गुरुवार, 11 जून 2020

👉 समय की आवश्यकता "संघ शक्ति": -

कई मोर्चे खुले पर सब जगह हार देवताओं की हुई! असुर उनके एक-एक कर सभी दुर्ग जीतते चले गये, देवताओं का अस्तित्व ही संकट में पड़ गया! पराजित देवता प्रजापति ब्रह्मा के पास पहुँचे! पराजय के कारण और उनसे असुरों पर विजय का उपाय पूछा! पराजय के कारण और विजय की नई योजनाओं पर कुछ देर तक विचार करने के बाद ब्रह्मा जी बोले-

देवताओं! तुम सभी दिव्य गुणों वाले हो, त्यागी और तपस्वी भी कम नहीं हो, शक्ति और साहस का तुम में अभाव भी नहीं है किन्तु एक बहुत बड़ी कमी तुम में भी है संगठन का अभाव! तुम्हारी शक्तियाँ बिखरी होने के कारण अभीष्ट प्रभाव उत्पन्न नहीं कर पातीं जब कि पापी और दुर्गुणी होकर भी केवल संगठित होने के कारण थोड़े से असुरों की शक्ति में वह बल आ जाता है कि वे तुम सब को जब चाहते परास्त करके रख देते हैं!

फिर ब्रह्मा जी ने सभी देवताओं से शक्ति का थोड़ा अंश लेकर दुर्गा का अवतरण किया।

यह इस रहस्य का उद्घाटन करता है की देवताओं ने मिलकर अपनी-अपनी शक्ति का अंश देकर एक संघ शक्ति का निर्माण किया, दुर्गा उस संस्था एवं संगठन  का प्रतीक है जिसमें श्रेष्ठ व्यक्तियों की शक्तियाँ संघ-बद्ध होकर काम करती हैं!

यह संघ शक्ति अवतरित हुई, उसने सिंह को अपना वाहन बनाया! सिंह साहस और स्फूर्ति का प्रतीक है उसका भावार्थ यह होता है कि देवताओं ने अपनी संगठित शक्ति का तेजी से साहसपूर्वक प्रयोग किया, उसका फल यह हुआ कि बड़े-बड़े दुर्दान्त और दिग्गज राक्षस आये पर दुर्गा उन सब को मारती-काटती चली गयी! वह अपने वाहन सहित राक्षसों पर टूट पड़ी, राक्षसों में अब उनका सामना करने की हिम्मत नहीं रही!

पुराणों की दुर्गा-अवतरण की कथा में संघ शक्ति का अलंकारिक चित्रण है, उसका उपयोग प्रकरान्तर से प्रत्येक युग में होता आया है, रावण जैसे शक्तिशाली असुर के सामने रीछ वानरों की कोई औकात नहीं थी पर यह उनकी संगठित शक्ति का परिणाम था कि एक लाख पुत्र, सवा लाख नातियों के कुनवे वाला मायावी रावण भी धराशायी कर दिया गया! इन्द्र के कोप का सामना करना कठिन हो जाता यदि यादवों ने कृष्ण के इशारे पर संगठित होकर गोवर्धन को नहीं उठा लिया होता! भगवान् बुद्ध को तो "बुद्धं शरणं गच्छामि" के साथ "संघं शरण गच्छामि" का भी नारा लगाना पड़ा था! तब कहीं उस युग में व्याप्त धर्म के नाम पर आडम्बर, अज्ञान, अनाचार और मत-मतान्तरों का अँधड़ रोका जा सका था!

अभी कुछ दिन पुर्व ही यही प्रयोग स्वतंत्रता सेनानियों ने किया! देशभक्तों के रूप में दुर्गा शक्ति ने अवतार लिया था तभी अंग्रेजी हुकूमत जैसी शक्तिशाली सत्ता पर भारतियों को विजय मिल सकी थी!

आज समाज में अच्छे लोगों का अभाव नहीं! लोग आस्तिक हैं, पूजा उपासना करते हैं, दान पुण्य करते हैं, उनमें नेक आदमियों के सब लक्षण है तो भी असुरता चाहे वह मनुष्यों के रूप में हो या दुष्प्रवृत्तियों के रूप में जीतती चली जाती है, अच्छे लोग आये दिन संकट में पड़ते, कष्ट भोगते रहते हैं यह सब उनमें संगठन शक्ति के आभाव के कारण है!

यदि आज भी लोग संगठित हो जायें तो इस युग की असुरता, पाप और अत्याचार को उसी प्रकार भगाया जा सकता है जिस प्रकार दुर्गा को जन्म देकर देवताओं ने असुरों को मार भगाया!!

👉 हम बदलेंगे युग बदलेगा’’ सूत्र का शुभारम्भ (भाग ५)

स्पष्ट है कि आजीविका का एक महत्वपूर्ण जनुपात अंशदान के रूप सृजन कृत्यों के लिए नियोजित करने की आवश्यकता पड़ेगी। इतना ही नहीं श्रम, समय भी इसके साथ ही देना पड़ेगा। अस्तु न केवल आजीविका का एक अंश वरन समय का श्रमदान भी इस निमित्त नियमित रूप से नियोजित करते रहने की आवश्यकता पड़ेगी। आरम्भ में महीने में एक दिन की आजीविका और हर दिन दो घण्टे का श्रम इस हेतु उन सभी को लगाना होगा जो प्रस्तुत विश्व संकट से उबरने की बात सोचते और इस निमित्त कुछ करने का साहस करते हैं।

योजनाएँ कैसी भी क्यों न हों बुद्धिबल, श्रम तथा धन की माँग करती है। युग परिवर्तन अभियान भी इसका अपवाद नहीं है। जो कहे सो पानी को जाय वाली उक्ति के अनुसार प्रतिपादन कर्त्ताओं को कथनी को करनी में प्रयुक्त करके दिखाना पड़ता है। विशेषतया आदर्शवादी प्रचलनों के सम्बन्ध में तो इसके बिना काम ही नहीं चलता।

तीसरा चरण अवांछनीयता उन्मूलन का है। नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्रान्तियाँ सम्पन्न करने के लिए प्रज्ञा अभियान की लाल मशाल इसी निमित्त जलाई गई है। प्रश्न यह है कि दुष्प्रवृत्तियों के विरुद्ध व्यापक संघर्ष का श्रीगणेश कहाँ से किया जाय। गाँधी जी ने सुगम उपाय नमक सत्याग्रह सोचा था और फिर सत्याग्रह आन्दोलन को करो या मरो स्तर तक पहुँचाया था। उसी रणनीति का अनुसरण हमें भी संव्याप्त दुष्प्रवृत्तियों के विरुद्ध अपनाना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Quintessence of Religion

The element of religion can’t be found in the mirage of rituals, cults or communal doctrines and rites. If you are true seeker, want to adopt religion in the truest sense, you must first introspect and sincerely analyze your aspirations, interests, habits and behavior to whether and to what extent these might trouble or hurt others or hinder their justified rights… You must restrain and curtail the tendencies of selfish possession, passions for sensual pleasures and ruthlessness and insensitivity to others. Simultaneously, the altruistic tendencies and sentiments of kindness, generosity, love, amity, feeling of service, sharing and cooperation should be cultivated and enhanced consistently.

The only measure of one’s religiousness is – the less one’s selfishness and the more his/her altruism, the greater is his/her religiousness and spirituality. It is only through this path or religiousness that the individual self realizes higher realms of divine grace and salvation.

The major cause of all misery, adversities and sufferings in the world is that – knowingly or unknowingly, people do not behave with others in a manner, which they expect and like others to behave. This disparity of – “different weight used in the same balance for buying and for selling” is the root of all mistrusts, conflicts and animosity. Ego, avarice and selfishness make one blind and debauch from the path of religion. If you do what your conscience would not allow, or what you would not like someone else doing to you, then you are committing a sin. So be vigilant towards your ambitions, attitude and actions.

📖 Akhand Jyoti, Mar. 1944

👉 Chintan Ke Kshan चिंतन के क्षण 11 June 2020

■ उन्नति की आकाँक्षा करने से पहले मनुष्य को अपने को परखकर देख लेना चाहिए कि ऊँचे चढ़ने के लिए जिस श्रम की आवश्यकता होती है, उसकी जीवन वृत्ति उसमें है भी या नहीं। यदि है तो उसकी आकाँक्षा अवश्य पूर्ण होगी अन्यथा इसी में कल्याण है कि मनुष्य उन्नति की आकाँक्षा का त्याग कर दे, नहीं तो उसकी आकाँक्षा स्वयं उसके लिए एक कंटक बन जायेगी।

□ हममें से अधिकांश लोग किसी कार्य की शुरुआत इसलिए नहीं करते, क्योंकि आने वाले खतरों को उठाने का साहस हममें नहीं होता। हम दूसरों की आलोचना, विरोध से डरते हैं। असफलता या लोकनिन्दा का भय हमें कार्य की शुरुआत में ही निस्तेज कर देता है, इसी कारणवश हम दीन-हीन जीवन व्यतीत करते हैं। संसार की जो जातियाँ साहस पर ही जीती हैं, वे ही सबकी अगुवा भी बन जाती हैं।

◆ किसी कार्य को केवल विचार पर ही नहीं छोड़ देना चाहिए। कार्य रूप में परिणत हुए बिना योजनाएँ चाहे कितनी ही अच्छी क्यों न हों, लाभ नहीं दे सकतीं।  विचार की आवश्यकता वैसी ही है जैसी रेलगाड़ी को स्टेशन पार करने के लिए सिग्नल की आवश्यकता होती है। सिग्नल का उद्देश्य केवल यह है कि ड्राइवर यह समझले कि रास्ता साफ है अथवा आगे कुछ खतरा है? विचारों द्वारा भी ऐसे ही संकेत मिलते हैं कि वह कार्य उचित और उपयुक्त है या अनुचित और अनुपयुक्त?

◇ मनुष्य के साध्य, सुख और शान्ति का निवास कामनाओं, उपादानों अथवा भोग-विलास में नहीं है। वह कम से कम कामनाओं, अधिक से अधिक त्याग और विषय-वासनाओं के विष से बचने में ही पाया जा सकता है। जो निःस्वार्थी, निष्काम, पुरुषार्थी, परोपकारी, संतोषी तथा परमार्थी हैं, सच्ची सुख-शान्ति के अधिकारी वही हैं। सांसारिक स्वार्थों एवं लिप्साओं के बंदी मनुष्य को सुख-शान्ति की कामना नहीं करनी चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य