रविवार, 17 दिसंबर 2017

👉 बूढ़ा पिता


🔷 किसी गाँव में एक बूढ़ा व्यक्ति अपने बेटे और बहु के साथ रहता था। परिवार सुखी संपन्न था किसी तरह की कोई परेशानी नहीं थी । बूढ़ा बाप जो किसी समय अच्छा खासा नौजवान था आज बुढ़ापे से हार गया था, चलते समय लड़खड़ाता था लाठी की जरुरत पड़ने लगी, चेहरा झुर्रियों से भर चूका था बस अपना जीवन किसी तरह व्यतीत कर रहा था।

🔶 घर में एक चीज़ अच्छी थी कि शाम को खाना खाते समय पूरा परिवार एक साथ टेबल पर बैठ कर खाना खाता था। एक दिन ऐसे ही शाम को जब सारे लोग खाना खाने बैठे। बेटा ऑफिस से आया था भूख ज्यादा थी सो जल्दी से खाना खाने बैठ गया और साथ में बहु और एक बेटा भी खाने लगे। बूढ़े हाथ जैसे ही थाली उठाने को हुए थाली हाथ से छिटक गयी थोड़ी दाल टेबल पे गिर गयी। बहु बेटे ने घृणा द्रष्टि से पिता की ओर देखा और फिर से अपना खाने में लग गए।

🔷 बूढ़े पिता ने जैसे ही अपने हिलते हाथों से खाना खाना शुरू किया तो खाना कभी कपड़ों पे गिरता कभी जमीन पर। बहु चिढ़ते हुए कहा – हे राम कितनी गन्दी तरह से खाते हैं मन करता है इनकी थाली किसी अलग कोने में लगवा देते हैं, बेटे ने भी ऐसे सिर हिलाया जैसे पत्नी की बात से सहमत हो। बेटा यह सब मासूमियत से देख रहा था।

🔶 अगले दिन पिता की थाली उस टेबल से हटाकर एक कोने में लगवा दी गयी। पिता की डबडबाती आँखे सब कुछ देखते हुए भी कुछ बोल नहीं पा रहीं थी। बूढ़ा पिता रोज की तरह खाना खाने लगा, खाना कभी इधर गिरता कभी उधर । छोटा बच्चा अपना खाना छोड़कर लगातार अपने दादा की तरफ देख रहा था। माँ ने पूछा क्या हुआ बेटे तुम दादा जी की तरफ क्या देख रहे हो और खाना क्यों नहीं खा रहे। बच्चा बड़ी मासूमियत से बोला – माँ मैं सीख रहा हूँ कि वृद्धों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, जब मैं बड़ा हो जाऊँगा और आप लोग बूढ़े हो जाओगे तो मैं भी आपको इसी तरह कोने में खाना खिलाया करूँगा।

🔷 बच्चे के मुँह से ऐसा सुनते ही बेटे और बहु दोनों काँप उठे शायद बच्चे की बात उनके मन में बैठ गयी थी क्युकी बच्चा ने मासूमियत के साथ एक बहुत बढ़ा सबक दोनों लोगो को दिया था।
बेटे ने जल्दी से आगे बढ़कर पिता को उठाया और वापस टेबल पे खाने के लिए बिठाया और बहु भी भाग कर पानी का गिलास लेकर आई कि पिताजी को कोई तकलीफ ना हो।

🔶 तो मित्रों, माँ बाप इस दुनियाँ की सबसे बड़ी पूँजी हैं आप समाज में कितनी भी इज्जत कमा लें या कितना भी धन इकट्ठा कर लें लेकिन माँ बाप से बड़ा धन इस दुनिया में कोई नहीं है यही इस कहानी की शिक्षा है और मैं आशा करता हूँ मेरा इस कहानी को लिखना जरूर सार्थक होगा।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 Dec 2017


👉 आज का सद्चिंतन 18 Dec 2017


👉 पवित्र, श्रद्धालु और धार्मिक बनें

🔷 इस संसार को माया इसलिए कहा गया है कि यहाँ भ्रान्तियों की भरमार है। जो जैसा है, वैसा नहीं दीखता। यहाँ हर प्रसंग में कबीर को उलटबांसियों की भरमार हैं। पहेली बुझाने की तरह हर बात पर सोचना पड़ता है। प्रस्तुत गोरख धन्धा बिना बुद्धि पर असाधारण जोर लगाए समझ में ही नहीं आता। तिलस्म की इस इमारत में भूल-भुलैया ही भरी पड़ी हे। आँख मिचौनी का बेल यहाँ कोई जादूगर खेलता खिलाता रहता है।

🔶 प्रस्तुत परिस्थितियों को विधि की विडम्बना नियति की प्रवंचना भी कहा जा सकता है पर गम्भीरतापूर्वक विचार करने पर प्रतीत होता हैं कि मनुष्य की बुद्धिमत्ता परखने के लिये उस चतुर चित ने पग-पग पर कसौटियाँ बिछा रखी हैं, जिनके माध्यम से गुजरने वाले के स्तर का पता लगता रहे। लगता है नियन्ता ने अपने युवराज को क्रमशः अधिकाधिक अनुदान देने की व्यवस्था बनाई है और उपयुक्त अधिकारी को उपयुक्त जिम्मेदारियाँ-विभूतियाँ सौंपते चलने की योजना विनिर्मित की है।      

🔷 दूरदर्शी और अदूरदर्शी का पता इस गुत्थी को सुलझा सकने, न सुलझा सकने से लग जाता है कि सच्चा स्वार्थ साधन किसमें है, किसमें नहीं। बाधक मात्र एक ही प्रवंचना होती है कि तात्कालिक आकर्षणों में यह चंचल मन इतना मचल जाता है कि बुद्धि को उसकी ललक पूरी करने तक का अवसर नहीं मिलता। तरकस से तीर निकल जाने पर पता चलता है कि निशाना जहाँ लगाना चाहिए था, वहाँ न लगकर कहीं से कहीं चला गया। सफलता और असफलता का निर्धारण यहीं हो जाता है। व्यवहार बुद्धि का आश्रय लेने वाले दूरदर्शी इसी कसौटी पर खरे उतरते एवं माया-प्रपंच से बचकर सफलता के साथ आत्मिक प्रगति के पथ पर प्रशस्त होते देखे जा सकते हैं।

📖 अखण्ड ज्योति फ़रवरी 1973 पृष्ठ 1
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1973/February/v1

👉 धर्म

🔷 अब धर्म भी एक शौकीनों की चीज बनता चला जाता है। घर में तरह के सुसज्जा साध और जी बहलाने वाले उपकरण रहते हैं, उसी तरह धर्म को भी घर के एक कोने में स्थान देने की आवश्यकता समझी जाती है। शौकीनी सुसज्जा में विभिन्न स्तर की वस्तुयें इकट्ठी करना पड़ती हैं, सभ्यता ने धर्म को भी एक ऐसा ही उपकरण समझना आरंभ किया है और कितने ही लोग अपने कई तरह के शोकों में एक शौक धर्म चर्चा का भी सम्मिलित कर लेते हैं।

🔶 यह स्थिति धर्म जैसे जीवन तत्व का उपहास करना है। स्नान घर सजाकर रखने मात्र से स्वच्छता की आवश्यकता पूरी नहीं होती। रसोई घर में आवश्यक वस्तुयें जमा कर देने भर से क्या भूख बुझ सकती है। पलंग भर बिछा रहे तो क्या बिना सोये नींद पूरी हो जायेगी?

🔷 दूसरों की दृष्टी में धर्मात्मा बनकर अपनी आंतरिक अधार्मिकता को छिपाने के लिए आवरण ओढ़ना किस काम का? यदि धर्म के प्रति सचमुच आस्था हो तो उसे न केवल दृष्टिकोण में वरन् क्रिया कलाप में भी समाविष्ट करना चाहिए। अन्यथा यह कम बुरा है कि हम अपना अधार्मिकता को उसी रूप में खुला रहने दें और धार्मिक बनने का दंभ न करें। इससे अधर्म के साथ दंभ को जोड़ने की दुहरी तो न बढ़ेगी।

✍🏻 रविन्द्र नाथ टैगोर
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1973 पृष्ठ 11
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1973/January/v1.11

👉 World-Admixture Of Happiness & Misery

🔶 This world has been created with, Sat & Tam, good & bad and auspicious & inauspicious elements. Nobody is either wholly good or wholly bad. Good & bad tendencies arise & subside from time to time. Desirable & undesirable occasions come & go like sun & shade. The sign of wisdom is to think as to which of them should be remembered & which forgotten. If we go on remembering sorrows, scercities, failures and evils done by others, this will pervade with hellish miseries.

🔷 Dejection, disappointment & dissatisfaction will occupy our mind every moment. But if we change our viewpoint & remember loving events, successes, prosperous people & good done by others, it will appear that there may be some scarcity now, but compared to it, pleasant circumstances are more in number. More favourable circumstances are available than unfavorable ones.

🔶 Necessity for comforts is felt to make life happy & peaceful. An effort should be made to get them. It should also not be forgotten that whatever is available should be put to the best use. If we learn the proper use of available means & use everything frugally, make the best use of them. then whatever is available can increase our happiness manifold.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 उच्चस्तरीय अध्यात्म साधना के तीन चरण (भाग 1)

🔶 उच्च स्तरीय साधना के भव पक्ष के तीन चरण है। (1) भजन, (2) मनन, (3) चिंतन। इन तीनों को मिला देने से ही एक समय साधन प्रक्रिया का निर्माण होता है। अन्न, जल और वायु के तीनों अग मिलकर पूर्ण आहार बनता है। इनमें से एक भी कम पड़ जाय तो जीवन यात्रा न चल सकेगी। इसी प्रकार आत्मिक जीवन के लिए भजन, मनन और चिंतन का सूक्ष्म आहार प्रस्तुत करना पड़ता है। अंतःकरण की स्वस्थता, प्रखरता, परिपुष्टता एवं प्रगति इन तीन आधारों पर ही निर्भर है। गायत्री महामंत्र के तीन चरणों की सूक्ष्म प्रेरणा भी इसी त्रिवेणी को कहा जा सकता है।
                  
🔷 सर्वोच्च साधन स्तर अद्वैत स्थिति का है। इसमें प्रवेश किये बिना न तो मनोलय होता है और न ईश्वर प्राप्ति। जब तक ईश्वर से भिन्न अपनी अलग सत्ता बनी रहेगी जब तक अपना विलय परमेश्वर में न होगा तब तक अपूर्णता का प्रथमता का अंत न होगा। लययोग ही समाधि की-मुक्ति की-परम स्थिति तक पहुँचा सकता है।
    
🔶 उच्च स्तरीय ‘भजन’ के लिए शरीर को शिथिल और मन को उदासीन करना पड़ता है। ताकि न शरीर की माँस पेशियों पर कोई तनाव रहे और न मस्तिष्क में कोई आकर्षण उत्तेजना पैदा करे। यह स्थिति कुछ ही दिन के अभ्यास से उपलब्ध हो जाती है। किस  आराम कुर्सी, कोमल बिस्तर या दीवार, पेड़ आदि का सहारा लेकर शरीर को निद्रित एवं मृतक स्थिति जैसा शिथिल कर देना चाहिए। इसे शवासन एवं जैसा शिथिलीकरण मुद्रा कहते हैं। शारीरिक दृष्टि से यह पूर्ण विश्राम है। मानसिक दृष्टि से इसे ध्यान भूमिका कहा जाता है। उत्तेजित तनी हुई नाड़ियाँ एवं माँस पेशियाँ होने पर कभी किसी का ध्यान लग ही नहीं सकता। इसलिए पद्मासन, बद्धपद्मासन जैसे तनाव उत्पन्न करने वाले आसन और किसी प्रयोजन के लिए उपयोगी भले ही हों-ध्यान के लिए बाधक होते हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1973 पृष्ठ 3
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य 

शनिवार, 16 दिसंबर 2017

👉 होशियारी और समझदारी

🔶 होशियारी अच्छी है पर समझदारी उससे भी ज्यादा अच्छी है क्योंकि समझदारी उचित अनुचित का ध्यान रखती है!

🔷 एक नगर के बाहर एक गृहस्थ महात्मा जी रहते थे और उनके आश्रम मे दुर दुर से विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने को आते थे और महात्मा जी भी सभी को समान रुप से शिक्षा देते थे!

🔶 एक बार एक युवक उनके पास आया जो बहुत ही होशियार था और उसने कहा की मैं भी आपके आश्रम मे शिक्षा-दीक्षा लेना चाहता हुं तो महात्मा जी ने कहा की ठीक है! फिर वो उस युवक को लेकर दुर नगर गये और वहाँ से जब वापस लोट रहे थे तो महात्मा जी बार बार अपने थेले को देख रहे थे और युवक इस दृश्य को बराबर देख रहा था! और फिर एक नदी के किनारे महात्मा जी ने कहा वत्स रात्री मे अब हम यही पर विश्राम करते है सुबह ही यहाँ से आश्रम के लिये निकलेंगे और पुरी रात महात्मा जी उस थेले को बारबार देख रहे थे! वो युवक बारबार उन्हे देख रहा था!

🔷 महात्मा जी ने कहा की वत्स तुम यही बैठना और इस थैले को सम्भाल के रखना मैं नदी मे स्नान कर के आता हुं और पहले महात्मा जी स्नान करने को गये और फिर वो युवक गया फिर दोनो आश्रम पहुँचे और जब वहाँ पहुँचे और जब थैले को देखा तो महात्मा जी की आँखो से आँसु आने लगे जब उस युवक ने महात्मा जी से पुछा की हॆ देव इन आँसुओं का क्या कारण है और जब महात्मा जी ने कारण बताया तो वो युवक रोने लगा और वो युवक वहाँ से चला गया !

🔶 महात्मा जी के थैले मे एक सोने की ईंट थी जो एक राजा ने उन्हे परमार्थ हेतु दी थी और महात्मा जी सोच रहे थे की इस ईंट से आश्रम मे रहने वाले विद्यार्थियों के लिये कुछ अच्छे पक्के भवन का निर्माण करवा देंगे ताकि सर्दी गर्मी बरसात से उनकी रक्षा हो सके उनकी जिंदगियों का अच्छे से निर्माण हो सकेगा और गायों के लिये भी सालभर की चारे की व्यवस्था हो जायेगी और परमार्थ के अनेक कार्य सम्पुर्ण हो सकेंगे! और युवक ने सोचा की महात्मा जी का अभी भी सोने मे मोह है और महात्मा जी ठहरे गृहस्थी कही वो भटक न जायें और उसने सोने की ईंट को नदी के बहाव मे फेंक दिया और थैले मे एक पत्थर रख दिया और बड़ा खुश होने लगा की मैंने महात्मा जी को मोह से मुप्त कर दिया!

🔷 पर जब युवक ने सत्य कहा तो महात्मा जी ने कहा वत्स विवाह न करना बड़ी बात नही है बड़ी बात है विवाह करके नियम और संयम मे जीना और धन का त्याग करना बड़ी बात नही है बड़ी बात तो तब है की तुम्हारे पास धन है पर तुम्हारे मन मे उसके प्रति उदासीनता का भाव है उस धन के प्रति तुम्हारे मन मे कोई आसक्ति अथवा कोई मोह न हो!
मेरी चिन्ता का जो कारण था वो ये था की परमार्थ की जो जिम्मेदारी मुझे सोपी कही मॆरी लापरवाही से कोई अनहोनी न हो जायें और परमार्थ का कार्य कही रुक न जायें! उस सोने की ईंट के बारे मे मुझे भी पुछ सकते थे वत्स पर वत्स तुमने आवश्यकता से ज्यादा होशियारी दिखाई तुमने अपनी ही बुद्धी से सारे निर्णय अपने आप ही ले लिये होशियारी होना अच्छी बात है पर समझदारी होना ज्यादा जरूरी है!

🔶 फिर उस युवक ने कहा देव मैं बहुत बड़ा अपराधी हुं और जब तक पश्चात्ताप न कर लू तब तक मैं आपको अपना मुँह न दिखाउँगा और फिर कुछ समय बाद वो युवक वापिस लौटा और उसने महात्मा जी के सारे सपनो को साकार किया!

🔷 उसके पास जो कुछ भी था वो सबकुछ बेच आया और अपने अपराध का पश्चात्ताप किया!

🔶 इसलिये एक बात हमेशा ध्यान रखनी चाहिये की कभी कभी आवश्यकता से ज्यादा होशियारी दिखाने पर नुकसान उठाना पड़ सकता है होशियारी अच्छी है पर आवश्यकता से ज्यादा होशियारी दुखदायी हो जाती है!

🔷 इसलिये होशियारी के साथ साथ समझदारी भी बहुत जरूरी है क्योंकि होशियारी उचित अनुचित नही देखती है पर समझदारी उचित अनुचित देखकर आगे बढ़ती है!

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 17 Dec 2017


👉 आज का सद्चिंतन 17 Dec 2017


👉 अनुशासन सीखिये

🔷 एक बार मेढ़कों को अपने समाज की अनुशासनहीनता पर बड़ा खेद हुआ और वे शंकर भगवान के पास एक राजा भेजने की प्रार्थना लेकर पहुँचे।

🔶 प्रार्थना स्वीकृत हो गई। कुछ समय बाद शिवजी ने अपना बैल मेढ़कों के लोक में शासन करने भेजा। मेढ़क इधर-उधर निःशंक भाव से घूमते फिरे सौ उसके पैरों के नीचे दब कर सैकड़ों मेढ़क ऐसे ही कुचल गये।      

🔷 ऐसा राजा उन्हें पसंद नहीं आया मेढ़क फिर शिवलोक पहुँचे और पुराना हटा कर नया राजा भेजने का अनुरोध करने लगे।

🔶 वह प्रार्थना स्वीकार कर ली गई। बैल वापिस बुला लिया गया। कुछ दिन बाद स्वर्गलोक  से एक भारी शिला मेढ़कों के ऊपर गिरी उससे हजारों की संख्या में वे कुचल कर मर गये।

🔷 इस नई विपत्ति से मेढ़कों को और भी अधिक दुःख हुआ और वे भगवान के पास फिर शिकायत करने पहुँचे।

🔶 शिवजी ने गंभीर होकर कहा-बच्चों पहले हमने अपना वाहन बैल भेजा था, दूसरी बार, हम जिस स्फटिक शिला पर बैठते हैं उसे भेजा। इसमें शासकों का दोष नहीं है। तुम लोग जब तक स्वयं अनुशासन में रहना न सीखोगे और मिल-जुलकर अपनी व्यवस्था बनाने के लिए स्वयं तत्पर न होगे तब तक कोई भी शासन तुम्हारा भला न कर सकेगा। मेढ़कों ने अपनी भूल समझी और शासन से बड़ी आशायें रखने की अपेक्षा अपना प्रबंध करने में जुट गये।

📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1973 पृष्ठ 1
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 भावनाएँ भक्तिमार्ग में नियोजित की जायें (अन्तिम भाग)

 🔶 धर्म का आडम्बर अब इतना अधिक बढ़ता चला जा रहा है कि कई बार तो यह भ्रम होने लगता है कि हम धर्मयुग में रह रहे हैं। कथा, कीर्तन, प्रवचन, सत्संग, पारायण, लीला, सम्मेलन आदि के माध्यम से जगह-जगह विशालकाय आयोजन होते हैं और उनमें एकत्रित विशाल भीड़ को देखने से प्रतीत होता है कि धर्म रुचि आकाश छूने जा रही है, पर जब गहराई में उतर कर देखते हैं तो लगता है कि यह धर्म दिखावा बहुत से लोग अपनी आंतरिक अधार्मिकता को झुठला कर आत्म प्रवंचना करने के लिए अथवा लोगों की दृष्टि में धार्मिक बनने के लिए रच कर खड़ा करते हैं। यह आवरण इसलिए खड़े किये जाते हैं ताकि उनकी यथार्थता पर पर्दा पड़ा रहे और लोग उन्हें उस ऊँचे स्तर का समझते रहे जिस पर कि वे वस्तुतः नहीं हैं।
                  
🔷 कुछ लोग वस्तुतः इन आयोजनों को सद्भावना के साथ सदृश्य के लिए भी करते हैं पर वे यह भूल जाते हैं कि धर्म आवरण का आरंभिक प्रयाग भक्ति-भावना लाभ तो मिलेगा जब आस्थाओं और क्रिया-कलापों में उच्च स्तरीय परिवर्तन संभव हो। इस कार्य के लिए उपयुक्त पथ प्रदर्शक वे हो सकते हैं जिनने अपने को मन, वचन, कर्म से सच्चा भक्त बनने में सफलता प्राप्त की हो और इस श्रेय पथ में प्रगति का प्रकाश वे ही पा सकते हैं जिन्होंने आवरण से आगे बढ़कर अपने आपको सुधारने सँभालने के लिए उत्कट प्रयास किया हो।
    
🔶 भावनाओं की शक्ति की भक्ति मार्ग में यदि नियोजन किया जा सके तो मनुष्य इतनी प्रगति कर सकता है जिससे उसकी अपूर्णता, चरम पूर्णता में परिणत हो सके।

.... समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1973 पृष्ठ 2
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1973/January/v1.2

👉 सुख चाहिए किन्तु दुःख से डरिये मत (अन्तिम भाग)

🔶 अनेक बार अनुभव किया जा सकता है कि कभी-कभी जीवन में ऐसी परिस्थितियां आ जाती हैं जिनसे जीवन का हर क्षेत्र निराशा, कठिनाइयों तथा आपत्तियों से भरा दिखाई पड़ता है। हर समय वही अनुभव होता है कि अब जीवन में कोई सार नहीं रहा है, उसके अस्तित्व को हर प्रकार से खतरा पैदा हो गया है किन्तु किसी भी माध्यम से आशा का एक प्रकाश कण दीख जाने से परिस्थिति बिल्कुल बदल जाती है और वही निराश व्यक्ति एक बार फिर कमर कसकर जीवन संग्राम में योद्धा की तरह उतर पड़ता है व निश्चय विजय किया करता है। हानि के धक्के अथवा असफलता के क्षोभ से जब भी किसी व्यक्ति की मरने अथवा निराश, निकम्मे हो बैठने का समाचार सुनें तो समझ लें कि उसने अपनी भौतिक हानि के साथ अपनी आशा की भी हानि करली है अपने उत्साह का पल्ला छोड़ दिया है।
   
🔷 आशा तथा उत्साह कहीं से लाने अथवा आने वाली वस्तु नहीं है। यह दोनों तेज आपके अन्तःकरण में सदैव ही विद्यमान रहते हैं। हां आवश्यकता के समय उनको जगाना एवं पुकारना अवश्य पड़ता है। जीवन की कठिनाइयों तथा आपत्तियों से घबराकर अपने इन अन्तरंग मित्रों को भूल जाना अथवा इनका साथ छोड़ देना बहुत बड़ी भूल है। ऐसा करने का अर्थ है कि आप अपने दुर्दिनों को स्थायी बनाते हैं अपनी कठिनाइयों को पुष्ट तथा व्यापक बनाते हैं। किसी भी अन्धकार में, किसी भी प्रतिकूलता अथवा कठिनाई में अपने आशा उत्साह के सम्बन्ध को कभी मत छोड़ियेगा, कठिनाइयां आपका कुछ भी नहीं कर सकेंगी।

🔶 सुख की कामना करिये, किन्तु दुःख से डरिये नहीं। आशा और उत्साह के बल पर उन्हें जीतकर सुख के रूप में बदल डालिये। चिर प्रसन्न आशान्वित तथा उत्साहित रहिये। आपको सुख की याचना करने की आवश्यकता न होगी। वह स्वयं दरवान की ही तरह आपके जीवन की हर ड्यौढ़ी पर खड़ा आपका स्वागत करता हुआ मिलेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- दिसंबर 1966 पृष्ठ 23
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/July/v1.23

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.3

👉 Prosperous Crop Of Action (Karma)

🔶 Human life is a field, wherein actions are sown & their good or bad fruits are reaped. He who does good deeds, gets good fruit. A doer of bad deeds accumulates bad fruits. It is said. “He who sows mangoes, will eat mangoes, he who sows acacia, will get thorns.” Just as getting mangoes by sowing acacia is not possible in nature, similarly getting good by sowing the seeds of evils cannot even be imagined.
 
🔷 There is no other truth in human life than this. The fruit of good cannot be anything but peace, happiness & progress. Similarly, evil has never resulted in good, nor will it ever result in good in future. History bears witness to it.

🔶 No action is ever without cause. Similarly, no action is without its result. It is the fundamental rule from both subtle & gross viewpoints that destinies are never created by themselves but are written by the pen of individual’s own action. A good & bad destiny is always the result of one’s own actions.

🔷 It is only a delusion to thind that any individual, society or country has prospered through evil. Life keeps an account of every moment. Water will always remain water. If it flows through mu, it will not be bereft of bad smell. It cannot be potable even by creating a delusion of water. Similarly, Successes achieved through fraud ultimately lead to ignominy. Everlasting success is achieved only through good. This alone reforms man’s this as well as the other life. Fruits of actions are incontrovertible.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 भावनाएँ भक्तिमार्ग में नियोजित की जायें (भाग 1)


🔶 भावनाओं की शक्ति भाप की तरह हैं यदि उसका सदुपयोग कर लिया जाय तो विशालकाय इंजन चल सकते हैं पर यदि उसे ऐसे ही खुला छोड़ दिया जाय तो वह बर्बाद ही होगी किसी के काम न आ सकेगी।
                  
🔷 भावनाओं में भक्ति का स्थान बहुत ऊँचा है। उसका सहारा लेकर मनुष्य नर से नारायण बन सकता है। किन्तु यदि उसे एक कल्पना-आवेश मात्र मन बहलाव रहने दिया जाय तो उससे किसी का कुछ प्रयोजन सिद्ध न होगा।
    
🔶 रविशंकर महाराज ने आज के भक्तों की तीन रोगों से ग्रसित गिनाया है (गाना) (2) रोना (3) दिखावा।

🔷 भजन कीर्तन के नाम पर दिन-रात झाँझ बजती और हल्ला होता है। गाना वही सार्थक है जो विवेक पूर्वक गाया जाय जिसमें प्रेरणा हो और उसे हृदयंगम करने का लक्ष्य सामने रखा गया हो। जहाँ केवल कोलाहल कही उद्देश्य हो वहाँ, भक्ति का प्रकाश कैसे उत्पन्न होगा।

🔶 रोना-अर्थात् संसार को शोक-संताप से भरा भव सागर मानना। इस दुनिया से छुटकारा पाकर-किसी अन्य लोक में जा बसने की कल्पना, अपने आपसे भागने के बराबर है। भगवान के सुरम्य उद्यान का सौंदर्य निहार कर आनंद विभोर होने की भक्ति-भावना यदि विश्व के कण-कण में संव्याप्त भगवान को देखने की अपेक्षा सर्वत्र दुःख और पाप ही देखें तो इसे बुद्धि विपर्यय ही कहा जायेगा। भक्ति भाव नहीं। पलायन नहीं-भक्ति का तात्पर्य दुखों का निराकरण एवं दुखियों की सहायता करना है। जहाँ। केवल घृणा का विषाद छाया रहे वहाँ भक्ति की आत्मा जीवित कैसे रहेगी। अपने को आर्त और दुखी के रूप में प्रस्तुत करने वाला इस कुरूप चित्रण से अपने सृष्टा को ही अपमानित करता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1973 पृष्ठ 2
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1973/January/v1.2

शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017

👉 धैर्य से काम


🔶 बात उस समय की है जब महात्मा बुद्ध विश्व भर में भ्रमण करते हुए बौद्ध धर्म का प्रचार कर रहे थे और लोगों को ज्ञान दे रहे थे।

🔷 एक बार महात्मा बुद्ध अपने कुछ शिष्यों के साथ एक गाँव में भ्रमण कर रहे थे। उन दिनों कोई वाहन नहीं हुआ करते थे सो लोग पैदल ही मीलों की यात्रा करते थे। ऐसे ही गाँव में घूमते हुए काफ़ी देर हो गयी थी। बुद्ध जी को काफ़ी प्यास लगी थी। उन्होनें अपने एक शिष्य को गाँव से पानी लाने की आज्ञा दी। जब वह शिष्य गाँव में अंदर गया तो उसने देखा वहाँ एक नदी थी जहाँ बहुत सारे लोग कपड़े धो रहे थे कुछ लोग नहा रहे थे तो नदी का पानी काफ़ी गंदा सा दिख रहा था।

🔶 शिष्य को लगा की गुरु जी के लिए ऐसा गंदा पानी ले जाना ठीक नहीं होगा, ये सोचकर वह वापस आ गया। महात्मा बुद्ध को बहुत प्यास लगी थी इसीलिए उन्होनें फिर से दूसरे शिष्य को पानी लाने भेजा। कुछ देर बाद वह शिष्य लौटा और पानी ले आया| महात्मा बुद्ध ने शिष्य से पूछा की नदी का पानी तो गंदा था फिर तुम साफ पानी कैसे ले आए। शिष्य बोला की प्रभु वहाँ नदी का पानी वास्तव में गंदा था लेकिन लोगों के जाने के बाद मैने कुछ देर इंतजार किया। और कुछ देर बाद मिट्टी नीचे बैठ गयी और साफ पानी उपर आ गया।

🔷 बुद्ध यह सुनकर बड़े प्रसन्न हुए और बाकी शिष्यों को भी सीख दी कि हमारा ये जो जीवन है यह पानी की तरह है। जब तक हमारे कर्म अच्छे हैं तब तक सब कुछ शुद्ध है, लेकिन जीवन में कई बार दुख और समस्या भी आते हैं जिससे जीवन रूपी पानी गंदा लगने लगता है। कुछ लोग पहले वाले शिष्य की तरह बुराई को देख कर घबरा जाते हैं और मुसीबत देखकर वापस लौट जाते हैं, वह जीवन में कभी आगे नहीं बढ़ पाते वहीं दूसरी ओर कुछ लोग जो धैर्यशील होते हैं वो व्याकुल नहीं होते और कुछ समय बाद गंदगी रूपी समस्याएँ और दुख खुद ही ख़त्म हो जाते हैं।

🔶 तो मित्रों, इस कहानी की सीख यही है कि समस्या और बुराई केवल कुछ समय के लिए जीवन रूपी पानी को गंदा कर सकती है| लेकिन अगर आप धैर्य से काम लेंगे तो बुराई खुद ही कुछ समय बाद आपका साथ छोड़ देगी।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 16 Dec 2017


👉 आज का सद्चिंतन 16 Dec 2017


👉 ईश्वर को पाना है तो हम उसकी मर्जी पर चलें

🔷 ईश्वर की प्रप्ति के लिए ऐसा दृष्टिकोण एवं क्रिया- कलाप अपनाना पड़ता है, जिसे प्रभु समर्पित जीवन कहा जा सके ।। जीवन लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए आत्मिक प्रगति का मार्ग अपनाना पड़ता और वह यह है कि हम प्रभु से प्रेरणा की याचाना करें और उद्देश्य यही है कि मनुष्य अपने लक्ष्य को, इष्ट को समझें और उसे प्राप्त करने के  लिए प्रबल प्रयास करें। उपासना कोई क्रिया कृत्य नहीं है। उसे जादू नहीं समझा जाना चाहिए।

🔶 आत्म परिष्कार और आत्म विकास का तत्वदर्शन ही अध्यात्म है। उपासना उसी मार्ग पर जीवन प्रक्रिया को धकेलने वाली एक शास्त्रानुमोदित ओैर अनुभव प्रतिपादित पद्धति है। इतना समझने पर प्रकाश की ओर चल सकना बन पड़ता  है। जो ऐसा साहस जुटाते हैं, उन्हें निश्चत रूप से ईश्वर मिलता है। अपने को ईश्वर के हाथ बेच देने वाला व्यक्ति ही ईश्वर को खरीद सकने में समर्थ होता है। ईश्वर के संकेतों पर चलने वाले में ही इतनी सामर्थ्य उत्पन्न होती है कि ईश्वर को अपने संकेतों पर चला सके।       

🔷 बुद्धिमत्ता इसी में है कि मनुष्य प्रकाश की ओर चले। ज्योति का अबलम्बन ग्रहण करे। ईश्वर की साझेदारी जिस जीवन में बन पड़ेगी, उसमें घटा पड़ने की कोई सम्भावना नहीं है। यह शांति और प्रगति का मार्ग है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सुख चाहिए किन्तु दुःख से डरिये मत (भाग 4)

🔶 आशा और उत्साह मनुष्य जीवन के दो बहुत बड़े सम्बल हैं। मनुष्य की प्रसन्नता के यह दोनों प्रमाणिक आधार हैं जो बुद्धिमान किसी भी दशा में इनको मन्द नहीं होने देते, अभाव, दुःख, कष्ट तथा प्रतिकूलतायें उस पर वैसे ही प्रभाव नहीं डाल पातीं जैसे कवच-सज्जित शरीर पर शत्रु के वाण! कष्ट आयेगा, कठिनाई खड़ी हो जायगी आशा उनका सत्य स्वरूप समझने और उनके हल के लिए मार्ग दिखलायेगी, उत्साह आगे बढ़ायेगा। और बढ़ते हुए व्यक्ति का मार्ग कोई भी अवरोध रोक नहीं सकता। दुःख-क्लेश होता उन्हीं को है जो किसी कारण से किंकर्तव्य विमूढ़ होकर एक जगह ठिठके रहते हैं। जो ठिठककर रुकना नहीं जानता, वह कठिनाइयों को परास्त कर आगे निकल ही जाता है।
   
🔷 आशा और उत्साह की शक्ति अपरिमित है। उसका परिमाण लगाया ही नहीं जाता। प्राणान्तक संकट में पड़े हुये न जाने कितने वीर व्यक्तियों ने केवल आशा और उत्साह के बल पर इतिहास प्रसिद्ध विजयों का वरण किया है। आशा और उत्साह के अभाव में एक नगण्य से कारण से परास्त होकर न जाने कितने व्यक्ति आत्म-हत्या कर लिया करते हैं, जब कि उनका वह दुःख, वह क्लेश अथवा वह अभाव—प्राण तो दूर, एक रोम के बलिदान योग्य भी नहीं होता। आशा और उत्साह का अभाव तिनके जैसी कठिनाई को पहाड़ जैसा बना दिया करता है। निराशा अन्धकार है और निरुत्साह व्याधि। अन्धेरे में एक छोटी-सी आशंका प्राण लेवा बन जाया करती है और व्याधिग्रस्त व्यक्ति एक कदम आगे बढ़ने का साहस नहीं रखता।

🔶 दिनों, महीनों और वर्षों के संचित विषाद को आशा की एक छोटी-सी किरण क्षणभर में दूर करके जीवन में उल्लास तथा उत्साह का संचार कर देती है। मरण शय्या पर पड़ा रोगी औषधि की अपेक्षा आशा के सहारे रोग या मृत्यु पर अधिक विजय पाता है जीवन से क्षुब्ध परेशानियों से परेशान होकर आत्महत्या को उद्यत यदि किसी व्यक्ति को किसी संयोग से आशा की किरण मिल जाती है तो वह तुरन्त अशुभ विचार छोड़कर जीवन-पथ पर हंसता हुआ बढ़ चलता है। तिल-तिल भूमि पर बलिदान देता हुआ कोई भी योद्धा विजय की आशा से ही युद्ध-भूमि में बढ़ता चला जाता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- दिसंबर 1966 पृष्ठ 23
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/July/v1.23

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.3

👉 Secret Of Karma

🔶 Man is himself the creator of his own destiny. How can good fortune arise without elimination of whatever evil actions have been done previously by us knowingly or unknowingly? How can milk or butter be filled in a pitcher which is already full of dirt? Therefore, the first necessity is to make an effort to get rid of the physical and mental dirt and proliferation produced by malimpressions.

🔷 At the same time, we should continue trying to ensure that the same defects and evils may never attack us again. Purification on one side and development on the other, if undertaken regularly, will show immediate result. The pauper of yesterday is seen becoming a rich man of today. The rich of yesterday are seen begging from door to door today. Those who achieve some success in their ascetic practice. This is the open secret of Karma. Therefore, we should always act in a manner which will not make our Atma (soul)  reproach us of scorch us in the fire of repentance.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

गुरुवार, 14 दिसंबर 2017

👉 जो सर्वश्रेष्ठ हो वही अपने ईश्वर को समर्पित हो

🔶 एक नगर मे एक महात्मा जी रहते थे और नदी के बीच मे भगवान का मन्दिर था और वहाँ रोज कई व्यक्ति दर्शन को आते थे और ईश्वर को चढाने को कुछ न कुछ लेकर आते थे! एक दिन महात्मा जी अपने कुछ शिष्यों के साथ नगर भ्रमण को गये तो बीच रास्ते मे उन्हे एक फल वाले के वहाँ एक आदमी कह रहा था की कुछ सस्ते फल दे दो भगवान के मन्दिर चढाने है! थोड़ा आगे बढे तो एक दुकान पर एक आदमी कह रहा था की दीपक का घी देना और वो घी ऐसा की उससे अच्छा तो तेल है! आगे बढे तो एक आदमी कह रहा था की दो सबसे हल्की धोती देना एक पण्डित जी को और एक किसी और को देनी है!

🔷 फिर जब वो मन्दिर गये तो जो नजारा वहाँ देखा तो वो दंग रह गये!

🔶 उस राज्य की राजकुमारी भगवान के आगे अपना मुंडन करवा रही थी और वहाँ पर एक किसान जिसके स्वयं के वस्त्र फटे हुये थे पर वो कुछ लोगों को नये नये वस्त्र दान कर रहा था! जब महात्मा जी ने उनसे पूछा तो किसान ने कहा हॆ महात्मन चाहे हम ज्यादा न कर पाये पर हम अपने ईश्वर को वो समर्पित करने की ईच्छा रखते है जो हमें भी नसीब न हो और जब मैं इन वस्त्रहीन लोगों को देखता हूँ तो मेरा बड़ा मना करता है की इन्हे उतम वस्त्र पहनावे!

🔷 और जब राजकुमारी से पूछा तो उस राजकुमारी ने कहा हॆ देव एक नारी के लिये उसके सिर के बाल अति महत्वपुर्ण है और वो उसकी बड़ी शोभा बढ़ाते है तो मैंने सोचा की मैं अपने इष्टदेव को वो समर्पित करूँ जो मेरे लिये बहुत महत्वपुर्ण है इसलिये मैं अपने ईष्ट को वही समर्पित कर रही हूँ!

🔶 जब उन दोनो से पूछा की आप अपने ईष्ट को सर्वश्रेष्ठ समर्पित कर रहे हो तो फिर आपकी माँग भी सर्वश्रेष्ठ होगी तो उन दोनो ने ही बड़ा सुन्दर उत्तर दिया!

🔷 हॆ देव हमें व्यापारी नही बनना है और जहाँ तक हमारी चाहत का प्रश्न है तो हमें उनकी निष्काम भक्ति और निष्काम सेवा के अतिरिक्त कुछ भी नही चाहिये!

🔶 जब महात्मा जी मन्दिर के अन्दर गये तो वहाँ उन्होने देखा वो तीनों व्यक्ति जो सबसे हल्का घी, धोती और फल लेकर आये साथ मे अपनी मांगो की एक बड़ी सूची भी साथ लेकर आये और भगवान के सामने उन मांगो को रख रहे है!

🔷 तब महात्मा जी ने अपने शिष्यों से कहा हॆ मेरे अतिप्रिय शिष्यों जो तुम्हारे लिये सबसे अहम हो जो शायद तुम्हे भी नसीब न हो जो सर्वश्रेष्ठ हो वही ईश्वर को समर्पित करना और बदले मे कुछ माँगना मत और माँगना ही है तो बस निष्काम-भक्ति और निष्काम-सेवा इन दो के सिवा अपने मन मे कुछ भी चाह न रखना!

🔶 इसीलिये एक बात हमेशा याद रखना की भले ही थोड़ा ही समर्पित हो पर जो सर्वश्रेष्ठ हो बस वही समर्पित हो !

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 15 Dec 2017


👉 आज का सद्चिंतन 15 Dec 2017


👉 प्रतिकूलतायें जीवन को प्रखर बनाती हैं

🔷 आग के बिना न भोजन पकता है, न सर्दी दूर होती है और न ही धातुओं का गलाना- ढलाना सम्भव हो पाता है। आदर्शों की परिपक्वता के लिए यह आवश्यक है कि उनके प्रति निष्ठा की गहराई कठिनाइयों की कसौटी पर कमी और खरे- खोटे की यथार्थता समझी जा सके। बिना तपे सोने को प्रमाणिक कहाँ माना जाता है? उसका उपयुक्त मूल्य कहाँ मिलता है? यह तो प्रारंभिक कसौटी है।       

🔶 कठिनाइयों के कारण उत्पन्न हुई असुविधाओं को सभी जानते हैं। इसलिए उनसे बचने का प्रयत्न भी करते हैं। इसी प्रयत्न के लिए मनुष्य को दूरदर्शिता अपनानी पड़ती है और उन उपायों को ढूँढना पड़ता है, जिनके सहारे विपत्ति से बचना सम्भव हो सके। यही है वह बुद्धिमानी जो मनुष्यों को यथार्थवादी और साहसी बनाती है। जिननेकठिनाईयों में प्रतिकूलता को बदलने के लिए पराक्रम नहीं किया, समझना चाहिए कि उन्हे सुदृढ़ व्यक्तित्व के निर्माण का अवसर नहीं मिला। कच्ची मिट्टी के बने बर्तन पानी की बूँद पड़ते ही गल जाते हैं। किन्तु जो देर तक आँवे की आग सहते हैं, उनकी स्थिरता, शोभा कहीं अधिक बढ़ जाती है।

🔷 तलवार पर धार रखने के लिए उसे घिसा जाता है। जमीन से सभी धातुऐँ कच्ची ही निकलती हैं। उनका परिशोधन भट्ठी के अतिरिक्त और किसी उपाय से सम्भव नहीं। मनुष्य कितना विवेकवान, सिद्धन्तवादी और चरित्रनिष्ठ है, इसकी परीक्षा विपत्तियों में से गुजरकर इस तप- तितीक्षा में पक कर ही हो पाती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सुख चाहिए किन्तु दुःख से डरिये मत (भाग 3)

🔶 सुख-सुविधा की कामना बेशक की जाये और उसके लिए अथक प्रयत्न भी, पर साथ ही कठिनाइयों का स्वागत करने के लिए भी प्रस्तुत रहना चाहिए। अनुकूलता पाकर हर्षोन्मत्त हो उठना और प्रतिकूलता देखते ही रो उठना मानसिक हीनता का लक्षण है। मनोहीन मनुष्य संसार में कुछ भी करने लायक नहीं होता। वह जीता जरूर है लेकिन मृतकों से भी बुरी जिन्दगी। जिसका हृदय विषाद से आक्रान्त है, चिन्ताओं से अभिभूत है उसका जीना जीने में नहीं गिना जा सकता। जिन्दगी वास्तव में वही है जिसमें जीने के साथ कुछ ऊंचा और अच्छा करते रहने का उत्साह सक्रिय होता रहे।
   
🔷 यह उत्साहपूर्ण सक्रियता केवल उसी में सम्भव है जो हर समय कठिनाइयों से लड़ने का साहस रखता है आपत्तियों से संघर्ष करने की हिम्मत वाला है। जो व्यग्र है त्रस्त है और निराश है वह न केवल संसार पर ही बल्कि अपने पर भी बोझ बना हुआ श्वासों का भार ढोया करता है। चिन्तित तथा निराश मनःस्थिति वाला व्यक्ति किसी पुरुषार्थ के योग्य नहीं रहता। जिसकी जड़ में दीमक लग चुकी है अथवा जिसका मूल किसी कीड़े ने काट डाला है उस लता से, उस वृक्ष से सुन्दर फल-फूलों की आशा नहीं की जा सकती।

🔶 सुख-सुविधा की कामना अवश्य करिए यह उपयुक्त है। किन्तु साथ ही कठिनाइयों से लोहा लेने के लिए भी सदैव तत्पर रहिये। कठिनाइयां स्वयं कष्ट लेकर नहीं आतीं। वे केवल आती है आपकी मानसिक प्रसन्नता, आपकी आशा तथा आपके उत्साह पर आवरण डालने। यदि आपने उनको अपनी इन आत्म-किरणों पर परदा डाल लेने दिया तो आपके मनो-मन्दिर में अन्धकार हो जायगा और तब तमोजन्य निराश, क्षोभ, दुःख, भय तथा असन्तोष की अशिव भावनायें आपको तरह-तरह से त्रस्त करने लगेंगी और आप अकारण ही पीड़ित रहने लगेंगे।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- दिसंबर 1966 पृष्ठ 23
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/July/v1.22

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.3

👉 Be Silent, Be Strong

🔶 World serve both as nectar & poison. The speech which is true, inspiring & encouraging, free from deceit, sweet & beneficial will be called nectarine. On the contrary, the words which are harsh, egoistic, mocking. taunting, shallow & inimical will be poisonous & others.

🔷 Words should never be misused. If possible, observe silence for a day in a week or a month & engage the mind in self-analysis & contemplation of truth. Silence is very dynamic. The language of an individual who controls his words & observes silence. as for as possible is very sweet. Speak only as much as is necessary. Misuse of words wastes a large part of our energy. Therefore, just as brahmacharya etc. have been ordained for control of senses, similarly the practice of silence has been laid down for control of speech.

🔶  Mahatma Gandhi has said- “Silence is the best speech.” If it is necessary to speak, speak as little as possible. If one word can do, don’t use two. In Franklin’s words, “No teacher is better than an ant & it remains silent.” Carlyle has said- “Silence has more word-power than speech.”

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 संजीवनी विद्या बनाम जीवन जीने की कला (भाग 6)

🔶 हमने अपने जीवन के इस अन्तिम समय में सारी हिम्मत और शक्ति इस बात में लगा दी है कि शान्तिकुञ्ज को हम एक विश्वविद्यालय बना देंगे। पाँच सौ व्यक्तियों के लिए हमने एक माह में शिक्षण देने की व्यवस्था की है। इतना बड़ा काम व मात्र एक महीना? हमने इसलिए बड़ा नहीं रखा, क्योंकि हमको कम समय में एक लाख से अधिक सही जीवन जीने वाले आदमी तैयार करने हैं। हमने पाँच सौ आदमियों को प्रत्येक माह ट्रेण्ड करके स्वयं का महान् और शानदार जीवन जीने के लिए शिक्षण देने का प्रबन्ध किया है। न केवल स्वयं का जीवन बल्कि समाज की सेवा का शिक्षण। न केवल समाज की सेवा बल्कि यह भी कि आज की समस्याएँ क्या हैं? गुत्थियों का हल और समाधान निकालने के लिए क्या कदम बढ़ाए जाने चाहिए और किस तरीके से काम करना चाहिए? यह सिखाने का प्रबन्ध किया है।
                  
🔷 एक और आपको अचम्भा होगा। यहाँ बहुत दिनों से जब से यह आश्रम बना है, यहाँ के निवास के लिए, बिजली तो जलती है, कुएँ से पानी जो लेते हैं, उसके लिए किसी से कुछ भी नहीं लिया गया है। अब एक और हिम्मत बढ़ाई है। वह यह कि अब खाने की जिम्मेदारी भी हम अपने कन्धों पर उठाएँगे, गरीब और अमीर दोनों के लिए कोई खर्च वसूला नहीं जाएगा। यदि कोई कहे कि हमने आपका खाया है, दान का पैसा है, ब्राह्मण का, साधु का पैसा है, हम खाना नहीं चाहते तो हम कहेंगे कि मुट्ठी बन्द करके दे जाइए, हम रसीद काट देंगे आपकी। तो इस शिक्षण में यह नवीन विशेषता है कि अधिक से अधिक आदमी लाभान्वित हो सकें।
    
🔶 सरकारी स्कूलों-कॉलेजों में आपने देखा होगा कि वहाँ बोर्डिंग फीस अलग देनी पड़ती है। पढ़ाई की फीस अलग देनी पड़ती है, लाइब्रेरी फीस अलग व ट्यूशन फीस अलग। लेकिन हमने यह हिम्मत की है कि कानी कौड़ी की भी फीस किसी के ऊपर लागू नहीं की जाएगी। यही विशेषता नालन्दा-तक्षशिला विश्वविद्यालय में भी थी। वही हमने भी की है, लेकिन बुलाया केवल उन्हीं को है, जो समर्थ हों, शरीर या मन से बूढ़े न हो गए हों, जिनमें क्षमता हो, जो पढ़े-लिखे हों। इस तरह के लोग आयेंगे तो ठीक है, नहीं तो अपनी नानी को, दादी को, मौसी को, पड़ोसन को लेकर के यहाँ कबाड़खाना इकट्ठा कर देंगे तो यह विश्वविद्यालय नहीं रहेगा? फिर तो यह धर्मशाला हो जाएगी। साक्षात् नरक हो जाएगा। इसे नरक मत बनाइए आप।

🔷 जो लायक हों वे यहाँ की ट्रेनिंग प्राप्त करने आएँ और हमारे प्राण, हमारे जीवट से लाभ उठाना चाहें, चाहे हम रहें या न रहें, वे लोग आएँ। प्रतिभावानों के लिए निमन्त्रण है, बुड्ढों, अशिक्षितों, उजड्डों के लिए निमन्त्रण नहीं है। आप कबाड़खाने को लेकर आएँगे तो हम आपको दूसरे तरीके से रखेंगे, दूसरे दिन विदा कर देंगे। आप हमारी व्यवस्था बिगाड़ेंगे? हमने न जाने क्या-क्या विचार किया है और आप अपनी सुविधा के लिए धर्मशाला का लाभ उठाना चाहते हैं? नहीं, यह धर्मशाला नहीं है। यह कॉलेज है, विश्वविद्यालय है। कायाकल्प के लिए बनी एक अकादमी है। हमारे सतयुगी सपनों का महल है। आपमें से जिन्हें आदमी बनना हो, बनाना हो, इस विद्यालय की संजीवनी विद्या सीखने के लिए आमन्त्रण है। कैसे जीवन को ऊँचा उठाया जाता है, समाज की समस्याओं को कैसे हल किया जाता है? यह आप लोगों को सिखाया जाएगा। दावत है आप सबको। आप सबमें जो विचारशील हों, भावनाशील हों, हमारे इस कार्यक्रम का लाभ उठाएँ। अपने को धन्य बनाएँ और हमको भी।

🌹  हमारी बात समाप्त।
🌹  ॐ शान्ति।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 166)

🌹  तीन संकल्पों की महान् पूर्णाहुति
🔷 तीसरा वर्ग प्रज्ञा परिवार का है। इसमें हमारा व्यक्तिगत लगाव है। लम्बे समय से जिस-जिस बहाने साथ-साथ रहने के कारण घनिष्ठता ऐसी और इतनी बढ़ गई है कि उसका समापन किसी भी प्रकार हो सकना सम्भव नहीं। इसके कई कारण हैं। प्रथम यह कि हमें अनेक जन्मों का स्मरण है। लोगों को नहीं। जिनके साथ पूर्व जन्मों में सघन सम्बन्ध रहे हैं उन्हें संयोगवश या प्रयत्नपूर्वक हमने परिजनों के रूप में एकत्रित कर लिया है और वे जिस-तिस कारण हमारे इर्द-गिर्द जमा हो गए हैं। इन्हें अखण्ड ज्योति अपने आँचल में समेटे बटोरे रही है। संगठन के नाम पर चलने वाले रचनात्मक कार्यक्रम भी इस संदर्भ में आकर्षण उत्पन्न करते रहे हैं।

🔶  इसके अतिरिक्त बच्चों और अभिभावकों के बीच जो सहज वात्सल्य भरा आदान -प्रदान रहता है, वह भी चलता रहा है। बच्चे सहज स्वभाव अभिभावकों से कुछ चाहते हैं। भले ही मुँह खोलकर माँगे नहीं अथवा भाव-भंगिमा से प्रकट करते रहें। बच्चों की आकाँक्षा बढ़ी-चढ़ी होती हैं। भले ही वह उपयोगी हो या अनुपयोगी, आवश्यक हो या अनावश्यक। दे दिलाकर ही उन्हें चुपाया जाता है। इतनी समझ होती नहीं कि पैसा व्यर्थ जाने और वस्तु किसी काम न आने का तर्क उसके गले उतारा जा सके। बच्चों और अभिभावकों के बीच यह दुलार भरी खींचतान तब तक चलती रहती है, जब तक वे परिपक्व नहीं हो जाते और उपयोगिता-अनुपयोगिता का अंतर नहीं समझने लगते। हमारे साथ एक रिश्ता परिजनों का यह भी चलता रहा है।

🔷 मान्यता सो मान्यता। आदत सो आदत। प्रत्यक्ष रिश्तेदारी न सही पूर्व संचित सघनता का दबाव सही। एक ऐसा सघन सूत्र हम लोगों के बीच विद्यमान है जो विचार विनियम, सम्पर्क-सान्निध्य तक ही सीमित नहीं रहता, कुछ ऐसा भी चाहता है कि अधिक प्रसन्नता का कोई साधन कोई अवसर हाथ लगे। कइयों के सामने कठिनाइयाँ होती हैं। कई भ्रमवश जंजाल में फँसे रहते हैं। कइयों को अधिक अच्छी स्थिति चाहिए। कारण कई हो सकते हैं, पर देखा यह जाता है कि अधिकाँश लोग इच्छा आकाँक्षा लेकर आते हैं। वाणी से या बिना वाणी के व्यक्त करते हैं, साथ ही सोचते हैं कि हमारी बात यथा स्थान पहुँच गई। उसका विश्वास उन्हें तब होता है जब पूरा न सही आधा-अधूरा उपलब्ध भी हो जाता है।

🔶 याचक और दानी का रिश्ता दूसरा है, पर बच्चों और अभिभावकों के बीच यह बात लागू नहीं होती। बछड़ा दूध न पिए तो गाय का बुरा हाल होता है। मात्र गाय ही बछड़े को नहीं देती, बछड़ा भी गाय को देता है। यदि ऐसा न होता तो कोई अभिभावक बच्चे जनने और उनके लालन-पालन में समय लगाने, पैसा खर्च करने का झंझट मोल न लेते।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.192

बुधवार, 13 दिसंबर 2017

👉 हीरों से भरा खेत

🔶 हफीज अफ्रीका का एक किसान था। वह अपनी जिंदगी से खुश और संतुष्ट था। हफीज खुश इसलिए था कि वह संतुष्ट था। वह संतुष्ट इसलिए था क्योंकि वह खुश था। एक दिन एक अक्लमंद आदमी उसके पास आया। उसने हफीज से कहा, ‘अगर तुम्हारे पास अंगूठे जितना बड़ा हीरा हो, तो तुम पूरा शहर खरीद सकते हो, और अगर तुम्हारे पास मुट्ठी जितना बड़ा हीरा हो तो तुम अपने लिए शायद पूरा देश ही खरीद लो।‘ वह अक्लमंद आदमी इतना कह कर चला गया। उस रात हफीज सो नहीं सका। वह असंतुष्ट हो चुका था, इसलिए उसकी खुशी भी खत्म हो चुकी थी।

🔷 दूसरे दिन सुबह होते ही हफीज ने अपने खेतों को बेचने और अपने परिवार की देखभाल का इंतजाम किया, और हीरे खोजने के लिए रवाना हो गया। वह हीरों की खोज में पूरे अफ्रीका में भटकता रहा, पर उन्हें पा नहीं सका। उसने उन्हें यूरोप में भी दूंढ़ा, पर वे उसे वहां भी नहीं मिले। स्पेन पहुंचते-पहुंचते वह मानसिक, शारीरिक और आर्थिक स्तर पर पूरी तरह टूट चुका था। वह इतना मायूस हो चुका था कि उसने बार्सिलोना नदी में कूद कर खुदखुशी कर ली।

🔶 इधर जिस आदमी ने हफीज के खेत खरीदे थे, वह एक दिन उन खेतों से होकर बहने वाले नाले में अपने ऊंटों को पानी पिला रहा था। तभी सुबह के वक्त उग रहे सूरज की किरणें नाले के दूसरी और पड़े एक पत्थर पर पड़ी, और वह इंद्रधनुष की तरह जगमगा उठा। यह सोच कर कि वह पत्थर उसकी बैठक में अच्छा दिखेगा, उसने उसे उठा कर अपनी बैठक में सजा दिया। उसी दिन दोपहर में हफीज को हीरों के बारे में बताने वाला आदमी खेतों के इस नए मालिक के पास आया। उसने उस जगमगाते हुए पत्थर को देख कर पूछा, ‘क्या हफीज लौट आया?‘ नए मालिक ने जवाब दिया, ‘नहीं, लेकिन आपने यह सवाल क्यों पूछा?‘

🔷 अक्लमंद आदमी ने जवाब दिया, ‘क्योंकि यह हीरा है। मैं उन्हें देखते ही पहचान जाता हूं।‘ नए मालिक ने कहा, ‘नहीं, यह तो महज एक पत्थर है। मैंने इसे पाले के पास से उठाया है। आइए, मैं आपको दिखता हूं। वहां पर ऐसे बहुत सारे पत्थर पड़े हुए हैं। उन्होंने वहां से नमूने के तौर पर बहुत सारे पत्थर उठाए, और उन्हें जांचन-परखने के लिए भेज दिया। वे पत्थर हीरे ही साबित हुए। उन्होंने पाया कि उस खेत में दूर-दूर तक हीरे दबे हुए थे।

🔶 इससे हमें सीख मिलते हैं-

🔷 जब हमारा नजरिया सही होता है, तो हमें महसूस होता है कि हम हीरों से भरी हुई जमीन पर चल रहे हैं। मौके हमेशा हमारे पावों तले दबे हुए हैं। हमें उनकी तलाश में कहीं जाने की जरूरत नहीं है। हमें केवल उनको पहचान लेना है।

🔶 दूसरे के खेत की घास हमेंशा हरी लगती है। जिन्हें मौके की पहचान नहीं होती, उन्हें मौके का खटखटाना शोर लगता है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 Dec 2017


👉 आज का सद्चिंतन 14 Dec 2017


👉 समर्थ होते हुए भी असमर्थ क्यों?

🔷 मनुष्य उतना तुच्छ नहीं है जितना कि वह अपने को समझता है। वह सृष्टा की सर्वोपरि कलाकृति है। न केवल वह प्राणियों का मुकुटमणि हेै, वरन् उसकी गतिविधियाँ भी  असाधारण हैं। प्रकृति की पदार्थ सम्पदा उसके चरणों पर लोटती है। प्राणि समुदाय उसका वशवर्ती और अनुचर है। उसकी न केवल संरचना अद्भुत है, वरन् इन्द्रिय समुच्चय की प्रत्येक इकाई अजस्र आनन्द- उल्लास हर जगह उड़ेलते रहने की विशेषताओं से सम्पन्न है। ऐसा अद्भुत शरीर सृष्टि में कहीं भी किसी भी जीवधारी के किस्से नहीं आया।       

🔶 मनः संस्थान उससे भी विलक्षण है। जहाँ अन्य प्राणिमात्र अपने निर्वाह तक की सोच पाते हेैं, वहाँ मानवी मस्तिष्क भूत- भविष्य का तारतम्य मिलाते हुए वर्तमान का श्रेष्ठतम सदुपयोग कर सकने में समर्थ है। ज्ञान और विज्ञान के दो पंख उसे ऐसे मिले हैं जिनके सहारे वह लोक लोकान्तरों का परिभ्रमण करने, दिव्य लोक तक पहुँचने का अधिकार जमाने में समर्थ है।

🔷 इतना सब होते हुए भी स्वयं को तुच्छ मान बैठना एक विडम्बना ही है। यह दुर्भार्र्ग्य जिस कारण उस पर लदता है , वह आत्म- विश्वास की कमी। अपने ऊपर विश्वास न कर पाने के कारण वह समस्याओं को सुलझाने, कठिनाइयों से उबरने और सुखद सम्भावनाओं को हस्तगत करने में दूसरों का सहारा तकता है। दूसरे कहाँ इतने फालतू होंगे कि हमारी सहायता के लिए दौड़ पड़ें? बात तभी बनती है, जब मनुष्य अपने पैरों पर खड़ा होता है, अपनीक्षमाताओं पर भरोसा करके, अपने साधनों व सूझ- बूझ के सहारे आगे बढ़ने का प्रयत्न करता है। यह भली भाँति समझा जाना चाहिए कि आत्म- विश्वास संसार का सबसे बड़ा बल है, एक शक्तिशाली चुम्बक है, जिसके आक र्षण से अनुकूलतायें स्वयं खिंचती चली आती हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सुख चाहिए किन्तु दुःख से डरिये मत (भाग 2)

🔶 मन प्रसन्न है तो संसार में सभी ओर प्रसन्नता ही प्रसन्नता दृष्टिगोचर होगी, सुख ही सुख अनुभव होगा। तब ऐसी सहज प्रसन्नता की दशा में परिस्थितियों के अनुकूल होने की अपेक्षा नहीं रहती। परिस्थितियां अनुकूल हैं—मनभावनी हैं—बहुत अच्छा। परिस्थितियां अनुकूल नहीं हैं तब भी कोई अन्तर नहीं पड़ता। प्रसन्न-मन मानव उन्हें अनुकूल करने के लिए प्रयत्न करेगा, संघर्ष करेगा, पसीना बहायेगा, मूल्य चुकायेगा, कष्ट उठायेगा किन्तु दुःखी नहीं होगा। वह, यह सब हंसते-हंसते, प्रसन्न मनो मुद्रा में ही करता रहेगा। उसे परिश्रम में आनन्द आयेगा। संघर्ष में सुख मिलेगा। असफलता पर हंसी आयेगी और सफलता का स्वागत करेगा। जीवन की विविध परिस्थितियां तथा विविध उपलब्धियां उसकी प्रसन्नता को बढ़ा ही सकती हैं घटा नहीं सकती।
   
🔷 यह सही है कि संसार का कोई मनुष्य दुःख की कामना नहीं करता। यदि चाहता है तो केवल सुख ही चाहता है। किन्तु एक मात्र सुख की स्वार्थपूर्ण कामना का अर्थ यह है कि दुःख क्लेश आ जाने पर हाय-हाय करते हुए हाथ-पैर छोड़कर बैठे रहना और दुर्भाग्य अथवा नियति को कोसते रहना। इस प्रकार की निरुत्साह वृत्ति ही सुख की स्वार्थ कामना है जो कि किसी मानव को शोभा नहीं देती।

 🔶 एक मात्र सुख की आकांक्षा रखने वाले दुःख क्लेशों से भयभीत होने वाले न केवल स्वार्थी ही होते हैं अपितु कायर भी होते हैं। कायरता मनुष्य जीवन का कलंक है जो संघर्षों, मुसीबतों एवं आपत्तियों से डरता है, उनके आने पर निराश अथवा निरुत्साहित हो जाता है वह और कोई बड़ा काम कर सकना तो दूर साधारण मनुष्यों की तरह साधारण जीवन भी यापन नहीं कर सकता है। संसार में न तो आज तक ऐसा कोई मनुष्य हुआ है और न आगे ही होगा जिसके जीवन में सदा प्रसन्नता की परिस्थितियां ही बनी रहे। उसे कभी दुःख क्लेश के तप्त झोंके न सहन करने पड़े हों।

🔷 राजा से लेकर रंक तक और बलवान से लेकर निर्बल तक प्रत्येक प्राणी को अपनी-अपनी स्थिति में अपनी तरह के दुःख क्लेश उठाने ही पड़ते हैं। कभी शारीरिक कष्ट, कभी मानसिक क्लेश, कभी सामाजिक कठिनाई कभी आर्थिक अभाव तो कभी आध्यात्मिक अन्धकार मनुष्य को सताते ही रहते हैं। सदा सर्वदा कोई भी व्यक्ति कष्ट एवं कठिनाइयों से सर्वथा मुक्त नहीं रह सकता। तब ऐसी अनिवार्य अवस्था में किसी प्रकार की कठिनाई, आ जाने पर निराश, चिन्तित अथवा क्षुब्ध हो उठना इस बात का प्रमाण है कि हम संसार के शाश्वत नियमों से सामंजस्य स्थापित नहीं करना चाहते, हम असामान्यता के प्रति हठी अथवा दुराग्रही बने रहना चाहते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- दिसंबर 1966 पृष्ठ 21
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/July/v1.21

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.3

👉 How To Develop Personality?

🔶 Can development of personality be possible through speeches & writings? This issue is worth consideration. Today only these two means are adopted to achieve any thing. Speeches & writhing can also be necessary to some extent to obtain general information; but this alone will not do. Creative means will have to be adopted for this purpose. It is only by injecting spirituality & theism in this purpose.

🔷 It is only by injecting spirituality & theism in the innerself that faith can be increased in the ideals. Which can eliminate an individual’s evil & animal tendencies & inculcate divine tendencies. This alone is Sadhana (Practice). Sadhana is taken as capable of disentangling every knote of human life, and remover of all obstructions.
 
🔶 This belief is not untrue. The practice which can eliminate the impurities & perplexity covering the Atma can also open the gates of peace, happiness & prosperity. The scientific method of spiritual development alone is called by the name of Sadhana (Practice). The job of spiritual development is more important than construction of a huge workshop or a large factory.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 संजीवनी विद्या बनाम जीवन जीने की कला (भाग 5)

🔶 ट्रेनिंग बड़ी आवश्यक है। विश्वमित्र राम व लक्ष्मण को उनके पिता से माँगकर ले गए थे और उनको ट्रेनिंग दी थी। काहे की ट्रेनिंग दी थी। बड़ी महत्त्वपूर्ण ट्रेनिंग थी। शिवाजी का इतना भारी धनुष तोड़ा जाए? लंका में जो राक्षस रहते हैं, उनको किस तरीके से समाप्त किया जाए? रामराज्य की स्थापना कैसे की जाए? ये सारी बातें विश्वमित्र के आश्रम में जाकर सीखी थीं। ऐसी ही एक ट्रेनिंग की व्यवस्था हमने अपने शान्तिकुञ्ज में की है, ताकि आप समाज में छाई असुरता से लड़ सकें।
                  
🔷 शान्तिकुञ्ज को पहले से भी हमारा तीस गुना करने का मन था, किन्तु अब बहुत दिनों से नालन्दा और तक्षशिला विश्वविद्यालय, यही हमारे दिमाग में घूमते रहते हैं। हमें यही सपना आते रहता है कि नालन्दा, जिसमें हजारों धर्म-प्रचारक तैयार किए गए थे एवं तक्षशिला जिसमें हजारों संस्कृति प्रचारक तैयार किए गए थे, यहाँ पर बने। धर्म का नाम तो मैं अब नहीं लूँगा। यह नाम बहुत बदनाम हो गया है। मैं समाज-सेवा की बात आपसे कहूँगा। यह कहूँगा कि आपकी महानता की वृद्धि के लिए सेवा नहीं करेंगे, तब तक आप उन्नतिशील नहीं बनेंगे? आपकी आत्मा में सन्तोष और शान्ति का निवास नहीं होगा।
    
🔶 आत्मसन्तोष के अलावा समाज का सहयोग व भगवान् का अनुग्रह कैसे मिल सकता है, शानदार जिन्दगी कैसे जीनी चाहिए? इसके लिए हमारे यहाँ ट्रेनिंग चलती है। ट्रेनिंग तो पहले भी चलती थी। नौ दिन की, पाँच दिन व एक माह की, पर अब हमने सारे के सारे शान्तिकुञ्ज को विश्वविद्यालय के रूप में परिणत कर दिया है। कानूनन तो यह विश्वविद्यालय नहीं है, क्योंकि विश्वविद्यालय के लिए तो खानापूर्ति की जाती है, वह बहुत बड़ी है लेकिन पुराने समय में नालन्दा में कोई खानापूर्ति नहीं हुई थी और न तक्षशिला में कोई खानापूर्ति हुई थी। ये गवर्नमेण्ट से कोई सम्बन्धित नहीं हुए थे। हमारा यह विश्वविद्यालय इसी प्रकार का है।

🔷 आज मनुष्य को जीना कहाँ आता है? जीना भी एक कला है। सब आदमी खाते हैं, पीते हैं, सोते हैं और मौत के मुँह में चले जाते हैं, किन्तु जीना नहीं जानते। जीना बड़ी शानदार चीज है। इसको संजीवनी विद्या कहते हैं—जीवन जीने की कला। यहाँ हम अपने विश्वविद्यालय में, शान्तिकुञ्ज में जीवन जीने की कला सिखाते हैं और यह सिखाते हैं कि आज के गए-बीते जमाने में आप अपनी नाव पार करने के साथ-साथ सैकड़ों आदमियों को बिठाकर पार किस तरह से लगा पाते हैं? नाव चलाना भी एक कला है। हम आपको नाव दे दें व आपको नदी के किनारे छोड़ दें, कहें कि आप जाइए तो इतने मात्र से आप नाव नहीं चला सकेंगे। कहीं लहरों के चक्कर में पड़ेंगे और बहते हुए चले जाएँगे। नाव को डुबो देंगे और आप भी डूब जाएँगे। लेकिन अगर आपको ट्रेनिंग मिली हो तो आप सकुशल पार हो जाएँगे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 165)

🌹  तीन संकल्पों की महान् पूर्णाहुति

🔷 युग संधि २००० तक चलेगी। तब तक हमें स्थूल या सूक्ष्म शरीर से सक्रिय रहना है। हमें सौंपे गए सभी कामों को पूरा करके ही जाना है। परिजन अब तक के सभी महत्त्वपूर्ण कार्यों में साथ देते, हाथ बँटाते और कदम से कदम मिलाकर चलते रहे हैं। विश्वास किया गया है कि इस अग्निपरीक्षा की घड़ी में वे साथ नहीं छोड़ेंगे, मुँह नहीं मोड़ेंगे। इस श्रेय साधना में सभी प्राणवानों की बराबर की भागीदारी रहेगी।

🔶 साधना से उपलब्ध अतिरिक्त सामर्थ्य को विश्व के मूर्धन्य वर्गों को हिलाने उलटने में लगाने का हमारा मन है। अच्छा होता सुई और धागे को आपस में पिरो देने वाले कोई सूत्र मिल जाते। अन्यथा सर्वथा अपरिचित रहने की स्थिति में तारतम्य बैठने में कठिनाई होगी। मूर्धन्यों में सत्ताधीश, धनाध्यक्ष, वैज्ञानिक और मनीषी वर्ग का उल्लेख है। यह सर्वोच्च स्तर के भी होंगे और सामान्य स्तर के भी। सर्वोच्च स्तर वालों की सूक्ष्मता जहाँ पैनी होती है वहाँ वे अहंकारी और आग्रही भी कम नहीं होते। इसलिए मात्र उच्च वर्ग तक ही अपने को सीमित न रखकर हम मध्यम वृत्ति के इन चारों की भी अपनी पकड़ में ले रहे हैं ताकि बात नीचे से उठते-उठते ऊपर तक पहुँचने का भी कोई सिलसिला बने।

🔷 दूसरा वर्ग जाग्रत आत्माओं का है, इसका उत्पादन सदा से भारतभूमि में अधिक होता रहा है। महामानव, ऋषि, मनीषी, देवता यहाँ जितने जन्मे हैं, उतने अन्यत्र कहीं नहीं। यही हमारे लिए समीप भी पड़ा है। अस्तु प्रयत्न करेंगे कि जहाँ कहीं भी पूर्व संचित संस्कारों वाली आत्माएँ दृष्टिगोचर हों उन्हें समय का संदेश सुनाएँ, युगधर्म बताएँ और समझाएँ कि यह समय व्यामोह में कटौती करके, किसी प्रकार निर्वाह भर में संतोष करने का है। जो हस्तगत है उसे बोया उगाया और हजार गुना बढ़ाया जाना चाहिए। हम अकेले ही उगे, बढ़े और गलकर समाप्त हो गए तो यह एक दुर्घटना होगी। एक से हजार वाली बात सोची और कही जा रही है तो उसकी प्रत्यक्ष परिणति भी वैसी ही होनी चाहिए। प्रज्ञा परिवार बड़ा है। फिर भारत भूमि की उर्वरता कम नहीं है। इसके अतिरिक्त अपनी योजना विश्वव्यापी है।

🔶 उसकी परिधि में अकेला भारत ही नहीं समूचा संसार भी आता है। अस्तु प्रयत्न यह चला है कि विचार-क्रान्ति की प्रक्रिया को परिस्थितियों के अनुरूप व्यापक बनाने के लिए जाग्रत आत्माओं का समुदाय हर क्षेत्र में हर देश में मिले। कार्य पद्धतियाँ क्षेत्रीय वातावरण के अनुरूप बनती रहेंगी, पर लक्ष्य एक ही रहेगा-ब्रेन वाशिंग, विचार परिवर्तन, प्रज्ञा अभियान। हम तीर की तरह सनसनाते हुए ही लक्ष्य तक पहुँचने का प्रयत्न करेंगे। जिनमें इस प्रकार की जीवटता होगी, वे अनुभव करेंगे कि उन्हें कोई कोंचता, कुरेदता, झकझोरता, घसीटता और बाधित करता है। यों ऐसे लोग समय की पुकार पर अंतरात्मा की प्रेरणा से भी जग पड़ते हैं। ब्रह्ममुहूर्त में मुर्गा बाँग लगाने के लिए उठ खड़ा होता है, तो कोई कारण नहीं कि जिनमें प्राण चेतना विद्यमान है, वे महाकाल का आमंत्रण न सुनें ओर पेट-प्रजनन की आड़ में व्यस्तता और अभावग्रस्तता की ही बहानेबाज़ी करते रहें। समय की पुकार और हमारी मनुहार का संयुक्त प्रभाव कुछ भी न पड़े ऐसा हो ही नहीं सकता। विश्वास किया गया है कि इस स्तर का एक शानदार वर्ग उभरकर ऊपर आएगा और सामने ही कटिबद्ध खड़ा दृष्टिगोचर होगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.191

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.23

👉 प्रज्ञायुग में परिवार की जिम्मेदारी समझी जाएगी

🔷 प्रज्ञा युग में हर व्यक्ति सामाजिक नीति मर्यादाओं को महत्व देगा। कोई ऐसा काम न करेगा जिससे मानवी गरिमा एवं समाज व्यवस्था को आँच आती हो। शिष्टाचार, सौजन्य, सहयोग, ईमानदारी, वचन का पालन, निश्छलता जैसी कसौटियों पर पारस्परिक व्यवहार खरा उतरना चाहिए। अनीति का न तो सहयोग किया जाय और न प्रत्यक्ष परोक्ष समर्थन। सामाजिक सुव्यवस्था के लिए यह आवश्यक है कि मूढ़ मान्यताओं का, अवाँछनीय प्रचलनों का, हानिकारक कुरीतियों का, विरोध किया जाय। इस प्रकार छल, शोषण उत्पीड़न जैसे अनाचारों से भी असहयोग, प्रतिरोध एवं संघर्ष का रुख अपनाया जाय। अनीति आचरण एवं अनुपयुक्त प्रचलनों को समान रूप से अहितकर माना जायेगा और उन्हें अपनाना तो दूर कोई उनका समर्थन तक करने को सहमत न होगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1984 पृष्ठ 30
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1984/July/v1.30

मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

👉 ईश्वर क्या है?

🔶 टेहरी राजवंश के 15-16 वर्षीय राजकुमार के हृदय में एक  प्रश्न उठा  ईश्वर क्या है?

🔷 वह स्वामी रामतीर्थ के चरणों में पहुँचा और प्रणाम करके पूछाः "स्वामी जी ! ईश्वर क्या है ?"

🔶 उसकी प्रबल जिज्ञासा को देखकर रामतीर्थ जी ने कहा, "अपना परिचय लिखकर दो।"

🔷 उसने लिखा, "मैं अमुक राजा का पुत्र हूँ और अमुक मेरा नाम है।'

🔶 रामतीर्थ जी ने पत्र देखा और कहा, "अरे राजकुमार ! तुम नहीं जानते कि तुम कौन हो। तुम उस निरक्षर, अनाड़ी आदमी की तरह हो, जो राजा से मिलना चाहता है पर अपना नाम तक नहीं लिख सकता। क्या राजा उससे मिलेगा ? अतः तुम अपना नाम ठीक से बताओ, तब ईश्वर तुमसे मिलेगा।"

🔷 लड़के ने कुछ देर चिंतन करके कहा, "अब मैं समझा मैंने केवल शरीर का पता बताया। मैं मन हूँ। क्या वास्तव में ऐसा ही है?"

🔶 "अच्छा कुमार ! यदि यह बात सही है तो बताओ कि आज सवेरे तुमने जो भोजन किया था, वह तुम्हारे शरीर में कहाँ रखा है?"

🔷 "जी, मेरी बुद्धि वहाँ तक नहीं पहुँचती और मेरा मन इसकी धारणा नहीं कर सकता।"

🔶 "प्यारे राजकुमार ! तुम्हारी बातों से सिद्ध होता है कि तुम मन, बुद्धि नहीं हो। तो तुम खूब विचारो, तब मुझे बताओ कि तुम क्या हो ? उसी समय ईश्वर तुम तक आ जायेगा।"

🔷 खूब मनन कर लड़का बोला, "मेरा मन, मेरी बुद्धि वहाँ तक जाने में जवाब दे देते हैं।"

🔶 "अब तक तुम्हारी बुद्धि जहाँ तक पहुँची है, उस पर विचार करो कि 'मैं शरीर नहीं हूँ, मैं मन नहीं हूँ, मैं बुद्धि नहीं हूँ।' यदि ऐसा है तो इसकी अनुभूति करो। अमल में लाओ। यदि तुम सत्य का केवल इतना अंश भी व्यवहार में लाना सीख जाते हो तो तुम्हारी समस्त शोक-चिंताएँ समाप्त हो जायेंगी।" बालक को यह जताने में रामतीर्थ जी द्वारा कुछ उपदेश दिया गया कि वह स्वयं क्या है।

🔷 इसके बाद रामतीर्थ जी द्वारा दिन भर में किये गये कार्यों का विवरण पूछने पर राजकुमार ने अपने जागने, स्नान व भोजन करने, पढ़ने एवं चिट्ठियाँ लिखने आदि का ब्यौरा बताया। रामतीर्थ जी- "राजकुमार! इन छोटे-छोटे कामों के अतिरिक्त तुमने अगणित कार्य किये हैं।"

🔶 राजकुमार किंकर्तव्यविमूढ़ होकर उनकी बात पर मनन करने लगा।

🔷 रामतीर्थ जीः "तुम भोजन करते हो, उसे आमाशय में पहुँचाते हो, उसका रस बनाते हो, रक्त, मांस, मज्जा बनाते हो, हृदयगति चलाते हो, शरीर की शिरा-शिरा में रक्त का संचार करते हो। तुम्हीं बाल उगाते हो, शरीर के प्रत्येक अंग को पुष्ट करते हो। अब ध्यान दो कि कितने कार्य, कितनी क्रियाएँ तुम प्रत्येक क्षण करते रहते हो।"

🔶 लड़का बारम्बार सोचने लगा और बोलाः "महाराज जी! वस्तुतः इस शरीर में हजारों क्रियाएँ एक साथ हो रही हैं, जिन्हें बुद्धि नहीं जानती, मन जिनसे बेखबर है और फिर भी वे सब क्रियाएँ हो रही हैं। इन सबका कारण अवश्य मैं ही हो सकता हूँ। इन सबका कर्ता मैं ही हूँ। अतः मेरा यह कथन सर्वथा गलत था कि मैंने कुछ ही काम किये हैं।"

🔷 रामतीर्थ जी ने शरीर में इच्छा और अनिच्छा से होने वाले कार्यों के बारे में समझाते हुए कहाः "लोग यह भयंकर भूल करते हैं कि केवल उन्हीं कार्यों को अपने किये हुए मानते हैं जो मन अथवा बुद्धि के माध्यम से होते हैं और उन सब कार्यों को अस्वीकार कर देते हैं जो मन अथवा बुद्धि के माध्यम के बिना सीधे-सीधे हो रहे हैं। इस भूल तथा लापरवाही से ही वे अपने शुद्ध स्वरूप को मन के बंदीगृह में बंदी बना लेते हैं। इस प्रकार वे असीम को ससीम और परिच्छिन्न (सीमित) बनाकर दुःख भोगते हैं। ईश्वर तुम्हारे भीतर हैं और वह ईश्वर तुम स्वयं हो।

🔶 तुम जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं का साक्षी हो। तुम सर्वत्र विराजमान हो। तुम्हारी शक्ति सर्वव्यापिनी है। वही सितारों को चमका रही है, वही तुम्हारी आँखों में देखने की शक्ति दे रही है, वही नदियों को प्रवाहित कर रही है, वही ब्रह्माण्डों को क्षण-प्रतिक्षण बना-बिगाड़ रही है। क्या तुम वह शक्ति नहीं हो ? सचमुच तुम वही शक्ति हो, वही चैतन्य हो जो मन बुद्धि से परे है, जो सम्पूर्ण विश्व का शासन कर रहा है। वही आत्मदेव तुम हो, वही अज्ञेय, वही तेज, तत्त्व, शक्ति, जो जी चाहे कह लो, वही सर्वरूप जो सर्वत्र विद्यमान है, वही तुम हो।" इस प्रकार स्वामी रामतीर्थ ने बालक को आत्मानुभव की झलक चखा दी और वह उनके मार्गदर्शन अनुसार आत्मानुसंधान कर आत्मस्वरूप में स्थित हुआ, ज्ञातज्ञेय हो गया।

🔷 राजकुमारः "मैंने सवाल किया था कि ईश्वर क्या है? और मुझे पता चल गया कि मेरा अपना आपा ही ईश्वर है। मुझे अपने को ही जानना था। मेरे जानने से ईश्वर का पता लग गया।"

🔶 'ईश्वर क्या है?', 'मैं कौन हूँ ?' – ये प्रश्न बहुत सरल लगते हैं लेकिन इनका जवाब पाने की जिज्ञासा जिनके हृदय में जागती है, उनके माता-पिता धन्य हैं, कुल गोत्र धन्य हैं। धन्या माता पिता धन्यो.... ऐसे लोग बहुत कम होते हैं। जिन्हें इसका जवाब पाये बिना चैन नहीं आता, ऐसे तो कोई-कोई विरले होते हैं और ऐसे सच्चे जिज्ञासु को ईश्वर-तत्त्व का अनुभव किये हुए किन्हीं महापुरुष की शरण मिल जाये तो फिर इस खोज को पूर्ण होने में बहुत देर नहीं लगती।

🔷 भगवान श्रीराम जी के गुरुदेव वसिष्ठजी महाराज कहते हैं, "हे राम जी! ज्ञान समझना मात्र है, कुछ यत्न नहीं। संतों के पास जाकर प्रश्न करना कि 'मैं कौन हूँ? जगत क्या है? जीव क्या है? परमात्मा क्या है? संसार-बंधन क्या है? और इससे तरकर कैसे परम पद को प्राप्त होऊँ?' फिर ज्ञानवान जो उपदेश करें, उसके अभ्यास से आत्मपद को प्राप्त होगा, अन्यथा न होगा।"

🔶 में भी यही युक्ति बताते हुए कहते हैं, "तुम अपने-आपसे पूछो- "मैं कौन हूँ?' खाओ, पियो, चलो, घूमो, फिर पूछोः 'मैं कौन हूँ?'

🔷 'मैं विक्रम हूँ, मैं मनीषा हूँ, मै मंदीप हूँ, मै सुदर्शन हूँ ।'

🔶 यह तो तुम्हारी देह का नाम है। तुम कौन हो ? अपने को पूछा करो। जितनी गहराई से पूछोगे, उतना दिव्य अनुभव होने लगेगा। एकांत में शांत वातावरण में बैठकर ऐसा पूछो.... ऐसा पूछो कि बस, पूछना ही हो जाओ। पूछो की में पिछले जनम में भी था तो फिर जिसको जलाया गया, दफनाया गया, पानी में डुबाया गया वो कोन था, वो शरीर था, तुम कौन हो???

🔷 लगे रहो। खूब अभ्यास करोगे तब 'मैं कौन हूँ? ईश्वर क्या है?' यह प्रकट होने लगेगा और मन की चंचलता मिटने लगेगी, बुद्धि के विकार नष्ट होने लगेंगे तथा शरीर के व्यर्थ के विकार शांत होने लगेंगे। यदि ईमानदारी से साधना करने लगो न, तो छः महीने में वहाँ पहुँच जाओगे जहाँ छः साल से चला हुआ व्यक्ति भी नहीं पहुँच पाता है। तत्त्वज्ञान हवाई जहाज की यात्रा है।"

🔶 महापुरुषों के सत्संग का जीवन में जितना आदर होता है, जितनी 'ईश्वर क्या है ? मैं कौन हूँ ?' यह जानने की जिज्ञासा तीव्र होती है, उतनी महापुरुषों की कृपा शीघ्र पचती है और जीव चौरासी लाख योनियों की भटकने से बचकर अपने ईश्वरत्व का, अपने ब्रह्मत्व का साक्षात्कार कर लेता है।

👉 वैभव की कमी नहीं, पर आवश्यकता जितना हो समेटें

🔷 पक्षियों को देखिये! पशुओ को देखिये! वे प्रातः से लेकर सायंकाल तक उतनी खुराक बीनते चलते हेैं, जितनी वे पचा सकते हैं। पृथ्वी पर बिखरे चारे- दाने की कमी नहीं। सबेरे से शाम तक घाटा नहीं पड़ता। पर लेते उतना ही हैं, जितना मुँह माँगता और पेट सम्हालता है। यही प्रसन्न रहने की नीति है।       

🔶 जब उन्हें स्नान का मन होता है, तब इच्छित समय तक स्नान करते हैं। उतना ही बड़ा घोंसला बनाते हैं, जिसमें उनका शरीर समा सके। कोई इतना बड़ा नहीं बनाता, जिसमें समूचे समुदाय को बिठाया सुलाया जाय।

🔷 पेड़ पर देखिये हर पक्षी ने अपना छोटा घोंसला बनाया हुआ है। जानवर अपने रहने लायक छाया का प्रबन्ध करते हैं। वे जानते हैं कि सृष्टा के सम्राज्य में किसी बात की कमी नहीं। जब जिसकी जितनी जरूरत है, आसानी से मिल जाता है। आपस में लड़ने का झंझट क्यों मोल लिया जाय? हम इतना ही लें, जितनी तात्कालिक आवश्यकता हो। 

🔶 ऐसा करने से हम सुख- शांतिपूर्वक रहेंगे भी और उन्हें भी रहने देंगे, जो उसके हकदार हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 13 Dec 2017


👉 आज का सद्चिंतन 13 Dec 2017


👉 सुख चाहिए किन्तु दुःख से डरिये मत (भाग 1)

🔶 जीवन में दुःख, शोक संघर्षों का आना स्वाभाविक है। इससे कोई भी जीवधारी नहीं बच सकता। सुख, दुःख मानव-जीवन के दो समान पहलू हैं। सुख के बाद दुःख और दुःख के बाद सुख आते ही रहते हैं। यदि कोई इतना साधन सम्पन्न भी हो कि उसके जीवन में किसी दुःख, किसी अभाव अथवा किसी संघर्ष की सम्भावना को अवसर ही न मिले और वह निरन्तर अनुकूल परिस्थितियों में मौज करता रहे, तब भी एक दिन उसका एकरस सुख ही दुःख का कारण बन जायेगा। वह अपनी एकरसता से ऊब उठेगा, थक जायेगा। उसे एक अप्रिय नीरसता घेर लेगी, जिससे उसका मन विषाद से भरकर कराह उठेगा, वह दुःखी रहने लगेगा। मानव-जीवन में दुःख सुख के आगमन के अपने नियम को प्रकृति किसी भी अवस्था में अपवाद नहीं बना सकती। जो सुखी है उसे दुःख की कटुता अनुभव करनी ही होगी और इस समय जो दुःखी है उसे किसी न किसी कारण से सुख की शीतलता का अनुभव करने का अवसर मिलेगा ही।
   
🔷 दुःख सुख है क्या? यह किसी भी मनुष्य के लिए परिस्थितियों का परिवर्तन मात्र ही है। और यदि ठीक दृष्टिकोण से देखा जाये तो परिस्थितियां भी दुःख सुख का वास्तविक हेतु नहीं है। वास्तविक हेतु तो मनुष्य की मनःस्थिति ही है, जो किसी परिस्थिति विशेष में सुख-दुःख का आरोपण कर लिया करती है। बहुत बार देखा जा सकता है कि किसी समय कोई एक परिस्थिति मनुष्य को पुलकित कर देती है, हर्ष विभोर बना देती है, तो किसी समय वही अथवा उसी प्रकार की परिस्थिति पीड़ादायक बन जाती है। यदि सुख-दुःख का निवास किसी परिस्थिति विशेष में रहा होता तो तदनुकूल मनुष्य को हर बार सुखी या दुःखी ही होना चाहिए। एक जैसी परिस्थिति में यह सुख-दुःख की अनुभूति का परिवर्तन क्यों? वह इसीलिए कि सुख दुःख वास्तव में परिस्थितिजन्य न होकर मनोजन्य ही होते हैं।

 🔶 इस सत्य के अनुसार मनुष्य को सुखी अथवा दुःखी होने का कारण अपने अन्तःकरण में ही खोजना चाहिए, परिस्थितियों को श्रेय अथवा दोष नहीं देना चाहिए। जो मनुष्य अपने दुःख के लिए परिस्थितियों को कोसा अथवा सुख के लिए उन्हें धन्यवाद दिया करता है वह अपनी अल्पज्ञता का ही द्योतक करता है। वह सर्वदा सत्य है कि कोई भी मनुष्य दुःख की कामना तो करता ही नहीं, वह तो सदा सुख ही चाहा करता है। इसलिए उसे अपनी यह चाह पूरी करने के लिए परिस्थितियों से अधिक मन पर ध्यान देने का प्रयत्न करना चाहिए। उसे ईर्ष्या, द्वेष, चिन्ता, क्षोभ अथवा असन्तोष से अभिभूत न होने देना चाहिए। इस प्रकार का निराभिभूत मानव गोमुखी गंगाजल की तरह निर्मल एवं प्रसन्न होता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- दिसंबर 1966 पृष्ठ 21

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/July/v1.21

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.3

👉 Three Bases Of Personality

🔶 Our personality stands on three bases, namely body, mind & Atma. In order to make these three pure and bright, we have to adopt the process & practice of Karmayog, Gyanyog and Bhaktiyog. Accomplishment in life means to keep all our activities saturated with idealism. Body is purified by becoming a Karmayogi, mind is purified by becoming Gyanyogi & Atma is purified by becoming a Bhaktiyogi.

🔷 If every physical activity of ours is for the performance of duty, every thought of ours is for the affirmation of truth & wisdom & every emotion is to increase love & kinship, it should understood that all the three bases are advancing in the direction, which is desired & inspired by God. It is only by following this path that we can succeed in the test of achievement of purpose of life.
 
🔶 In order to reform the world, we should reform ourselves. A part of the world is sublimated to the extent, we can reform ourselves. It makes the world more beautiful by transmitting itself to another & thus the process goes on. We achieve the credit of really doing great service to the world by making our inner-self sublime.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 संजीवनी विद्या बनाम जीवन जीने की कला (भाग 4)

🔶 विचारों से ही अब्राहम लिंकन जैसे, जार्ज वाशिंगटन जैसे, गारफिल्ड जैसे छोटे-छोटे इनसान कितने महान् बन जाते हैं। विचार अगर मनुष्य के पास हों तो, आज अगर विचारशीलता और दूरदर्शी विवेकशीलता लोगों के अन्दर आ गई होती तो दुनिया खुशहाल होती। इनसान, इनसान न रहकर देवता हो गया होता और जमीन का वातावरण स्वर्ग जैसा होता। पर विचारशील है कहाँ? समझदारी है कहाँ? अगर समझदारी बढ़ेगी तो आदमी के अन्दर ईमानदारी बढ़ेगी, ईमानदारी बढ़ेगी तो आदमी में जिम्मेदारी आयेगी और जिम्मेदारी आयेगी तो बहादुरी आयेगी। चारों चीजें एक साथ जुड़ी हुई हैं। समझदारी इसका मूल है। हमको लोगों की समझदारी बढ़ाने के लिए जी-जान से कोशिश करनी चाहिए।
                 
🔷 प्राचीनकाल के ब्राह्मण और सन्त यही काम करते थे। वे अपना गुजारा कम में करते थे व जीवन का उद्देश्य यही रहता था कि लोगों की समझदारी बढ़ाएँ। आप लोगों से भी मेरी यही प्रार्थना है कि लोगों की समझदारी बढ़ाने के लिए अपने समय का जितना अंश आप लगा सकते हों, लगाएँ। दिमाग में से आप यह ख्याल निकाल पाए तो बड़ा अच्छा हो कि बहुत-सा पैसा इकट्ठा होना चाहिए। पैसा रहेगा नहीं। मैं एक बात आपको बताए देता हूँ। अगले दिनों समाज की ऐसी व्यवस्था बनने वाली है, जिससे कि धन व्यक्तिगत नहीं रह जाएगा। सच्चा अध्यात्मवाद आपको मालदार नहीं बनने देगा। चौबीसों घण्टे आपका दिमाग व शक्तियाँ मालदार बनने की ख्वाहिश में लगते हैं तो आप गलती पर हैं, आप ठीक कीजिए अपने आपको।
    
🔶 अपना गुजारा सामान्य मनुष्य जिस तरीके से करते हैं, आप भी उसी तरीके से गुजारा करना सीखिए। फिर आप देखेंगे कि आपके पास समय, श्रम, बुद्धि, क्षमताएँ कितनी ही चीजें बच जाती हैं, जो समाज के काम में लगाई जा सकती हैं। जरूरी नहीं कि आप अपना मकान छोड़कर बाहर चले जाएँ। आप अपने घर रहकर भी बहुत काम कर सकते हैं, जिससे आपका क्षेत्र, आपका गाँव, आपके समीपवर्ती वातावरण में जाने कैसी हवा पैदा हो सकती है। कमाल हो सकता है तो इसके लिए क्या करना पड़ेगा? इसके लिए मेरे ख्याल से आपको एक ट्रेनिंग लेनी चाहिए, छोटी से छोटी चीजों के लिए ट्रेनिंग की जरूरत पड़ती है। लुहार, संगीतज्ञ, रेलगाड़ी चलाने वाले, मोटर चलाने वाले, अध्यापक, चिकित्सक सभी को ट्रेनिंग लेनी पड़ती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 प्रज्ञायुग में मानवी गरिमा बढ़ेगी

🔷 प्रज्ञा युग में हर व्यक्ति सामाजिक नीति मर्यादाओं को महत्व देगा। कोई ऐसा काम न करेगा जिससे मानवी गरिमा एवं समाज व्यवस्था को आँच आती हो। शिष्टाचार, सौजन्य, सहयोग, ईमानदारी, वचन का पालन, निश्छलता जैसी कसौटियों पर पारस्परिक व्यवहार खरा उतरना चाहिए। अनीति का न तो सहयोग किया जाय और न प्रत्यक्ष परोक्ष समर्थन। सामाजिक सुव्यवस्था के लिए यह आवश्यक है कि मूढ़ मान्यताओं का, अवाँछनीय प्रचलनों का, हानिकारक कुरीतियों का, विरोध किया जाय। इस प्रकार छल, शोषण उत्पीड़न जैसे अनाचारों से भी असहयोग, प्रतिरोध एवं संघर्ष का रुख अपनाया जाय। अनीति आचरण एवं अनुपयुक्त प्रचलनों को समान रूप से अहितकर माना जायेगा और उन्हें अपनाना तो दूर कोई उनका समर्थन तक करने को सहमत न होगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1984 पृष्ठ 29

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 164)

🌹  तीन संकल्पों की महान् पूर्णाहुति

🔷 अच्छा हो कि इस गोवर्धन को मिल-जुलकर उठाया जाए। अच्छा हो इस समुद्र बाँधने की कड़ी में कंकड़-पत्थर ढोने मात्र से श्रेय लूटा और यशस्वी बना जाए। प्रज्ञा परिजनों के लिए इस योजना में हाथ बँटाना उनके निज के हित में है, जो खोएँगे उस से हजार गुना अधिक पाएँगे। बीज को कुछ क्षण ही गलने का कष्ट उठाना पड़ता है। इसके उपरांत तो बढ़ने, हरियाने और फूलने फलने का आनंद ही आनंद है। वैभव ही वैभव है। स्वतंत्रता संग्राम में जो अग्रगामी बने वे मिनिस्टर बनने से लेकर स्वतंत्रता सेनानियों वाली पेंशन, सम्मान सहित प्राप्त कर सके। यह अवसर भी ऐसा ही है, जिसमें ली हुई भागीदारी मणिमुक्तकों की खदान, कौड़ी मोल खरीद लेने के समान है जिसका श्रेय यश और वैभव सुनिश्चित है उसे हस्तगत करने में कृपणता से अधिक और कुछ नहीं हो सकता।

🔶 हमने जैसा कि इस पुस्तक में समय-समय पर संकेत किया है, जैसे हमारे बॉस के आदेश मिलते रहे हैं, वैसे ही हमारे संकल्प बनते, पकते व फलते होते गए हैं। सन् १९८६ वर्ष का उत्तरार्द्ध हमारे जीवन का महत्त्वपूर्ण सोपान है। इस वर्ष के समापन के साथ हमारे पचहत्तरवें वर्ष की हीरक जयंती का वह अध्याय पूरा होता है, जिनके साथ एक-एक लाख के पाँच कार्यक्रम जुड़े हुए हैं। उसकी पूर्णाहुति का समय भी आ पहुँचा है। अखण्ड ज्योति पत्रिका जो इस मिशन की प्रेरणा पुंज रही है, जिसके कारण यह विशाल परिवार बनकर खड़ा हो गया है, अपने जीवन के पचासवें वर्ष में प्रवेश कर रही है। उसकी स्वर्ण जयंती इस उपलक्ष्य में मनायी जा रही है। तीन वर्ष से हमारी सूक्ष्मीकरण साधना चल रही है। उसे सावित्री साधना या भारतवर्ष की देवात्म-शक्ति की कुण्डलिनी जागरण साधना भी कह सकते हैं, पर हमारी साधना विशुद्धतः लोकमंगल के प्रयोजनों के निमित्त हुई है। जिससे न केवल अपने देश की गरिमा बढ़े, वरन धरती पर बिखरे अनेक अभावों, संकटों, व्यवधानों, विपत्ति भरे घटाटोपों का निराकरण भी सम्भव हो सके।

🔷 इन तीन महाअनुष्ठानों की पूर्णाहुति एक विशेष धर्मानुष्ठान के द्वारा की जा रही है। २४ लक्ष्य के २४ महापुरश्चरणों के समापन पर पूर्णाहुति के अवसर पर सन् १९५८ में हमने १००० कुण्डीय यज्ञ किया था जो अविस्मरणीय बन गया। इस बार की तीन साधनाओं की पूर्णाहुति सारे भारत में कुल एक हजार स्थानों पर एक सौ आठ कुण्डीय यज्ञ एवं युग निर्माण सम्मेलनों के रूप में होगी। एक वर्ष में एक हजार यज्ञों के माध्यम से एक लाख यज्ञों का संकल्प भी हमारा पूरा होगा एवं विभिन्न क्षेत्रों के वातावरण का परिशोधन करने में समृद्धि तथा प्रगति में सहायता मिलेगी।

🔶 यह न समझा जाए कि ये सभी संकेत आदेश किसी व्यक्ति विशेष के लिए हैं, इसलिए उसे ही पूरा करना चाहिए। यहाँ यह समझ रखना चाहिए कि इतना बड़ा भार कोई एक व्यक्ति न तो उठा सकता है और न उसे लक्ष्य तक पहुँचा सकता है। यह व्यक्ति वस्तुतः समुदाय है जिसे आज की स्थिति में प्रज्ञा परिवार जैसी छोटी इकाई समझा जा सकता है, किन्तु अगले दिनों यह उदार चेताओं की एक महान् बिरादरी होगी। इस यशस्वी वर्ग में सम्मिलित होना, उनके दायित्वों में हाथ बँटाना उन बड़भागियों के लिए एक अलौकिक वरदान है, जो अपने हिस्से का काम करके उपयुक्त अनुदान प्राप्त करते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.190

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.22

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