बुधवार, 19 सितंबर 2018

👉 त्याग का अर्थ

🔷 “इच्छाओं के त्याग का अर्थ संसार को त्याग देना नहीं है। जीवन का ऐसा किसी प्रकार का निषेध मनुष्य को मनुष्यत्वशून्य बनाता है। ईश्वरत्व, मनुष्यत्व से रहित नहीं है। आध्यात्मिक का परमावश्यक कर्तव्य मनुष्य को अधिक मनुष्यत्व युक्त बनाना है। मनुष्य में जो सौंदर्य है, महानता तथा सात्विकता है, उन्हें मुक्त तथा व्यक्त करने का नाम आध्यात्मिक है। वाह्य-जगत में जो कुछ भी भव्य तथा सुन्दर है, उसे भी वह विकसित रहती है।

🔶 साँसारिक कार्यों में बाह्य त्याग तथा कर्तव्य और उत्तरदायित्व की उपेक्षा को वह आवश्यक नहीं मानती। वह केवल यही कहती है कि व्यक्ति के जो कार्य और उत्तरदायित्व है, उनका सम्पादन करते समय, उसकी आत्मा इच्छाओं के बोझ से मुक्त रहे। द्वैत के बन्धनों से मुक्त रहना ही पूर्णता है। बन्धनों के भय से जीवन से दूर भागने से यह मुक्ति प्राप्त नहीं हो सकती। बन्धनों से बचने के प्रयत्न का अर्थ है जीवन से भयभीत होना। किंतु आध्यात्मिकता का अर्थ है ‘परस्पर विरोधों के वशीभूत हुए बिना जीवन का ठीक और पूर्ण ढंग से सामना करना।”

~ मेहरबाबा

👉 आनंद पर शर्त

🔷 एक दिन एक उदास पति-पत्नी संत फरीद के पास पहुंचे। उन्होंने विनय के स्वर में कहा,’बाबा, दुनिया के कोने-कोने से लोग आपके पास आते हैं, वे आपसे खुशियां लेकर लौटते हैं। आप किसी को भी निराश नहीं करते। मेरे जीवन में भी बहुत दुख हैं। मुझे उनसे मुक्त कीजिए।’ फरीद ने देखा, सोचा और झटके से झोपड़े के सामने वाले खंभे के पास जा पहुंचे। फिर खंभे को दोनों हाथों से पकड़कर ‘बचाओ-बचाओ’ चिल्लाने लगे। शोर सुनकर सारा गांव इकट्ठा हो गया। लोगों ने पूछा कि क्या हुआ तो बाबा ने कहा-‘इस खंभे ने मुझे पकड़ लिया है, छोड़ नहीं रहा है।’ लोग हैरानी से देखने लगे।

🔶 एक बुजुर्ग ने हिम्मत कर कहा- ‘बाबा, सारी दुनिया आपसे समझ लेने आती है और आप हैं कि खुद ऐसी नासमझी कर रहे हैं। खंभे ने कहां, आपने खंभे को पकड़ रखा है।’ फरीद खंभे को छोड़ते हुए बोले, ‘यही बात तो तुम सब को समझाना चाहता हूं कि दुख ने तुम्हें नहीं, तुमने ही दुखों को पकड़ रखा है। तुम छोड़ दो तो ये अपने आप छूट जाएंगे।’

🔷 उनकी इस बात पर गंभीरता से सोचें तो इस निष्कर्ष पर पहुंचेंगे कि हमारे दुख-तकलीफ इसलिए हैं क्योंकि हमने वैसी सोच बना रखी है। ऐसा न हुआ तो क्या होगा और वैसा न हुआ तो क्या हो सकता है। सब दुख हमारी नासमझी और गलत सोच के कारण मौजूद हैं। इसलिए सिर्फ अपनी सोच बदल दीजिए, सारे दुख उसी वक्त खत्म हो जाएंगे। ऐसा नहीं है कि जितने संबुद्ध हुए हैं, उनके जीवन में सब कुछ अच्छा-अच्छा हुआ हो, लेकिन वे 24 घंटे मस्ती में रहते थे। कबीर आज कपड़ा बुन कर बेचते, तब कल उनके खाने का जुगाड़ होता था। लेकिन वह कहते थे कि आनंद झरता रहता है नानक आनंदित होकर एकतारे की तान पर गीत गाते चलते थे। एक बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि सुख और दुख सिर्फ आदतें हैं। दुखी रहने की आदत तो हमने डाल रखी है । सुखी रहने की आदत भी डाल सकते हैं।

🔶 एक प्रयोग कीजिए और तुरंत उसका परिणाम भी देख लीजिए। सुबह सोकर उठते ही खुद को आनंद के भाव से भर लीजिए। इसे स्वभाव बनाइए और आदत में शामिल कर लीजिए। यह गलत सोच है कि इतना धन, पद या प्रतिष्ठा मिल जाए तो आनंदित हो जाएंगे। दरअसल, यह एक शर्त है। जिसने भी अपने आनंद पर शर्त लगाई वह आज तक आनंदित नहीं हो सका। अगर आपने बेशर्त आनंदित जीवन जीने का अभ्यास शुरू कर दिया तो ब्रहमांड की सारी शक्तियां आपकी ओर आकर्षित होने लगेंगी।

🔷 क्राइस्ट ने अद्भुत कहा है, ‘पहले तुम प्रभु के राज्य में प्रवेश करो यानी तुम पहले आनंदित हो जाओ, बाकी सभी चीजें तुम्हें अपने आप मिलती चली जाएंगी।

👉 आज का सद्चिंतन 19 September 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 19 September 2018