माली की साधना पौधे के साथ और आपकी जीवात्मा की साधना अपने जीवन के साथ। जीवन को अगर परिष्कृत बना लें, व्यक्तित्व को अगर ऊँचा आप उठा लें, फिर मजा आ जाएगा। फिर देखिये आपकी हैसियत कितनी बड़ी हो जाती है और आपकी जितनी हैसियत है, उसी हिसाब से आपको कीमत मिलनी शुरू हो जाएगी। आप एम.ए. तक पढ़े हैं, तो ज्यादा पैसा मिलेगा—मैट्रिक तक पढ़े हैं, तो कम पैसा मिलेगा और बिना पढ़े आदमी हैं, तो उससे भी कम पैसा मिलेगा।

🔶 पात्रता बढ़ाइये न, कीमत बढ़ाइये न अपनी और जो चाहते हैं पाइये। कीमत आप बढ़ाना नहीं चाहते, माँग करके लेना चाहते हैं। प्रार्थना करेंगे—माँगेंगे, माँगेंगे, माँगेंगे। अरे बाबा! माँगने से तो पाँच पैसे भी नहीं मिलते; उसमें भी पात्रता की जरूरत होती है। अन्धा, कोढ़ी होगा, तो शाम तक उसकी भीख में दो रुपये आ जाएँगे; हट्टा-कट्टा होगा, तो देगा नहीं, गालियाँ और सुनाएगा तुझे शर्म नहीं आती बेशर्म! भीख माँगने चला आया। काम, मेहनत, मजदूरी क्यों नहीं करता? पात्रता तो भिखारी को भी चाहिए, फिर सामान्य लोगों का तो पात्रता के बिना दुनिया में कुछ नहीं चलता। इसलिए पात्रता के लिए अपने गुण, अपने कर्म, अपने स्वभाव इन तीनों चीजों को परिष्कृत करना हर आदमी के लिए बेहद जरूरी है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 82)

👉 सबसे सच्ची सिद्धि : गुरुभक्ति

🔶 भगवान् सदाशिव गुरुगीता के अगले प्रकरण में कहते हैं कि यदि भूल से, प्रभाव से अथवा अहंकारवश यदि कोई शिष्य गुरुवचनों की अवहेलना करता है, तो उसका अध्यात्म मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। माँ भवानी से इस प्रकरण को स्पष्ट करते हुए भोले बाबा कहते हैं-

एवं श्रुत्वा महादेवि गुरुनिन्दां करोति यः। स याति नरकं घोरं यावच् चन्द्रदिवाकरौ॥ १०१॥
यावत्कल्पांतको देहस्तावदेव गुरुं स्मरेत्। गुरुलोपो न कर्तव्यः स्वच्छन्दो यदि वा भवेत्॥ १०२॥

हुंकारेण न वक्तव्यं प्राज्ञैः शिष्यैः कथञ्चन। गुरोरग्रे न वक्तव्यम् असत्यं च कदाचन॥ १०३॥
गुरुं त्वंकृत्य हुंकृत्य गुरुंनिर्जित्य वादतः। अरण्ये निर्जले देशे स भवेद् ब्रह्मराक्षसः॥ १०४॥

मुनिभिः पन्नगैर्वाऽपि सुरैर्वा शापितो यदि। कालमृत्युभयाद्वापि गुरूरक्षति पार्वति॥ १०५॥
अशक्ता हि सुराद्याश्च अशक्ता मुनयस्तथा। गुरुशापेन ते शीघ्रं क्षयं यान्ति न संशयः॥ १०६॥

🔷 गुरु की जो महिमा मैंने पहले बतायी, उसे जानकर, सुनकर भी यदि कोई गुरुनिन्दा करता है, वह जब तक चन्द्र, सूर्य है, तब तक घोर नरक में पड़ा रहता है॥ १०१॥ इसलिए जब तक देह है, तब तक यहाँ तक कि कल्पान्त तक भी गुरुदेव का स्मरण करते रहना चाहिए। शिष्य को चाहिए कि मुक्त होने पर भी वह गुरु स्मरण का लोप न होने दे॥ १०२॥ जो शिष्य प्रज्ञावान व विवेकी हैं, वे कभी भी अपने गुरु के सामने हुंकारपूर्वक (तेज स्वर में) बात नहीं करते। इतना ही नहीं, वे गुरु के सामने कभी भी असत्य नहीं बोलते॥ १०३॥ और जो गुरु के पास तू करके, हुं करके बाते करते हैं, वे किसी निर्जन अरण्य प्रदेश में ब्रह्मराक्षस का जीवन जीने के लिए विवश होते हैं॥ १०४॥ भगवान् शिव कहते हैं—हे पार्वती! मुनि, नाग, देवों के शाप से, काल और मृत्यु के भय से केवल गुरुदेव ही शिष्य का रक्षण करने में समर्थ हैं॥ १०५॥ लेकिन जो गुरु के शाप से ग्रस्त हैं, उनकी रक्षा कोई भी देवता अथवा मुनि नहीं कर पाते। ऐसे शिष्य शीघ्र ही नष्ट  होते हैं, इसमें कोई संशय नहीं है॥ १०६॥
  
🔶 देवाधिदेव भगवान् महादेव के इन वचनों में बड़ी गहरी अनुभूति समायी है। जो तार्किक हैं, वे तो इस सच को शायद ही छू पाएँ ; लेकिन जो तप करते हैं, जिन्होंने अपनी अन्तर्यात्रा में गुरु-महिमा को जाना है, वे इस अनुभूति कथा को पल-पल पीते हैं। इस अनुभव को साकार करने वाली बड़ी मर्मस्पर्शी घटना है, जो एक शिष्य के जीवन में तब हुई, जब उसका अपने आराध्य गुरुदेव से प्रत्यक्ष सम्पर्क नहीं हुआ था।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 124

👉 जीवन की सफलता

जीवन ऊर्जा का महासागर है। काल के किनारे पर अगणित अन्तहीन ऊर्जा की लहरें टकराती रहती हैं। इनकी न कोई शुरुआत है, और न कोई अन्त; बस मध्य है...