बुधवार, 8 जून 2016

🌞 शिष्य संजीवनी (भाग 58) :-- 👉 संवाद की पहली शर्त-वासना से मुक्ति

🔴 शिष्य संजीवनी के सूत्र शिष्यों को सुपात्र बनाते हैं। शिष्य शब्द को उसका सही अर्थ प्रदान करते हैं। इन सूत्रों के ढलकर जो सुपात्र बन गया है, उस पर अपने आप ही सद्गुरुदेव की अनुकम्पा बरस पड़ती है। उसका अन्तःकरण अपने गुरु की कृपा से लबालब भर जाता है। उसके अस्तित्त्व के कण- कण से शिष्यत्व परिभाषित होता है। ढाई अक्षर का शब्द शिष्य- प्रेम के ढाई अक्षर का पर्याय बन जाता है। गुरुप्रेम ही शिष्य का जीवन है। यही उसका पात्रता और पवित्रता की कसौटी है। शिष्य शब्द का सच्चा अर्थ भी इसी में है। जिन्होंने भी अपनी जिन्दगी में इसे ढूँढ लिया है- वे निहाल हो गए हैं। साधना पथ के शूल में भी उनके लिए फूल बन गए हैं।
   
🔵 जो अभी पथ की खोज में है, उनके मार्गदर्शन के लिए अगला सूत्र प्रस्तुत है। इस सूत्र में शिष्यत्व की साधना के महासाधक बताते हैं- आन्तरिक इन्द्रियों को उपयोग में लाने की शक्ति प्राप्त करके, बाह्य इन्द्रियों की वासनाओं को जीतकर, जीवात्मा की इच्छाओं पर विजय पाकर और ज्ञान प्राप्त करके, हे शिष्य, वास्तव में मार्ग में प्रविष्ट होने के लिए तैयार हो जा। मार्ग मिल गया है, उस पर चलने के लिए अपने को तैयार कर। इस मार्ग के रहस्यों का ज्ञान तू पूछ पृथ्वी से, वायु से, जल से। इन्हीं में इन रहस्यों को तेरे लिए छुपाकर रखा है। यदि तूने अपनी आन्तरिक इन्द्रियों को विकसित कर लिया है, तो तू इस काम को कर सकेगा। इन रहस्यों को तू पृथ्वी के पवित्र पुरुषों से पूछ, यदि तू शिष्यत्व की कसौटी पर खरा है, तो वे तूझे इन रहस्यों का ज्ञान देंगे। तू भरोसा कर- बाह्य इन्द्रियों की लालसाओं से मुँह मोड़ लेने भर से तूझे यह रहस्य ज्ञान पा लेने का अधिकार प्राप्त हो जाएगा।
    
🔴 इस रहस्यमय सूत्र में आध्यात्मिक जीवन में कई महत्त्वपूर्ण आयाम समाए हैं। इन्हें समझकर आत्मसात कर लिया जाय तो साधना की डगर आसान हो सकती है। इतना ही नहीं इसके शिखर पर भी पहुँचा जा सकता है। लेकिन शुरूआत वासनाओं से मुँह मोड़ने से करनी होगी। जो लालसाओं से लिपटा और वासनाओं से बंधा है, उसके लिए साधना सम्भव नहीं है। साधना के सच केवल साधक को ही मिला करते हैं। और साधक बनने के लिए वासनाओं के बन्धन तोड़ने ही पड़ते हैं। कई बार लोग सवाल करते हैं- ऐसा प्रतिबन्ध क्यों है? इनका कहना है कि कामनाएँ एवं वासनाएँ तो स्वाभाविक हैं, नैसर्गिक हैं। इनकी ओर से मुँह मोड़ने से तो जीवन अप्राकृतिक बन जाएगा। और अप्राकृतिक जीवन को रोगी जिया करते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 डॉ. प्रणव पण्डया
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Devo/savad

👉 आत्मचिंतन के क्षण 8 June 2016


🔵 अपनी सफलता को ऐतिहासिक स्त्री पुरुषों के कार्यों से तुलना करके नम्रता सीखो। ऊँट तभी तक अपने को ऊँचा समझता है, जब तक पहाड़ के नीचे नहीं आता। अपने से बड़े प्रसिद्ध पुरुषों से मिलते जुलते रहते का उद्योग करो। इस प्रकार की मित्रता आपको अत्यन्त प्रभाव पूर्ण नम्रता की शिक्षा देगी।

🔴 आपके शरीर का रचयिता कोई दूसरा नहीं है, आप स्वयं अपने शरीर के रचयिता हैं। आपके भाग्य का रचयिता कोई दूसरा नहीं है अपने भाग्य के विधाता आप स्वयं हैं। विधाता के वचन में जो शक्ति है वही आपके वचन में हैं। विश्वास के साथ जो कहियेगा अवश्य पूरा होगा।

🔵 जो वस्तु जितनी ही उत्तम है वह उतने ही कठिन प्रयास से मिलती है। जिनमें दृढ़ता, साहस, पौरुष, पराक्रम लगन की परिश्रम शीलता है वे ही इस सम्पदा के अधिकारी होते हैं। साधना से सिद्धि मिलती है। जो लोग एकाग्रता पूर्वक अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर रहते हैं वे ही विजयीश्री को प्राप्त करते हैं।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आत्मोत्कर्ष के चार अनिवार्य चरण (भाग 1)


🔴 आगे बढ़ने का क्रम यह है कि एक कदम पीछे से उठा कर आगे रखा जाय और जो आगे रखा था उसे और आगे बढ़ाया जाय। इसी प्रकार चलने की क्रिया संपन्न होती है और लम्बी मंजिल पार की जाती है। आत्मिक प्रगति का मार्ग भी यही है। पिछड़ी योनियों में रहते समय जो पिछड़े संस्कार चेतना भूमि में जड़ जमाकर जहाँ-तहाँ बैठे हुए हैं उनका उन्मूलन किया जाय और दैवी प्रवृत्तियाँ, जो अभी तक समुचित परिणाम में प्राप्त नहीं हो पाई हैं, उन्हें प्रयत्न पूर्वक अपनाया और बढ़ाया जाय। किसान यही करता है। खेत को जोतता है, उसमें से पिछली फसल के पौधों की सूखी हुई जड़ों को हल चला कर उखाड़ता है।

🔵 कंकड़ पत्थर बीनता है और नई फसल उगाने में जो भी अवरोध थे, उन्हें समाप्त करता है। इसके उपरान्त उर्वरता बढ़ाने के लिए खाद पानी का प्रबन्ध करता है और बीज बोने के उपरान्त नई फसल अच्छी होने की आशा करता है। आत्मिक प्रगति के मार्ग को कृषि कर्म के समतुल्य गिना जा सकता है। मनुष्य पद के लिए अनुपयुक्त पिछले कुसंस्कारों को उखाड़ कर उन्मूलन करना एक काम है और जो इस पद को सफल सार्थक बना सके ऐसे उत्कृष्ट स्तर के गुण कर्म स्वभावों को अभ्यास में लाना, यही है वह उभय-पक्षीय क्रिया-कलाप जिसमें आत्मिक प्रगति का उद्यान विकसित होते और फलते-फूलते देखा जा सकता है।

🔴 प्रगतिशीलता अपनाने का उपाय एक ही है कि अवांछनीयताओं को निरस्त करते चला जाय और जो अभीष्ट आवश्यक है उसे अपनाने के लिए पूरे उत्साह का प्रयोग किया जाय। उत्कर्ष के उच्च शिखर पर चढ़ने के लिए इस रीति-नीति को अपनाने के अतिरिक्त और कोई मार्ग है नहीं।

🔵 आत्मिक प्रगति का भवन, चार दीवारों से मिल कर बनता है। इस तख्त में चार पाये हैं। चारों दिशाओं की तरह आत्मिक उत्कर्ष के भी चार आधार हैं। ब्रह्माजी के चार मुखों से निकले हुए चार वेदों में इसी ज्ञान-विज्ञान का वर्णन है। चार वर्ण-चार आश्रमों का विभाजन इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया गया है। इन्हें (1) आत्म-चिन्तन (2) आत्म-सुधार (3) आत्म-निर्माण और (4) आत्म विकास के नाम से पुकारा जाता है। इन्हें एक एक करके नहीं वरन् समन्वित रूप से सम्पन्न किया जाता है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति जनवरी पृष्ठ 7
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1977/January.7

👉 The Art of Sadhana


🔴 The essence of Sadhana is self-discipline. The deities we worship are in fact the symbolic representatives of our own divine attributes and virtues. So long as these attributes are dormant, we live in a miserable state, but when the divine self is awakened and activated, we realize that we are full of spiritual powers (riddhi and siddhi). The sole aim of Sadhana is to activate these dormant attributes through a dedicated process of self-refinement and self-transcendence.

🔵 A farmer understands the significance of Sadhana. While tending his crops, he remains thoroughly involved in farming day after day throughout the year. In this process, he is least concerned about his health or the severity of weather. He takes care of the fields like he would of his own body. He keeps an eye over each and every plant. According to the needs of the crop, he provides it with manure and performs several operations such as tilling, irrigating, weeding and the harrowing of the field, and finally harvesting. The wisdom for the preservation and maintenance of the fields, the bullocks, ploughs and the ancillary equipments comes to him intuitively from within. He does all this without feeling tired or bored, or showing any haste. He does not insist on the immediate reward for his labour because he knows that the crop takes a specific time to ripen and so he has to wait patiently till then.

🔴 He remains free from the anxiety of filling his cellar with the produce. He also understands the futility of anticipating a plentiful yield. His Sadhana of farming continues single-mindedly. It cannot be said that he does not encounter any obstacles. He overcomes them with his own expertise and with the help of available resources. He refuses to relax without fulfilling the needs of the field. When the crop ripens and is harvested, he takes home the produce with a sense of gratitude to Nature. This is Sadhana of a farmer, which he continues to perform from his childhood till death with unwavering faith. There is no rest, no tiredness, no boredom and no indifference. A sadhaka (devotee) should learn the art of Sadhana from the farmer.

👉 आत्मचिंतन के क्षण 15 Dec 2018

प्रतिभा किसी पर आसमान से नहीं बरसती, वह अंदर से ही जागती है। उसे जगाने के लिए केवल मनुष्य होना पर्याप्त है। वह अन्य कोई प्रतिबन्ध नहीं...