गुरुवार, 17 अगस्त 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 44)

🌹  मनुष्य के मूल्यांकन की कसौटी उसकी सफलताओं, योग्यताओं एवं विभूतियों को नहीं, उसके सद्विचारों और सत्कर्मों को मानेंगे।

🔴 मनुष्य की श्रेष्ठता की कसौटी यह होना चाहिए कि उसके द्वारा मानवीय उच्च मूल्यों का निर्वाह कितना हो सका, उनको कितना प्रोत्साहन दे सका। योग्यताएँ, विभूतियाँ तो साधन मात्र हैं। लाठी एवं चाकू स्वयं न तो प्रशंसनीय हैं, न निंदनीय। उनका प्रयोग पीड़ा पहुँचाने के लिए हुआ या प्राण रक्षा के लिए? इसी आधार पर उनकी भर्त्सना या प्रशंसा की जा सकती है। मनुष्य की विभूतियाँ एवं योग्यताएँ भी ऐसे ही साधन हैं। उनका उपयोग कहाँ होता है, इसका पता उसके विचारों एवं कार्यों से लगता है। वे यदि सद् हैं तो वह साधन भी सद् हैं, पर यदि वे असद् हैं तो वह साधन भी असद् कहे जाएँगे। मनुष्यता का गौरव एवं सम्मान इन जड़- साधनों से नहीं, उसके प्राणरूप सद्विचारों एवं सत्प्रवृत्तियों से जोड़ा जाना चाहिए। उसी आधार पर सम्मान देने, प्राप्त करने की परम्परा बनाई जानी चाहिए।
 
🔵 जिस कार्य से प्रतिष्ठा बढ़ती है, प्रशंसा होती है, उसी काम को करने के लिए, उसी मार्ग पर चलने के लिए लोगों को प्रोत्साहन मिलता है। हम प्रशंसा और निंदा करने में, सम्मान और तिरस्कार करने में थोड़ी सावधानी बरतें, तो लोगों को कुमार्ग पर न चलने और सत्पथ अपनाने में बहुत हद तक प्रेरणा दे सकते हैं। आमतौर से उनकी प्रशंसा की जाती है, जिन्होंने सफलता, योग्यता, सम्पदा एवं विभूति एकत्रित कर ली है। चमत्कार को नमस्कार किया जाता है। यह तरीका गलत है। विभूतियों को लोग केवल अपनी सुख- सुविधा के लिए ही एकत्रित नहीं करते वरन् प्रतिष्ठा प्राप्त करना भी उद्देश्य होता है।
    
🔴 जब धन- वैभव वालों को ही समाज में प्रतिष्ठा मिलती है, तो मान का भूखा मनुष्य किसी भी कीमत पर उसे प्राप्त करने के लिए आतुर हो उठता है। अनीति और अपराधों की बढ़ोत्तरी का एक प्रमुख कारण यह है कि अंधी जनता सफलता की प्रशंसा करती है और हर असफलता को तिरस्कार की दृष्टि से देखती है। धन के प्रति, धनी के प्रति आदर बुद्धि तभी रहनी चाहिए जब वह नीति और सदाचारपूर्वक कमाया गया हो, यदि अधर्म और अनीति से उपार्जित धन द्वारा धनी बने हुए व्यक्ति के प्रति हम आदर दृष्टि रखते हैं तो इससे उस प्रकार के अपराध करने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन ही मिलता है और इस दृष्टि से अपराध वृद्धि को प्रोत्साहन ही मिलता है और इस दृष्टि से अपराध वृद्धि में हम स्वयं भी भागीदार बनते हैं।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.61

👉 दाम्पत्य-जीवन को सफल बनाने वाले कुछ स्वर्ण-सूत्र (भाग 1)

🔴 पति-पत्नी में कभी झगड़ा नहीं होना चाहिये। यह शोभनीय भी नहीं है और कल्याणकारी भी नहीं है। पति-पत्नी के झगड़े का मतलब है पूरे परिवार का नाश और उनके प्रगाढ़ प्रेम का अर्थ है, सुन्दर परिवार, सुखदायी गृहस्थ। पति-पत्नी के पारिवारिक लड़ाई-झगड़े के कुछ बाह्य और कुछ मनोवैज्ञानिक कारण होते हैं। उनमें से अकर्तव्यशीलता भी एक विशेष कारण है। यदि पति-पत्नी परस्पर अपने बाह्य और मनोवैज्ञानिक कर्तव्यों को सावधानीपूर्वक पूरा करते रहें तो उन दोनों में कभी कोई लड़ाई-झगड़ा न हो।

🔵 बाह्य कर्तव्यों में पति का सबसे पहला कर्तव्य है कि वह पत्नी के स्वास्थ्य का अपनी ओर से पूरा ध्यान रखे। बहुत स्वार्थी पति अपनी सेवा लेने के साथ-साथ पत्नी को हर समय किसी न किसी काम में लगाये रखते हैं। उनका विचार रहता है कि पत्नी से जितना ज्यादा से ज्यादा काम लिया जा सके, लिया जाना चाहिये। वह तो काम करने और सेवा करने के लिये आई ही है। जगह पर पानी, जगह पर खाना, यहां तक कि कपड़े-लत्ते और किताब, कागज, स्याही, दवात, तक जगह पर ही लेते हैं।

🔴 किसी वस्तु अथवा किसी काम के लिए जगह से उठना जानते ही नहीं। यहाँ तक कि कलम पेंसिल तक उसी से बनवाते और फाउंटेनपेन में रोशनाई तक उससे हीं भरवाया करते हैं। इतना ही नहीं इन तुच्छ कामों के लिए भी उन्हें आराम करती हुई अथवा कोई और आवश्यक काम करती हुई पत्नी को उठा देने में जरा भी दया या संकोच नहीं करते। बहुत से बाबू साहबों को तो पत्नी ही कोट-पतलून और टाई-जूते पहनाती है और हर रोज जूते पर पालिश किया करती है।

🔵 रसोई और नाश्ते के सम्बन्ध में तो उसे जितना हैरान किया जा सकता है किया जाता है। और यह मुसीबत छुट्टी के दिन तो और भी बढ़ जाती है। जरा यह बनाना, थोड़ा वह भी बना लेना, आज सुबह इसकी चाय है, शाम को उसका भोजन है, बहुत दिन से यह नहीं बना, वह चीज खाये तो कई दिन हो गये- की ऐसी रेल लग जाती है कि बेचारी पत्नी को दिन भर दम मारने और चूल्हें, अंगीठी के पास से उठने की फुरसत नहीं मिलती। आप तो कोच, कुरसी या चारपाई पर पड़ गये और मिनट-मिनट पर तरह-तरह की फरमाइशें चलाने लगे। अपनी इस नवाबी में उन्हें इस बात का जरा भी ध्यान नहीं रहता है कि उनकी इस फैल-सूफी से बेचारी पत्नी की हड्डी-हड्डी टूट जाती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति जुलाई 1968 पृष्ठ 26
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1968/July/v1.26

👉 आत्मचिंतन के क्षण 17 Aug 2017

🔴 जो मनुष्य संसार की सेवा करता है वह अपनी ही सेवा करता है। जो मनुष्य दूसरों की मदद करता है वास्तव में वह अपनी ही मदद करता है। यह सदा ध्यान में रखने योग्य बात है। जब आप दूसरे व्यक्ति की सेवा करते हैं, जब आप अपने देश की सेवा करते हैं तब आप यह समझकर कि ईश्वर ने आपको सेवा द्वारा अपने को उन्नत तथा सुधारने का दुर्लभ अवसर दिया है। उस मनुष्य के आप कृतज्ञ हों जिसने आपको सेवा करने का अवसर दिया हो।

🔵 निष्काम सेवा करने से आप अपने हृदय को पवित्र बना लेते हैं। अहंभाव, घृणा, ईर्ष्या, श्रेष्ठता का भाव और उसी प्रकार के और सब आसुरी सम्पत्ति के गुण नष्ट हो जाते हैं। नम्रता, शुद्ध प्रेम, सहानुभूति, क्षमा, दया की वृद्धि होती है। भेद-भाव मिट जाते हैं। स्वार्थपरता निर्मूल हो जाती है। आपका जीवन विस्तृत तथा उदार हो जायेगा। आप एकता का अनुभव करने लगेंगे। अन्त में आपको आत्मज्ञान प्राप्त हो जायेगा। आप सब में “एक” और “एक” में ही सबका अनुभव करने लगेंगे। आप अत्यधिक आनन्द का अनुभव करने लगेंगे। संसार कुछ भी नहीं है केवल ईश्वर की ही विभूति है। लोक सेवा ही ईश्वर की सेवा है। सेवा को ही पूजा कहते हैं।

🔴 अधिकाँश साधक कुछ सेवा के बाद ही शीघ्र ही ईश्वर प्राप्ति के लिये अधीर हो जाते हैं यह निष्काम सेवा या कर्मयोग का लक्षण नहीं, कर्मयोगी वे हैं जो नम्रता तथा आत्मभाव से मनुष्यों की सेवा करते हैं। वही वास्तव में अखिल विश्व के नायक बन जाते हैं। सब लोग उनकी बड़ाई तथा आदर करते हैं। जितना ही आत्मभाव से सेवा करने जायें आप उतनी ही विशेष शक्ति, पौरुष, तथा योग्यता प्राप्त करेंगे। आप इसका अभ्यास करके ही स्वयं अनुभव प्राप्त करें।
                                        
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 परिस्थितियों के अनुकूल बनिये। (भाग 1)

🔵 हमारे एक मित्र की ऐसी आदत है कि जब तक सब कुछ चीजें यथास्थान न हो, सफाई, शान्ति, और उचित वातावरण न हो, तब तक वे कुछ भी नहीं कर पाते। घर पर आते ही चीजों को इधर-उधर यथा स्थान न पाकर वे बिगड़ उठते हैं, उनकी मानसिक शान्ति विचलित हो उठती है।
 
🔴 इस प्रकार के आदर्शवादी संसार में कम नहीं हैं। वे चाहते हैं कि संसार में उच्चता, पवित्रता, स्वच्छता, शुद्धता एवं शान्ति प्राप्त हो। इनके अभाव में प्रायः क्रुद्ध हुए रहते हैं। उनका मन क्रोध से भरा रहता है। वे परिस्थितियों को दोष देते हैं। कहते हैं “क्या करें, हमें तो अवकाश ही नहीं मिलता। कार्य करें, तो किस प्रकार करें। कभी कुछ हमें उलझाये ही रहता है।” परिस्थितियों की अनुकूलता की ही प्रतीक्षा में से व्यक्ति दिन सप्ताह और वर्ष बरबाद कर रहे हैं।

🔵 परिस्थितियों की अनुकूलता की प्रतिज्ञा करते-2 मूल उद्देश्य दूर पड़ा रह जाता है। हमें जीवन में जो कष्ट है, जो हमारा लक्ष्य है, उसे हम परिस्थिति के प्रपंच में पड़ कर विस्मृत कर रहे हैं।

🔵 हमने अपनी मनः स्थिति ऐसी संवेदनशील बना ली है कि सूक्ष्म सी बात से ही हम विचलित हो उठते हैं। आदर्श परिस्थितियाँ इस व्यस्त संसार में दुष्प्राय हैं। कुछ न कुछ कमी, कुछ अड़चन, मामूली बीमारियाँ, मौसम का परिवर्तन, भाग्य की करवटें सदा चलती रहेंगी। समय के साथ परिस्थितियाँ बदलती जायेंगी। संभव है वे आपके विपक्ष में हों या आपको प्रतीत हो कि महान संकट आने वाला है, फिर भी हमें अपने मूल उद्देश्य को दृष्टि से दूर नहीं करना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति मई 1949 पृष्ठ 16
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1949/May/v1.16

👉 आज का सद्चिंतन 17 Aug 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 17 Aug 2017


👉 जीवन के लिए

🔵 पत्नी ने कहा - आज धोने के लिए ज्यादा कपड़े मत निकालना…

🔴 पति- क्यों ??

🔵 उसने कहा -अपनी काम वाली बाई दो दिन नहीं आएगी…

🔴 पति- क्यों??

🔵 पत्नी- गणपति के लिए अपने नाती से मिलने बेटी के यहाँ जा रही है, बोली थी…

🔴 पति- ठीक है, अधिक कपड़े नहीं निकालता…

🔵 पत्नी- और हाँ गणपति के लिए पाँच सौ रुपए दे दूँ उसे ? त्यौहार का बोनस..

🔴 पति- क्यों? अभी दिवाली आ ही रही है, तब दे देंगे…

🔵 पत्नी- अरे नहीं बाबा!! गरीब है बेचारी, बेटी-नाती के यहाँ जा रही है, तो उसे भी अच्छा लगेगा… और इस महँगाई के दौर में उसकी पगार से त्यौहार कैसे मनाएगी बेचारी!!

🔴 पति- तुम भी ना… जरूरत से ज्यादा ही भावुक हो जाती हो…

🔵 पत्नी- अरे नहीं… चिंता मत करो… मैं आज का पिज्जा खाने का कार्यक्रम रद्द कर देती हूँ… खामख्वाह पाँच सौ रूपए उड़ जाएँगे, बासी पाव के उन आठ टुकड़ों के पीछे…

🔴 पति- वा, वा… क्या कहने!! हमारे मुँह से पिज्जा छीनकर बाई की थाली में??

🔵 तीन दिन बाद… पोंछा लगाती हुई कामवाली बाई से पति ने पूछा...

🔴 पति- क्या बाई?, कैसी रही छुट्टी?

🔵 बाई- बहुत बढ़िया हुई साहब… दीदी ने पाँच सौ रूपए दिए थे ना.. त्यौहार का बोनस..

🔴 पति- तो जा आई बेटी के यहाँ…मिल ली अपने नाती से…?

🔵 बाई- हाँ साब… मजा आया, दो दिन में 500 रूपए खर्च कर दिए…

🔴 पति- अच्छा ! मतलब क्या किया 500 रूपए का??

🔵 बाई- नाती के लिए 150 रूपए का शर्ट, 40 रूपए की गुड़िया, बेटी को 50 रूपए के पेढे लिए, 50 रूपए के पेढे मंदिर में प्रसाद चढ़ाया, 60 रूपए किराए के लग गए.. 25 रूपए की चूड़ियाँ बेटी के लिए और जमाई के लिए 50 रूपए का बेल्ट लिया अच्छा सा… बचे हुए 75 रूपए नाती को दे दिए कॉपी-पेन्सिल खरीदने के लिए… झाड़ू-पोंछा करते हुए पूरा हिसाब उसकी ज़बान पर रटा हुआ था…

🔴 पति- 500 रूपए में इतना कुछ???

🔵 वह आश्चर्य से मन ही मन विचार करने लगा...उसकी आँखों के सामने आठ टुकड़े किया हुआ बड़ा सा पिज्ज़ा घूमने लगा, एक-एक टुकड़ा उसके दिमाग में हथौड़ा मारने लगा… अपने एक पिज्जा के खर्च की तुलना वह कामवाली बाई के त्यौहारी खर्च से करने लगा… पहला टुकड़ा बच्चे की ड्रेस का, दूसरा टुकड़ा पेढे का, तीसरा टुकड़ा मंदिर का प्रसाद, चौथा किराए का, पाँचवाँ गुड़िया का, छठवां टुकड़ा चूडियों का, सातवाँ जमाई के बेल्ट का और आठवाँ टुकड़ा बच्चे की कॉपी-पेन्सिल का..आज तक उसने हमेशा पिज्जा की एक ही बाजू देखी थी, कभी पलटकर नहीं देखा था कि पिज्जा पीछे से कैसा दिखता है… लेकिन आज कामवाली बाई ने उसे पिज्जा की दूसरी बाजू दिखा दी थी… पिज्जा के आठ टुकड़े उसे जीवन का अर्थ समझा गए थे…

🔴 “जीवन के लिए खर्च” या “खर्च के लिए जीवन” का नवीन अर्थ एक झटके में उसे समझ आ गया…l

बुधवार, 16 अगस्त 2017

👉 क्या मैं शरीर ही हूँ-उससे भिन्न नहीं? (अंतिम भाग)

🔵 मैं काया हूँ। यह जन्म के दिन से लेकर-मौत के दिन तक मैं मानता रहा। यह मान्यता इतनी प्रगाढ़ थी कि कथा पुराणों की चर्चा में आत्मा काया की पृथकता की चर्चा आये दिन सुनते रहने पर भी गले से नीचे नहीं उतरती थी। शरीर ही तो मैं हूँ-उससे अलग मेरी सत्ता भला किस प्रकार हो सकती है? शरीर के सुख-दुख के अतिरिक्त मेरा सुख-दुख अलग क्यों कर होगा? शरीर के लाभ और मेरे लाभ में अन्तर कैसे माना जाय? यह बातें न तो समझ में आती थीं और न उन पर विश्वास जमता था। परोक्ष पर प्रत्यक्ष कैसे झुठलाया जाय? काया प्रत्यक्ष है-आत्मा अलग है, उसके स्वार्थ, सुख-दुःख अलग हैं, यह बातें कहने सुनने भर की ही हो सकती हैं। सो रामायण गीता वाले प्रवचनों की हाँ में हाँ तो मिलाता रहा पर उसे वास्तविकता के रूप में कभी स्वीकार न किया।
 
🔴 पर आज देखता हूँ कि वह सचाई थी जो समझ में नहीं आई और वह झुठाई थी जो सिर पर हर घड़ी सवार रही। शरीर ही मैं हूँ। यही मान्यता-शराब की खुमारी की तरह नस-नस में भरी रही। बोतल पर बोतल छानता रहा तो वह खुमारी उतरती भी कैसे? पर आज आकाश में उड़ता हुआ वायुभूत-एकाकी-’मैं’ सोचता हूँ। झूठा जीवन जिया गया। झूठ के लिए जिया गया, झूठे बनकर जिया गया। सचाई आँखों से ओझल ही बनी रही। मैं एकाकी हूँ, शरीर से भिन्न हूँ। आत्मा हूँ। यह सुनता जरूर रहा पर मानने का अवसर ही नहीं आया। यदि उस तथ्य को जाना ही नहीं-माना भी होता तो वह अलभ्य अवसर जो हाथ से चला गया, इस बुरी तरह न जाता। जीवन जिस मूर्खता पूर्ण रीति-नीति से जिया गया वैसा न जिया जाता।

🔵 शरीर मेरा है-मेरे लिए है, मैं शरीर नहीं हूँ। यह छोटी-सी सच्चाई यदि समय रहते समझ में आ गई होती तो कितना अच्छा होता। तब मनुष्य जीवन जैसे सुर-दुर्लभ सौभाग्य का लाभ लिया गया होता, पर अब क्या हो सकता है। अब तो पश्चाताप ही शेष है। भूल भरी मूर्खता के लिए न जाने कितने लम्बे समय तक रुदन करना पड़ेगा?

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति मार्च 1972 पृष्ठ 5
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1972/March/v1.5

👉 दिखावा ना करे!

🔵 मैनेजमेंट की शिक्षा प्राप्त एक युवा नौजवान की नौकरी लग जाती है, उसे कंपनी की और सेकाम करने के लिए अलग से एक केबिन दे दिया जाता है। वह नौजवान जब पहले दिन ऑफिस जाता है और बैठ कर अपने शानदार केबिन को निहार रहा होता है तभी दरवाजा खट-खटाने कीआवाज आती है दरवाजे पर एक साधारण सा व्यक्ति रहता है, पर उसे अंदर आने कहने के बजाय वह युवा व्यक्ति उसे आधा घँटा बाहर इंतजार करने के लिए कहता है। आधा घँटा बीतने के पश्चात वह आदमी पुन: ऑफिस के अंदर जाने की अनुमति मांगता है, उसे अंदर आते देख युवक टेलीफोन से बात करना शुरु कर देता है वह फोन पर बहुत सारे पैसो की बाते करता है,अपने ऐशो आराम के बारे मे कई प्रकार की डींगें हाँकने लगता है, सामने वाला व्यक्ति उसकी सारी बाते सुन रहा होता है, पर वो युवा व्यक्ति फोन पर बड़ी-बड़ी डींगें हांकनाजारी रखता है।

🔴 जब उसकी बाते खत्म हो जाती है तब जाकर वह उस साधारण व्यक्ति से पूछता है है कि तुम यहाँ क्या करने आये हो?

🔵 वह आदमी उस युवा व्यक्ति को विनम्र भाव से देखते हुए कहता है, “साहब, मै यहाँ टेलीफोन रिपेयर करने के लिए आया हुँ, मुझे खबर मिली है कि आप जिस टेलीफोन से बात कर रह थे वो हफ्ते भर से बँद पड़ा है इसीलिए मै इस टेलीफोन को रिपेयर करने के लिए आया हूँ।”

🔴 इतना सुनते ही युवा व्यक्ति शर्म से लाल हो जाता है और चुप-चाप कमरे से बाहर चला जाता है। उसे उसके दिखावे का फल मिल चुका होता है।

🔵 कहानी का सार यह है कि जब हम सफल होते है एक लेवल हासिल करते हैं, तब हम अपने आप पर बहुत गर्व होता है और यह स्वाभाविक भी है। गर्व करने से हमे स्वाभिमानी होने का एहसास होता है लेकिन  एक सीमा के बाद ये अहंकार का रूप ले लेता है और आप स्वाभिमानी से अभिमानी बन जाते हैं और अभिमानी बनते ही आप दुसरो के सामने दिखावा करने लगते हैं, और जो लोग ऐसा करते हैं वो उसी लेवल पर या उससे भी निचे आ जाते हैं |

🔴 अतः हमें ध्यान रखना चाहिए कि हम चाहे कितने भी सफल क्यों ना हो जाएं व्यर्थ के अहंकार और झूठे दिखावे में ना पड़ें अन्यथा उस युवक की तरह हमे भी कभी न कभी शर्मिदा होना पड़ सकता है। हमे हमेशा एक लेवल हासिल करने के बाद दुसरे फिर तीसरे और इस तरह से हमे अपने सर्वश्रेस्ट लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए लगातार काम करते रहना चाहियें

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 16 Aug 2017

👉 आज का सद्चिंतन 16 Aug 2017

👉 आत्मचिंतन के क्षण 16 Aug 2017

🔴 आपको कोई काम निरुत्साह से, लापरवाही से, बेमन से नहीं करना चाहिए यदि मन की ऐसी वृत्ति रखोगे तो जल्दी उन्नति नहीं कर सकते। सम्पूर्ण चित्त, मन, बुद्धि आत्मा उस काम में लगा होना चाहिये। तभी आप उसे योग या ईश्वर पन कह सकते हो। कुछ मनुष्य हाथों से काम करते हैं और उनका मन कलकत्ते के बाजार में होता है, बुद्धि दफ्तर में होती है और आत्मा स्त्री या पुत्र में संलग्न रहती है। यह बुरी आदत है। आपको कोई भी काम हो उसे योग्य सन्तोषप्रद ढंग से करना चाहिये। आपका आदर्श यह होना चाहिये कि एक समय में एक ही काम अच्छे ढंग से किया जाये।

🔵 लगातार असफलता होने से आपको साहस नहीं छोड़ना चाहिए असफलता के द्वारा आपको अनुभव मिलता है। आपको वे कारण मालूम होंगे जिनसे असफलता हुई है और भविष्य में उनसे बचने के लिये सचेत रहोगे। आपको बड़ी-बड़ी होशियारी से उन कारणों से रक्षा करनी होगी। इन्हीं असफलताओं की कमजोरी में से आपको शक्ति मिलेगी। असफल होते हुए भी आपको अपने सिद्धान्त, लक्ष्य, निश्चय और साधन का दृढ़ मति होकर पालन और अनुसरण करना होगा। आप कहिये “कुछ भी हो मैं अवश्य पूरी सफलता प्राप्त करूंगा, मैं इसी जीवन में- नहीं नहीं, इसी क्षण आत्म साक्षात्कार करूंगा। कोई असफलता मेरे मार्ग में रुकावट नहीं डाल सकती।”

🔴 प्रयत्न और कोशिश आपकी ओर से होनी चाहिये भूखे मनुष्य हो आप ही खाना पड़ेगा। प्यासे को पानी पीना ही पड़ेगा। आध्यात्मिक सीढ़ी पर आपको हर एक कदम अपने अपने आप ही रखना होगा। इस बात को भली प्रकार स्मरण रखिये। साहसी बनो। यद्यपि बेरोजगार हो कुछ खाने को नहीं हो, तन पर वस्त्र भी न होवे तब भी सदा प्रसन्न रहो। आपका यथार्थ स्वभाव सच्चिदानन्द है। यह बाह्य नाशवान स्थूल शरीर तो माया का ही कार्य हैं मुस्कुराओ, सीटी बजाओ, हँसो कूदो और आनन्द में मग्न होकर नाचो।
                                        
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 15 अगस्त 2017

👉 क्या मैं शरीर ही हूँ-उससे भिन्न नहीं? (भाग 4)

🔵 अरे स्वजन और मित्र कहलाने वाले लोगों-इस अत्याचार से मुझे बचाओ। अपनी आँखों के आगे ही मुझे इस तरह जलाया जाना तुम देखते रहोगे। मेरी कुछ भी सहायता न करोगे। अरे यह क्या-बचाना तो दूर उलटे तुम्हीं मुझमें आग लगा रहे हो। नहीं-नहीं, मुझे जलाओ मत-मुझे मिटाओ मत। कल तक मैं तुम्हारा था- तुम मेरे थे-आज ही क्या हो गया जो तुम सबने इस तरह मुझे त्याग दिया? इतने निष्ठुर तुम सब क्यों बन गये? मैं और मेरा संसार क्या इस चिता की आग में ही समाप्त हुआ? सपनों का अन्त-अरमानों का विनाश-हाय री चिता-हत्यारी चिता- तू मुझे छोड़। मरने का जलने का मेरा जरा भी जी नहीं है। अग्नि देवता, तुम तो दयालु थे। सारी निर्दयता मेरे ही ऊपर उड़ेलने के लिए क्यों तुल गये?
 
🔴 लो, सचमुच मर गया। मेरी काया का अन्त हो ही गया। स्मृतियाँ भी धुँधली हो चलीं। कुछ दिन चित्र फोटो जिये। श्राद्ध तर्पण का सिलसिला कुछ दिन चला। दो तीन पीढ़ी तक बेटे पोतों को नाम याद रहे। पचास वर्ष भी पूरे न हो पाये कि सब जगह से नाम निशान मिट गया। अब किसी को बहुत कहा जाय कि इस दुनिया में ‘मैं’ पैदा हुआ था। बड़े अरमानों के साथ जिया था, जीवन को बहुत सँजोया, सँभाला था, उसके लिए बहुत कुछ जिया था, पर वह सारी दौड़, धूप ऐसे ही निरर्थक चली गई। मेरी काया तक ने मेरा साथ न दिया-जिसमें मैं पूरी तरह घुल गया था। जिस काया के सुख को अपना सुख और जिसके दुःख को अपना दुःख समझा। सच तो यह है कि मैं ही काया था-और काया ही मैं था हम दोनों की हस्ती एक हो गई थी; पर यह क्या अचम्भा हुआ, मैं अभी भी मौजूद हूँ।

🔵 वायुभूत हुआ आकाश में मैं अभी भी भ्रमण कर रहा हूँ। पर वह मेरी अभिन्न सहचरी लगने वाली काया न जाने कहाँ चली गई। अब वह मुझे कभी नहीं मिलेगी क्या? उसके बिना मैं रहना नहीं चाहता था, रह नहीं सकता था, पर हाय री निर्दय नियति। तूने यह क्या कर डाला। काया चली गई। माया चली गई। मैं अकेला ही वायुभूत बना भ्रमण कर रहा हूँ। एकाकी-नितान्त एकाकी। जब काया ने ही साथ छोड़ दिया तो उसके साथ जुड़े हुए परिवारी भी क्या याद रखते-क्यों याद रखते? याद रखे भी रहे हों तो अब उससे अपना बनना भी क्या है?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति मार्च 1972 पृष्ठ 4
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1972/March/v1.4

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 15 Aug 2017


👉 आज का सद्चिंतन 15 Aug 2017

सोमवार, 14 अगस्त 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 43)

🌹  अनीति से प्राप्त सफलता की अपेक्षा नीति पर चलते हुए असफलता को शिरोधार्य करेंगे।

🔴 जिसे हम बुरा समझते हैं, उसे स्वीकार न करना सत्याग्रह है और यह किसी भी प्रियजन, संबंधी या बुजुर्ग के साथ किया जा सकता है। इसमें अनुचित या अधर्म रत्तीभर नहीं है। इतिहास में ऐसे उदाहरण पग-पग पर भरे पड़े हैं। प्रह्लाद, भरत, विभीषण, बलि आदि की अवज्ञा प्रख्यात है। अर्जुन को गुरुजनों से लड़ना पड़ा था। मीरा ने पति का कहना नहीं माना था। मोहग्रस्त अभिभावक अपने बच्चों को अनेक तरह के कुकृत्य करने के लिए विवश करते हैं। बेईमानी का धंधा करने वाले बुजुर्ग अपने बच्चों से भी वही कराते हैं। अपनी मूढ़ता और रूढ़िवादिता की रीति-नीति अपनाने के लिए भी दबाते हैं, न मानने पर नाराज होते हैं, अवज्ञा का आरोप लगाते हैं, ऐसी दशा में किंकर्तव्यविमूढ़ होने की जरूरत नहीं है। आदर्श यही रहना चाहिए कि केवल औचित्य को ही स्वीकार किया जाएगा, चाहे वह किसी के पक्ष में जाता हो।
 
🔵 अनौचित्य करे ही हालत में अस्वीकार किया जाएगा, चाहे किसी ने भी उसके लिए कितना ही दबाव क्यों न डाला हो। आज की सामाजिक कुरीतियों के अंधानुकरण में पुरानी पीढ़ी ही अग्रणी है। बच्चों का जल्दी विवाह कर उन्हें स्वास्थ्य तथा शिक्षा से वंचित करना, उनका मिथ्या मोह मात्र है। नम्रतापूर्वक ऐसे अवसरों पर अपनी हठ, असहमति व्यक्त की जा सकती है। दृढ़तापूर्वक स्पष्ट शब्दों में यह कह दिया जाए कि हमें किसी भी शर्त पर खर्चीला विवाहोन्माद स्वीकार नहीं। जब करना होगा तो बिना दहेज, जेवर तथा बिना धूमधाम का विवाह ही करेंगे। देखने भर में यह अवज्ञा है, पर वस्तुतः इसमें हर किसी का केवल हित साधन ही सन्निहित है। इसलिए बुरा लगने पर भी कड़वी दवा की तरह यह अवज्ञा सबके लिए श्रेयस्कर है। अतएव उसे किसी प्रकार अनुचित अथवा अधर्म नहीं कहा जा सकता।
    
🔴 दोस्ती के नाम पर लोग सिगरेट, शराब, जुआ, सिनेमा आदि के कुमार्ग पर घसीटना चाहते हैं। ऐसे अवसरों पर भी अपनी सहमति को स्पष्ट और कड़े शब्दों में व्यक्त कर सकते हैं। दोस्ती का मतलब मित्र को कुमार्ग से छुड़ाना है। पथ-भ्रष्ट करने के लिए घसीट ले जाना नहीं। इसी प्रकार कर्ज माँगने वाले, भीख के लिए अड़ने वाले, अनीति का विरोध न करके चुप रहने का आग्रह करने वाले लोग आए दिन सामने आते रहते हैं और चतुरतापूर्वक अपने तर्क तथा प्रतिभा का ऐसा प्रयोग करते हैं कि अनिच्छा होने पर भी उनके प्रभाव में आकर वैसा ही करने को विवश होते हैं। ऐसे अवसरों पर हमारा साहस इतना प्रखर होना चाहिए कि नम्र किंतु स्पष्ट शब्दों में इनकार कर सकें। इनकार, असहयोग, विरोध और संघर्ष इन चार शस्त्रों से हम अनीति और विवेक का सामना कर सकते हैं। सत्य और न्याय के लिए इन शस्त्रों का प्रयोग हमें साहसी शूरवीर योद्धा की तरह करते भी रहना चाहिए।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.59

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.9

👉 क्या मैं शरीर ही हूँ-उससे भिन्न नहीं? (भाग 3)

🔵 मौत के जरा से आघात से मेरा स्वरूप यह कैसा हो गया। अब तो मेरी मृत काया-हिलती डुलती भी नहीं-बोलती, सोचती भी नहीं? अब तो उसके कुछ अरमान भी नहीं है। हाय, यह कैसी मलीन, दयनीय, घिनौनी बनी जमीन पर लुढ़क रही है। अब तो यह पलंग बिस्तर पर सोने तक का अधिकार खो बैठी। कुशाओं बान से ढकी-गोबर से लिपी गीली भूमि पर यह पड़ी है। अब कोई चिकित्सक भी इसका इलाज करने को तैयार नहीं। कोई बेटा, पोता गोदी में नहीं आता।

🔴 पत्नी छाती तो कूटती है पर साथ सोने से डरती है। मेरा पैसा-मेरा वैभव-मेरा सम्मान हाय रे! सब छिन गया-हार से मैं बुरी तरह लुट गया। मेरे कहलाने वाले लोग ही-मेरा सब कुछ छीन कर मुझे इस दुर्गति के साथ घर से निकाल रहें हैं। क्या यही अपनी दुर्दशा कराने के लिए मैं जन्मा? यही है क्या मेरा अन्त-यही था मेरा लक्ष्य, यही है क्या मेरी उपलब्धि। जिसके लिए कितने पुरुषार्थ किये थे-क्या उसका निष्कर्ष यही है? यही हूँ मैं-जो मुर्दा बना पड़ा हूँ-और लकड़ियों की चिता में जल कर अगले ही क्षण अपना अस्तित्व सदा के लिए खोने जा रहा हूँ।

🔵 लो अब पहुँच गया मैं चिता पर। लो, मेरा कोमल मखमल जैसा शरीर-जिसे सुन्दर, सुसज्जित, सुगन्धित बनाने के लिए घण्टों शृंगार किया करता था, अब आ गया अपनी असली जगह पर। लकड़ियों का ढेर-उसके बीच दबाया हुआ मैं। लो यह लगी आग। लो, अब मैं जला। अरे मुझे जलाओ मत। इन खूबसूरत, हड्डियों में मैं अभी और रहना चाहता हूँ, मेरे अरमान बहुत हैं, इच्छायें तो हजार में से एक भी पूरी नहीं हुई। मुझे उपार्जित सम्पदाओं से अलग मत करो, प्रियजनों का वियोग मुझे सहन नहीं। इस काया को जरा सा कष्ट होता था तो चिकित्सा, उपचार मैं बहुत कुछ करता था। इस काया को इस निर्दयतापूर्वक मत जलाओ।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति मार्च 1972 पृष्ठ 4
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1972/March/v1.4

👉 आज का सद्चिंतन 14 Aug 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 Aug 2017


रविवार, 13 अगस्त 2017

👉 क्या मैं शरीर ही हूँ-उससे भिन्न नहीं? (भाग 2)

🔵 आत्म चिन्तन कहेगा- नहीं-नहीं-नहीं। आत्मा इतना हेय और हीन नहीं हो सकता। वह इतना अपंग और असमर्थ-पराश्रित और दुर्बल कैसे होगा? यह तो प्रकृति के पराधीन पेड़-पौधों जैसा-मक्खी, मच्छरों जैसा जीवन हुआ। क्या इसी को लेकर-मात्र जीने के लिए मैं जन्मा। सो भी जीना ऐसा जिसमें न चैन, न खुशी, न शान्ति, न आनन्द, न सन्तोष। यदि आत्मा-सचमुच परमात्मा का अंश है तो वह ऐसी हेय स्थिति में पड़ा रहने वाला हो ही नहीं सकता। या तो मैं हूँ ही नहीं।

🔴 नास्तिकों के प्रतिपादन के अनुसार या तो पाँच तत्वों के प्रवाह में एक ‘भंवर जैसी बबूले जैसी क्षणिक काया लेकर उपज पड़ा हूँ और अगले ही क्षण अभाव के विस्मृति गर्त में समा जाने वाला हूँ। या फिर कुछ हूँ तो इतना तुच्छ और अपंग हूँ जिसमें उल्लास और सन्तोष जैसा-गर्व और गौरव जैसा-कोई तत्व नहीं है। यदि मैं शरीर हूँ तो-हेय हूँ। अपने लिए और इस धरती के लिए भारभूत। पवित्र अन्न को खाकर घृणित मल में परिवर्तन करते रहने वाले-कोटि-कोटि छिद्रों वाले इस कलेवर से दुर्गन्ध और मलीनता निसृत करते रहने वाला-अस्पर्श्य-घिनौना हूँ ‘मैं’। यदि शरीर हूँ तो इससे अधिक मेरी सत्ता होगी भी क्या?

🔵 मैं यदि शरीर हूँ तो उसका अन्त क्या है? लक्ष्य क्या है? परिणाम क्या है? मृत्यु-मृत्यु-मृत्यु। कल नहीं तो परसों वह दिन तेजी से आँधी तूफान की तरह उड़ता उमड़ता चला आ रहा है, जिसमें आज की मेरी यह सुन्दर सी काया-जिसे मैंने अत्यधिक प्यार किया-प्यार क्या जिसमें पूरी तरह समर्पित हो गया-घुल गया। अब वह मुझसे विलग हो जायगी। विलग ही नहीं अस्तित्व भी गँवा बैठेगी। काया में घुला हुआ ‘मैं’-मौत के एक ही थपेड़े में कितना कुरूप-कितना विकृत-कितना निरर्थक-कितना घृणित हो जायगा कि उसे प्रिय परिजन तक-कुछ समय और उसी घर में रहने देने के लिए सहमत न होंगे जिसे मैंने ही कितने अरमानों के साथ-कितने कष्ट सहकर बनाया था। क्या यही मेरे परिजन हैं? जिन्हें लाड़-चाव से पाला था। अब ये मेरी इस काया को-घर में से हटा देने के लिए-उसका अस्तित्व सदा के लिए मिटा देने के लिए क्यों आतुर हैं? कल वाला ही तो मैं हूँ।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति मार्च 1972 पृष्ठ 4
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1972/March/v1.4

👉 आज का सद्चिंतन 13 Aug 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 13 Aug 2017


शनिवार, 12 अगस्त 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 42)

🌹  अनीति से प्राप्त सफलता की अपेक्षा नीति पर चलते हुए असफलता को शिरोधार्य करेंगे।

🔴 हम एक-एक करके सताए जाते हैं, इसका एक ही कारण है कि सामूहिक प्रतिरोध की क्षमता खो गई। उसे जगाया जाना चाहिए। आज जो एक पर बीत रही है, वह कल अपने पर भी बीत सकती है। दूसरे पर होने वाले अत्याचार का प्रतिरोध हम न करेंगे तो हमारी सहायता के लिए क्यों आएगा? यह सोचकर व्यक्तिगत सुरक्षा की इस चपेट में अपने को भी चोट लगे, आर्थिक तथा दूसरे प्रकार की क्षति उठानी पड़े तो भी इसे मनुष्यता के उत्तरदायित्व का मूल्य समझकर चुकाना चाहिए। इसे सहन करना ही चाहिए। शूरवीरों को आघात सहने का ही पुरस्कार मिलता है और वे इसी आधार पर लोक-श्रद्धा के अधिकारी बनते हैं।
 
🔵 लोक-श्रद्धा के अधिकारी तीन ही हैं-१ संत, (२) सुधारक, (३) शहीद। जिन्होंने अपने आचरणों, विचारों और भावनाओं में आदर्शवादिता एवं उत्कृष्टता का समावेश कर रखा है, वे संत हैं। विपन्न परिस्थितियों को बदलकर जो सुव्यवस्था उत्पन्न करने में संलग्न हैं-अनौचित्य के स्थान पर औचित्य की प्रतिष्ठापना कर रहे हैं, वे सुधारक हैं। अन्याय से जूझने में जिन्होंने आघात सहे और बर्बादी हो हँसते हुए शिरोधार्य किया है, वे शहीद हैं। ऐसे महामानवों के प्रति मनुष्यता सदा कृतज्ञ रही है और इतिहास उनका सदा अभिनंदन करता रहा है। भले ही आपत्ति सहनी पड़े, पर इस गौरव से गौरवान्वित हो सकता हो, उसे अपने को धन्य ही मानना चाहिए। अनीति का सामूहिक प्रतिरोध करने की प्रवृत्ति हमें जन-मानस में जाग्रत करनी चाहिए और जिन्होंने इस संदर्भ में कुछ कष्ट सहा हो, शौर्य दिखाया हो, त्याग किया हो, उनका भाव भरा सार्वजनिक अभिनंदन किया जाना चाहिए, ताकि वैसा प्रोत्साहन दूसरों को भी मिले और जन-जीवन में अनीति से लड़ने की उमंग उठ पड़े।
    
🔴 हमें कई बार ऐसी बात मानने और ऐसे काम करने के लिए विवश किया जाता है, जिन्हें स्वीकार करने को अपनी आत्मा नहीं कहती, फिर भी हम दबाव में आ जाते हैं और इंकार नहीं कर पाते। इच्छा न होते हुए भी उस दबाव में आकर वह करने लगते हैं, जो न करना चाहिए। ऐसे दबावों में मित्रों या बुजुर्गों का निर्देश इतने आग्रहपूर्वक सामने आता है कि गुण-दोष का ध्यान रखने वाला असमंजस में पड़ जाता है। क्या करें, क्या न करें? कुछ सूझ नहीं पड़ता। कमजोर प्रकृति के मनुष्य प्रायः ऐसे अवसरों पर ‘ना’ नहीं कह पाते और इच्छा न रहते हुए भी वैसा करने लगते हैं। इस बुरी स्थिति में साहसपूर्वक इनकार कर देना चाहिए।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.57

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.9

👉 क्या मैं शरीर ही हूँ-उससे भिन्न नहीं? (भाग 1)

🔵 मैं क्या हूँ? मैं कौन हूँ? मैं क्यों हूँ? इस छोटे से प्रश्न का सही समाधान न कर सकने के कारण ‘मैं’ को कितनी विषम विडम्बनाओं में उलझना पड़ता है और विभीषिकाओं में संत्रस्त होना पड़ता है, यदि यह समय रहते समझा जा सके तो हम वह न रहें, जो आज हैं। वह न सोचें जो आज सोचते हैं। वह न करें जो आज करते हैं।

🔴 हम कितने बुद्धिमान हैं कि धरती आकाश का चप्पा-चप्पा छान डाला और प्रकृति के रहस्यों को प्रत्यक्ष करके सामने रख दिया। इस बुद्धिमत्ता की जितनी प्रशंसा की जाय उतनी कम और अपने आपके बारे में जितनी उपेक्षा बरती गई उसकी जितनी निन्दा की जाय वह भी कम ही है।

🔵 जिस काया को शरीर समझा जाता है क्या यही मैं हूँ? क्या कष्ट, चोट, भूख, शीत, आतप आदि से पग-पग पर व्याकुल होने वाला अपनी सहायता के लिए बजाज दर्जी, किसान, रसोइया, चर्मकार, चिकित्सक आदि पर निर्भर रहने वाला ही मैं हूँ? दूसरों की सहायता के बिना जिसके लिए जीवन धारण कर सकना कठिन हो-जिसकी सारी हँसी-खुशी और प्रगति दूसरों की कृपा पर निर्भर हो, क्या वही असहाय, असमर्थ, मैं हूँ? मेरी आत्म निर्भरता क्या कुछ भी नहीं है? यदि शरीर ही मैं हूँ तो निस्सन्देह अपने को सर्वथा पराश्रित और दीन, दुर्बल ही माना जाना चाहिए।

🔴 परसों पैदा हुआ, खेल-कूद, पढ़ने-लिखने में बचपन चला गया। कल जवानी आई थी। नशीले उन्माद की तरह आँखों में, दिमाग में छाई रही। चञ्चलता और अतृप्ति से बेचैन बनाये रही। आज ढलती उम्र आ गई। शरीर ढलने गलने लगा। इन्द्रियाँ जवाब देने लगी। सत्ता, बेटे, पोतों के हाथ चली गई। लगता है एक उपेक्षित और निरर्थक जैसी अपनी स्थिति है। अगली कल यही काया जरा जीर्ण होने वाली है। आँखों में मोतियाबिन्द, कमर-घुटनों में दर्द, खाँसी, अनिद्रा जैसी व्याधियाँ, घायल गधे पर उड़ने वाले कौओं की तरह आक्रमण की तैयारी कर रही हैं।

🔵 अपाहिज और अपंग की तरह कटने वाली जिन्दगी कितनी भारी पड़ेगी। यह सोचने को जी नहीं चाहता वह डरावना और घिनौना दृश्य एक क्षण के लिए भी आँखों के सामने आ खड़ा होता है रोम-रोम काँपने लगता है? पर उस अवश्यंभावी भवितव्यता से बचा जाना सम्भव नहीं? जीवित रहना है तो इसी दुर्दशा ग्रस्त स्थिति में पिसना पड़ेगा। बच निकलने का कोई रास्ता नहीं। क्या यही मैं हूँ? क्या इसी निरर्थक विडम्बना के कोल्हू के चक्कर काटने के लिए ही ‘मैं’ जन्मा? क्या जीवन का यही स्वरूप है? मेरा अस्तित्व क्या इतना ही तुच्छ है?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति मार्च 1972 पृष्ठ 3

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1972/March/v1.3

👉 आज का सद्चिंतन 12 Aug 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 12 Aug 2017


👉 आजादी

🔵 एक समय की बात हैं, एक सेठ और सेठानी रोज सत्संग में जाते थे। सेठजी के एक घर एक पिंजरे में तोता पाला हुआ था। तोता रोज सेठ-सेठानी को बाहर जाते देख एक दिन पूछता हैं कि सेठजी आप रोज कहाँ जाते है। सेठजी बोले कि भाई सत्संग में ज्ञान सुनने जाते है। तोता कहता है सेठजी फिर तो कोई ज्ञान की बात मुझे भी बताओ। तब सेठजी कहते हैं की ज्ञान भी कोई घर बैठे मिलता हैं। इसके लिए तो सत्संग में जाना पड़ता हैं। तोता कहता है कोई बात नही सेठजी आप मेरा एक काम करना। सत्संग जाओ तब संत महात्मा से एक बात पूछना कि में आजाद कब होऊंगा। सेठजी सत्संग ख़त्म होने के बाद संत से पूछते है की महाराज हमारे घर जो तोता है उसने पूछा हैं की वो आजाद कब होगा?

🔴 संत को ऐसा सुनते हीं पता नही क्या होता है जो वो बेहोश होकर गिर जाते है। सेठजी संत की हालत देख कर चुप-चाप वहाँ से निकल जाते है। घर आते ही तोता सेठजी से पूछता है कि सेठजी संत ने क्या कहा। सेठजी कहते है की तेरे किस्मत ही खराब है जो तेरी आजादी का पूछते ही वो बेहोश हो गए। तोता कहता है कोई बात नही सेठजी में सब समझ गया। दूसरे दिन सेठजी सत्संग में जाने लगते है तब तोता पिंजरे में जानबूझ कर बेहोश होकर गिर जाता हैं।
      
🔵 सेठजी उसे मरा हुआ मानकर जैसे हीं उसे पिंजरे से बाहर निकालते है तो वो उड़ जाता है। सत्संग जाते ही संत सेठजी को पूछते है की कल आप उस तोते के बारे में पूछ रहे थे ना अब वो कहाँ हैं। सेठजी कहते हैं, हाँ महाराज आज सुबह-सुबह वो जानबुझ कर बेहोश हो गया मैंने देखा की वो मर गया है इसलिये मैंने उसे जैसे ही बाहर निकाला तो वो उड़ गया। तब संत ने सेठजी से कहा की देखो तुम इतने समय से सत्संग सुनकर भी आज तक सांसारिक मोह-माया के पिंजरे में फंसे हुए हो और उस तोते को देखो बिना सत्संग में आये मेरा एक इशारा समझ कर आजाद हो गया।

🔴 कहानी से तात्पर्य : हम सत्संग में तो जाते हैं ज्ञान की बाते करते हैं या सुनते भी हैं, पर हमारा मन हमेशा सांसारिक बातों में हीं उलझा रहता हैं। सत्संग में भी हम सिर्फ उन बातों को पसंद करते है जिसमे हमारा स्वार्थ सिद्ध होता हैं। हमे वहां भी मान यश मिल जाये यही सोचते रहते हैं। जबकि सत्संग जाकर हमें सत्य को स्वीकार कर सभी बातों को महत्व देना चाहिये और जिस असत्य, झूठ और अहंकार को हम धारण किये हुए हैं उसे साहस के साथ मन से उतार कर सत्य को स्वीकार करना चाहिए

शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

👉 उद्देश्यों की पूर्ति हेतु साधन और उनकी पूर्ति

🔵 यह हमारी वास्तविकता की परीक्षा वेला है। अज्ञान- असुर के विरुद्ध लड़ने के लिए प्रचुर साधनों की आवश्यकता पड़ेगी। जनशक्ति, बुद्धिशक्ति, धनशक्ति जितनी भी जुटाई जा सके उतनी कम है। बाहर के लोग आपाधापी की दलदल में आकंठ मग्न हैं। इस युग पुकार को अखण्ड ज्योति परिवार ही पूरा करेगा।

🔴 जिनको पारिवारिक उत्तरदायित्वों का न्यूनतम निर्वाह करने के लिए जितना समय लगाना अनिवार्य है, वे उस कार्य में उतना ही लगाएँ और शेष समय अज्ञान के असुर से लड़ने के लिए लगाएँ। जिनके बच्चे बड़े हो चुके, जिनके घर में निर्वाह व्यवस्था करने वाले दूसरे लोग मौजूद हैं वे वह उत्तरदायित्व उन लोगों पर मिल- जुलकर पूरा करने की व्यवस्था बनाएँ। जिनने संतान के उत्तरदायित्व पूरे कर लिए वे पूरी तरह वानप्रस्थ में प्रवेश करें और परिव्राजक बनकर जन- जागरण का अलख जगाएँ। जगह- जगह छोटे- छोटे आश्रम बनाने की आवश्यकता नहीं है। इस समय तो हमें परिव्राजक बनकर भ्रमण करने के अतिरिक्त दूसरी बात सोचनी ही नहीं चाहिए।

🔵 बूढ़े होने पर संन्यास लेने की कल्पना निरर्थक है। जब शरीर अर्द्धमृतक हो जाता है और दूसरों की सहायता के बिना दैनिक निर्वाह ही कठिन हो जाता है, तो फिर सेवा- साधना कौन करेगा। युग सैनिकों की भूमिका तो वे ही निभा सकते हैं, जिनके शरीर में कड़क मौजूद है। जो शरीर और मन से समर्थ हैं। इस तरह भी भावनाशील एवं प्रबुद्ध जनशक्ति की अधिक मात्रा में आवश्यकता है। सड़े- गले, अधपगले, हरामखोर और दुर्व्यसनी तो साधु- बाबाओं के अखाड़ों में वैसे ही बहुत भरे पड़े हैं। युग देवता को तो वह प्रखर जनशक्ति चाहिए, जो अपना बोझ किसी पर न डाले वरन् दूसरों को अपनी बलिष्ठ भुजाओं से ऊँचा उठा सकने में समर्थ हों।

🔴 अखण्ड ज्योति परिवार में से ऐसी ही समर्थ एवं सुयोग्य जनशक्ति का आह्वान किया जा रहा है। योग, तप, सेवा, पुरुषार्थ जवानों द्वारा ही किया जा सकता है। वोल्टेज कम पड़ जाने पर पंखा, बत्ती आदि सभी टिमटिम जलते हैं। नवनिर्माण के लिए भी प्रौढ़शक्ति ही काम देगी। बुड्ढे- बीमारों से वह काम भी चलने वाला नहीं है। अस्तु, आह्वान उसी समर्थ जनशक्ति का किया जा रहा है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- मार्च 1975 पृष्ठ 56-57

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 41)

🌹  अनीति से प्राप्त सफलता की अपेक्षा नीति पर चलते हुए असफलता को शिरोधार्य करेंगे।  

🔴 पौधे की जड़ में पानी मिलता जाएगा तो वह बढ़ता ही चलेगा। अनीति का पोषण होता रहा तो वह दिन-दूनी रात-चौगुनी बढ़ती रहेगी। अन्याययुक्त आचरण करने वालों को प्रोत्साहन उनसे मिलता है, जो इसे सहन करते हैं। उत्पीड़ित चुपचाप सब कुछ सह लेता है, यह समझकर अत्याचारी की हिम्मत दूनी-चौगुनी हो जाती है और वह अपना मार्ग निष्कंटक समझकर और भी अधिक उत्साह से अनाचरण करने पर उतारू हो जाता है। अन्याय सहना-अपने जैसे अन्य, असंख्य को उसी तरह का उत्पीड़न सहने के लिए परिस्थितियाँ पैदा करना है। अनीति सहना प्रत्यक्षतः आततायी को प्रोत्साहन देना है
 
🔵 दूसरों को अनीति से पीड़ित होते देखकर कितने ही लोग सोचते हैं कि जिस पर बीतेगी वह भुगतेगा। हम क्यों व्यर्थ का झंझट मोल लें। एक सताया जाता रहता है-पड़ोसी चुपचाप देखता रहता है। दुष्ट लोग हमें भी न सताने लगें, यह सोचकर वे आँखें फेर लेते हैं और उद्दंडों को उद्दंडता बरतते रहने का निर्बाध अवसर मिलता रहता है। चार गुंडे सौ आदमियों की भीड़ में घुसकर सरे बाजार एक-दो को चाकुओं से गोद सकते हैं। सारी भीड़ तमाशा देखेगी, आँखें फेरेगी या भाग खड़ी होगी। कहीं हम भी चपेट में न आ जाएँ, इस भय से कोई उन चार दुष्टों को रोकने या पकड़ने का साहस न करेगा।
   
🔴 इस जातीय दुर्बलता को समझते हुए ही आए दिन दुस्साहसिक अपराधों की, चोरी, हत्या, लूट, कत्ल, बलात्कार आदि की घटनाएँ घटित होती रहती हैं। जानकार, संबंधित और जिन्हें सब कुछ मालूम है, वे गवाही तक देने नहीं जाते और आतंकवादी अदालतों से भी छूट जाते हैं और दूने-चौगुने जोश से फिर जन-साधारण को आतंकित करते हैं। एक-एक करके विशाल जन-समूह थोड़े से उद्दंडों द्वारा सताया जाता रहता है। लोग भयभीत, आतंकित, पीड़ित रहते हैं, पर कुछ कर नहीं पाते। मन ही मन कुड़कुड़ाते रहते हैं। विशाल जन-समूह ‘निरीह’ कहलाए और थोड़े से दुष्ट-दुराचारी निर्भय होकर संत्रस्त, आतंकित करते रहें, यह किसी देश की जनता के लिए सामाजिकता के लिए भारी कलंक-कालिमा है। इससे उस वर्ग की कायरता, नपुंसकता, भीरुता, निर्जीवता ही सिद्ध होती है। ऐसा वर्ग पुरुष कहलाने का अधिकारी नहीं। पुरुषार्थ करने वाले को, साहस और शौर्य रखने वाले को पुरुष कहते हैं। जो अनीति का प्रतिरोध नहीं कर सकता, उसे नपुंसक, निर्जीव और अर्द्धमृत भी कहना चाहिए। यह स्थिति हमारे लिए अतीव लज्जाप्रद है।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.56

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.9

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 129)

🌹  चौथा और अंतिम निर्देशन

🔵 ‘‘इसके लिए जो करना होगा, समय-समय पर बताते रहेंगे। योजना को असफल बनाने के लिए, इस शरीर को समाप्त करने के लिए जो दानवी प्रहार होंगे, उससे बचाते चलेंगे। पूर्व में हुए आसुरी आक्रमण की पुनरावृत्ति कभी भी किसी रूप में सज्जनों-परिजनों पर प्रहार आदि के रूप में हो सकती है। पहले की तरह सबमें हमारा संरक्षण साथ रहेगा। अब तक जो काम तुम्हारे जिम्मे दिया है, उन्हें अपने समर्थ सुयोग्य परिजनों के सुपुर्द करते चलना, ताकि मिशन के किसी काम की चिंता या जिम्मेदारी तुम्हारे ऊपर न रहे। जिस महा परिवर्तन का ढाँचा हमारे मन में है, उसे पूरा तो नहीं बताते, पर उसे समयानुसार प्रकट करते रहेंगे। ऐसे विषम समय, में उस रणनीति को समय से पूर्व प्रकट करने से उद्देश्य की हानि होगी।’’

🔴 इस बार हमें अधिक समय रोका नहीं गया। बैटरी चार्ज करके बहुत दिनों तक काम चलाने वाली बात नहीं बनी। उन्होंने कहा कि ‘‘हमारी ऊर्जा अब तुम्हारे पीछे अदृश्य रूप से चलती रहेगी। अब हमें एवं जिनको आवश्यकता होगी, उन ऋषियों को तुम्हारे साथ सदैव रहना और हाथ बँटाते रहना पड़ेगा। तुम्हें किसी अभाव का, आत्मिक ऊर्जा की कमी का कभी अनुभव नहीं होगा। वस्तुतः यह ५ गुनी और बढ़ जाएगी।’’

🔵 हमें विदाई दी गई और हम शान्तिकुञ्ज लौट आए। हमारी सूक्ष्मीकरण सावित्री साधना राम नवमी १९८४ से आरम्भ हो गई।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.145

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.19

👉 विचारों से बदलेगी दुनिया

🔵 साहित्य की आज कहीं कमी है? जितनी पत्र-पत्रिकाएं आज प्रकाशित होती हैं, जितना साहित्य नित्य विश्व भर में छपता है उस पहाड़ के समान सामग्री को देखते हुए लगता है, वास्तव में मनीषी बढ़े हैं, पढ़ने वाले भी बढ़े हैं। लेकिन इन सबका प्रभाव क्यों नहीं पड़ता? क्यों एक लेखक की कलम कुत्सा भड़काने में ही निरत रहती है एवं क्यों उस साहित्य को पढ़कर तुष्टि पाने वालों की संख्या बढ़ती चली जाती है, इसके कारण ढूंढ़े जायें तो वहीं आना होगा, जहाँ कहा गया था- “पावनानि न भवन्ति”। यदि इतनी मात्रा में उच्चस्तरीय, चिन्तन को उत्कृष्ट बनाने वाला साहित्य रचा गया होता एवं उसकी भूख बढ़ाने का माद्दा जन-समुदाय के मन में पैदा किया गया होता तो क्या ये विकृतियाँ नजर आतीं जो आज समाज में विद्यमान है। दैनन्दिन जीवन की समस्याओं का समाधान यदि सम्भव हो सकता है तो वह युग-मनीषा के हाथों ही होगा।

🔴 जैसा कि हम पूर्व में भी कह चूके हैं कि नवयुग यदि आएगा तो विचार शोधन द्वारा ही, क्रान्ति होगी तो वह लहू और लोहे से नहीं विचारों की काट द्वारा होगी, समाज का नव-निर्माण होगा तो वह सद्-विचारों की प्रतिष्ठापना द्वारा ही सम्भव होगा। अभी तक जितनी मलिनता समाज में प्रविष्ट हुई है, वह बुद्धिमानों के माध्यम से ही हुई है। द्वेष-कलह, नस्लवाद-जातिवाद, व्यापक नर-संहार जैसे कार्यों में बुद्धिमानों ने ही अग्रणी भूमिका निभाई है। यदि वे सन्मार्गगामी होते, उनके अन्तःकरण पवित्र होते, तप, ऊर्जा का सम्बल उन्हें मिला होता तो उन्होंने विधेयात्मक चिन्तन प्रवाह को जन्म दिया होता, सत्साहित्य रचा होता, ऐसे आन्दोलन चलाए होते।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- जुलाई 1984 पृष्ठ 21

👉 आत्मचिंतन के क्षण 11 Aug 2017

🔴 अनेक प्रकार के मन होते हैं। विचारने की शैली अनेक प्रकार की हुआ करती है विचारने के भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण हुआ करते हैं। अतएव हर एक दृष्टिकोण निर्दोष है, लोगों के मत के अनुकूल बनो। उनके मत को भी ध्यान तथा सहानुभूति पूर्वक देखो और उसका आदर करो। अपने अहंकार चक्र के क्षुद्र केन्द्र से बाहर निकलो और अपनी दृष्टि को विस्तृत करो। अपना मत सर्वग्राही और उदार बना सब के मत के लिए स्थान रखो। तभी आपका जीवन विस्तृत और हृदय उदार होगा। आपको धीरे-धीरे मधुर और नम्र होकर बातचीत करनी चाहिए। मितभाषी बनो।

🔵 अवाँछनीय विचारों और सम्वेदनाओं को निकाल दो। अभिमान या चिड़चिड़ेपन को लेश मात्र भी बाकी नहीं रहने दो। अपने आपको बिल्कुल भुला दो। अपने व्यक्तित्व का भी अंश या भाव न रहने पावे। सेवा कार्य के लिए पूर्ण आत्मसमर्पण की आवश्यकता है यदि आप में उपरोक्त सद्गुण मौजूद हैं तो आप संसार के लिये पथ प्रदर्शक और अमूल्य प्रसाद रूप हो। आप एक अलौकिक सुगन्धित पुष्प हो जिसकी सुगन्ध देश भर में व्याप्त हो जायेगी। आपने बुद्धत्व की उच्चतम अवस्था को प्राप्त कर लिया।

🔴 नम्र, दयालु, उपकारी और सहायक बनो। यही नहीं कि कभी-कभी यथावकाश इन गुणों का उपयोग किया जावे बल्कि सर्व काल में आपके सारे जीवन में इन्हीं गुणों का अभ्यास होना चाहिये। एक भी शब्द ऐसा मत कहो जिससे दूसरों को ठेस पहुँचे। बोलने से पहले भली प्रकार विचार करो और देख लो कि जो कुछ आप कहने लगे हो वह दूसरों के चित्त को दुखी तो नहीं करेगा-क्या वह बुद्धिसंगत मधुर सत्य तथा प्रिय तो है। पहले से ही ध्यानपूर्वक समझ लो कि आपके विचार शब्दों और कार्यों का क्या प्रभाव होगा। प्रारम्भ में आप कई बार भले ही असफल हो सकते हो परंतु यदि आप अभ्यास करते रहे तो अंतः में आप अवश्य सफल हो जाओगे।
                                        
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आमदनी खर्च करने का उद्देश्य क्या हो?

🔵 आप यह उद्देश्य सामने रखिये कि परिवार के प्रत्येक सदस्य को जीवनरक्षक पदार्थ और निपुणता दायक वस्तुएँ पर्याप्त परिणाम में प्राप्त होती रहें। जब तक ये चीजें न आ जावें, तब तक किसी प्रकार की आराम या विलासिता की वस्तुओं से बचे रहिये। यदि किसी का स्वास्थ्य खराब है, तो पहले उसकी चिकित्सा होनी चाहिए। यदि किसी विद्यार्थी का अध्ययन चल रहा है, तो उसके लिए सभी को थोड़ा बहुत त्याग करना चाहिए। कृत्रिम आवश्यकताओं को दूर करने का सब को प्रयत्न करना चाहिए। शिक्षा, त्याग और पारस्परिक सद्भाव से सभी सामूहिक परिवार के लिए प्रयत्नशील हो।

🔴 प्रत्येक व्यक्ति की अपने खर्च पर गंभीरता से विचार कर कृत्रिम आवश्यकताओं, व्यसनों, फैशन, मिथ्या प्रदर्शन, फिजूल खर्ची कम करनी चाहिए। आदतों को सुधारना ही श्रेष्ठ और स्थायी है। ऐश आराम और विलासिता के खर्चो को कम करके बचे हुए रुपये को जीवन रक्षक अथवा निपुणता दायक या किसी टिकाऊ खर्च पर व्यय करना चाहिए। बचत का रुपया बैंक में भविष्य के आकस्मिक खर्चों, विवाह शादियों, मकान, या बीमारियों के लिए रखना चाहिए। प्रत्येक पैसा समझदारी से जागरुक रह कर भविष्य पर विश्वास न करते हुए खर्च करने से प्रत्येक व्यक्ति को अधिकतम संतोष और सुख होगा।

🔵 कमाई और आमदनी से नहीं, आपकी आर्थिक स्थिति आपके खर्च से नापी जाती है। यदि खर्च आमदनी से अधिक हुआ तो बड़ी आय से क्या लाभ?

🔴 हम एक प्रिंसिपल महोदय को जानते हैं जिन्हें 800 रु. मासिक आमदनी होती थी। किन्तु वे 200 रु. माह बार घर से और खर्चे के लिए मंगवाते थे। सदैव हाथ तंग रखते और वेतन के कम होने का रोना रोया करते थे।

🔵 दूरदर्शी व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं और खर्चों का पहले से ही बजट तैयार करता है। उसकी आय वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति में ही व्यय नहीं होती प्रत्युत वह भविष्य के लिए, बच्चों की शिक्षा, विवाह, बुढ़ापे के लिए धन एकत्रित रखता है। अपनी परिस्थिति के अनुसार कुछ न कुछ अवश्य बचाता है।



🔴 किसी कवि ने कहा है-
कौडी कौडी जोड़ि कै, निधन होत धनवान।
अक्षर अक्षर के पढ़े, मूरख होत सुजान॥


आप बचत कर सकते हैं?

🌹 अखण्ड ज्योति जनवरी 1950 पृष्ठ 12

👉 कर्म योग द्वारा सर्व सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। (अंतिम भाग)

🔵 तुम मालिक हो तो नौकरों को सताओ मत, अभिमान वश अपने को बड़ा न समझो, अपने स्वाँग के अनुसार नौकरों से काम लो परन्तु मन ही मन उन्हें भगवान का स्वरूप समझ कर उनके हित रूपी सेवा करने की चेष्टा करते रहो। मन से किसी का तिरस्कार न करो। लोभवश किसी की न्याय आजीवन को न काटो। उनके भले में लगे रहो। इसी से तुम पर भगवान कृपा करेंगे और तुम्हें अपना परम पद प्रदान करेंगे।

🔴 इसी प्रकार और भी सब लोगों को अपने कर्मों द्वारा भगवान की निष्काम पूजा करनी चाहिये।

🔵 उपरोक्त तथ्यों से हम यह सार निकालते हैं कि भगवान की प्रसन्नता प्राप्ति के लिए किसी विशेष धन या ऐश्वर्य की आवश्यकता नहीं है बल्कि जो काम हम करते हैं, उसी को विवेकपूर्णता से किये जायें। लोभ वृत्ति उत्पन्न करके हम छल, कपट आदि को न अपनायें। अपने ग्राहकों या व्यवहार में आने वालों को भगवत् स्वरूप मानकर चलें। हम अपने काम को हीन न समझें। उसी में सुन्दरता लाने का प्रयत्न करें। इसी से हम उन्नति के पथ पर अग्रसर हो सकते हैं, मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं, आनन्द के समुद्र में गोते लगा सकते हैं। सभी प्रकार की सिद्धियाँ उसके पैरों पर लौटती हैं।

🌹 समाप्त
🌹 अखण्ड ज्योति जनवरी 1960 पृष्ठ 10

👉 आज का सद्चिंतन 11 Aug 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 Aug 2017


👉 इच्छापूर्ति वॄक्ष -

🔵 एक घने जंगल में एक इच्छा पूर्ति वृक्ष था, उसके नीचे बैठ कर कोई भी इच्छा करने से वह तुरंत पूरी हो जाती थी। यह बात बहुत कम लोग जानते थे क्योंकि उस घने जंगल में जाने की कोई हिम्मत ही नहीं करता था।

🔴 एक बार संयोग से एक थका हुआ व्यापारी उस वृक्ष के नीचे आराम करने के लिए बैठ गया उसे पता ही नहीं चला कि कब उसकी नींद लग गयी। जागते ही उसे बहुत भूख लगी, उसने आस पास देखकर सोचा- 'काश कुछ खाने को मिल जाए!' तत्काल स्वादिष्ट पकवानों से भरी थाली हवा में तैरती हुई उसके सामने आ गई।
      
🔵 व्यापारी ने भरपेट खाना खाया और भूख शांत होने के बाद सोचने लगा.. काश कुछ पीने को मिल जाए.. तत्काल उसके सामने हवा में तैरते हुए अनेक शरबत आ गए।
  
🔴 शरबत पीने के बाद वह आराम से बैठ कर सोचने लगा-  कहीं मैं सपना तो नहीं देख रहा हूँ।

🔵 हवा में से खाना पानी प्रकट होते पहले कभी नहीं देखा न ही सुना..जरूर इस पेड़ पर कोई भूत रहता है जो मुझे खिला पिला कर बाद में मुझे खा लेगा ऐसा सोचते ही तत्काल उसके सामने एक भूत आया और उसे खा गया।

🔴 इस प्रसंग से आप यह सीख सकते है कि हमारा मस्तिष्क ही इच्छापूर्ति वृक्ष है आप जिस चीज की प्रबल कामना करेंगे  वह आपको अवश्य मिलेगी।

🔵 अधिकांश लोगों को जीवन में बुरी चीजें इसलिए मिलतीहैं.....

🔴 क्योंकि वे बुरी चीजों की ही कामना करते हैं।
 
🔵 इंसान ज्यादातर समय सोचता है- कहीं बारिश में भीगने से मै बीमार न हों जाँऊ.. और वह बीमार हो जाता हैं..!
                     
🔴 इंसान सोचता है - मेरी किस्मत ही खराब है .. और उसकी किस्मत सचमुच खराब हो जाती हैं ..!
         
🔵 इस तरह आप देखेंगे कि आपका अवचेतन मन इच्छापूर्ति वृक्ष की तरह आपकी इच्छाओं को ईमानदारी से पूर्ण करता है..! इसलिए आपको अपने मस्तिष्क में विचारों को सावधानी से प्रवेश करने की अनुमति देनी चाहिए।
 
🔴 यदि गलत विचार अंदर आ जाएगे तो गलत परिणाम मिलेंगे। विचारों पर काबू रखना ही अपने जीवन पर काबू करने का रहस्य है..!
 
🔵 आपके विचारों से ही आपका जीवन या तो स्वर्ग बनता है या नरक उनकी बदौलत ही आपका जीवन सुखमय या दुख:मय बनता है।
 
🔴 विचार जादूगर की तरह होते है, जिन्हें बदलकर आप अपना जीवन बदल सकते है..!
         
🔵 इसलिये सदा सकारात्मक सोच रखें।

हम बदलेंगे, युग बदलेगा

गुरुवार, 10 अगस्त 2017

👉 Cost of body parts

🔴 A person went to a saint. ”I am unlucky. I don’t have anything. It’s better to die than to live such a life.” The saint said, “Do you have any idea of the things you have? If not then I’ll give you. What are you willing to take in return of your one arm, one leg and one eye? I am ready to give 100 gold coins for each of the parts.” The person said, “I can’t give them, how will I live without them?” The saint said, “Fool, you already have property worth crores, then also you are crying for having nothing”.

🔵 There are many such people who don’t recognize their true worth and consider themselves unlucky. They realize when some enlightened one teaches them lesson.

🌹 From Pragya Puran

👉 चांदी की छड़ी:-

🔵 एक आदमी सागर के किनारे टहल रहा था। एकाएक उसकी नजर चांदी की एक छड़ी पर पड़ी, जो बहती-बहती किनारे आ लगी थी।

🔴 वह खुश हुआ और झटपट छड़ी उठा ली। अब वह छड़ी लेकर टहलने लगा।

🔵 धूप चढ़ी तो उसका मन सागर में नहाने का हुआ। उसने सोचा, अगर छड़ी को किनारे रखकर नहाऊंगा, तो कोई ले जाएगा। इसलिए वह छड़ी हाथ में ही पकड़ कर नहाने लगा।

🔴 तभी एक ऊंची लहर आई और तेजी से छड़ी को बहाकर ले गई। वह अफसोस करने लगा और दुखी हो कर तट पर आ बैठा।

🔵 उधर से एक संत आ रहे थे। उसे उदास देख पूछा, इतने दुखी क्यों हो?

🔴 उसने बताया, स्वामी जी नहाते हुए मेरी चांदी की छड़ी सागर में बह गई।

🔵 संत ने हैरानी जताई, छड़ी लेकर नहा रहे थे? वह बोला, क्या करता? किनारे रख कर नहाता, तो कोई ले जा सकता था।

🔴 लेकिन चांदी की छड़ी ले कर नहाने क्यों आए थे? स्वामी जी ने पूछा।

🔵 ले कर नहीं आया था, वह तो यहीं पड़ी मिली थी, उसने बताया।

🔴 सुन कर स्वामी जी हंसने लगे और बोले, जब वह तुम्हारी थी ही नहीं, तो फिर दुख या उदासी कैसी?

🔵 मित्रों कभी कुछ खुशियां अनायास मिल जाती हैं और कभी कुछ श्रम करने और कष्ट उठाने से मिलती हैं।

🔴 जो खुशियां अनायास मिलती हैं, परमात्मा की ओर से मिलती हैं, उन्हें सराहने का हमारे पास समय नहीं होता।

🔵 इंसान व्यस्त है तमाम ऐसे सुखों की गिनती करने में, जो उसके पास नहीं हैं- आलीशान बंगला, शानदार कार, स्टेटस, पॉवर वगैरह और भूल जाता है कि एक दिन सब कुछ यूं ही छोड़कर उसे अगले सफर में निकल जाना है।

👉 आज का सद्चिंतन 10 Aug 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 Aug 2017


👉 कर्म योग द्वारा सर्व सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। (भाग 3)

🔵 तुम हाकिम हो तो अपने स्वाँग के अनुसार दया पूर्ण न्याय करो तुम्हारे इजलास में कोई भी मुकदमा आवे तो उसे ध्यान से सुनो रिश्वत खाकर या अन्य किसी भी कारण से पक्षपात और अन्याय न करो। प्रत्येक न्याय चाहने वाले को भगवान का स्वरूप समझकर न्याय रूप सामग्री से उसकी पूजा करो उसे न्याय प्राप्ति में जहाँ तक हो सहूलियत कर दो और सेवा के भाव से ही अपने को मजिस्ट्रेट या जज समझो, अफसर नहीं। तुम्हारी इसी निष्काम सेवा से भगवान की कृपा होगी और तुम भगवन् प्राप्ति कर सकोगे। तुम वकील हो तो पैसे के लोभ से कभी अन्याय का पैसा मत लो, झूँठी गवाहियाँ न बनाओ, किसी को तंग करने की नीयत न रखो। प्रत्येक मुश्किल को भगवान का स्वरूप समझकर भगवत् सेवा के भाव से उचित मेहनताना लेकर उनका न्याय-पक्ष ग्रहण करो।

🔴 तुम चाहो तो भगवान की बड़ी सेवा कर सकते हो और सेवा से तुम्हें भगवन् प्राप्ति हो सकती है।

🔵 तुम डॉक्टर या वैध हो तो रोगी को भगवान का स्वरूप समझ कर उसके लिये सेवा के भाव से ही उचित पारिश्रमिक लेकर औषधि की व्यवस्था करें लोभ वश रोगी को सताओ नहीं। गरीबों का सदा ध्यान रक्खो। तुम अपनी निःस्वार्थ सेवा से भगवान के बड़े प्यारे बन सकते हो और भगवान प्राप्ति कर सकते हो।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति जनवरी 1960 पृष्ठ 10

👉 आत्मचिंतन के क्षण 10 Aug 2017

🔴 यदि आप जल्दी आध्यात्मिक उन्नति चाहते हैं तो इसके लिए सजगता, होशियारी रखना बहुत जरूरी है आध्यात्मिक मार्ग में थोड़ी-सी सफलता थोड़ी सी मन की गंभीरता, एकाग्रता, सिद्धियों के थोड़े से दर्शन, थोड़े से अन्तर्यामी ज्ञान की शक्ति से ही कभी संतुष्ट मत रहो। इससे ज्यादा ऊंची चढ़ाइयों पर चलना अभी बाकी है।

🔵 सदा सेवा करने को तैयार रहो। शुद्ध प्रेम, दया और नम्रता सहित सेवा करो। सेवा करते समय कभी मन में भी खीझने या कुढ़ने का भाव मत आने दो। सेवा करते हुए मुख पर खेद और ग्लानि के भाव मत आने दो। ऐसा करने से जिसकी सेवा करते हो वह आपकी सेवा स्वीकार नहीं करेगा। आप एक अवसर खो दोगे। सेवा के लिए अवसर ढूँढ़ते रहो। एक भी अवसर को मत जाने दो बल्कि अवसर खुद बनालो।

🔴 अपने जीवन को सेवामय बना दो सेवा के लिए अपने हृदय में चाव तथा उत्साह भर लो। दूसरों के लिये प्रसाद बन कर रहो। यदि ऐसा करना चाहते हो तो आपको अपने मन को निर्मल बनाना होगा। अपने आचरण को दिव्य तथा आदर्श बनाना होगा। सहानुभूति, प्रेम, उदारता, सहनशीलता और नम्रता बढ़ानी होगी। यदि दूसरों के विचार आपके विचारों से भिन्न हों तो उनसे लड़ाई झगड़ा न करो। 
                                        
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 क्या आप कर्जदार हैं?

🔵 क्या आप कर्जदार है? यदि ऐसा है तो आपकी आत्मा को शान्ति नहीं मिल सकती। उन धनी मानी व्यक्तियों के उदाहरण अपने सन्मुख रखिये जो आजन्म ऋण के बोझ से दबे रहे। हमारे ग्रामीण तो 80 प्रतिशत कर्ज के बोझ से दबे हुए हैं। गोल्डस्मिथ, बालजाक, मार्क टवैन, वेबस्टर, लार्ड वायरन, सर वाल्टर स्काट सब कर्जदार रहे। वाल्टरस्काट आजन्म कर्ज चुकाते रहे। रूसी लेखक डास्टाएन्सकी कर्ज में डूबा रहा। उसकी इच्छा थी कि कर्ज से मुक्त हो जावे किन्तु न हो सका।

🔴 गोल्डस्मिथ इतना फिजूल खर्च रहा कि जौनसन साहब की सहायता करने पर भी ऋण मुक्त न हो सका। कथाकार बालजाक अपने महाजनों से डरा-2 फिरा करता था। मार्क स्वेन का 300,000 रु॰ व्यापार में नष्ट हो गया था। लार्ड वायरन जैसे कवि का घर कई बार नीलाम होते होते बचा सुविख्यात चित्रकार व्हिरलय तथा हेडेन का जीवन सदैव दुःख में रहा।

🔵 श्री योगेन्द्र बिहारी लाल ऋण ग्रस्त व्यक्तियों के उदाहरण देते हुए लिखते हैं-“सौ वर्ष पहले ल्योब्रमेल इंग्लैंड का फैशन ‘सम्राट् कहा जाता था। उसके कपड़े पहनने का ढंग ही फैशन हो जाता था पर ऋण के कारण उसका सब कुछ बिक गया। जब नीलाम करने वाले उसके घर आते थे तो वह कपड़ों की अलमारियों के पीछे छिप जाता था। अन्त में वह पकड़ा गया। दरिद्रता के कारण उसे फटी कमीज पहननी पड़ती थी, और जनता उस भूतपूर्व फैशन सम्राट पर हंसती थी। विलियन पिट का विवाह कुमारी एडेन से होने जा रहा था, पर पिट के ऋण ग्रस्त होने से विवाह न हो सका था।”

🔴 अब्राहम लिंकन ने किसी से शराब की दुकान में साझीदार के मरने पर लिंकन ग्यारह वर्ष तक ऋण चुकाता रहा।

🔵 खर्च के विषय में बेखबर रहने से मनुष्य की पूरी आयु नष्ट हो जाती है। इसी के सदुपयोग से जीवन सरस बनता है, समाज में आदर और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। कौटिल्य ने कहा है-“केवल धन के द्वारा मनुष्य गुण, आनन्द एवं मोक्ष की प्राप्ति करता है।” वास्तव में आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न रहने से मनुष्य नैतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति भी सरलता से कर सकता है। रुपया पास होने से सूर्योदय और गुलाब भी हमें सुन्दर लगते हैं। एक कवि ने लिखा है-

“जब जेब में पैसा होता है,
जब पेट में रोटी होती है।
तब हर एक जर्रा हीरा है,
तब हर एक शबनम मोती होती है॥
इस उक्ति में एक शाश्वत सत्य अंतर्निहित है।

🌹 अखण्ड ज्योति जनवरी 1950 पृष्ठ 11

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 40)

🌹  अनीति से प्राप्त सफलता की अपेक्षा नीति पर चलते हुए असफलता को शिरोधार्य करेंगे।  

🔴 लोगों की दृष्टि में सफलता का ही मूल्य है। जो सफल हों गया, उसी की प्रशंसा की जाती है। देखने वाले यह नहीं देखते कि सफलता नीतिपूर्वक प्राप्त की हो या अनीतिपूर्वक। झूठे, बेईमान, दगाबाज, चोर, लुटेरे भी बहुत धन कमा सकते हैं। किसी चालाकी से कोई बड़ा पद या गौरव भी प्राप्त कर सकते हैं। आप लोग तो केवल उस कमाई और विभूति मात्र को ही देखकर उसकी प्रशंसा करने लगते हैं और समर्थन भी, पर सोचना चाहिए कि क्या यह तरीका उचित है? सफलता की अपेक्षा नीति श्रेष्ठ है। यदि नीति पर चलते हुए परिस्थितिवश असफलता मिली है तो वह भी कम गौरव की बात नहीं है। नीति का स्थायी महत्त्व है, सफलता का अस्थाई।
 
🔵 सफलता न मिलने से भौतिक जीवन के उत्कर्ष में थोड़ी असुविधा रह सकती है, पर नीति त्याग देने पर तो लोक, परलोक, आत्म-संतोष चरित्र, धर्म, कर्तव्य और लोकहित सभी कुछ नष्ट हो जाता है। ईसामसीह ने क्रूस पर चढ़कर पराजय स्वीकार की, पर नीति का परित्याग नहीं किया। शिवाजी, राणा प्रताप, बंदा वैरागी, गुरु गोविन्द सिंह, लक्ष्मीबाई, सुभाषचंद्र बोस आदि को पराजय का ही मुँह देखना पड़ा, पर उनकी वह पराजय भी विजय से अधिक महत्त्वपूर्ण थी। धर्म और सदाचार पर दृढ़ रहने वाले सफलता में नहीं कर्तव्य पालन में प्रसन्नता अनुभव करते हैं और इसी दृढ़ता को स्थिर रख सकने को एक बड़ी भारी सफलता मानते हैं। अनीति और असफलता में से यदि एक को चुनना पड़े तो असफलता को ही पसंद करना चाहिए, अनीति को नहीं। जल्दी सफलता प्राप्त करने के लोभ में अनीति के मार्ग पर चल पड़ना ऐसी बड़ी भूल है जिसके लिए सदा पश्चाताप ही करना पड़ता है।
   
🔴 वास्तव में नीतिमार्ग छोड़कर किसी मानवोचित सदुद्देश्य की पूर्ति की नहीं जा सकती। मनुष्यता खोकर पाई सफलता कम से कम मनुष्य कहलाने में गौरव अनुभव करने वाले के लिए प्रसन्नता की बात नहीं है। यदि कोई व्यक्ति ऊपर से नीचे जल्दी पहुँचने की उतावली में सीधा कूदकर हाथ-पैर तोड़ ले तो कोई उसे जल्दी पहुँचने में सफल हुआ नहीं कहना चाहेगा। इससे तो थोड़ा देर में पहुँचना अच्छा। मानवोचित नैतिक स्तर गँवाकर किसी एक विषय में सफलता की लालसा उपरोक्त प्रसंग जैसी विडम्बना ही है। हर विचारशील को इससे सावधान रहकर, नीतिमार्ग को अपनाए रहकर मनुष्यता के अनुरूप वास्तविक सफलता अर्जित करने का प्रयास करना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.55

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.9

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 128)

🌹  चौथा और अंतिम निर्देशन

🔵 बात जो विवेचना स्तर की चल रही थी, सो समाप्त हो गई और सार संकेत के रूप में जो करना था सो कहा जाने लगा।

🔴 ‘‘तुम्हें एक से पाँच बनना है। पाँच रामदूतों की तरह, पाँच पाण्डवों की तरह काम पाँच तरह से करने हैं, इसलिए इसी शरीर को पाँच बनाना है। एक पेड़ पर पाँच पक्षी रह सकते हैं। तुम अपने को पाँच बना लो। इसे सूक्ष्मीकरण कहते हैं। पाँच शरीर सूक्ष्म रहेंगे, क्योंकि व्यापक क्षेत्र को संभालना सूक्ष्म सत्ता से ही बन पड़ता है। जब तक पाँचों परिपक्व होकर अपने स्वतंत्र काम न सँभाल सकें, तब एक इसी शरीर से उनका परिपोषण करते रहो। इसमें एक वर्ष भी लग सकता है एवं अधिक समय भी। जब वे समर्थ हो जाएँ तो उन्हें अपना काम करने हेतु मुक्त कर देना। समय आने पर तुम्हारे दृश्यमान स्थूल शरीर की छुट्टी हो जाएगी।’’

🔵 यह दिशा निर्देशन हो गया। करना क्या है? कैसे करना है? इसका प्रसंग उन्होंने अपनी वाणी में समझा दिया। इसका विवरण बताने का आदेश नहीं है, जो कहा गया है, उसे कर रहे हैं। संक्षेप में इसे इतना ही समझना पर्याप्त होगा-१-वायु मण्डल का संशोधन, २-वातावरण का परिष्कार, ३-नवयुग का निर्माण, ४-महाविनाश का निरस्तीकरण समापन, ५-देवमानवों का उत्पादन-अभिवर्द्धन।

🔴 ‘‘यह पाँचों काम किस प्रकार करने होंगे, इसके लिए अपनी सत्ता को पाँच भागों में कैसे विभाजित करना होगा, भागीरथ और दधीचि की भूमिका किस प्रकार निभानी होगी, इसके लिए लौकिक क्रिया-कलापों से विराम लेना होगा। बिखराव को समेटना पड़ेगा। यही है-सूक्ष्मीकरण।’’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.19

बुधवार, 9 अगस्त 2017

👉 आत्मचिंतन के क्षण 9 Aug 2017

🔴 जरा सा लाभ होने में, सम्पत्ति मिलने, रूप सौंदर्य यौवन की तरंग आने, कोई अधिकार या पद प्राप्त हो जाने, पुत्र जन्मने, विवाह होने, आदि अत्यन्त ही तुच्छ सुखद अवसर आने पर फूले नहीं समाते, खुशी से पागल हो जाते हैं, ऐसे उछलते-कूदते हैं मानो इन्द्र का सिंहासन इन्हें ही प्राप्त हो गया हो। सफलता, बड़प्पन या अमीरी के अहंकार के मारे उनकी गरदन टेढ़ी हो जाती है, दूसरे लोग अपनी तुलना में उन्हें कीट पतंग जैसे मालूम पड़ते हैं और सीधे मुँह किसी से बात करने में उन्हें अपनी इज्जत घटती दिखाई देती है।

🔵 जरा ही हानि हो जाय, घाटा पड़ जाय, कोई कुटुम्बी मर जाय, नौकरी छूट जाय, बीमारी पकड़ ले, अधिकार छिने, अपमानित होना पड़े, किसी प्रयत्न में असफल रहना पड़े, अपनी मरजी न चले, दूसरों की तुलना में अपनी बात छोटी हो जाय तो उनके दुख का ठिकाना नहीं रहता। बुरी तरह रोते चिल्लाते हैं। चिन्ता के मारे सूख-सूख कर काँटा होते जाते हैं, दिन-रात सिर धुनते रहते हैं, भाग्य का कोसते हैं और भी, आत्महत्या आदि, जो कुछ बन पड़ता है करने से नहीं चूकते।

🔴 जीवन एक झूला है जिसमें आगे भी और पीछे भी झोंटे आते हैं। झूलने वाला पीछे जाते हुए भी प्रसन्न होता है और आगे आते हुए भी, यह अज्ञानग्रस्त, माया मोहित, जीवन विद्या से अपरिचित लोग बात-बात में अपना मानसिक सन्तुलन खो बैठते हैं कभी हर्ष में मदहोश होते हैं तो कभी शोक में पागल बन जाते हैं। अनियंत्रित कल्पनाओं की मृग मरीचिका में उनका मन अत्यन्त दीन अभावग्रस्त दरिद्री की तरह व्याकुल रहता है। कोई उनकी रुचि के विरुद्ध बात कर दे तो क्रोध का पारापार नहीं रहता। इन्द्रियाँ उन्हें हर वक्त तरसाती रहती हैं, भस्मक रोग वाले की जठर ज्वाल के समान, भोगों की लिप्सा बुझ नहीं पाती। नशे में चूर शराबी की तरह “और लाओ, और लाओ, और चाहिए, और चाहिए” की रट लगाये रहते हैं। ऐसे लोगों के लिए कभी भी सुख-शान्ति के एक कण का दर्शन होना भी दुर्लभ है।
                                        
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 अगर शांति चाहिए तो इससे दोस्ती कीजिए…

🔴 यदि आप शांति की तलाश में हैं तो अपनी दोस्ती मौन से भी कर ली जाए। पुरानी कहावत है मौन के वृक्ष पर शांति के फल लगते हैं। मौन और चुप्पी में फर्क है। चुप्पी बाहर होती है, मौन भीतर घटता है। चुप्पी यानी म्यूटनेस जो एक मजबूरी है। लेकिन मौन यानी साइलेंस जो एक मस्ती है। इन दोनों ही बातों का संबंध शब्दों से है।

🔵 दोनों ही स्थितियों में हम अपने शब्द बचाते हैं लेकिन फर्क यह है कि चुप्पी में बचाए हुए शब्द भीतर ही भीतर खर्च कर दिए जाते हैं। चुप्पी को यूं भी समझा जा सकता है कि पति-पत्नी में खटपट हो तो यह तय हो जाता है कि एक-दूसरे से बात नहीं करेंगे, लेकिन दूसरे बहुत से माध्यम से बात की जाती है।

🔴 भीतर ही भीतर एक-दूसरे से सवाल खड़े किए जाते हैं और उत्तर भी दे दिए जाते हैं। यह चुप्पी है। इसमें इतने शब्द भीतर उछाल दिए गए कि उन शब्दों ने बेचैनी को जन्म दे दिया, अशांति को पैदा कर दिया। दबाए गए ये शब्द बीमारी बनकर उभरते हैं। इससे तो अच्छा है शब्दों को बाहर निकाल ही दिया जाए।

🔵 मौन यानी भीतर भी बात नहीं करना, थोड़ी देर खुद से भी खामोश हो जाना। मौन से बचाए हुए शब्द समय आने पर पूरे प्रभाव और आकर्षण के साथ व्यक्त होते हैं। आज के व्यावसायिक युग में शब्दों का बड़ा खेल है। आप अपनी बात दूसरों तक कितनी ताकत से पहुंचाते हैं यह सब शब्दों पर टिका है। कुछ लोग तो सही होते हुए भी शब्दों के अभाव, कमजोरी में गलत साबित हो जाते हैं।

🔴 कोई आपको क्यों सुनेगा यदि आपके पास सुनाने लायक प्रभावी शब्द नहीं होंगे। इसलिए यदि शब्द प्रभावी बनाना है तो जीवन में मौन घटित करना होगा। समझदारी से चुप्पी से बचते हुए मौन को साधें। चुप्पी चेहरे का रौब है और मौन मन की मुस्कान। जीवन में मौन उतारने का एक और तरीका है जरा मुस्कराइए…

👉 अनिश्चित व्यय वाले व्यक्ति

🔵 आमदनी का सम्बन्ध हमारी प्रकृति, आदतों, फैशन, रहन सहन का ढंग, जलवायु, देशकाल, आवश्यकताओं, घर के सदस्यों की संख्या, रीति रस्म, आचार व्यवहार पर निर्भर है। इनमें से प्रत्येक का ध्यान हमें रखना पड़ता है। उपभोक्ताओं की परिस्थितियों के अनुसार आमदनी की कमी या अधिकता बदलती रहती है। प्रायः देखा जाता है कि आदत पड़ जाने पर मनुष्य विलासिता पर व्यय करना आवश्यकताओं पर व्यय करने से अधिक उत्तम समझता है। जिस व्यक्ति को शराब, चाय, सिनेमा, वेश्यागमन, तम्बाकू, गाँजा, चरस का व्यसन लग जाता है, वे दूध, दही, मक्खन, हवादार मकान इत्यादि जीवन रक्षण और निपुणता - दायक पदार्थों में व्यय करना पसन्द नहीं करते।

🔴 फैशन परस्त लोग घर की गरीबी न देखते हुए भी बाहरी टीपटाप, मिथ्या प्रदर्शन में फंसे रहते हैं। निर्धन लोग थोड़ी सी वाहवाही के लिए कर्ज लेकर विवाह, जनेऊ या दान इत्यादि में व्यय कर देते हैं। गरीब मजदूर भी पान, बीड़ी, सिनेमा, चाय, जुआ, सट्टा, शराब इत्यादि व्यसनों में व्यय करते हुए नहीं डरते। भिक्षुक तक चाय या बीड़ी पीना दूध रोटी से अधिक पसन्द करते हैं।

🔵 एक अमीर व्यक्ति के लिए आलीशान महल, बिजली के पंखे, लैम्प, मोटर, फाउन्टेन पेन, भड़कीले वस्त्र, सजावट की वस्तुएँ आराम की वस्तुएँ समझी जायेंगी, किन्तु एक गरीब किसान, या क्लर्क, मामूली दुकानदार नौकरी पेशा के लिए ये ही वस्तुएँ विलासिता की चीजें मानी जावेंगी।

🔴 सदा अपनी आमदनी पर दृष्टि रखिये। आमदनी से अधिक व्यय करना नितान्त मूर्खता और दिवालियापन की निशानी है। जैसे-2 आमदनी कम होती जाये, वैसे-2 व्यय भी उसी अनुपात में कम करते जाइये। व्यय में से विलासिता और आराम की वस्तुओं को क्रमशः हटाते चलिये, व्यसन छोड़ दीजिये, सस्ता खाइये, एक समय खाइये, सस्ता पहनिये। मामूली मकान में रह जाइये, नौकरों को छुड़ाकर स्वयं काम किया कीजिये, धोबी का काम खुद कर लीजिये, चाहे बर्तन तक खुद साफ कर लीजिये किन्तु आमदनी के बाहर पाँव न रखिये।

🌹 अखण्ड ज्योति जनवरी 1950 पृष्ठ 10

👉 कर्म योग द्वारा सर्व सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। (भाग 2)

🔵 यदि तुम व्यापारी या दुकानदार हो तो यह समझो कि मेरा यह व्यापार धन कमाने के लिये नहीं है श्री भगवान की पूजा करने के लिये है। लोभवृत्ति से जिन जिन के साथ तुम्हारा व्यवहार हो इन्हें लाभ पहुंचाते हुये अपनी आजीविका चलाने मात्र के लिये व्यापार करो। याद रखो- व्यापार में पाप लोभ से ही होता है। लोभ छोड़ दोगे तो किसी प्रकार से भी दूसरे का हक मारने की चेष्टा नहीं होगी।

🔴 वस्तुओं का तोल-नाप या गिनती कभी ज्यादा लेना और कम देना बढ़िया के बदले घटिया देना और घटिया के बदले बढ़िया लेना आढ़ती दलाली वगैरह हमें शर्त से ज्यादा लेना आदि व्यापारिक चोरियाँ लोभ से ही होती हैं। परन्तु केवल लोभ ही नहीं छोड़ना है, दूसरों के हित की भी चेष्टा करनी है। जैसे लोभी मनुष्य अपनी दुकान पर किसी ग्राहक के आने पर उसका बनावटी आदर सत्कार करके उससे ठगने की चेष्टा करते हैं, वैसे ही तुम्हें कपट छोड़कर ग्राहक को प्रेम के साथ सरल भाषा में सच्ची बात समझा कर उसका हित देखना चाहिए।

🔵 यह समझना चाहिये कि इस ग्राहक के रूप में साक्षात् परमात्मा ही आ गये हैं। इनकी जो कुछ सेवा मुझसे बन पड़े वही थोड़ी है। यों समझ कर व्यापार करोगे तो तुम श्री भगवान के कृपा पात्र बन जाओगे और यह व्यापार ही तुम्हारे लिए भगवन् प्राप्ति का साधन बन जायेगा।

🔴 यदि तुम दलाल हो तो व्यापारियों को झूँठी सच्ची बातें समझाकर अपनी दलाली के लोभ से किसी को ठगाओ मत। दोनों के रूप में ईश्वर के दर्शन कर सत्य और सरल वाणी से दोनों की सेवा करने की चेष्टा करो। याद रखो! अभी नहीं तो आगे चलकर तुम्हारी इस वृत्ति का लोगों पर बहुत प्रभाव पड़ेगा यदि न भी पड़े तो कोई हर्ज नहीं है, तुम्हारी मुक्ति का साधन तो हो ही जायेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति जनवरी 1960 पृष्ठ 10
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1960/January/v1.10

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 44)

🌹  मनुष्य के मूल्यांकन की कसौटी उसकी सफलताओं, योग्यताओं एवं विभूतियों को नहीं, उसके सद्विचारों और सत्कर्मों को मानेंगे। 🔴 मनुष्य की श्...