मंगलवार, 19 जून 2018

👉 ईश्वर भक्त लडकी जीनल

🔶 एक राजा बहुत दिनो से पुत्र की प्राप्ती के लिये आशा लगाये बैठा था,पर पुत्र नही हुआ। उसके सलाहकारों ने तांत्रिकों से सहयोग की बात बताई। सुझाव मिला कि किसी बच्ची की बलि दे दी जाये तो पुत्र प्राप्ति हो जायेगी। राजा ने राज्य में ये बात फैलाई कि जो अपनी बेटी देगा उसे बहुत सारे धन दिये जायेगे।

🔷 एक परिवार में कई बच्चें थे, गरीबी भी थी, एक ऐसी बच्ची भी था जो ईश्वर पर आस्था रखती थी जिसका नाम जीनल था तथा वो सन्तों के संग सत्संग में ज्यादा समय देती थी। परिवार को लगा कि इसे राजा को दे दिया जाये क्योंकि ये कुछ काम भी नही करती है, हमारे किसी काम की भी नही। इससे राजा प्रसन्न होकर बहुत सारा धन देगा। ऐसा ही किया गया जिनल को राजा को दे दिया गया।

🔶 राजा के तात्रिकों द्वारा जीनल की बलि की तैयारी हो गई, राजा को भी बुलाया गया, बच्चे से पुछा गया कि तुम्हारी आखरी इच्छा क्या है? क्योंकि अाज तुम्हारा जीवन का अन्तिम दिन है। जीनल ने कहा कि ठीक है मेरे लिये रेत मँगा दिया जाये, रेत अा गया। जीनल ने रेत से चार ढ़ेर बनाये, एक-एक करके तीन रेत के ढ़ेर को तोड़ दिया और चौथे के सामने हाथ जोड़कर बैठ गई और कहा कि अब जो करना है करे। ये सब देखकर तॉत्रिक डर गये बोले कि ये तुमने क्या किया है पहले बताओं।

🔷 राजा ने भी पुछा तो जीनल ने कहा कि पहली ढ़ेरी मेरे माता पिता की है, मेरी रक्षा करना उनका कर्तव्य था पर उन्होने पैसे के लिये मुझे बेच दिया। इसलिये मैने ये ढ़ेरी तोड़ी, दुसरा मेरे सगे-सम्बन्धियों का था, उन्होंने भी मेरे माता-पिता को नही समझाया तीसरा आपका है राजा क्योंकि राज्य के सभी इंसानों की रक्षा करना राजा का ही काम होता है पर राजा ही मेरी बलि देना चाह रहा है तो ये ढ़ेरी भी मैने तोड़ दी। अब सिर्फ मेरे सदगुरुदेव और ईश्वर पर मुझे भरोसा है इसलिये ये एक ढ़ेरी मैने छोड़ दी है।

🔶 राजा ने सोचा कि पता नही बच्ची की बलि से बाद भी पुत्र प्राप्त हो या न हो क्यों ना इस लडकी को ही अपनी पुत्री बना ले, इतनी समझदार और ईश्वर भक्त लडकी है। राजा ने उस बच्ची को अपनी बेटी बना ली और वो राजकुमारी बन गई और जीनल की ईश्वर भक्त के परिणाम राजा के वहा बच्चे का जन्म हुआ।

🔷 कहानी का भाव कि जो ईश्वर और सदगुरुदेव पर यकीन रखते है, उनका बाल भी बांका नही होता है, हर मुश्किल में एक का ही जो आसरा लेते है उनका कही से किसी प्रकार का कोई अहित नही होता है।

👉 आज का सद्चिंतन 19 June 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 19 June 2018


👉 सादा जीवन उच्च विचार अन्योन्याश्रित (भाग 2)

🔶 जन मनोविज्ञान को समझने वाले जानते है कि साथियों की तुलना में बहुत अधिक विलास वैभव एकत्रित करना, गरिमा अर्जित नहीं कर पाता, वरन् आक्रोश उत्पन्न करता है जिसकी चपेट में न जाने कितने आक्रमण सहने और कष्ट उठाने पड़ते हैं। इसलिए दूरदर्शिता सदा यही कहती रही है कि सम्पन्नता अॢजत करने के अनेक खतरे हैं, जबकि सादगी अपनाने पर महानता उभरती है और जन-जन का स्नेह सहयोग घसीट लाती है।

🔷 सादा जीवन उच्च विचार का सिद्धान्त ऐसा है जिसमें जीवन की सार्थकता, सफलता और जुड़ी हुई अति प्रसन्नता के समस्त सूत्रों का समावेश है। हलका-फुलका जीवन अर्थात् सादगी, मितव्ययता और बिना विलास वैभव का सीधा सादा निर्वाह। इसके लिए औसत भारतीय स्तर को मापदण्ड मानकर चलना होता है अन्यथा यह पता ही न चलेगा कि जिस वैभव का उपभोग चल रहा है वह आवश्यक है या अनावश्यक, उचित है या अनुचित। जिसकी अपनी तृष्णा आकाश चूमती हो उसके लिए यह अनुमान लगा सकना कठिन है कि औसत मनुष्य को किस स्तर का निर्वाह अपनाना पड़ता है। वे सदा धन कुबेरों के सपने देखते है और तस्करों, लोलुपों और निष्ठुरों के द्वारा अपनाये जाने जैसे विलास वैभव को स्वाभाविक मानते हैं।

🔶 इस राह पर चलते तो अनेकों हैं, जो चल नहीं पाते वे भी ललक वैसी ही सँजोये रहते हैं। परिणति स्पष्ट हैं, साधनों के रहते हुए भी उनका इच्छित रसास्वादन तो कदाचित ही कोई कर पाते हों। मधुमक्खियों के वैभव को कौन सहन करता है। छत्ता तोड़ने के लिए बहेलिये ही नहीं, गिद्ध और बन्दर तक घात लगाये रहते हैं। यह अपहरण चापलूसी के औजार से किया गया या गला मरोड़ने वाले नागपाश से, यह बात दूसरी है।

🔷 बढ़ा हुआ वैभव रुदन के अतिरिक्त और कुछ उत्पन्न नहीं कर सकता। उससे दुर्व्यसन और अहंकार समान रूप में बढ़ते हैं। यह दोनों ही ऐसे हैं जो शहतीर में लगे घुन की तरह उसे गुप-चुप खोखला करते और धराशायी करने तक अपने प्रयास में निरत रहते हैं। अधिक जोड़ने की, अधिक भोगने की ललक में मनुष्य कुकृत्य तो करते ही हैं, उसका खर्च भी सीधे रास्ते नहीं होता। या तो मनुष्य स्वयं उसे दुर्व्यसनों में उड़ाता है या फिर ईर्ष्यालुओं के आक्रमण का शिकार बनता है। पारा किसी को पचता नहीं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Control and Refinement of Hormones

🔶 At a superficial level, it appears that some chemical processing of the food intakes generates blood, and that the flow of blood is the source of heat and energy in the body.  However, deeper analysis has shown that there is a separate mechanism at the root of all functions inside the body, which gives rise to the formation of blood and maintenance of body-energy.  The auto-regulatory system of the neurons and the influence of the conscious and unconscious mind on it are also now regarded as a manifestation of some subtler processes.

🔷 The hormone secreting endocrine glands constitute this subtle system, which is now found to be the basic controller of all functions, qualities, abilities or disabilities of the bodily and mental functions. The thyroid gland secrets a hormone called thyroxin, which enters the blood stream and reaches different parts of the body. Deficiency of this hormone reduces the absorption rate of oxygen, which often results in disruption of metabolic functions, excessive fatigue, loss of memory and bluntness of mind.

🔶 Also, the skin and hair become dry, lips and eyelids become lose and appear as pulled downwards. The body fattens and its plumpness is such that pressing a finger makes a groove (depression) in the swollen part. One is unable to bear chill and feels tired because of the reduced level of this hormone.  Growth of the thyroid gland results in a swollen, protuberant throat and gives rise to the diseases like goiter. The reasons for abnormal shrinkage or growth of this gland are not fully understood. It may malfunction even if one’s diet is balanced and the daily routine is also maintained at a level, which is normally prescribed for a healthy person.

📖 Akhand Jyoti- June- 2003

👉 बुरे विचारों से दूर रहिए (अन्तिम भाग)

🔶 बुरे विचारों के निरोध का उपाय सबसे प्रथम उनको पहचानना ही है। जिनके विचारों को। हम बुरे विचार मानते ही नहीं, उन्हें हम अपने मनोमन्दिर में प्रवेश करने से क्योंकर रोक सकेंगे? यदि दूसरों के धनापहरण के विचार को हम उत्तम विचार मानते हैं तो उसे अपने मन में आने से रोकने की जगह भली प्रकार से उसका स्वागत करेंगे। जो विचार बुरे होते हैं। वे उनके प्रथम स्वरूप में ही बुरे नहीं लगेंगे, उनके परिणाम बुरे होते हैं। विचारवान व्यक्ति ही इस बात को जान सकता है कि अमुक विचार अन्त में दुखदायी होगा।
संसार के अत्याधिक मनुष्यों को यह समझाना ही कठिन है कि उनके विचार ही उनके सुख-दुख के कारण हैं।

🔷 मनुष्यमात्र में अपने आप पर विवेचना करने की शक्ति का अभाव होता है। हम सभी बहिर्मुखी हैं। हम अपने कष्टों का कारण दूसरों को मानने में सन्तोष पाते हैं। अपने दोषों को दूसरे में देखते हैं। जिस अवाँछनीय घटना की जड़ हमारे विचारों में ही है उसे हम दूसरे व्यक्तियों में देखते हैं। इस प्रकार की मानसिक प्रवृत्ति को दोषारोपण की प्रवृत्ति कहते हैं अथवा प्रोजेक्शन कहते है। वही मनुष्य बुरे विचारों के निरोध में समर्थ होता है, जो अपने आपके विषय में सदा चिन्तन करता है और जो परोक्ष रूप से भी यह जानता है कि मनुष्य का मन ही दुख और दुखों का कारण है। ऐसे ही मनुष्य में भले ओर बुरे विचारों के पहचानने की शक्ति उत्पन्न होती है।

🔶 किसी भी ऐसे विचार को बुरा विचार कहना चाहिये जो आत्मा को दुःख देता हो, उसको भ्रम में डालता हो। बीमारी के विचारों और असफलता के विचारों को सभी बुरा कहेंगे यह प्रत्यक्ष ही है कि इन विचारों से मन को दुख होता है और अनहोनी घटना होके रहती है। किन्तु इस बात को मानने के लिये कम लोग तैयार होंगे कि शत्रुता के विचार, दूसरों को क्षति पहुंचाने के विचार भी बुरे विचार है। ये विचार भी उसी प्रकार हमारी आत्मा का बल कम कर देते हैं जिस प्रकार कि असफलता और बीमारी के विचार आत्मा का बल कम कर देते हैं।

.... समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति मई 1950 पृष्ठ 14
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/May/v1.14

👉 ईश्वर उपासना

🔶 ईश्वर उपासना मानव जीवन की अत्यन्त महत्वपूर्ण आवश्यकता है। आत्मिक स्तर को सुविकसित, सुरक्षित एवं व्यवस्थित रखने के लिए हमारी मनोभूमि में ईश्वर के लिए समुचित स्थान रहना चाहिए और यह तभी संभव है जब उसका अधिक चिन्तन, मनन, अधिक सामीप्य, सान्निध्य प्राप्त करते रहा जाय। भोजन के बिना शरीर का काम नहीं चल सकता, साँस लिए बिना रक्ताभिषरण की प्रक्रिया बिगड़ जाती है। इसी प्रकार ईश्वर की उपेक्षा करने के उपरान्त आन्तरिक स्तर भी नीरस, चिन्ताग्रस्त, अनिश्चित, अनैतिक, अव्यवस्थित एवं आशंकित बना रहता है। यह हानि कुछ कम हानि नहीं है। दीखने वाली हानियों को लोग आसानी से समझ लेते हैं, पर इस जीवन के सारे आनन्द और उद्देश्य को ही नष्ट कर देने वाली हानि को हम न तो देख पाते हैं और न समझते ही हैं। यह कैसे दुर्भाग्य की बात है।

🔷 मानव जीवन की प्रगति और सुख-शान्ति आन्तरिक स्तर की उत्कृष्टता पर निर्भर रहते हैं। इस उत्कृष्टता की पुष्टि एवं अभिवृद्धि के लिए ही उपासना तंत्र का आविर्भाव हुआ हैं। भौतिक सुख- साधन, बाहुबल और बुद्धिबल के आधार पर कमाये जा सकते हैं पर गुण-कर्म-स्वभाव की उत्कृष्टता पर निर्धारित समस्त विभूतियाँ हमारे आन्तरिक स्तर पर ही निर्भर रहती हैं। इस स्तर के सुदृढ़ और समुन्नत बनाने में उपासना का भारी योग रहता है। इसलिए अत्यन्त आवश्यक कार्यों की भाँति ही उपासना को दैनिक कार्यक्रम में स्थान मिलना चाहिए। जिस प्रकार जीविका उपार्जन, आहार, विश्राम, सफाई, गृहस्थ पालन, विद्याध्ययन, मनोरंजन आदि का ध्यान रखा जाता है, वैसा ही ध्यान उपासना का भी रखा जाना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1965 पृष्ठ 5
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/January/v1.5