गुरुवार, 18 अप्रैल 2019

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 April 2019



👉 आज का सद्चिंतन 18 April 2019


👉 निंदा रस से बच कर रहें

हमारा प्रिय शगल है दूसरों की निंदा करना। सदैव दूसरों में दोष ढूंढते रहना मानवीय स्वभाव का एक बड़ा अवगुण है। दूसरों में दोष निकालना और खुद को श्रेष्ठ बताना कुछ लोगों का स्वभाव होता है। इस तरह के लोग हमें कहीं भी आसानी से मिल जाएंगे।

परनिंदा में प्रारंभ में काफी आनंद मिलता है लेकिन बाद में निंदा करने से मन में अशांति व्याप्त होती है और हम हमारा जीवन दुःखों से भर लेते हैं। प्रत्येक मनुष्य का अपना अलग दृष्टिकोण एवं स्वभाव होता है। दूसरों के विषय में कोई अपनी कुछ भी धारणा बना सकता है। हर मनुष्य का अपनी जीभ पर अधिकार है और निंदा करने से किसी को रोकना संभव नहीं है।

लोग अलग-अलग कारणों से निंदा रस का पान करते हैं। कुछ सिर्फ अपना समय काटने के लिए किसी की निंदा में लगे रहते हैं तो कुछ खुद को किसी से बेहतर साबित करने के लिए निंदा को अपना नित्य का नियम बना लेते हैं। निंदकों को संतुष्ट करना संभव नहीं है।

जिनका स्वभाव है निंदा करना, वे किसी भी परिस्थिति में निंदा प्रवृत्ति का त्याग नहीं कर सकते हैं। इसलिए समझदार इंसान वही है जो उथले लोगों द्वारा की गई विपरीत टिप्पणियों की उपेक्षा कर अपने काम में तल्लीन रहता है। किस-किस के मुंह पर अंकुश लगाया जाए, कितनों का समाधान किया जाए!

प्रतिवाद में व्यर्थ समय गंवाने से बेहतर है अपने मनोबल को और भी अधिक बढ़ाकर जीवन में प्रगति के पथ पर आगे बढ़ते रहें। ऐसा करने से एक दिन आपकी स्थिति काफी मजबूत हो जाएगी और आपके निंदकों को सिवाय निराशा के कुछ भी हाथ नहीं लगेगा।

संसार में प्रत्येक जीव की रचना ईश्वर ने किसी उद्देश्य से की है। हमें ईश्वर की किसी भी रचना का मखौल उड़ाने का अधिकार नहीं है। इसलिए किसी की निंदा करना साक्षात परमात्मा की निंदा करने के समान है। किसी की आलोचना से आप खुद के अहंकार को कुछ समय के लिए तो संतुष्ट कर सकते हैं किन्तु किसी की काबिलियत, नेकी, अच्छाई और सच्चाई की संपदा को नष्ट नहीं कर सकते। जो सूर्य की तरह प्रखर है, उस पर निंदा के कितने ही काले बादल छा जाएं किन्तु उसकी प्रखरता, तेजस्विता और ऊष्णता में कमी नहीं आ सकती।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 8)

HOW DOES CHITRAGUPTA MAINTAIN THE RECORD?

A sinful act leaves an indelible dark spot on the conscience of a relatively more virtuous individual. In other words, the gravity of sin is considered lesser in the case of an illiterate, ignorant, uncivilized person. With the increase in wisdom a person acquires a greater capability to discriminate between right and wrong, proper and improper. The conscience becomes aware of the consequences of proper and improper actions. The “Voice of Conscience”, therefore, becomes more assertive. It becomes more responsible. None blames an infant for dirtying its undergarments. Nor does the child feel embarrassed for it.

On the other hand, if a grown-up person behaves in such a manner, the society considers it disgraceful and the individual too feels embarrassed and humiliated. With self-evolution, the soul also has to share additional responsibility for higher level of morality and ethics. A soldier will probably be discharged after a minor punishment an account of disobedience, but an officer will have to face court martial for a similar  misconduct. When wise, intelligent and empathic persons indulge in corrupts practices, Chitragupta records these in the category of grave sins.

Mythology tells us that king Nripa had to face hell for a minor offence. When an ignorant person commits a crime, it is not taken seriously, but if a person made responsible for upholding standards of morality for the masses (a brahmin) deviates from his course of duty, in the court of divine justice he/she deserves a stern punishment. A social reformer has the status of a leader in society. Being a leader has its own advantages, but the leader also has the highest responsibility. Knowledgeable persons have the formidable responsibility of adhering to upright conduct and unimpeachable character, failing which; divine justice will make them suffer the agony of falling from a mountaintop to the depths of a valley. In the following chapter we shall discuss the various types of actions (karmas) and their relationship with Divine Justice.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 16

👉 आत्मचिंतन के क्षण 18 April 2019

★ आज मित्रता की आड़ लेकर शत्रुता बरतने का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। इसे चतुरता, कुशलता समझा जाता है और इस प्रयास में सफल व्यक्ति आत्म-श्लाघा भी बहुत करते हैं। साथी को मित्रता के जाल में फँसाकर उसकी बेखबरी का-भोलेपन का अनुचित लाभ उठा लेना यही आज तथाकथित चतुर लोगों की नीति बनती जा रही है। ऐसी दशा में मित्र और शत्रु की कसौटी को हर घड़ी साथ रखने की आवश्यकता है।

◆ किसी का सम्मान करने का अर्थ है- बदले में उसका सम्मान पाना। दूसरे कम कीमत में सम्मान पाने की बात बन ही नहीं सकती। सादगी से रहा जाय, शालीनता बरती जाये और दूसरों को संतुष्ट रखकर उन  पर अपना प्रभाव छोड़ने की कला सीखी जाये, इससे बढ़कर अपने आपको बड़ा बनाने-ऊँचा उठाने का कोई श्रेष्ठ उपाय है ही नहीं।

◇ विचार फालतू बात नहीं है। वह एक संज्ञा है। एक मजबूत ताकत है। उसका स्पष्ट स्वरूप है। उसमें  जीवन है। वह स्वयं ही हमारा मानसिक जीवन है। वह सत्य है। विचार ही मनुष्य का आदि रूप है। पानी में लकड़ी, पत्थर, गोली आदि फेंकने से जैसा आघात होता है, जैसा रूप बनता है, जो प्रभाव होता है, वैसा ही तथा उससे भी अधिक तेज आघात विचारों को फेंकने से होता  है। मनुष्य के जैसे  विचार होते हैं उसी दिशा में उसकी तीव्र उन्नति-अवनति होती जाती है।

■ आप अवकाश के क्षणों को व्यर्थ ही सिनेमा, क्लबों, व्यर्थ की बातचीत, ताश, चौपड़, गपबाजी, चुहल तथा बेमतलब की बातों में नष्ट कर देते हैं। ये तथाकथित मनोरंजन के साधन स्वस्थ नहीं है। जबकि स्वाध्याय से आप अपनी गुप्त शक्तियों का विकास करते हैं और समुन्नत आत्माओं के सत्संग में रहते हैं। वे आपको पवित्र कल्पनाएँ और विचार की नई दिशाएँ देते हैं। स्वाध्याय का साधन स्वस्थ और गुणकारी है। अतएव स्वाध्याय में प्रमाद नहीं करना चाहिए। यह हमारे  दैनिक जीवन का एक अंग होना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1 द्वितीयोSध्याय) श्लोक 21 से 23

पिप्पलाद उवाच
महाभाग! न ते प्रश्न: केवलं दीपयत्यहो।
अध्यात्मतत्वज्ञानस्य सारतथ्यात्युतापि तु ॥२१॥
लोककल्याणकृच्चापि, श्रीष्यज्येनं तु ये जना:।
सत्यं ज्ञास्यन्ति यास्यन्ति श्रेयो मार्गेऽविपत्तया ॥२२॥
भवन्त: सर्व एतस्या: समस्यायास्तु कारणम्।
समाधानं च शृण्वन्तु सावधानेन चेतसा ॥२३॥

टीका- हे महाभाग! आपका प्रश्न न केवल अध्यात्म तत्वज्ञान के सार तथ्यों पर प्रकाश डालता है, वरन् लोक कल्याणकारी भी है। जो इस शंका समाधान को सुनेंगे, वे सभी सत्य को समझेंगे, विपत्ति से बचेंगे और श्रेय-पथ पर चल सकने में समर्थ होंगे। आप सब लोग इस समस्या का कारण और समाधान ध्यानपूर्वक सुनें ॥२१-२३॥

व्याख्या- महाप्राज्ञ पिप्पलाद प्रश्न की गम्भीरता को अनुभव करते हुए कहते हैं कि ऐसी जिज्ञासा का समाधान हर सुनने वाले को सत्य का बोध कराता है। वस्तुत: सुनते तो अनेक हैं पर वे अन्दर तक उसमें प्रवेश कर उसे जीवन में कहाँ उतार पाते हैं। सुनने वाले जिज्ञासु साधक वृत्ति के हों, जन कल्याण ही जिनका उद्देश्य हो, वे कथा श्रवण कर उसे सार्थक कर देते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 41

👉 निर्माण से पूर्व सुधार की सोचें (भाग १)

महत्त्व निर्माण का ही है। उपलब्धियाँ मात्र उसी पर निर्भर हैं। इतना होते हुए भी पहले से ही जड़ जमाकर बैठी हुई अवांछनीयता निरस्त करने पर सृ...