मंगलवार, 12 जून 2018

👉 अखण्ड-ज्योति परिवार

🔶 कष्ट पीड़ित, कामनाग्रस्त, ऋद्धि सिद्धि के आकाँक्षी, स्वर्ग मुक्ति के फेर में पड़े हुए, विरक्त , निराश व्यक्ति भी हमारे संपर्क में आते रहते हैं। ऐसे कितने ही लोगों से हमारे सम्बन्ध भी हैं, पर उनसे कुछ आशा हमें नहीं रहती। जो अपने निजी गोरखधन्धे में इतने अधिक उलझे हुए हैं कि ईश्वर, देवता, साधु, गुरु किसी का भी उपयोग अपने लाभ के लिए करने का ताना-बाना बुनते रहते हैं, वे बेचारे सचमुच दयनीय हैं। जो लेने के लिए निरन्तर लालायित हैं, उन गरीबों के पास देने के लिए है ही क्या? देगा वह—जिसका हृदय विशाल है, जिसमें उदारता और परमार्थ की भावना विद्यमान है। समाज, युग, देश, धर्म, संस्कृति के प्रति अपने उत्तरदायित्व की जिसमें कर्तव्य-बुद्धि जम गई होगी—वही लोक-कल्याण की बात सोच सकेगा और वही वैसा कुछ कर सकेगा। आज के व्यक्ति वादी, स्वार्थ परायण युग में ऐसे लोग चिराग लेकर ढूँढ़ने पड़ेंगे। पूजा उपासना के क्षेत्र में अनेक व्यक्ति अपने आपको अध्यात्म-वादी कहते मानते रहते हैं पर उनकी सीमा अपने आप तक ही सीमित है। इसलिए तत्वतः वे भी संकीर्ण व्यक्ति वादी ही कहे जा सकते हैं।

🔷 हमारी परम्परा पूजा उपासना की अवश्य है पर व्यक्ति बाद की नहीं। अध्यात्म को हमने सदा उदारता, सेवा और प्रस्ताव की कसौटी से कसा है और स्वार्थी को खोटा एवं परमार्थी को खरा कहा है। अखण्ड-ज्योति परिवार में दोनों ही प्रकार के खरे-खोटे लोग मौजूद हैं। अब इनमें से उन खरे लोगों की तलाश की जा रही है जो हमारे हाथ में लगी हुई मशाल को जलाये रखने में अपना हाथ लगा सकें, हमारे कंधे पर लदे हुए बोझ को हलका करने में अपना कंधा लगा सकें। ऐसे ही लोग हमारे प्रतिनिधि या उत्तराधिकारी होंगे। इस छाँट में जो लोग आ जावेंगे उनसे हम आशा लगाये रहेंगे कि मिशन का प्रकाश एवं प्रवाह आगे बढ़ाते रहने में उनका श्रम एवं स्नेह अनवरत रूप से मिलता रहेगा। हमारी आशा के केन्द्र यही लोग हो सकते हैं। और उन्हें ही हमारा सच्चा वात्सल्य भी मिल सकता है। बातों से नहीं काम से ही किसी की निष्ठा परखी जाती है और जो निष्ठावान् हैं उनको दूसरों का हृदय जीतने में सफलता मिलती है। हमारे लिए भी हमारे निष्ठावान् परिजन ही प्राणप्रिय हो सकते हैं।

🔶 लोक सेवा की कसौटी पर जो खरे उतर सकें, ऐसे ही लोगों को परमार्थी माना जा सकता है। आध्यात्मिक पात्रता इसी कसौटी पर परखी जाती है। हमारे उस देव ने अपनी अनन्त अनुकम्पा का प्रसाद हमें दिया है। अपनी तपश्चर्या और आध्यात्मिक पूँजी का भी एक बड़ा अंश हमें सौंपा है। अब समय आ गया जब कि हमें भी अपनी आध्यात्मिक कमाई का वितरण अपने पीछे वालों को वितरित करना होगा। पर यह क्रिया अधिकारी पात्रों में ही की जायगी, यह पात्रता हमें भी परखनी है और वह इसी कसौटी पर परख रहे हैं कि किस के मन में लोक सेवा करने की उदारता विद्यमान है। इसी गुण का परिचय देकर किसी समय हमने अपनी पात्रता सिद्ध की थी अब यही कसौटी उन लोगों के लिए काम आयेगी जो हमारी आध्यात्मिक पूँजी के लिए अपनी दावेदारी प्रस्तुत करना चाहेंगे।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1964 पृष्ठ 50-51

👉 Concentration – an essential pre-requisite for spiritual unfoldment (Part 1)

🔶 The reflection cannot be seen clearly in disturbed and muddled surface of water. In the same way, so long as the mind is unstable, the inner self cannot be felt. Therefore, with the help of sadhana, one should try to steady the mind. Sadhana will purify the innerself and with increase in purity, concentration will also increase.

🔷 Therefore, patiently, one should engage the mind in sadhana and should try to make it quite gradually. Without controlling the mind, a sadhak cannot succeed in sadhana. Psychologists say that in a state of calm and quiet mind a great subtle energy field emerges from the deep recesses of the soul. It is very difficult for the ordinary people to get a feel of this energy field.

🔶 A disciplined mind helps in physical, mental and spiritual well-being. Among the various types of yogas, for example, karmayoga, bhaktiyoga, layayoga, hathayoga, ragayoga, tapayoga, etc., only japayoga is the simplest and most practical. Japa (recitation) of a mantra helps in achieving concentration.

📖 Akhand Jyoti Mar-2002

👉 वेष-भूषा की मनोवैज्ञानिक कसौटी (भाग 1)

🔶 एक दो नहीं संपूर्ण 6 वर्ष तक उसने पार्कों, थियेटरों, छविग्रहों और दूसरे-दूसरे सार्वजनिक स्थानों के चक्कर काटे। एक नहीं हजारों फोटोग्राफ लिये और जिस। जिस के फोटोग्राफ लिये उन-उन के व्यक्तिगत जीवन का परिचय और अध्ययन किया। सोचते होंगे होगा कोई व्यर्थ के कामों में समय गंवाने वाला फक्कड़, पर नहीं वह हैं लन्दन के एक प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक— श्रीनेक हेराल्ड जिन्होंने इतने वर्ष के अध्ययन से महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह निकाला कि वेष-भूषा का मनुष्य के चरित्र, स्वभाव, शील और सदाचार से गहनतम सम्बन्ध है।

🔷 पुरुषों की तरह की वेष-भूषा धारण करने वाली नवयुवतियों का मानसिक चित्रण और उनके व्यवहार की जानकारी देते हुए श्री हेराल्ड लिखते हैं—ऐसी युवतियों की चाल-ढाल, बोल-चाल, उठने-बैठने के तौर तरीकों में भी पुरुष के से लक्षण प्रकट होने लगते हैं। वे अपने आप को पुरुष सा अनुभव करती हैं जिससे उनके लज्जा आदि नारी सुलभ गुणों का ह्रास होने लगता है। स्त्री जब स्त्री न रह कर पुरुष बनने लगती है तब वह न केवल पारिवारिक उत्तरदायित्व निबाहने में असमर्थ हो जाती है वरन् उसके वैयक्तिक जीवन की शुद्धता भी धूमिल पड़ने लगती है। पाश्चात्य देशों में दाम्पत्य जीवन में उग्र होता हुआ अविश्वास उसी का एक दुष्परिणाम है।”

🔶 श्री हेराल्ड ने अपना विश्वास व्यक्त किया कि भारतीय आचार्यों ने वेष-भूषा के जो नियम और आचार बनायें वह केवल भौगोलिक अनुकूलता ही प्रदान नहीं करते वरन् स्त्री-पुरुषों की शारीरिक बनावट का दर्शक पर क्या प्रभाव पड़ता है उस सूक्ष्म विज्ञान को दृष्टि में रखकर भी बनाये गये हैं वेष-भूषा का मनोविज्ञान के साथ इतना बढ़िया सामंजस्य न तो विश्व के किसी देश में हुआ न किसी संस्कृति में, यह भारतीय आचार्यों की मानवीय प्रकृति के अत्यन्त सूक्ष्म अध्ययन का परिणाम था।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 83

👉 कठिनाइयों का अन्त कैसे हो?

🔶 जो व्यक्ति अपने आपको जितना महान समझता है उसके शत्रु भी उतने ही अधिक होते हैं। महानता का भाव एक प्रकार का मानसिक रोग है। जो व्यक्ति अपने आपको महान समझता है वह अंतर्मन से असन्तुष्ट रहता है। उसके मन में भारी अन्तर्द्वन्द्व होता रहता है। वह बड़े-बड़े काम का आयोजन करता है। उसके सभी काम असामान्य होते हैं। वह संसार को ही गलत मार्ग पर चलते हुए देखता है और उसके सुधार करने की धुन में लग जाता है।

🔷 महानता के भाव से प्रेरित कोई व्यक्ति अपने प्रतिद्वन्द्वी पर भौतिक विजय प्राप्त करने की चेष्टा करता है और कोई नैतिक। नैतिक विजय में वह अपने शत्रु को मित्र बनाने में भी समर्थ न होता परन्तु संसार में उसको पद पर से गिराने में समर्थ होता है। इस प्रकार जितने लोगों को वह नैतिक दृष्टि से संसार में नीचा सिद्ध करने की चेष्टा करता है, वे सब उसके शत्रु बन जाते हैं। इन शत्रुओं की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जाती है परन्तु शत्रुओं की संख्या बढ़ती हुई देखकर उसे कोई आश्चर्य नहीं होता। वह समझता है कि उसके उच्चादर्श का समाज द्वारा विरोध होना स्वाभाविक ही है।

🔶 जब तक इन शत्रुओं से लड़ने को वह अपने आप में सामर्थ्य पाता है, वह कुछ न कुछ रचनात्मक काम में लगा रहता है। इस प्रकार वह संसार का कल्याण करने में समर्थ होता है। पर जब अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने की उसकी आशा निराशा में बदल जाती है तो वह विक्षिप्त अथवा निराश पापी मनोवृत्ति का हो जाता है।

📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1956 पृष्ठ 11

👉 गुरुगीता (भाग 128)

👉 सर्वसंकटहारिणी गुरूगीता की मंत्र साधना

🔶 विष्णु शंकर सामान्य गृहस्थ थे। उनकी जीवन यात्रा सामान्य जनों की भाँति साधारण चल रही थी। घर- परिवार की मामूली उलझनों के साथ सब कुछ ठीक था। थोड़े बहुत उतार- चढ़ाव तो आते थे, पर अभी तक ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था जिसे अघटित कहा जा सके। पर दैव का कोप कहें या दुर्विपाक, एकाएक सब कुछ उलट- पुलट गया। समय का फेर जिन्दगी में होता है, ऐसा लगने लगा। ग्रहों की क्रूर दशा साफ नजर आने लगी। खेती, घर, काम- काज, रिश्तों का संसार, सब कहीं टुटन- दरारें नजर आने लगी। हानि, षडयन्त्र और अपमान से विष्णु शंकर का जीवन घिर गया। वह क्या करें, कैसे करे, कहाँ जाय कुछ भी नहीं सूझ रहा था।

🔷 यहाँ तक कि हमेशा शांत एवम् स्वस्थ रहने वाले विष्णु शंकर चिड़चिड़े ,अन्यमनस्क, उदासीन एवं अवसादग्रस्त रहने लगे। विपरीत परिस्थितियों का प्रचण्ड वेग उन्हें असहाय बनाने लगा। ऐसी असहायता में उन्हें यदा- कदा आत्महत्या के विचार घेर लेते। अकेले बैठेकर वह फुट- फुटकर रोते रहते। कभी- कभी शिवालय जाकर भगवान शिव की लिंगमूर्ति के सामने बिलख उठते, परंतु उपाय नदारत था। अब तो असहा आर्थिक हानि के कारण भुखे- मरने की नौबत आ पहुँची थी। परन्तु कोई उपाय न था।

🔶 पर उस दिन सोते समय उन्होंने सपने में देखा कि एक श्रेव्त केश दाढ़ी एवं देदीप्यमान चेहरे वाले ऋषि उन्हें सान्त्वना देते हुए कह रहे है -धैर्य रखो पुत्र! यह पुर्वजन्म के कर्मों के कारण आया दुर्विपाक है। इस जीवन में तुमने ऐसे कोई काम नहीं किए, जिसका तुम्हें इतना कठोर दण्ड मिलता। पर कर्म तो कर्म होते है, इस जीवन के हों या पिछले जीवन के, भोगने तो पड़ते ही है, धैर्य रखो और कठिन तप में अपने को प्रवृत करो। तुम्हारे कठोर तप के प्रभाव से यह अंधेरा छिन्न- भिन्न हो जाएगा, पर तप का आधार क्या हो? अंतस में यह अनुगूँज उठी। यह अनुगूँज देर तक रहती इसके पहले ही ऋषि ने कहा- गुरुगीता भगवान शिव की वाणी है। शिवमुख से उच्चारित होने के कारण यह परम मंत्र है। इसमें असीम ऊर्जा समायी है। इसे ही अपने तप का आधार बनाओ।

🔷 उस दिव्य स्वप्र में ही उन ऋषि ने उन्हें तप की प्रकिया समझा दी। चन्द्रायण व्रत, नियमित गायत्री जप और गुरुगीता जप और गुरुगीता का पाठ अनुष्ठान, उन ऋषि ने मस्तक पर हाथ रखा। उनके दिव्य स्पर्श से विष्णुशंकर के मन का अवसाद जाता रहा। निद्रा से जगकर उन्हें चैतन्यता लग रही थी। मन हल्का था और उनमें तप का उत्साह संचारित हो रहा था। अगले दिन गुरुवार था। गुरुवार- गुरुचेतना के स्मरण का पुनीत क्षण है। ऐसा समझते हुए उन्होंने इस पावन क्षण में जो पुष्य नक्षत्र से भी जुड़ा था। ऐसे गुरुपुष्य योग में विष्णु शंकर ने अपनी तप साधना आरम्भ कर दी।

🔶 हालांकि परिस्थितियों में अभी भी अपमान, षड़यंत्र ,हानि एवं कुचक्रों के प्रबल झंझावात उठ रहे थे। पर अब मन:स्थिति भिन्न थी, उसमें तप के लिए प्रबल उत्साह था और दैवी सहायता पर प्रबल विश्वास भी। इसी विश्वास की पूँजी के साथ तप की अंतर्धारा बह चली। दिवस, मास बीतने लगे। छ: महीने तक तो परिस्थितियों में किसी तरह का कोई परिवर्तन नहीं दिखाई दिया, परन्तु छह महीने बाद घने अँधेरे में प्रकाश की किरणें फुटने लगी। इतना हुआ कि भूखे मरने की नौबत समाप्त हुई। बाहर अपमान एवं व्यंग के अवसर कम होने लगे सघन अँधेरे में यह उजाले की वृष्टि बढ़ती गयी। गुरुगीता ने उन्हें आश्रय, आश्र्वासन एवं सुफल सभी कुछ दिया। अब वह अनुभव कर रहे थे कि गुरुगीता दुष्कर संकटों का सार्थक समाधान है, जो संकटों के पाश से पाश से मुक्त कर गुरुभक्ति ईश्वरनिष्ठा का वरदान देती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 193

👉 आरोप

🔶 एक युगल को शादी के 11 साल बाद एक लड़का हुआ। उनका लड़का उनकी आँखों का तारा था। एक सुबह, आदमी को काम पर जाने के लिए देरी हो रही थी जाते जाते उसने कमरे में एक दवाई की बोतल खुली देखी, उसने अपनी पत्नी से उस बोतल को ढक्कन लगा कर अलमारी में रखने को कहा, लड़के की मम्मी रसोई घर में तल्लिन थी, वो ये बात पूरी तरह से भूल गयी थी।

🔷 लड़का जो तक़रीबन 2 साल का था कमरे में खेलते-खेलते वो बोतल देखी और उस बोतल की ओर गया, उसने उसमे की पूरी दवाई पी ली। उस दवाई की ज्यादा मात्रा छोटे बच्चो को जहरीली हो सकती थी। दवाई पीने के बाद वह लड़का बेहोश हो गया, उसकी मम्मी उसे जल्द से जल्द अस्पताल ले गयी जहाँ उसकी मौत हो गयी। उसकी मम्मी पूरी तरह से हैरान हो गयी थी, वह भयभीत हो गयी थी, की कैसे वो अब अपने पति का सामना करेंगी?

🔶 जब लड़के के परेशान पिता अस्पताल में आये तो उन्होंने अपने बेटे को मृत पाया और अपनी पत्नी और देखते हुए सिर्फ चार शब्द कहे। आपको क्या लगता है कौन से होंगे वो चार शब्द?

🔷 पति ने सिर्फ इतना ही कहा- “ I Love You Darling”. उसके पति का अनअपेक्षित व्यवहार आश्चर्यचकित करने वाला था, उसका लड़का मर चूका था, वो उसे कभी वापिस नहीं आ सकता था, और वो अपनी पत्नी में भी कोई कसूर नहीं ढूंढ रहा था क्योंकि वो सोच रहा था की अगर उसने खुद वह बोतल उठाके बाजू में रख दी होती तो आज उसके साथ यह सब न होता।

🔶 वो किसी पर भी आरोप नहीं लगा रहा था, क्योंकि उसकी पत्नी ने भी अपना एकलौता बेटा खो दिया था. उस समय उसे सिर्फ अपने पति से सहानुभूति और दिलासा चाहिये थी. और यही उसके पति ने उस समय उसे दिया।

🔷 मित्रों कभी-कभी हम इसी में समय व्यर्थ कर देते है की परिस्थिती के लिए कौन जिम्मेदार है या कौन आरोपी है, ये सब हमारे आपसी रिश्तों  में होता है, जहाँ काम करते है वहाँ या जिन लोगो को हम जानते है उन सभी के साथ होता है, और परिस्थिती के आवेश में आकर हम अपने रिश्तों को भूल जाते है और एक दुसरे का सहारा बनने के बजाये एक दुसरे पर आरोप लगाते है।

🔶 कुछ भी हो जाये, हम उस व्यक्ति को कभी भी नहीं भूल सकते जिसे हम प्रेम करते है, इसीलिए जीवन में जो आसान है उसे प्रेम करो।

🔷 आपके पास अभी जो है उसे जमा करो, और अपनी तकलीफों को विचार कर-कर के बढ़ाने के बजाये उन्हें भूल जाओ. उन सभी चीजो का सामना करो जो आपको अभी मुश्किल लगती है या जिनसे आपको डर लगता है सामना करने के बाद आप देखोंगे के वो चीजे उतनी मुश्किल नहीं है जितना की आप पहले सोच रहे थे। हमें परिस्थिती को समझकर ही लोगो के साथ व्यवहार करना चाहिये, और कठिन परिस्थितियों में उनका हमदर्द बनना चाहिये।

👉 आज का सद्चिंतन 12 June 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 12 June 2018


👉 अपना अपना भाग्‍य

एक राजा के तीन पुत्रियाँ थीं और तीनों बडी ही समझदार थी। वे तीनो राजमहल मे बडे आराम से रहती थी। एक दिन राजा अपनी तीनों पुत्रियों सहित भोज...