मंगलवार, 6 मार्च 2018

👉 "तीव्र वैराग्य किसे कहते हैं।

🔶 किसी देश में एक बार वर्षा कम हुई। किसान नालियाँ काट-काटकर दूर से पानी लाते थे। एक किसान बडा़ हठी था। उसने एक दिन शपथ ली कि जब पानी न आने लगे, नहर से नाली का योग न हो जाए, तब तक बराबर नाली खोदूँगा। इधर नहाने का समय हुआ। उसकी स्त्री ने लड़की को उसे बुलाने भेजा। लड़की बोली, 'पिताजी, दोपहर हो गयी, चलो तुमको माँ बुलाती है। 'उसने कहा, तू चल, हमें अभी काम है।' दोपहर ढल गयी, पर वह काम पर हटा रहा। नहाने का नाम न लिया।

🔷 तब उसकी स्त्री खेत में जाकर बोली, 'नहाओगे कि नहीं? रोटियाँ ठण्डी हो रही हैं। तुम तो हर काम में हठ करते हो। काम कल करना या भोजन के बाद करना।' गालियाँ देता हुआ कुदाल उठाकर किसना स्त्री को मारने दौडा़ बोला, 'तेरी बुद्धि मारी गयी है क्या? देखती नहीं कि पानी नहीं बरसता; खेती का काम सब पडा़ है; अब की बार लड़के-बच्चे क्या खाएँगे? सब को भूखों मरना होगा। हमने यही ठान लिया है कि खेत में पहले पानी लायेंगे, नहाने-खाने की बात पीछे होगी।' मामला टेढा़ देखकर उसकी स्त्री वहाँ से लौट पडी़।

🔶 किसान ने दिनभर जी तोड़ मेहनत करके शाम के समय नहर के साथ नाली का योग कर दिया। फिर एक किनारे बैठकर देखने लगा, किस तरह नहर पानी खेत में 'कलकल' स्वर से बहता हुआ आ रहा है, तब उसका मन शान्ति और आनन्द से भर गया। घर पहुँचकर उसने स्त्री को बुलाकर कहा, 'ले आ अब डोल और रस्सी।' स्नान भोजन करके निश्चिन्त करके निश्चिन्त होकर फिर वह सुख से खुर्राटे लेने लगा। जिद यह है और यही तीव्र वैराग्य की उपमा है।
     
🔷 "खेत में पानी लाने के लिए एक और किसान गया था। उसकी स्त्री जब गयी और बोली, 'धूप बहुत हो गयी, चलो अब, इतना काम नहीं करते', तब वह चुपचाप कुदाल एक ओर रखकर बोला, 'अच्छा, तू कहती है तो चलो।' (सब हँसते हैं।) वह किसान खेत में पानी न ला सका। यह मन्द वैराग्य की उपमा है।
       
🔶 " हठ बिना जैसे किसान खेत में पानी नहीं ला सकता, वैसे ही मनुष्य ईश्वरदर्शन नहीं कर सकता।"

रामकृष्ण परमहंस
(रामकृष्ण वचनामृत से)

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 07 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 07 March 2018


👉 परिस्थितियों का जन्मदाता

🔶 अध्यात्मवाद का दूसरा सिद्धान्त है ‘‘आत्मनिर्भरता।’’ अपने ऊपर विश्वास करना, अपनी शक्तियों पर विश्वास करना एक ऐसा दिव्य गुण है जो हर कार्य को करने योग्य साहस, विचार एवं योग्यता उत्पन्न करता रहता है। दूसरों के ऊपर निर्भर रहने से अपना बल घटता है और इच्छाओं की पूर्ति में अनेक बाधाएँ उपस्थित होती हैं। स्वाधीनता, निर्भयता औैर प्रतिष्ठा इस बात में है कि अपने ऊपर निर्भर रहा जाय, सफलता का सच्चा और सीधा पथ भी यही है।
  
🔷 अपनी हर एक बाह्य परिस्थिति की जिम्मेदारी दूसरों पर मत डालिए वरन् अपने ऊपर लीजिए। दुनिया को दर्पण के समान समझिए जिसमें अपनी ही सूरत दिखार्ई पड़ती है। दूसरे लोगों में जो अच्छाइयाँ, बुराइयाँ दिखाई पड़ती हैं, सामने जो प्रिय एवं अप्रिय परिस्थितियाँ आती हैं उसका कारण कोई और नहीं वरन् आप स्वयं हैं और उनमें परिवर्तन करने की शक्ति भी किसी और में नहीं वरन् स्वयं आप में है।
  
🔶 शास्त्रों में कहा गया है कि ब्रह्माण्ड की कुंजी पिण्ड के अन्दर है, हर व्यक्ति अपने लिए एक अलग संसार बनाता है और उसकी रचना उस पदार्थ से करता हे जो उसके अन्दर होता है। वास्तव में संसार बिल्कुल जड़ है उसमें किसी को सुख-दु:ख पहुँचाने की शक्ति नहीं है। मकड़ी अपना जाला खुद बुनती है और उसमें विचरण करती है। आप अपने लिए अपना संसार स्वतंन्त्र रूप से बनाते हैं और जब चाहते हैं उसमें परिवर्तन कर लेते हैं।
  
🔷 एक व्यक्ति क्रोधी है- उसे प्रतीत होगी की सारी दुनिया उससे लड़ती-झड़ती है, कोई उसे चैन से नहीं बैठने देता, किसी में भलमानसाहत है ही नहीं, जो आता है उससे उलझता चला आता है। एक व्यक्ति झूठ बोलता है- उसे लगता है कि सब लोग अविश्वासी हैं, सन्देह करने वाले हैं, किसी पर भरोसा ही नहीं करते। एक व्यक्ति नीच है- वह देखता है कि सारी दुनिया घृणा करने वाले, घमण्डियों, स्वार्थियों से भरी हुई है, किसी में सहानुभूति है ही नहीं। एक व्यक्ति निकम्मा और आलसी है- उसे मालूम होता है कि दुनिया में काम है ही नहीं, सब जगह बेकारी फैली हुई है, व्यापार नष्ट हो गया, नौकरियाँँ नहीं हैं, लोग बहुत काम लेकर थोड़ा पैसा देना चाहते हैं। एक व्यक्ति बीमार है- उसे दिखार्ई पड़ता है कि दुनिया में सारे भोजन अस्वादिष्ट, हानिकारक और नुकसान पहुँचाने वाले हैं। इसी प्रकार व्यभिचारी, लम्पट, मूर्ख, कंजूस, अशिक्षित, सनकी, गँवार, पागल, भिखारी, चोर तथा अन्यान्य मनोविकारों वाले व्यक्ति अपने लिए अलग दुनिया बनाते हैं। वे जहाँ जाते हैं उनकी दुनिया उनके साथ जाती है।
  
🔶 जब मनुष्य आत्म निर्भरता के वीरतापूर्ण दृष्टिïकोण को छोडक़र पराया मुँह ताकने की कायरता, क्लीवता और हीनता की अन्धकारमयी  भूमिका में उतरता है तो वह बड़े दीन वचन बोलने लगता है। ‘मैं क्या कर सकता हूँ, दूसरों ने मुझे जकड़ रखा है, रास्ते रोक रखे हैं।’ ऐसी शिकायतों में तीन चौथाई भाग झूठ होता है। भूत, पलीत, देवी, देवता, भाग्य, ईश्वर, ग्रह, नक्षत्र, समय, युग तथा और भी अनेक बहानों को पकड़ कर वह कहता है कि यही सब मेरे सुख-दु:ख के कारण हैं। विपत्ति के समय वह देवी-देवताओं की मनौती मानता है। चाहता है कि कोई ऐसा देव-दानव कहीं से उतर आये जो पलक मारते उन कठिनाइयों को हल कर दे। इस प्रकार की विचारधारा बेकार और भयंकर है। यह स्पष्टï है कि जो अपनी विपत्ति से आप लडऩे को तैयार नहीं होता, उसकी सहायता कोई दृश्य या अदृश्य शक्ति नहीं करती। सुनिए, कान खोल कर सुनिए। यदि आप कष्टï से बचकर आनन्द प्राप्त करना चाहते हैं तो आत्मनिर्भरता सीखिए, अपनी भुजाओं पर विश्वास कीजिए, अपनी बुद्धि को काम में लाइये और अपने पैरों पर खड़े हो जाइए। तभी आपकी इच्छा और आकांक्षाएँ पूर्ण हो सकेंगी।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 अपनी वासनाएं काबू में रखिए (अन्तिम भाग)

🔶 देखो, जब तक तुम्हारे सामने कोई 500 रुपयों की थैली चुपचाप लाकर न रख दे तब तक तुम लोभी हो अथवा निर्लोभी, इसकी परीक्षा कैसे हो सकती है? यदि पाप न होते तो संसार में महात्मा और दुष्टों की पहचान कैसे होती। अतएव छल, अभिमान, माया, मोह इत्यादि कुवासनाओं से घेरे जाने पर अपने लिए असमर्थ मान कर उन्हें दोष का स्थान मानना मानो उन्नति के मार्ग से हटना है।

🔷 प्रत्येक व्यक्ति का अनुभव है कि वासनाओं की तपस्या कितनी कठिन है। पाप क्रोध के बुरे परिणामों के विषय में चाहे ग्रंथ के ग्रंथ लिख देने योग्य ज्ञान रखते हों, घंटों उस विषय पर व्याख्यान देकर लोगों को उनके आवेश के शमन करने की शिक्षा दे सकते हों, परन्तु जब सच्चे क्रोध का अवसर आ- उपस्थित होता है उस समय उसे संभाल लेना टेढ़ा काम है। इसीलिये किसी महात्मा का कथन है कि केवल ज्ञान के द्वारा आत्मोन्नति असंभव है। जानना और काम को कर दिखाना ये दो बातें हैं। काम-वासना को ही लीजिए पुराणों की तिलोत्तमा द्वारा ब्रह्माजी के तपो-भ्रष्ट होने की बात सभी को विदित है। पाँच हजार वर्ष तक दिव्य तप करने वाला योगी भी जिस काम-वासना को विजय न कर सका उसकी जलन का क्या ठिकाना है।

🔶 वासनाओं के अवगुणों और बुरे फलों की आलोचना करने के लिए यदि प्रतिदिन मनुष्य कोई विशेष समय नियत कर लेता उसकी नैतिक उन्नति बहुत शीघ्र हो सकती है। प्रत्येक धर्म में अपने दिन भर के कार्यों पर विचार करने के लिए सोने के पेश्तर समय निश्चित करने का उपदेश दिया गया है। उसका अभिप्राय यही है कि मनुष्य अपने नैतिक चरित्र की संभाल उसी भाँति कर लिया करे जैसे कि वह अपने दैनिक आय-व्यय किया करता है।

.... समाप्त
✍🏻 महात्मा जेम्स ऐलन
📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1950 पृष्ठ 10
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/April/v1.10

👉 अचिन्त्य चिन्तन से मनोबल न गँवाएँ (भाग 5)

🔶 निराशा इससे बुरी है। वह सोचती भी है और चाहती भी, किन्तु साथ ही अपनी असमर्थता, भाग्य की मार, परिस्थितियों की प्रतिकूलता, साथी की बेरुखी जैसी निषेधात्मक संभावनाओं पर ध्यान केन्द्रित करती है और कदम उठाने से पहले ही असफल रहने का दृश्य देखती और हार मान लेती है। ऐसे लोग उदास रहने वालों की अपेक्षा अधिक दीन-हीन स्थिति में होते हैं और सन्तोष भी हाथ से गँवा बैठते हैं।

🔷 अशुभ की आशंका जिन्हें डराती रहती है, वे चिन्तातुर पाये जाते हैं। कुछ चाहते तो हैं, किन्तु सूझ-बूझ और पुरुषार्थ के अभाव को परिस्थितिजन्य गतिरोध मान बैठते हैं। अपने को ऐसे चक्रव्यूह में फँसा पाते हैं जिसमें से बच निकलने का रास्ता अवरुद्ध पाते हैं। इस स्तर के व्यक्ति चिन्तातुर देखे जाते हैं, घबराहट में सिर धुनते हैं, हड़बड़ी में कुछ का कुछ कहते, कुछ करते और सोचते हैं, वह सब बेतुका होता है। अपनी परेशानी साथियों के सामने इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं मानो आकाश टूटकर उन्हीं पर गिरा हो। यों इस कथन में उनका प्रयोजन सहायता न सही, सहानुभूति पाने का तो होता ही है, पर वे यह भूल जाते हैं कि हारते का सभी साथ छोड़ देते हैं।

🔶 मित्र भी कन्नी काटने लगते हैं। इस दुनियाँ में सफल, साहसी और समर्थ को ही साथियों का भी सहारा मिलता है। डूबते को देखकर लोग दूर रहते हैं, ताकि चपेट में आकर कहीं उन्हें भी न डूबना पड़े। उदार, परोपकारी तो जहाँ-तहाँ उँगलियों पर गिनने जितनी संख्या में ही पाये जाते हैं। ऐसी दशा में चिन्तातुर, निराश, भयभीत, संत्रस्त कायर, दुर्बल होने की दुहाई देने के नाम पर यदि सहानुभूति मिलेगी, वह भी उथली एवं व्यंग-तिरस्कार से भरी हुई होगी। सहायता तो कहीं से कदाचित ही मिल सके। यह भी हो सकता है जिनसे सामान्य स्थिति में थोड़ी बहुत सहायता की आशा थी, उससे भी हाथ धोना पड़े।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 How long can we go on tolerating vulgarly and extravagant weddings? (Part 1)

A strange contradiction

🔶 We have just entered the third millennium. The literacy rate is on the rise. Plethora of creature comforts is available in ever-improving models and designs. There was a time when owning a scooter or a cycle was a matter of pride, but now car has become a basic necessity, be it a village or a town.  If we just leave aside the extremely poor segment, we will see that mobile, fridge, microwave, TV, home theater, car and several other things have become basic necessities. This list has been increasing for the past fifteen years.

🔷 We certainly cannot take this as a symbol of financial prosperity and should acknowledge this as crass consumerism. Our country represents a glaring contradiction where on one side, vast majority of the population is a victim of poverty, illiteracy, unhygienic living conditions, etc while on the other side an affluent minority owns flats, skyscrapers and modern means of entertainment. On one side lie the dirty slums, while on the other side are palatial mansions; on one side there are extreme crowds at the railway stations / bus stands while on the other side there is equal rush at the airports. The capacity of the creamy layer of society to splurge has increased. We see places full of multiplexes and malls.

📖 From Akhand Jyoti
✍🏻 Pranav Pandya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 22)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔶 स्वास्थ्य की शिक्षा अभी प्रारंभ नहीं हुई है। हम और आप वकील हों, तो मुबारक, लेकिन आपको नहीं मालूम कि पेट खराब क्यों हो गया? और पेट को खराब होने से बचाने के लिए क्या तरीका होना चाहिए। क्या आपके पास इसके लिए कोई स्कूल है? दवाखाने वाले तो वो चीज हैं कि जहाँ कहीं भी जाइए, हर चीज का इंजेक्शन लगा देंगे। उन्हें ये मालूम नहीं है कि वजह क्या है और किसकी वजह से सेहत खराब कर रहा है। उन सेहत खराब करने वाली खुराक और आदतों को जब तक ये हेर-फेर नहीं करेगा, तब तक उसकी सेहत कभी भी अच्छी नहीं हो सकेगी, चाहे वह रोज एक-एक दिन में बीस इंजेक्शन लगवाता चला जाए। व्यक्ति इंजेक्शन से कदापि अच्छा नहीं हो सकता। सेहत को अच्छा करने के लिए शिक्षण की आवश्यकता है।

🔷 मित्रो! हमको शिक्षण की प्रक्रिया राष्ट्र में पैदा करनी पड़ेगी। विद्या हमारे देश में नहीं है। साक्षरता हमारे देश में नहीं है। उसको बढ़ाने के लिए हमको नाइट स्कूलों की जरूरत पड़ेगी। विद्या के लिए घनघोर आंदोलन खड़ा करना पड़ेगा और इस आंदोलन के लिए हम नौकर नहीं रख सकते, कर्मचारी नहीं रख सकते और वेतन-भोगी नहीं रख सकते। गवर्नमेंट ने इस तरह के वेतन-भोगी रख लिए हैं और आप देखिए क्या हाल हो रहा है? हर डिपार्टमेंट को बढ़ा-बढ़ाकर इतना लंबा चौड़ा कर लिया है कि अगर इतना पैसा इन डिपार्टमेंट में नहीं लगाया गया होता, तो उस बचत से शिक्षण-प्रशिक्षण की समस्या सुलझ गई होती।

🔶 मित्रो! हमको जो काम करना पड़ेगा, उन क्षमता वालों के आधार पर और प्रतिभा वालों के आधार पर करना पड़ेगा। अपना यह मिशन कितना जबरदस्त मिशन है। इसको आगे बढ़ाने के लिए हमको उन आदमियों के पास जाना पड़ेगा, जिनके पास विचारशीलता भी विद्यमान है और क्षमता भी विद्यमान है। विचारशीलता नहीं है और क्षमता है, तो हमको यह कोशिश करनी पड़ेगी कि अपने मिशन की विचारधारा को, मिशन की पुस्तिकाओं को, मिशन के ट्रैक्टों को उनको बार-बार सुनाएँ और किसी प्रकार से इस तरीके से लाएँ कि वे हमारी विचारधारा के संपर्क में आएँ। अगर कोई आदमी हमारी विचारधारा के संपर्क में आ गया, तो यह बड़ी जलती हुई विचारधारा है, यह बड़ी तीखी और प्रखर विचारधारा है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 58)

👉 मद्गुरुः श्री जगद्गुरुः

🔶 परम आराध्य गुरुदेव इस जड़-चेतन, चर-अचर सम्पूर्ण जगत् में संव्याप्त हैं। उन सद्गुरु को नमन है॥ ७१॥ ज्ञान शक्ति पर आरूढ़, सभी तत्त्वों की माला से विभूषित गुरुदेव भोग एवं मोक्ष दोनों ही फल प्रदान करने वाले हैं। उन कृपालु सद्गुरु को नमन है॥ ७२॥ जो अपने आत्मज्ञान के प्रभाव से शिष्य के अनेक जन्मों से संचित सभी कर्मों को भस्मसात कर देते हैं, उन कृपालु सद्गुरु को नमन है॥ ७३॥ श्री गुरुदेव से बढ़कर अन्य कोई तत्त्व नहीं है। श्री गुरु सेवा से बढ़कर कोई दूसरा तप नहीं है, उनसे बढ़कर अन्य कोई ज्ञान नहीं है, ऐसे कृपालु गुरुदेव को नमन है॥ ७४॥ मेरे स्वामी गुरुदेव ही जगत् के स्वामी हैं। मेरे गुरुदेव ही जगत्गुरु हैं। मेरे आत्म स्वरूप गुरुदेव समस्त प्राणियों की अन्तरात्मा हैं। ऐसे श्री गुरुदेव को मेरा नमन है॥ ७५॥
  
🔷 सद्गुरु महिमा का यह मंत्रात्मक स्तोत्र अपने आप में अनेकों दार्शनिक रहस्यों को समाए हैं। इसमें श्रद्धा एवं चिन्तन दोनों का ही मेल है। सद्गुरुदेव की पराचेतना न केवल सर्वव्यापी है; बल्कि शिष्य के सभी पूर्वसंचित कर्मों को नष्ट करने में समर्थ है। सचमुच ही गुरुदेव से श्रेष्ठ अन्य कोई भी तत्त्व या सत्य नहीं है; क्योंकि जो कर्म के गहनतम रहस्य को जानते हैं, उनके लिए यह बड़ा ही स्पष्ट है कि कर्मों के क्रूर, कुटिल कुचक्र से सद्गुरु ही उबारने में समर्थ होते हैं। तभी तो गोस्वामी तुलसीदास जी ने मानस में कहा है- गुरु बिनु भव निधि तरइ न कोई। जौं बिरंचि संकर सम होई॥ यानि कि श्री गुरुदेव के बिना कोई भी संसार सागर को नहीं पार कर सकता, फिर भले ही ब्रह्मा अथवा शिव की भाँति ही समर्थ क्यों न हों।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 94

👉 यह भी नहीं रहने वाला 🙏🌹

एक साधु देश में यात्रा के लिए पैदल निकला हुआ था। एक बार रात हो जाने पर वह एक गाँव में आनंद नाम के व्यक्ति के दरवाजे पर रुका। आनंद ने साध...