गुरुवार, 12 सितंबर 2019

👉 मूर्ख कौन?

ज्ञानचंद नामक एक जिज्ञासु भक्त था। वह सदैव प्रभुभक्ति में लीन रहता था। रोज सुबह उठकर पूजा- पाठ, ध्यान-भजन करने का उसका नियम था। उसके बाद वह दुकान में काम करने  जाता। दोपहर के भोजन के समय वह दुकान बंद कर देता और फिर दुकान नहीं खोलता था।

बाकी के समय में वह साधु- संतों को भोजन करवाता, गरीबों की सेवा करता, साधु- संग एवं दान-पुण्य करता। व्यापार में जो भी मिलता उसी में संतोष रखकर प्रभुप्रीति के लिए जीवन बिताता था।

उसके ऐसे व्यवहार से लोगों को आश्चर्य होता और लोग उसे पागल समझते। लोग कहतेः  "यह तो महामूर्ख है। कमाये हुए सभी पैसों को दान में लुटा देता है। फिर दुकान भी थोड़ी देर के लिए ही खोलता है। सुबह का कमाई करने का समय भी पूजा- पाठ में गँवा देता है। यह तो पागल ही है।"

एक बार गाँव के नगरसेठ ने उसे अपने पास बुलाया। उसने एक लाल टोपी बनायी थी। नगरसेठ ने वह टोपी ज्ञानचंद को देते हुए कहाः  "यह टोपी मूर्खों के लिए है। तेरे जैसा महान् मूर्ख मैंने अभी तक नहीं देखा, इसलिए यह टोपी तुझे पहनने के लिए देता हूँ। इसके बाद यदि कोई तेरे से भी ज्यादा बड़ा मूर्ख दिखे तो तू उसे पहनने के लिए दे देना।"

ज्ञानचंद शांति से वह टोपी लेकर घर वापस आ गया। एक दिन वह नगर सेठ खूब बीमार पड़ा। ज्ञानचंद उससे मिलने गया और उसकी तबीयत के हालचाल पूछे। नगरसेठ ने कहाः "भाई ! अब तो जाने की तैयारी कर रहा हूँ।"

ज्ञानचंद ने पूछाः   "कहाँ जाने की तैयारी कर रहे हो? वहाँ आपसे पहले किसी व्यक्ति को सब तैयारी करने के लिए भेजा कि नहीं? आपके साथ आपकी स्त्री, पुत्र, धन, गाड़ी, बंगला वगैरह आयेगा कि नहीं?"

"भाई ! वहाँ कौन साथ आयेगा? कोई भी साथ नहीं आने वाला है। अकेले ही जाना है। कुटुंब-परिवार, धन-दौलत, महल-गाड़ियाँ सब छोड़कर यहाँ से जाना है ।आत्मा-परमात्मा के सिवाय किसी का साथ नहीं रहने वाला है।"

सेठ के इन शब्दों को सुनकर ज्ञानचंद ने खुद को दी गयी वह लाल टोपी नगरसेठ को वापस देते हुए कहाः "आप ही इसे पहनो।"

नगरसेठः  "क्यों?"

ज्ञानचंदः  "मुझसे ज्यादा मूर्ख तो आप हैं। जब आपको पता था कि पूरी संपत्ति, मकान, परिवार वगैरह सब यहीं रह जायेगा, आपका कोई भी साथी आपके साथ नहीं आयेगा, भगवान के सिवाय कोई भी सच्चा सहारा नहीं है, फिर भी आपने पूरी जिंदगी इन्हीं सबके पीछे बरबाद कर दी?"

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 12 Sep 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prerak Prasang 12 Sep 2019


👉 अंडा खाइये और लकवा बुलाइये

इधर मूर्ख नेताओं वाले देश भारतवर्ष में तृतीय पंचवर्षीय योजना देश भर में मुर्गी पालन और अण्डा उत्पादन का अभियान चला रही थी उधर फ्लोरिडा अमेरिका का कृषि विभाग ‘अण्डों का स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है’ उसकी शोध और परीक्षण कर रहा है। अट्ठारह महीनों के परीक्षण के बाद 1967 की हेल्थ बुलेटिन ने बताया- अण्डों में डी.डी.टी. विष पाया जाता है जो स्वास्थ्य के लिये अत्यधिक हानिकारक है।

कैलीफोर्निया के विश्व विख्यात डॉ. कैथेराइन निम्मो डी.सी.आर.एन. तथा डॉ. जे. एमन विल्किन्ज ने एक सम्मिलित रिपोर्ट में बताया-एक अण्डे में लगभग 4 ग्रेन ‘केले स्टरोल’ नामक अत्यन्त विषैला तत्व पाया जाता है। यह विष हृदय रोगों का मुख्य कारण है। इतनी सी मात्रा से ही हाई ब्लडप्रेशर, पित्ताशय में पथरी, गुर्दों की बीमारी तथा रक्त में जाने वाली धमनियों में घाव हो जाते हैं ‘इस स्थिति में अण्डों से स्वास्थ्य की बात सोचना मूर्खता ही है।’

इन डाक्टरों की यह रिपोर्ट पढ़कर विश्वभर के डॉक्टर चौंके और तब सारे संसार की प्रयोगशालाओं में परीक्षण होने लगे। उन परीक्षणों में न केवल उपरोक्त तथ्य पुष्ट हुये वरन् कुछ नई जानकारियाँ मिलीं जो इनसे भी भयंकर थीं।

उदाहरण के लिये इंग्लैंड के डॉ. राबर्ट ग्रास, इविंग डैविडसन तथा प्रोफेसर ओकड़ा ने कुछ पेट के बीमारों का- अण्डे खाने और अण्डे खाना छोड़ देने इन, दोनों परिस्थितियों में परीक्षण किया और पाया कि जब तक वे मरीज अण्डे खाते रहे तब तक उनका पाचन बिगड़ा रहा, पेचिश हुआ और ट्यूबर कुलैसिस बैक्टीरिया (टी.बी.) जन्म लेता दिखाई दिया।’

अमेरिका के डॉ. ई.वी.एम.सी. कालम ने तो इन तथ्यों का विधिवत प्रचार किया उन्होंने अपनी पुस्तक ‘न्यूअर नॉलेज आफ न्यूट्रिन पेज 171 में लिखा है’ अण्डों में कार्बोहाइड्रेट्स तथा कैल्शियम की कमी होती है। अतः यह पेट में सड़ाँद उत्पन्न करते हैं, यह सड़न ही अपच, मन्दाग्नि और अनेक रोगों के रूप में फूटती है साथ ही स्वभाव में चिड़चिड़ापन- थोड़े में क्रुद्ध हो जाना जैसी बुराइयाँ उत्पन्न करता है।

‘दि नेचर ऑफ डिसीज’ पत्रिका के द्वितीय वाल्यूम पेज 194 में चेतावनी देते हुए डॉ. जे.ई.आर.एम.सी. डोनाह एफ.आर.सी.पी. (इंग्लैंड) लिखते हैं- ‘कैसा पागलपन है कि जो अंडा आँतों में विष और घाव उत्पन्न करता है आज उन्हीं अण्डों की उपज में वृद्धि करने की व्यावसायिक योजनाएं तैयार की जा रही हैं।’

धार्मिक आध्यात्मिक और जीव दया जैसी अत्यधिक आवश्यक बातें उपेक्षित भी की जा सकती हैं पर क्या इन डाक्टरी निष्कर्षों को भी ठुकराया जा सकता है। अण्डा किसी भी अर्थ में स्वास्थ्य वर्धक नहीं। इंग्लैण्ड के डॉ. आर. जे. विलियम्स का कथन है आज जो लोग अण्डे खाकर स्वस्थ होने की कल्पना करते हैं वहीं कल जब एक्जिमा और लकवे जैसे भयंकर रोग से शिकार होंगे- तब पश्चाताप करेंगे कि घास की रोटी खा लेती तो अच्छा था अण्डा खाकर आत्मघात जैसा दुर्भाग्य तो सिर पर न पड़ता।

📖 अखण्ड ज्योति, अक्टूबर १९७० पृष्ठ ३१
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1970/October/v1.31

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ६५)

👉 आसन, प्राणायाम, बंध एवं मुद्राओं से उपचार

प्राणायाम के अलावा बन्ध हठयोग की अन्य महत्त्वपूर्ण विधि है। इसे अन्तः शारीरिक प्रक्रिया कहा गया है। इनके अभ्यास से व्यक्ति शरीर के विभिन्न अंगों तथा नाड़ियों को नियंत्रित करने में समर्थ होता है। इनके द्वारा शरीर के आन्तरिक अंगों की मालिश होती है। रक्त का जमाव दूर होता है। इन शारीरिक प्रभावों के साथ बन्ध सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त विचारों एवं आत्मिक तरंगों को प्रभावित कर चक्रों पर सूक्ष्म प्रभाव डालते हैं। यहाँ तक कि यदि इन का अभ्यास विधिपूर्वक जारी रखा जाय तो सुषुम्रा नाड़ी में प्राण के स्वतन्त्र प्रवाह में अवरोध उत्पन्न करने वाली ब्रह्मग्रन्थि, विष्णुग्रन्थि व रुद्रग्रन्थि खुल जाती है और आध्यात्मिक विकास का पथ प्रशस्त होता है।

हठयोग की एक अन्य विधि के रूप में मुद्राएँ सूक्ष्म प्राण को प्रेरित, प्रभावित व नियंत्रित करने वाली प्रक्रियाएँ हैं। इनमें से कई मुद्राएँ तो ऐसी हैं जिनके द्वारा अनैच्छिक शरीरगत प्रक्रियाओं पर नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है। मुद्राओं का अभ्यास साधक को सूक्ष्म शरीर स्थित प्राण- शक्ति की तरंगों के प्रति जागरूक बनाता है। अभ्यास करने वाला इन शक्तियों पर चेतन रूप से नियंत्रण प्राप्त करता है। फलतः व्यक्ति अपने शरीर के किसी अंग में उसका प्रवाह ले जाने या अन्य व्यक्ति के शरीर में उसे पहुँचाने की क्षमता प्राप्त करता है।

हठयोग की ये सभी विधियाँ जीवन व्यापी प्राण के स्थूल व सूक्ष्म रूप को प्रेरित, प्रभावित, परिशोधित व नियंत्रित करती हैं। इनके प्रभाव से प्राण प्रवाह में आने वाले व्यतिक्रम या व्याघात को समाप्त किया जा सकता है। इसके लाभ अनगिनत है। ऐसे ही एक लाभ का उदाहरण हम यहाँ पर दे रहे हैं। जिनसे इन पंक्तियों के पाठक इन विधियों के महत्त्व को जान सकेंगे। उन दिनों यहाँ से एक योग विशेषज्ञ अमेरिका के एक विश्वविद्यालय में गए थे। वहाँ उनका एक योग विषय पर व्याख्यान था। जिस विश्वविद्यालय में उन्हें व्याख्यान देना था, वहाँ उन दिनों विद्यार्थियों को द्रुत शिक्षण व प्रशिक्षण पर कुछ प्रयोग सम्पन्न किए जा रहे थे। इसे उन लोगों ने साल्ट नाम दिया था। साल्ट यानि कि सिस्टम ऑफ एक्सीलरेटेड लर्निंग् एण्ड ट्रेनिंग।

उस प्रयोग के दौरान जब बात होने लगी तो यहाँ पहुँचे योग विशेषज्ञ ने अपनी चर्चा में कहा, मस्तिष्क एवं मन की ग्रहणशीलता का सम्बन्ध श्वास से होता है। योग इस बात को स्वीकार करता है। इस बात को सुनते ही प्रयेागकर्त्ता वैज्ञानिक प्रसन्न हो गए और उन्होंने कहा, आप तो भारत से आए हैं क्यों नहीं हमारे विद्यार्थियों पर प्रयोग करते। इस बात ने एक लघुप्रयोग का सिलसिला जुटाया। आचार्य श्री द्वारा बताए गए प्राणायाम की सरलतम विधि प्राणाकर्षण प्राणायाम को विद्यार्थियों को सिखाया गया। और प्रयोग प्रारम्भ हो गया। एक महीने तक यह सिलसिला चलता रहा। एक महीने के बाद पाया गया कि विद्यार्थियों की ग्रहणशीलता तीस से चालीस प्रतिशत तक बढ़ गयी। उनके तनाव, दुश्चिन्ता आदि भी समाप्त हुए। इस प्रयोग से वहाँ के वैज्ञानिक समुदाय को हठयोग की विधियों के महत्त्व का भान हुआ। उन्होंने अनुभव किया कि इन विधियों का केन्द्रीभूत तत्त्व प्राण चिकित्सा है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ ८९

👉 आत्मचिंतन के क्षण 12 Sep 2019

★ आज का युग "खूब कमाओ, आवश्यकताएँ बढाओं, मजा उडाओं" की भ्रान्त धारणा में लगा है और सुख कोक दु:खमय स्थानों में ढूँढ़ रहा है। उसकी सम्पत्ति बढी है, अमेरिका जैसे देशों में अनन्त सम्पत्ति भरी पडी है। धन में सुख नहीं है, अतृप्ति है, मृगतृष्णा है। संसार में शक्ति की कमी नहीं, आराम और विलासिता की नाना वस्तुएँ बन चुकी हैं, किन्तु इसमें तनिक भी शान्ति या तृप्ति नहीं।  
 
□  जब तब कोई मनुष्य या राष्ट्र ईश्वर में विश्वास नहीं रखता, तब तक उसे कोई स्थायी विचार का आधार नहीं मिलता। अध्यात्म हमें एक दृढ़ आधार प्रदान करता है। अध्यात्मवादी जिस कार्य को हाथ में लेता है वह दैवी शक्ति से स्वयं ही पूर्ण होता है। भौतिकवादी सांसारिक उद्योगों मे कार्य पूर्ण करना चाहता है, लेकिन ये कार्य पूरे होकर भी शान्ति नहीं देते।
 
◆ दूसरों के अनुशासन की अपेक्षा आत्मानुशासन का विशेष महत्त्व है। हमारी आत्म-ध्वनि हमें सत्य के मार्ग की ओर प्रेरित कर सकती है। सत्य मार्ग से ही पृथ्वी स्थिर है, सत्य से ही रवि तप रहा है और सत्य से ही वायु बह रहा है। सत्य से ही सब स्थिर है। सत्य का ग्रहण और पाप का परित्याग करने को हमें सदैव प्रस्तुत रहना चाहिए।

◇ आस्तिकता हमें ईश्वर पर श्रद्धा सिखाती है। हमें चाहिए कि ईश्वर को चार हाथ-पाँव वाला प्राणी न समझें। ईश्वर एक तत्त्व है, उसी प्रकार जैसे वायु एक तत्त्व है। वैज्ञानिको ने वायु के अनेक उपभाग किये हैं- आँंक्सीजन, नाइट्रोजन, इत्यादि। इसके हर एक भाग को भी स्थूल रुप से वायु ही कहेंगे। इसी प्रकार एक तत्त्व, जो सर्वत्र ओत-प्रोत है जो सब के भीतर है तथा जिसके भीतर सब कुछ है, वह परमेश्वर है। यह तत्त्व सर्वत्र है, सर्वत्र व्याप्त है । परमेश्वर हमारे ऋषि-मुनियों की सबसे बडी़ खोज है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 स्वाध्याय, जीवन विकास की एक अनिवार्य आवश्यकता (अन्तिम भाग)

आत्मोन्नति के सम्बन्ध में विपरीत वृत्तियाँ आलस्य, प्रमाद अथवा असंयम आदि स्वाध्यायशील व्यक्ति के निकट नहीं जाने पातीं। इसका भी एक वैज्ञानिक हेतु ही है कोई सुरक्षा कवच का प्रभाव नहीं हैं। जिसे पढ़ना है और नित्य नियम से जीवन का ध्येय समझ का पढ़ना है, वह तो हर अवस्था में अपने उस व्रत का पालन करेगा ही। अव्यवस्था अथवा अनियमितता, वह जानता है उसके इस रुचिपूर्ण व्रत में बाधक होगी, वह जानता है उसके इस रुचिपूर्ण व्रत में बाधक होगी, अस्तु वह जीवन की एक सुनिश्चित दिनचर्या बनाकर चलता है। उसका सोना, जागना, खाना-पीना टहलना-घूमना और कार्य करने के साथ-साथ पढ़ने-लिखने का कार्यक्रम एक व्यवस्थित रूप में बड़े अच्छे ढंग से चला करता है। जिसने जीवन के क्षणों को इस प्रकार उपयोगिता पूर्वक नियम-बद्ध कर दिया है, उसका तो एक-एक क्षण तपस्या का ही समय माना जायेगा। जिसने जीवन में व्यवस्था एवं नियम बद्धता का अभ्यास कर लिया, उसने मानो अपने आत्म लक्ष्य के लिये एक सुन्दर नसेनी तैयार कर ली है, जिसके द्वारा वह सहज ही में ध्येय तक जा पहुँचेगा।

अनुभव सिद्ध विद्वानों ने स्वाध्याय को मनुष्य का पथ प्रदर्शक नेता और मित्र जैसा हितैषी बताया है। उनका कहना है कि जो व्यक्ति सत्पथ-प्रदर्शक बताया है, उसका नाड़ी आदि इन्द्रियों पर अधिकार नहीं रहता। उसका मन चंचल विवेकानंद और बुद्धि कुण्ठित रहती है। इन समस्याओं के कारण उसे दुःखों का भागी बनना पड़ता है। इसलिये बुद्धिमान् व्यक्ति वही है, जो अपने सच्चे मित्र स्वाध्याय को कभी नहीं छोड़ता। इसीलिये तो गुरुकुल से अध्ययन पूरा करने के बाद विद्या लेते समय गुरु, शिष्य को यही अन्तिम उपदेश दिया करता था--

“स्वाध्यायात् मा प्रमद।”
अर्थात्- हे प्यारे शिष्य! अपने भावी जीवन में स्वाध्याय द्वारा योग्यता बढ़ाने में प्रमाद मत करना।
स्वाध्याय से जहाँ संचित ज्ञान सुरक्षित तो रहता ही है, साथ ही उस न कोष में नवीनता और वृद्धि भी होती रहती है। वहाँ स्वाध्याय से विरत हो जाने वाला नई पूँजी पाना तो क्या गाँठ की विद्या भी खो देता है।

स्वाध्याय जीवन विकास के लिये एक अनिवार्य आवश्यकता है, जिसे हर व्यक्ति को पूरी करना चाहिये। अनेक लोग परिस्थितिवश अथवा प्रारम्भिक प्रमादवश पढ़-लिख नहीं पाते और जब आगे चल कर उन्हें शिक्षा और स्वाध्याय के महत्व का ज्ञान होता है, तब हाथ मल-मल कर पछताते रहते है।

किन्तु इसमें पछताने की बात होते हुए भी अधिक चिन्ता की बात नहीं है। ऐसे लोग जो स्वयं पढ़-लिख नहीं सकते, उन्हें विद्वानों का सत्संग करके और दूसरों द्वारा सद्ग्रन्थों को पढ़वाकर सुनने अथवा उनके प्रवचन का लाभ उठाकर अपनी इस कमी की पूर्ति करते रहना चाहिये। जिनके घर पढ़े-लिखे बेटी-बेटे अथवा नाती-पोते हों, उन्हें चाहिये कि वे सन्ध्या समय उनको अपने पास बिठा कर सद्ग्रन्थों का अध्ययन करने का अभ्यास हो जायेगा। जहाँ चाह, वहाँ राह-के सिद्धान्त के अनुसार यदि स्वाध्याय में रुचि है और उसके महत्व का हृदयंगम कर लिया गया है तो शिक्षा अथवा अशिक्षा का कोई व्यवधान नहीं आता, स्वाध्याय के ध्येय को अनेक तरह पूरा किया जा ही सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, मार्च १९६९ पृष्ठ २४
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1969/March/v1.24