मंगलवार, 31 दिसंबर 2019

👉 ईश्वर और विज्ञान

1970 के समय तिरुवनंतपुरम में समुद्र के पास एक बुजुर्ग भगवद्गीता पढ़ रहे थे। तभी एक नास्तिक और होनहार नौजवान उनके पास आकर बैठा, उसने उन पर कटाक्ष किया कि लोग भी कितने मूर्ख है विज्ञान के युग मे गीता जैसी ओल्ड फैशन्ड बुक पढ़ रहे है। उसने उन सज्जन से कहा कि आप यदि यही समय विज्ञान को दे देते तो अब तक देश ना जाने कहाँ पहुँच चुका होता, उन सज्जन ने उस नौजवान से परिचय पूछा तो उसने बताया कि वो कोलकाता से है और विज्ञान की पढ़ाई की है अब यहाँ भाभा परमाणु अनुसंधान में अपना कैरियर बनाने आया है।

आगे उसने कहा कि आप भी थोड़ा ध्यान वैज्ञानिक कार्यो में लगाये भगवद्गीता पढ़ते रहने से आप कुछ हासिल नही कर सकोगे।

सज्जन मुस्कुराते हुए जाने के लिये उठे, उनका उठना था की 4 सुरक्षाकर्मी वहाँ उनके आसपास आ गए, आगे ड्राइवर ने कार लगा दी जिस पर लाल बत्ती लगी थी। लड़का घबराया और उसने उनसे पूछा "आप कौन है??"

उन सज्जन ने अपना नाम बताया 'विक्रम साराभाई' जिस भाभा परमाणु अनुसंधान में लड़का अपना कैरियर बनाने आया था उसके अध्यक्ष वही थे।

उस समय विक्रम साराभाई के नाम पर 13 अनुसंधान केंद्र थे, साथ ही साराभाई को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी जी ने परमाणु योजना का अध्यक्ष भी नियुक्त किया था।

अब शर्मसार होने की बारी लड़के की थी वो साराभाई के चरणों मे रोते हुए गिर पड़ा। तब साराभाई ने बहुत अच्छी बात कही, उन्होंने कहा
"हर निर्माण के पीछे निर्माणकर्ता अवश्य है। इसलिए फर्क नही पड़ता ये महाभारत है या आज का भारत, ईश्वर को कभी मत भूलो।"

आज नास्तिक गण विज्ञान का नाम लेकर कितना नाच ले मगर इतिहास गवाह है कि विज्ञान ईश्वर को मानने वाले आस्तिकों ने ही रचा है, फिर चाहे वो किसी भी धर्म को मानने वाले क्यो ना हो।
ईश्वर सत्य है।

👉 अन्तराल के परिशोधन की प्रायश्चित प्रक्रिया (भाग ४)

न केवल शारीरिक वरन् मानसिक रोगों की भी इन दिनों बाढ़ आई हुई है। सिर दर्द, आधा शीशी, जुकाम, अनिद्रा, उन्माद, बेहोशी के दौरे आदि तो प्रत्यक्ष और प्रकट मस्तिष्कीय रोग हैं। चिन्ता, भय, निराशा, आशंका, आत्महीनता जैसे अवसाद और क्रोध, अधीरता, चंचलता, उद्दण्डता, ईर्ष्या, द्वेष, आक्रमण जैसे आवेश मनःसंस्थान को ज्वार-भाटों की तरह असंतुलित बनाये रहते हैं। फलतः मानसिक क्षमता का अधिकाँश भाग निरर्थक चला जाता है एवं अनर्थ बुनने में लगा रहता है। अपराधी दुष्प्रवृत्तियों से लेकर आत्म हत्या तक की अगणित उत्तेजनाएँ विकृत मस्तिष्क के उपार्जन ही तो हैं। तरह-तरह की सनकों के कितने ही लोग सनकते रहते हैं और अपने तथा दूसरों के लिए संकट खड़े करते हैं। दुर्व्यसनों और बुरी आदतों से ग्रसित व्यक्ति अपना तथा अपने साथियों का कितना अहित करते हैं, यह सर्वविदित है। पागलों की संख्या तो संसार में तेजी के साथ बढ़ रही है। जनसंख्या इसी चपेट में आई हुई दिखाई पड़ेगी। शारीरिक रोगों का विस्तार भी तेजी से हो रहा है। दुर्बलता और रुग्णता से सर्वथा अछूते व्यक्ति ही बहुत स्वल्प संख्या में मिलेंगे।

रंगाई से पूर्व धुनाई आवश्यक है। यदि कपड़ा मैला-कुचैला है, तो उस पर रंग ठीक तरह न चढ़ेगा। इस प्रयास में परिश्रम, समय और रंग सभी नष्ट होंगे। कपड़े को ठीक तरह धो लेने के उपरान्त उसकी रंगाई करने पर अभीष्ट उद्देश्य पूरा होता है। ठीक इसी प्रकार आध्यात्मिक प्रगति के लिए की गई साधना का समुचित प्रतिफल प्राप्त करने के लिए उन अवरोधों का समाधान किया जाना चाहिए जो दुष्कर्मों के फलस्वरूप आत्मोत्कर्ष के मार्ग में पग-पग पर कठिनाई उत्पन्न करते है। दीवार बीच में हो तो उसके पीछे बैठा हुआ मित्र अति समीप रहने पर भी मिल नहीं पाता। कषाय-कल्मषों की दीवार ही हमें अपने इष्ट से मिलने में प्रधान अवरोध खड़ा करती है।

उपासना का प्रतिफल प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि आत्मशोधन की प्रक्रिया पूर्ण की जाय। यह प्रक्रिया प्रायश्चित विधान से ही पूर्ण होती है। हठयोग में शरीर शोधन के लिए नेति-धोति, वस्ति, न्यौली-व्रजोली आदि क्रियाएँ करने का विधान है। राजयोग में यह शोधन कार्य यम-नियमों में करना पड़ता है। भोजन बनाने से पूर्व चौका-चूल्हा, बर्तन आदि की सफाई कर ली जाती है। आत्मिक प्रगति के लिए भी आवश्यक है कि अपनी गतिविधियों का परिमार्जन किया जाय। गुण-कर्म को सुधारा जाय और पिछले जमा कूड़े करकट का ढेर उठाकर साफ किया जाय। आयुर्वेद के कायाकल्प विधान में वमन, विरेचन, स्वेदन, स्नेहन आदि कृत्यों द्वारा पहले मल-शोधन किया जाता है, तब उपचार आरम्भ होता है। आत्म-साधना के सम्बन्ध में भी आत्मशोधन की प्रक्रिया काम में लाई जाती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 What are “Vyahritis”?

Q.7. What are “Vyahritis”?

Ans.  The Gayatri Mantra begins with enunciation of “Om” (Amen in Christianity and Aameen in Islam are its variants). “Om” is believed to be resonating all over the cosmos as the primordial sound. Spiritual-science considers it as one of the cosmic representations of omnipresent GOD (Shabda Brahma or Nad Brahma). Devotees attempt to simulate “Om” in audible frequencies by blowing in a conch shell, sounding a gong, ringing a large bell or simply by pronouncing “O-O-O-M”.

The ‘Vyahritis’ Bhoor, Bhuwaha and Swaha are the three amongst the five elemental streams of primordial energy emanating from “Om” (Ref. Gayatri Tatva Bodh). Spiritual-science refers to these streams as Brahma (The Creator), Vishnu (The sustainer), Mahesh (The Destroyer). The three primary attributes of animate and inanimate components of the cosmos - Sat, Raj and Tam are also known as Vyahritis. Though not part of the text of ‘Gayatri Mantra’, the ‘Vyahritis’ are considered as the fountainhead (Shirsha) of this Mantra and are used as its prefix.
Q.8. What is a Beej Mantra? How is it applied?

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 41

👉 क्या हम मनुष्य हैं?

क्या हम मनुष्य हैं? अटपटे से लगने वाले इस सवाल का जवाब बड़ा सीधा है। संवेदना में जितनी हमारी गहराई होगी-मनुष्यता में उतनी ही ऊँचाई होगी। और संग्रह में जितनी ऊँचाई होगी, मनुष्यता में उतनी ही नीचाई होगी। संवेदना और संग्रह जिन्दगी की दो दिशाएँ हैं। संवेदना सम्पूर्ण हो तो संग्रह शून्य हो जाता है। और जिनके चित्त संग्रह की लालसा से घिरे रहते हैं, संवेदना वहाँ अपना घर नहीं बसाती।
  
अरब देश की एक मलिका ने अपनी मौत के बाद कब्र के पत्थर पर निम्न पंक्तियाँ लिखने का हुक्म जारी किया- ‘इस कब्र में अपार धन राशि गड़ी हुई है। जो व्यक्ति अत्यधिक निर्धन, दीन-दरिद्र और अशक्त हो, वह उसे खोदकर प्राप्त कर सकता है।’ कब्र बनाये जाने के बाद से हजारों दरिद्र और भिखमंगे उधर से गुजरे लेकिन उनमें से कोई भी इतना दरिद्र नहीं था कि धन के लिए किसी मरे हुए व्यक्ति की कब्र खोदे। एक अत्यन्त बूढ़ा और दरिद्र भिखमंगा उस कब्र के पास सालों से रह रहा था। जो उधर से गुजरने वाले प्रत्येक दरिद्र व्यक्ति को कब्र पर लगे हुए पत्थर की ओर इशारा कर देता था।
  
और फिर आखिरकार वह इंसान भी आ पहुँचा, जिसकी दरिद्रता इतनी ज्यादा थी कि वह उस कब्र को खोदे बिना नहीं रह सका। अचरज की बात तो यह थी कि कब्र खोदने वाला यह व्यक्ति स्वयं एक सम्राट था। उसने कब्र वाले इस देश को अभी-अभी जीता था। अपनी जीत के साथ ही उसने बिना समय गँवाये उस कब्र की खुदाई का काम शुरु कर दिया। लेकिन कब्र की गहराई में उसे अपार धनराशि की बजाय एक पत्थर मिला, जिस पर लिखा हुआ था, ऐ कब्र खोदने वाले इंसान, तू अपने से सवाल कर-क्या तू सचमुच मनुष्य है?
  
निश्चय ही जो मनुष्य है, वह भला मृतकों को सताने के लिए किस तरह तैयार हो सकता है। लेकिन जो धन के लिए जिन्दा इंसानों को मुरदा बनाने के लिए तैयार हो, उसे भला इससे क्या फर्क पड़ता है। निराश व अपमानित वह सम्राट जब कब्र से वापस लौट रहा था तो लोगों ने कब्र के पास रहने वाले बूढ़े भिखमंगे को जोर से हँसते देखा। वह कह रहा था-मैं सालों से इंतजार कर रहा था, अंततः आज धरती के सबसे अधिक निर्धन, दरिद्र एवं अशक्त व्यक्ति का दर्शन हो ही गया। सचमुच संवेदना जिस हृदय में नहीं है, वही दरिद्र, दीन और अशक्त है। जो संवेदना के अलावा किसी और सम्पत्ति के संग्रह के फेर में रहता है, एक दिन उसकी सम्पदा ही उससे पूछती है-क्या तू मनुष्य है? और आज हम पूछें अपने आपसे-क्या हम मनुष्य हैं?

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १४९

👉 जीवन-सार्थकता की साधना—चरित्र (अन्तिम भाग)

चरित्रवान् बनने के लिये अपनी आत्मिक शक्ति जगाने की आवश्यकता होती है। तप, संयम और धैर्य से आत्मा बलवान बनती है। कामुकता, लोलुपता व इन्द्रिय सुखों की बात सोचते रहने से ही आत्म-शक्ति का ह्रास होता है। अपने जीवन में कठिनाइयों और मुसीबतों को स्थान न मिले तो आत्म-शक्ति जागृत नहीं होती। जब तक कष्ट और कठिनाइयों से जूझने का भाव हृदय में नहीं आता तब तक चरित्रवान् बनने की कल्पना साकार रूप धारण नहीं कर सकती।

चरित्र-निर्माण के लिये साहित्य का बड़ा महत्व है। महापुरुषों की जीवन कथायें पढ़ने से स्वयं भी वैसा बनने की इच्छा होती है। विचारों को शक्ति व दृढ़ता प्रदान करने वाला साहित्य आत्म-निर्माण में बड़ा योग देता है। इससे आन्तरिक विशेषताएं जागृत होती हैं। अच्छी पुस्तकों से प्राप्त प्रेरणा सच्चे मित्र का कार्य करती हैं। इससे जीवन की सही दिशा का ज्ञान होता है। इसके विपरीत अश्लील साहित्य अधःपतन का कारण बनता है। जो साहित्य इन्द्रियों को उत्तेजित करे, उससे सदा सौ कोस दूर रहें। इनसे चरित्र दूषित होता है। साहित्य का चुनाव करते समय यह देख लेना अनिवार्य है कि उसमें मानवता के अनुरूप विषयों का सम्पादन हुआ है अथवा नहीं? यदि कोई पुस्तक ऐसी मिल जाय तो उसे ही सच्ची रामायण, गीता, उपनिषद् मानकर वर्णित आदर्शों से अपने जीवन को उच्च बनाने का प्रयास करें तो चारित्रिक संगठन की बार स्वतः पूरी होने लगती है।

हमारी वेषभूषा व खानपान भी हमारे विचारों तथा रहन-सहन को प्रभावित करते हैं। भड़कीले, चुस्त व अजीब फैशन के वस्त्र मस्तिष्क पर अपना दूषित प्रभाव डालने से चूकते नहीं। इनसे हर घड़ी सावधान रहें। वस्त्रों में सादगी और सरलता मनुष्य की महानता का परिचय है। इससे किसी भी अवसर पर कठिनाई नहीं पड़ती। मन और बुद्धि की निर्मलता, पवित्रता पर इनका बड़ा सौम्य प्रभाव पड़ता है। यही बात खान-पान के सम्बन्ध में भी है। आहार की सादगी और सरलता से विचार भी वैसे ही बनते हैं। मादक द्रव्य मिर्च, मसाले, मांस जैसे उत्तेजक पदार्थों से चरित्र-बल क्षीण होता है और पशुवृत्ति जागृत होती है। खान-पान की आवश्यकता स्वास्थ्य रहने के लिए होती है न कि विचार-बल को दूषित बनाने को। आहार में स्वाद-प्रियता से मनोविकार उत्पन्न होते हैं। अतः भोजन जो ग्रहण करें, वह जीवन रक्षा के उद्देश्य से हो तो भावनायें भी ऊर्ध्वगामी बनती है।

चरित्र-रक्षा प्रत्येक मूल्य पर की जानी चाहिये। इसके छोटे-छोटे कार्यों की भी उपेक्षा करना ठीक नहीं। उठना, बैठना, वार्तालाप, मनोरंजन के समय भी मर्यादाओं का पालन करने से उक्त आवश्यकता पूरी होती है। सभ्यता का चिह्न सच्चरित्र, सादा जीवन और उच्च विचारों को माना गया है। इससे जीवन में मधुरता और स्वच्छता का समावेश होता है। जीवन की सम्पूर्ण मलिनतायें नष्ट होकर नये प्रकाश का उदय होता है जिससे लोग अपना जीवन लक्ष्य तो पूरा करते ही हैं औरों को भी सुवासित तथा लाभान्वित करते हैं। जीवन सार्थकता की साधना चरित्र है। सच्चे सुख का आधार भी यही है। इसलिए प्रयत्न यही रहे कि हमारा चरित्र सदैव उज्ज्वल रहे, उद्दात्त रहे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1964 पृष्ठ 11