शनिवार, 24 दिसंबर 2016

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 Dec 2016


👉 आज का सद्चिंतन 25 Dec 2016


👉 सतयुग की वापसी (भाग 20) 25 Dec

🌹 समस्याओं की गहराई में उतरें   

🔴 मुड़कर देखने पर प्रतीत होता है कि जब तथाकथित शिक्षा का, सम्पदा का, विज्ञान स्तर की चतुरता का इतना अधिक विकास नहीं हुआ था, तब मनुष्य अपेक्षाकृत अधिक स्वस्थ, सुखी, सन्तुष्ट और हिल-मिलकर मोद मनाने की स्थिति में था। बढ़ी हुई समृद्धि ने तो वह सब भी छीन लिया, जिसे मनुष्य ने लाखों वर्षों के अध्यवसाय के सहारे, सभ्यता और सुसंस्कारिता के उच्चस्तरीय संयोग से दूरदर्शिता के साथ अर्जित किया था।    

🔵 यहाँ सुविधा-साधनों को दुर्गति का कारण नहीं बताया जा रहा है, वरन् यह कहा जा रहा है कि यदि उनका सदुपयोग बन पड़ा होता, तो स्थिति उस समय की अपेक्षा कहीं अधिक अच्छी होती, जिस समय साधन कम थे। तब विकसित भावचेतना के आधार पर स्वल्प उपलब्धियों का भी श्रेष्ठतम उपयोग कर लिया जाता था और अपने साथ समूचे समुदाय को, वातावरण को, सच्चे अर्थों में समृद्ध-समुन्नत बनाए रहने में सफलता मिल जाती थी। ऐसे ही वातावरण को सतयुग कहा जाता रहा है।  

🔴 तथाकथित प्रगति का विशालकाय सरंजाम जुट जाने पर भी, भयानक स्तर की अवगति का वातावरण क्यों कर बन गया? इसका उत्तर यदि गम्भीरता से सोचा जाए तो तथ्य एक ही हाथ लगेगा कि बुद्धि भ्रम ने ही यह अनर्थ सँजोए हैं। फिर क्या बुद्धि को कोसा जाए? नहीं, उसका निर्धारण तो भाव-संवेदनाओं के आधार पर होता है। भावनाओं में नीरसता, निष्ठुरता जैसी निकृष्टताएँ घुल जाए तो फिर तेजाबी तालाब में जो कुछ गिरेगा, देखते-देखते अपनी स्वतन्त्र सत्ता को उसी में जला-घुला देगा।

🔵 उस क्षेत्र में विकृतियों का जखीरा जम जाना ही एकमात्र ऐसा कारण है, जिसके रहते समृद्धि और चतुरता का विकास-विस्तार होते हुए भी, उल्टी सर्वतोमुखी विपन्नता ही हाथ लग रही है। सुधार तलहटी का करना पड़ेगा। सड़ी कीचड़ के ऊपर तैरने वाला पानी भी अपेय होता है। दुर्भावनाओं के रहते दुर्बुद्धि ही पनपेगी और उसके आधार पर दुर्गति के अतिरिक्त और कुछ हाथ लगेगा नहीं।     

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आत्मचिंतन के क्षण 25 Dec 2016

 🔴 युग निर्माण परिवार के हर सदस्य को अपनी उदारता का स्तर और आगे बढ़ाना चाहिए। दस पैसा रोज और एक घंआ समय आरंभिक प्रतीक पूजा थी। अभ्यास के रूप में इतना छोटा ही श्रीगणेश कराया गया था, वह अंतिम नहीं न्यूनतम था। गुजारा भर कर पाने वालों को भी महीने में एक दिन की कमाई देनी चाहिए, ताकि उनके बदले में एक कार्यकर्त्ता उसकी रोटी खोकर सर्वग्राही असुरता से लड़ने के लिए खड़ा रह सके।

🔵 वर्ग भेद उत्पन्न करने वाली हर प्रवृत्ति को निरुत्साहित किया जाना चाहिए। जाति, वर्ण, भाषा, देश, धर्म, संस्कृति आदि के नाम पर इतने विभेद पिछले दिनों खड़े कर दिये गये हैं कि उनने न केवल आदमी-आदमी के बीच खाई खोदी है, वरन् परस्पर एक दूसरे को बिराना, अपरिचित, विरोधी और शत्रु भी बना दिया है। जब तक यह दीवारें गिराई नहीं जायेंगी, प्रथकतावादी संकीर्णता के रक्त-रंजित पंजे मनुष्य की छाती में गढ़े ही रहेंगे।

🔴 यदि हमें मानवी एकता का लक्ष्य प्राप्त करना है और ज्ञान की परिधि को विश्वव्यापी बनाना है, तो एक विश्व-भाषा बनाये बिना काम चल ही नहीं सकता। आरंभ में एक क्षेत्रीय भाषा इस प्रकार से भी  रह सकती है पर उन दोनों को ही सीखना अनिवार्य होना चाहिए। पीछे क्षेत्रीय भाषाओं का झंझट मिटाया जा सकता है और दुहरा वजन ढोने से इनकार भी किया जा सकता है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 3) 25 Dec

🌹 गायत्री एक या अनेक

🔴 गायत्री एकमुखी, सावित्री पंचमुखी है। गायत्री आत्मिक और सावित्री भौतिकी है। एक को ऋद्धि और दूसरी को सिद्धि कहते हैं। रुपये के दोनों ओर दो आकृतियां होती हैं, पर इससे रुपया दो नहीं हो जाता। गायत्री और सावित्री एक ही तथ्य की दो प्रतिक्रियाएं हैं। जैसे आग में गर्मी और रोशनी दो वस्तुएं होती हैं, उसी प्रकार गायत्री-सावित्री के युग्म को परस्पर अविच्छिन्न समझना चाहिए।

🔵 त्रिकाल संध्या में ब्राह्मी-वैष्णवी-शांभवी की तीन आकृतियों की प्रतिष्ठापना की जाती है। अन्यान्य प्रयोजनों के लिए उसकी अन्य आकृतियां ध्यान एवं पूजन के लिए प्रयुक्त होती हैं। यह कलेवर भिन्नता ऐसी ही है जैसे एक ही व्यक्ति सैनिक, मिस्त्री, खिलाड़ी, तैराक, नट, दूल्हा आदि बनने के समय भिन्न-भिन्न बाह्य उपकरणों को धारण किये होता है, भिन्न मुद्राओं में देखा जाता है। उसी प्रकार एक ही महाशक्ति विभिन्न कार्यों में रहते समय विभिन्न स्वरूपों में दृष्टिगोचर होती है। यही बात गायत्री माता की विभिन्न आकृतियों के सम्बन्ध में समझी जानी चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गृहस्थ-योग (भाग 44) 25 Dec

🌹 पारिवारिक स्वराज्य

🔵 सास बहुओं में, ननद भौजाइयों में, देवरानी जिठानियों, में अक्सर छोटी-छोटी बातों पर लड़ाई हुआ करती है। स्त्री जाति को मानसिक विकास के अवसर प्रायः कम ही उपलब्ध होते हैं इसलिए उनकी उदारता संकुचित होती है। निस्संदेह पुरुष की अपेक्षा आत्म-त्याग और स्नेह की मात्रा स्त्रियों में बहुत अधिक होती है पर वह अपने बच्चे या पति में अत्यधिक लग जाने के कारण दूसरों के लिए कम बचती है।

🔴 समझा-बुझाकर, एक दूसरे के उदारता प्रकट करने का अवसर देकर, उन्हें यह अनुभव करना चाहिए कि परिवार के सब सदस्य बिलकुल निकटस्थ, बिलकुल सगे हैं। विरानेपन या परायेपन की दृष्टि से सोचने की दुर्भावना को हटाकर आत्मीयता की दृष्टि से सोचने योग्य उनकी मनोभूमि को तैयार करना चाहिये। बड़े बूढ़े यह आशा न करें कि हमारे साथ शिष्टाचार की अति बरती जानी चाहिये, उन्हें छोटों के प्रति क्षमा, उदारता, प्रेम और और सहानुभूति का व्यवहार करना चाहिये। दास, नौकर या गुलाम जैसा नहीं।

🔵 इसी प्रकार छोटों को बड़ों के प्रति आदर-भाव रखना चाहिये, घर के अन्य कामों की अपेक्षा पहिले आवश्यकता और इच्छाओं को पूरा करना चाहिये। घर का काम धंधा आमतौर से बंटा हुआ रहना चाहिये। बीमारी, कमजोरी, गर्भावस्था या अन्य किसी कठिनाई की दशा में दूसरों को उसका काम आपस में बांटकर उसे हलका कर देना चाहिये। नित्य पहनने के जेवरों को छोड़कर अन्य जेवर सम्मिलित रखे जा सकते हैं जिनका आवश्यकतानुसार सब उपयोग कर लें। आपको यदि पैसे की सुविधा हो तो सबके लिये अलग-अलग जेवर भी बन सकते हैं पर वे सब के पास करीब करीब समान होने चाहिये। नई शादी होकर आने वाली बहू के लिये अपेक्षाकृत कुछ अधिक चीजें होना स्वाभाविक है। विशेष अवस्था को छोड़कर साधारणतः सबका भोजन वस्त्र करीब करीब एक सा ही होना चाहिये। इस प्रकार स्त्रियों में एकता रह सकती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 गहना कर्मणोगति: (भाग 26) 24 Dec


🌹 अपनी दुनियाँ के स्वयं निर्माता

🔵 आप सरल मार्ग को अपनाइए, लड़ने, बड़बड़ाने और कुढ़ने की नीति छोड़कर दान, सुधार, स्नेह के मार्ग का अवलम्बन लीजिए। एक आचार्य का कहना है कि ‘‘प्रेम भरी बात, कठोर लात से बढ़कर है।’’ हर एक मनुष्य अपने अंदर कम या अधिक अंशों में सात्विकता को धारण किए रहता है। आप अपनी सात्विकता को स्पर्श करिए और उसकी सुप्तता में जागरण उत्पन्न कीजिए। जिस व्यक्ति में जितने सात्विक अंश हैं, उन्हें समझिए और उसी के अनुसार उन्हें बढ़ाने का प्रयत्न कीजिए। अंधेरे से मत लड़िए वरन् प्रकाश फैलाइए, अधर्म बढ़ता हुआ दीखता हो, तो निराश मत हूजिए वरन् धर्म प्रचार का प्रयत्न कीजिए। बुराई को मिटाने का यही एक तरीका है कि अच्छाई को बढ़ाया जाय। आप चाहते हैं कि इस बोतल से हवा निकल जाय, तो उसमें पानी भर दीजिए। बोतल में से हवा निकालना चाहें पर उसके स्थान पर कुछ भरें नहीं तो आपका प्रयत्न बेकार जाएगा। एक बार हवा को निकाल देंगे, दूसरी बार फिर भर जाएगी। गाड़ी जिस स्थान पर खड़ी हुई है, वहाँ खड़ी रहना पसंद नहीं करते, तो उसे खींच कर आगे बढ़ा दीजिए, आपकी इच्छा पूरी हो जाएगी। आप गाड़ी को हटाना चाहें, पर उसे आगे बढ़ाना पसंद न करें, इतना मात्र संतोष कर लें कि कुछ क्षण के लिए पहियों को ऊपर उठाए रहेंगे, उतनी देर तो स्थान खाली रहेगा, पर जैसे ही उसे छोड़ेंगे, वैसे ही वह जगह फिर घिर जाएगी।
 
🔴 संसार में जो दोष आपको दिखाई पड़ते हैं, उनको मिटाना चाहते हैं तो उनके विरोधी गुणों को फैला दीजिए। आप गंदगी बटोरने का काम क्यों पसंद करें? उसे दूसरों के लिए छोड़िए। आप तो इत्र छिड़कने के काम को ग्रहण कीजिए। समाज में मरे हुए पशुओं के चमड़े उधेड़ने की भी जरूरत है पर आप तो प्रोफेसर बनना पसंद कीजिए। ऐसी चिंता न कीजिए कि मैं चमड़ा न उधेडूँगा तो कौन उधेड़ेगा? विश्वास रखिए, प्रकृति के साम्राज्य में उस तरह के भी अनेक प्राणी मौजूद हैं। अपराधियों को दण्ड देने वाले स्वभावतः आवश्यकता से अधिक हैं। बालक किसी को छेड़ेगा तो उसके गाल पर चपत रखने वाले साथी मौजूद हैं, पर ऐसे साथी कहाँ मिलेंगे, जो उसे मुफ्त दूध पिलाएँ और कपड़े पहनाएँ। आप चपत रखने का काम दूसरों को करने दीजिए। लात का जवाब घूँसों से देने में प्रकृति बड़ी चतुर है। आप तो उस माता का पवित्र आसन ग्रहण कीजिए, जो बालक को अपनी छाती का रस निकाल कर पिलाती है और खुद ठंड में सिकुड़ कर बच्चे को शीत से बचाती है। आप को जो उच्च दार्शनिक ज्ञान प्राप्त हुआ है, इसे विद्वान, प्रोफेसर की भाँति पाठशाला के छोटे-छोटे छात्रों में बाँट दीजिए।

🔵 हो सकता है कि लोग आपको दुःख दें, आपका तिरस्कार करें, आपके महत्त्व को न समझें, आपको मूर्ख गिनें और विरोधी बनकर मार्ग में अकारण कठिनाइयाँ उपस्थित करें, पर इसकी तनिक भी चिंता मत कीजिए और जरा भी विचलित मत हूजिए, क्योंकि इनकी संख्या बिल्कुल नगण्य होगी। सौ आदमी आपके सत्प्रयत्न का लाभ उठाएँगे, तो दो-चार विरोधी भी होंगे। यह विरोध आपके लिए ईश्वरीय प्रसाद की तरह होगा, ताकि आत्मनिरीक्षण का, भूल सुधार का अवसर मिले और संघर्ष से जो शक्ति आती है, उसे प्राप्त करते हुए तेजी से आगे बढ़ते रहें।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/gah/aapni.4

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 56)

🌹 कला और उसका सदुपयोग

🔴 83. धर्म-प्रचार की पद-यात्रा— घरेलू कार्यों से छुट्टी लेकर कुछ विचारशील लोग टोली बनाकर पद-यात्रा पर निकला करें। पूर्व निश्चित प्रोग्राम पर एक-एक दिन ठहरते हुए आगे बढ़ें। प्रातः जप, हवन, तीसरे पहर विचार-गोष्ठी और रात्रि को सामूहिक प्रवचनों का कार्यक्रम रहा करे। जिन जगहों में टोली को ठहरना हो, वहां पहले से ही आवश्यक तैयारी रहे, ऐसा प्रबन्ध कर लेना चाहिए। सन्त बिनोवा की भूदान जैसी पद-यात्राएं युग-निर्माण योजना के प्रसार के लिए भी समय-समय पर की जाती रहनी चाहिए।

🔵 प्रसन्नता की बात है कि इस वर्ष बहरायच जिसे में श्री गिरीश देव वर्मा के नेतृत्व में एक महीने की पद-यात्रा का कार्यक्रम संभ्रान्त एवं सुशिक्षित लोगों ने बनाया है। टोली की योजना तथा कार्य-पद्धति का विवरण पाठक अन्यत्र पढ़ेंगे।

🔴 84. आदर्श वाक्यों का लेखन— दीवारों पर आदर्श वाक्यों का लेखन एक सस्ता लोक शिक्षण है, गेरू में गोंद पकाकर दीवारों पर अच्छे अक्षरों में आदर्श शिक्षात्मक एवं प्रेरणाप्रद वाक्य लिखे जाएं तो उनसे पढ़ने वालों पर प्रभाव पढ़ता है। जिस जगह प्रेरणाप्रद विचार पढ़ने को मिलें तो उस स्थान के सम्बन्ध में स्वतः ही अच्छी भावना बनती है। जहां स्याही का ठीक प्रबन्ध न हो सके तो सूखे गेरू की डली से भी लिखते रहने का कार्यक्रम चलता रहा सकता है। कई व्यक्ति मिल कर अपने नगर की दीवारों पर इस प्रकार लिख डालने का कार्यक्रम बनालें तो जल्दी ही नगर की सारी दीवारें प्रेरणाप्रद बन सकती हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 "हमारी वसीयत और विरासत" (भाग 5)

🌞 जीवन के सौभाग्य का सूर्योदय

🔴 भगवान् की अनुकंपा ही कह सकते हैं कि जो अनायास ही हमारे ऊपर पंद्रह वर्ष की उम्र में बरसी और वैसा ही सुयोग बनता चला गया, जो हमारे लिए विधि द्वारा पूर्व से ही नियोजित था। हमारे बचपन में सोचे गए संकल्प को प्रयास के रूप में परिणत होने का सुयोग मिल गया।

🔵 पंद्रह वर्ष की आयु थी, प्रातः की उपासना चल रही थी। वसंत पर्व का दिन था। उस दिन ब्रह्म मुहूर्त में कोठरी में ही सामने प्रकाश-पुंज के दर्शन हुए। आँखें मलकर देखा कि कहीं कोई भ्रम तो नहीं है। प्रकाश प्रत्यक्ष था। सोचा, कोई भूत-प्रेत या देव-दानव का विग्रह तो नहीं है। ध्यान से देखने पर भी वैसा कुछ लगा नहीं। विस्मय भी हो रहा था और डर भी लग रहा था। स्तब्ध था।

🔴  प्रकाश के मध्य में ऐसे एक योगी का सूक्ष्म शरीर उभरा, सूक्ष्म इसलिए कि छवि तो दीख पड़ी, पर वह प्रकाश-पुंज के मध्य अधर में लटकी हुई थी। यह कौन है? आश्चर्य।

🔵 उस छवि ने बोलना आरम्भ किया व कहा-‘‘हम तुम्हारे साथ कई जन्मों से जुड़े हैं। मार्गदर्शन करते आ रहे हैं। अब तुम्हारा बचपन छूटते ही आवश्यक मार्गदर्शन करने आए हैं। सम्भवतः तुम्हें पूर्व जन्मों की स्मृति नहीं है, इसी से भय और आश्चर्य हो रहा है। पिछले जन्मों का विवरण देखो और अपना संदेह निवारण करो।’’ उनकी अनुकंपा हुई और योगनिद्रा जैसी झपकी आने लगी। बैठा रहा, पर स्थिति ऐसी हो गई मानों मैं निद्राग्रस्त हूँ। तंद्रा सी आने लगी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 5)

🌞  हमारा अज्ञातवास और तप-साधना का उद्देश्य

🔵 नई सृष्टि रच डालने वाले विश्वामित्र की, रघुवंशी राजाओं का अनेक पीढ़ियों तक मार्गदर्शन करने वाले वशिष्ठ की क्षमता तथा साधना इसी में ही अन्तर्हित थी। एक बार राजा विश्वामित्र जब वन में अपनी सेना को लेकर पहुंचे तो वशिष्ठजी ने कुछ सामान न होने पर भी सारी सेना का समुचित आतिथ्य कर दिखाया तो विश्वामित्र दंग रह गये। किसी प्रसंग को लेकर जब निहत्थे वशिष्ठ और विशाल सेना सम्पन्न विश्वामित्र में युद्ध ठन गया तो तपस्वी वशिष्ठ के सामने राजा विश्वामित्र को परास्त ही होना पड़ा। उन्होंने ‘‘धिग् बलं आश्रम बलं ब्रह्म तेजो बलं बलम् ।’’ की घोषणा करते हुए राजपाट छोड़ दिया और सबसे महत्व पूर्ण शक्ति की तपश्चर्या के लिए शेष जीवन समर्पित कर दिया।

🔴 अपने नरक गामी पूर्व पुरुषों का उद्धार करने तथा प्यासी पृथ्वी को जल पूर्ण करके जन-समाज का कल्याण करने के लिए गंगावतरण की आवश्यकता थी। इस महान उद्देश्य की पूर्ति लौकिक पुरुषार्थ से नहीं वरन् तपशक्ति से ही सम्भव थी। भागीरथ कठोर तप करने के लिये वन को गये और अपनी साधना से प्रभावित कर गंगा जी को भूलोक में लाने एवं शिवजी को उन्हें अपनी जटाओं में धारण करने के लिए तैयार कर लिया। यह कार्य साधारण प्रक्रिया से सम्पन्न न होते। तप ने ही उन्हें सम्भव बनाया।

🔵 च्यवन ऋषि इतना कठोर दीर्घ-कालीन तप कर रहे थे कि उनके सारे शरीर पर दीमक ने अपना घर बना लिया था और उनका शरीर एक मिट्टी के टीला जैसा बन गया था। राजकुमारी सुकन्या को दो छेदों में से दो चमकदार चीजें दीखीं और उनमें उसने कांटे चुभो दिए। यह चमकदार चीजें और कुछ नहीं च्यवन ऋषि की आंखें थीं। च्यवन ऋषि को इतनी कठोर तपस्या इसीलिए करनी पड़ी कि वे अपनी अन्तरात्मा में सन्निहित शक्ति केन्द्रों को जागृत करके परमात्मा के अक्षय शक्ति भण्डार में भागीदार मिलने की अपनी योग्यता सिद्ध कर सकें।

🔴 शुकदेव जी जन्म से साधन रत हो गये। उन्होंने मानव जीवन का एक मात्र सदुपयोग इसी में समझा कि इसका उपयोग आध्यात्मिक प्रयोजनों में करके नर-तनु जैसे सुर दुर्लभ सौभाग्य का सदुपयोग किया जाय। वे चकाचौंध पैदा करने वाले वासना एवं तृष्णा जन्य प्रलोभनों को दूर से नमस्कार करके ब्रह्मज्ञान की ब्रह्म तत्व की उपलब्धि में संलग्न हो गये।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books/sunsaan_ke_shachar/hamara_aagyatvaas.2

👉 आत्मचिंतन के क्षण 16 Dec 2018

ऐसा कोई नियम नहीं है कि आप सफलता की आशा रखे बिना, अभिलाषा किये बिना, उसके लिए दृढ़ प्रयत्न किये बिना ही सफलता प्राप्त कर सको। प्रत्ये...